अन्तस के पल का रथी : दिनकर की डायरी

अन्तस के पल का रथी : दिनकर की डायरी

मनोज शर्मा

शोधार्थी, हिंदी विभाग

दिल्ली विश्वविद्यालाय, दिल्ली

संपर्क: 9868310402

ईमेल: mannufeb22@gmail।com

सारांश

हिंदी के आधुनिक काल में नयी-नयी विधाओं का सूत्रपात हुआ। डायरी विधा आधुनिक काल की प्रमुख विधा है। इसका प्रचलन छायावाद के पश्चात हुआ। दिनकर नित्य डायरी लिखते थे। दिनकर की डायरी में उनकी बारह वर्ष की जिंदगी लेखा जोखा है। इस डायरी में उनका राजनितिक व् साहित्यिक रूप परिलक्षित होता है। दिनकर की डायरी में उनकी रूस तथा अन्य देशों में की गई यात्राओं का वर्णन है। डायरी एक वयक्तिक विधा है जिसमें डायरीकार के व्यक्तित्व का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। दिनकर की डायरी में भारत की संस्कृति के दर्शन होते है। इसमें उनके आध्यात्मिक व्यक्तिव के दर्शन होते हैं। दिनकर जी हिंदी के बड़े साहित्यकार ही नहीं थे उनका राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने हिंदी के प्रचार प्रसार में विशेष भूमिका अदा की। दिनकर की डायरी का हिंदी में महत्वपूर्ण स्थान है।

बीज शब्द : साहित्य, डायरी, गद्य,कथेतर, विधा, वैयक्तिक, अभिव्यक्ति ,विकास

शोध आलेख

हिंदी का आधुनिक काल कथेतर साहित्य का प्रसव काल है। आचार्य राम चन्द्र शुक्ल ने इस काल को गद्य काल की संज्ञा दी इसका कारण इस युग में गद्य विधाओं का विकास और विस्तार है। डायरी विधा पश्चिम साहित्य की देन है समुअल पीप्स की डायरी को पाश्चात्य साहित्य में काफी आदर के साथ देखा जाता है। भारत में डायरी लेखन का सूत्रपात छायावाद बीतने के पश्चात हुआ। हिंदी साहित्य में डायरी विधा सहज और स्वाभाविक रूप में विकसित हुई। वर्तमान में डायरी साहित्य काफी समृद्ध एवं प्रभावकारी है।

“ दिनकर जी अपने समकालीनों में मात्र एक ऐसे साहित्यकार थे जो सत्ता, साहित्य और जनता तीनों जगह समान रूप से लोकप्रिय थे। यही कारण है कि यह पुस्तक अपने कालखंड में हर स्तर पर अपनी ज़‍िम्मेवारी का निर्वहन करनेवाले एक महाकवि के मनोजगत की जिस यात्रा को प्रस्तुत करती है, वह प्रभावशाली भी है और प्रेरक भी। ‘दिनकर की डायरी’ भारतीय और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में न सिर्फ़ भावनाओं, विचारों का दस्तावेज़ है, बल्कि एक राष्ट्रकवि के संस्मरणों और जीवन-प्रसंगों की भी एक अमूल्य निधि है।” (1)

डायरी एक तरल विधा है इसे नित्य लिखा जाता है और जिसमें रोज नयी बाते लिखी जाती है। डायरी प्रिय मित्र की भांति होती है जिसमें लेखक स्वयं से की गयी बातों को या अनुभूत तथ्यों का प्रस्तुतीकरण करता है। डायरी का तथ्य अपेक्षाकृत पूर्ण आंतरिक और आत्मीय होता है। डायरी में जो कुछ भी लिखा जाता है उसे लेखक तिथि, वर्ष, स्थान आदि के साथ लिखता है। डायरी विधा संस्मरण के काफी नज़दीक मानी जाती है। यद्यपि डायरी अंगेजी का शब्द है जिसके लिए हिंदी में दैनिंदनी, दैनिकी आदि कई पर्याय देखे जाते हैं तो उर्दू में इसके लिए रोजनामचा शब्द उपलब्ध है किन्तु डायरी शब्द ही सर्वाधिक प्रयुक्त है।

रामधारी सिंह दिनकर ने डायरी के लिए कहा है

“दैनिकी के लिए अंग्रेजी में दो शब्द हैं। डायरी और जर्नल। डायरी वह चीज़ है जो रोज़ लिखी जाती है और जिसमें घोर रूप से वैयक्तिक बाते भी लिखी जा सकती है “ (2)

दिनकर जी ने डायरी 1961 से 1971 के मध्य लिखी। 1964 और 1965 के बीच की डायरी नहीं लिखी गयी है जिसके संबंध में वो लिखते हैं

“ विधिवत डायरी लिखना मैंने सन 1961 से आरम्भ किया। फिर 1964 और 1965 में वाइस चांसलरी में फंस जाने के कारण डायरी लिखने का काम प्राय: अवरूद्ध ही हो गया।”(3)

दिनकर ने अपनी डायरी को काफी आत्मीयता से लिखा है। दिनकर की डायरी का प्रकाशन उदयांचल प्रकाशन पटना से पहली बार 1973 में हुआ था। इसका सम्पादन अरविन्द कुमार सिंह ने किया है। उनकी डायरी से यह पता चलता है कि दिनकर अपने अंतिम दिनों में काफी टूटने लगे थे जिसके कारण वो आध्यात्म की ओर उन्मुख हो गए थे इसका कारण उनके पुत्र की असामयिक मृत्यु था। उनको अपने जीवन के अंतिम दिनों में परिवार की बहुत चिंता थी वो जीवित रहते अपने नाते नातियो के लिए बेहद चिंतित थे। दिनकर एक कर्मठ साहित्यकार हैं तथा लेखन के प्रति काफी सजग रहे हैं उन्होंने हिंदी के प्रचार प्रसार व उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

दिनकर जिस काम में संलग्न होते है फिर उस काम को पूरा किये बिना उस काम को नहीं छोड़ते। उर्वशी काव्य रचना लिखते समय वो काफी व्यथित रहे इसका प्रमाण डायरी के आरम्भ में दिखाई देता है।

02 जनवरी,1961 (दिल्ली)

“ कल रात उर्वशी काव्य पूरा हो गया। लगता है, माथे पर से एक बोझ उतर गया। पहले कवी चाहता है कि कविता मुझे पकड़ ले और जब कविता उसे पकड़ लेती है ,तब कवि से न सोते बनता है ना जागे बनता है। अधूरी कविता क्षण-क्षण उसके दिमाग में सुई चुभोती रहती है और जब तक कविता पूरी ना हो जाए, कवि दिन-रात परेशानी में पड़ा रहता है। रचना का यह दर्द उर्वशी के प्रसंग में मैंने आठ वर्ष तक लगातार भोगा है। “(4)

दिनकर की डायरी एक व्यक्तिगत डायरी है जो व्यक्तिगत होने के साथ-साथ सामाजिक, राजनितिक और सांस्कृतिक डायरी भी है। इस डायरी में दिनकर जी की भारतीय और विदेशी यात्राओं के मनोरम प्रसंग यत्र-तत्र दिखाई देते हैं। दिनकर जी बड़े साहित्यकार होने के साथ-साथ वो राज्य सभा के सदस्य भी थे अत: बड़े राजनेताओं से मिलकर हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए हमेशा ऊर्जावान दिखाई देते थे। दिनकर की डायरी में उनके कविता पाठो, संगोष्ठियों की भी सूचना मिलती है। दिनकर की डायरी में दिनकर के सपनों का भी ज़िक्र है। हजारीप्रसाद द्विवेदी, भवानी प्रसाद मिश्र और अन्य साहित्यकारों से उनके मेल मिलाप मुलाकातों को भी डायरी में उल्लेख है।

दिनकर की डायरी में रूस की यात्राओं को उन्होंने एक खंड में समायोजित किया है। रूस की डायरी के पहले पन्ने में उन्होंने लिखा है।

रूस की डायरी

“ जब भी मैं विदेश यात्रा पर जाता हूँ यात्रा की प्रमुख घटनाओं को नोट ज़रूर कर लेता हूँ। उन्हीं के आधार पर मेरे यात्रा-विवरण तैयार होते हैं। किन्तु रूसी यात्रा पर जब मैं निकला, मेरा स्वास्थ्य कमज़ोर था। बदकिस्मती से मैं अपने शिष्टमंडल का प्रधान बनाकर भेजा गया था। “आप इस शिष्टमंडल के लीडर हैं, “ऐसा तो सरकार ने लिखकर नहीं दिया था, मगर रूस में सहित्यिकों को जो उपहार देने थे, वे सभी उपहार मेरे जिम्मे पर दिए गए थे तथा ज़रूरी काग़ज़-पत्र भी मैं ही ले गया था। इसीलिए समझा ये गया की शिष्टमंडल की जिमीदारी मेरे सिर पर है “(5)

इस डायरी में रूस संबंधी यात्राओं के सारे आँकड़ें तिथिवार मौजूद हैं। दिनकर जी रूस ,मास्को में कई बार गए और जब भी गए वहां के सुन्दर मनोरम दृश्यों का चित्रण और वहां की संस्कृति को डायरी में देखा जा सकता है। जैसे

7 से 12 अक्तूबर, 1961 (मॉस्को)

“ मॉस्को दिल्ली के समान नहीं है। वह शंघाई, कलकत्ता और लन्दन से भी भिन्न है। पीकिंग में प्राचीनता की जो छाप दिखाई देती है, उसका कुछ आभास मॉस्को में भी है। यदि आध्यात्मिक दृष्टि से विचार करें तो मॉस्को की आत्मा कुछ-कुछ पेरिस की आत्मा से मेल खाती है। मगर एक बात में मॉस्को पेरिस से भी श्रेष्ठ दिखाई पढ़ा। मॉस्को में जो खुलापन दिखाई देता है वह पेरिस के खुलेपन से अधिक है।

मॉस्को हम रात में पहुंचे थे, जब पूरी नगरी शांत प्रकाश में दुल्हन सी जगमगा रही थी। लेकिन दिन भी मॉस्को का जादू बना हुआ था। मैंने लक्ष्य किया कि मॉस्को के जिस रूप पर मैं मोहित हो रहा हूँ, वह अवश्य ही इसकी प्राचीनता के कारण श्लाघ्य है, मानो औद्योगिक देश की इस मुख्य पुरी के भीतर कविता अभी भी जीवित और चेतन हो।” (6)

निराला ओर अपने पूर्ववर्ती साहित्यकारों के प्रति विशेष आदर भाव रखते थे तो दूसरी तरफ अपने समकालीन साहित्यकारों पन्त जी, बच्चन जी के साथ उनकी आत्मीयता स्पष्ट दिखाई देती है। जहाँ एक ओर राष्ट्रपति भवन में वो निराला जयंती मनाते हैं वहीँ प्रख्यात नाटककार मोहन राकेश के नाटक को देखकर उनकी खुले ह्रदय से प्रंशसा करते हैं। बच्चन, नरेंद्र और सुमन, वैरागी के साथ उन्होंने जब भी कहीं भी कविता पाठ किया उनका उल्लेख अपनी डायरी के पन्नो में तिथि और स्थान के साथ करना वो नहीं भूलते थे। साहित्य में किसी भी विधा में जो पसंद आया उसके विषय में उन्होंने अपनी डायरी में अवश्य लिखा जैसे ‘गुनाहो का देवता’ को पढ़ते हुए लिखा कि यह बहुत अच्छा उपन्यास है। वो बच्चन द्वारा लिखी ‘प्रवास की डायरी’ का अध्ययन करते थे। दिनकर की डायरी में उनकी दिनचर्या उनका श्रम, कर्म आदि सभी पहलुओं के दर्शन होते हैं जिन्हें वो काफी आत्मीयता से लिखते थे।

दिनकर जी चिंतनशील प्रवृति के व्यक्ति थे। वो एक और जहाँ आध्यात्म से जुड़े हैं वहीँ दूसरी और उनकी धर्म में गहरी आस्था है। वो नारी-पुरुष के सम्बन्धों पर काफी जोर देते हैं नारी के विविध रूपों का वर्णन करते हुए वो लिखते हैं।

05 मार्च, 1963 (दिल्ली)

बहुत-सी नारियां इस भ्रम में रहती हैं कि वे प्यार कर रही हैं। वास्तव में वे प्रेम किए जाने के कारण आनंद से भरी होती हैं। चूंकि वे इंकार नहीं कर सकती, इसलिए यह समझ लेती हैं कि प्रेम कर रही हैं। असल में यह रिझाने का शौक है, हल्का व्यभिचार है।प्रेम का पहला चमत्कार व्यभिचार को खत्म करने में है, पार्टनर के भीतर सच्चा प्रेम जगाने में है।(7)

साहित्य अकादमी की सभाओं, बैठकों और आयोजनों में उनकी शिरकत का कई जगह उल्लेख है इसका तात्पर्य यह है कि वो साहित्य के सच्चे प्रहरी थे। हिंदी के वो सच्चे प्रेमी थे पर कहीं-कहीं उन्होंने अपने भाषण अंग्रेजी भाषा में भी दिए जिसका उल्लेख उन्होंने पानी डायरी में भी किया है। दिनकर जी जब भी किसी राजनेता, कवि, साहित्यकार से मिलते तो उसका उल्लेख अपनी डायरी में करना कभी नहीं भूलते।

दिनकर जी राष्ट्र कवि के साथ-साथ लोक प्रिय कवि भी थे उनकी ख्याति ना केवल भारतवर्ष में ही रही बल्कि विदेशों में भी उनके साहित्य सृजन को खूब सराहा जाता रहा है। दिनकर जी के दूसरे वरिष्ठ साहित्यकारों से भी बहुत मधुर संबंध थे किन्तु फिर भी कुछ साहित्यकार उनके प्रति द्वेष भाव भी रखते थे। मैथिली शरण गुप्त (ददा) का डायरी में उल्लेख करते हुए वो लिखते हैं।

16 अप्रैल, 1962 (दिल्ली)

“ आज रेडियों की और से साहित्य-समारोह था। देशभर के लेखक और कवि आये थे। सभापतित्व कर रहे थे श्री गोपाल रेड्डी। मैंने भाषण शुरू तो किया हिंदी में किन्तु आगे मैं अंग्रेजी में बोलने लगा। अहिंदी- भाषी प्रान्तों के। विशेषत: दक्षिण के साहित्यकार बहुत प्रसन्न हुए। मुझे लगा मेरा बोलना सार्थक हो गया। किन्तु जब लोग चाय पर मिले, मुकुट बाबू और बांके बिहारी ने कहा, आपने अंग्रेजी में भाषण क्यों दिया? बांके बिहारी ने यह धमकी भी दी कि मैं साप्ताहिक हिन्दुस्तान में नोट लिखूंगा।।।। इधर मैथिली शरण गुप्त के व्यवहार से मैं बहुत दुखी रह रहा हूँ। वे मुझसे द्वेष क्यों करते हैं, कुछ समझ में नहीं आता। मैं तो उनके जूतों में बैठने को तैयार हूँ। ”(8)

गुप्त जी की नाराजगी डायरी के पन्नो में स्पष्ट: दिखाई देती है। मैथिली शरण गुप्त ने तो सरेआम संसद में उन्हें चंडाल तक कहा है फिर भी दिनकर जी ददा की बहुत इज्जत करते थे।

“ तू तो पूरा चंडाल है” मैंने कहा, “आज से ये चांडाल बनिया आपको कष्ट नहीं देगा।”(9)

दिनकर ने अपनी डायरी में वो सबकुछ लिखा जिसे उन्होंने अनुभूत किया। उनकी डायरी में भारतीय संस्कृति, विवाह, प्रेम आदि के संबंध में उनके विचार हैं। संक्षिप्त में  ‘दिनकर की डायरी’ भारतीय और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में न सिर्फ भावनाओं, विचारों का दस्तावेज है, बल्कि एक राष्ट्रकवि के संस्मरणों और जीवन-प्रसंगों की भी एक अमूल्य निधि है। दिनकर की डायरी में कहीं-कहीं उन्होंने अपनी कविताओं को भी स्थान दिया है। उनकी रोज़-रोज़ सभाएँ होती थी और उनपर बहुत-सी जिम्मेदारियां थी जिसके कारण वो अंतिम दिनों में बुरी तरह थक गये थे। उनके यहाँ नित्य कोई न कोई मिलने के लिए आता था इससे ये विदित होता है कि दिनकर एक मिलनसार और मददगार प्राणी थे। दिनकर ने जब तक डायरी लिखी उसमे तिथियों की क्रमबद्धता है प्राय: डायरी जहाँ भी गए डायरी लिखते समय उन्होंने स्थान का उल्लेख किया। साहित्यिक दृष्टि से दिनकर की डायरी में वे सभी गुण हैं जो एक साहित्यिक डायरी में होने चाहिए। इसीलिए दिनकर की डायरी एक अप्रतिम डायरी है जिसके पाठन के उपरान्त दिनकर के विविध रूप सामने आते हैं।

दिनकर जी एक विद्वान् साहित्यकार रहे हैं कहीं उनकी डायरी में ‘फिराक’ के शेर हैं तो कहीं ‘टॉलस्टॉय’ की पंक्तियाँ यानि उन्हें जितना मोह हिंदी से था उतना ही दूसरी भाषाओं से। वो जैसा अनुभव करते ज्यों का त्यों डायरी में उतार देते। वास्तव में यही डायरीकार का दायित्व है कि वो बिना किसी लाग लपेट के अपनी बात को डायरी में अपनी बात कह दे।

दिनकर जी की कविताओं में उनका उग्र रूप सामने आता है किन्तु डायरी उनके व्यक्तिव का आईना है जिसमें कहीं उनका शांत स्वभाव दिखाई देता है तो कहीं वो आध्यात्म की तरफ झुके हुए दिखाई देते हैं। रजनीश जी की भक्ति संबंधी अवधारणा को व्यक्त करते हुए वो अपनी डायरी में लिखते हैं

9 अगस्त ,1971 (ट्रेन में)

पंजाब मेल से दिल्ली के लिए प्रस्थान

“ रजनीश जी के अनुसार अवतरण प्रार्थना है, भक्ति है, आरोहण योग है, ध्यान है। जिसने सोचा, परमात्मा ऊपर है, उसने प्रार्थना सिखाई। जिसने समझा, परमात्मा नीचे है, रूट में है, उसने ध्यान सिखाया। रजनीश समझते हैं प्रार्थना के दिन लदते जा रहे हैं, ध्यान की महिमा बढ़ती जा रही है। स्वामी मुक्तानंद का जोर प्रार्थना और ध्यान, दोनों पर है। बल्कि वे सगुणोपासना पर अधिक जोर देते जा रहे हैं। मेरे लिए तो प्रार्थना छोड़कर केवल ध्यान पर निर्भर होना कठिन है। जो शक्ति भक्ति से द्रवित होकर नीचे नहीं उतरती, वह ध्यान से पकड़ाई दे सकती है? साधक को भक्ति और ध्यान, दोनों चाहिए।”(10)

दिनकर जी को किताबें पढने में अत्यधिक रुचि थी। वो किसी भी किताब के अध्ययन के उपरान्त जो भी उन्हें प्रेरक लगता उन्हें अपनी डायरी में नोट कर लेते। एक दिन जब यात्रा के दौरान उन्होंने विश्वनाथ जी का उपन्यास ‘सहस्त्रफण’ पढ़ा तो उससे इतने प्रभावित हुए की उसमे से कई नए मुहावरे अपनी डायरी में नोट कर लिए ताकि हिंदी में इनका प्रयोग किया जा सके। दिनकर सच्चे राष्ट्रकवि थे वो सदैव भारत वर्ष को आगे ले जाना चाहते थे। सन 1971 में जब एक तरफ युद्ध चल रहा था तो दूसरी ओर वो ओजस्वी कविताएँ लिखकर समरभूमि में वीरों की देह में अग्नि प्रज्वलित कर रहे थे। उन्होंने बाहुबल के स्थान पर बुद्धिबल पर अधिक जोर दिया है। युद्ध के समय किस तरह की कविता रची जानी चाहिए इसका उल्लेख करते हुए कहा है।

25 दिसम्बर, 1971 (पटना)

युद्ध की कविता

युद्ध की कविता कैसी होनी चाहिए

तो सुनो, हम बतलाते हैं

हम अकसर औरतों की सभाओं में जाते हैं

और कहते हैं,

माताओं, दुनिया बदल गयी है।

धरती और पीठ में

अब कोई भेद नहीं है।

न अब फर्क रहा कि

कौन घर पर है

और कौन लाम पर है

नापाम उसे भी जला देगा,

जो दुकान पर बैठा है,

जो खेती के काम पर है। (11)

दिनकर जी के साहित्य पर भारत वर्ष में ही नहीं अपितु विदेशों में भी शोध हुआ। डायरी में उन्होंने (स्वेतलाना) आदि शोधार्थियों का भी उल्लेख किया है। दिनकर जी ने अंतिम दिनों तक राष्ट्र में हिंदी की सेवा की वो अंत तक साहित्यकारों से मिलते रहे अथवा पत्र व्यवहार से जुड़े रहे। उनकी नियुक्तियां जहाँ भी हुई इसका ब्योरा डायरी में मिलता है। उन्हें राष्ट्र भाषा आयोग का सदस्य मनोनीत किया गया तथा वो भागलपुर विश्व विद्यालय के कुलपति बने। दिनकर जी 1972 तक अनवरत डायरी लिखी। वो अंत तक राष्ट्र और परिवार के प्रति समर्पित रहे। पुत्र राम सेवक की मृत्यु को उन्होंने अपने जीते जी देखा जिसके पश्चात वो धीरे-धीरे टूटते गए।

‘हारे को हरिनाम’ उनकी अंतिम रचना है जिसे पढकर विदित होता है की वो अपने अंतिम वर्षों में आध्यात्म की ओर उन्मुख होने लगे थे। ’हारे को हरिनाम’ एक आध्यात्मिक रचना है। दिनकर जब तक जीवित रहे उन्हें परिवार की और कन्याओं के विवाह की चिंता सताती रही। डायरी के अंतिम दिन भी पूनम के लिए वर की चिंता करते हुए वो लिखते हैं।

31 दिसम्बर, 1972 (पटना)

आज वर्ष का अंतिम दिन हैं। अब तक भी पूनम का वर नहीं मिला है। हे बहतर, जाते समय तिहतर के कानों में कह देना कि वह पूनम के होने वाले वर तक मुझे पहुंचा दे।

मन को शांत करने की शक्ति सबसे बड़ी शक्ति है। बड़ी कविता का जन्म तब होता है, जब मन का यंत्र निश्चेष्ट होकर पद जाता है। सूना है बड़े-बड़े आविष्कार भी मन की इसी निश्चल दशा में हुए हैं। सोचने की शक्ति बहुत बड़ा वरदान है, किन्तु न सोचने की शक्ति उससे भी बड़ा वरदान है। मन को स्वच्छ रखने का भी तरीका यही है कि मन को सोचने से रोक लिया जाए। योग कुछ करने का नाम नहीं है, वह केवल होने का नाम है यानी केवल बींग ,बिकबिंग नहीं। मन के शांत होने पर ही बींग की स्थिति आती है, जो किसी की नहीं है।

श्री अरविन्द: शरणं नम: (12)

निष्कर्ष : दिनकर की डायरी सहियिक दृष्टि से एक प्रोढ़ रचना है जिसके भीतर दिनकर जी के मह्त्वपूर्ण दस वर्षों की श्रम–साधना है। दिनकर जी वेनीपुरी से काफी प्रभावित थे हो सकता है डायरी लेखन की प्रेरणा उन्हें वेनीपुरी से ही मिली हो पर दिनकर की डायरी वेनीपुरी की डायरी से बिलकुल भिन्न है। संक्षिप्त में डायरी उनके व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति का अतिशय घनीभूत रूप है। अत: दिनकर की डायरी दिनकर के एक-एक क्षण की साक्षी है। उनकी डायरी के विषय में ALIAS P.P. कहती हैं

“दिनकर ने साहित्य, धर्म, राजनीति, विज्ञान, नैतिकता प्रेम और काम , नर-नारी समस्या आदि अनेक बिन्दुओं का परामर्श अपनी डायरी में किया है। दिनकर के व्यक्तिव की झलक यहाँ मिल जाती है। उनकी स्पष्टवादिता , धैर्य और साहस इसमें प्रकट होता है। दिनकर की शैली बोद्धिक प्रखरता , ओज और प्रसाद गुण से परिपूर्ण है। विषय वर्णन, स्वतंत्र प्रतिक्रियाओं और सुबोध भाषा शैली के कारण यह डायरी साहित्य में अपनी निज़ी सत्ता का प्रमाण देती है। अनेकायामी यह डायरी दिनकर और उनके विचारों को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।” (13)

अत: दिनकर की डायरी केवल डायरी ना होकर दिनकर के व्यक्तित्व का प्रतिबिम्ब है जिसमें एक दशक से अधिक समय का भाव पूर्ण वर्णन है।

संदर्भ सूची

  1. दिनकर,रामधारी सिंह, 2019,दिनकर की डायरी, लोकभारती प्रकाशन दिल्ली
  2. वही (भूमिका)
  3. वही (भूमिका)
  4. दिनकर, रामधारी सिंह , 1973 ,व्यक्तिगत निबन्ध और डायरी ,उदयांचल प्रकाशन–पटना
  5. (व्यक्तिगत निबन्ध और डायरी) पृष्ठ 55
  6. वही पृष्ठ 61
  7. वही पृष्ठ 62-63
  8. वही पृष्ठ 132-133
  9. वही पृष्ठ 96
  10. वही पृष्ठ 97
  11. वही पृष्ठ 266
  12. वही पृष्ठ 314
  13. वही पृष्ठ 379-380
  14. ALIAS P.P., 1994, दिनकर का गद्य साहित्य एक अध्ययन कोचिन विश्वविद्यालय, कोचिन पृष्ठ 277

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