संपादकीय: संक्रमण कालीन समय में मनुष्यता और विमर्श का दायित्व
हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जहाँ बदलाव की गति हमारी कल्पना से कहीं अधिक तेज है। तकनीक, समाज और राजनीति के मोर्चों पर रोज़ नए समीकरण बन और बिगड़ रहे हैं। इस संक्रमण कालीन समय में जहाँ एक तरफ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और भाषा प्रौद्योगिकी हमारे सोचने, लिखने और संवाद करने के तौर-तरीकों को बदल रही है, वहीं दूसरी तरफ सामाजिक और आर्थिक स्तर पर मध्यवर्ग नए अंतर्विरोधों से जूझ रहा है। जब तकनीक इंसानी मेधा की जगह लेने का दावा करने लगे और वैश्वीकरण के दौर में स्थानीय संस्कृतियाँ हाशिये पर जाने लगें, तब अकादमिक पत्रिकाओं का यह दायित्व बनता है कि वे समाज को केवल एक दिशा में बहने से रोकें और उसे तार्किक कसौटी पर परखें।
‘जनकृति’ का यह संयुक्त अंक (फरवरी-अप्रैल 2026) इसी बदलते समय की नब्ज को पकड़ने का एक ईमानदार प्रयास है। इस अंक में जहाँ डिजिटल माध्यमों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उभार के बीच हिंदी भाषा के भविष्य और उसकी तकनीकी चुनौतियों पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत किया गया है, वहीं उदारीकरण के दौर में भारतीय मध्यवर्ग के भीतर पनप रहे द्वंद्वों और सामाजिक सचाइयों को भी रेखांकित किया गया है। यह दिखाता है कि तकनीक चाहे जितनी आगे बढ़ जाए, उसके सामाजिक और मानवीय प्रभावों का मूल्यांकन अंततः इंसानी संवेदना ही कर सकती है।
इसके साथ ही, समाज के उन स्वरों को मंच देना हमारा निरंतर संकल्प रहा है जो मुख्यधारा की बहसों में अक्सर पीछे छूट जाते हैं। इस अंक में शामिल ‘दलित एवं आदिवासी-विमर्श’, ‘स्त्री-विमर्श’ और ‘क्वीर विमर्श’ (तृतीय लिंग का समाजशास्त्रीय अध्ययन) के आलेख महज अकादमिक शोध नहीं हैं, बल्कि यह उस अस्मिता और गरिमा की तलाश है जो हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। जब हम संविधान सभा में दक्षिणायनी वेलायुधन की मुखर आवाज को याद करते हैं या समकालीन उपन्यासों में जेंडर के नए आयामों को टटोलते हैं, तो हम वास्तव में एक अधिक समावेशी समाज की नींव मजबूत कर रहे होते हैं।
प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता आज सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रहा है। बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं के इस युग में भारत-नेपाल सीमा पर आपदा प्रबंधन और पूर्व चेतावनी प्रणालियों को लेकर किया गया पारिस्थितिकीय अध्ययन यह याद दिलाता है कि सीमाएं इंसानी हो सकती हैं, लेकिन प्राकृतिक आपदाएं किसी भूगोल को नहीं मानतीं। इसके समाधान के लिए हमें अपनी पारंपरिक ज्ञान परंपरा, योग और संस्कारों के समन्वय के साथ-साथ आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण को भी अपनाना होगा।
साहित्य, कला और रंगमंच हमेशा से समाज के प्रतिरोधी और रचनात्मक स्वर रहे हैं। प्रेमचंद, त्रिलोचन और हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्य से लेकर पारंपरिक नाटक और सिनेमा के बदलते स्वरूप तक, इस अंक की सामग्री पाठक को इतिहास-बोध और वर्तमान की चुनौतियों दोनों से एक साथ जोड़ती है। जैसा कि नामदेव जी ने एक साक्षात्कार में बहुत सटीक कहा है कि “बिना इतिहास बोध के कोई भी आलोचना सिर्फ शब्दों का जाल है।” ‘जनकृति’ शब्दों का जाल बुनने के बजाय इसी इतिहास बोध और सामाजिक सरोकारों को आपके सामने रखने का माध्यम है।
यह अंक देश-दुनिया के विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों, शोधार्थियों और रचनाकारों के इसी साझा वैचारिक मंथन का प्रतिफल है। आशा है कि ये शोध आलेख और रचनात्मक विमर्श आपको न केवल सोचने पर मजबूर करेंगे, बल्कि इस संक्रमण कालीन दौर में सही और तार्किक रास्ता चुनने में भी मदद करेंगे।
- डॉ. कुमार गौरव मिश्रा
विषय सूची
कला-विमर्श
Tradition and Transformation:
Reimagining the Aesthetic Conventions and Principles of Traditional Theatre in Post-colonial Indian Theatre) / Dr. Chavan Pramod R. 9
भारतीय दर्शन और मिथकीय संरचनाओं का सिनेमाई सन्दर्भ/ प्रो. (डॉ.) रमा, डॉ. विजय कुमार मिश्र 27
रंगमंच का बदलता स्वरूप / डॉ. प्रदीप कुमार 38
दलित एवं आदिवासी -विमर्श
दक्षिणायनी वेलायुधन: भारतीय संविधान सभा की मुखर दलित आवाज/ डॉ. सुमीत कुमार गुप्ता, डॉ. प्रीति कुमारी 49
प्रेमचंद संबंधी विमर्श और दलित आलोचना/ भगवान साहु 80
दिव्य आलोक और गद्दी जनजाति : एक समाजशास्त्रीय अध्ययन / डॉ. अशोक कुमार, अक्षय कुमार 89
स्त्री-विमर्श
Standpoint Theory: A Feminist Approach / Kalyani Singh 102
भारत में महिलाओं के संवैधानिक एवं कानूनी अधिकार: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन / हिमांशु नागदा 114
मातृत्व : स्नेह, संवेदना, चरित्र और राष्ट्र निर्माण की यात्रा / डॉ.मनोज शर्मा 123
क्वीर विमर्श
21वीं सदी के हिंदी उपन्यासों में तृतीय लिंग – एक समजशास्त्रीय अध्ययन/ डॉ. गुड्डू कुमार 129
मीडिया-विमर्श
हिंदी डिजिटल मीडिया : आर्थिक प्रासंगिकता और विज्ञापन प्रभाव / डॉ. श्रीप्रकाश पाल 143
हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों की कलम, कर्म और क्रांति की कालजयी कथा / डॉ. शैलेश शुक्ला 154
शिक्षा-विमर्श
Educating for a Sustainable future: NEP 2020 and its role in the Development of Odisha / Rukadhara Chhatria, Dr. Subhadra Maharana 159
Bhagavad Gita and Teacher Education: A Framework for Ethical and Reflective Teaching Practices / Shrutika Sahu 172
भाषिक-विमर्श
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और हिंदी भाषा का भविष्य: अवसर और चुनौतियाँ / प्रदुन कुमार 186
भाषा प्रौद्योगिकी में कृत्रिम मेधा की बढ़ती भूमिका / डॉ. दिनेश कुमार गुप्ता 203
राजनीतिक -विमर्श
सरदार वल्लभ भाई पटेल का रियासतों की विलय में योगदान / अनिल 214
एक युग का समापन: लालू से नीतीश और उत्तर-नीतीश बिहार तक / डॉ. सीमा कुमारी 224
पारिस्थितिकीय -विमर्श
Enhancing Cross-Border Resilience: Integrating Community-Based Disaster Risk Reduction with Indo-Nepal Flood Early Warning Systems. / Dr. Anand Bijeta, Mr. Mukund Kumar 232
समाजशास्त्रीय -विमर्श
उदारीकरण और भारतीय मध्यवर्ग: स्वरूप, चुनौतियाँ और अंतर्विरोध / डॉ. अनूप श्री विजयिनी 239
साहित्यिक-विमर्श
लोकांचल में गहन संपृक्ति से उपजी कविताएं / डा. सत्यनारायण स्नेही 250
मेहरुन्निसा परवेज़ के ‘कोरजा’ उपन्यास में चित्रित समस्याएँ / डॉ. सुफियाबानु सब्बीरहुसेन मनसुरी 269
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंधों में भारतीय ज्ञान परंपरा / प्रभात मिश्रा 276
कृष्ण भक्त कवियों द्वारा राम कथा का वर्णन / डॉ. धर्म दास अटवाल 286
जन सरोकारों के कवि त्रिलोचन / डॉ. प्रेम कुमार 292
अंजना वर्मा की कविताओं का संवेदना-आलोक / डॉ० मनोज कुमारी 303
प्रेमचंद और फकीर मोहन सेनापति के कथा-साहित्य में सामाजिक यथार्थ / डॉ. करूणा खलखो 320
मुंडा आदिवासी समुदाय : सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक विशिष्टता / एमलेन बोदरा 329
‘चारू चन्द्रलेख’ में विन्यस्त मध्यकालीन भारतीय समाज और उसकी समकालीन प्रासंगिकता / प्रवीण कुमार विश्वकर्मा 341
लोक-सांस्कृतिक विमर्श
लोकप्रिय संस्कृति और भारत/ विपिन यादव 352
अनुवाद एवं निर्वचन विमर्श
हिंदी अनुवाद और वैश्वीकरण / रितिका भारद्वाज 364
साक्षात्कार
कथाकार राकेश कुमार सिंह के साथ साहित्यिक संवाद / साक्षात्कारकर्ता: दिव्या रानी 374
साहित्यिक रचनाएँ
साहित्यिक रचनाएँ: कविता
प्रियंका अनीता 388
साहित्यिक रचनाएँ: कहानी
खूनी सड़क / संजय अलंग 390
साहित्यिक रचनाएँ: व्यंग्य
भला आदमी / हनुमान मुक्त 396
पुस्तक समीक्षा
‘उपेक्षित’ को ‘अपेक्षित’ महत्त्व/ समीक्षक: सर्वेश मिश्र 401
झील, हिज्र, हर्फ़, सागर “मैं और मेरा मन” / समीक्षक- तेजस पूनियां 406
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