हिंदी के समकालीन स्त्री कथा साहित्य में क्वीर विमर्श
डॉ. हेमा नारायण
सहायक आचार्य एवं विभाग अध्यक्षा,
हिंदी विभाग, कुरियाकोस एलियास कॉलेज, मान्नानम, कोट्टायम, केरल
मोबाईल: 7306246093
ईमेल: Hemanarayanan@kecollege.ac.in
सारांश
मनुष्य समाज में विभिन्न लैंगिक पहचान के लोग रहते हैं। मुख्यधारा समाज इनमें से क्वीर को नकारते हैं लेकिन समकालीन स्त्री लेखन सबको अपनाता है। क्वीर के जीवन संघर्षों की अभिव्यक्ति स्त्री लेखन में सशक्त रूप से हम देख सकते हैं। क्वीर के प्रति स्त्री लेखन की दृष्टि मानवीय है।
बीज शब्द- क्वीर, समाकलीनता, स्त्री, लेखन, हिजड़ा, समलैंगिक, क्रॉस ड्रेसर
शोध आलेख
विविधता दुनिया का शर्त है। इस दुनिया में हर एक चीज एक दूसरे से भिन्न है। विविधता उनकी पहचान भी है। मनुष्य जाति में भी विविधता है। यौनता (sex) तथा लिंग(Gender) के आधार पर मनुष्य में विविधता हम देख सकते हैं। आमतौर पर इन दो शब्दों को पर्यायवाची शब्द माने जाते हैं। लेकिन दोनों में भिन्नता हैं। यौनता का संबंध मनुष्य के जैविक शरीर से है। लिंग का संबंध मनुष्य की इच्छाओं से है। स्त्री पुरुष के लैंगिक संबंध को मुख्य धारा समाज माने जाते हैं। लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर आदि सब हमारे बीच है। इन विविधता को समाज नकारते हैं। इसका कारण हमारी अज्ञाता, सत्ता एवं अंधपरंपरा है। अनादिकाल से यह लोग भी हमारे बीच मौजूद है। लेकिन सत्ता उन्हें दबाते थे । स्त्री-पुरुष के लैंगिकता को मान्यता देते रहे थे।इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि इस संबंध का आधार वंश वृद्धि से है। इसके आधार पर पारिवारिक, सामाजिक धार्मिक संस्थाओं का निर्माण हुआ। अपने मानवीय अधिकारों से वंचित ये अल्पसंख्यक लोग खुद अपने आप से, इस समाज से भाग रहे थे। समकालीन संदर्भ में यह लोग अपने अधिकार का मांग करते हैं। यह मांग उनकी आत्मस्वीकृति का प्रतिफलन एवं अस्मिता की स्थापना है।
- क्वीर (Queer)
डॉ के वनजा ने क्वीर विमर्श नामक अपने पुस्तक में इस शब्द को यों परिभाषित करती है कि-” क्वीर (Queer) अंग्रेजी शब्द है, अर्थ है- स्ट्रेंज( Strange) ,आँड (Odd), पेक्युलियर(Peculiar), अनयूज्अल (Unusual), एक्सेंट्रिक(Eccentric) आदि। इसका मतलब वह कुछ विशेष है,साधारण स्वभाव का नहीं है, अजनबी है। यहाँ क्वीर शब्द एलजीबीटी का प्रतिनिधित्व करता है, एलजीबीटी आंदोलन ने अपने को द्योतित करने के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया।”( डॉ के वनजा – क्वीर विमर्श- पृष्ठ-28)। इस शब्द में लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर, ट्रांजैक्शन, ट्रांसमेन, ट्रांस वूमेन, इंटरसेक्स, आलैंगिक, कोत्ती, पान्ती, डबल डेकर, क्रॉसड ड्रेसर आदि सब कुछ इस शब्द में समाहित हो जाते हैं।
- समकालीनता
समकालीनता अंग्रेजी के कंटेंपरेरी शब्द का पर्यायवाची हिंदी शब्द है। इस शब्द को दो दृष्टि से व्याख्यायित कर सकते हैं । समय सीमा को पार करते हुए हर एक काल के साथ चलने वाली रचनाओं को समकालीन रचनाएंँ कहा जा सकता है। तत्कालीन समय में लिखित रचनाओं को समकालीन रचनाओं के अंतर्गत रख सकते हैं। इन रचनाओं में वर्तमान समय की विडंपनायें, विद्रोह, प्रतिरोध आदि सब कुछ देखने को मिलते हैं। यहाँ लेखक वर्तमान समय पर पैनी दृष्टि रखते है। वर्तमान समय की सूक्ष्म आलोचना भी करते हैं। इसके आधार पर नवीन रचनाओं का निर्माण भी करते हैं। इन रचनाओं द्वारा लेखक समाज को अवगत कराने की कोशिश करते हैं। आधुनिक रचनाओं का विकसित रूप है समकालीन रचनाएँ। आधुनिक साहित्य में मनुष्य की चर्चा हम देख सकते हैं। लेकिन समकालीन साहित्य में आते समय मनुष्य की परिकल्पना में काफी विकास हम दे सकते हैं। हाशियेकृत लोगों की चर्चा यहाँ प्रमुख रूप से हो रही है। इनमें एक है क्वीर। उनकी चर्चा करते हुए जनता के मन में उनके प्रति जो नकारात्मक दृष्टि मौजूद है उसमें परिवर्तन लाना, उनको अपना अधिकार दिलाना, उनको एक बेहतर जिंदगी प्रदान करना आदि सब लेखक का प्रमुख लक्ष्य होते हैं। अपनी रचनाओं के ज़रिए लेखक उनको मानवीय रूप प्रदान करते हैं। समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की कोशिश भी करते हैं।
- स्त्री लेखन
स्त्री द्वारा लिखित रचनाओं को स्त्री लेखन या महिला लेखन नाम से जाने जाते हैं। इनमें स्त्री के जीवन दृष्टि, जीवन अनुभूतियां ,परेशानियां, देवी हुई भावनाओं, स्वत्व, प्रतिरोध आदि सब देखने को मिलते हैं। पुरुष संकल्पना उनसे भिन्न एक नया स्त्री रूप यहाँ हम देख सकते हैं। यह नवीन स्त्री रूप आदर्श स्वरूपों का विरोध करते हुए अपने यथार्थ रूप की अभिव्यक्ति करता है। प्रारंभिक काल के स्त्री लेखन पुरुष लेखन का अनुकरण था। लेकिन बाद में परिवर्तन आया है। इस परिवर्तन का प्रमुख आधार स्त्री मुक्ति आंदोलन और स्त्रीवाद की विभिन्न धाराएँ हैं। शुरुआती दौर में स्त्री सिर्फ अपनी जिंदगी के बारे में सोचती थी। लेकिन अब वह समझती है कि स्त्री की दुनिया मात्रा उसकी इर्द-गिर्द में सीमित नहीं है। उसकी दुनिया विशाल है। वहांँ परिवार, समाज, समाज के हर एक हिस्से, शोषित-पीड़ित आम जनता, हाशिए कृत लोग आदि सबके लिए अपना स्थान है। उन सबके प्रगति के बिना अपना प्रगति नामुमकिन है। अपने समाज शोषित पीड़ित लोगों के प्रति हमदर्दी दिलाकर स्त्री लेखन उनको बेहतर जिंदगी प्रदान करने की कोशिश करता है। इसलिए क्वीर विमर्श भी स्त्री लेखन का अंश बन गया है।
- हिजड़ा
हिजड़ा स्त्री- पुरुष से भिन्न है। मुख्य धारा समाज में स्त्री- पुरुष के लिए स्थान है। एक लिंग में जन्म लेकर दूसरी लिंग की इच्छाओं को प्रकट करने वाले लोगों को ट्रांसजेंडर नाम से पुकारे जाते हैं। स्त्री के शरीर और पुरुष के मन के साथ जन्म लेने वाले, पुरुष के शरीर और स्त्री के मन के साथ जन्म लेने वाले लोग इसमें शामिल होते हैं। शल्य चिकित्सा के जरिए लिंग परिवर्तन करने वाले लोगों को ट्रांस सेक्सुअल कहे जाते हैं। इसमें ट्रांस मैन और ट्रांस विमन दोनों शामिल हैं ।जन्म से सेक्स का पहचान न करनेवाले लोगों को इंटर सेक्स कहा जाता है। उनमें स्त्री और पुरुष के लिंग दोनों एक में हैं। इन सबको आम समाज हिजडा नाम से पुकारते हैं । ये सब लोग बचपन से ही शोषण का शिकार है।
समकालीन स्त्री लेखन में उनके जीवन के यथार्थ को हम देख सकते हैं। उनके जीवन के आदि से अंत तक संघर्ष हम देख सकते हैं। उनका संघर्ष स्वत्व निर्माण से जुड़े हुए हैं ।चित्रा मुदगल के पोस्ट बॉक्स नंबर 203 नाला सोपरा में हिजड़ा अपनी अम्मा के लिए चिट्ठी लिखती है। बच्चे के जन्म से लेकर मुख्यधारा समाज उन्हें स्त्री और पुरुष के रूप में विभाजित करते हैं। किसी और के लिए वहाँ कोई स्थान नहीं है। इस रचना के हिजड़ा को भी घरवालों ने विनोद नाम दिया है। लेकिन उसने वह नाम को छोड़ दिया है क्योंकि उनके भीतर एक स्त्री रहती है। अपनी पहचान को बनाने के लिए वह अपना घर छोडती है।
हिजड़ा लोग अपने शरीर से संघर्ष करती है। यमदीप उपन्यास में नाजबीवी एक इंटरसेक्स है । उसके शरीर में स्त्री तथा पुरुष दोनों की विशेषताएं हैं। वह कहती है कि-” एक तो भगवान ने हमसे मजाक करके भेजा है… इंसान अलग देख हंसता है”( नीरजा माधव- यमदीप- पृष्ठ-20)। यहाँ वह अपने शरीर को अपूर्ण समझती है। उनका मानसिक संघर्ष इन शब्दों में व्यक्त है। नारी उधार ग्रह में स्त्रियों के प्रति होनेवाले अत्याचार देखकर नाजबीबी ऐसा कहती है कि-” … भगवान ने मुझे हिजड़ा बनाकर ठीक ही किया। अगर यह ना बनाता तो मुझे जरूर औरत बनाता और तब यह सारे अत्याचार मुझे भी खेलना पड़ते।”( नीरजा माधव- यमदीप- पृष्ठ- 287) इससे हमें पता चलता है कि शोषण का कारण शरीर नहीं, बल्कि हमारी दृष्टि है। उसमें परिवर्तन लाना है।
बचपन से होने वाले पारिवारिक व सामाजिक शोषण की वजह से ज्यादातर हिजड़ा लोग अशिक्षित व अल्पशिक्षित हो जाते हैं। उनके जीवन यथार्थ को व्यक्त करते हुए यमदीप उपन्यास के मेहताब गुरु कहता है कि -” किसी स्कूल में आज तक किसी हिजरा को पढ़ते लिखते हुए देखा है ? किसी कुर्सी पर हिजडा बैठा है ?” ( नीरज माधव- यमदीप- पृष्ठ- 94)। वर्तमान संदर्भ में हिजडा लोग अपने इस अधिकार के लिए आवाज़ उठाते हैं । इसके फलस्वरूप आज वे पढ़ते हैं, उच्च स्थान पर नौकरी करते हैं। यह सब उनके प्रतिरोध का फल है।
अशिक्षित व अल्प शिक्षित हिजडा लोग आजीविका चलाने के लिए दूसरों के घर में खुशियों के अवसर पर नाचते हैं, गाते हैं, कुछ लोग भीख मांगते हैं और अन्य कुछ लोग वेश्यावृत्ति भी करते हैं। कहीं लोग यौन रोगों से पीड़ित होते हैं। कुछ लोग दूसरों की गिरिया यानी रखैल और कोती यानी रखैल हिजडा बन जाते हैं। महानगरों के लोग अपने आप में सीमित हो गये हैं। हिजडा लोगों की आमदनी में कामी आयी है। हिजडा लोगों के साथ यौन संबंध रखने वाले लोग भी दूसरों के सामने उन्हें छिपाते हैं। यमदीप उपन्यास नाजबीबी अपने जीवनसाथी के बारे में कहती है कि- ” वह क्या जाएगा मेरे साथ? रिक्शे में कभी-कभार साथ बैठकर चलता है तो अपने मुंह पर गमछा लपेट लेता है, ताकि कोई पहचान ना ले” ( नीरजा माधव- यमदीप- पृ- 46)। हिजडा लोग को सब हीन दृष्टि से देखते हैं। सोना की पढ़ाई हेतु नाजबीबी स्कूल में जाती है। तब वहाँ सब लोग उस पर मजाक करते हैं। समाज की वजह से नाजबीवी की पढ़ाई बंद हो गई है। उसके भाई जी ने उससे कहा- ” तुम परिवार में रह नहीं सकती, हम रख दे नहीं सकते। इसलिए यह समझ लो कि तुम अनाथ हो। कोई नहीं तुम्हारा दुनिया में।”( नीरजा माधव- यमदीप- पृष्ठ- 82)। यात्रा के समय हिजड़ा लोगों के साथ बैठने के लिए कोई तैयार नहीं होता है। हिजडा लोगों के लिए जगह मिलना भी मुश्किल है। मुख्य धारा समाज उन्हें हाशियेकृत किये हैं। उनके जीवन यथार्थ के चित्रण के जरिए जनता के नज़रिए में परिवर्तन लाने की कोशिश करते हैं समकालीन स्त्री लेखन।
हिजड़ो के यौन शोषण करने वाले लोग भी हमारे समाज में है। गीतांजलि चाटर्जी का उपन्यास तीसरे लोग में किसना नामक का हिजडे का यौन शोषण करता है मिश्र। लेखिका कहती है कि- ” समस्त सीमा रेखा को लांघते हुए वासना के अंधे हुए उस वृद्ध ने अभागे किसना को किसी भयभीत हिरणशावक सा अपने चौडे खुरदरे पंजों में दबोच लिया और उसके भरे रसीले अधरों से खेलने लगा। किसना ने काफी मन्नतें की। अपने को बचाने की कोशिश भी कींं। रोया, गिड़गिड़ाया, पर उस कामांध राक्षस की शक्ति के समक्ष वह गरीब दब के रह गया।”( गीतांजलि चटर्जी -तीसरे लोग- पृष्ठ- 46 ) यहाँ मालिक किसना का बलात्कार करता है। बार-बार होने वाले यौन शोषण से मुक्ति पाने के लिए किसना मिश्र जी की हत्या करके भाग जाता है। वह खुद यौन कर्मी बन जाता है। ये सब कुछ का प्रतिरोध है। अंत में ऐयिड्स से पीड़ित वह मर जाता है। यहाँ किसना का प्रतिरोध, विवशता, जीवन यथार्थ आदि सब हम देख सकते हैं।
हिजड़ा लोग वेश्यावृत्ति करते हैं। लेकिन उनके लिए अपना नियम है। यमदीप उपन्यास के नाजबीबी रहती है कि- ” हम लोग सुधरे हैं तो क्या हुआ? कुछ उसूल है हमारा भी। हम वेश्या थोड़े ही है। एक तो जल्दी हम ये करम फानते नहीं, और किसी मजबूरी में गिरिया बना ही लिया किसी को तो जीवन भर निभाते हैं। वह भले ही हमें छोड़ दे, पर हम वफादार कोती की तरह तमाम उम्र बिता देते हैं।” ( नीरज माधव- यमदीप- पृष्ठ-137) हिजरा लोग मूलतः मनुष्य है। इसलिए मानवीय भावनाओं के लिए उनकी जिंदगी में सबसे महत्वपूर्ण स्थान है।
हिजडा संस्कृति का जिक्र समकालीन स्त्री लेखन में है। नीरज माधव का यमदीप नामक उपन्यास में हिजडा लोगों के बीच प्रयुक्त कई शब्दों का प्रयोग लेखिका ने किया है। जैसे- छिबरी( लिंग रहित हिजड़ों के लिए प्रयुक्त सांकेतिक भाषा), टेपका (नवजात शिशु), आदि। यह भाषा उनकी संस्कृति का अंश है। हिजडा बस्ती का चित्रण भी इस उपन्यास में है। लेखिका कहती है कि- ” बीस पच्चीस छोटे- बड़े घरों वाली यह हिजरा बस्ती शहर में रहते हुए भी शहर से बहुत दूर है। दिन में अपने-अपने क्षेत्र में गा- बजा कर अपना जीवन यापन करने वाले यह लोग आपस में मिल- जुल कर रहते हैं। एक दूसरे के सुख-दुख में बराबर भागीदार। कभी-कभी झगड़ा होते भी है तो गुरुजी( मेहताब गुरु) के यहां जाकर सब शांत हो जाता है। गुरुजी पूरे शहर के हिजड़ों के गुरु हैं। हिजड़ा समुदाय में उनकी ही बात चलती है। उनका अनुशासन ही सर्वोपरि है। उनका निर्णय सर्वमान्य है। कब किस किसे किस क्षेत्र में नाचना गाना है? किसी के बीमार होने पर किसे उसकी सेवा टहल करनी है? उसकी कमाली ना होने पर भी उसका एक हिस्सा गुरुजी के पास सुरक्षित हो जाता है। वैसे वैसे अपनी कमाई का एक मोटा सा हिस्सा गुरुजी के पास ईमानदारी से जमा कर देना शहर के तमाम हिजड़ो का प्रतिदिन का नैतिक दायित्व है।” ( नीरजा माधव -यमदीप -पृष्ठ-16 )। हिजड़ा लोग शहर के हिस्सा है ,लेकिन शहर से अलग रहते हैं। उनके बीच माननीय भावनायें है। गुरु के लिए उनकी जिंदगी में हम सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। वे बेसरा माता की आराधना करते हैं। भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृति में जन्म होने के बावजूद वे एक ही संस्कृत में लीन हो जाते हैं।
- समलैंगिक
स्त्री पुरुष के यौन संबंधों को मुख्य धारा समाज मानते हैं। लेकिन एक स्त्री और दूसरी स्त्री के बीच( लेस्बियन ) तथा एक पुरुष और दूसरे पुरुष के बीच( गे) के यौन संबंधों को समाज ह न दृष्टि से ही देखता है। लेकिन यह कोई मानसिक विद्ररूपता या नई बात नहीं है। नारीवाद के विभिन्न दशाओं में पुरुष के प्रति अपना विद्रोह प्रकट करने के लिए कई स्त्रियों ने खुद समलैंगिकता को स्वीकार किये थे। लेकिन विद्वानों की राय में समलैंगिकता का निर्धारण मनुष्य मस्तिष्क ही करता है।
गीतांजलि चटर्जी का उपन्यास है तीसरे लोग। इसमें स्मारक नामक पात्र गे है। वह कहता है कि- ” ….. मैं स्वयं पुरुष के रूप में होने पर भी किसी अन्य पुरुष के काया से ही उत्तेजना पाता हूँ, बिल्कुल सामान्य नियम के विरुद्ध और यही सबसे बड़ी विडंबना है कि यह पुरुष काया के भीतर समस्त स्त्रीयोजित गुण है, लालसा है, कामना है, जो तुम्हारे या अन्य किसी भी स्त्री के भीतर होती है xxxx आई एम ए गे ।” ( गीतांजलि चाटर्जीजी- तीसरे लोग- पृष्ठ-37) वह दूसरे पुरुष के साथ यौन संबंध जोड़ना चाहता है। उसे अपने जीवनसाथी के रूप में देखना भी चाहता है। लेकिन उसको समझने में उसके पारिवारिक लोग असमर्थ हो जाते है। उसकी पत्नी उससे पूछता है कि-” क्या उचित चिकित्सा द्वारा आप एक साधारण पुरुष नहीं बन पाएंगे?” ( गीतांजलि चाटर्जी- तीसरे लोग -पृष्ठ -69) अपनी पत्नी को समझाते हुए स्मारक कहता है कि-“… इलाज तो बीमारी का होता है। समलैंगिकता कोई रोग नहीं एक प्रवृत्ति है। एक बिहेवियर..xxx मैं पैदाइशी समलैंगिक हूँ, जिसमें मेरा कोई दोष नहीं । दूसरे पुरुषों की तरफ मेरी भी मानसिकता, मेरी सोच भी नॉर्मल है, फर्क इतना है कि मेरी तरह तीसरे किस्म के लोग दोहरी जिंदगी जीते हैं।” ( गीतांजलि चटर्जी- तीसरे लोग- पृष्ठ -69,70)। अपने व्यक्तित्व के बारे में स्मारक को सही पता है। वह कभी-कभी गे क्लबों में जाता है। वहाँ आने वाले लोगों के साथ वह अपने मानसिक सामाजिक दशा के बारे में चर्चा करता है।
- क्रॉस ड्रेसर / ट्रांस्वेस्टीज
मुख्यधारा समाज स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग कपड़ा निर्धारित किया है । लेकिन मनुष्य में ऐसे भी लोग हैं जो यौन संबंधों में विपरीत लिंग के कपडा पहनते हैं। ऐसे लोगों को क्रॉस ड्रेसर कहते हैं। डॉक्टर के वनजा की राय में -” यदि पुरुष स्त्रियों का वेश पहनता है तो उसे क्रॉसड्रेसर कहते हैं वैसे ही स्त्री पुरुष के लिए निर्धारित ड्रेस पहनती है तो वह भी क्रोस ड्रेसर है।” ( डॉ. के वनजा – क्वीर विमर्श- पृ 30) हिंदी के समकालीन महिला कथा साहित्य में ऐसे लोगों को हम देख सकते हैं। गीतांजलि चटर्जी के तीसरे लोग नामक उपन्यास में जोगिया नामक एक पात्र है। उसके पति विप्लव कई स्त्रियों के साथ संबंध रखने वाले एक पुरुष था। शादी के बाद उसने अपनी पत्नी को सिर्फ एक जिस्म के रूप में ही देखा। उनके संबंधों में दरार आया। विप्लव अपने मित्र माइक के साथ यौन संबंध करता है। इसके बारे में जोगिया इस प्रकार कहती है कि-” विप्स ने मेरी साड़ी पहनी हुई थी। गले में हीरों का हार ।होंठों में लिपस्टिक, माथे पर बिंदिया और दोनों कामांध वासना की विकृत मनोवृति के लिए इस तरह से लिप्त थे और ऐसी भी वीभल्स, पाश्विक कामलीला में मग्न थे, जो मैं बात नहीं सकती।”( गीतांजलि चटर्जी तीसरी लोग पृष्ठ- 120 ) अपने पति के इस मनोवृत्ति के बारे में वह आगे कहती है कि -” ही इस ए ब्लडी ट्रांस्वेस्टीज।xxx ट्रांस्वेस्टीज उन लोगों को कहते हैं जो अपोजिट सेक्स के कपड़े पहन कर उनकी तरह श्रृंगार करके रतिक्रिया में उत्तेजना का अनुभव करते हैं । यह एक प्रकार का मनोरोग है। पुरुष जनाना कपड़े पहनना पसंद करता है और स्त्री मर्दाना।”(गीतांजलि चटर्जी तीसरी लोग पृष्ठ-121) । अपने पति की इस दशा को समझने में असमर्थ हो जाती है। जोगिया अपने पति से तलाक लेती है। हिंदी साहित्य में इस मनोवृति पर ज्यादा विश्लेषण अभी तक नहीं हुआ है। मनुष्य की विभिन्नता को सूचित करने का एक कोशिश यहाँ हम देख सकते हैं।
- क्वीर के प्रति स्त्री लेखन की दृष्टि
क्वीर के प्रति हिंदी के स्त्री लेखन की दृष्टि हमेशा सकारात्मक तथा प्रगतिशील है। उर्मिला शुक्ला की कहानी है मैं फूलमती और हिजड़ा। इस कहानी का केंद्र पात्र एक अर्ध पौरुषवाले हिजड़ा है। वह फूलमती नामक एक यौनकर्मी के साथ संबंध जुड़ाने के लिए आता है। फूलमती उसके साथ संबंध जोड़ती है। वह यह जानना चाहती है कि एक पुरुष और हिजड़ा में क्या अंतर है। अन्य पुरुषों के साथ उसने संबंध जोड़ दिया था। लेकिन उन संबंधों में प्यार का अभाव थे। फूलमती को एक हिजडा से सबसे पहले जिंदगी में प्यार और सम्मान मिला है। लेखिका कहती है कि-” सारी दुनिया जिसे हिजरा कहती थी फूलमती के लिए वही संपूर्ण पुरुष था। वह पुरुष जिसने प्यार दिया, सम्मान दिया और अधिकार दिया।”( सं. हरिनारायण- कथादेश मार्च-2011, पृ-58)। हिजडा के प्यार की वजह से फूलमती ने वेश्यावृत्ति की छोड़कर उसे अपना जीवनसाथी बनाया। यहाँ हिजडा कि प्रति फूलमती की दृष्टि सकारात्मक है। उसने उसे एक मानव के रूप में देखा, प्यार किया, सम्मान किया। हिजड़ा ने भी फूलमती के साथ एक मनुष्य के समान व्यवहार किया।
तीसरे लोग नामक उपन्यास में किसना नामक एक हिजड़ा का चित्रण किया गया है। एड्स रोग से त्रस्त किसना के प्रति संवेदनशील व्यवहार करती है नूरा। उसने उसे अस्पताल में पहूँचाती है। वहाँ उसका ख्याल रखती है फाल्गुनी। फाल्गुनी ने उसे अपना भाई समझती है। किसना की मृत्यु की बाद उसकी रचनाओं को पुस्तककार देकर समाज की ओर पहुंँचाती है फाल्गुनी। फाल्गुनी की दृष्टि भी सकारात्मक एवं मानवोचित है।
इस उपन्यास के स्मारक एक समलैंगिक है। पारिवारिक जबरदस्ती की वजह से वह फाल्गुनी के साथ शादी करता है। वह फाल्गुनी से अपना असलियत व्यक्त करता है। फाल्गुनी उसे मानती है। समाज से उसकी असलियत को छिपाती है। समाज से वह कहती है कि वह माँ बनने में असमर्थ है ।स्मारक की इच्छा था एक अस्पताल का निर्माण करना। फाल्गुनी उसकी पूर्ति के लिए स्मारक का पूरा सहयोग देती है।
चित्रा मुद्गल का उपन्यास पोस्ट बॉक्स नंबर 203 नाला सोपरा में विमली की माँ हमेशा उसके प्रति संवेदनशील है। विमली हिजडा है। उसने घर छोड़ दिया था। लेकिन अपनी मां के साथ हमेशा संबंध रखती थी। घर के अन्य सभी लोगों ने विमली की उपेक्षा की है। विमली के भाई से माँ कहती है कि-” मेरे पेट में जन्मे को तू काली परछाई कह रहा है। तू भी उसी कोख में जन्मा है। “( सं. एकांत श्रीवास्तव-वागर्थ- फरवरी-2014-पृ- 17) इन शब्दों में माँ की ममता प्यार आदि सब हम देख सकते हैं। उसे अपने अन्य संतानों के समान वह दिखती है। तीसरे लोग उपन्यास में सरसुतिया अपना संतान किसना के प्रति बहुत प्यार करती है। उसे अमानत के रूप में समझती है वह। हिजडा होकर भी माँ के मन में अपने संतान की प्रति सकारात्मक दृष्टि है।
नीरजा माधव के यमदीप उपन्यास में नाज बीवी के मां-बाप अपने संतान से बहुत प्यार करते थे। नाजबीबी इंडस्टेक्स है। लेकिन उसके मां-बाप एक लडकी के रूप में उसका पालन पोषण करते हैं। अपनी संतान की सुरक्षा हेतु वे एक ही जगह में कई दिनों तक ठहरते नहीं हैं। विभिन्न कारणों के वजह से नाजबीवी को अपना घर छोड़ना पड़ा। लेकिन हिजडा बस्ती में रहते समय भी उसके माँ-बाप उससे मिलने के लिए आते थे। मुझे वापस ले जाने में भी तैयार थे।नाजबीबी ने इनकार किया। वह फोन में अपने मां-बाप से बातें भी करती है। उपन्यास की सोना अपनी माँ नाजबीबी से बहुत प्यार करती है। नाजबीबी हिजडा है । लेकिन उसने सोने का पालन पोषण किया। सोना उससे कहती है कि-” जब मैं बड़ी होकर पढ लिख लूंगी और नौकरी करने लगूँगी तो तुमसे तुम्हारा धंधा छुड़ा दूंगी।” ( नीरजा माधव -यमदीप- पृष्ठ-261)। सोना अपनी माँ की असलियत जानकर भी उससे बहुत प्यार करती है। उसके लिए वह पूर्णतः माँ है ना हिजड़ा। इन सभी संदर्भों में मानवीयता का चमक हम देख सकते हैं।
- समाज के प्रति क्वीर की दृष्टि
सालों से समाज से शोषित- पीड़ित जनसमूह है क्वीर। समाज के हिस्सा होकर भी सभी लोगों ने उन्हें अनदेखा कर दिया। लेकिन क्वीर लोग समाज के प्रति अपने मानवोजित दायित्व निभाते हैं। नीरजा माधव के यमदीप नामक उपन्यास में प्रसव पीड़ा से तड़पने वाली पगली की सहायता करती है हिजड़ा लोग। उसकी सहायता करने के लिए कोई और तैयार नहीं थे। उसकी पीड़ा देखकर नाजबीबी कहती है कि -” अब कोई पुछनहार नहीं है इसका तो क्या हम भी छोड़ जाएंगे? अरे हम हिजडे हैं, हिजड़े… इंसान है…।” ( नीरजा माधव -यमदीप- पृष्ठ- 12)। प्रसूति के बाद हिजडा नाजबीबी उस पगली की बेटी को अपनी बेटी के समान देखकर उसका देखभाल करती है। एक हिजडा के पास एक लड़की रहना समाज की दृष्टि में बहुत बुरी बात है। लेकिन नजीबीबी सभी मुसीबतों का सामना करती है। वह लड़की को शिक्षा प्रदान करती है। एक माँ के रूप में नाजबीबी खुद बहुत खुशी महसूस करती है।
लोग धर्म के नाम पर आपस में लड़ते हैं ।यह देख कर यमदीप उपन्यास में नाजबीवी कहती है कि-” अपने देश के लिए तो देखिए हम लोग मर मिटेंगे। जिस तरह फौज में एक सिपाही भर्ती होता है, पुलिस होता है… सरकार हमें भी हथियार दे दे। मैं तो लडूंगी । लड़ते-लड़ते हिंदुस्तान के पीछे अपना जान दे दूंगी।”( नीरजा माधव- यमदीप- पृष्ठ -163)। हिजड़े लोगों के बीच हिंदू- मुसलमान जैसे कोई धार्मिक अलगाव नहीं है। सभी धर्म में उनकी दशा एक समान है। इसलिए भी उन सब से अलग होकर मनुष्य के सामान रहते हैं। लेकिन समाजों ने मनुष्य के रूप में देखने के लिए तैयार नहीं है। यह उनकी दृष्टि की कमी है। इसमें परिवर्तन लाना है।
यमदीप उपन्यास के छैलू अपना घर छोड़ता है। वह एक हिजड़ा है ।उसके माँ-बाप ने उससे बहुत प्यार किया था। उसकी वास्तविकता को छुपा कर उसका पालन पोषण किया। लेकिन परिवार की बदनामी से भयभीत होकर अपना घर छोड़ता है। यहाँ छैलू अपने घर वालों से बहुत प्यार करता है। इस उपन्यास के नाज बीवी अपने मां-बाप से बहुत प्यार करती है। उसने खुद अपना घर छोड़ दिया। क्योंकि उसकी उपस्थिति में उसकी बहन की शादी होना नामुमकिन थी। दूसरों की भलाई के लिए वे खुद दुख का वरण करती हैं। यहाँ उनके मन की विशालता हम देख सकते हैं।
निष्कर्ष
हिंदी के समकालीन महिला लेखन की दृष्टि लोग हितकामी है। दुनिया में सकारात्मक परिवर्तन लाने की कोशिश महिला लेखन में हम देख सकते हैं। क्वीर को मानवीय रूप प्रदान करने में हिंदी के समकालीन महिला लेखन सक्षम हुए हैं। क्वीर के सभी मुद्दों की चर्चा यहाँ हम नहीं देख सकते हैं फिर भी यह एक शुरुआत है। उसकी महत्ता कम नहीं है।
संदर्भ सूची
- क्वीर विमर्श- डॉ. के वनजा – वाणी प्रकाशन- नई दिल्ली( 2021 प्रथम संस्करण)
- नीरजा माधव -यमदीप- सुनील साहित्य सदन- नई दिल्ली(2002 प्रथम संस्करण)
- सं. एकांत श्रीवास्तव-वागर्थ- फरवरी-2014
- गीतांजलि चटर्जी -तीसरे लोग- सामयिक प्रकाशन- नई दिल्ली( 2010 प्रथम संस्करण)
- सं. हरिनारायण- कथादेश पत्रिका- मार्च-2011







