रीतिकालीन दरबारी काव्य की जेंडरवादी आलोचना
डॉ० गरिमा सिंह
असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग
विद्यावती मुकंदलाल गर्ल्स कॉलेज, गाजियाबाद (उ०प्र०)
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सारांश
रीतिकालीन दरबारी काव्य सामंती ताकतों से नियंत्रित था; जहाँ सुरा एवं सुंदरी का बोलबाला था। चूंकि दरबारी साहित्य के अधिकतर रचनाकार पुरुष थे जो न केवल सामंती परिवेश में पल-बढ़ रहे थे बल्कि उस मानसिकता से भी परिचालित थे जो उन्हें परंपरा से प्राप्त थी; ऐसी स्थिति में तत्कालीन रीति काव्य का मूल्यांकन अधूरा ही माना जाना चाहिए। यद्यपि रीतिकालीन कवियों के पास भले ही उनकी जीविका का प्रश्न गंभीर रहा हो तथापि रचना में स्त्री को वस्तु के रूप में प्रस्तुत करना नितांत ही उपेक्षणिय और निंदनीय है। रितिकाव्या में स्त्री की बड़े पैमाने पर नायिका भेद के अंतर्गत दृश्यमान्यता भले ही उसे पुरुषों के समक्ष खड़ा करती है लेकिन यह तत्कालीन अभिरुचि के अनुकूल ही जान पड़ता है; जहाँ स्त्री ‘वस्तु’ के रूप में निरंतर पेश की जाती है। रीतिकाव्यों की भाषा भी नितांत स्त्री विरोधी है जो उसे पुनः शोषण के चक्र में जकड़ती है। इस रूप में प्रस्तुत शोध आलेख स्त्री विमर्शीय दृष्टि से तत्कालीन रीतिकाव्य को समझने की एक जरूरी कोशिश है क्योंकि आलोच्य काल का स्त्रियों से सीधा संबंध है।
बीज शब्द – रीतिकाव्य, दरबारी, जेंडरवादी, वस्तु, शोषण, कामशास्त्र, स्त्री, पुरुषवादी
शोध आलेख
रीतिकालीन संपूर्ण दरबारी काव्य न केवल आश्रयदाता शासकों के आश्रय में पली-बढ़ी बल्कि दरबारी शान-शौकत और चाटूकारिता की प्रवृत्ति से भी अपना पीछा न छुड़ा सकी। मध्यकालीन परिवेश और सामंती मानसिकता तत्कालीन काव्य को निर्मित करने के आधार बिन्दु रहें। तत्कालीन कवियों के सामने चाहे आर्थिक लाचारी का बड़ा कारण भले ही उपस्थित रहा हो लेकिन उनकी निर्मित हो चुकी सामंती मानसिकता और पुरुषवादी दृष्टिकोण स्त्री को लेकर पिछड़ेपन और शोषण संबंधी मानसिकता से प्रेरित रही। रीतिकालीन प्रायः बड़े दरबारी कवियों द्वारा भी कामशास्त्र की उत्तरवर्ती परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास किया गया जहाँ स्त्री को मानवी रूप से अधिक ‘कामिनी, ‘परकीया, ‘नायिका’ के रूप में देखा गया और उसे दरबारी शान-शौकत के अनुरूप ‘भोग्या’ का रूप प्रदान किया गया। स्त्री के समस्त शारीरिक हाव-भाव, मानसिक आवेगों और सामाजिक क्रिया-कलापों को ‘कामशास्त्र’ के संकुचित दृष्टिकोण में बाँधकर देखा गया। स्त्री को मनोरंजन के सस्ते उपकरण के रूप में कविता के माध्यम से सामने प्रस्तुत किया गया। तत्कालीन युग में काव्य के माध्यम से जीविकोपार्जन का यह तरीका नितांत हेय और निंदनीय माना जाना चाहिए क्योंकि ‘‘इस काल में स्त्री काव्य-रचना व मनोरंजन का उपकरण मात्र दिखाई देती है, भावहीन व संवेदनाहीन देहमात्र। यह विभेद स्त्री के सेक्सुअली सन्तुष्टि प्रदान करने की विभिन्न डिग्रियों का ही सारणीकरण प्रतीत होता है। नायिका-भेद व उसके उपभेदों पर दृष्टिपात करते ही उस समय की स्त्री की दयनीय व उपेक्षणीय स्थिति को डिकोड किया जा सकता है। स्वकीया, परकीया व वेश्या अथवा, प्रवेष्या व सामान्या आदि भेदों से स्त्री के प्रति उपभोगवादी सामाजिक नजरिया उजागर होता है। प्रेमगर्विता, अन्यसंभोगदुःखिता, सौन्दर्यगर्विता, प्रोषितपतिका स्त्री की जेंडर ट्रेनिंग ही नहीं, उसके सामाजिक अस्तित्व की नगण्यता को भी इंगित करते हैं। कुलटा या अधमा जैसे विभेद एक सेक्सुअल आब्जेक्ट के रूप में इस्तेमाल होने वाली स्त्री की सामाजिक नियति का अंदाजा कराते हैं। इस विभेदीकरण का निहितार्थ यह है कि पारिवारिक संरचना में अपने स्थान के लिए संघर्ष करती स्त्री को अपना स्थान तभी मिल सकता है, जब वह रूपवती व काम प्रवीण होकर नायक के लिए काम्य हो। इस तरह के विभेद स्त्री की यौनिक पहचान को कई शरीरेतर व मनोभावेतर कारकों से जोड़ते हैं; स्त्री के सोचने, महसूस करने या उसमें दखल देने के लिए बहुत कम स्पेस या कहें कि कोई स्पेस नहीं छोड़ते । ”1
‘नायिका-भेद’ की तत्कालीन काव्यधरा के अन्तर्गत् इतनी विशद चर्चा केवल परिवेश और युग-विशेष की माँग ही नहीं कही जा सकती बल्कि इसके मूल में पुरुषवादी रसिक-वृत्ति और विलास-वृत्ति भी प्रधान है। चूँकि विभिन्न प्रकार की नायिकाओं के भेद पुरूषों के विलासी प्रेम और रसिकता के अनुरूप ही किया गया है। इस विशद नायिका-भेद को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि प्रायः सभी नायिकाओं का अपने शरीर मन और यहाँ तक कि सामाजिक क्रियाकलाप तक पर अपना कोई अधिकार नहीं है, सब कुछ पुरूषों के सामंती अभिरूचि के अनुरूप है। ‘स्वकीया’ नायिका को आदर्श नायिका के रूप में परिगणित किया गया है; जो कि एक गृहिणी और सुशील पतिव्रता स्त्री है। यही कारण है कि युग की मूल प्रवृत्ति के अनुरूप ‘स्वकीया’ नायिका का वर्णन अत्यधिक नहीं किया गया। डॉ. बच्चन सिंह के अनुसार- ‘‘नैतिक दृष्टि से विचार करने पर स्वकीया आदर्श नायिका ठहरती है। जो विवाहिता स्त्री मन, वचन, कर्म से पति के अनुकूल रहकर स्वप्न में भी पर-पुरूष का चिंतन न करे, वह स्वकीया है। वह पतिव्रता, शीलवान, लज्जावती तथा पति के घर के बड़ो और गुरुजनों के प्रति विनम्र भाव रखने वाली होती है। ‘देव’ ने नायिका के जिन आठ लक्षणों का उल्लेख किया है, वे ही उनकी स्वकीया के भी लक्षण हैं। इसके आधार पर कहा जा सकता है कि वे सिद्धांतत: स्वकीया को ही नायिकापद का अधिकारी समझते थे। इन्होंने स्वकीया, परकीया और सामान्या का अंतर स्पष्ट करते हुए लिखा है-
भूषन, जीवन, रूप, गुन, विभव, सील, कुल, प्रेम ।
आठों अंग सुकियाहि के, परकिया बिन कुल प्रेम।।
सामान्या बिन सील, कुल, प्रेम, विभौ पहिचानि।
भूषन, जोबन, रूप, गुन सहित उत्तमा जानि।।
-भवानी विलास
भूषण, यौवन, रूप, गुण, वैभव, शील, कुल और प्रेम स्वकीया के अंग माने गए हैं। परकीया में स्वकीया के ‘कुलनेम ’ के अतिरिक्त अन्य सभी गुण सन्निहित हैं। सामान्या कुल, शील और प्रेम से रिक्त होती है।”2
भारतीय समाज में ‘रूदन’ को स्त्री का प्रधान गुण माना जाता है। प्रायः साहित्य में इसी ‘रूदन’ को वियोगमूलक शृंगार के अंतर्गत देखा गया। यद्यपि प्रियतम के परदेश-गमन के कारण जो दुःख होता है तथा उससे उत्पन्न असह्य वेदना प्रकारांतर से साहित्य में विरह-वियोग का कारण मानी जाती रही है। लेकिन तत्कालीन सामंती परिवेश में स्त्रियों के दुःख, पीड़ा, वेदना और मानसिक हलचलों को रसिक मनोरंजन के निमित्त और कामी स्वभाव के अन्तर्गत ही अत्यधिक वर्णित किया गया। स्त्रियों के दुःख और पीड़ा का न केवल अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन किया गया बल्कि उन्हें मजाक की हद तक भी सीमित कर दिया गया। इस संबंध् में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कथन है- ‘‘बिहारी की उन उक्तियों में जिनमें विरहिणी के शरीर के पास ले जाते शीशी का गुलाबजल सूख जाता है, उसके विरह-ताप की लपट के मारे माघ के महीने में भी पड़ोसियों का रहना कठिन हो जाता है, कृशता के कारण विरहिणी साँस खींचने के साथ दो-चार हाथ पीछे और साँस छोड़ने के साथ दो-चार हाथ आगे उड़ जाती है, अत्युक्ति का एक बड़ा तमाशा ही खड़ा किया गया है। कहाँ यह सब मजाक, कहाँ विरह की वेदना।”3
‘प्रेम’ दो व्यक्तियों के मध्य उत्पन्न एक सहज आकर्षण है। ‘प्रेम’ केवल ज्ञानेन्द्रियों तक सीमित शारीरिक सुख ही नहीं बल्कि इससे बहुत आगे मानसिक और आध्यात्मिक आनंद भी है। किन्तु रीतिकालीन साहित्य में जिस प्रकार का प्रेम परिभाषित होता है वह शारीरिक स्पर्शजन्य सुख ही है, जिसमें रसिकता, मांसलता, वासना और काम ही प्रधान है। प्रायः सभी रीतिकालीन दरबारी कवियों के यहाँ प्रेम का यही स्वरूप परिलक्षित होता है। बिहारी के अनेक दोहे इस बात की पुष्टि करते हैं; एक दोहे के अनुसार – नायक- नायिका को छींके पर दहेंड़ी रखते हुए देखता है और अपने रसिक तथा कामी स्वभाव के कारण नायिका से कहता है कि वह उसी अवस्था में कुछ देर रहे – “अहे दहेंड़ी जिनि धरै, जिनि तूँ लेहि उतारि। नीकै है छीकैं छुवै, ऐसै रहि, नारि।।“4 इसी प्रकार कामी नायक एक अन्य दोहे में नायिका को किसी ऊंचे वृक्ष से फूल तोड़ता हुआ देखता है तो उसके उभरे हुए कुचों और त्रिवली को देखकर आनंद विभोर हो उठता है- “बढ़त निकसि कुच-कोर-रुचि, कढ़ती गौर भूजमूल। मनु लूटि गौ लोटनु चढ़त, चोटत ऊँचे फूल।।”5 रीतिकालीन दरबारी काव्य में वर्णित प्रेम के स्वरूप पर टिप्पणी करते हुए डॉ. बच्चन सिंह लिखते हैं कि- ‘‘एक ओर दरबारी वातावरण और दूसरी ओर काव्य रूढ़ियों के बंधनों में पनपा हुआ प्रेम (शारीरिक सुखोपभोग के आकांक्षी) रसिकों के अनुकूल अधिक होगा, उदात्त चित्तवृत्ति वालों के अनुकूल कम। इस तरह से प्रेम में साहस, रोमांस, त्याग आदि चित्तवृत्तियों को बल मिलने का प्रश्न ही नहीं उठता । ऐसे प्रेम में या तो नायक संयोगकालीन परिरंभ तथा रतिरंग में आकंठमग्न होता है या फिर मानिनी खंडिता और धीरादि नायिकाओं की क्षोभपूर्णवाणी सुनकर और सहकर पुनः विहार में संलग्न हो जाता है। समग्रतः यहाँ प्रेम के इसी रूप के दर्शन मिलेंगे।”6 जेंडरवादी नजरिए से देखें तो यहाँ प्रेम स्त्री को स्वतंत्र नहीं करता बल्कि उसे पुरुष के रसिक एवं कामी वृत्ति को तुष्ट करने वाले माध्यम के रूप में प्रस्तुत करता है। स्त्री का प्रत्येक बनाव, शृंगार तथा उसकी आत्ममुग्धता पुरुष को रिझाने और उसके वासनात्मक प्रेम के परितोष के लिए है जहाँ प्रेम की गम्भीरता, त्याग और आत्म-समर्पण का लेश भी नहीं है।
रीतिकालीन दरबारी काव्य में नायिका-भेद के अन्तर्गत् स्त्रियों की वाक्-पटुता, उलाहना और रोष भी रसिकता को बनाये रखने के लिए ही सृजित किया गया। कवियों के अन्तर्गत् चाहे घनानंद की ‘सुजान’ की बात करें या केशवदास के ‘राय प्रवीण’ की सभी की वाक-चतुरता पुरुषों के घेरे से बाहर नहीं निकल पाई है। संभव है कि यह तत्कालीन परिवेश के कारण हो लेकिन इसी ‘नायिका-भेद’ के माध्यम से स्त्री की इतनी नकारात्मक छवि को प्रकारांतर से प्रस्तुत किया जाता रहा है, जिसके कारण तथाकथित रूढ़िवादी समाज और पुरुष-वर्ग के द्वारा स्त्रियों को निरंतर शोषित और उत्पीड़ित किया जाता रहा है। तत्कालीन परिवेश में स्त्रियों के प्रति निर्मित होने वाले विशेष प्रकार के दृष्टिकोण को लक्षित करते हुए डॉ. बच्चन सिंह लिखते हैं कि- ‘‘सामन्तों से नारी के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण की आशा ही क्या की जा सकती थी। मुगलों की छत्रछाया में ये विलासी सामन्त निर्भय विलास का सुख लूट रहे थे। उनके लिए ‘तिय-छवि, ‘छाया ग्राहिनी’ से कम न थी। उन्हीं के मनस्तोष के लिए तो नायिका-भेद का विपुल-साहित्य तैयार हुआ था। बिहारी ने नायिका-भेद के लक्षण-उदाहरण तो नहीं प्रस्तुत किए पर नायिकाओं की अनेकानेक भंगिमाओं, चेष्टाओं, मनोदशाओं आदि के चटकीले चित्र खींचे। उन्हें घर में, घाट-बाट में, कुंज-वन में सर्वत्र शोखी से भरी हुई देखा।… नायिकाओं के सहज-सौन्दर्य और भोलेपन से उनको कुछ विशेष लेना-देना नहीं था। वे उनके अन्दाज और शोखी पर फिदा थे- जो एक विशेष प्रकार के दृष्टिकोण का द्योतक था।”7
निष्कर्षत: स्त्री की उत्पत्ति का इतिहास जितना प्राचीन है उतना ही प्राचीन उसके दमन और उत्पीड़न का इतिहास भी है। स्त्री को देखने और समझने का व्यावहारिक और सामाजिक नजरिया उसकी ऐतिहासिक निर्मिति का प्रतिफलन है। भूमंडलीकरण के दौर में जब समस्त विश्व एक परिवार है और इसी से उपजी भगिनीवाद की अवधारणा के समतुल्य समस्त स्त्रियों की पीड़ा और शोषण की त्रासदी भौगोलिक और परिवेशगत विभिन्नता के बावजूद लगभग एक है। दरअसल पूंजीवादी और उपभोक्तावादी संस्कृति ने स्त्री को पूरी तरह से बाजार का एक उपकरण बनाकर छोड़ दिया है। मसलन बाजार मांग-पूर्ति पर आधारित अर्थव्यवस्था की एक महत्वपूर्ण इकाई है। यही कारण है कि स्त्री के शारीरिक गठन और रूपरेखा की बारीकी से जांच की जाती है तथा विभिन्न प्रकार की सत्ताओं द्वारा स्त्री की छवि का मानकीकरण इसी का परिणाम है। चूंकि रीतिकाल के विशेष संदर्भ में ही स्त्री को मनुष्य से पृथक एक उत्पाद के रूप में देखे जाने में कामशास्त्र की परंपरा पर आधारित ग्रंथों का विशेष योगदान रहा है। कहना चाहिए कि स्त्री को उपभोग का साधन बनाने में इन ग्रंथो का प्रकारांतर से उपयोग किया गया, जिसके कारण रीतिकालीन दरबारी परिवेश में नायिका-भेद पर आधारित अनेक ग्रंथों का रसिक दृष्टि से न केवल प्रणयन किया गया अपितु अनुकरण और पिष्टपेषण की प्रवृत्ति भी खूब रही। स्त्रियों के विषय में लिखे जाने के संबंध में पुरुषीय मानसिकता और दृष्टि का व्यापक आधार ग्रहण किया गया तथा स्त्री को इतिहास में सत्ता-वर्ग के हाथ की कठपुतली के रूप में दर्ज करने की एक अनुचित कोशिश की गई।
संदर्भ सूची
- मुकेश गर्ग (संपा०); स्त्री की नज़र में रीतिकाल, वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2020, नई दिल्ली, पृष्ठ 48-49 (डॉ० नीलिमा चौहान के लेख-‘रीतिकाल में स्त्री यौनिकता का सवाल उर्फ़ देह अपनी बाक़ी उनका’ से उद्धृत अंश)
- डॉ० बच्चन सिंह; रीतिकालीन कवियों की प्रेम व्यंजना, लोकभारती प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2005, इलाहाबाद, पृष्ठ 305
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल; चिंतामणि (भाग-एक), संजय बुक सेंटर, प्रथम संस्करण 2006, वाराणसी, पृष्ठ 102
- जगन्नाथ दास रत्नाकर; बिहारी रत्नाकर, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2011, इलाहाबाद, पृष्ठ 312
- जगन्नाथ दास रत्नाकर; बिहारी रत्नाकर, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2011, इलाहाबाद, पृष्ठ 312
- डॉ० बच्चन सिंह; रीतिकालीन कवियों की प्रेम व्यंजना, लोकभारती प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2005, इलाहाबाद, पृष्ठ 213
- डॉ० बच्चन सिंह; बिहारी का नया मूल्यांकन, लोकभारती प्रकाशन, पंचम संस्करण 2008, इलाहाबाद, पृष्ठ 116






