Home Blog Page 32

हिन्दी-उर्दू का अन्तर्संबंध और निदा फ़ाज़ली की कविता-ग़ज़ल: डॉ. बीरेन्द्र सिंह

0

हिन्दी–उर्दू का अन्तर्संबंध और निदा फ़ाज़ली की कविता–ग़ज़ल

डॉ. बीरेन्द्र सिंह
सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग
स्कॉटिश चर्च कॉलेज, कोलकाता
मो.-9331265343
ई-मेल: birendra_scottish@yahoo.in

 

शोध सारांश

हिन्दी और उर्दू दो भिन्न भाषाएँ न होकर एक ही भाषा की दो भिन्न शैलियाँ हैं । जिनके बीच का भेद बहुत हद तक आधारहीन है । स्वयं राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी हिन्दी और उर्दू में कोई भेद न देखते थे और एक मिली–जुली सामान्य भाषा जिसे उन्होंने हिन्दुस्तानी कहा था,  राष्ट्रभाषा के रूप में चाहते थे । आज के साहित्य में हिन्दी–उर्दू के इस भेद को मिटाकर रख देने वाले रचनाकारों की एक लम्बी फेहरिस्त है – प्रेमचंद, फिराक गोरखपुरी, चकबस्त, राही मासूम रज़ा, शानी, असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, मंजूर एहतेशाम आदि–आदि । इन रचनाकारों ने अपने लेखन में हिन्दी–उर्दू के बीच की बेबुनियाद दीवार को लगातार तोड़ा है । इसी परम्परा के प्रमुख शायर निदा फ़ाज़ली को मैंने अपने अध्ययन का आधार बनाया है । निदा फ़ाज़ली मौजूदा दौर के हिन्दी–उर्दू के ऐसे शायर रहे हैं जिनकी लेखनी हिन्दी और उर्दू के बीच फैलाये गए भ्रम की दीवार को ढहा कर रख देती है ।

बीज शब्द: भाषा, राष्ट्रभाषा, उर्दू, हिंदी, परिस्थिति, हिन्दुस्तानी

शोध विस्तार:

आज हिन्दी और उर्दू दो प्रमुख भाषाओं के रूप में मान्य हैं । सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ इस भाषा-भेद को स्थापित करने में अहम भूमिका अदा करती हैं फलस्वरूप साधारण तौर पर हिन्दी और उर्दू को न केवल दो भाषाओं बल्कि एक हद तक दो विरोधी भाषाओं का दर्जा प्राप्त है । परन्तु यह मान्यता भाषावैज्ञानिक दृष्टि से वास्तविकता से कोसों दूर ठहरती है । आज तक किसी भी भाषावैज्ञानिक ने हिन्दी और उर्दू को दो भिन्न भाषाएँ नहीं माना है ।

लिपिभेद एवं शब्दावली का किंचित अंतर छोड़ हिन्दी और उर्दू में कोई भेद नहीं है । इस संबंध में हिन्दी के मुर्धन्य आलोचक एवं भाषाशास्त्री डा. रामविलास शर्मा लिखते हैं, ‘‘हिन्दी-उर्दू में सबसे पहला भेद लिपि का है । लिपि लिखने के काम आती है न कि बोलने के । इसलिए लिपि-भेद को हम बुनियादी भेद नहीं मानते । हिन्दी-उर्दू में दूसरा भेद है शब्दभंडार का । यह भेद साधारण लोगों की बोलचाल में बिल्कुल नहीं है, पढ़े-लिखे लोगों में बहुत थोड़ा है और भाषा के लिखित रूपों में बहुत ज्यादा है ।’’1 यानी हिन्दी-उर्दू का भेद एक ही भाषा के लिखित रूपों का भेद है, वो भी वहाँ जहाँ साधारण लोगों की बोलचाल की सहज भाषा का प्रयोग नहीं किया जाता । दूसरे शब्दों में हिन्दी-उर्दू का भेद है नहीं, उसे बनाया जाता है । प्रेमचंद भी यही मानते थे और उनका तो लेखन भी इस बात का गवाह है कि अगर बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग लेखन में भी किया जाये तो हिन्दी उर्दू में कहीं कोई भेद है ही नहीं । फिर हिन्दी-उर्दू के बीच यह भेद की दीवार कैसे खड़ी हो गई, इसके पीछे का इतिहास क्या है, अब आइए इस पर भी ज़रा निगाह डालते हैं ।

आमतौर पर माना जाता है कि भारत में उर्दू का जन्म हिन्दुओं और मुसलमानों के आपसी मेलजोल के फलस्वरूप हुआ । दूसरी ओर भाषा के अर्थ में उर्दू शब्द का प्रयोग 18वीं सदी के अंत तक नहीं मिलता है । दरअसल भारतीय व्यापार की उन्नति के साथ-साथ उत्तर भारत के बड़े हिस्से में जिस खड़ी बोली का व्यापक प्रचार हुआ उसे हिन्दी, हिन्दवी या हिन्दुई कहा गया । कवि-रचनाकारों ने भी अपनी भाषा को इसी नाम से पुकारा चाहें वो किसी भी धर्म के रहे हों । इस संदर्भ में डा. रामविलास शर्मा बड़े ही मजेदार ढंग से लिखते हैं, ‘‘हिन्दी-उर्दू का एक सामान्य आधार है, बोलचाल की खड़ीबोली । इस खड़ीबोली में अरबी-फारसी के कुछ या बहुत ज्यादा शब्द आ मिले तो इससे एक नयी भाषा नहीं उत्पन्न हो गयी । यह खड़ीबोली मुसलमानों के आने से पहले भी थी, उनके शासनकाल में रही और आज भी है । एक दूसरी बात ध्यान देने की यह है कि जितना ही हम पुराने जमाने के उर्दू लेखकों की रचनाएँ पढ़ते हैं, उतनी ही साधारणतः अरबी-फारसी के शब्दों की खपत कम मिलती है और जितना ही बीसवीं सदी की ओर बढ़ते हैं, उतना ही यह खपत बढ़ती जाती है । अगर बारहवीं-तेरहवीं सदी में मेलजोल के लिए पाँच फीसदी अरबी-फारसी शब्दों की जरूरत थी तो 1947 के आसपास यह जरूरत बढ़कर पचासी फीसदी तक पहुँच गयी है । यानी ज्यों-ज्यों मेलजोल बढ़ा, त्यों-त्यों हिन्दी-उर्दू का अलगाव बढ़ता गया । मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की ।’’2

दरअसल हिन्दी और उर्दू का भेद बढ़ना शुरु हुआ भारत में अंग्रेजों के आगमन के बाद । 18वीं सदी के पहले जिस ‘उर्दू’ शब्द का कहीं जिक्र नहीं मिलता अचानक वह एक नयी भाषा कहलाने लगती है । इसके पीछे फोर्ट विलियम कॉलेज की भी महत्वपूर्ण भूमिका है । जॉन गिलक्राइस्ट हिन्दी-उर्दू भाषी कौम की शक्ति और इसके खतरों को कहीं-न-कहीं महसूस कर सकते थे । उन्होंने फोर्ट विलियम कॉलेज के साथ-साथ पहला काम ही किया, भाषा को मजहब से जोड़कर देखने-दिखाने की प्रवृति का प्रचार । जातीय भाषा के विकास में दरार डालकर भाषा को धर्म से जोड़ा जाने लगा ।

1857 की जनक्रांति में हिन्दू और मुसलमानों ने जिस प्रकार की एकता का परिचय दिया, अंग्रेजी हुकूमत उससे काफी विचलित हुई । अतः हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच दूरी बढ़ाने वाले तत्वों पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा । ‘फूट डालो राज करो’ की नीति अहम हो गई । इस सिलसिले में भाषा-भेद को धर्म से जोड़कर भयावह रूप में बढ़ावा दिया गया । फलतः अब तक सामान्य जनता के बीच जिस सामान्य भाषा का प्रयोग होता आ रहा था, वहाँ मुसलमानों ने अपने लेखन में अरबी-फारसी के शब्दों की खपत बढ़ानी शुरु की और संस्कृत तथा सामान्य बोलचाल के शब्दों को जानबूझकर बाहर निकाला गया जिसे मतरुकात का सिद्धांत कहा गया । इसीतरह हिन्दुओं ने संस्कृत शब्दों की ओर ज्यादा ध्यान देना शुरु किया । दुःख की बात है कि इस अलगाववादी मानसिकता के कारण एक ही भाषा दो रूपों में आगे बढ़ी ।

इसतरह इतना तो स्पष्ट होता ही है कि हिन्दी और उर्दू दो भिन्न भाषाएँ न होकर एक ही भाषा की दो भिन्न शैलियाँ हैं । जिनके बीच का भेद बहुत हद तक आधारहीन है । स्वयं राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी हिन्दी और उर्दू में कोई भेद न देखते थे और एक मिली-जुली सामान्य भाषा जिसे उन्होंने हिन्दुस्तानी कहा था,  राष्ट्रभाषा के रूप में चाहते थे । दरअसल मजहब से भाषाएँ तय नहीं हुआ करतीं । यह घोर साम्प्रदायिक दृष्टिकोण है जिसका खामियाजा हम अब तक भुगत रहे हैं । हिन्दी-उर्दू भेद की तमाम व्यावहारिक सच्चाइयों को मानते हुए भी कम-से-कम हमें यह भी मान लेना चाहिए कि भारत में हिन्दी-उर्दू एक ही क्षेत्र के वासिन्दों की – एक कौम की – भाषा है । यह ‘हिन्दी जाति’ की भाषा है । रामविलास शर्मा के शब्दों में फिर एक बार कहना पड़े तो, ‘‘हिन्दी-उर्दू का व्याकरण एक, वाक्य-रचना एक-सी, शब्द भंडार और क्रियाएँ एक-सी – इसीलिए हिन्दी-उर्दू भाषियों की दो कौमें नहीं हैं । उनकी जाति एक है और बोलचाल की भाषा एक है ।’’3

आज के साहित्य में हिन्दी-उर्दू के इस भेद को मिटाकर रख देने वाले रचनाकारों की एक लम्बी फेहरिस्त है – प्रेमचंद, फिराक गोरखपुरी, चकबस्त, राही मासूम रज़ा, शानी, असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, मंजूर एहतेशाम आदि-आदि । इन रचनाकारों ने अपने लेखन में हिन्दी-उर्दू के बीच की बेबुनियाद दीवार को लगातार तोड़ा है । इसी परम्परा के प्रमुख शायर निदा फ़ाज़ली को मैंने अपने अध्ययन का आधार बनाया है । निदा फ़ाज़ली मौजूदा दौर के हिन्दी-उर्दू के ऐसे शायर रहे हैं जिनकी लेखनी हिन्दी और उर्दू के बीच फैलाये गए भ्रम की दीवार को ढहा कर रख देती है ।

भाषा का सवाल जातीय एकता से जुड़ा सवाल है । यह साम्प्रदायिकता और अलगाववाद के विरोध का सवाल है । यह हमारे विकास का सवाल है । पाकिस्तान से लौटने के बाद अपनी एक मशहूर नज़्म में निदा लिखते हैं, गौर करें –

‘‘ख़ूँख्वार दरिन्दों के

फ़क़त नाम अलग हैं

शहरों में बयाबान

यहाँ भी है वहाँ भी

 

रहमान की कुदरत हो

या भगवान की मूरत

हर खेल का मैदान

यहाँ भी है वहाँ भी

 

हिन्दू भी मज़े में है

मुसलमाँ भी मज़े में

इन्सान परेशान

यहाँ भी है वहाँ भी’’4

इंसान की परेशानी से जूझने वाले इस शायर की शायरी का विश्लेषण करते हुए हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि आज की जटिल परिस्थितियों की अभिव्यक्ति करते हुए किसी रचनाकार की संवेदना किसी भाषा-भेद का ख़्याल रखती है क्या ! एक और नज़्म देखें –

‘‘मस्जिदों मंदिरों की दुनिया में

मुझको पहचानते कहाँ हैं लोग

रोज़ मैं चाँद बन के आता हूँ

दिन में सूरज सा जगमगाता हूँ

खनखनाता हूँ माँ के गहनों में

हँसता रहता हूँ छुप के बहनों में

मैं ही !

मज़दूर के पसीने में

मैं ही !

बरसात के महीने में’’5

            मस्जिद-मंदिर के बीच की खाई से पीड़ित शायर अल्लाह-ईश्वर की उपस्थिति को सूरज-चाँद से लेकर मानवीय संबंधों और संघर्ष की अभिव्यक्ति तक ले जाकर जिस सेतु के निर्माण का प्रयत्न कर रहा है क्या वहाँ आपको किसी हिन्दी-उर्दू का भेद दीख रहा है? ऐसा शायर प्रार्थना करते हुए ईश्वरीय सत्ता के सामने क्या निवेदन रखता है, इसे देखें –

‘‘नील गगन पर बैठे

कब तक

चाँद सितारों से झाँकोगे

 

पर्वत की ऊँची चोटी से

कब तक

दुनिया को देखोगे

 

आदर्शों के बन्द ग्रन्थों में

कब तक

आराम करोगे

 

मेरा छप्पर

टपक रहा है

बनकर सूरज

इसे सुखाओ

 

खाली है

आटे का कनस्तर

बनकर गेहूँ

इसमें आओ’’6

अब आप ही निर्णय लीजिए यह प्रार्थना किस धर्म वाले की है, किसके लिए है और किस भाषा में है?…

निदा जैसा शायर जब कहता है –

‘‘बच्चा बोला देख कर मस्जिद आलीशान

अल्ला तेरे एक को, इतना बड़ा मकान’’7

तो कहीं ऐसा नहीं लगता कि जो काम कबीर जैसा क्रांतिकारी 14-15वीं सदी में कर रहा था वही अधूरा काम अपने तरीके से कोई रचनाकार आज भी पूरा कर रहा है । आखिर ‘काँकर-पाथर’ जोड़कर अल्लाह के लिए इतना बड़ा मकान बनवाया जाना तो आज भी बदस्तूर जारी है । वहीं दूसरी ओर –

‘‘अन्दर मूरत पर चढ़े घी, पूरी, मिष्ठान

मन्दिर के बाहर खड़ा, ईश्वर माँगे दान’’8

और निदा इन सारे चोंचलों से मुक्ति का जो रास्ता बताते हैं, उसे देखिए –

‘‘घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें

किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये’’9

निदा के यहाँ मासूमियत को बचाये रखने की गहरी अपील देखने मिलती है । बौद्धिकता आदमी को कहीं-न-कहीं खुंखार बना रही है, निदा इसे व्यक्त करते हुए कहते हैं –

‘‘बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो

चार किताबें पढ़कर ये भी हम जैसे हो जायेंगे’’10

और यहीं मैं जोड़ना चाहूँगा कि हिन्दी-उर्दू का झगड़ा यही चार किताबें पढ़ चुके लोगों के बीच का झगड़ा है । निदा अपने लेखन में जिसका प्रतिरोध रचते हैं । इसीलिए सिनेमा जैसे माध्यम से, जहाँ हिन्दी-उर्दू का भाषाई भेद लगभग नहीं है क्योंकि वह आम जन का माध्यम है, निदा को विशेष लगाव रहा । उनका साहित्य, कविता-ग़ज़ल सिनेमा में नई ऊँचाई पाता है । निदा उन्हीं के लिए लिखना पसंद करते थे जो –

‘‘दुःख में नीर बहा देते थे, सुख में हँसने लगते थे

सीधे-सादे लोग थे, लेकिन कितने अच्छे लगते थे’’11

और यही कारण है कि आज की दुनिया में सोच-समझवालों के लिए निदा नादानी माँगते हैं –

‘‘दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है

सोच-समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला’’12

निदा आदमी और आदमियत की तलाश के शायर हैं इसीलिए वह आज एक नई ग़ज़ल सुनाना चाहते हैं –

‘‘उठके कपड़े बदल, घर से बाहर निकल जो हुआ सो हुआ

रात के बाद दिन, आज के बाद कल जो हुआ सो हुआ

जब तलक साँस है, भूख है प्यास है ये ही इतिहास है

रख के काँधे पर हल , खेत की ओर चल जो हुआ सो हुआ

*          *          *          *          *          *

मन्दिरों में भजन, मस्जिदों में अज़ाँ आदमी है कहाँ?

आदमी के लिए एक ताज़ा ग़ज़ल जो हुआ सो हुआ’’13

निदा मानते हैं –

‘‘हम सब

एक इत्तिफ़ाक़ के

मुख़्तलिफ़ नाम हैं

मज़हब

मुल्क

ज़बान

इसी इत्तिफ़ाक़ की अनगिनत कड़ियाँ हैं’’14

आज के दौर की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि इन मुख़्तलिफ (भिन्न) चीजों के बीच का ‘लफ़्जों का पुल’ लगातार दरकते-दरकते कहीं टूट चुका है और इसे किसी भी कीमत पर जोड़े जाने की महती आवश्यकता है । अगर हम ऐसा कर सके तभी हम अपनी-अपनी तन्हाई से निजात पा पायेंगे । निदा की नज़्म है – ‘लफ़्जों का पुल’

‘‘मस्जिद का गुंबद सूना है

मंदिर की घंटी ख़ामोश

जुज़दानों में लिपटे

सारे आदर्शों को

दीमक कब की चाट चुकी है

रंग

गुलाबी

नीले

पीले

कहीं नहीं हैं

तुम उस जानिब

मैं उस जानिब

बीच में मीलों गहरा ग़ार

लफ़्जों का पुल टूट चुका है

तुम भी तन्हा

मैं भी तन्हा’’15

यह लफ़्जों का पुल जब तक नहीं जुड़ेगा, अपनी-अपनी तन्हाइयों में हिन्दी-उर्दू के ‘बीच में मीलों गहरा ग़ार’ बदस्तूर कायम रहेगा । निदा ने अपने सम्पूर्ण रचनाकर्म के माध्यम से इस मीलों गहरी खाई को पाटने की एक अदना-सा कोशिश की है और बाकी का एक विस्तृत कार्य हम सभी के लिए छोड़ गए हैं । निःसंदेह यह काम कठिन तो है पर नामुमकिन नहीं । पुनः निदा के ही शब्दों में –

‘‘मुम्किन है सफ़र हो आसाँ अब साथ भी चल कर देखें

कुछ तुम भी बदल कर देखो, कुछ हम भी बदल कर देखें’’16

 

संदर्भः

 

  1. शर्मा रामविलास, भाषा और समाज, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पाँचवा संस्करण, 2002, पृ. 331
  2. वही, पृ. 284
  3. वही, पृ. 331
  4. फ़ाज़ली निदा, सफ़र में धूप तो होगी (सं.-शीन काफ़ निज़ाम और नन्दकिशोर आचार्य), वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर, प्रथम संस्करण, 2000, पृ. 155
  5. वही, पृ. 129
  6. वही, पृ. 117
  7. वही, पृ. 157
  8. वही, पृ. 158
  9. वही, पृ. 22
  10. वही, पृ. 39
  11. वही, पृ. 54
  12. वही, पृ. 75
  13. वही, पृ. 74
  14. वही, पृ. 139
  15. वही, पृ. 140
  16. वही, पृ. 63

Structure of Complex Verb in Hindi- Arun Kumar Pandey, Indra Kumar Pandey

0

Structure of Complex Verb in Hindi

   Arun Kumar Pandey                                                                           Indra Kumar Pandey

  (Ph.D Language Technology)                                                                   (Ph.D Language Technology)

   arunkpandey2@gmail.com                                                               indra.pandey280@gmail.com

शोध सारांश

प्रत्येक भाषा की अपनी एक व्यवस्था होती है तथा उसके अपने नियम होते हैं। इसीलिए वक्ता जो कुछ कहता है, श्रोता वही समझता है। भूतकाल का वाक्य भूतकाल का ही समझा जाता है, भविष्यकाल का नहीं। यह व्यवस्था ध्वनि, शब्द–रचना, वाक्य–रचना आदि सभी स्तरों पर होती है। किसी भी भाषा के आधारभूत वाक्य साँचों के निर्धारण में विशेष रूप से क्रिया ही वाक्य में आने वाले उद्देश्य (कर्ता, कर्म) एवं विधेय को नियंत्रित करती है। इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि किसी भाषा विशेष में वाक्य–व्यवस्था को व्यवस्थित करने में क्रिया ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

बीज शब्द : भाषा, क्रिया, स्वरूप, व्यवस्था, वाक्य, रचना

 

शोध विस्तार

संप्रेषण की दृष्टि से भाषा की लघुतम इकाई तथा व्याकरण की दृष्टि से भाषा की महत्तम इकाई वाक्य है और किसी भी वाक्य का केंद्रीय तत्व उस वाक्य की क्रिया होती है। क्रिया के अभाव में वाक्य संरचना संभव नहीं है। अन्य शब्द या पदबंध तो क्रिया के साथ संयुक्त होकर ही वाक्य  में अपनी सार्थकता पाते हैं। क्रिया के होने से ही वाक्य का अर्थ स्पष्ट होता है, अतः किसी भी भाषा में क्रिया का विशेष महत्व है। क्रिया ही वाक्य में प्रयुक्त पदों की संख्या को नियंत्रित करती है।

   “कारक व्याकरण के अनुसार वाक्य एक क्रिया तथा एक से अधिक संज्ञा पदबंधों की ऐसी संरचना है, जिसमें प्रत्येक संज्ञा क्रिया के साथ एक विशेष कारक संबंध के अंतर्गत जुड़ी रहती है”।                                                                                                                 

                                                                                                                                   (फिल्मोर, 1968)

इस सिद्धांत के अनुसार कहा जा सकता है कि वाक्य की मूल संरचना क्रिया पर निर्भर होती है।

प्रत्येक भाषा की अपनी एक व्यवस्था होती है तथा उसके अपने नियम होते हैं। इसीलिए वक्ता जो कुछ कहता है, श्रोता वही समझता है। भूतकाल का वाक्य भूतकाल का ही समझा जाता है, भविष्यकाल का नहीं। यह व्यवस्था ध्वनि, शब्द-रचना, वाक्य-रचना आदि सभी स्तरों पर होती है। उदाहरण के लिए- हिंदी में ड़, ढ़ शब्द के प्रारंभ में नहीं आते या ङ्, शब्द के आदि और अंत में नहीं आते। यह ध्वनि स्तर पर व्यवस्था है। वाक्य स्तर पर हिंदी में कर्ता + कर्म + क्रिया का क्रम होता है, किंतु अंग्रेजी में कर्ता + क्रिया + कर्म का। यह वाक्य स्तर पर व्यवस्था है।

 

किस भी भाषा के आधारभूत वाक्य साँचों के निर्धारण में विशेष रूप से क्रिया ही वाक्य में आने वाले उद्देश्य (कर्ता, कर्म) एवं विधेय को नियंत्रित करती है। इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि किसी भाषा विशेष में वाक्य-व्यवस्था को व्यवस्थित करने में क्रिया ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

हिंदी के वाक्य विन्यास की दृष्टि से वाक्य में क्रिया की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। जैसे-

    राम ने रावण को मारा।

    कर्ता      कर्म      क्रिया

इस वाक्य में क्रिया के बिना वाक्य पूरा नहीं हो सकता। अतः कहा जा सकता है कि वाक्य में क्रिया ही केंद्रक का कार्य करती है।

वाक्य में प्रयुक्त क्रिया पदबंध प्रायः दो घटकों से मिलकर बना होता है-

मुख्य क्रिया और सहायक क्रिया।

मुख्य क्रिया कोशीय अर्थ देती है और सहायक क्रिया व्याकरणिक अर्थ। मुख्य क्रिया के अंतर्गत सरल, मिश्र, यौगिक और संयुक्त क्रिया आते हैं और सहायक क्रिया काल, पक्ष, वृत्ति आदि की सूचना देती है।

क्रिया की परिभाषा –

“जिस विकारी शब्द के प्रयोग से हम किसी वस्तु के विषय में कुछ विधान करते हैं, उसे क्रिया कहते हैं। जैसे- हरीश भागा, राजा नगर में आया, मैं आऊँगा, घास हरी होती है।”[1]

“वाक्य में जिस शब्द के द्वारा किसी कार्य-व्यापार,गति, स्थिति अथवा अस्तित्व का बोध होता है, उसे क्रिया कहते हैं।“[2]

जैसे-

            राम आम खाता है।

            लड़का पुस्तक पढ़ता है।

            वह घर जाएगा।

            वह पेड़ है।1

            ईश्वर है।2

इन वाक्यों में खाता है, पढ़ता है (कार्य-व्यापार), जाएगा (गति), है1 (स्थिति),  है (अस्तित्व) आदि क्रियाएँ है।

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि वाक्य में प्रयुक्त वह शब्द जिससे कार्य की स्थिति, करना या होना पता चले तथा किसी वस्तु, स्थान आदि के अस्तित्व या उपस्थिति होने का बोध हो, क्रिया कहलाता है। किसी भी वाक्य में क्रिया ही केंद्र में रहता है। क्रिया शब्द रूप अलग-अलग स्थितियों में परिवर्तित होता रहता है। उदाहरण- मैं आज दौड़ने गया, वे आज दौड़े, मैंने आज दौड़ा आदि।

 

 

 

संरचना के आधार पर क्रिया के चार प्रकार होते हैं-

  1. सरल क्रिया

     संरचना: वह घर जा रहा है.

मैं सोता हूँ.

  1. यौगिक क्रिया

     संरचना:मोहन चावल ले गया(ले+ जा+आ).

मैं पुस्तक रख गया(रख+ जा+आ).

  1. संयुक्त क्रिया

     संरचना:मोहन आ गया.

सीता ने रोटी खा ली(खा+ले+ई).

  1. मिश्र क्रिया:

“मिश्र क्रिया की संरचना में दो घटकों (संज्ञा अथवा विशेषण एवं क्रियांगी) के योग से होती  है. प्रथम घटक को क्रियामूल(Pre-Verb)एवं द्वितीय घटक को क्रियाकर (Verblizer)कहा गया है.”

जैसे- शादी करना,स्वीकार करना आदि.

                  मुख्यतःहिंदी के वाक्यों में तीन तरह की संरचना देखने को मिलती है-

  • संज्ञा+ क्रियाकर:

            इसके अंतर्गत पहला घटक संज्ञा(Noun) और दूसरा घटक क्रियाकर(Verblizer)होता है. जिसमें संज्ञा शब्द का संयोग कुछ अलग-अलग क्रियाकरों की सहायता से होकर मिश्र क्रिया बनाते हैं.

  • संज्ञा+ क्रियाकर संरचना: 

   उदाहरण:

  • NN+Verbalizer + AuxVerb.

वह उससे नफरत करती थी.

नफरत(NN)कर(Verbalizer)+ती थी (Aux Verb).

  • (VR+ई)=NN+ Verbalizer + AuxVerb.

2014-15 में केंद्र सरकार ने ट्रैक्स के बलबूते 1.3 लाख करोड़ रुपये की कमाई की  थी,

कमाई(VR+ई=NN) करना(Verbalizer)+ई थी(Aux Verb),

  • NN+Negation+Verbalizer + AuxVerb.

तुम उसकी बात मत करना.

बात(NN) मत(Negation) करना(Verbalizer).

  • NN+Question Word+( Negation)+Verbalizer + AuxVerb.

मुझे उसकी बात क्यों नहीं करनी चाहिए.

बात(NN)क्यों(Question Word) नहीं(Negation)करना(Verbalizer)+ ई चाहिए(Aux).    

  • कुछ भिन्न संरचनाएँ:
  • हमें बात(NN) उत्तर प्रदेश के मौखिक साहित्य पर करनी(Verbalizer)है।
  • विदेशी धरती से कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने जिस आरएसएस की तुलना(NN)मुस्लिम ब्रदरहुड से की(Verbalizer)थी।
  • विशेषण+क्रियाकर

 इसके अंतर्गत पहला घटक विशेषण(Adjective) और दूसरा घटक क्रियाकर(Verblizer)होता है. जिसमेंविशेषण शब्द का संयोग कुछ अलग-अलग क्रियाकरों की सहायता से होकर मिश्र क्रिया बनाते हैं.

        विशेषण+ क्रियाकर  संरचना:  

        उदाहरण:

  • Adj+Verbalizer + Aux Verb.

          मैं आज अच्छे से स्पष्ट करना चाहती हूँ.

स्पष्ट(ADJ)करना(Verblizer) चाहती हूँ(AUX).

  • ADJ+Negation+Verbalizer + AuxVerb.

        अब मैं प्रमाणित नहीं करना चाहता हूँ.

प्रमाणित (ADJ)नहीं(Negation) करना(Verbalizer)चाहता हूँ(AUX).

  • ADJ+Question Word+( Negation)+Verbalizer + AuxVerb.
  • और Question Word + ADJ+( Negation)+Verbalizer + AuxVerb.
  • तुम प्रमाणित क्यों नहीं करना चाहता हूँ.

प्रमाणित (ADJ) क्यों(Questionword)नहीं(Negation) करना(Verbalizer)चाहता हूँ(AUX).

  • तुम क्या प्रमाणित नहीं करना चाहता हूँ.

क्या(Questionword)प्रमाणित (ADJ)नहीं(Negation) करना(Verbalizer)चाहता हूँ(AUX).

  • क्रियांगी + क्रियाकर : इसके अंतर्गत पहला घटक क्रियांगी(Adjective) और दूसरा घटक क्रियाकर(Verblizer)होता है.

 

 क्रियांगी + क्रियाकर  संरचना: 

  • क्रियांगी +Verbalizer + Aux

      तुम्हें  मेरी बात स्वीकार होनी चाहिए.

स्वीकार(क्रियांगी) होना(Verbalizer)+ई चाहिए(Aux)

  • क्रियांगी +Neg+Verbalizer + Aux Verb

           तुम्हें  मेरी बात स्वीकार नहीं होनी चाहिए.

स्वीकार(क्रियांगी) नहीं(Neg) होना(Verbalizer)+ई चाहिए(Aux)

  • क्रियांगी + Question Word+( Negation)+Verbalizer + AuxVerb

           तुम्हें  मेरी बात स्वीकार क्यों नहीं होनी चाहिए.

स्वीकार(क्रियांगी) क्यों(Qeword) नहीं(Neg) होना(Verbalizer)+ई चाहिए(Aux)

 

संदर्भ–सूची

  • सिंह, सूरजभान (2000) हिंदी का वाक्यात्मक व्याकरण. साहित्य सहकार, नई दिल्ली।
  • पाण्डेय, अनिल कुमार. (2010). हिंदी संरचना के विविध पक्ष.
  • गुरु, कामता प्रसाद (2010) हिंदी व्याकरण. प्रकाशक संस्थान, नई दिल्ली।
  • तरुण, हरिवंश (2009) मानक हिंदी व्याकरण और रचना. प्रकाशक संस्थान, नई दिल्ली।
  • सिंह, ब्रज किशोर प्रसाद (2010) सामान्य व्याकरण. भारत पुस्तक भंडार, नई दिल्ली।
  • Kacharu,Yamuna. (1980) Aspects of Hindi Grammar.
  • Kulkarni,Ambha. (2015) Agreement in Hindi Conjunct verb.(Research Paper)

[1]गुरु, कमाता प्रसाद. (2008). हिंदी व्याकरण. पृष्ठ- 103.

[2]पाण्डेय, अनिल कुमार. (2010). हिंदी संरचना के विविध पक्ष. पृष्ठ- 27.

शोध और बोध से ही राष्ट्र का विकास संभव- महेश तिवारी

0

शोध और बोध से ही राष्ट्र का विकास संभव

महेश तिवारी
स्नाकोत्तर, पत्रकारिता संकाय,
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल।।
मोबाइल न. 9630377825
ईमेल- tiwariauthor@gmail.com

 

शोध सारांश:-  किसी भी राष्ट्र की प्रगति और विकास का आकलन वहां पर संसाधन जुटा देने मात्र से नहीं होता, अपितु वहां के लोगों के द्वारा अपनाने वाली पद्धतियों, संस्कारों, मूल्यों, कार्य–शैलियों से राष्ट्र निर्माण होता है। ऐसे में जिस दौर में भारत के पास लगभग 65 फ़ीसदी आबादी युवाओं की है। साथ ही साथ देश की सियासी परिपाटी भी देश को विश्वगुरु और महाशक्ति बनाने की बात करती। ऐसे में हमें और हमारी व्यवस्था को देखना होगा, कि आख़िर क्या कारण है जिसकी वजह से हम इक्कीसवीं सदी में वैश्विक पटल पर पीछे छूट रहें। इतिहास की निगहबानी करें तो हमारा इतिहास तो कदापि ऐसा न था। जहां हम पिछड़े हुए अपने को महसूस करें। हम तो गौरवशाली इतिहास और परंपरा के वाहक रहें। ऐसे में जब हम आज के समय की स्थितियों और परिस्थितियों को देखते हैं। फ़िर एक बात स्पष्ट होती है, कि हमारे यहां आज के समय में कुछ खामियों ने घर कर लिया है। जैसे शिक्षा में गुणवत्ता नाम की चीज़ नहीं बची है। मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा को हम ढो रहें हैं। उच्च शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में शोध नाममात्र की बात समझ आती। इसके अलावा मानवीय पूंजी को हमारे यहां मानव संसाधन समझ लिया गया है। जिस कारण हम चाहकर भी विश्वगुरु बनने या विश्व को नेतृत्व करने की दिशा में आगेनहीं बढ़ पा रहें। ऐसे में अब हमें शोध के महत्व को समझना होगा। इसके साथ हर क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देना होगा साथ ही साथ मानवीय पूंजी की अहमियत पर भी जोर देना होगा। तभी एक मजबूत राष्ट्र की तरफ़ हम अग्रसर हो पाएंगे।।

कीवर्ड:- शोध, राष्ट्र, नेशन, शिक्षा व्यवस्था, एक भारत–श्रेष्ठ भारत, अनुसंधान एवं विकास।

शोध विस्तार

    कहते हैं कि आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। ऐसे में कुछ दिन पहले देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उद्बोधन का ज़िक्र करना यहाँ जरूरी हो जाता है। तत्कालीन दौर में जब भारत देश ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व कोरोना संक्रमण से कराह रहा है। हमारे देश के प्रधानमंत्री देश की अवाम को दिए गए संदेश में “आत्मनिर्भर भारत” की बात करते हैं। यहां यक्ष प्रश्न यहीं क्या कोई भी राष्ट्र, समाज या फ़िर व्यक्ति बिना शोध के आत्मनिर्भर हो सकता है? यह बात असंभव सी लगती है। किसी भी राष्ट्र या समाज के विकास के लिए उस समाज या राष्ट्र में शोध को बढ़ावा देना महती जरूरी होता है। चलिए यहाँ एक प्रश्न करते हैं, किसी राष्ट्र का विकास कब होगा? तभी न जब उस राष्ट्र के लोगों का जीवन मूल्य उच्च कोटि का होगा। सांस्कृतिक रूप से समाज मजबूत होगा। नए और परिमार्जित सांस्कृतिक मूल्यों को आत्मसात करने में कोई झिझक नहीं होगी। नई- नई तकनीक को विकसित किया जाएगा। ऐसे में शोध किसी भी क्षेत्र की प्राथमिकता में रहता है। राष्ट्र के विकास की पहली सीढ़ी कहीं न कहीं शोध है। देखिए न राष्ट्र निर्माण में शैक्षिक संस्थानों की भूमिका को कैसे उत्तरप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष ह्रदय नारायण दीक्षित स्वीकृति करते हैं।

    वे कहते हैं कि राष्ट्र निर्माण में शैक्षिक संस्थानों की अहम भूमिका होती है। भारत में 10वीं सदी के पहले से ही राष्ट्र की अवधारणा का निर्माण हो चुका था। बाद में विश्व को नेशन शब्द का बोध हुआ। नेशन और राष्ट्र दो अलग- अलग बातें हैं। हमारे वेदों में राष्ट्र की अवधारणा की व्याख्या मिलती है। शोध और बोध से राष्ट्र का जन्म और विकास होता है।1  ऐसे में जब राष्ट्र शब्द का जन्म ही अपने आप में शोध शब्द को समाहित किए हुए हो। फ़िर हम आसानी से समझ सकते कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति की राह शोध के माध्यम से ही निकलती है। यहां हम राष्ट्र निर्माण में शोध की भूमिका की चर्चा कर रहें। ऐसे में पहले हम राष्ट्र की परिभाषा समझने का प्रयास करते हैं। उसके उपरांत शोध को समझेंगे और आख़िर में राष्ट्र निर्माण में शोध की भूमिका को।

   राष्ट्र क्या है? राष्ट्र का अर्थ एक स्वशासी राज्य की जनसंख्या से है। जिसमे कई राष्ट्रीयताओं का समावेश हो सकता है। जहां राष्ट्रीयता राजनीतिक स्वतंत्रता और प्रससत्ता प्राप्त कर लेती हैं। वह राष्ट्र बन जाती हैं।2  “राष्ट्र” शब्द जो आप हम समझते हैं, यह आधुनिक समय की उपज है। यह लैटिन शब्द ‘नेशन’ से लिया गया है। ‘Ambedkarian framework of National- Building A critical Enquiry’ में केसी यादव और एसके चहल ने बताया है कि हमें आधुनिक प्रक्रिया को धन्यवाद देना चाहिए जैसे- पुर्नजागरण, पुर्नसुधार, वाणिज्यवाद, फ्रांसीसी क्रांति उपनिवेशवाद, सम्राज्यवाद विश्वयुद्ध आदि। इसी समय में राष्ट्र की उत्पत्ति विभिन्न प्रकार से यूरोप और शेष विश्व में हुई। भारत में इस प्रक्रिया की जड़ें उन्नीसवीं सदी में दिखाई दी।3  ऐसे में प्रथम दृष्टया यह मान लेते हैं आधुनिक राष्ट्र की बात भले भारत में उन्नीसवीं सदी में दिखी, लेकिन उसके पूर्व पुरातन काल से भी तो यहां पर सोलह महाजनपद आदि का ज़िक्र होते आया है। एक बात और राष्ट्र का निर्माण कैसे होता। किसी भू- भाग में रहने वाले प्राणियों से। ऐसे में तो भारत में सदियों से कई मानवीय सभ्यता का इतिहास मिलता है।

   अब हम शोध को समझें तो शोध एक प्रकार की खोज है, जो नवीन संभावनाओं को तलाशने की, मौलिकता का समावेशन करने की और वैज्ञानिक तरीके से कार्य का निष्पादन करने की क्षमता का विकास है। सीसी क्रोफोर्ड के अनुसार, ” शोध चिंतन की एक ऐसी क्रमबद्ध तथा विशुद्ध प्रविधि है, जिसमें विशिष्ट यंत्रों, उपकरणों तथा प्रक्रियाओं का उपयोग इस उद्देश्य से किया जाता है, एक समस्या का समाधान उपलब्ध हो सकें।” वहीं वी यंग के शब्दों में, ” शोध एक ऐसी व्यवस्थित विधि है, जिसके द्वारा नवीन तथ्यों की खोज अथवा प्राचीन तथ्यों की पुष्टि की जाती है तथा उनके उन अनुक्रमों, पारस्परिक सम्बन्धों, कारणात्मक व्याख्याओं तथा प्राकृतिक नियमों का अध्ययन करती है, जो कि प्राप्त तथ्यों को निर्धारित करते हैं।”4 यहां अब हम वर्तमान वैश्विक महामारी कोरोना की ही बात कर लें, इससे सम्पूर्ण विश्व कराह रहा। इससे निज़ात का उपाय क्या होगा। सभी को पता है, कि जब किसी औषधि का अनुसंधान होगा। तभी इस महामारी से विश्व को सुरक्षित किया जा सकता। इतना ही नहीं एक बात और स्पष्ट हो, जो देश इस महामारी की दवा तलाश लेगा, वह सामाजिक और आर्थिक रूप से भी आने वाले समय में मजबूत बनेगा। बाक़ी देश उस पर निर्भर होने की स्थिति में होंगे। इन सब बातों से एक ही तथ्य को मजबूती मिलती कि किसी भी राष्ट्र के विकास, उत्थान में शोध की काफ़ी भूमिका है।

    शोध के महत्व को देखते हैं तो पाएंगे कि शोध हर जगह महत्व रखता है। चलिए एक उदाहरण से बात को स्पष्ट करते। पर्यटन चूंकि राष्ट्र, राज्य और स्थानीय क्षेत्रों से सम्बंधित होता। ऐसे में पर्यटन को अगर बढ़ावा मिलेगा तो समाज और राष्ट्र मजबूत बनेगा। इसलिए भारत में ‘डिपार्टमेंट ऑफ एनवायरनमेंट एन्ड फारेस्ट’ की स्थापना की गई। अब सोचिए इसका उद्देश्य क्या रहा होगा? इसका उद्देश्य है भारत में पर्यटन स्थलों के वातावरण की शुद्धता को बनाएं रखना। जे. ए. स्टीन के मुताबिक भारत में अनेक आश्चर्य है जिनमें ह्रास और विनाश प्रारम्भ हो गया है। ऐसे में पर्यटन के पांच कारणों की और क्रिपेनड्रॉफ ने ध्यान आकर्षित किया:-

1) ग्राम्यांचलों में प्रदूषण न फैले।

2) किन्हीं क्रियाओं से व्यतिरेक न पैदा हो।

3) पर्यावरण का महत्व आर्थिक विकास और पर्यटन के संदर्भ में बना रहें।

4) वातावरण आदि स्त्रोतों के ह्रास के प्रमाण और अनिश्चितता की स्थिति में कमी हो तथा

5) स्थानीय लोगों की सोच बदलें।5

 

        ऐसे में जो पर्यटन देश के विकास में योगदान करता। फ़िर वह योगदान आर्थिक और सांस्कृतिक किसी भी तरीक़े का हो। वह पर्यावरण के लिहाज़ से भी समाज और राष्ट्र की समृद्धि का वाहक बनें। यह तथ्य कैसे सभी को पता चला होगा। यकीनन शोध और बोध से ही। ऐसे में सभी योजना के पहले शोध का होना अति आवश्यक है। हम इतिहास में विचरण करेंगे तो पाते हैं कि श्रीराम जी हिन्दू संस्कृति के अनुसार लंका जाने के लिए “रामसेतु” का निर्माण करते हैं। जिसका प्रमाण आज सारी दुनिया मान चुकी है। इसके अलावा “पुष्पक विमान” को कौन भूल सकता। ये सब बातें रामायण में देखने और सुनने को मिल जाएंगी। तो कहीं न कहीं यह सब सम्भव कैसे हुआ होगा? निश्चित ही शोध के कारण। ऐसे में एक बात पूर्णरूपेण सत्य है कि हमारा भारतीय समाज सनातन समय से ही शोध और बोध में विश्वास रखता आया है। अपितु आज के वर्तमान काल में भले हम शोध कार्यों में पिछड़ते जा रहें।

         अनुसन्धान किसी भी राष्ट्र की प्रगति का मूलाधार है। अतः इसका महत्व विविध प्रकार से है। यह ज्ञान के विकास में, उद्देश्य प्राप्ति हेतु, समाज और राष्ट्र को नई गति प्रदान करने में, राष्ट्रीय एवम अंतर्राष्ट्रीय भावना के विकास में, सुधार में, सत्य की खोज में, प्रशासनिक आदि अनेक क्षेत्रों में सहायता प्रदान करता है। तभी तो अनुसन्धान को जॉन डीवी “प्रगतिशील प्रक्रिया” मानते हैं। वैसे भी भारत जैसे देश में शिक्षा का महत्व हमेशा से रहा है और उसे सर्वोच्च धन के रूप में स्वीकार किया गया है। लम्बे समय तक भारत गुलामी की बेड़ियों में रहते हुए भले शोध और बोध में पिछड़ गया हो। इन सब के बाद आज़ादी के उपरांत पुनः भारतीय ज्ञान परम्परा में शोध और बोध को महत्व दिया जाने लगा। तभी तो प्रथम पंचवर्षीय योजना में शिक्षा पर ख़र्च 151 करोड़ रुपए किया जाता। शोध और बोध की ही देन रहीं, कि जो भारत गुलामी की जंजीरों में बंधे-बंधे भुखमरी का शिकार हो गया था। वह आज़ादी के बाद शैने- शैने आत्मनिर्भरता की तरफ़ कदम बढ़ाता है और हरित क्रांति के माध्यम से उठ खड़ा होता है।

एक बार स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था – सुधारकों से मैं कहूंगा कि मैं स्वयं उनसे कहीं बढ़कर सुधारक हूं। वे लोग इधर- उधर थोड़ा सुधार करना चाहते हैं- और मैं चाहता हूँ आमूल सुधार। हम लोगों का मतभेद है केवल सुधार की प्रणाली में। उनकी प्रणाली विनाशात्मक है और मेरी संघटनात्मक। मैं सुधार में विश्वास करता हूँ स्वाभाविक उन्नति में। स्वाभाविक उन्नति तभी होती है जब संसाधन उपलब्ध हो। कार-मोटरसाइकिल घर मे पहले से रहता है तो स्वाभाविक रूप से कम उम्र में ही घर के लोग चलाना सीख जातें हैं। इसलिए सुधार को वो महान शास्त्र- ‘विश्वशास्त्र’ पहले संसाधन के रूप में प्रत्येक घर में उपलब्ध हो। जो आध्यात्मिक और दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत- श्रेष्ठ भारत की परिकल्पना को प्रतिरूप दे सकें।6

     ऐसे में देखें तो राष्ट्र के निर्माण के लिए जरूरी कोई भी पक्ष हो। वह नवीकरणीय ऊर्जा का क्षेत्र हो, धर्म और दर्शन का क्षेत्र हो। अंतरिक्ष से जुड़ी बातें हो। शिक्षा या समाज से जुड़ी संकल्पनाएं हो। सभी क्षेत्रों में जब तक शोध के महत्व को अंगीकार नहीं किया जाएगा। तब तक एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण नहीं हो सकता। एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण नहीं होगा। फ़िर भारत के जो नेतृत्वकर्ता भारत को पुनः सोने की चिड़िया बनते देखना चाहते वह सपना कैसे साकार होगा। इसलिए राष्ट्र का शिल्पी अगर वहां की रहनुमाई व्यवस्था होती तो उसे स्थिति और परिस्थितियों को देखते हुए शोध के महत्व को समझना अति आवश्यक हो जाता, क्योंकि शोध और बोध के माध्यम से ही एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण हो सकता।।

       किसी भी राष्ट्र की प्रगति और विकास का आकलन वहां पर संसाधन जुटा देने मात्र से नहीं होता। केवल अवस्थापना या उपकरण जुटाना पर्याप्त नहीं है, अपितु वहां के लोगों के द्वारा अपनाने वाली पद्धतियों, संस्कारों, मूल्यों, कार्य-शैलियों से राष्ट्र निर्माण होता है। हम अपने डिजिटल रिसोर्स से शहर के चप्पे-चप्पे की निगरानी तो कर सकते हैं, लेकिन सन्मार्ग पर चलते हुए हमें अपनी कार्य संस्कृति, संस्कारों, मूल्यों और कार्यशैली को भी उसी के अनुरूप ढालना होगा, तभी शक्तिशाली भारत, समृद्ध भारत, आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार होगा। हमारी अजर अमर भारतीय संस्कृति हमें उन मानवीय मूल्यों के दर्शन कराती है जो सर्वोत्कृष्ट समाज और राष्ट्र के निर्माण का आधार स्तंभ है। विश्व के युवा राष्ट्र के रूप में हम सृजनात्मकता, उद्यमिता, नवाचार, शोध एवं अनुसंधान का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकते हैं। कई बार मैंने विभिन्न मंचों पर यह कहा है कि युवा विद्यार्थियों के रूप में हमारे पास एक बड़ी शक्ति है। अमेरिकी जनसंख्या से अधिक हमारे विद्यार्थियों की संख्या है। हम इसे सकारात्मक दिशा में ले जाने में सक्षम हुए तो हम नए युग का सूत्रपात कर सकते हैं।7

इन सब बातों के मद्देनजर देखें तो आज शिक्षण संस्थानों आदि को लेकर देश में राजनीति ख़ूब होती रहती। शायद इसका आधा हिस्सा भी उसको बेहतर करने में लगा दें सियासतदां तो भारत को आज की स्थिति में शर्मिंदा न होना पड़ें। आप कहते रहिए कि हम विश्वगुरु थे। वैश्विक रैंकिंग में दुनिया के 300 विश्वविद्यालयों में एक भी विश्वविद्यालय भारत का नहीं। 2012 के बाद पहली बार टॉप- 300 में भारत का कोई विश्वविद्यालय नहीं है। 92 देशों के 1396 संस्थानों में भारत का नंबर 300 के नीचे आता है। केवल आईआईटी रोपड़ को ग्लोबल रैंकिंग में टॉप- 350 संस्थानों में जगह दी जाती। तो वेदों- पुराणों, उपनिषदों में महानता की खोज करने वाले कोलंबस कहाँ है? क्या वो बताएंगे कि अगर हम इतने ही महान थे तो विकास के कालखंड में हमारी वो महानताएँ कहाँ जमींदोज हो गई हैं। 337 प्रायवेट यूनिवर्सिटी, 400 राज्य विश्वविद्यालय, 126 डीम्ड यूनिवर्सिटी, 48 सेंट्रल यूनिवर्सिटी, 31 एनआईटी, 28 आईआईटी और 19 आईआईएम यानी कुल संस्थान 984 और कुल छात्र 3.66 करोड़। लेकिन पढ़ाई- लिखाई के संसार में न तो हमारी कोई साख है और न कोई महत्व। तो सिर्फ़ इतिहास का ककहरा पढ़ाते हुए यह मत बताएं कि हम गणेश जी की गर्दन पर हाथी का माथा जोड़ देते थे। जरूरत है राष्ट्र की समृद्धि और विकास के लिए शिक्षा में बदलाव और शोध को बढ़ावा देने की।

    भारत में सरकार के स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों में अनुसन्धान एवं विकास ( आर एंड डी) पर बहुत कम निवेश पर संसद की स्थायी समिति ने चिंता व्यक्त करते हुए इस दिशा में तत्काल निजी क्षेत्रों को साथ लाकर शोध को बढ़ावा देने के उपाय लागू करने की सिफारिश की है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय संबन्धी संसदीय स्थायी समिति ने वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसन्धान विभाग से सम्बंधित प्रतिवेदन में केंद्र सरकार द्वारा आर एंड डी पर किए गए निवेश का स्तर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का महज 0.6 प्रतिशत होने पर चिंता जताई है। राज्यसभा सदस्य आनंद शर्मा की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट में अन्य देशों की तुलना में भारत में अनुसन्धान और विकास पर निवेश को बहुत कम बताते हुए कहा गया कि केंद्र सरकार द्वारा निवेश को पर्याप्त मात्रा में बढ़ाएं जाने की तत्काल जरूरत है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में सरकार के स्तर पर अनुसंधान और विकास पर कुल जीडीपी का 2.8 प्रतिशत, चीन में 2.1 फ़ीसदी, इजरायल में 4.3 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया में 4.2 फीसदी ख़र्च होता है। इतना ही नहीं समिति ने कहा कि वैज्ञानिक रिसर्च और विकासमें महिलाओं की आबादी तो बहुत ही कम है।8

     ऐसे में अगर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष सुखदेव थोराट कहते हैं, कि यदि हम वर्तमान प्रमाणों के आधार पर बात करें तो बड़ी संख्या में विश्वविद्यालय NAAC के मानकों की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। इसलिए इन संस्थाओं के भौतिक एवं शैक्षिक आधारभूत संरचना में तत्काल सुधार करने की आवश्यकता है। दूसरे शब्दों में कॉलेजों एवम राज्यस्तरीय विश्वविद्यालयों का पुनरूत्थान समय की मांग है।9  इसके अलावा जेपी नायक के शब्दों में- “हमने प्रायः गुणात्मक कार्यक्रमों को भी संख्यात्मक कार्यक्रमों में बदल दिया है।”10

 फ़िर अगर हमें और हमारी व्यवस्था को  राष्ट्र को पुष्पित और पल्लवित होते हुए देखना है, तो राष्ट्र निर्माण में शोध की भूमिका को पहचानना होगा। इसके अलावा शोध को हर क्षेत्रों में बढ़ावा देकर ही एक भारत और श्रेष्ठ भारत बनाया जा सकता।।

 

संदर्भ सूची:-

  • दैनिक जागरण अखबार में प्रकाशित ख़बर, 11 जनवरी, 2020, दिन- शनिवार
  • डॉक्टर बी.आर अम्बेडकर और राष्ट्र निर्माण, लेखक- डॉ. राकेश कुमार, पृष्ठ संख्या- 7
  • डॉक्टर बी.आर अम्बेडकर और राष्ट्र निर्माण, लेखक- डॉ. राकेश कुमार, पृष्ठ संख्या- 7
  • यूजीसी नेट पत्रकारिता एवं संचार, अरिहंत प्रकाशन
  • पर्यटन- सिद्धांत और प्रबंधन तथा भारत में पर्यटन, लेखक- शिवस्वरूप सहाय
  • मैं सत्यकाशी से कल्कि महावतार बोल रहा हूँ, लेखक- लवकुश सिंह “विश्वमानव”

 

  • मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक द्वारा दैनिक जागरण को लिखें लेख का अंश। प्रकाशन तिथि 11 नवम्बर 2019
  • इंडिया टीवी के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर 6 जनवरी 2019 को प्रकाशित रिपोर्ट के अंश
  • योजना, मई, 2007 पृष्ठ संख्या- 19
  • NAIK, JP. एजुकेशनल प्लानिंग इन इंडिया, पृष्ठ संख्या- 22

Experiential learning, its Concept, Its Process, role of Instructor and of learners in this process & its integration with class room teaching-Anchal Saxena

0

Experiential learning, its Concept, Its Process, role of Instructor and of learners in this process & its integration with class room teaching

-Anchal Saxena
Vice Principal,
Kendriya Vidyalaya Kanpur Cantt, Kanpur
Mob.8004912415

Experiential learning is the process of learning through experience, or “learning through reflection on doing”.  

Experiential education is participant focused active approach to learning that engages learners of all ages, backgrounds and experience levels. It  can be understand as learning through action, learning by doing, learning through experience, and learning through discovery and exploration.

Experiential Learning is often used synonymously with the term “Experiential Education“, but Experiential Education is a broader philosophy of education, experiential learning considers the individual learning process and in comparison to experiential education, experiential learning is concerned with more concrete issues related to the learner and the learning context.

This learning is not new but a long time before Confucius and John Dewey. As per Confucius ideas about best teaching learning education is –

                                    I hear and I forget, I see and I remember, I do and I understand.

~ Confucius, 450 BC

            He further states –“for the things we have to learn before we can do them, we learn by doing them”

John Dewey (1859-1952), Carl Rogers (1902-1987), and David Kolb (b. 1939) have provided the ground of this learning theory.  About this learning process, Mr. John Dewey states that there is an intimate and necessary relation between the process of actual experience and education. John Dewey devised that Experiential Learning focuses on problem solving and critical thinking rather than memorization and rote learning.

 But Rogers considered experiential learning “significant” as compared to what he called “meaningless” cognitive learning.

In this regard, Wurdinger and Carlson, The teachers should actively involve their students in the learning process through discussion, group work, hands-on participation, and applying information outside the classroom”. This process defines experiential learning where students are involved in learning content in which they have a personal interest, need, or want.

David A. Kolb also noted that concrete learning experiences are critical to meaningful learning and is well known for his Learning Style Inventory (LSI) which is widely used in many disciplines today to help identify preferred ways of learning.

A key element of experiential learning, therefore, is the student, and that learning takes place (the knowledge gained) as a result of being personally involved in this pedagogical approach.

Basic concept of this learning

Instruction is designed to engage students in direct experiences which are tied to real world problems and situations in which the instructor facilitates rather than directs student progress. The focus of EL is placed on the process of learning and not the product of learning” The soul main principle of Experiential Learning is that students should be more motivated to learn when they have a personal stake in the subject rather than being assigned to review a topic or read a textbook chapter. The main essential part of this learning is that the phases of experiencing (doing), reflection and applying are present. In addition, “the stages of reflection and application are what make experiential learning”.

“Experiential [learning] is a philosophy and methodology in which educators purposefully engage with students in direct experience and focused reflection in order to increase knowledge, develop skills, and clarify values” (Association for Experiential Education).

Experiential Learning is one that:

  • Combines direct experience with focused reflection.
  • Builds on past knowledge and experiences.
  • Requires active involvement in meaning construction.
  • Encourages collaboration and exchange of ideas and perspectives.
  • Can be course focused or in-class, community focused, or work focused.

The following is a list of experiential learning principles as noted from the (Association for Experiential Education, 2011): –

  • Experiential learning occurs when carefully chosen experiences are supported by reflection, critical analysis and synthesis.
  • Experiences are structured to require the student to take initiative, make decisions and be accountable for results.
  • Throughout the experiential learning process, the student is actively engaged in posing questions, investigating, experimenting, being curious, and solving problems, assuming responsibility, being creative and constructing meaning.
  • Students are engaged intellectually, emotionally, socially, soulfully and/or physically. This involvement produces a perception that the learning task is authentic.
  • The results of the learning are personal and form the basis for future experience and learning.
  • Relationships are developed and nurtured: student to self, student to others and student to the world at large.
  • The instructor and student may experience success, failure, adventure, risk-taking and uncertainty, because the outcomes of the experience cannot totally be predicted.
  • The instructor’s primary roles include setting suitable experiences, posing problems, setting boundaries, supporting students, insuring physical and emotional safety, and facilitating the learning process. He recognizes and encourages spontaneous opportunities for learning. He strives to be aware of their biases, judgments and pre-conceptions, and how these influence the student.
  • The design of the learning experience includes the possibility to learn from natural consequences, mistakes and successes.

How Experiential Learning Works

The basic model of experiential learning cycle is “Do Reflect Decide”.Kolb’s Experiential Learning Theory (David Kolb, 1984) defines experiential learning as “the process whereby knowledge is created through the transformation of experience. Knowledge results from the combination of grasping and transforming experience.”

Kolbs Experiential Learning Cycle

​Kolb’s Experiential Learning Theory presents a cycle of four elements

  1. Concrete Experience
  2. Reflective Observation
  3. Abstract Conceptualization
  4. Active Experimentation

​Kolb described two different ways of grasping experience:

  1. Concrete Experience
  2. Abstract Conceptualization

He also identified two ways of transforming experience:

  1. Reflective Observation
  2. Active Experimentation

Understanding the 4 Stages of Experiential Learning Cycle

  1. CONCRETE EXPERIENCE: 
    Concrete experience describes the hands-on experiences that we learn from. It’s here that we try new things, face problems and step out of our comfort zone. These experiences could be anything in our personal or professional lives. it’s through experience that we get to learn from our successes or failures.  
    ​2. REFLECTIVE OBSERVATION-. The ‘reflective observation’ phase of the experiential learning cycle is all about reflection on the experiences which include both action and feelings. It’s during this stage that we ponder on the experiences. We get to reflect on what went right and what could be improved? It’s also a chance to observe how it could have been done differently and to learn from each other. 
    3. ABSTRACT CONCEPTUALIZATION
    Once we have identified and understand the defining characteristics of an experience, we can decide on what we can do differently next time. This is a time for planning and brainstorming steps for success.
    4. ACTIVE EXPERIMENTATION
    ​
    The active experimentation phase of the learning cycle is where we get to experiment with our ideas. It’s time to put our plan of action to the test in the real world! 

Examples of Experiential Learning 

The learning process does not necessarily begin with experience, however. Instead, each person must choose which learning mode will work best based upon the specific situation.For example, let’s imagine that you are going to learn how to drive a car. Some people might choose to begin learning via reflection by observing other people as they drive. Another person might prefer to start more abstractly, by reading and analyzing a driving instruction book. Yet another person might decide to just jump right in and get behind the seat of a car to practice driving on a test course.
​Examples-

Learning to ride a bicycle:

  • Reflective observation – Thinking about riding and watching another person ride a bike.
  • Abstract conceptualization – Understanding the theory and having a clear grasp of the biking concept.
  • Concrete experience – Receiving practical tips and techniques from a biking expert.
  • Active experimentation – Leaping on the bike and have a go at it.​

​Learning to coach:

  • Concrete experience – Having a coach guide you in coaching someone else.
  • Active experimentation – Using your people skills with what you have learned to achieve your own coaching style.
  • Reflective observation – Observing how other people coach.
  • Abstract conceptualization – Reading articles to find out the pros and cons of different methods.

Experiential Learning Style Model

Kolb notes that people who are considered “watchers” prefer reflective observation, while those who are “doers” are more likely to engage in active experimentation. “Because of our hereditary equipment, our particular past life experiences, and the demands of our environment, we develop a preferred way of choosing,”

Kolb explains-These preferences also serve as the basis for Kolb’s learning styles. In this learning style model, each of the four types has dominant learning abilities in two areas.
  The four learning styles are–
        1. Diverging (concrete, reflective) – Emphasizes the innovative and imaginative approach to doing things. Views concrete situations from many perspectives and adapts by observation rather than by action. Interested in people and tends to be feeling-oriented like such activities as cooperative groups and brainstorming.

  1. Assimilating(abstract, reflective) – Pulls a number of different observations and thoughts into an integrated whole. Likes to reason inductively and create models and theories. Likes to design projects and experiments.
  2. Converging(abstract, active) – Emphasizes the practical application of ideas and solving problems. Likes decision-making, problem-solving, and the practical application of ideas. Prefers technical problems over interpersonal issues.
  3. Accommodating(concrete, active) – Uses trial and error rather than thought and reflection. Good at adapting to changing circumstances; solves problems in an intuitive, trial-and-error manner, such as discovery learning. Also tends to be at ease with people.

Kolbs Learning Styles

Kolb theorized that the four combinations of perceiving and processing determine one of four learning styles of how people prefer to learn. Kolb believes that learning styles are not fixed personality traits, but relatively stable patterns of behavior that is based on their background and experiences.
What is both interesting and important for group work is that different people tend to have different styles of learning, and therefore, place more emphasis, or feel more comfortable, in some stages of the learning cycle than others. ​
The learning styles are combinations of the individual’s preferred approaches. These learning styles are as follows:

  • Reflector / Diverger
  • Theorist / Assimilator
  • Pragmatist / Converger
  • Activist / Accomodator

​For example, people with the Diverging learning style are dominant in the areas of concrete experience and reflective observation.
Kolb suggests that a number of different factors can influence preferred learning styles. Some of the factors that he has identified include:

  • Personality type
  • Educational specialization
  • Career choice
  • Current job role
  • Adaptive competencies

Importance of Experiential Learning

  • Makes learning relatable to participants: Participants build on what they already know and are provided with opportunities to make connections between new concepts and existing ones.
  • Increases the effectiveness of learning: Participants engage in critical thinking, acquire problem solving skills and engage in decision making.
  • Links theory to practice: Participants have the chance to engage in the experience and practice what they have learned, see the application of the theoretical concepts in practice, process that application and make generalizations.
  • Increases Participants’ engagement, by encouraging collaboration and scaffolding between learners.
  • Assists in memory retention, by building strong relationships between feelings and thinking processes. Participants have the capacity to learn successfully when the information is associated with values and feelings.
  • Leads to development of skills for lifelong learning, by assisting in the acquisition of essential skills and encouraging Participants to reflect, conceptualize, and plan for next steps.

​Principles of Experiential Learning

  1. The learner has a real authentic experience which includes real consequences where the learner makes a choice to participate and is intentionally involved in examining, exploring and playing with a real world experience that can lead to any outcome.
  2. The experience is an hands-on “feeling and doing” interaction. The experience can be planned or be completely spontaneous. There is very less or no teaching involved and the experience may include experiences which involve solo and group involvement.
  3. The experience is direct experience with focused reflection and builds on past knowledge and experiences. It requires active involvement in construction of meaning and encourages collaboration and exchange of ideas and perspectives between the participants.
  4. The learner actively reflects on that experience through individual thought, group discussion, questioning, processing or writing in a journal. They may participate in group processing and discussion including debriefing and reflective questions posed by a facilitator who challenges the group to create personal meaning and transference of learning to new situations.
  5. The Learning is able to draw conclusions and makes sense of what the learner has experienced, including having opportunities to relate this/ her own experiences with those of others. The learner may develop theories, models or concepts about the experience. The learner may develop new questions, which can lead to the next experience or explorations. The learner is able to apply their new learned knowledge in the next experiences. 

 

Role of Instructor and students in Experiential Learning-

Instructor Roles in Experiential Learning In experiential learning, the instructor guides rather than directs the learning process where students are naturally interested in learning. The instructor assumes the role of facilitator and is guided by a number of steps crucial to experiential learning as noted by (Wurdinger & Carlson, 2010, p. 13).

  1. Be willing to accept a less teacher-centric role in the classroom.
  2. Approach the learning experience in a positive, non-dominating way.
  3. Identify an experience in which students will find interest and be personally committed.
  4. Explain the purpose of the experiential learning situation to the students.
  5. Share your feelings and thoughts with your students and let them know that you are learning from the experience too.
  6. Tie the course learning objectives to course activities and direct experiences so students know what they are supposed to do.
  7. Provide relevant and meaningful resources to help students succeed.
  8. Allow students to experiment and discover solutions on their own.
  9. Find a sense of balance between the academic and nurturing aspects of teaching.
  10. Clarify students‟ and instructor roles.

Student Roles in Experiential Learning

Qualities of experiential learning are those in which students decide themselves to be personally involved in the learning experience (students are actively participating in their own learning and have a personal role in the direction of learning). Students are not completely left to teach themselves; however, the instructor assumes the role of guide and facilitates the learning process. The following list of student roles has been adapted from (UC-Davis, 2011 and Wurdinger & Carlson, 2010).

  1. Students will be involved in problems which are practical, social and personal.
  2. Students will be allowed freedom in the classroom as long as they make headway in the learning process.
  3. Students often will need to be involved with difficult and challenging situations while discovering.
  4. Students will self-evaluate their own progression or success in the learning process which becomes the primary means of assessment.
  5. Students will learn from the learning process and become open to change. This change includes less reliance on the instructor and more on fellow peers, the development of skills to investigate (research) and learn from an authentic experience, and the ability to objectively self-evaluate one’s performance.

 Integrating Experiential Learning (EL) in Teaching-

As previously noted, a primary role for instructors is to identify a situation which challenges students through problem-solving, cooperation, collaboration, self-discovery and self-reflection. At the same time, decide what the students should learn or gain from the learning experience. Below are some primary points to consider when integrating experiential learning in your own teaching.

Plan- Once the EL experience has been decided upon, plan the experience by tying it to the course learning objectives and determine what students will need to successfully complete the exercise (resources such as readings and  worksheets, research, rubrics, supplies and directions to off-campus locations, etc.). Also, determine the logistics: how much time will be allotted for the students to complete the experience (a complete class session, one week or more)? Will students need to work outside of class? How will the experience end? What forms of assessment will you employ? Will you use ongoing assessments such as observations and journals (called formative assessment), end of experience assessments such as written reports and projects, self and/or peer assessments, or a combination of all three?

Prepare. After the planning has been completed, prepare materials, rubrics, and assessment tools and ensure that everything is ready before the experience begins.

Facilitate. As with most instructional strategies, the instructor should commence the experience. Once begun, you should refrain from providing students with all of the content and information and complete answers to their questions. Instead, guide students through the process of finding and determining solutions for themselves.

Evaluate. Success of an experiential learning activity can be determined during discussions, reflections and a debriefing session. Debriefing, as a culminating experience, can help to reinforce and extend the learning process. In addition, make use of the assessment strategies previously planned.

When Does Experiential Learning Happen?

​Experiential learning is said to happen when participants get immersed cognitively, affectively, behaviorally, and are supported by a facilitator in reflecting, processing the experiences, emotions, thoughts, and actions to get a insight in a safe learning environment, leading to change in perspective, understanding, thought, and behavior.  is able to apply the newly acquired learning in a different real life situation thereby demonstrating change.
​How is experiential learning delivered?

Training needs and desired outcomes are identified, conducive and safe learning environment away from work is created and participants are walked through a sequence of activities that focus on ice breaking, energizing, trusting building initially.  Once participants are engaged and feel safe, they are put into various tasks and challenges where they get to participate in a experience.
​            The sequence of the tasks or activities follows low order thinking skills to high order thinking skills. After every activity the facilitator invites the participants to take part in in a discussion where the facilitator debriefs or processes the experiences.
The facilitator invites the group to achieve a goal, but does not explain how to successfully complete the activity. Participants must work to find a solution individually and together as a team, and must communicate and learn from each other in order to be successful. The Learning begins with the experience followed by reflection, discussion, analysis and evaluation of the experience.

 

The Learning Wave

How do participants learn in Experiential Learning?

The Participants undergoing the experience are instantly able to feel the results of their actions by participating in the experience. During the processing  they get to realise the immense difference that can be made by a changing their thinking and behavior to the real life application.

Where Experiential Learning can be used?

Experiential learning can become a continuous process of learning and development in corporate companies and schools by adopting the basic steps of “do, reflect and apply”.

 

References –

  • Association for Experiential Education http://www.aee.org/
  • Dewey, J. (1938). Experience & Education. New York, NY: Kappa Delta
  • D.  Experiential Learning: Experience as the source of learning and

 

  • developmentEnglewood Cliffs NJ: Prentice Hall
  • Moon, J.A. (2004) A Handbook of Reflective and Experiential Learning: Theory and PracticeNew York: Routledge
  • Hubbbrad Ryan. Experiential Learning in the Internationalisation of Higher Education
  • IGNOU ES-361 Educational Technology
  • Saini Kavita, Gullybaba Publishing House(P) Ltd.
  • Coilnbeard, Wilson Jhon P., Experiential Learning: A Handbook of Educational Training and Coaching.

वेब श्रृंखला और नैतिकता की राजनीति में ’’स्त्री’’- एक आलोचनात्मक विश्लेषण- रजनी

0

वेब श्रृंखला और नैतिकता की राजनीति में ’’स्त्री’’- एक आलोचनात्मक विश्लेषण 

रजनी, 
Ph.D शोधार्थी,
राजनीति विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय
ईमेल  riya7116@gmail.com,
संपर्क  9716452972

सार

नैतिकता की राजनीति से आषय आपके लिए एक पैमाना तय कर देने से है, जहां आपको बताया जाता है कि आपको कैसे जीवन व्यतीत करना है, आपका व्यक्तित्व राज्य के नियमो पर निर्भर करता है, जहां आप स्वयं को सिर्फ आईने के सामने स्वतंत्र अनुभव कर सकते है, जिसका सबसे अधिक प्रभाव लैंगिकता अर्थात स्त्री पर पड़ता है या यों कहिए कि लैंगिकता को इस नैतिकता की राजनीति के पैमाने से नापकर अन्य चीजो का स्थान तय किया जाता है, फिर चाहे वे घरेलू कार्य हो या नौकरी, स्त्री–पुरूश का पहनावा हो, या बोलचाल व तौर तरीको का रहन सहन यहां तक की टेलीविजन और समाचारपत्र पर प्रस्तुत किये जाने वाले कार्यक्रम, इत्यादि प्रकार के अन्य भी कार्य है, परंतु वर्तमान युग ने नए तत्व को जन्म दिया जिसे वेब सीरिज के नाम से जाना जाता है इसकी विकसित तकनीकि ने लैंगिकता के प्रस्तुतिकरण को एक अलग ही दिषा का रूप  दिया है, वेब सीरीज ने आज के युग को प्रभावित करने का पूर्ण प्रयत्न किया है जिसके समाज पर नकारातमक और सकारात्मक प्रभाव देखे जा रहे है।

प्रस्तावना

’’मनुश्य जन्म से स्वतंत्र है, परंतु बेड़ियों में जकड़ा है’’ यह कथन कहीं न कहीं सत्य प्रतीत होता है, जहां नैतिकता में राजनीति का समावेष है। नैतिकता की राजनीति से आषय आपके लिए एक पैमाना तय कर देने से है, जहां आपको बताया जाता है कि आपको कैसे जीवन व्यतीत करना है, आपका व्यक्तित्व राज्य के नियमो पर निर्भर करता है, जहां आप स्वयं को सिर्फ आईने के सामने स्वतंत्र अनुभव कर सकते है, परंतु वास्तविकता में आप राजनीति की बेड़ियों में जकड़े हुए है और यदि वास्तविक नैतिकता को देखा जाए तो उसका तात्पर्य मानदण्ड और मूल्यो से है जिनका प्रयोग केवल व्यक्तिगत जीवन के लिए किया जाना चाहिए न कि जीवन के सामाजिक पहलुओ के लिए। नैतिकता की राजनीति को हर मोड़, हर क्षेत्र में देखा जा सकता है, जिसका सबसे अधिक प्रभाव लैंगिकता अर्थात स्त्री पर पड़ता है या यों कहिए कि लैंगिकता को इस नैतिकता की राजनीति के पैमाने से नापकर अन्य चीजो का स्थान तय किया जाता है, फिर चाहे वे घरेलू कार्य हो या नौकरी, स्त्री-पुरूश का पहनावा हो, या बोलचाल व तौर तरीको का रहन सहन यहां तक की टेलीविजन और समाचारपत्र पर प्रस्तुत किये जाने वाले कार्यक्रम, इत्यादि प्रकार के अन्य भी कार्य है, परंतु वर्तमान युग ने नए तत्व को जन्म दिया जिसे वेब सीरिज के नाम से जाना जाता है इसकी विकसित तकनीकि ने टेलीविज़न को पछाड़ कर पीछे कर दिया है। जहां लैंगिकता के प्रस्तुतिकरण ने एक अलग ही दिषा का रूप ग्रहण कर लिया है, वेब सीरीज ने आज के युग को प्रभावित करने का पूर्ण प्रयत्न किया है जिसके समाज पर नकारातमक और सकारात्मक प्रभाव देखे जा रहे है।

 

 

स्वाभाविक रूप से, मानव हमेशा वेब श्रृंखला में पात्रों के साथ अपने जीवन की तुलना करने का प्रयास करते हैं और यह नहीं भूलते कि चरित्र काल्पनिक हैं लेकिन प्रेरणा वास्तविक जीवन के लोगों से है। मानव मस्तिष्क हमेशा यह जानने का प्रयास करता है कि हमारे जैसा क्या है और जब टीवी श्रृंखला देख रहे होते हैं तो वही होता है, अर्थात आप खुद को पात्रों के साथ प्रक्षेपित करते हैं जिसके कारणवष यह अंततः हमारे दिन-प्रतिदिन के जीवन को प्रभावित कर, हमारे दृष्टिकोण, व्यवहार, विचारों, जीवनशैली को परिवर्तित कर देता है और मुख्य बात तो यह है कि मनुश्य उस परिवर्तन से अवगत नहीं हो पाता। जिसका प्रभाव समाज पर नकारात्मक व सकारात्मक दोनो रूप में देखने को मिलता है।

लैंगिकता और वेब सीरिज

आधुनिक काल में लैंगिकता के प्रति विमर्ष में वृद्धि हुई है, इसमें संवाद, राजनीतिक सक्रियता और संवाद की अंतर्क्रिया को एक साथ देखा जा सकता है। लैंगिकता के सांस्कृतिक प्रतिक अनेकार्थी होते है, जिसमें अधिकतर लोग अंतर्विरोधो से ग्रसित होते है, जहां लैंगिकता का प्राथमिक रूप षक्ति, सत्ता या क्षमता के साथ जोड़कर प्रस्तुत करना है। षक्ति को मर्दानगी अर्थात पुरूश से संबंधित कर इसकी अपेक्षा कमजोरी, निर्भरता, अराजक, परायापन, के रूप में स्त्रीत्व को दर्षाया जाता रहा है, क्योंकि जेंडर, मर्दानगी अर्थात पुरूश और स्त्रीत्व अर्थात स्त्री के बीच अंतर और अंतर करने वाली विशेषताओं की श्रेणी है। संदर्भ के आधार पर, इन विशेषताओं में जैविक सेक्स (यानी, पुरुष, महिला या एक अंतर-भिन्नता की स्थिति), सेक्स-आधारित सामाजिक संरचनाएं (यानी, लिंग भूमिकाएं) या लिंग पहचान शामिल हो सकती हैं, जिसे वेब सीरीज के माध्यम से भरपूर दर्षाने का प्रयास किया जा रहा है।

बाजार में इंडियन वेब सीरीज आने से पहले यह कभी चर्चा में नहीं आने वाले विचारों के बारे में बात करने से एक उत्साह उत्पन्न हुआ है। इसका प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में देखा जा सकता है। हाल ही में इसके दर्शकों की संख्या में वृद्धि हुई है। वेब सीरीज के बाजार को पूरा करने के लिए हाल के दिनों में कई एप्लिकेशन बनाए गए हैं जैसे- नेटफ्लिक्स, अमेजॅन प्राइम, हॉटस्टार, उल्लू, वूट, आदि। दिलचस्प बात यह है की वे दैनिक सोप ओपेरा संस्कृति द्वारा निर्धारित मानकों से दूर होते जा रहे हैं। पश्चिमी मूल्यों से इसके सभी सरोकार जुड़े हुए है जो हमारी संस्कृति पर बड़ा आघात है क्योंकि इसके परिणाम सकारात्मक और नकारात्मक दोनों हैं। “पश्चिमी नाटकों से भारतीय वेब श्रृंखला में नग्नता को संभव बनाने का भरपूर प्रयास किया है। जिस पर किसी प्रकार का कोई टैबू नहीं हैं। यह सत्य है कि भारत में बनाई जा रही वेब श्रृंखला में सेक्स को जिस तरह से दर्षाया गया है, वह भारतीय संस्कृति से बहुत अलग है, और यह पश्चिमी शो का एक प्रभाव है जिसने इस प्रकार की चीजों के लिए बाजार को खोल लिया है।

प्रारंभ में सेक्रेड गेम्स (नेटफ्लिक्स पर) की रिलीज ने इसकी प्रवीणता और संकीर्णता की प्रस्तुति से दर्शकों को आश्चर्यचकित किया तो वहीं आपराधिक न्याय (हॉटस्टार पर) या दिल्ली अपराध (नेटफ्लिक्स पर) जैसे शो कानून और न्याय के अंधेरे में स्त्री पक्ष को दिखाने के लिए सहारा लिया है। तो वहीं स्त्री सषक्तिकरण पर बल देते हुए Cable Girls, coronavirus lockdown, Deadwind, Devi, four more shots please, Killing Eve, Orange Is The New Black, Little Fires Everywhere, Hundred जैसी वेब श्रृंखला को रचा गया परंतु इसका एक ऐसा पक्ष भी है जो सकारात्मकता के साथ समाज में नकारात्मक संदेष भी देने का साधन है जिसमें कुछ वेब श्रृंखला इस प्रकार है

 

 

Lust stories, Margrita with a straw, Mirzapur, Four more shots please, Paanchali, MastRam, Made in Heaven, Mastram इस प्रकार की वेब श्रृंखला स्त्रियों की कामुकता को दर्षाती है परंतु इस प्रकार के दृष्य देखने के लिए सेक्स षिक्षा का होना अतिआवष्यक है। इस प्रकार के वेब श्रृंखला ने उद्योग में क्रांति लाने और खुद को एक ऐसी चीज के माध्यम से बाजार में उतारने का एक सकारात्मक मोड़ ले लिया है, जिसे पहले कभी भी प्रस्तुत करने योग्य नहीं माना जाता था, वे भी, कुछ मायनों में, गलत तरीके से चीजों की वास्तविकता दिखाने वाले हैं। वहीं भारतीय शो आमतौर पर यौन संकीर्णता और कार्यात्मक शराब के साथ ’गतिशील सोच को भ्रमित करते हैं’ जो आजकल सिर्फ एक विशय प्रतीत होता है। जहां यह भी विधिवत स्वीकार किया जाना चाहिए कि हम, एक समाज के रूप में, जहां न्यूनतम औपचारिक यौन शिक्षा का अभाव है, यह भी अनुभव किया जाना चाहिए कि लोगों द्वारा यौन सामग्री की पहुंच की अपेक्षा से अधिक हानिकारक परिणाम हो सकते हैं। जिस तरह से एक अपरिपक्व दिमाग इस तरह के संवेदनशील मुद्दों को मानता है, उसे दैनिक रूप से लड़कियों और महिलाओं के साथ बलात्कार के कृत्य में भाग लेने वाले नाबालिगों की संख्या से आसानी से मापा जा सकता है। इसलिए, हालांकि सेक्स, कामुकता, शराब, आदि के मुद्दों के बारे में चिंताओं पर बात करना और उनका प्रतिनिधित्व करना महत्वपूर्ण है, यह भी कि कैसे, कब, और क्यों  पर ध्यान केंद्रित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

अभी तक हिंदी फिल्मों में हमेशा ही औरत को त्याग की मूर्ति और सती-सावित्री दिखाया है। इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन औरतें सिर्फ ऐसी ही नहीं होतीं? औरतें भी इंसान हैं जिनमें कमियां, इच्छाएं और सेक्शुअल फैंटसीज होती हैं। समय के साथ बहुत से डायरेक्टर्स ने इस बात को समझा कि सेक्स की बात करने वाली औरत ‘बुरी औरत’ नहीं है और उसे वैम्प के रूप में दिखाना जरूरी नहीं है- उदाहरणस्वरूप जिसमें कुछ वेब श्रृंखला निम्न प्रकार है

’’मार्गरीटा विद अ स्ट्रॉ’’ जिसमें शारीरिक रूप से डिसेबल्ड लोगों में भी सेक्शुअल इच्छाएं होती हैं, इस बारे में इस फिल्म से पहले किसी ने नहीं दिखाया था। कल्कि केकलां ने इस किरदार को बेहद खूबसूरती से निभाया था। प्यार, सेक्शुएलिटी और जिंदगी को तलाशती इस फिल्म के सेंटर में एक औरत का होना बहुत ताजगी देता है, वहीं ’’लस्ट स्टोरीज’’ के केंद्र में 4 अलग-अलग स्त्रियां हैं, जिसमें शादी में धोखा, अपने से कम उम्र के लड़के से प्यार, मास्टरबेशन और सेक्स टॉयज जैसे विशयों को केंद्रित किया गया, दूसरी ओर ’’मिर्जापुर के माध्यम से लाइब्रेरी में इरोटिका पढ़कर मास्टरबेट करती लड़की और पति से असंतुष्ट रह जाने वाली स्त्री इस सीरीज के मजबूत किरदार के साथ, ’’फोर मोर शॉर्ट्स प्लीज’’ शो को पसंद किया जाए या नहीं, लेकिन ये बात तो तय है, इस शो ने स्त्री को एक इंसान के रूप में दर्षाया है। अपने डॉक्टर के बारे में फैंटसी रखने वाली स्त्री और अपनी वर्जिनिटी खोने के लिए एक पुरूश प्रॉस्टिट्यूट बुलाने वाली एक लड़की भी इसी समाज का भाग हैं, जिसे इस शो के माध्यम से बहुत अच्छे से दर्षाया गया है इत्यादि प्रकार की अन्य सीरीज भी देख जा सकती है। इस प्रकार इनके चलते समाज में आये और आ रहे बदलावों के बारे मेंदर्षाया गया है। जहां स्त्रियों के लिए अब विकल्प अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खोल दिए गए है जिसके लिए आज की स्त्री अब जागरूक हो रही है, स्त्री को समर्थता के साथ सषक्तिकरण को बढावा दिया जा रहा है। यह समाज की यर्थाथता को दर्षाने का एक प्रयास है जो कहीं न कहीं दबी हुई है। सेंसर बार्ड से हडा दिया जाता है, स्त्रियों के लिए षक्ति की धारणा को दर्षाने का एक कार्य कर रहा है जहां स्त्रियों की कामुकता को प्रधानता दी रही है परंतु यह बात भी सत्य है कि इस

 

 

शक्ति की परिभाषा का पूर्ण रूप से सही प्रस्तुतीकरण नहीं किया जा रहा है जिसका कारण वर्तमान और आने वाली पीढ़ी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ कता है, जिसका कारण सेक्स को अधिक परोसना रहा है।

आलोचनात्मक मूल्यांकन

वर्तमान युग की वेब श्रृंखला शैक्षिक होने के साथ-साथ मनोरंजक भी हो सकती है। यह लोगों को दुनिया भर में यात्रा करने का अवसर दे सकता है, और नए विचारों को उजागर कर सकता है जो उन्हें अपने समुदाय से सामना नहीं करना पड़ सकता है, और विभिन्न संस्कृतियों के बारे में जानने का मौका भी। वेब श्रृंखला के शो से प्रो-सामाजिक संदेश आज के युवाओं के व्यवहार पर सकारात्मक प्रभाव डालेंगे। हालांकि, इन वेब श्रृंखलाओं से नकारात्मक मूल्यों को सीखने की अधिक संभावना है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं, युवाओं को अपने व्यवहार में किसी के व्यवहार की नकल और अनुकूलन करने की अधिक संभावना है क्योंकि वे आसानी से वेब श्रृंखला में दिखाए गए से संबंधित हो सकते हैं। आज निश्चित रूप से युवाओं में बहुत से व्यवहार परिवर्तन होंगे यदि वे वेब श्रृंखला पर दिखाई जाने वाली अत्यधिक हिंसा के संपर्क में हैं। इस प्रकार के कार्यक्रम इन युवाओं को उनके व्यवहार और उनके विचारों में आक्रामक होने के लिए प्रोत्साहित करेंगे और  प्रभावित होने की अधिक संभावना होगी।

वेब श्रृंखला न केवल आक्रामक के प्रति अपने व्यवहार को बदल रही है, बल्कि उनकी भाषा और भाषा को भी बदल रही है जो किसी भी संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। युवाओं में धूम्रपान, शराब पीने की आदतें तेजी से बढ़ रही हैं। अन्य भौतिक गतिविधियों की तुलना में मनोरंजन के स्रोत के रूप में वेब श्रृंखला का अधिक उपयोग। आमतौर पर युवाओं में मोटापा, अवसाद, नेत्र विकार देखे जाते हैं। निष्कर्ष बताते हैं कि युवाओं को पता चलता है कि वेब श्रृंखला शो की सामग्री समाज की नैतिकता, संस्कृति और मूल्य के खिलाफ है।अंत में अध्ययन विश्लेषण के माध्यम से यह स्पष्ट है कि वेब श्रृंखला मानसिक रूप से और साथ ही युवा युवाओं पर शारीरिक रूप से प्रभावित करती है।

आज का समाज नैतिकता की राजनीति में फंसा हुआ है जिसने नैतिकता की जड़ो को खोखला करना षुरू कर दिया है। जहां गुड स्वयं को अर्थात अच्छे को नैतिकता की श्रेणी में रखता है जिसे शक्तिषाली लोगो द्वारा तैयार किया जाता है और यही शक्तिषाली लोग जैसे की पितृसत्तात्मक ढ़ाचा स्वयं से नीचे के लोगो को कमजोर व इविल की संज्ञा देते है। और इसी ढाचें के चलते आधुनिक समाज में समझने ओर समझाने के तरीको में परिवर्तन अत्यधिक नकारात्मक प्रारूप में सामने आया है जिसे परिवर्तन की अतिआवष्यकता है।

वहीं इस बात को भी समझने की आवष्यकता है कि कुछ लोगो द्वारा कैसे पूरे समाज के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा का निर्णय किया जा सकता है। कैसे इस प्रकार भेदभाव की नैतिकता को नियम के रूप में परिवर्तित करके मानवता पर थोपा जाता है। बहरहाल, बीते दो सालों के अंदर छोटे और बड़े पर्दे के बीच एक नये तीसरे पर्दे यानी वेबसीरीज ने भी प्रवेश लिया है जहां कैमरे की तीसरी आंख अपने भीतर वह सबकुछ समेट रही है जो हमारे घर, समाज और अंतरंग दुनिया में अब तक कई पाबंदियों के साथ पहुंचता था। वेबसीरीज का तीसरा पर्दा छोटा है लेकिन उसका विस्तार और पहुंच हर व्यक्ति, बच्चे, बूढ़े, औरतों के हाथों में है।

 

हर पांबदी से दूर, सेंसर से परे और बेहिसाब बेरोक-टोक के वेबसीरीज हमारे पास हमारा ही अंधेरा उस रौशनी के साथ परोस रही है जिसे देखकर हम कभी उसके बदलाव के प्रति चिंतित हुआ करते थे। खून-खराबे की घटनाएं, बलात्कार, शोषण, गालियों और हिंसा के दृश्यों से अटी पड़ी ये वेबसीरीज सिनेमा का नया स्वरूप है। जहां रचनात्मक उड़ान के लिए कोई पाबंदी नहीं है और दृश्यांकन के लिए कोई सेंसर नहीं  है। वेबसीरीज की नई दुनिया ने हमारे समाज के यथार्थ को मनोरंजन बना दिया है। दमन, शोषण, बेचौनी, डर, भय, कुंठाओं, मानवीय त्रासदियों, विद्रुपताओं, जीवन के विभत्स के हिस्से को कंटेंट और प्रोडक्ट में बदल दिया गया है।

साहित्य के सामानांतर फिल्में और सिनेमा सामाजिक बदलावा का माध्यम तो बना है, लेकिन सेंसर की मर्यादा के साथ। उसने अपने समाज और समय के सवालों को उसके हल, संशोधनों और अपेक्षित आग्रहों के साथ प्रस्तुत किया है। फिल्में सीमाओं में रही हैं और समाज के बीच हद में भी। फिल्मों की तुलना में  तीसरे पर्दे  यानी की वेबसीरीज में सबकुछ कंटेंट है और प्रॉडक्ट का हिस्सा। यथार्थ यहां बदलाव के आग्रह के साथ नहीं आया है बल्कि व्यूअरशिप और मनोरंजन के साथ मौजूद है। दरअसल, वेबसीरीज में गालियों से भरपूर, हिंसा से लबरेज और बेहद विभत्स तरीके से दर्शाए सेक्स के दृश्यों ने उसे सॉफ्ट पॉर्न के बीच घटती कथाओं से मनोरंजित किया है। हाथ में मोबाइल, हिंसा, गालियों और सेक्स में डूबे दृश्यों के बीच बह रही एक कहानी से चाश्नी सा चस्का। यह कंटेंट हमारे ही परिवेश से उठाकर तड़के और मसाले के साथ बेचने की कला का तरीका है जो एक समय तक तो आर्कषित कर चुका है लेकिन अब विद्रुपताओं, हिंसा, पॉर्न कंटेंट के कारण सवालों के घेरे में है।

सिनेमा में सेंसर बोर्ड है लेकिन टेली सीरियल्स उनके चनतअपमू के अंतर्गत नहीं आते हैं । सीरियल निर्माता समाज को कई बुरे संदेश दे रहे हैं, बता रहे हैं और चित्रित कर रहे हैं। यह पूरी तरह से नकारात्मक और बुरी चीजों को प्रेरित करता है, और लोगों के दिमाग में नए बुरे विचारों को नया रूप देता है। वहीं नैतिकता की राजनीति की बात करे तो नैतिकता की राजनीति केवल स्त्रियों के लिए ही क्यों होती है? जहां अच्छा और बुरे का निर्णय सिर्फ सत्ताधारी हाथों में ही क्यों होता है?

इसके माध्यम से पुरानी परंपराओं पर यह आघात का स्रोत है, जिसका कारण इसका यह एक ओपन सोर्स होना है जिसकी कोई सीमाएं नहीं है। इसीकारण इसपर सेंसरषिप नहीं लगाया जा सकता। इस प्रकार की नकारात्मकता को निशेध करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में 100 से अधिक की संख्या मे पीटीषन उाली गई है जिस पर कोई कार्यवाही न होने और किसी प्रकार की रोक न लगा पाने के कारण यह घातक सिद्ध हो सकता है। वहीं इसका अन्य कारण इसका अत्यधिक काल्पनिक होना भी है जिसे वास्तविक जीवनषैली में न के बराबर ही देखने को मिलता है, क्योंकि यह सिर्फ एक उघोग मात्र है, जहां महिला को बस अपने उघोग में बढ़ोतरी का साधन मात्र के रूप में देखने का प्रयास किया गया है। परंतु ऐसी रूढ़ियों को भी तोड़ा है जहां फिल्मों, सीरीयलो में पुरूशों को बाहुबली के रूप् में दर्षाया जाता है परंतु वेब सीरीज में इसके विपरित दर्षाया गया है जहां एक स्त्री को बाहुबली होने की आवश्यकता नहीं वह बिना इसके भी सब पर नियंत्रण कर सकती है। समाज इसी से प्रभावित होकर अब उसी प्रकार के जीवन जीने की अग्रसर है।

 

 

 

निष्कर्ष

निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि लोग वेब श्रृंखला शो से अत्यधिक प्रभावित हैं। क्योंकि वे अन्य गतिविधियों के बजाय वेब श्रृंखला शो पर अधिक ध्यान और समय देते हैं। जबकि वर्तमान समय में यह भी महत्वपूर्ण कारक है कि परिवार के सदस्य (माता-पिता) युवा युवाओं को कम समय देते हैं, इसलिए, वे ज्यादातर वेब श्रृंखला शो देख रहे हैं। घर में, हर किसी के पास वाई-फाई कनेक्टिविटी के साथ अलग-अलग बेडरूम हैं, इसलिए युवा घंटों के लिए कमरों में बंद हैं। जब उम्र के युवाओं को वेब श्रृंखला पर अधिक ध्यान केंद्रित करना होगा, तो इसका मतलब है कि वे वेब श्रृंखला से बहुत कुछ सीख रहे हैं। वास्तव में, विश्लेषण से पता चलता है कि अधिकांश युवा मनोवैज्ञानिक रूप से वेब श्रृंखला के माध्यम से प्रभावित होते हैं। फिल्में कैमरे की आंख का सौंदर्य है। फिल्मी दुनिया अपने सौंदर्यबोध में जितनी खूबसूरत है उतनी ही विद्रूप भी। एक ओर कैमरे में दर्ज कहानियां सपनों का संसार बुनती हैं तो वहीं अपने समय की विद्रूपताओं और विभत्सताओं से अंधेरे की दुनिया भी। हमारी फिल्मों में सौंदर्य और यथार्थ दोनों ने अपनी तरह की रचनात्मकता के साथ हमारे बीच जगह बनाई है। यथार्थ यहां मनोरंजन हैं और शोषण कंटेंट। इन दोनों का मिश्रण जितना मसालेदार होगा उतना ही बिकेगा और लोकप्रिय होगा। अपने समय के यथार्थ और उसके विभत्स स्वरूप को बताते हुए साहित्य ने समाज को दिशा देने के साथ-साथ शोषण और दमकारी प्रवृत्तियों को हटाने के  लिए राजनीतिक हस्तक्षेप, आंदोलन और विद्रोह को पर्याय माना है और उसे जगह दी है।

अगर ऊर्जा को सही दिशा ना दी जाए तो इसका दुष्परिणाम भी हो सकता हैं जैसे कि परमाणु शक्ति से हम इलेक्ट्रिसिटी भी बनना सकते हैं जो कि समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वही दूसरी ओर परमाणु बम जो कि समाज की आने वाली पीढ़ियों को भी विनाश की कगार पर खड़ा कर देती है।

हमारी भारतीय संस्कृति पारिवारिक मूल्यों से बहुत समृद्ध और बंधुआ है। लोग उस पारिवारिक बंधन में जीते हैं जो हमेशा के लिए रहता है, जिसके लिए भारत जाना जाता है। लेकिन ये टेली धारावाहिक इन मूल मूल्यों को बर्बाद कर रहे हैं और बदले में हमारे परिवार और समाज को तोड़ रहे हैं। यह निश्चित रूप से इनकार नहीं किया जा सकता है कि नेटफ्लिक्स और अमेजॅन प्राइम जैसी स्ट्रीमिंग सेवाएं व्यापक पहुंच प्रदान करती हैं और भारतीय फिल्म निर्माताओं को अपनी वास्तविक रचनात्मकता प्रदर्शित करने में मदद करती हैं। लेकिन नग्नता दिखाने वाली सामग्री, या हिंसा में संलग्न होने से संबंधित चिंताएँ भी मान्य हैं। इस प्रकार सेल्फ-सेंसरशिप एक अच्छे समाधान के रूप में दिखाई देती है।

संदर्भ

  1. De Beauvoir, Simone (2005), “Introduction from The Second Sex“, in Cudd, Ann E.; Andreasen, Robin O. (eds.), Feminist theory: a philosophical anthology, Oxford, UK Malden, Massachusetts: Blackwell Publishing, pp. 27–36
  2. Scott, Joan Wallach (1986). “Gender: A Useful Category of Historical Analysis”. The American Historical Review. 91(5): 1053. 
  3. Anderson, C, A. (2003). The influence of media violence on youth. Psychological Sciencein the Public Interest. December, 4, 110.

 

  1. Gokulsing, K, M. (2009).Popular culture in globalized India. Routledge.
  2. Kottak, C.P. (1990). Prime time society: An anthropological analysis of television andculture. Belmont, CA: Wadsworth.
  3. BAndura, D. R. (1963). Abnorm. Soc. Psychol.
  4. a. Anderson, L. B. (2003). Influence of media violence on youth. Psychol. Sci. PublicInteres.
  5. Huesmann, B. J. (2006). Short-term and long-term effects of violent media on aggressionin childern and adults. Arch. Pediatr. Adolesc. Med.

9/11 and the Shifting Contours of Xenophobia: Studying Karan Johar’s My Name is Khan- Dr. Hari Pratap Tripathi

0

9/11 and the Shifting Contours of Xenophobia: Studying Karan Johar’s My Name is Khan

 Dr. Hari Pratap Tripathi
                                                  Asst. Professor,
Dept. Of English,
St. Joseph’s College for Women,
Civil Lines, Gorakhpur, UP.
Email: prataphari661@gmail.com
Mobile: 9695705820

The 9/11 attacks on the giant twin towers of World Trade Centre, the citadel of American economy and on the Pentagon (the headquarters of the US Department of Defence) at the very beginning of the new millennium chronicle an apocalyptic moment in the history of the world. The terrorist attacks and the backlash following it proved the very notion of the American society as a ‘salad bowl’ to be a complete fiasco. Assessing the post 9/11 situation Nancy Kwang Johnson in her essay ‘Conceptualizing the Nation: Myths, Imagined Communities or Multiethnic Realities?’ The Cases of Israel, France and the US writes, ‘Post- 9/11, American case, known for its ‘‘melting pot’’, verged on becoming a ‘‘boiling pot’’ for the Muslim ‘‘other.’’ (Italics mine) (pg. 63)

Considerable attempts have been made since then to record the tragedy and the ensuing trauma from it through both cinematic as well as literary/fictional modes. There is a massive body of literature present today and even being added in the University syllabi. University of Maryland introduced ‘The Literature of 9/11’ as a graduate English course in the spring of 2014. In this rich corpus of literary and cinematic responses on 9/11 from across the globe South Asian cinema has a remarkable contribution. Some of the films that represent the catastrophe are: Yun Hota to Kya Hota (2006), Hope and A Little Sugar (2006), New York (2009), My Name is Khan (2010), I am Singh (2011), and The Reluctant Fundamentalist (2013) from India, and Khuda Key Liye (2007), from Pakistan.

The present paper is a reading into the film My Name is Khan directed by Karan Johar as a South Asian cinematic response to the growing chaos and trauma caused by the attacks of 9/11. The backdrop of the film is post terror attacks American society (stretching to a period of 6 years after the attacks) and the drastic change in its policies furthering the ordeals of a particular community (here Muslims). The paper attempts to highlight how a kind of Xenophobia infiltrated and prevailed into the post attacks society. In addition to it the presentation answers the following questions: What is xenophobia? What is a stranger? Is the existence of stranger mere a myth or a reality? How is a stranger constructed? What is the locus of Xenophobia? How does capitalism affect xenophobia? How does globalization influence xenophobia and the violence done to the strangers? Thus, focusing on these questions I have made an endeavour to highlight the shifting patterns of Xenophobia and the socio-politico-economic and historical factors that affect this change.

Xenophobia comes from the Greek word ξένος, (Xenos), meaning ‘stranger’ or ‘alien’ and Φόβος, (phobos), meaning ‘fear’. Hence it is defined as ‘dislike of or prejudice against people from other countries.’ It can be seen throughout history in the form of communal clashes, racial attacks, ethnic cleansing, religious hatred and genocide. Casteism and the Hindu/Muslim riots in India, Sinhalese/Tamil tension in Sri Lanka, ethnic cleansing in former Yugoslavia, purging of Shia’s and Sunnis in Iraq and Syria, the Jewish holocaust in Europe, the tussles of the Chechnya and the ordeals faced by the Rohingyas are a few examples.

Narrated through the character of Rizwan (Shah Rukh Khan) who suffers from Asperger’s Syndrome (Fear of new places, new people, yellow colour and detest of loud noises) the film portrays a Muslim father’s lone journey to meet the president of America to say that his name is Khan and he is not a terrorist. In the opening shots of the film we see Rizwan looking at the travel itinerary of the then American president George W. Bush and immediately after this he is seen being interrogated at San Francisco airport:

Officer: Why are you going to Washington DC?

Rizwan: I am going to meet the president of the United States of America.

Officer: Why do you want to meet the American president? Do you know where Osama is?

Rizwan: Oh! No-no I have to say to him, ‘My name is Khan and I am not a terrorist.’

Thus, Rizwan is catechized on the grounds of suspicion for him being a Muslim. This fear and detest of the stranger is xenophobia often termed as Islamophobia but in a very limited sense.

Further the film moves in flashback depicting Rizwan’s childhood days in India, the sad demise of his mother etc. The reference to the 1983 Hindu-Muslim riots in India and Rizwan’s repetition of the words of the rioters ‘All are bastards, we must shoot them’ symbolize the animosity that is prevalent both among Hindus as well as Muslims. This flashback serves as a referent point to the global pervasiveness of xenophobia. Further Rizwan’s journey to America gives pace to the plot and we see how in America Haseena (Zakir’s Wife) who teaches psychology in Brooklyn University, New York, diagnoses him with Asperger’s syndrome, a kind of Autism.

Rizwan meets Mandira (Kajol) while selling beauty products in salons which he has been asked to do by Zakir (Jimmy Shergil). Mandira is a divorced Hindu woman who has an eight years old son. Rizwan falls in love with her and wants to marry her but Zakir does not give consent to Rizwan’s relationship with a Hindu woman. The conversation between Zakir and Rizwan regarding his plans to marry Mandira marks the deep prejudice both among Hindus and Muslims due to their difference in religion:

Zakir: Bhai, You can’t marry her. She is a Hindu and does not match our religion. Understand? If you marry her our relationship will end forever.

Rizwan: No. There is no difference. Ammi always said there are only good people and bad people. And Mandira is a good woman.

Despite Zakir’s difference Rizwan marries Mandira, adopts Sam as his son and they shift to Banville where Mandira opens a salon of her own. Their happy lives come to a dreadful state following the terror attacks of September 11, 2001. Rizwan and Mandira both sense this premonition immediately from the reactions of the white people in the community gathering to pay homage to the dead. The moment Rizwan recites certain verse from Quran to pay tribute to the departed souls it disturbs the attention of the people and they immediately leave the place since he is a Muslim clad in Kurta-Pajama with a topi on his head- an attire generally identified with Muslim and a marker of their identity.  The very appearance of Rizwan is taken to be a threat and hence an object of revulsion. Sensing this animosity Rizwan says, ‘In this part of the world history is divided in two parts BC and AD but now another division has set in and it is 9/11.’ This new division befalls like a death blow to the American Muslims and we see how a community which though being an integral part of American culture and economy is suddenly seen to be stranger and alien to the land therefore lethal to the sovereignty of the nation.

Tabish Khair in his discourse of the existence of strangers in The New Xenophobia argues as strangers are inexorable for humans and fear is a very rudimentary emotion, it is certain that ‘different socio-historical contexts will or can give rise to different types of xenophobia,’ (pg.3). With changes in human situations and thinking there always approaches a change in what we consider as stranger and what we fear. Hence, the fact that we need to fear the stranger cannot be taken for granted if it were so we would not be able to survive in this world. Formulating his ‘Somatic Marker Hypothesis’ the neurologist, Antonio Damasio proposes that emotional processes guide (or bias), particularly decision-making. He writes, ‘when the spurious alignment of emotion (fear) and object is pervasive, phobic behaviour will ensue.’ (pg. 6) The fear from stranger does not always culminate into phobia rather it is shaped by the context. Thus, the stranger of xenophobia cannot be a total stranger because such a stranger would simply not be comprehensible. Taking the example of the literary vampire Tabish states, ‘despite not existing in real life the literary vampire still contains not just what is unknown, but also what is thoroughly  known.’ (pg. 13) The strangeness of the stranger is always a definition of our own normality; without it the stranger ceases to come into existence. The stranger is thus constructed before our eyes out of a familiar person and a certain understanding of self and other turns a person into not just a stranger, but a hostile one. If we look into the history of Partition as well as into other later Hindu-Muslim riots in India we witness ‘how people who have shared a culture, a past, or even a childhood, found themselves pushed into the position of strangers who had to be combated.’ (pg.14) In the same manner, Muslims who were once part and parcel of the American multicultural society were constructed as strangers in the post 9/11 attacks and made an object of fear and abhorrence.

In his discourse on what a stranger is Zygmunt Bauman in The making and Unmaking of Strangers writes, “[S]trangers are the people who do not fit the cognitive, moral, or aesthetic map of the world.” (18) This simple definition lays bare two poles in understanding the reality of the stranger. The first pole is the world with its pre-defined cognitive, moral and aesthetic map; the second pole is the individual that does not ‘fit’, which means outside the predefined landscape of the world. ‘Not fit’ implies that the stranger is somebody outside the world, outside the system, outside the ‘crowd’ or outside the State. ‘Outside’ here does not indicate a spatial separation. Rather, as Bauman clearly presents, ‘outside’ refers to the non-conformity of the established cognitive, moral or aesthetic map or simply called later on the order of society. Order has become the supreme principle that anybody who jumps out of it is seen as a traitor, or a nuisance of the state. Through this Order, the State has the right to trample upon, or step on, and pin down the disorderly and send them to oblivion.

The fear and loathing of the stranger i.e. Muslims is so intense in the post events society as a consequence it forces many American Muslims to change their names and appearances to hide their identity. People are assaulted places raided even women wearing Burqa are mutilated. The very Identity itself is in jeopardy, the film portrays it aptly by showing how a Sikh is attacked on the grounds of suspicion of being an Afghani Muslim. The 9/11 situation as John L. Esposito notes, ‘led to the war on global terrorism against a dangerous global threat but also reinforced and fed an irrational fear of the religion of Islam and mainstream Muslims, not just fear of a dangerous and deadly minority of religious extremists and tourists.’ (pg vi) In the name of preventing terrorism thousands of people were arrested and detained without any criminal charges. Laws like PATRIOT ACT were implemented to fight the Green Menace- Islamic Fundamentalism.

Rizwan, Mandira, Sameer, Zakir and Hasina all undergo the depression of the mayhem in different ways. No one visits Mandira’s salon since it belongs to a Khan, a Muslim. In Sameer’s school a lady teacher while teaching world religions says, ‘of all the world’s religions Islam is the most violent and aggressive. It encourages killing or Jihad as they call in the name of God.’ Sameer is humiliated by his schoolmates since he is a Muslim and they put Osama’s photos in his wardrobe. Haseena (Sonya Zehan) is hit in the university premises we see how an invisible white hand pulls her hijab from the back saying ‘get out of my country.’ One is here reminded of Zygmunt Bauman’s concept of Anthropophagic and Anthropoemic strategies. Bauman argues that these are the two common strategies employed by societies to deal with the problem of strangers or difference-

  1. Anthropophagic = annihilating the strangers by devouring them and then metabolically transforming into a tissue distinguishable from one’s own.
  2. This is the strategy of assimilation: making different similar; smothering of cultural and linguistic distinctions; forbidding all traditions and loyalties except those meant to feed the conformity to the new and all-embracing order; promoting one and only one measure of conformity. (pg.18)
  3. Anthropoemic= vomiting the strangers, banishing them from the limits of the orderly world and barring them from all communication with those sides.
  4. This is the strategy of exclusion – confining the strangers within the visible walls of the ghettos or behind the invisible, yet no less tangible, prohibitions of commensality, connubium and commercium; ‘cleansing’ – expelling the strangers beyond the frontiers of the managed and manageable territory; or, when neither of the two measures was feasible – destroying the strangers physically. (pg.18)

 

The fear of the Islam grows nightmarish to the extent of eliminating them and we see how after the attacks Muslims are targeted and stereotyped as commodities either to be devoured or vomited.

With the death of Mark, (a journalist and a family friend to Mandira) in Afghanistan who is sent to cover the war, the animosity against Muslims seems to be rather intense. Once very good friends, it causes Reese (son to Mark) to hate Sameer. He starts avoiding Sameer thinking that his father died because of the Muslims. The conversation between the two in the soccer field makes it more precise:

Sam: Reese! You know I loved your dad. We are best friends, our moms are best friends.

Reese: You know what! You people are nobody’s best friends. All you people care is your damn Jihad.

In between this conversation some friends to Reese come and beat Sam to death. The investigating officer inspector Garcia tells Mandira that the death of Sam was the result of a community scuffle. This hatred is so grievous that even Mandira syas to Rizwan, ‘I must never have married a Musalman. Had Sam been a ‘Rathore’, he would have been alive today. He died because he was a ‘Khan’. He died because of you, because of your name.’ Mandira’s reply to Rizwan’s question that when should he return home since she has finally asked him to leave her home and go away forever is worth noticing:

Mandira: Leave me alone and go away right now.

Rizwan: When should I come back Mandira?

Mandira: When should I come back? You know? This, Banville, where almost 30000 people live, they all hate you. Go and tell them that you are not a terrorist. Why only to them, go and say to every citizen of America, ‘I am not a terrorist’ can you do that? Then why don’t you go and say to the President of America, Mr. President ‘My name is Khan and I am not a terrorist’ so that he could tell these people that my Sam was not the terrorist son of a terrorist father. He was just a baby, my baby. And when you do that then only return to me.’

And here starts Rizwan’s journey to meet the US president.

The draconian change in the American society and politics both at home and abroad to fight the global menace of terrorism and protect the sovereignty of the country can be viewed as a conflict for power. On the one hand we see it celebrating and preaching the democratic principles on the other its politics of intrusion in the gulf countries and its angst against the developing nations that might pose a threat to its supremacy. Power is always there at the locus of xenophobia. The constitution and reception of the stranger of xenophobia is always a question of power. Tabish considers capitalism as the dominant structure of power which arises in the 18th century (though with older roots) and transmutes itself again in the late 20th century. Power was predominantly imposed, maintained, and experienced in physical and material terms until the rise of capitalism. But it (power) grows more abstract with the expansion of consciousness in human society. In the same way when money transforms itself into capital as in high capitalism this leads to change in the source of fear and in the stranger. When there is ‘extreme abstraction of money under high capitalism, we encounter a greater abstraction of violence, and hence a different conception of the stranger of xenophobia’ writes Tabish. (pg 6)

The changing patterns of xenophobia have been classified as the old and the new xenophobia by Tabish. He lists some forms of old xenophobia as- ‘the fire bomb in the letter box of an immigrant; the Jew, Muslim, or Hindu being chased down a street by skinheads; the persecution of religious minorities in Pakistan; the killing of people of a different ‘ethnicity’; even the violent imposition of another language or an alien lifestyle on any people fall under old xenophobia.’  (pg 3) The change in the socio-economic and historical context gives birth to newer forms of xenophobia. Tabish writes ‘old xenophobia is monstrous, spectacular, and quickly identifiable. New xenophobia, which must be seen within the context of high capitalism, is less visible, just as ‘hard’ cash becomes less visible when money transforms into numerical high capital.’ (pg 6) The fear and loathing of the stranger and the violence perpetrated on them as has been delineated through the film can be seen as an example of Old xenophobia.

A process of naturalization is central to Old xenophobia. It naturalizes itself by referring to a hoary past and to ‘natural’ (biological, evolutionary, genetic) elements, but these elements are always crafted and defined in the present. Nazism which combined both the concepts of Nationalism and Racism stands supreme as an example to understand this process of naturalization in xenophobia. Both racism and nationalism tend to ‘naturalize’ various ideological underpinnings with reference to a hoary past.

Old xenophobia is affected particularly by the rise of high capitalism, with its increasingly abstract structures of power. Tabish points out three factors that have contributed to the changing patterns of xenophobia, these are:

  1. Changing patterns of immigration in and from the mid-twentieth century.
  2. Changes in capitalism, or in other words, the movement from production based capitalism to high-capitalism, finance capitalism, or ‘globalization’.
  3. Changes in the socio-political organization in the First World, particularly Europe, with the rise and crisis of social welfare states. (pg.40)

Samuel P. Huntington in The Clash of Civilizations? argues that the most significant conflicts of the future will fall along the cultural fault lines separating civilizations apart from one another and one of the reasons behind it as he notes is ‘the world is becoming a smaller place’. (pp.25) The increasing interaction between peoples from different civilizations gives way to a civilization consciousness and hence intensifies the awareness of difference and commonalities along civilizations. The era of globalization has comparatively aggravated this consciousness of difference in the self and the other.

In the film the reactions of the motel owner Jitesh (Vinay Pathak) when an American hooligan throws stones on the window and breaks the glasses because he (Jitesh) is an Indian hence an outsider signifies the violent vehemence against Muslims. He says: ‘All this is happening due to Musalmans. They attacked the world trade centre 6 years ago and we suffer the blow. They wage Jihad and stones are hurled upon us. Blind Englishmen can’t you see the difference between a Gujrati from Gandhi Baba’s village and a Gunda like Osama! I am definitely going to put a board, ‘No Muslim allowed!’

A primary element of Xenophobia is narcissism. The affection to the self is so pervasive that we tend to push the other to margins, hated because on has invested too much in selfhood.

In both old as well as new xenophobia this is a common characteristic but it appears to be more deeply embedded in the self of high capitalism. The nature of high capitalism enables power to be exercised in the abstract. The narcissism of the empowered self, implanted in high capitalism, prevents it from seeing this glaring fact.

Old xenophobia framed laws that discriminated on the basis of visible difference, even as it sought abstract justification for such uneven structures of power. The proliferation of the theories of social Darwinism, racism, the ethnic/linguistic fervour of nationalisms makes it more precise. If differences were not visible, or readily visible, old xenophobia legislated to make them visible. The Nuremberg Laws (1935) of the Nazis serve as the earliest illustration of this legislative trend of old xenophobia.

Just as xenophobia has changed character over time and space, violence also alters itself. One can argue that a constant change has approached into the degree of violence with shifts in the society and economy from the very hunting-gathering society to the agricultural society, from the agricultural to the industrial society and today the era of globalization has largely mitigated violence on a physical level. But it seems to be an erroneous notion. Tabish writes, ‘sweeping socio-economic changes do not just lead to a decline in some kinds of violence, but they also mark a paradigmatic shift in our perception of violence.’ (Italics in original) (pg.125) Thus, New xenophobia does not just replace old xenophobia globally; it exists along with it, and sometimes justifies its own kind of violence with reference to the physical and material violence of old xenophobia.

Fear, difference and contact/border the amalgamation of these three elements leads to the construction of xenophobia, old or new. Speaking of fear Damasio argues that animals or birds (including humans) are not ‘innately wired’ for composite constructs of fear.  He notes ‘A baby chick in a nest does not know what eagles are, but promptly responds with alarm and by hiding its head when wide-winged objects fly overhead at a certain speed.’ (pg. 132) Thus, animals or birds do not suffer from ‘bear fear’ or ‘snake-fear’; instead, they are wired to fear large forms, growling noises, etc. What this suggests in the context of xenophobia, is the cognitive impossibility of fearing a stranger qua stranger, and it also explains why we give the stranger-to-be-feared certain animalistic attributes-hooked nose, large size, wily eyes, sharp teeth, etc. which help us construct the stranger in the image of the forms that might actually evoke some sort of instinctive fear in us.

So far as the element of difference is concerned in this physical world we are surrounded by difference which is the second constitutive element of xenophobia. We differ from one another at multiple levels but this does not mean that these differences make us fear. Yet these differences can be constructed in such a manner as to make one fear the stranger. Hence, ‘it is not the difference of the stranger that is feared when we are xenophobic; it is a certain construction and understanding of difference (which might or might not exist)’ notes Tabish. Mere Diffrence does not work, there has to be a meeting line of difference which can be termed as ‘border/contact.’ Thus the construction of difference across certain meeting points produce fear and this is central to the production of xenophobia.

A kind of Paranoia is the prime element of new xenophobia. It involves a kind of abstract and faceless fear. In this sense too, the fear cultivated by new xenophobia differs from that propagated by old xenophobia. Though certain strangers are made the face of this paranoia, what lurks behind them is the vast, faceless machine of high capitalism, those abstract and numerical flows of capital that impinge on our lives without becoming visible. This stranger is constructed in increasingly abstract terms also because its source is anxiety and paranoia, not just fear.

The agony and ambivalence of a community that has proved to be an essential ingredient in the salad bowl American society has been aptly presented through the film. It seems to be celebrating the idea of multiculturalism simultaneously being critical of it. Religious fundamentalism leading to vengeance of any kind has been denounced. We see how Rizwan counters the misinterpretations of Islamic doctrines and Quran by Faisal Rahman who misguides some Muslim youths in the name of religion inciting them to wage Jihad and live a martyr’s life.  Even he is seen helping the FBI to arrest Faisal Rahman, and rescuing the people from the flood stricken Wihemina, Georgia. Rizwan’s co-operations in building a peaceful society in the turbulent times can be seen as an endeavour to build common courtesy for people from different cultures and civilizations. I feel this courtesy be it at linguistic, cultural, religious etc. levels is a need of the hour in establishing a society based on humanity.

Finally, this courtesy and the herculean effort that Rizwan makes in his odyssey to meet the US president attains its reward and he proudly says to Barack Obama, the newly elected US president , ‘My Name is Khan and I am not a Terrorist’.

After the dramatic emergence of Donald Trump in the US politics, his jingoistic ideas and decisions have reinvigorated xenophobia. We already witnessed several repercussions of it. As Tabish notes, ‘Xenophobia is the attempt to reduce the other to a stranger and/or to reduce the strangeness of the other in a bid to empower oneself on terms denied to the other’. (pg.187.) It is not primarily about people. It is about power. It is essentially the index of an ongoing power struggle, enabled by the nature of capital, which is why its subjects-the men and women-change, but xenophobia like the proverbial river, seems to ‘go on forever.’ There is a constant need of introspection and the courtesy that has been discussed above to be maintained in the multicultural society. Otherwise to return to Nancy Kwang Johnson’s statement the American society will again galvanize itself from a melting pot into a boiling pot. It can be seriously addressed by ensuring-constitutionality, legally, economically, etc.- that power struggles (which cannot be avoided) are not institutionally biased against any particular group.

                                                             

Works Cited:

 

Bauman, Zygmunt. ‘The Making and Unmaking of Stranger’, Postmodernity and Its Discontents. New York University Press. 1997.

Damasio, Antonio R. Descartes’ Error: Emotion, Reason and the Human Brain, Avon Books. New York. 1994.

Huntington, Samuel P. The Clash of Civilizations? in Foreign Affairs; Summer 1993; 72,3.

Johar, Karan. My Name is Khan (2010). India.

Johnson, Nancy Kwang. ‘Conceptualizing the Nation: Myths Imagined Communities, or Multiethnic Realities? The Cases of Israel, France, and the United Nations’ in Michelle Hale Williams (ed), The Multicultural Dilemma: Migration, Ethnic Politics, and State Intermediation. Routledge, New York. 2013. Pp 50-66.

Khair, Tabish. The New Xenophobia, Oxford University Press. New Delhi. 2016.

Levinas, Emmanuel. Difficult Freedom: Essays on Judaism (Trans. Sean Hand) The Johns Hopkins University Press. Baltimore, Maryland. 1990.

Pratt, Douglas and Rachel Woodlock. Fear of Mulims: International Perspectives on Islamophobia, Springer, 2016.

MODIFIED PARTICLE SWARM OPTIMIZATION BASED FEATURE EXTRACTION AND CLASSIFICATION FOR NEWSREADERS IMAGE-Deepa.V, Dr.Sengalliappan.M

0

MODIFIED PARTICLE SWARM OPTIMIZATION BASED FEATURE EXTRACTION AND CLASSIFICATION FOR NEWSREADERS IMAGE

Deepa.V1
Department of Computer Science
Research Scholar
Kovai Kalaimagal College of Arts & Science

Dr.Sengalliappan.M2
Research Supervisor
Dean of Computer Science
Department of Computer Science
Kovai Kalaimagal College of Arts & Science

Abstract:

Digital image are usually amid noise throughout the acquisition. Image denoising aims at reducing the noise without disturbing the image quality. The subject has been intensively researched through the past years and various algorithms were implemented with sensible results in noise reduction. This paper explains the processing of varied methods like image pre-processing, segmentation and have extraction model for any picture extracted from a video as frame.We propose a narrative approach supported patch matching using Gaussian mixture model (PDGMM) for image denoising and a neighborhood based segmentation supported horizontal vertical segmentation model for image segmentation. A unique technique for feature extraction supporting Particle swarm optimization (PSO), modified Particle swarm optimization and Speed-Up Robust Features (SURF). Our proposed algorithm provides promising result on extracting an image without loss in quality.

Keywords: Image Denoising; Patch Matching; Gaussian Mixture Model; Particle Swarm Optimization; Speed-Up Robust Features (SURF).

  1. INTRODUCTION:

Digital image process lays emphasis on two main tasks: Betterment of pictorial information for the requirements of human interpretation and process of data image for storage, illustration, and transmission for freelance machine perception. The scope of digital image processing is to supply exact image without the loss in quality even after dimension changes.

 

Pre-processing involves the operations that are typically needed before to the analysis of data, extraction and are broadly classified as geometric or radiometric corrections. Radiometric corrections incorporate correcting the information for sensing element irregularities and undesirable sensing element or region noise, additionally as changing the information specified they exactly represent the emitted or mirrored radiation measured by the sensing element.

Image improvement involves modification of one or more elements of the image to increase clarity and details through the visual analysis and interpretation. It looks to switch the visual impact in a method that enhances the data content of the image. Digital image improvement strategies or techniques offer a bunch of selections for enabling the visual quality additionally for attractiveness of images [3] .The non-commissioned techniques supply a large range of means for altering image so on achieve images that are deemed visually adequate.

  1. PREPROCESSING:

Image restoration is the process of recovering the underlying original image from its degraded form. The image captured through common imaging systems typically contain disturbance like noise, optical or motion blur attributable to sensing element limitations or other environmental conditions [8]. Due to the above mentioned limitations image restoration algorithms were used in applications like medical imaging, satellite imaging, surveillance, and general client imaging applications. Priors on natural image play an important role in image restoration. Image priors are familiar with denoise or regularize ill-posed restoration problems like deblurring and super-resolution.

III. FEATURE EXTRACTION:

3.1 PARTICLE SWARM OPTIMIZATION

The Particle Swarm Optimization (PSO) algorithm is proposed to model social behaviour of bird flocking or fish schooling. The algorithm is suitable for solving minimization or maximization problems [8]. Each element of the population is referred to as a particle, and is represented by three vectors and two real values: One of them points out the position of the particle, and the other one represents the last position change, and it is also called velocity vector. The third

 

one is a copy of the best position of the particle found as yet. Each particle moves in the solution space according to its current speed, the best solution found yet, and the position of the best of the population [2]. The PSO algorithm maintains several candidate solutions in the search space iteratively. In each iteration of the algorithm, each candidate solution is obtained by optimizing the objective function, determining the fitness of that solution. It has good performance even under post processing and pre-processing attacks (such as blurring, noise addition, rotation, JPEG compression).

3.2 SPEED-UP ROBUST FEATURES (SURF)

The algorithm can be described as a key point detector and descriptor. SURF approximates second order Gaussian derivatives with box filters [1]. With using integral images, image convolutions with these box filters can be calculated rapidly. Through the computed integral image, it is easy to calculate the sum of the intensities of pixels. The location and scale of interest points are selected by counting on the determinant of the Hessian matrix. Finally, the calculated maxima of the determinant of the Hessian matrix are interpolated in scale and image space. SURF constructs a circular region around the detected interest points via assign a unique orientation to gain invariance to image rotations. The orientation is computed using Haar wavelet responses in both x and y direction [9]. The Haar wavelets can be easily computed via integral images, similar to the Gaussian second order approximated box filters. After assigned the orientation, around the interest points the SURF descriptors are constructed by obtaining square regions. The windows are divided into 4 by 4 sub regions for keep in some spatial information. In each sub region, Haar wavelets are computed at regularly spaced sample points.

  1. PROPOSED METHOD:

The input parameters are the test image and Hessian threshold. The output is number of matched key points, which isused as evaluation criterion to make detect decision. The higher criterion value means high performance. The Hessianthreshold parameter is determined with PSO [5]. The Particle Swarm Optimization (PSO) algorithm is proposed to model social behavior of bird flocking or fish schooling. The algorithm is suitable for solving minimization or maximization problems. Each element of the population is referred to as a particle and is represented by three

 

vectors and two real values: One of them points out the position of the particle, and the other one represents the last position change, and it is also called velocity vector. The third one is a copy of the best position of the particle found as yet. Each particle moves in the solution space according to its current speed, the best solution found yet, and the position of the best of the population [15]. The PSO algorithm maintains several candidate solutions in the search space iteratively and in each iteration of the algorithm corresponding to match for the current key point. We set t value to 0.6. RANSAC surveys the quality of the hypothetical model on input data set that is contaminated by outliers. For the analysis of copy-move forgery detection, the right matching should robust to the rotation and scaling, which is defined as location of point. So, for every outlier that are not appropriate for the translation matrix are removed with iteratively.

  1. CLASSIFICATION:

5.1 MODIFIED BACK PROPAGATION ALGORITHM

To overcome some of the disadvantages of the Back propagation algorithm, two modification techniques are proposed in this paper. The first modification technique helps in reducing the mean square error and also reducing the number of epochs required for training the Artificial Neural Networks, hence speeding up the training of the Neural Networks [13]. The second modification technique computes the near optimum value of the learning rate for each training pattern that also reduces the number of training epochs. In the following, the two modification techniques are presented.

First Modification Technique: Second order approximation of the steepest-descent.

The back propagation method depends on the first-order approximation of the steepest descent method [12]. In the first modification technique the second-order approximation of the -descent method is proposed to beused instead of the first & approximation.

Second Modification Technique: Computation of Learning Rate per Pattern Using One Dimensional Optimization

This technique tries to get use near optimum learning rate within the specified range for each training input, grid search method is used, and this method requires only the objective function values but not the partial derivatives of the function (non-gradient method).

Third Modification Technique: Rounding Technique.

 This technique is used only for Neural Networks that are used in the classification, and triestotrain the Networks with virtually zero mean square error, this is done in the test phase and not in the training phase [18].

Modified Back Propagation Algorithm:

Step 0: Initialize weights (set to small random values).

Step 1: While stopping condition is false. Do steps 2 – 9.

Step 2: For each training pair, do steps 3 -9.

Step 3: Each input unit (, i = 1, …..) receives input signal and broadcasts this signal to all units in the layer above (the hidden units).

Step 4: Each hi- unit sums its weighted input signals,

Apply this activation function to compute the output signal,

Send this signal to all units in the layer above (output units).

Step 5: Each output unit sums its weighted input signals,

Apply the activation function to compute the output signal.

Step 6: Each output unit receives a target pattern corresponding to the input training pattern. Compute the error term.

Step 7: Calculate the near optimal learning rate using the second modification technique, which is mentioned above.

Step 8: Calculate the weight correction term and its bias correction. Send error term to units in the layer below.

Step 9: Each hidden unit sum its delta input (from the unit in the layer above). Multiply by the derivative of its activation function to calculate its error term Calculate the weight correction term, and calculate the bias correction term

(t)

Step 10: Each output unit updates its bias and weights, and each hidden unit updates its bias and weights.

Step 11: Enter the same input unit (, i = 1, …..) And repeat again steps from step 4 to step 10 except step 7

Step 12: (used in the test phase for classification only)

Step 13: Test stopping condition.

The Back Propagation algorithm is terminated at the weight vector W- when

Where is sufficient small error threshold.

The advantages of The Modified Back Propagation Algorithm:

  • Minimizing the training time and the number of epochs required for training
  • Searching for the optimum learning rate for each input pattern.
  • Give virtually zero mean square error in thecase of classification problem.

 

  1. RESULT:

Modified optimization based future extraction algorithm applying the image get the best future point from the images.

Table 1 show the parameters analysis of feature extraction for existing algorithm and proposed algorithm

S.No

Algorithm

Feature point

1

MPSO_HOG

156

2

SURF

170

3

MPSO_SURF

183

 

This is below figure shows comparison of existing algorithm future extraction point (MPSO_HOG, SURF) is better prediction for proposed algorithm MPSO_SURF.

Feature extraction based Classification

S.No

Algorithm

Accuracy

precision

Recall

Time

1

BPNN

93.5

89.4

91.4

2.58

2

HOGBPNN

94.7

90.6

93.4

2.42

3

SURFBPNN

96.8

93.6

94.2

2.14

Table 2 show the parameters analysis (accuracy, precision, recall measure, time period) existing algorithm and proposed algorithm

this figure show comparsion of accuracy,precision ,recall for existing (BPNN, HOGBPNN) algorithm and   proposed algorithm SURFBPNN

this figure show comparsion of time period for existing (BPNN, HOGBPNN) algorithm and   proposed algorithm SURFBPNN.

 

S.No

Algorithm

Accuracy

precision

Recall

Time

1

BPNN

94.6

92.4

93.6

2.42

2

HOGMBPNN

96.8

94.7

95.3

2.34

3

SURFMBPNN

98.7

95.5

96.8

1.94

 

Table 3 show the parameters analysis (accuracy, precision, recall measure, time period) existing algorithm and proposed algorithm

this figure show comparsion of accuracy,precision ,recall for existing (BPNN,HOGMBPNN) algorithm and   proposed algorithm SURFMBPNN.

this figure show comparsion of time period for existing (BPNN, HOGMBPNN) algorithm and   proposed algorithm SURFMBPNN.

VII. CONCLUSION

This paper explains the processing of varied methods like image pre-processing, segmentation and have extraction model for any picture extracted from a video as frame. We proposed a narrative approach supported patch matching using Gaussian mixture model (PDGMM) for image denoising and a neighborhood based segmentation supported horizontal vertical segmentation model for image segmentation. A unique technique for feature extraction supporting Particle swarm optimization (PSO) modified Particle swarm optimization and Speed-Up Robust Features (SURF). Our proposed algorithm provides promising result on extracting an image without loss in quality.

VIII.REFERENCE

[1] Dong Hui, Han Dian Yuan,” Research of ImageMatching Algorithm Based on SURF Features ”,in International Conference on Computer Science andInformation Processing (CSIP),2012.

[2] Alec Banks, et al. “A review of particle swarmoptimization. Part II: hybridization, combinatorial, multicriteria and constrained optimization, and indicativeapplications”, Nat Compute (2008) 7:109-124, DOI10.1007/s11047-007-9050-z.

[3] Gheorghita Ghinea, (member, IEEE), Rajkumarkannan,and Suresh kannaiyan,”Gradient-Orientation-Based PCASubspace for Novel Face Recognition” in IEEE Access, vol2, 2169-3536, 2014.

[4] Hossein Sahoolizadeh, ZarghamHeidari, and HamidDehghani,” A New Face Recognition Method using PCA,LDA and Neural Network “in International Journal ofElectrical and Electronics Engineering 2:8, 2008

[5] Ajit P. Gosavi , S.R.Khot,” Facial ExpressionRecognition using Principal Component Analysis withSingular Value Decomposition” in International Journal ofAdvance Research in Computer Science and ManagementStudies, Volume 1, Issue 6, November 2013

[6] A. J. Fridrich, B. D. Soukal, A. J. Lukas, “Detection of copy-moveforgery in digital images”, Proceedings of Digital ForensicResearch Workshop, Trumansburg, 2003.

[7] Q. Wu, S. Wang and X. Zhang, “Log-Polar Based Scheme forRevealing Duplicated Regions in Digital Images,” in IEEE SignalProcessing Letters. vol. 18, no. 10, 2011, pp. 559-562.

[8] S.-J. Ryu, M. Kirchner, M.-J. Lee, H.-K. Lee, Rotation invariantlocalization of duplicated image regions based on Zernike moments, Trans. Inform. Forensics Secur. (T.IFS), 8 (8) (2013), pp.1355–1370

[9] H. Zhou, Y. Shen, X. Zhu, B. Liu, Z. Fu, and N. Fan, “Digitalimage modification detection using color information and itshistograms,” Forensic Science International, vol. 266, pp. 379–388, 2016.

[10] S. Wenchang, Z. Fei, Q. Bo and L. Bin, “Improving image copy-move forgery detection with particle swarm optimizationtechniques,” in Proc. in China Communications, vol. 13, no. 1, pp.139-149, Jan. 2016.

[11] F. Yang, J. Li, W. Lu, J. Weng, ‘Copy-move forgery detection based on hybrid features’, Engineering Applications of ArtificialIntelligence, Volume 59, 73-83.

[12] Q. Wu, S. Wang and X. Zhang, “Log-Polar Based Scheme forRevealing Duplicated Regions in Digital Images,” in IEEE SignalProcessing Letters. vol. 18, no. 10, 2011, pp. 559-562.

[13] V.V.Joseph, Rajapandian, N.Gunaseeli Modified Standard Backpropagation Algorithm with Optimum Initialization for Feedforward Neural Networks” JISE, GA, USA, ISSN: 1934- 9955, vol.1, no.3

[14] M. Emam, Q. Han, and X. Niu, “PCET based copy-move forgery detection in images under geometric transforms,” Multimedia Tools andApplications, vol. 75, no. 18, pp. 11513–11527, 2016.

[15] V. Christlein, C. Riess, J. Jordan, C. Riess, and E. Angelopoulos, “An evaluation of popular copy-move forgery detection approaches,” IEEE Trans.Inf. Forensics Security, vol. 7. Dec. 2012.

[16] Y. Zhu, X. Shen, H. Chen, Copy-move forgery detection based on scaled ORB, Multimed Tools Appl, pp. 1-15, DOI: 10.1007/s11042-014-2431-2.

[17] I. Amerini, L. Ballan, R. Caldelli, A. Del Bimbo, L. Del Tongo, G.Serra (2013) Copy-move forgery detection and localization by means of robustclustering with J-Linkage. Signal Process Image Commun 28(6):659– 669.

[18] Omaima N.A. AL-Allaf, “Improving the Performance of Backpropagation Neural Network Algorithm for Image Compression/Decompression System”, Journal of Computer Science 6, 2010.

मीडिया में राष्ट्रवाद की बहस

0

मीडिया में राष्ट्रवाद की बहस

राकेश कुमार
पीएच.डी
विभाग- प्रौढ़ सतत शिक्षा एवं प्रसार विभाग
(Department of Adult, Continuing Education & Extension)
विश्वविद्यालय- दिल्ली विश्वविद्यालय
संपर्क सूत्र- 7503518676
ईमेल- mr.rakeshkumar11@gmail.com

 सारांश :-

प्रस्तुत शोध आलेख मीडिया में मौजूदा राष्ट्रवाद, देशद्रोही, देशभक्त और हिंसा की बहस और उसके विभिन्न पहलुओं को मौजूदा समय से व्याख्यायित करने की पहल करता है। राष्ट्र और राष्ट्रवाद दो ऐसे विचार रहे है जिन पर कई सालों से हर अलग–अलग देश में विचार–विमर्श हुआ है। राष्ट्र और राष्ट्रवाद का उदय हर देश में एक समान नहीं रहा है और न ही राष्ट्रवाद के परिणाम। भारत में राष्ट्रवाद का उदय उपनिवेशी सत्ता के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन के लिए हुआ था। राष्ट्रवाद ने भारत की स्वतंत्रता में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया था। स्वतंत्रता के इतने सालों बाद मीडिया में एक बार फिर राष्ट्रवाद और इसका विमर्श केंद्र में है। प्रस्तुत शोध आलेख इसी विमर्श और बहस का आलोचनात्मक परीक्षण करने का प्रयास करता है।

प्रमुख शब्द :- राष्ट्रवाद, मीडिया, आन्दोलन, वर्तमान राष्ट्रवाद, देशद्रोही, देशभक्त और हिंसा।

परिकल्पना :- राष्ट्रवाद एक नकारात्मक विचार है।

शोध प्रविधि:- प्रस्तुत शोध आलेख में द्वितीयक स्रोतों का प्रयोग किया गया है जिसमे पुस्तकें एवं अखबार शामिल है।

शोध विस्तार

  • राष्ट्रवाद:-

राष्ट्र एक लगातार निर्माण की प्रक्रिया है। एक राष्ट्र का अपना एक इतिहास, संस्कृति, सभ्यता, प्रतीक, गान इत्यादि होते है। जब उस राष्ट्र का व्यक्ति या नागरिक अपने राष्ट्र के इतिहास, संस्कृति, सभ्यता, प्रतीकों और गान के प्रति एक सम्मान की भावना रखते है तो उसे राष्ट्रवाद कहा जा सकता है। सरल अर्थों में अपने राष्ट्र के प्रति सम्मान की भावना राष्ट्रवाद है।

राष्ट्रवाद को लेकर विभिन्न-विभिन्न विचारकों के अलग-अलग मत रहे है। अर्नेस्ट गैलनर ने राष्ट्रवाद को एक ऐसी विचारधारा के रूप में देखा जिसका जन्म और आगमन आधुनिक काल में हुआ है। वे कहते है कि “जहां सामंतवादी समाज अपने सामंतवादी बंधनो एवं संबंधो से जुड़े होते है, वहीं आधुनिक औद्योगिक समाज में कोई बंधन नहीं बन पाता क्योंकि यह समाज अधिक गतिशील एवं प्रतिस्पर्धी होता है इसलिए कुछ मूल्यों और विचारधाराओं का होना जरूरी है,

जो समाज की सांस्कृतिक साम्यता को बनाए रखे। जिसका आधार राष्ट्रवाद है।” (अभय प्रसाद सिंह, “भारत में राष्ट्रवाद” पृष्ठ–3)

औद्योगिक समाज एक ऐसा समाज होता है जिसका संबंध हर तबके के व्यक्ति से होता है और यह संबंध हमेशा से ही अपने स्वभाव में प्रतिस्पर्धी और प्रयोगकर्ता होते है। ऐसी अवस्था में हमे एक ऐसे सन्तुलित आधार की जरूरत होती है जो इन संबंधो में एक समानता बनाए रखे और यही समानता का आधार राष्ट्रवाद होता है।

इरिक हॉब्सवॉम राष्ट्रवाद को राजनीतिक विचार के रूप में देखने की कोशिश करते है। उनका मानना था कि किसी भी राष्ट्र की कोई पुरानी नृजातीय परंपरा नहीं होती। वे कहते है कि “प्राचीन परंपरा में विश्वास, सांस्कृतिक शुद्धता, ऐतिहासिक निरंतरता सब एक झूठी कल्पना है, जो स्वयं राष्ट्रवाद द्वारा ही बनाई गई है। यह तो राष्ट्र था जिसने अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए राष्ट्रवाद को जन्म दिया।” (अभय प्रसाद सिंह, “भारत में राष्ट्रवाद” पृष्ठ–4)

हम पुराने समाजों को देखे तो हम पाएंगे कि पुराने समाजों में एक नृजातीय परंपरा होती थी। यह नृजातीय परंपरा कबीलाई समाज के रूप में होती थी। पुराने दौर में मानव जीवन एक-दूसरे पर निर्भर था। यह वह दौर था जब मानव समाज कबीलों में रहा करता था। जीवनयापन और सुरक्षा की दृष्टि से लोग कबीलें बनाकर रहा करते थे। हर कबीलें के लोगों में एक दूसरे के प्रति विश्वास की भावना होती थी, जो कबीलों का मुख्य आधार हुआ करती थी। यही संबंध लगातार विकसित होते गए और जिसने आधुनिक युग में राष्ट्रवाद का रूप लिया।

बेनेडिक्ट एंडरसन राष्ट्रवाद पर लिखते हुए कहते है कि “राष्ट्रवाद को लोग आवश्यकता से अधिक महत्व दे रहे है। क्या ही अच्छा हो कि हम इसे लोगों की आयु और लिंग के समान अध्ययन और विवेचन का कारक भर माने, राष्ट्रवाद को फासीवाद या उदारवाद जैसी किसी विचारधारा से जोड़ने से बेहतर है इसे सामाजिक व्यवहार या धर्म जैसा ही एक तत्व माना जाए और आवश्यकता से अधिक महत्त्व नहीं दिया जाए।” ( Benedict Anderson, “Imagined Communities”, Page no.5) 

इतिहास में कई ऐसे उदहारण है जब राष्ट्रवाद अपने स्वभाव में उग्र हुआ और दो राष्ट्रों के बीच या राष्ट्र के भीतर दो समुदायों के बीच हिंसा के माहौल ने जन्म ले लिया इसलिए एंडरसन का मानना था कि ‘हमें राष्ट्रवाद को आवश्यकता से अधिक महत्व नहीं देना चाहिए।’

एंडरसन कहते है कि “मैं राष्ट्रवाद की मानक सम्बन्धी यह परिभाषा देना चाहूंगा कि यह एक काल्पनिक राजनैतिक समुदाय भर है और काल्पनिक तौर पर ही यह आरंभ से सीमित और स्वायत्त दोनों रहा है।” (Benedict Anderson, “Imagined Communities”, Page no.5-6) 

एंडरसन राष्ट्रवाद को एक काल्पनिक विचार इसलिए मानते है क्योंकि किसी भी राष्ट्र में ऐसे कई लोग या नागरिक होते है जो एक ही राष्ट्र के भीतर वास करते है लेकिन वास्तविक रूप में कभी एक दूसरे को देख या जान नहीं पाते लेकिन तब भी वह यह मानते है कि वह एक ही राष्ट्र के सदस्य है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि राष्ट्रवाद की कोई अंतिम परिभाषा नहीं हो सकती है । यह एक ऐसी भावना है जो काल, देश, समय के अनुसार लगातार बदलती रहती है और स्वभाव में परिवर्तनशील होती है।

  • मीडिया और राष्ट्रवाद की मौजूदा बहस :-

मीडिया में राष्ट्रवाद पर जो मौजूदा विमर्श हुआ, उसकी शुरुआत शैक्षणिक संस्थान से हुई। नौ फरवरी 2016 को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से राष्ट्रवाद पर बहस शुरू हुई । इस बहस में कई बिंदु थे जैसे भाषा, धर्म, अभिव्यक्ति की आज़ादी, असहमति का अधिकार, समानता का अधिकार, देशभक्त बनाम देशद्रोही आदि। 

मीडिया ने शैक्षणिक संस्थान की इस बहस को व्यापक पटल पर रखा और टीवी चैनल्स, पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से राष्ट्रवाद की इस बहस को विमर्श में तब्दील कर इसके सभी बिंदुओं और आधारों पर एक व्यापक बातचीत की।

मीडिया में राष्ट्रवाद पर जो विमर्श हुआ, उनमें एक मुद्दा भाषा का भी था। निवेदिता मेनन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में राष्ट्रवाद पर अपने भाषण के दौरान कहती है कि “प्रोफ़ेसर आयशा किदवई के लेक्चर के बाद किसी ने यह सवाल उठाया था कि एक राष्ट्र बनने के लिए एक भाषा होनी चाहिए, तो वह भाषा कौन सी भाषा होगी? कौन-सी ज़ुबान होगी?” (Azad.R, Nair.J, Singh.M, & Roy.M.S, (Edited) “What The Nation Really Needs To Know; The JNU Nationalism Lectures”) 

अगर हम भारतीय राष्ट्रवाद को देखे तो हम पाते है कि आज़ादी की लड़ाई में सभी वर्गों और समुदायों के लोगों ने अपना समान योगदान दिया था, इन वर्गों के लोग भिन्न-भिन्न भाषा बोलने वाले लोग थे। ज़ाहिर सी बात है कि भारतीय राष्ट्रवाद के मूल में भाषाई विविधता भी है। भारतीय राष्ट्रवाद ने भाषाई विविधता के साथ जन्म लिया था इसलिए भारतीय राष्ट्र के सन्दर्भ में किसी एक भाषा को ज्यादा महत्व नहीं दिया जा सकता है।

आनंद कुमार अपने वक्तव्य में कहते है कि “हमारे मुल्क में नेशनलिज़्म को बनाने और पहचानने के लिए जो विमर्श चला उनमें से एक विचार तो यह वाला था कि बिना एक प्रभुत्व पहचान के राष्ट्र निर्माण कैसे होगा।” (Azad.R, Nair.J, Singh.M, & Roy.M.S, (Edited) “What The Nation Really Needs To Know; The JNU Nationalism Lectures”) 

भारत जब उपनिवेशी सत्ता के विरुद्ध अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था, तब सभी वर्गों ने उस लड़ाई में अपना बहुमूल्य योगदान दिया था। ऐसे में हमें इस बात की आवश्यकता थी कि हम एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण करें जहाँ सभी वर्गों के लोगों को समान दर्जा, समान अवसर और समान लाभ मिले। हमें जरुरत एक ऐसे विचार और पद्धति को अपनाने की थी जिसमें बिना किसी एक प्रभुत्व पहचान और बिना किसी एक पहचान को विशेष दर्जा देते हुए समावेशी पहलू से राष्ट्र निर्माण हो सके। आज़ादी के बाद हमने एक ऐसे संविधान को अपनाया जिसमें सभी के लिए समान दर्जा और समान अवसर थे। आने वाले दिनों में भाषा के आधार पर राज्य बने और भाषाई विविधता होते हुए भी सभी राज्य एकजुटता के साथ भारतीय संविधान के दायरे में रहे।

योगेंद्र यादव कहते है कि ” राष्ट्रवाद पर जो विमर्श हुआ है, उसका सबसे दुःखद पहलू इसकी फ्रेमिंग है। यह सारा विमर्श दो पक्षों में विभाजित है। दोनों पक्षों का एक भी वर्ग भारतीय राष्ट्रीयता का सच्चा वारिस नहीं है।” ( योगेंद्र यादव, “राष्ट्रवाद की चुनौतियाँ” अदहन पत्रिका।)

एक देश की राजनीतिक व्यवस्था एक मज़बूत व्यवस्था होती है और इस व्यवस्था की पहुँच समाज में सबसे ज्यादा गहरे और व्यापक स्तर तक होती है। राजनीतिक बदलाव देश में नई परिस्थितियों को जन्म देता है। अगर हम भारत में उपनिवेशी शासन को देखे तो हम पाते है कि आजादी की लड़ाई के दौरान भारतीयों ने अंग्रेजों के खिलाफ कई आंदोलन छेड़े और इन्हीं आंदोलनों के कारण उस समय की राजनीतिक व्यवस्था में अनेक परिवर्तन हुए और यही परिवर्तन अपने आप में भारतीय राष्ट्रवाद के जन्म का आधार बना लेकिन वर्तमान दौर को देखा जाए तो कहीं न कहीं आंदोलनों के प्रयोग पर भी सवाल खड़े हुए है। मीडिया में राष्ट्रवाद का जो मौजूदा विमर्श हुआ। उस विमर्श ने इस सवाल को तो खड़ा किया ही कि एक लोकतंत्र में आंदोलनों की बेहद बड़ी भूमिका होती है लेकिन यह विमर्श साथ में ये भी बताता है कि आंदोलनों का सही प्रयोग बेहद ही आवश्यक है।

” स्वाधीनता प्राप्ति के लक्ष्य ने जिस प्रकार की राष्ट्रीयता को जन्म दिया उसमें विषम आर्थिक विकास और जाति व्यवस्था पर टिके समाज के विभिन्न समुदायों की विशिष्ट जरुरतों को अलग-अलग सुनना और उनके लिए संघर्ष करना प्रमुख नहीं था। अतः बहुत से जरूरी मुद्दे जिनमें स्त्रियों, दलितों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों के मुद्दे महत्त्वपूर्ण थे- फर्श के नीचे खिसका दिए गए। राष्ट्रवाद के भीतर जिस मनुष्यता की रक्षा करने की जरूरत थी, वह न हो सका।” (सुधा सिंह, “राजनीति: समावेशी राष्ट्रवाद बनाम प्रतीकवाद” , जनसत्ता।)

राष्ट्रवाद का समकालीन विमर्श जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से शुरू हुआ और जाधवपुर विश्वविद्यालय और दिल्ली के रामजस महाविद्यालय जैसे कई पड़ाव से गुजरा। मीडिया में राष्ट्रवाद के इस समकालीन विमर्श में दो शब्द मुख्य रूप से केंद्र बिंदु में घूमते रहे, पहला “देशभक्त” और दूसरा “देशद्रोही” । 

विचारधारा के स्तर पर ये विमर्श दो वर्गों में विभाजित था। एक वर्ग मुख्य रूप से वामपंथ विचारधारा से जुड़ा था और दूसरा वर्ग राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (दक्षिणपंथ) से जुड़ा हुआ था। 

वामपंथ विचारधारा का मानना था कि संविधान के अनुसार चलना ही देशभक्ति है, इसके समर्थनकारी यह भी बोलते कि भारत का संविधान हमें अभिव्यक्ति की आज़ादी प्रदान करता है और इस अभिव्यक्ति की आज़ादी को दबाना सही नहीं है।

वहीं दूसरी ओर जो वर्ग राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (दक्षिणपंथ) से जुड़ा हुआ था, उसका मानना था कि यह सही है कि भारत का संविधान अभिव्यक्ति की आज़ादी प्रदान करता है लेकिन यह सही नहीं है कि हम उस अभिव्यक्ति की आज़ादी का ग़लत इस्तेमाल करे और उसका प्रयोग देश की एकता को तोड़ने में करे। हर वह अभिव्यक्ति की आज़ादी जो देश को तोड़ने की बात करती हो वह निश्चित रूप से गलत ही है। अभिव्यक्ति की आज़ादी का प्रयोग तो देश की एकता को बनाए रखने और देश के विकास में होना चाहिए।

राष्ट्रवाद के इस विमर्श, रामजस महाविद्यालय प्रकरण और अभिव्यक्ति की आज़ादी के मुद्दे पर बोलते हुए राकेश सिन्हा कहते है कि ” घटना आधारित विमर्श और विचार आधारित विमर्श में अंतर होता है। अभी जो घटना घटी, ऐसी दस घटनाएं दस-पाँच दिन में शांत हो जाएगी। यह घटना आधारित विमर्श है। कोई आया, उसे रोका गया, धरना दिया गया ऐसी घटनाएं घटती रहती है। मैं अभिव्यक्ति की आज़ादी को बड़े परिप्रेक्ष्य में देखता हूँ।” (राकेश सिन्हा, “बारादरी” , रविवारीय स्तंभ, जनसत्ता)

राष्ट्रवाद के इस समकालीन विमर्श में हर पहलू थे, राष्ट्रवाद के इस समकालीन विमर्श ने सभी मुद्दों को समेटने की कोशिश की। अगर अभिव्यक्ति की आज़ादी को देखा जाए तो हम सब मानते है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी एक लोकतंत्र का प्राणतत्व होती है। एक लोकतंत्र के मज़बूत होने का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वह लोकतंत्र अपने नागरिकों को या अपनी जनता को अभिव्यक्ति की कितनी आज़ादी प्रदान करता है। 

दूसरी तरफ यह भी जरूरी है कि हम लोकतंत्र में संविधान द्वारा दिए गए अपने समस्त अधिकारों का एक उचित प्रयोग सही और सकारात्मक दिशा में करे। हमें चाहिए कि हम अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग संविधान के ही दायरे में करे। यदि संविधान द्वारा दिए गए किसी अधिकार का गलत प्रयोग होता है तो आखिरकार वह गलत प्रयोग हमारे लोकतंत्र और राष्ट्र की एकता को ही नुक़सान पहुंचाएगा और साथ में यह भी सही नहीं कि हम किसी को उसके विचारों और इच्छाओं को अभिव्यक्त करने से रोके। अभिव्यक्ति की आज़ादी का सकारात्मक प्रयोग इस तरीके से होना चाहिए जिससे एक राष्ट्र की बुनियाद और उसके संविधान की मजबूती बनी रहे।

राष्ट्रवाद के इस विमर्श में एक मुख्य बिन्दु ऐसा भी था जिसने उपनिवेशी सत्ता के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया था, वह मुख्य बिंदु था “भारत माता की जय” का नारा राष्ट्रवाद के इस समकालीन विमर्श में “भारत माता की जय” के नारे को कुछ लोगों ने हिंदुत्ववादी नारा कहा और इसे बोलने से इंकार कर दिया। 

योगेंद्र यादव कहते है कि ” भारत माता की जय, कोई राइट विंग हिन्दुत्व राष्ट्रवादियों का स्लोगन नहीं था, इस देश में “भारत माता की जय”, हमारे राष्ट्रीय आंदोलन का बिल्कुल मैनस्ट्रीम स्लोगन था।” (योगेंद्र यादव, “राष्ट्रवाद की चुनौतियां” अदहन पत्रिका) 

उपनिवेशी सत्ता के खिलाफ हमारे भारत राष्ट्र की जनता ने अनेक आंदोलन किये थे। उन आंदोलनों में जनता ने कई नारों का उपयोग किया था। इन नारों ने विविधता से भरी हुई जनता का एकबद्ध किया और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अपना बहुमूल्य योगदान दिया। ये नारे किसी खास धर्म, जाति और राजनीतिक पार्टी के नहीं थे। ये सभी नारे भारतीय जनता की एकजुटता की उपज थे इसलिए इन नारों को संकीर्ण दायरे में देखना गलत है। ये समस्त नारे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की बहुमूल्य धरोहर हैं।

  • निष्कर्ष:-

 राष्ट्रवाद के कुछ देशों में नकारात्मक परिणाम ही रहे है पर कुछ देशों में इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिले है। कई देशों में एक सकारात्मक विचार के रूप में राष्ट्रवाद ने लोगों को एकजुट करने का काम भी किया है। उपनिवेशी सत्ता के खिलाफ भारत में राष्ट्रवाद ने लोगों को एकरूपता में बांधा है जिसके कारण लोगों में एक दूसरे के प्रति विरोध और नफ़रत की भावना  काफी हद तक समाप्त हो गयी। इस रूप में राष्ट्रवाद ने मानवता को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया है। मीडिया में राष्ट्रवाद की मौजूदा बहस को इन्हीं मुद्दों के साथ आगे बढ़ाना चाहिए और एक सकारात्मक विमर्श के साथ राष्ट्रवाद का प्रयोग राष्ट्र के विकास में करना चाहिए।

संदर्भ–ग्रन्थसूची

  1. चन्द्र, वि. (1996), “भारतीय राष्ट्रवाद कुछ निबंध”, नई दिल्ली: जवाहार पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स।
  2. Hobsbawm, E.J, (1990) “Nations and Nationalism since 1780” Delhi: Cambridge University Press. 
  3. Anderson, B, (1983) “IMAGINED COMMUNITIES” London: Verso
  4. सिंह, अ.प्र. (2014) “भारत में राष्ट्रवाद” नई दिल्ली: ओरियंट ब्लैकस्वान प्राइवेट लिमिटेड।
  5. चौधरी, बा.ना. और कुमार, यु, (2013) “आज का भारत: राजनीति और समाज” नई दिल्ली:ओरियंट ब्लैकस्वान प्राइवेट लिमिटेड।
  6. दुबे, अ.कु. (2005) “बीच बहस में सेकुलरवाद” नई दिल्ली: वाणी प्रकाशन ।
  7. Aloysius, G, (1997) “Nationalism without a Nation in INDIA”, New Delhi: Oxford University Press
  8. R, Nair. J, Singh. M, & Roy. M.S, (Edited), (2016) “WHAT THE NATION REALLY NEEDS TO KNOW: THE JNU NATIONALISM LECTURES” India: HarperCollins Publishers
  1. स. रविकान्त (2018) – “आज के आईने में राष्ट्रवाद”, नयी दिल्ली: राजकमल प्रकाशन.
  2. B. (2009), “History of Modern India”, New Delhi, Orient Blackswan.
  3. B. (2012) “The Making of Modern India: From Marx to Gandhi” New Delhi: Orient Blackswan.
  4. देसाई, ए. आर. (2016) “भारतीय राष्ट्रवाद की अधुनातन प्रवृत्तियां” , दिल्ली, ग्रन्थशिल्पी।
  5. पुनियानी, रा. (2016) “धर्म सत्ता और हिंसा”, नई दिल्ली, राजकमल प्रकाशन।
  6. खिलनानी, सु. (2001) “भारतनामा”, नई दिल्ली, राजकमल प्रकाशन।
  7. (2018) “THE IDEA OF A UNIVERSITY” New Delhi, Thomson Press (India) Ltd.

 

पत्र–पत्रिकाएं :-

  1. सिंह सुधा, राजनीति: समावेशी राष्ट्रवाद बनाम प्रतीकवाद, 14 मार्च 2016 

http://www.jansatta.com/politics/inclusive-nationalism-versus-symbolism/76634/

  1. सिन्हा राकेश, जनसत्ता, बारादरी, रविवारीय स्तंभ, 7 मार्च 2017 

http://www.jansatta.com/sunday-column/rss-thinker-rakesh-sinha-interview-over-students-union-vs-rss-ideology/268022/

हिंदी की लघु पत्रिकाएं और बांग्ला साहित्य: एक नज़र-डॉ. निकिता जैन

0

हिंदी की लघु पत्रिकाएं और बांग्ला साहित्य: एक नज़र

डॉ. निकिता जैन 
 अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली में अध्यापन
nkjn989@gmail.com
                    9953058803

 

शोध सारांश – प्रस्तुत शोधालेख में हिंदी की लघु पत्रिकाओं में प्रकाशित बांग्ला भाषा के अनुवादित (हिंदी में) साहित्य का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। इस विश्लेषण के ज़रिये न केवल ये पता लगाने की कोशिश की गयी है कि हिंदी की लघु पत्रिकाओं का अन्य क्षेत्रीय या प्रादेशिक भाषाओं का प्रति क्या दृष्टिकोण था बल्कि यह भी मूल्यांकित करने का प्रयास भी किया गया है कि किस तरह यह पत्रिकाएं हिंदी के पाठकों के समक्ष अन्य भाषाओं के अनुवादित साहित्य (हिंदी में) को प्रस्तुत कर रही थीं ताकि वह अन्य भाषाओं की साहित्यिक प्रवृत्तियों से न केवल परिचित हों बल्कि उन्हें आत्मसात करने के पथ पर भी अग्रसर हों। प्रस्तुत शोधालेख में बांग्ला साहित्य को तत्कालीन स्थितियों (1950 से लेकर 1980 तक के विशेष संदर्भ में ) के अनुसार अलग–अलग भागों और संदर्भों में विवेचित करने प्रयास किया गया है जैसे – बांग्लादेश मुक्ति आन्दोलन, हंगरीजेनरेशन मूवमेंट आदि का बांग्ला साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा और उसे किस प्रकार लेखकों ने अपनी रचनाओं के द्वारा प्रस्तुत किया –इन सभी पहलुओं को इस लेख में विवेचित किया गया है।

 मुख्य शब्द – लघु पत्रिका (सीमित संसाधनों के अंतर्गत निकलने वाली पत्रिका), अणिमा,उत्कर्ष,कल्पना, संचेतना,नई धारा  (पत्रिकाओं के नाम)

 शोध–विस्तार

बांग्ला:प्रतिरोध का साहित्य  – हिंदी पर बंगला साहित्य की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है| शरतचन्द्र का देवदास हो या रविन्द्रनाथ टैगोर की चोखेर बाली, इन अविस्मरणीय रचनाओं को कौन भूल सकता है, न जाने कितनी बार हिंदी में इन रचनाओं का रूपांतरण हो चुका है, कितनी हिंदी फिल्मों में इनका चित्रांकन किया जा चुका है। बंगला साहित्य हमेशा से अपनी दृष्टि और कला द्वारा हिंदी साहित्य को समृद्ध करता आ रहा है। इसके अतिरिक्त कितने ही ऐसे हिंदी साहित्यकार हैं जिनका सम्बन्ध बंगाल से है, जो बांग्ला  और हिंदी दोनों में सक्रिय रूप से लिखते रहे हैं। बांग्ला  साहित्य आज भी हिंदी के मुकाबले बहुत समृद्ध माना जाता है क्योंकि बंगाल में ही सबसे पहले नवजागरण का आवागमन हुआ। स्वतंत्रता से पूर्व और उसके पश्चात भी बंगाल राजनीतिक, साहित्यिक, शैक्षिक

एवं सामाजिक सभी दृष्टि से अधिक सक्रिय रहा है। साहित्य की किसी भी नयी प्रवृत्ति या विधा की शुरुआत अधिकतर बंगाल से ही हुई है। लघु पत्रिकाओं की बात की जाए तो भारत में लघु पत्रिका आन्दोलन की शुरुआत भी सर्वप्रथम बंगाल से हुई थी। दरअसल बंगाल शुरू से ही अंग्रेजी एवं अन्य विदेशी भाषाओं के साहित्य के प्रति आकर्षित रहा और यही वजह है कि धीरे-धीरे साहित्य प्रेमियों ने विदेशी भाषाओं के साहित्य का अनुवाद करना शुरू कर दिया। इसी कारण साहित्य की नयी-नयी प्रवृत्तियों और आन्दोलन से ये लोग परिचित होने लगे और इनको अपने साहित्य में आकार देने लगे। हिंदी की लघु पत्रिकाओं का झुकाव बांग्ला  साहित्य की ओर स्पष्ट रूप से दिखलाई पड़ता है। इसका एक कारण यह भी है कि बांग्ला  साहित्य प्रतिरोध का साहित्य है| विद्रोह छोटा हो या बड़ा बांग्ला  भाषा हमेशा से अपनी संस्कृति,कला के प्रति सजग और आक्रमक रही है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो बांग्ला  साहित्य ने कभी-भी पुरानी परम्पराओं को छोड़ने और नए को अपनाने में वक़्त नहीं लगाया। यही वजह है कि 1920 के आस-पास ही बंगाल में लेखकों की एक नयी पीढ़ी तैयार हो गयी थी जबकि हिंदी में नए प्रयोग करने वाले लेखक सन् 1950 के बाद आते हैं।

विद्रोह के तीखे तेवर लिए बांग्ला साहित्य के विकास का एक कारण वहां की राजनीतिक परिस्थितियां भी रहीं हैं। 1905 में बंग-विभाजन का होना, पश्चिमी और पूर्वी बंगाल में परिस्थितियों का बदलना, देश की आज़ादी के बाद पूर्वी बंगाल का पाकिस्तान में शामिल होना, अपने अस्तित्व एवं भाषा की गौरवशाली परम्परा को बनाये रखने के लिए पूर्वी बंगाल का पाकिस्तान को करारा जवाब देना इत्यादि घटनाओं ने प्रतिरोध की ऐसी ज़मीन तैयार की, जिसने आगे चलकर केवल भारतीय इतिहास में ही नहीं बल्कि विश्व इतिहास में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी ।

सन् 1971 के दशक को कौन भूल सकता है ? जिसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था। बंगपिता शेख मुजीबुर्र रहमान ने एक स्वतंत्र बांग्लादेश की परिकल्पना की और कुछ महीनों के भीतर ही इस कल्पना ने हकीकत का रूप ले लिया। किसी भी देश की जीत के पीछे सबसे बड़ा हाथ उन बुद्धिजीवियों का होता है जिन्हें ये ज्ञात हो कि आने वाली परिस्थितियां किस करवट बैठेंगी। लेखक इस सूची में सबसे आगे रहते हैं। बंगाल के लेखकों की यह सबसे बड़ी खासियत है कि वह विपरीत परिस्थितियों में कभी हथियार नहीं डालते। पूर्वी बंगाल पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ पश्चिमी बंगाल के कथाकारों,शिक्षकों,कवियों आदि ने भी सख्त तेवर अपना रखे थे। पूर्वी बंगाल के लेखकों की तरह ही पश्चिमी

बंगाल के साहित्यकारों ने यह ठान लिया था कि ‘बांग्लादेश’ को एक स्वतंत्र देश बनाकर ही छोड़ेंगे। तत्कालीन बंगाली कहानी, कविता एवं उपन्यासों में केवल बांग्लादेश के मुक्ति आन्दोलन की चर्चा ही मिलती है। बात चाहे बांग्ला देश छोड़कर भारत में आने वाले शरणार्थियों की हो या फिर उस जनता की जो बिना हथियार के भी इस स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़ी या उन स्त्रियों की जिनकी अस्मत को सरेआम बेआबरू किया गया फिर भी वह अपनी अंतिम साँस तक जय बांग्ला  का नारा लगाती रहीं-इन सभी पहलुओं को बंगाली कथाकारों ने बड़ी बारीकी से चित्रित किया। केवल बंगाल में ही नहीं बल्कि हिंदी प्रान्त में भी कुछेक लघु पत्रिकाओं ने ‘बांग्लादेश’ के तत्कालीन मुक्ति आन्दोलन को अपनी पत्रिका में आवाज़ प्रदान की। ऐसी ही पत्रिकाओं में से एक है ‘अणिमा’। शुरुआत में यह पत्रिका कलकत्ता से ही प्रकाशित होती थी। लेकिन नवम्बर 1971 का ‘बंगलादेश कथा विशेषांक’ जयपुर से प्रकाशित हुआ। इस विशेषांक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसने पूर्वी बंगाल की तत्कालीन परिस्थितियों के हर पहलू पर रोशनी डालने की कोशिश की है। उन कथाओं को विशेषांक में जगह दी गयी जो उस समय के हालातों को सही रूप से चित्रित करने में सक्षम थीं। जितनी भी कहानियां इस अंक में प्रकाशित हुईं  सभी भोगे हुए यथार्थ पर आधारित थीं। बांग्लादेश पर केन्द्रित यह अंक केवल इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं है कि यह वहां की घटनाओं का सिलसिलेवार वर्णन प्रस्तुत कर रहा है। बल्कि यह विशेषांक इस बात का प्रमाण है कि- किसी भी राष्ट्र या समाज में होने वाली परिघटनाएं सबसे पहले वहां के कला माध्यमों पर ही असर डालती हैं और ऐसी सूरत में इन माध्यमों का यह कर्तव्य होता है कि वह ऐसे साहित्य की रचना करें जो समाज और राष्ट्र के केवल हित में ही न हों बल्कि उन्हें जुझारू भी बनाएं। बांग्लादेश की मुक्ति में कलम के सिपाहियों का भी उतना ही बड़ा योगदान है जितना कि बन्दूक के सिपाहियों का। लेखक या कलाकार सही वक़्त पर अपनी कला का इस्तेमाल करे तो क्या हो सकता है यह ‘बांग्लादेश’ के रूप में हमारे सामने है।

प्रस्तुत विशेषांक की पहली कहानी ताराशंकर वन्द्योपाध्याय के उपन्यास ‘एकटि कालो मेयेर कथा’ का एक अंश है। ‘वे दो काल रात्रियाँ’ शीर्षक से छपी यह कहानी अपने अंदर हजारों प्रश्नों को समाये हुए है। कहानी का हर पड़ाव अपने साथ एक नया प्रश्न लेकर आता है कि क्या जो उस समय हुआ वो होना ज़रूरी था ? अगर ज़रूरी था भी तो क्या इस रूप में, जहाँ लाखों लोगों को दो गज ज़मीन भी नसीब नहीं हुई ? प्रस्तुत कहानी केवल दो रातों पर केन्द्रित है। 25 और 26 मार्च 1971 की दो रातें किस तरह भयानक काल रात्रि में बदल गयीं, लोगों को कैसे उनके घरों में जिंदा जला

 

दिया गया, लड़कियों को खींच-खींच कर सड़कों पर लाया गया और उनके साथ वो सलूक किया गया, जिसे सुनने से पहले लोग मरना पसंद करेंगे – ऐसे हालातों में तीन शख्स कैसे एक जले हुए मकान के अन्दर अपनी जान बचाने के लिए बैठे हुए हैं और पाकिस्तानी सेना एवं याहिया खान के खूनी दरिंदों का यह नंगा नाच देख रहे हैं। इस पूरी कथा को एक एंग्लो –इन्डियन शरणार्थी के द्वारा कहलवाया गया है –जो कि इस पूरे काण्ड का प्रत्यक्षदर्शी है। कहानी का सबसे मर्मस्पर्शी पहलू वो है जहाँ औरतों की आबरू को लूटा जा रहा है लेकिन घरों में छिपे हुए लोग केवल मूक दर्शक बने हुए हैं। उन स्त्रियों की चीखें सुनकर पास पड़ा कुत्ता भी काँप रहा है लेकिन इंसानी ज़मीर मर चुका है और जिनका जिंदा है वो भी मजबूर हैं – “वे कह रही थीं, तुम लोगों के पाँव पड़ते हैं। हमें छोड़ दो। अल्ला की दुहाई है|………….मैं अपने बालों को दोनों हाथों से नोचता हुआ किसी जानवर की करुण मूक चीत्कार की तरह चीख पड़ना चाहता था।……..मिस्टर सेन ने कहा ‘इधर आ जाइये। भूल जाइये कि आप जिंदा है|”1.  कहानी का यह अंश ये सोचने पर मजबूर कर देता है कि ‘बांग्लादेश’ को मुक्ति तो मिली लेकिन किस कीमत पर ? यह सही है कि स्वतंत्रता बलिदान मांगती है लेकिन क्या उस त्याग की भी कोई सीमा निश्चित है ? बांग्लादेश के लोगों ने भी अपने खून से इस आन्दोलन को सींचा। लेकिन क्या बांग्लादेश इतिहास के इस काले पन्ने को कभी भूला पायेगा ? यह सभी प्रश्न कहानी अपने पीछे छोड़ जाती है। दो रातों का चित्र इतना भयानक था तो आगे के नौ महीनों में क्या हुआ होगा यह सोचकर ही रूह काँप उठती है। बांग्ला  कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वहां के लेखक  सच को प्रदर्शित करने के लिए किसी आडम्बर का सहारा नहीं लेते, अपनी सधी हुई भाषा के माध्यम से वह यथार्थ को ज्यों का त्यों आपके सामने रख देते हैं। प्रस्तुत कहानी भले ही पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों को व्याख्यायित कर रही हो लेकिन अगर गौर से देखा जाए तो यह कथा प्रतिरोध की एक ज़मीन भी तैयार कर रही है – कहानी में ‘सेन’ अपने साथी से पूछता है कि तुम तो एंग्लो इन्डियन हो, तो तुम्हें किस बात का डर ? प्रत्युत्तर में एंग्लो इन्डियन कहता है –“मिस्टर सेन, इससे बेहतर तो मर जाना है। मेरी मां बंगाली है तथा मैं क्रिश्चियन हूँ। जानवरों का मित्र बनकर उनसे अपने प्राण बचाने की ख्वाहिश भी नहीं है।”2.   एंग्लो इन्डियन के ये शब्द इस बात का प्रमाण हैं कि ऐसी परिस्थितियों में हर शख्स जो बांग्लादेश के साथ था, अपने स्तर पर इस अमानवीय व्यवहार का विरोध कर रहा था। ये मायने नहीं रखता कि आप विरोध कैसे कर रहे हैं, मायने ये रखता है कि आप विरोध कर रहे हैं। हर शख्स आन्दोलन में बन्दूक लेकर नहीं उतर सकता। लेकिन जो

अपनी जान की बाजी लगाकर इस पथ पर निकल पड़े हैं उनका साथ कैसे दिया जाये,यही भावना किसी भी क्रांति को आगे बढ़ाने के लिए काफी होती है। कहानी का अंत भी इसी आशा के साथ होता है जहाँ मिस्टर सेन यह मन बना लेते हैं कि “वे यह लड़ाई अब देखकर ही जायेंगे” इसलिए नहीं कि उन्हें अब अपनी मृत्यु का डर नहीं है बल्कि इसलिए कि जिन हजारों लोगों ने इस आशा में अपने प्राण त्याग दिए हैं कि कभी न कभी दुनिया के नक़्शे में बांग्लादेश का स्वतंत्र अस्तित्व होगा, उनकी इस आशा को पूरा होते हुआ देखने वाला कोई तो हो।

‘अणिमा’ के इस विशेषांक की हर कहानी केवल ‘बांग्लादेश’ की कथा को ही रेखांकित नहीं करती बल्कि बंगाली साहित्यकारों की विचारधारा को भी व्याख्यायित करती है। बंगाली रचनाकारों ने जिस सूक्ष्मता के साथ ‘कहानी’ के प्लाट का चुनाव किया है उससे यह प्रदर्शित होता है कि उन्होंने कितने करीब से उन परिस्थितियों को महसूस किया होगा कि वह उतने ही जीवंत रूप में उसे पन्नों पर उतार पाए| मनोज बसु की कहानी ‘गोरिल्ला’ भी इसी जीवंतता का उदाहरण है। प्रस्तुत कहानी में निहत्थी जनता के आक्रोश का चित्रण किया गया है जो पाकिस्तानी सेना द्वारा किये गए कत्लेआम को देखकर उठ खड़ी होती है और गोरिल्ला युद्ध द्वारा सेना के नाक में दम कर देती है। छोटे-छोटे कस्बों और गांवों में गोरिल्ला युद्ध कितना महत्त्वपूर्ण था तथा एक आम जनता उसे कैसे अंजाम दे रही थी इसका सजीव चित्रण प्रस्तुत किया गया है – “नरम मिट्टी वाले बांग्लादेश देश में यह कैसा आश्चर्यजनक काण्ड हो रहा है ! लड़के–लड़कियां अविजीत सैनिक हो गए हैं। सिर्फ अपने हृदय की शक्ति से बांग्ला  देश की मूर्ति और असाधारण से हथियारों द्वारा गोरिल्ला सेना का गठन किया है। खान लोगों की कदम–कदम पर नींद हराम कर रहे हैं।”3. एक ओर मन्मथ पाल जैसे युवक हैं जो साधारण हथियारों से देश की रक्षा करने के लिए संघर्षरत हैं तो दूसरी ओर जावेद अली जैसे स्वार्थी व्यक्ति हैं जो अपनी जान बचाने के लिए देश के साथ गद्दारी कर रहे हैं। लेकिन पाक सैनिक जावेद अली जैसे शुभचिंतकों के साथ भी कैसा अमानवीय व्यवहार करते हैं –इसका सशक्त चित्रण ही इस कहानी का केन्द्रीय बिंदु है – “सूबेदार डबल मार्च करता हुआ आंगन पार करके शयन–कक्ष में जा घुसा।……कमरे में जावेद की तीसरी शादी की हुई नई दुल्हन थी।……जावेद भी पीछे–पीछे कमरे में घुसने जा रहा था कि शॉट –गन का निशाना साध आँखें तरेरकर सूबेदार बोला, ‘हट जाओ’ ! भड़ाक से सूबेदार ने

 

दरवाज़ा बंद कर भीतर से कुंडी लगा ली। कमरे से आर्तनाद सुनाई दिया।…..जावेद अली चिल्ला रहा था – ‘अल्लाह की दुहाई हुज़ूर, मेरी बीवी को छोड़ दो’|”4. इस प्रसंग के पश्चात् ज़ेहन में एक ही बात कौंधती है कि इंसानियत के दुश्मन क्या कभी किसी के सगे हुए हैं ? धर्म और मज़हब के नाम पर कत्लेआम करने वालों और उनका साथ देने वालों को, उनका अल्लाह कभी माफ़ कर पायेगा ? जावेद अली ने देश के वफ़ादारों की मुखबरी करने से पहले शायद ये सोचा नहीं होगा अगर सोचा होता तो जावेद अली को कहानी के अंत में अपनी ही मौत की भीख मांगने की ज़रूरत नहीं पड़ती –“कहाँ हैं गोरिल्ले छोकरे ? …..मेरे नाक–कान काट लें। आँखें निकाल लें। जो कुछ मैंने उन्हें कहते सुना था उसमें से आज वे कुछ भी कर लें तो शायद मेरे हृदय को शान्ति मिले।”5.  बंगाली साहित्य को पढ़कर यह महसूस होता है कि अवश्य ही हिंदी साहित्य को इससे बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है। ऐसा कतई नहीं कि हिंदी कहानियों में गंभीरता नहीं है या उनमें समसामयिक घटनाओं का विवेचन नहीं मिलता। लेकिन हिंदी कहानी में बंगाली कहानियों जैसा फ़ोर्स नहीं है। सन् 1971 के दौरान हिंदी में कई कहानी आन्दोलनों की शुरुआत हो चुकी थी। नयी कहानी, सचेतन कहानी, अकहानी जैसे आन्दोलनों  के दौरान कई तरह के नए प्रयोग हिंदी कहानी में किये गए। कई बेहतर कहानियाँ भी लिखी गयीं लेकिन कुछेक साहित्यकारों की रचनाओं को छोड़ दें तो उस समय की अधिकतम कहानियों में केवल आधुनिक युग के पुरुष-स्त्री संबंधों की व्याख्या ही नज़र आती हैं । क्या ? हिंदी भाषी क्षेत्र बांग्लादेश के हालातों से अनजान थे या वो इस बात से वाकिफ नहीं थे कि लाखों लोग बंगलादेश छोड़कर पश्चिमी बंगाल में शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं ? उनकी पीड़ा और स्थिति का वर्णन केवल बंगाली समाचार पत्रों में छपता था ? पश्चिमी बंगाल भारत से अलग था ? और अगर इन सभी प्रश्नों का जवाब नहीं है तो फिर क्यों हिंदी लेखकों की कहानियों में, कविताओं में, उपन्यासों में इतिहास की इस घटना का चित्रण न के बराबर मिलता है। ‘अणिमा’ के इस महत्त्वपूर्ण विशेषांक में एक भी कहानी किसी हिंदी लेखक की नहीं छपी और न ही संपादक ने यह ज़हमत उठाई कि वह इस बात का स्पष्टीकरण करें कि उन्होंने केवल बांग्ला  कथाकारों की ही कहानियों को क्यों  शामिल किया ? बात चाहे जो भी रही हो लेकिन एक हिंदी भाषी पत्रिका में जिसमें अनुवादित बंगाली कहानियां प्रकाशित की जा रही हैं और वो भी उस मुद्दे को केंद्र में रखकर जिसमें भारत की

अहम भूमिका है – ऐसे मुद्दों पर हिंदी लेखक चुप्पी साधे क्यों बैठे थे ? और इसके बाद भी अन्य किसी पत्रिका ने ये प्रयास क्यों नहीं किया कि बांग्लादेश के मुद्दे पर अन्य भाषाओं के लेखकों की राय ली जाए। न ही इस दिशा में तत्कालीन स्थापित हिंदी लेखकों का कोई ठोस पक्ष सामने आया।  वजह चाहे कुछ भी रही हो लेकिन एक बात स्पष्ट है कि बांग्लादेश के संदर्भ में बांग्ला  साहित्य में जिस तरह का विरोध दर्ज है ऐसा विरोध आपातकाल के समय में भी साहित्य में नज़र नहीं आता। हिंदी साहित्य में गिनी-चुनी कहानी -उपन्यास ही इस संदर्भ में लिखे गए वो भी काफी बाद में। जहाँ तक बांग्ला साहित्यकारों की बात है तो चाहे अचिन्त्यकुमार सेनगुप्त हों या जरासंध या फिर बांग्ला  की प्रतिष्ठित लेखिका महाश्वेता देवी सभी ने उस महत्त्वपूर्ण समय को अपनी कहानियों में कैद कर हमेशा के लिए अमर कर दिया है|

महाश्वेता देवी की कहानी ‘जनक राजा के धान खेत’ भी एक ऐसी कथा है जिसमें बांग्लदेश के उन किसानों की पीड़ा को दिखाया गया है जो अपने खेतों से वैसे ही प्यार करते थे जैसे राजा जनक अपनी पुत्री सीता से। अपने देश को छोड़कर चले जाने का दर्द क्या होता है –इस दर्द को शायद एक किसान से बेहतर कोई और नहीं समझ सकता जो अपनी देश की मिट्टी को सींच-सींच कर उसमें खेती करता है। जिस खेत में कभी फसलें लहलाहतीं थीं आज उसी में लोगों की लाशें सड़ रही हैं। एक आम किसान को यह भी नहीं पता कि वह अपने ही देश में अपने ही लोगों से क्यों लड़ रहे हैं ? एक स्वतंत्रता की लड़ाई अंग्रेजों से लड़ी थी क्योंकि वो विदेशी थे लेकिन अपनों से कैसा युद्ध ? क्या ये वाकई में युद्ध था या उससे भी भीषण कुछ और – “सभी इसे युद्ध क्यों कहते हैं ? ……घर–घर में आग लगाना, बाज़ारों और हाटों को लूटना, क्या इसी का नाम युद्ध है ? आंच लगने से मिट्टी को फोड़कर चीटियों का झुंड जिस प्रकार निकलता है, उसी प्रकार मनुष्य अपने घर–द्वार छोड़कर निकल रहे हैं। क्या इसी का नाम युद्ध है।”6.   जनक के मन में यह प्रश्न रह-रहकर आते हैं कि जिस युद्ध की वजह से उसका पोता मर गया, जिस युद्ध के कारण उसके पोते की बहू पागल हो गयी उस युद्ध से किसी को हासिल क्या होगा ? और अंत में जाकर उसे अपने सभी सवालों का जवाब मिल जाता है –‘जो काम जिस के लिए है उसे करते रहना भी एक युद्ध है।’ किसान का एक ही काम है अपने खेतों का ध्यान रखना, उसे बीमारी से बचाना – इसी कार्य को करने के लिए जनक बीच रास्ते में ही शरणार्थी कैंप को

छोड़कर अपने खेतों की तरफ लौट आता है –“जनक अपने खेत में आ खड़ा हुआ|…जेठ के महीने में धान के खेत का चारा सब्ज रहता है। निराई नहीं हुई इसीलिए बीच–बीच में घास–फूस भी उगे हुए हैं।……जनक पागलों की तरह घास–फूस को उखाड़कर फेंकने लगा|…..बड़बड़ाता हुआ वह घास–फूस को गालियाँ देने लगा। मानो वो युद्ध कर रहा हो। मिट्टी की गंध से उसे उत्तेजना मिल रही थी। जिसका जो काम है वह उसे नहीं करने दिया जाए तो मनुष्य जिंदा कैसे रह सकता है।…… मिट्टी की गंध और धान–चारे की खुशबू में जनक अँधा हो गया। बहरा हो गया। इसलिए वह लोगों का चिल्लाना सुन नहीं सका। देख नहीं सका कि सामने कौन हैं जो उस पर बन्दूक तान रहे हैं|”7.  बांग्लादेश की लड़ाई केवल सत्ता के लिए नहीं थी ये लड़ाई हर कोई अपने लिए लड़ रहा था – किसान अपने खेतों के लिए, बच्चे अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए, युवा अपने देश के लिए , सभी अपनी –अपनी इच्छाओं को जिंदा रखना चाहते थे। अपनी इच्छाओं को मरने नहीं देना यह भी तो एक युद्ध ही है| महाश्वेता देवी की यह कहानी भले ही बांग्लादेश की पृष्ठभूमि पर लिखी गयी हो लेकिन गौर से देखा जाए तो ये कथा हर उस देश की है जहाँ युद्ध जैसी भीषण परिस्थितियां बनी हुईं हैं। दरअसल ‘अणिमा’ के इस अंक में प्रकाशित हर कहानी आज भी प्रासंगिक है केवल इसलिए नहीं कि ये युद्ध में मारे गए उन लाखों लोगों की शहादत की याद दिलाती है बल्कि इसलिए कि वर्तमान समय में जो देश के हालात हैं उनसे लड़ने की शक्ति प्रदान करती है। ‘नील फूल’ जैसी कहानियां आज भी बंगलादेशी शरणार्थियों की स्थिति का वर्णन करती हैं जो अपने देश से दूर दूसरे देश में लोगों की दया के पात्र बने हुए हैं। जिनके मन में एक आशा आज भी जिंदा है कि कभी न कभी वह अपने बांग्लादेश के नील फूल ज़रुर देख सकेंगे।

अतीन वन्द्योपाध्याय की कहानी ‘बांग्लादेश के लोग’ में धर्म और भाषा के नाम पर लोगों को मारने वालों पर करारा व्यंग्य किया गया है| धर्म और भाषा की लड़ाई में पिसने वाले बंगलादेशी लोग यह नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर उन्हें मारा क्यों जा रहा है। क्यों उन्हें अपने ही देश में परदेसी बना दिया गया है| केवल इसलिए कि उनका धर्म इस्लाम है लेकिन भाषा बंगाली ? या इसलिए कि वह अपने अल्लाह के साथ-साथ माँ दुर्गा का भी नाम लेते हैं ? जो परिस्थितियां उस समय बांग्लादेश के समक्ष थीं वह आज भारत के सामने कश्मीर को

 

लेकर हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय धर्म के ठेकेदार अब्दुल वारी (कथा का नायक) के कपड़े उतारकर उसके मुस्लिम होने का सबूत मांगते हैं और आज के ठेकेदार फतवा जारी करके यह कहते हैं कि मुस्लिम औरतों के लिए बुर्का पहनना ज़रूरी है। समय ज़रुर बीत गया है लेकिन हालात ज्यों के त्यों बने हुए हैं।           

बांग्लादेश की गाथा को अपने कथा विशेषांक में जगह देकर अणिमा ने बांग्ला  साहित्य के महत्त्व को प्रतिपादित करने की कोशिश की है। निश्चित तौर पर यह कथा विशेषांक केवल बांग्ला  साहित्य की विशिष्टताओं को ही उजागर नहीं करता बल्कि साहित्य-सृजन की कला क्या और कैसी होनी चाहिए- इसकी भी प्रेरणा प्रदान करता है।

          अणिमा के इस कथा-विशेषांक से पूर्व ‘उत्कर्ष’ पत्रिका ने मई और सितम्बर 1971 के अंक में बांग्लादेशी कविताओं को प्रकाशित किया था। इन कविताओं की खासियत यह थी कि ये केवल  बांग्लादेश की पृष्ठभूमि पर ही आधारित नहीं थीं बल्कि बंगलादेशी कवियों द्वारा रचित थीं। इसके अतिरिक्त इस अंक में हिंदी कवियों की उन रचनाओं को भी शामिल किया गया जो बांग्लादेश की स्थितियों पर अपना मत स्पष्ट करते हैं। वेणु गोपाल, गोपी डढूला, वीर राजा, अप्रसाद दीक्षित जैसे कवियों ने यह साबित कर दिया कि केवल पश्चिम बंगाल ही नहीं बल्कि भारत के अन्य राज्य भी बांग्लादेश की क्रांति में उनके साथ हैं।  बांग्लादेश के कवियों की पंक्तियों को अपनी पत्रिका में आवाज़ देकर ‘उत्कर्ष’  ने  उन सोये हुए कवियों को जगाने की कोशिश की जो अभी भी क्रांति एवं स्वतंत्रता जैसे शब्दों से अनजान थे। जिनकी कविता अभी –भी प्रेयसी के केशों में उलझी हुई थी। दरअसल 1971 के बांग्लादेश पर केन्द्रित साहित्य हर उस लेखक, कवि एवं कलाकार के लिए एक प्रेरणा हैं जो सच को बाहर लाने से कतराता है। यह कवितायें केवल बांग्लादेश के लोगों को ही नहीं पुकार रही हैं बल्कि हर उस देश के नागरिक को जगा रही हैं जो अभी-भी परतंत्रता की ज़जीरों में जकड़ा हुआ है –

“महाप्रलय की पुकार आई है

आगे बढ़ने की

शपथ लेने की

 

घर–घर में।

खून में आया है आदिम ज्वार

उसी के प्रवाह में

हमने ली नई सौगंध

कोई भी बाधा का प्राचीर हम नहीं मानेंगे

न कुंठित है, न हम दुर्बल।

हम हैं भयंकर :

तोड़ेंगे हम

शत्रुओं का सारा बंधा

रचेंगे दूसरा

नया फंदा।”8.

काजी हिमायातुल्ला की यह कविता क्रांति का आह्वान कर रही है। देश के हर नागरिक को उसके कर्त्तव्य की याद दिला रही है कि अब एक स्वतंत्र देश बनाने का वक्त आ गया है,इसलिए यह आवश्यक है कि हम सब मिलकर यह शपथ लें कि अब मरेंगे ही नहीं, मारेंगे भी। शत्रु-पक्ष का फंदा उसी के गले में डाला जाएगा और उसी के खून से बांग्लादेश का नया इतिहास लिखा जाएगा। ज़ाहिर है कि ऐसी कविता करना उस समय की मांग थी – क्रान्ति के आह्वान के लिए ज़रूरी है कि कवि आम-जनता के दिलों से मौत का डर निकाल फेकें क्योंकि सड़क पर पड़ी अपने देशवासियों की लाशों को देखकर कोई भी इंसान कमज़ोर पड़ सकता है। ऐसे हालातों में उसके अन्दर दबे आक्रोश को क्रान्ति का रूप दे देना ही कवि का कर्म था। शमसुर रहमान की कविता ‘लाश’ इसी कवि कर्म को निभाते हुए नज़र आती है –

“यह लाश हम रखें तो कहाँ

भला इस लायक कब्र कहाँ

–x-x-x-

चूं आज यह लाश नहीं रखता

मिट्टी में, पहाड़ में, सागर में –

 

हर दिल में है ठांव इसका|”9.

बांग्लादेश की लड़ाई में शामिल हर शख्स अपने दिलो-दिमाग में इन लाशों के ढेर को सहजे बैठा है। सड़क पर पड़ी लाशें चीख रही हैं कि अब पीछे मत हटना। इन लाशों को पर्वत, पहाड़,मिट्टी दफ़न नहीं कर सकती क्योंकि अभी भी यह बंगवासियों के दिलों में जिंदा हैं, उनकी लड़ाई में उनके साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़ रही हैं, उन्हें प्रेरित कर रही हैं कि बिना रुके आगे बढ़ते चलो, मंज़िल करीब है।

हुमांयू आज़ाद की कविता ‘ब्लड बैंक’ भी देशवासियों के मनोबल को बढ़ाती हुई प्रतीत होती है। बांग्ला देश में बंगवासियों के खून की जो नदियाँ बह रही हैं दरअसल वो खून मातृभूमि के लिए ब्लड बैंक का काम कर रहा है। प्रस्तुत कविता में हुमायूँ आज़ाद बंगवासियों की शहादत को संबोधित करते हुए कह रहे हैं कि स्वतंत्रता की लड़ाई को खून से सींचना ही पड़ेगा अगर ऐसा नहीं किया तो तुम्हारा खून अस्पताल की बोतलों में पड़ा-पड़ा गन्दा हो जाएगा। इसलिए आवश्यक है कि तुम अपना खून इस धरती पर बह जाने दो। धरती पर पड़ी तुम्हारे रक्त की एक बूँद दस गुना होकर तीव्र गति से शत्रु-पक्ष का सफाया कर रही है इसलिए आवश्यक है कि अपने इस ब्लड बैंक को स्वतंत्रता मिलने तक खाली न होने दो –

“बंगाल की धरती पर रोज़ाना कैसा रक्तपात हो रहा है

हर बटोही कुछ लोहू दे जाता

ब्लड बैंक में : बंगाल की धरती पर……….

हर मजदूर अपनी मंजिल के पथ पर बिखेरता रक्त सूर्य बीज

स्कूल के बच्चे छात्र युवती–युवक…….

सब लोग खून छोड़ जाते ब्लड बैंक में।

कौन भला अब ब्लड–बैंक अस्पताल में रखे

वह लाल खून गन्दला जाता है

कांच शीशी और दवा के जहरीले स्पर्श से

बंगाल की धरती जैसा ब्लड–बैंक कहीं नहीं

 

बूँद भर लाल खून

दस बूँद बन जाता उस बैंक में रखते ही

इसलिए अब कोई ब्लड बैंक– अस्पताल जाता नहीं।”10.

 

बांग्ला देश की हवा में अब मुक्ति की महक आने लगी है। मुक्ति की कल्पना भयभीत चेहरों पर मुस्कान के फूल खिलाने लगी है। स्वतंत्र देश की शुद्ध परिकल्पना कैसे बंगवासियों को भाव-विभोर कर रही है इसका चित्रण हसन हाफिसुर रहमान की इस कविता में मिलता है –

“निसर्ग के गले में बंधे रंग–गर्ती टाई की नाई

अनगिनत कनकौवे उड़ रहे हैं

सारे देश भर में एक भी अमरीकी झंडा नहीं

बे रोक टोक हवा के शुद्ध आवागमन से

बच्चों के ताज़े चेहरों पर मानों भिनसारे खिले फूल हों”11

उपर्युक्त पत्रिकाओं में प्रकाशित बंगला साहित्य के विवेचन से यह स्पष्ट है कि बांग्ला  साहित्य में समसामयिक घटनाओं का चित्रण कितने मुखर रूप में हुआ है। बात भले ही देश की हो या देश के बाहर की बांग्ला  लेखक हर राजनीतिक एवं सामाजिक गतिविधि पर अपनी पैनी दृष्टि रखते है और उसे बड़ी ही बारीकी के साथ साहित्य में व्याख्यायित करते हैं। लेकिन तत्कालीन समय में बांग्ला  साहित्य में और किस प्रकार की साहित्यिक प्रवृत्तियां विद्यमान थीं – कैसी कहानी और कविता लिखी जा रही थीं, राजनीतिक मुद्दों के अलावा बंगला साहित्य और किन मुद्दों की ओर केन्द्रित था, इन प्रश्नों के जवाब जाने बिना तत्कालीन बंगला साहित्य को पूर्ण रूप से विवेचित नहीं किया जा सकेगा।ऊपर जिन कहानियों या कविताओं का ज़िक्र किया गया है वह एक विशेष दृष्टिकोण के अंतर्गत लिखी गयीं थीं लेकिन इसके अलावा बंगला कहानी या कविता का क्या स्वरुप है यह जानने के लिए कुछेक और पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों, कविताओं और लेखों का मूल्यांकन करना आवश्यक होगा –

बंगला कहानी–   साहित्यिक प्रवृतियों के दृष्टि से देखा जाए तो 1950 से लेकर 1980 तक का समय काफी महत्त्वपूर्ण था। विशेषत: कहानी और कविता जैसी विधाओं के विकास की दृष्टि से। बंगला कहानी की बात करें तो इन तीस वर्षों में बंगला कहानी के स्वरुप में काफी परिवर्तन आया था।  ऐसा माना जाता है कि 50 के दशक में बंगाली कहानीकार मूलत: कथा के लिए या तो किस्सा-गोई की शैली पसंद करते थे या फिर पाठक के सामने चमत्कारिक शैली में कोई रोमांचकारी घटना का विवेचन कर देते थे। लेकिन 70 के दशक तक आते-आते लेखकों के दृष्टिकोण में परिवर्तन आया। अब कहानीकार न तो किस्सागोई की शैली पसंद करते थे न ही उन्हें चमत्कारिकता में विश्वास था। ‘संचेतना‘ के अप्रैल–जुलाई 1967 के अंक में प्रकाशित लेख ‘आज की बंगला कहानी‘ में आलोक सरकार पूर्ववती एवं समकालीन बंगला कहानीकारों में अंतर स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि -” वर्तमान बंगला कहानी के चिंताशील एवं संचेतन रचयिताओं ने कहानी–रचना के दायित्व को नितांत भिन्न अर्थ में ग्रहण किया है|……आज के कहानीकार कहानी तत्त्व को निकाल, चरित्र का निषेध कर, किसी भी प्रकार के उद्देश्य को वर्जित कर,कहानी को एकांत, एकमात्र शिल्प–परिणत का अर्थ देना चाहते हैं|…पच्चास के दशक के कहानीकार कहानी और कविता में अभिन्नता स्थापित करना चाहते थे।बहुधा इसका सुपरिणाम होने पर भी अधिकांशत: यह आवेगपूर्ण रहा और किशोर भावुकता में सीमाबद्ध हो गया। ….कुछ लेखक यौन–आवेग के खुलासा वर्णन को ही आधुनिकता मानते हैं……जबकि आज के कहानीकार यौन–विषय के बचकाने वाद–विवाद पर बहस नहीं करना चाहते न ही समाज–सुधार एवं उन्नयन का दायित्व ग्रहण करना चाहते हैं । ये केवल कहानी लिखना चाहते हैं|”12. ज़ाहिर है कि नये कहानीकार एक नया तरह का प्रयोग साहित्य में करना चाह रहे थे – उद्देश्य विहीन कहानी लिखना जिसमें पात्रों या कहानी तत्व की प्रधानता न होकर केवल शिल्प का आधिपत्य हो, यह भी तो एक तरह का नया प्रयोग ही हुआ। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि 50 के दशक के कहानीकार केवल किस्सागोई शैली में ही रचनाएँ करते थे या उनकी कहानी में कौरी भावुकता थी।  यहाँ पर ताराशंकर वन्द्योपाध्याय की कहानी ‘मोतीलाल‘ की चर्चा करना आवश्यक है जो कल्पना के फ़रवरी 1953 के अंक में प्रकाशित हुई थी। 50 के दशक में लिखी गयी ये कहानी हर लिहाज़ से उत्कृष्ट है। यह कहानी हाशिये पर पड़े उस आदमी की स्थिति का वर्णन कर रही है जो दलित होने के साथ –

साथ अपनी कुरूपता का मूल्य भी प्रतिदिन समाज के ठेकेदारों को देता है। कहानी में मोतीलाल और उसकी पत्नी देखने में आम इंसानों जैसे नहीं हैं।उनकी कुरूपता को लेकर गाँव भर में चर्चा है। यही वजह है कि मोतीलाल नुक्कड़ नाटकों में रूप बदल-बदलकर हर प्रकार की भूमिकाएं निभाता है। लेकिन उसकी पत्नी भुवन को यह बात पसंद नहीं है वो चाहती है कि उसका पति कोई काम पकड़ ले ताकि आगे चलकर बच्चे हों तो उनका पालन-पोषण भी अच्छे से हो। लेकिन मोतीलाल इससे इक्तिफाक नहीं रखता। उसे लगता है कि उसका रूप ही उसकी पहचान है अत: वो जो कार्य कर रहा है वो ही ठीक है। इसी उधेड़बुन में कहानी आगे बढ़ती है और एक दिन गाँव के किसी माननीय व्यक्ति की बेटी मोतीलाल का रूप देखकर बेहोश हो जाती है। मोतीलाल लड़की का स्वास्थ्य जानने की नीयत से उसके घर जाता है जहाँ उसका स्वागत लात और घूंसों से किया जाता है। मोतीलाल किसी तरह घर पहुँचता है और अपनी पत्नी से कहता है -“हम लोगों का लड़का हम लोगों की तरह ही काला और कुत्सित होगा न भुवन ! ज़रूरत नहीं है हमें बाल–बच्चों की|”13. कहानी का अंत समाज के घिनौने चेहरे से पर्दा उठाता है जो मानवीय संवेदना को महत्त्व न देकर जाति एवं रंग-रूप पर जोर देता है। हाशिये पर पड़े व्यक्ति में न तो इतनी हिम्मत है और न ही इतना धैर्य कि वह इन रुढ़िवादी परम्पराओं के खिलाफ लड़े। इसलिए इसे ही अपनी नियति मानकर ये अपने हालातों के साथ समझौता कर लेते हैं। यह कहानी समाज की एक समस्या की ओर ध्यान आकर्षित अवश्य करती है लेकिन कहानी कोई उपदेश नहीं देती। पूरी कहानी का शिल्प-विधान भी बेजोड़ है। शुरू से लेकर अंत तक कहानी की भाषा पाठकों को बांधे रखती है। कहानी में चित्रित परिस्थितियां एक के बाद एक स्वयं ही कहानी की गति को आगे बढ़ाती हैं। हाँ यह ज़रुर है कि इस कहानी का एक उद्देश्य है। लेकिन एक बात गौर करने लायक है कि अगर साहित्य में से उद्देश्य तत्त्व का ही लोप कर दिया जाएगा तो साहित्य का अर्थ ही क्या रह जाएगा ? नये कहानीकारों का नया प्रयोग हैकेवल कहानी लिखना है- लेकिन क्या कोई कहानीकार उद्देश्य विहीन कहानी लिखा सकता है ? किसी नयी रचना का सृजन करना अपने आप में एक उद्देश्य है इसलिए भले ही कोई कहानीकार ये मानकर चले कि उसने एक उद्देश्यहीन कहानी की रचना की है लेकिन पाठक उस कहानी के लिए कोई न कोई उद्देश्य ढूंढ ही लेगा। जहाँ तक बात नए कहानीकारों की है तो उन्होंने ज़रुर ऐसी कथाओं की रचना की जिसमें कहानी तत्त्व और चरित्र प्रधानता दोनों का ही लोप था। ‘संचेतना’ के अप्रैल–जुलाई 1967 के अंक में रमानाथ राय की बंगला कहानी ‘दरवाज़ा‘ प्रकाशित हुई। सन् 60 के बाद जिस नयी चाल की कहानी की चर्चा शुरू हुई ये उसमें

बिलकुल फिट बैठती है। इस कहानी में प्रधान पात्र है एक ‘पुराना दरवाज़ा’ जिसे लक्ष्य करके कहानी लिखी गयी है| दरवाज़े के पीछे से सीढ़ियाँ उतरते आदमियों की कुछ-कुछ आवाजें आती हैं और ऐसा लगता है कि ये दरवाज़ा टूट जाएगा।लेकिन वह दरवाज़ा ज्यों का त्यों यूँ ही खड़ा है। कहानी का मूल्यांकन करने के पश्चात् ऐसा लगता है कि जो आवाजें दरवाज़े के पीछे से सीढ़ियाँ उतरते हुए लोगों की आ रही हैं वो केवल सहायक पात्र हैं, जिनका उपयोग उस दरवाज़े की महत्ता को प्रतिपादित करने के लिए किया गया है। कितने ही वर्षों से यह दरवाज़ा खड़ा है। हजारों लोग सीढ़ियों से उतरते –चढ़ते हैं दरवाज़ा उन सभी को देखता है, उनकी बातें सुनता है लेकिन कोई उस दरवाज़े की ओर ध्यान नहीं देता। दरवाज़ा हर अच्छी-बुरी बात को ध्यान से सुन रहा है लेकिन चाहकर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहा क्योंकि उसकी मजबूरी है, वो निर्जीव है, उसकी आवाज़ कोई सुन नहीं सकता। लेकिन आज का मनुष्य तो बोल सकता है  सुन सकता है,  देख सकता है फिर भी जानबूझकर अँधा,बहरा,गूंगा बना हुआ है ?  ऐसा लगता है यह कहानी आधुनिक मनुष्य की प्रवृत्ति को विवेचित कर रही है जो अच्छे-बुरे में भेद तो जानता है लेकिन सही को सही और गलत को गलत कहने से कतराता है। कहानी के अंत में दरवाज़े की पीछे से आ रही आवाजों से ऐसा लगता है जैसे कि इस बार दरवाज़ा ज़रूर टूट जाएगा –पैरों की धम-धम से नहीं बल्कि मनुष्य के गिरते हुए व्यवहार से जिसे एक दरवाज़ा तो महसूस कर रहा है लेकिन इंसान नहीं – “और ? /एक मंथली था /और ?/सिनेमा का टिकट था / और ?/ कुछ रुपए थे / और?/एक ब्लेड था /और?/…….और किसी के घर का पता था / और ?/……..दरवाज़े के भीतर से आवाज़ आने लगी धम..धम ….दरवाज़ा इस बार टूटकर गिर पड़ेगा।”14.  प्रस्तुत कहानी के शिल्प-विधान से स्पष्ट है कि 60 के दशक का लेखक किस तरह की कहानियां लिखना चाह रहा था। केवल नया प्रयोग ही नहीं बल्कि कहानी के स्वरुप को ही नया आकार देने में लगा हुआ था। ‘नई धारा’ पत्रिका में प्रकाशित सभी बंगला कहानियां नए प्रयोग पर ही आधारित हैं । समरेश बसु की कहानी ‘अनजाने’ जहाँ एक ओर आधुनिक –पति और पत्नी के संबंधों को नए रूप में व्याख्यायित करती है वहीं मिहिर आचार्य की कहानी ‘तीर्थ यात्रा’ प्रतीकात्मक रूप में अन्धविश्वास और विश्वास के बीच के भेद को स्पष्ट करती है। ‘नई धारा’ पत्रिका में प्रकाशित अधिकतर बंगला कहानी प्रतीकात्मकता एवं रहस्यवाद का आभास कराती हैं जिससे लेखक की परिकल्पना पर कभी-कभी आश्चर्य  होता है तो कभी-कभी खीझ भी चढ़ती है कि कहानी को इतना दुरूह बनाने की क्या आवश्यकता थी। इसका स्पष्टीकरण देते हुए आलोक सरकार कहते हैं कि – “आज के

लेखक मानते हैं कि उनकी कहानी प्रधानत: ऑब्जेक्टिव होगी।….ओब्जेक्टिविटी से उनका तात्पर्य है कि कहानी को किसी चरित्र के दृष्टिकोण से रचने की प्रक्रिया मान्य नहीं होगी।……लेकिन अधिकतर कहानीकार जिस वस्तुनिष्ठ कहानी की बात करते हैं वे प्राय: उसे कार्यान्वित नहीं कर पाते। उनकी कहानियां पढ़कर, उनकी आत्मनिष्ठता (subjectivity) स्पष्ट हो जाती है….कोई भी साहित्य पूर्णत: वस्तुनिष्ठ हो ही नहीं सकता क्योंकि उसके प्राण–उत्स में रहता है एक सब्जेक्ट अर्थात लेखक।”15.  आलोक सरकार का यह कथन पुराने और नए कहानीकारों के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए नये लेखकों के विज़न को पूर्णत:रेखांकित करता है। हालाँकि इस बिना पर ये नहीं कहा जा सकता कि नए कहानीकार अपने इस प्रयोग में सफल नहीं हुए। एक ओर जहाँ रमानाथ राय, शेखर बसु, कल्याण सेन जैसे लेखकों ने अपने नए विज़न में कहानी को ढालकर बंगला साहित्य को समृद्ध किया है। वहीं दूसरी ओर 50 के दशक के बुद्धदेव बसु,ताराशंकर वन्द्योपाध्याय जैसे कहानीकारों की चर्चा किये बिना बंगाली कहानी का इतिहास अधूरा ही रहेगा।

बंगला कविता – लघु पत्रिकाओं में जितना स्पेस बंगला कहानी को दिया गया है उतना किसी अन्य विधा को नहीं दिया गया। यहाँ तक कि बंगला कविता भी इन लघु पत्रिकाओं की नज़रों से ओझल ही रही। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि 50 के दशक में जितना महत्त्व गद्य का बढ़ा उतना पद्य का नहीं। गद्य की नयी-नयी विधाओं ने साहित्य में अपना स्थान बनाना शुरू कर दिया था इसलिए इन पत्रिकाओं ने भी नई विचारधारा का अनुसरण करते हुए गद्य को अधिक महत्त्व दिया। शायद यही वजह रही हो कि  बंगला कविता पर इन पत्रिकाओं में कोई विशेष चर्चा नहीं हुई है। ‘कल्पना’ के मई 1956 के अंक में ‘बांग्ला  कविता’ पर रवीन्द्रनाथ देव का लेख प्रकाशित हुआ था। प्रस्तुत लेख में आरंभिक युग से लेकर आधुनिक युग तक के बांग्ला  कविता के स्वरुप का विवेचन किया गया है।  बौद्ध भिक्षु के चर्या पदों से लेकर जीवनानंद दास की स्वछन्द कविता तक किस प्रकार बांग्ला  कविता का रूप परिवर्तित होता गया इसका संक्षेप में विवेचन किया गया है। इसके अतिरिक्त ‘उत्कर्ष’, नयी धारा, लहर जैसी पत्रिकाओं ने अपने कुछ अंकों में समसामयिक मुद्दों पर बंगाली कविताओं को प्रकाशित किया है। इन पत्रिकाओं में प्रकाशित बंगला कवितायें मुख्य रूप से तत्कालीन राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों का विवेचन करती हुई दिखाई देती हैं। ‘नई धारा’ के दिसम्बर

1967 के अंक में त्रिदिब मित्र की एक लम्बी कविता ‘हत्याकांड’ प्रकाशित हुई थी। दरअसल सन् 60 के दशक में हंगरी जेनरेशन मूवमेंट ने बंगला संस्कृति एवं साहित्य की तस्वीर को कुछ समय के लिए पूरी तरह से बदल कर रख दिया था। त्रिदिब मित्र भी इस आन्दोलन के सक्रिय प्रचारकर्ताओं में से एक थे। उनकी यह कविता तत्कालीन समय के विभिन्न अंतर्विरोधों को अपने में समेटे हुए है। राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों का केवल ज़िक्र भर ही नहीं है बल्कि आधुनिक मनुष्य  उनमें किस तरह फंसा हुआ है इसका विस्तार से उल्लेख किया गया है। स्वार्थ,लालच,भय, क्रोध,प्रेम इन सबके बीच पिसते हुए मनुष्य का चित्रण इस कविता का केंद्रीय बिंदु है। आधुनिक युग का मनुष्य इतना हताश और निराश हो गया है कि वह अपनी हत्या अपने ही हाथों से करना चाहता है लेकिन मृत्यु भी मनुष्य के इस स्वरुप को देखकर भाग खड़ी होती है –

“मुझे बार–बार ज़िन्दगी से फिसल कर ज़िन्दगी के फंदे में

फंसना पड़ रहा है

मृत्यु केवल मेरे साथ प्रतारणा कर रही है………

अस्वाभाविक मृत्यु भी मेरे डर से फरार होकर भाग रही है

क्योंकि मैं सरल आँखों से मृत्यु के पास गया था

डर से उसकी आँखें सिकुड़ गयीं थीं

अंधी आँखों से सिर झुकाकर वह रो पड़ी थी।”16.

आज के मनुष्य के समक्ष सबसे बड़ी दुविधा है उसका डर। वह डर जिसके कारण वे अपनी आत्मा की आवाज़ को अनदेखा कर देता है, वह डर जिसकी वजह से वे स्वतंत्र होकर भी पराधीनों की ज़िन्दगी जीता है। इस डर ने इंसान को इतना कुत्सित बना दिया है कि वह अपने आप का सामना नहीं कर पाता-

“स्वाधीनता के हाथ पर कोई हाथ नहीं रख पा रहा है डर से

ओह मेरे और सभी के बीच में तैयार हो रही है –

एक लम्बी, गहरी खाई………….

सारे शरीर छानबीन कर आत्मा ढूंढे नहीं मिल रही है

 

मैं एक बार भी अपनी ओर मुड़कर नहीं देख पा रहा हूँ।”17.

हंगरी जेनरेशन मूवमेंट से प्रभावित यह कविता बँगला साहित्य में आये बदलाव को भली-भांति प्रतिपादित करती है। सन् 60 के बाद की कविता का ध्येय केवल भारी-भरकम शब्दों के माध्यम से काव्यात्मकता का निरूपण करना नहीं था बल्कि एक ऐसी सच्चाई से मनुष्य को वाकिफ करवाना था जिससे वो कोसों दूर है। ज़ाहिर है कि बांग्ला  कवियों ने पूरी ईमानदारी के साथ अपने इस दायित्व को निभाया है।

 निष्कर्ष–       उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि हिंदी की लघु पत्रिकाओं ने बंगला साहित्य को केवल अपनी पत्रिकाओं में प्रकाशित ही नहीं किया बल्कि बंगला साहित्य को समझने की एक नयी दृष्टि भी प्रदान की है। हालाँकि अधिकतर लघु पत्रिकाओं में समकालीन बंगला कहानी को ही अधिक प्रश्रय दिया गया है, फिर भी बंगला साहित्य में होने वाले नए प्रयोगों और लेखकों के नयी विचारधारा की जो तस्वीर सामने आती है वह निश्चित रूप से हिंदी साहित्य के वर्तमान और भविष्य के लिए मार्ग प्रशस्त करती है।

संदर्भ –

  1. संपा- देवड़ा,शरद.( नवम्बर-1971). ‘अणिमा’,कलकत्ता , वर्ष-7, ‘बांग्लादेश कथा विशेषांक’,पृष्ठ संख्या-20.
  2. वही,पृष्ठ संख्या -27
  3. वही,पृष्ठ संख्या -35
  4. वही,पृष्ठ संख्या – 41- 42
  5. वही,पृष्ठ संख्या – 44.
  6. वही,पृष्ठ संख्या – 129.
  7. वही,पृष्ठ संख्या – 133.
  8. संपा – उपाध्याय,गोपाल, उपाध्याय,घनानंद.( मार्च –अप्रैल, 1971). ‘उत्कर्ष’,लखनऊ, वर्ष -12, अंक -3-4, ‘सात समंदर :दस दिगंत बंगलादेश’ , पृष्ठ संख्या -25.
  9. वही,पृष्ठ संख्या -27.
  10. वही,पृष्ठ संख्या -26.
  11. वही,पृष्ठ संख्या -27
  12. संपा-सिंह,महीप, बग्गा,कुलदीप.(अप्रैल –जुलाई ,1967). ‘संचेतना -3’,दिल्ली, ‘आज की बंगला कहानी’, पृष्ठ संख्या :- 65-66-67.
  13. संपा- शर्मा, डॉ.आर्येन्द्र. (फ़रवरी -1953). ‘कल्पना’, हैदराबाद, वर्ष-4, अंक-2, पृष्ठ संख्या -164.
  14. संपा-सिंह,महीप, बग्गा,कुलदीप.(अप्रैल –जुलाई ,1967). ‘संचेतना -3’, ‘आज की बंगला कहानी’, पृष्ठ संख्या :-73- 74
  15. वही, पृष्ठ संख्या -68.
  16. संपा- सिंह,उदयराज.(दिसम्बर 1967 – जनवरी 1968) ‘नई धारा’,पटना, ‘हत्याकाण्ड –त्रिदिब मित्र’, वर्ष -18, अंक :- 9-10, पृष्ठ संख्या, 23.
  17. वही, पृष्ठ संख्या – 26.

ARTICLE ON ADAM GONDVI…WRITER- VEENA BHATIA

0

लेखिका: वीणा भाटिया
स्रोत: जनकृति पत्रिका
रिकॉर्डिंग: कुमार गौरव मिश्रा
वीडियो सम्पादन: नीरज छिलवार
विश्वहिंदीजन- http://www.vishwahindijan.blogspot.in