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ग्वालियर के तोमर शासनकालीन ऐतिहासिक महल:डॉ.  आनन्द कुमार शर्मा

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ग्वालियर के तोमर शासनकालीन ऐतिहासिक महल

डॉ.  आनन्द कुमार शर्मा
09926292034, 09074606019                                                                 anand.dr64@gmail.com

शोध सार

तोमर राजवंश की स्थापना चैदहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुई। वीरसिंहदेव ने ग्वालियर के तोमर राजवंश की स्थापना की थी। ग्वालियर के तोमर राजवंश के सर्वाधिक प्रतापी शासक डुंगरसिंह एवं मानसिंह तोमर थे। मानसिंह तोमर ने मान मंदिर एवं गूजरी महल जैसे राजमहलों का निर्माण करवाया। जोकि, हिन्दु स्थापत्य कला के अद्वितीय नगीने है। विक्रम महल का निर्माण राजा मानसिंह तोमर के पुत्र विक्रमादित्य ने करवाया था। कर्ण महल का निर्माण ग्वालियर के तोमर शासन कीर्ति सिंह द्वारा करवाया गया था।

बीज शब्द: ग्वालियर, राजवंश, मंदिर, स्थापत्य

शोध विस्तार

            ग्वालियर के तोमर राजवंश की स्थापना चैदहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुई। वीरसिंहदेव ने ग्वालियर के तोमर राजवंश की स्थापना की थी। ग्वालियर के तोमर राजवंश के सर्वाधिक प्रतापी शासक डुंगरसिंह एवं मानसिंह तोमर थे। ग्वालियर के तोमर राजवंश का अंतिम शासक विक्रमादित्य 1526 ई॰ में पानीपत के प्रथम युद्ध में मारा गया। इस प्रकार ग्वालियर के तोमर राजवंश का ग्वालियर क्षेत्र पर सोलहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक शासन रहा। ग्वालियर के तोमर शासनकालीन ऐतिहासिक महलों में मान मंदिर, गूजरी महल, विक्रम महल एवं कर्ण महल है। ग्वालियर के तोमर राजवंश में ऐतिहासिक महलों के निर्माण का श्रेय सर्वप्रथमतः मानसिंह तोमर को जाता है। मानसिंह तोमर ने मान मंदिर एवं गूजरी महल जैसे राजमहलों का निर्माण करवाया। जोकि, हिन्दु स्थापत्य कला के अद्वितीय नगीने है। विक्रम महल का निर्माण राजा मानसिंह तोमर के पुत्र विक्रमादित्य ने करवाया था। कर्ण महल का निर्माण ग्वालियर के तोमर शासन कीर्ति सिंह द्वारा करवाया गया था।1

मान मंदिर:-

                        ग्वालियर के किले पर स्थित मान मंदिर अपने अद्भुत शिल्प और स्थापत्य के लिए जाना जाता है। इसका निर्माण मानसिंह तोमर ने करवाया था। मान मंदिर ग्वालियर के शासक मानसिंह तोमर का राजप्रासाद था। मान मंदिर चार मंजिला भवन है, जिसमें दो मंजिलें भूमिगत है। महल आयताकार है, इसकी लम्बाई उत्तर से दक्षिण की ओर 300 फीट व चैड़ाई पूर्व से पश्चिम की ओर 160 फीट लगभग है। इसके पूर्वी एवं दक्षिणी भाग की दीवारों को तराशे हुए प्रस्तरों की सहायता से निर्मित किया गया है। दीवारों के मध्य को अर्धगोलाकार मीनारों, गवाक्षों, छज्जों, जलियों, झिलमिली, तोरणों, छतरियों व गोखों से सज्जित किया गया है।2

            मान मंदिर की मीनारों के शीर्ष पर बनी छतरियों के गोल गुम्मदाकार छत को मानसिंह द्वारा तांबे की पतरों से ढका गया था, जिस पर स्वर्ण पत्र लगे हुए थे, दूर से ये स्वर्णमयी आभा देने वाले मंदिर के स्वर्ण कलशों का आभास देते थे, यही कारण है, कि इसे मान महल न कहकर मानमंदिर कहना जनसाधारण को रूचिकर लगा होगा। मानमंदिर की सम्पूर्ण बाहरी एवं आन्तरिक दीवारों को पत्थर की खुदाई कर कई प्रकार की आकृतियों, पृष्पाकृति बनाई गई थी, जिनमें रंग बिरंगा मीना भरा गया था। विशेषतः बाहरी दीवारों पर तोरण, स्तम्भ, केले के वृक्ष, हाथी, सिंह, मयूर, हंस, वानर, चवंरधारी आदि आकृतियों को पत्थर में उकेर कर लाल, हरे, पीले, नीले, सफेद एवं काले मीने के रंगों से सजाया गया था, आज लगभग पाँच सौ वर्ष बीत जाने के बाद यहां मौजूद रंग उतने ही चटक एवं भव्य हैं।3

            मान मंदिर के भवन के भीतरी भाग में दो विशाल चैक हैं, जिनके चारों ओर दो मंजिले कक्ष बने हुए हैं, ऊपर का कक्ष गवाक्ष व जालियों युक्त हैं, जो संभवतः रानियों के आवास के रूप में प्रयुक्त किये जाते रहे होंगे। महल के आन्तरिक कक्ष स्थापत्य कला एवं प्रयोगात्मक प्रकृति के उच्चकोटि के उदाहरण प्रस्तुत करते है। भवन के निचले भाग में एक मन्जिल को ’हिड़ोला कक्ष’ कहते हैं, व दूसरे तल को ’जौहर कक्ष’ कहा जाता है, प्रथम कक्ष आमोद प्रमोद हेतु तथा दूसरा राजकीय महिलाओं के जौहर, सामूहिक अग्निदाह के प्रयोग हेतु था। मानसिंह के शासन के उपरान्त इन तलघरों का प्रयोग मुगल काल में राजनैतिक कैदियों को कैद करने व फांसी देने हेतु किया जाता रहा था। मानसिंह के प्रत्येक कक्ष व तल पर शुद्ध एवं ताजी हवा एवं प्रकाश की उत्तम व्यवस्था की गई है।

             भवन की जल प्रदाय एवं निकासी प्रणाली भी अद्भुत है, जो उस समय के उच्च कोटि के भवन स्थापत्य व विज्ञान का सुंदर संगम है। मानमंदिर के प्रत्येक कक्ष व तल पर शुद्ध एवं ताजी हवा एवं प्रकाश की उत्तम व्यवस्था की गई है। भवन की जल प्रदाय एवं निकासी प्रणाली भी अद्भुत है, जो उस समय के उच्च कोटि के भवन स्थापत्य व विज्ञान का सुंदर संगम है। वर्तमान में यहां पर सायंकाल में आयोजित ध्वनि एवं प्रकाश कार्यक्रम के दौरान कई रंगों में जब प्रकाश किया जाता है, तब ऐसा प्रतीत होता है मानों राजा मानसिंह की कल्पना स्वप्न लोक में विचरण कर ही है।4

गूजरी महल:-

                        ग्वालियर के किले में निर्मित गूजरी महल मध्यकालीन हिन्दू स्थापत्य कला की अद्भुत इमारत है। गूजरी महल का निर्माण राजा मानसिंह (1486 – 1516 ई0) ने 1494 ई॰ में  करवाया था। गूजरी महल लगभग 300 फीट लम्बा और 230 फीट चैड़ा है। मानसिंह तोमर ने गूजरी महल का निर्माण अपनी प्रिय रानी मृगनयनी के लिए करवाया था। चूँकि रानी गुर्जर जाति से थी, इसीलिए उन्हें गूजरी कहते थे और उनके लिए बनवायी गयी इमारत ’गूजरी महल’ कहलायी। ग्वालियर के किले में गूजरी महल पूर्व की दिशा में किले के बादलगढ़ प्रवेश द्वार के पास स्थित है। गूजरी महल की तीन मंजिला आकार की विशाल इमारत है। गूजरी महल में प्रवेश कर सीड़ियों द्वारा ऊपर चढ़ने के बाद आयताकार विशाल खुला प्रांगण है, जिसके चारों ओर विभिन्न आकार – प्रकार के कक्ष बने हुए हैं।

                                    गूजरी महल की बाहरी दीवारें तराशे हुए प्रस्तर खण्डों से निर्मित हैं, जिन पर कई प्रकार की पच्चीकारी की गई है, इन दीवारों पर दो मन्जिले गवाक्ष युक्त कक्ष बने हुए हैं, जिनकी बाहरी दीवारों को विभिन्न प्रकार की रंगों की मीनाकारी से सजाया गया है। गुजरी महल के उत्तरी एवं दक्षिणी द्वारों को वृहत आकार के पत्थर के हाथियों से सजाया गया है। दक्षिण दिशा के सभी कक्ष विशिष्ट स्थापत्य शैली के हैं, अतः ऐसा प्रतीत होता है, कि संभवत ये कक्ष

राज परिवार के प्रयोग में लाये जाते होंगे, व शेष अन्य परिचारिकाओं हेतु रहे होगें।5 वर्तमान में गूजरी महल ’राज्य संग्रहालय’ बना हुआ है।

विक्रम महल:-

                        ग्वालियर के किले में निर्मित विक्रम महल मध्यकालीन हिन्दू स्थापत्य कला की शानदार इमारत है। विक्रम महल ग्वालियर के किले में मान मंदिर के पास स्थित हैं। दो मंजिला विक्रम महल का निर्माण राजा मानसिंह तोमर के पुत्र विक्रमादित्य ने करवाया था। राजा मानसिंह के ज्येष्ठ पुत्र विक्रमादित्य का निवास होने और विक्रमादित्य द्वारा निर्मित होने के कारण यह महल विक्रम महल के नाम से विख्यात हो गया। विक्रम महल लगभग 212 है। विक्रम महल में 12 दरबाजों का खुला बरामदा है। विक्रम महल दो मंजिला है, ऊपरी कक्ष की छत गुम्मदाकार है, जिसके शीर्ष पर एक चैकोर छतरी बनी है व इसके चारों कोनों पर चार अन्य लघु आकार की छतरियां बनाई गई हैं, भवन के शीर्ष भाग को इस प्रकार की छतरियों से सज्जित करना ग्वालियर स्थापत्य की एक प्रमुख विशेषता है।6

                        प्रथम तल पर एक विशाल कक्ष बना है, जिसके दोनों छोरों पर दो मध्यम आकार के कक्ष बने हैं। भवन का स्थापत्य अत्यधिक सादगी पूर्ण है। इस भवन का उल्लेख बाबर ने अपनी आत्म जीवनी ’’बाबर नामा’’ में किया है, वह लिखता है, कि इस अंधकार युक्त भवन में उसने रौशनी हेतु कई सुधार करने के निर्देश भी दिये थे। वह आगे लिखता है, कि यह भवन एक गुप्त मार्ग से मानमंदिर से मिला हुआ था।7

कर्ण महल:-

                        ग्वालियर के किले में निर्मित कर्ण महल मध्यकालीन हिन्दू स्थापत्य कला की शानदार इमारत है। कर्ण महल ग्वालियर के किले में मान मंदिर के पास पश्चिम की ओर स्थित हैं। कर्ण महल को कर्ण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। कर्ण महल का निर्माण ग्वालियर के तोमर शासन कीर्ति सिंह द्वारा करवाया गया था। कीर्ति सिंह का दूसरा नाम कर्ण सिंह था। इसीलिए इस भवन को कर्ण महल की संज्ञा दी गयी।8 यह एक विशाल चार मंजिला भवन है, भवन का स्थापत्य किसी भी दृष्टि से किसी आधुनिक भवन स्थापत्य शैली से कम नहीं है, जो इस बात का प्रतीक है, कि उस काल में स्थापत्य विज्ञान बहुत अधिक विकसित था। कर्ण महल लगभग 200 फीट लम्बा और 35 फीट चैड़ा है।9

                        कर्ण महल में सभी सुख – सुविधाओं का ध्यान रखा गया है। मान मंदिर के विपरीत इसकी आन्तरिक एवं बाहरी दीवारों पर मोटे चूने का पलस्टर किया गया है, जिसमें कहीं कही सुंदर रंगों की मीनाकारी भी की गई है। भवन की सुंदरता को बढ़ाने हेतु लाल पत्थर के कलात्मक पैनलों का प्रयोग भी किया गया है। इस भवन में ग्वालियर झिलमिली, झरोखों, छतरियों आदि का यथा स्थान प्रयोग कर इसकी सुंदरता को बढ़ाने के प्रयास किये गये हैं। भवन का स्थापत्य बहु आयामी है।10

सन्दर्भ ग्रंथ सूची

  1. 1. सिंधिया, बलबंत राव भैयासाहेब – हिस्ट्री ऑफ दि फोट्र्रेस ऑफ ग्वालियर, बंबई, 1892, पृ॰ 17, शर्मा, आर॰ के॰ – मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के पुरातत्व का संदर्भ             ग्रंथ, भोपाल, 2010, पृ॰ 117 -119
  2. 2. चक्रवर्ती, के॰ के॰ – ग्वालियर फोर्ट, नई दिल्ली, 1984, पृ0 33-35, द्विवेदी, एस॰      के॰ एवं मधुबाला कुलश्रेष्ठ – ग्वालियर, भोपाल, 2011, पृ0 385
  3. 3. चक्रवर्ती, के॰ के॰ – ग्वालियर फोर्ट, नई दिल्ली, 1984, पृ0 33-35, मजपुरिया, संजय – ग्वालियर का इतिहास और दर्शनीय स्थान, ग्वालियर, 1991, पृ0 05 – 09
  4. 4. चक्रवर्ती, के॰ के॰ – ग्वालियर फोर्ट, नई दिल्ली, 1984, पृ0 33-35, मजपुरिया,           संजय – ग्वालियर का इतिहास और दर्शनीय स्थान, ग्वालियर, 1991, पृ0 05 – 09
  5. 5. शर्मा, वी॰ के॰ – ग्वालियर एवं पश्चिमी बुंदेलखण्ड के दुर्ग एवं गढ़ियाँ, बरेली, 2013, पृ0 58, द्विवेदी, एस॰ के॰ एवं मधुबाला कुलश्रेष्ठ – ग्वालियर,         भोपाल, 2011, पृ0 407 – 10
  6. 6. चक्रवर्ती, के॰ के॰ – ग्वालियर फोर्ट, नई दिल्ली, 1984, पृ0 28-29
  7. 7. शर्मा, वी॰ के॰ – ग्वालियर एवं पश्चिमी बुंदेलखण्ड के दुर्ग एवं गढ़ियाँ, बरेली,    2013, पृ0 59, द्विवेदी, एस॰ के॰ एवं मधुबाला कुलश्रेष्ठ – ग्वालियर,         भोपाल, 2011, पृ0 386
  8. 8. सक्सेना, चैतन्य – ग्वालियर के स्मारक, भोपाल, 2002, पृ0 17 – 18
  9. 9. चक्रवर्ती, के॰ के॰ – ग्वालियर फोर्ट, नई दिल्ली, 1984, पृ0 28
  10. 10. शर्मा, वी॰ के॰ – ग्वालियर एवं पश्चिमी बुंदेलखण्ड के दुर्ग एवं गढ़ियाँ, बरेली,         2013, पृ0 58-59, द्विवेदी, एस॰ के॰ एवं मधुबाला कुलश्रेष्ठ –           ग्वालियर, भोपाल,            2011, पृ0 385

संघर्ष की दास्तान वाया थर्ड जेन्डर: डॉ0 आलोक कुमार सिंह

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संघर्ष की दास्तान वाया थर्ड जेन्डर

डॉ0 आलोक कुमार सिंह 
सहायक प्राध्यापक-हिन्दी विभाग
अटल बिहारी वाजपेई नगर निगम
डिग्री कॉलेज , लखनऊ

शोध सार

समाज का अंग होकर भी अपने अधिकारों से वंचित और अपनी अस्मिता के लिए संघर्षत किन्नर समाज आज भी प्रमुखता से चर्चा के केंद्र में नहीं है। इन्हें ‘तीसरी दुनिया’ ‘थर्ड जेंडर’ या ‘हिजड़े’ इत्यादि कई रूप में समाज जानता और पहचानता है। यह वर्ग पुरातनकाल से उपेक्षित रहा है। तब से अब तक इनके संघर्ष का कोई अंत नहीं रहा है। बात की जाए तो उसे समाज का दर्पण कहा जाता है जैसा समाज में घटता है साहित्य उसकी अभिव्यक्ति विभिन्न स्वरों में करने की क्षमता रखता है। लेकिन इस तीसरी सत्ता की बात आते ही साहित्य में भी मौन व्याप्त दिखाई देता है। अधिकारों और कर्तव्यों की लड़ाई की बात तो दूर है, उनकी मूलभूत आवश्यकताओं पर भी कम ही लिखा गया है। इधर कुछ समय से इस क्षेत्र में काफी काम हुआ है। साहित्य में इसकी आमद सुनी जा सकती है। कुछेक साहित्यकार हैं जिन्होंने बेबाकी से इस समाज के यथार्थ को हमारे सामने लाने का प्रयास किया है।

बीज शब्द: समाज, किन्नर, थर्ड जेंडर, विमर्श, साहित्य, अस्मिता, संघर्ष, कहानी, उपन्यास

शोध विस्तार     

            समाज के दो वर्गो में बंटे होने की परिकल्पना बहुत पुरानी है। यहाँ जन्म से ही वर्ग निर्धारण हो जाता है। यशपाल नें अपने उपन्यास ‘दिव्या’ में यह गंभीर प्रश्न उठाया था कि– ‘जन्म का अपराध..? यदि यह अपराध है तो इसका मार्जन किस प्रकार संभव है ? शस्त्र की शक्ति, धन की शक्ति, विद्या की शक्ति, कोई शक्ति जन्म को परिवर्तित नहीं कर सकती! कोई भी उपाय जन्म के अपराध का मार्जन नहीं कर सकता! जन्म के अपराध का प्रतिकार क्या मनुष्य दैव से ले?1 यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर मिलना सम्भव नहीं है। प्रथमदृष्टया तो यह दर्द निम्न वर्ण में जन्में पृथुसेन का है जो वर्ण व्यवस्था का शिकार होता है किन्तु यह जन्म की विडंबना तो हर उस व्यक्ति को झकझोरती है जो मुख्यधारा से इतर है। इसी धारा में वह वर्ग भी है जिसे समाज ‘तीसरी दुनिया’ ‘थर्ड जेंडर’ या ‘हिजड़े’ के रूप में जानता और पहचानता है। यह वर्ग पुरातनकाल से उपेक्षित रहा है। तब से अब तक इनके संघर्ष का कोई अंत नहीं रहा है।

            इनके संघर्ष और समस्याओं के बारे में सुधीश पचैरी ने कहते है कि यह ‘असामान्य लिंगी होने के साथ ही समाज के हाशियों पर धकेल दिए गए, इनकी सबसे बड़ी समस्या आजीविका है जो इन्हें अंततः इनके समुदाय में ले जाती है। ..अकेले अकेले बहिष्कृत ये किन्नर आर्थिक रूप से भी हाशिये पर डाल जाते हैं। ..नपुंसकलिंगी कहाँ कैसे जियेंगे? समाज का सहज स्वीकृत हिस्सा कब बनेंगे।’2 यह प्रश्न सदियों से हमारे सामने मुंह उठाये खड़ा है। साहित्य की बात की जाए तो उसे समाज का दर्पण कहा जाता है जैसा समाज में घटता है साहित्य उसकी अभिव्यक्ति विभिन्न स्वरों में करने की क्षमता रखता है। लेकिन इस तीसरी सत्ता की बात आते ही साहित्य में भी मौन व्याप्त दिखाई देता है। अधिकारों और कर्तव्यों की लड़ाई की बात तो दूर है, उनकी मूलभूत आवश्यकताओं पर भी कम ही लिखा गया है। इधर कुछ समय से इस क्षेत्र में काफी काम हुआ है। साहित्य में इसकी आमद सुनी जा सकती है। कुछेक साहित्यकार हैं जिन्होंने बेबाकी से इस समाज के यथार्थ को हमारे सामने लाने का प्रयास किया है। साहित्य की विविध विधाओं में यह प्रयास देखा जा सकता है। प्रदीप सौरभ का उपन्यास ‘तीसरी ताली’ इस दृष्टि से खूब चर्चित हुआ। इस विषय पर सबसे समृद्ध विधा कहानियों की रही है। अब तो हिंदी में ही नहीं बल्कि अन्य भाषाओं जैसे पंजाबी, गुजराती, बांग्ला, मारवाड़ी आदि में भी इस विषय पर कहानियां लिखी जा रही हैं। इन कहानियों में इस वर्ग के जीवन की कठिनाईयों का सजीव चित्रण मिलता है।

            यह संघर्ष व्यक्ति केन्द्रित न होकर एक पूरे वर्ग की है। बिंदा महराज (शिव प्रसाद सिंह), खलीक अहमद बूआ (राही मासूम रजा), बीच के लोग (सलाम बिन रजाक), संझा (किरण सिंह), त्रासदी (महेंद्र भीष्म), किन्नर (एस.आर. हरनोट), ई मुर्दन का गाँव (कुसुम अंसल), नेग (लवलेश दत्त), संकल्प (विजेंद्र प्रताप सिंह), हिजड़ा (श्री कृष्ण सैनी), रतियावन की चेली (ललित शर्मा) आदि कहानियां तीसरी दुनिया के यथार्थ को निरुपित करती हैं। अभी तक यह कहानियां संकलन के रूप में सामने नहीं आई थी, किन्तु हाल ही में वांग्मय पत्रिका नें अपने थर्ड जेंडर– कहानी विशेषांक द्वारा इन्हें समेकित किया है। इन कहानियों के अपने अलग यथार्थ और निहितार्थ हैं किन्तु सबका उद्देश्य एक ही है, तीसरी दुनिया के सत्य को सामने लाना और उनके संघर्ष को स्वर देना।

            ‘संकल्प’ कहानी में नया फलक पाठक के सामने आता है। हिजड़ों में भी एक अलग वर्ग बुचरा हिजड़ों का होता है, मेडिकल साइंस की सहायता से हिजड़े के अधूरे जीवन से पूर्णतः परिवर्तित होकर पूर्णत्व जीवन को प्राप्त कर सकते है। कहानी में गुरुमाई और माधुरी के माध्यम से इस तथ्य को कथा का रूप देते हुए सामने रखा गया है। यह बात जब माधुरी को पता चलती है कि वह भी समाज में एक बेहतर जीवन जी सकती है तो वह इस दिशा में प्रयास करना शुरू करती है। चूँकि समाज में अपमान और उपेक्षा झेल रहे इस समुदाय में कभी भी समाज के प्रति दृष्टिकोण नहीं बदला। ‘समाज से भी हिजड़ों को शिवाय दर्द और तकलीफ के क्या प्राप्त होता है। लाख कानून बन जाने के बाद भी क्या आज तक समाज में बड़ी जाति वाले आज तक नीची जाति के साथ अपने व्यवहार को बदल पाए। ऐसे में हिजड़ों के लिए नियम कानून बनाए जाने की जानकारी होने के बाद भी माधुरी को समाज से कोई भरोसा नहीं थाकृ। अधिकाँश लोग जानकारी के अभाव में चिकित्सक से बिना परामर्श लिए ही यह मान लेते हैं कि ये तो हिजड़ा है और कभी ठीक नहीं होगा परन्तु ऐसा नहीं है। हाँ इतना अवश्य है की बहुत से मामले ठीक न होने वाले होते हैं परन्तु बहुत से मामलों में ओपरेशन या प्लास्टिक सर्जरी के माध्यम से भी हिजड़ों को ठीक किया भी जा सकता है।’3

            ‘इज्जत के रहबर’ कहानी में इस वर्ग के जीवन की त्रासदी के साथ ही मानवीय संवेदनाओं का भी चित्रण मिलता है। यह वर्ग समाज के द्वारा भले ही हमेशा से उपेक्षा का शिकार होता आया है किन्तु इनके भीतर सामाजिकता की भावना सामान्य स्तर की ही होती है, तभी तो कहानी की मुख्य पात्र सोफिया कहती है– ‘हमारे भी कुछ उसूल है लालजी। लड़की की शादी में लड़की वालों से शगुन नहीं लेते, लड़के वालों से लेते हैं।… और जिनके यहाँ गमी हो जाती है उसके यहाँ साल भर तक नेग दस्तूर नहीं लेते। ..पहली लड़की होने पर जिद नहीं करते। ..गरीबों को कम पैसे में बक्श देते हैं।’ ‘लालजी हमारी संख्या तो ईश्वर बढाता है। खुदा न करे वह और अधिक संख्या बढ़ाए। हमें कितना कष्ट है इस योनि में होने का, ये तो हम ही जानती हैं।’4

            ‘पन्ना बा’ कहानी अत्यन्त मार्मिक है। यह कहानी कम और संस्मरण अधिक है। यह समाज की रूढ़ियों पर करारा व्यंग्य करती है। यह ज्वाजल्यमान प्रश्न आज भी हमारे समक्ष मुंह उठाये खड़ा है कि ‘अगर यह वरदान कि ‘किन्नर की दुआ की कोई होड़ नहीं और उसकी बद्दुआ का कोई तोड़ नहीं’ उनके साथ नही होता तो प्रकृति के इस अभिशाप को झेलता यह वर्ग किस तरह जिंदा रहता।’ लेखिका का आक्रोश समाज और उसकी व्यवस्था के विरुद्ध है वह लिखती है– ‘मेरा मन दुःख और क्रोध से जल रहा थाद्य मृत्यु स्वाभाविक दुःख देती है और क्रोध इसलिए कि मैं भी चाहती थी कि उसकी लाश पर जूते बरसा कर मै भी उसे किन्नर के जन्म पर धिक्कारू। और शायद वह मेरे जूतों की बौछार से डर कर अगले जन्म में किन्नर के रूप में पैदा होने की हिमाकत न करे ।’5

            सलाम बिन रजाक की एक प्रतीकात्मक कहानी है ‘बीच के लोग’। यह कहानी व्यंग्यात्मक तरीके से सामाजिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न उठाती है। कहानी में हिजड़ों की एक टोली का जुलूस निकल रहा है, उन्हें रोकने में पुलिस प्रशासन के लिए एक चुनौती बन जाता है। शहर एस.पी. कहते हैं–‘स्त्रियों और हिजड़ों में क्या अंतर है।’ तो उत्तर लेडी कांस्टेबल देती है और कहती है– ‘सर! यों देखा जाये तो पुरुषों और हिजड़ों में भी कोई विशेष अंतर नहीं होता है।’6 अर्थात यह पूरा समाज ही अपने मूल रूप में हिजड़ों की प्रवृत्ति को धारण किये हुए है।

            ‘संझा’ इस दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है, जिसे किरण सिंह नें लिखा है। यह एक लम्बी कहानी है। जिसकी मुख्य पात्र संझा है। संझा एक हिजड़ा है। वह दो लिंगो के बिन्दुओं का मध्य है, इसी कारण उसका नाम संझा रखा जाता है। यह कहानी इस वर्ग की यातना को बहुत ही मनोविज्ञानिक ढंग से व्यक्त करती है। ‘हिजड़ा’ कहानी भी हिजड़ो की संवेदना को दर्शाती है। जिसमें रजिया नाम के एक हिजड़े नें एक अनाथ को पाल–पोस कर न केवल बड़ा करता है बल्कि पढ़ा–लिखा कर उसे आई.एस. भी बना देता है। यह सभी कहानियाँ इस समानांतर दुनिया का जीता जागता दस्तावेज हैं।  ‘खुश रहो क्लिनिक‘ कहानी में किन्नर संतति को सामाजिक रूप से स्वीकार न कर पानें का दंश है। समाज की परम्पराएं व मान्यताएं ऐसी हैं जिसे मानने के लिए हम आदिम काल से बाध्य है। कहानी का मुख्य पात्र ऋषि एक किन्नर है। उसका पिता बचपन से ही उससे नफरत करता है और मौका मिलते ही परिवार से छुप कर उसे किन्नरों के यहाँ भिजवा देता है। उसका बचपन बहुत कष्ट में बीतता है।

            इन कहानियों के पात्रों का अध्ययन करते हुए एक बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि अधिकाँश किन्नर घोर आस्तिक होते हैं और सदियों से चली आ रही परम्पराओं का शिद्दत से पालन करते हैं। बिंदा महराज, खलीक अहमद बुआ, पार्वती, संझा, सुन्दरी आदि अनेक उदाहरण हैं। सभी कहानियों में भारतीय समाज की परम्परागत कुत्सित सोच दिखाई देती है जो सदियों से लेकर आज भी अपनी संकीर्ण सोच से उबार नहीं पायी। यह वर्ग हमारे समाज का अभिन्न अंग है फिर भी समाज का हर वर्ग इस को हिकारत से देखता है और मनोरंजन से अधिक और कुछ नहीं समझता है। भले ही साहित्य में थर्ड जेंडर पर लेखन अभी प्रारम्भिक अवस्था में है, लेकिन ये कहानियाँ बड़ी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराती हैं। यह कहानियाँ व्यवस्था के विरुद्ध प्रश्न खड़े करती हैं और इस वर्ग की मूलभूत आवश्यकताओं को उजागर करती है। जिस समाज में इन्हें हेय द्रष्टि से देखा जाता रहा है, उसी समाज के बरक्स साहित्य में इनकी व्यथा कथा को स्वर देना, बहुत बड़ी उपलब्धि है। ये कहानियां समाज की सोच को बदलने का एक नया नजरिया विकसित करती है ।

सन्दर्भ–

  • दिव्या–यशपाल, लोक भारती प्रकाशन इलाहाबाद, पृ–21
  • तीसरी ताली– प्रदीप सौरभ–वाणी प्रकाशन, कवर पेज
  • डॉ0 एम. फीरोज खान, थर्ड जेन्डरःहिन्दी कहानियां, संकल्प–विजेंद्र प्रताप सिंह, अनुसंधान पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, कानपुर, 2017, पृ0-133
  • वही, इज्जत के रहबर–डॉ0 पद्यमा शर्मा, पृ0-92,95
  • वही, पन्ना बा–गरिमा संजय दुबे, पृ0-1213-
  • वही, बीच के लोग–सलाम बिन रजाक, पृ0- 38

किन्नर जीवन : एक दर्द भरा दास्तान-पूजा सचिन धारगलकर

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किन्नर जीवन : एक दर्द भरा दास्तान

पूजा सचिन धारगलकर
इ.डब्ल्यू.एस 247,
हनुमान मंदिर के पास,
हाउसिंग बोर्ड रुंमदामोल दवर्लिम सालसेत (गोवा) -403707
संपर्क – 9356437855
ईमेल- pujadhargalkar7@gmail.com  

शोध सार

स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श, दलित विमर्श, किसान विमर्श, बाल विमर्श लेकिन किन्नर विमर्श यह ज्वलंत विषय ही और इसी विषय के जरिए हम उनके दुख को काम तो नहीं कर सकते लेकिन हम इससे रूबरू अवश्य होंगे। किन्नर समाज जिसके साथ बिल्कुल उपेक्षित सा व्यवहार किया जाता है, उपहास उड़ाया जाता है, उसको आज सम्मान की दरकार है। वे आम आदमी की तरह जीने का अधिकार रखते हैं। आज साहित्य उनकी पीड़ा की अभिव्यक्ति के लिए तरस रहा है, किंतु उसको उचित अभिव्यक्ति नहीं मिल पा रही है।

बीज शब्द: किन्नर, विमर्श, समाज, सम्मान, अधिकार

शोध विस्तार:

‘किन्नर’ नाम सुनते ही आपके दिमाग में अवश्य लज्जा का भाव आया होगा। लेखन तो दूर, नाम लेने मात्र से लोग कतराते हैं। शायद आपने भी यह भाव महसूस किया हो। ‘किन्नर’ शब्द सुनते ही हमारे मस्तिष्क में एक मनोग्रन्थि बन जाती है। ‘किन्नर’ शब्द पर मैंने इसलिए विशेष ज़ोर दिया ताकि आपका ध्यान आकर्षित हो सके और आप इस शब्द से परे जाकर सोचने और समझने की दृष्टि उत्पन्न कर सके। किन्नर समाज जिसके साथ बिल्कुल उपेक्षित सा व्यवहार किया जाता है, उपहास उड़ाया जाता है, उसको आज सम्मान की दरकार है। वे आम आदमी की तरह जीने का अधिकार रखते हैं। आक उनकी व्यथा-कथा, समस्याएँ, उपेक्षा और तकलीफ से हमारे समाज को रूबरू होने की अवश्यकता है। उनको भी समाज की मुख्य धारा, मुख्य समाज में रहने, जीने का अधिकार है। आज साहित्य उनकी पीड़ा की अभिव्यक्ति के लिए तरस रहा है, किंतु उसको उचित अभिव्यक्ति नहीं मिल पा रही है।

सामाजिक पूर्वाग्रह से युक्त हमारा तथा-कथित समाज इस प्रजाति को हेय और गृणित दृष्टि से देखता है। ऐसे कई अवसर आते हैं, जब उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखा जाता है। चाहे विद्यालय हो, प्रशिक्षण संस्थान हो या फिर नौकरी देने की बात हो, उनके साथ उपेक्षित व्यवहार किया जाता है। हमारे गरिमामय भारतीय संविधान में इस बात का साफ-साफ उल्लेख है कि जाति, धर्म, लिंग के आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा। लेकिन फिर भी इन लोगों के साथ यह भेदभाव क्यों किया जाता है।  

 इस संसार में नर-नारी के अलावा और भी एक अन्य वर्ग है जो न पूरी तरह नर होता है और न नारी होते है, जिसे लोग ‘हिजड़ा’, ‘किन्नर’ या फिर ‘थर्ड जेंडर’ के नाम से भी जानते है। ‘हिजड़ा’ जिनके बारे में जानने की उत्सुकता हमेशा लोगों के अंदर होती है। शास्त्र की बात करे तो ऐसा माना जाता है की किन्नर की पैदाइश अपने पूर्व जन्म के गुनाहों की वजह से होती है।

वैसे देखा जाए तो सभी नाम एक दूसरे के पृथक है या कहे की समानांतर है। फिर भी अध्ययन करने पर उसमें भेद किया जा सकता है। किन्नर एक जाति का भी नाम है जो हिमालय के कनौर प्रदेश (हिमवत और हेमकूटी) में रहते हैं। उनकी भाषा ‘कनौरी’ है। “हिजड़ा उर्दू शब्द है और किन्नर हिन्दी शब्द है। आज के समय में सरकार एवं सामाजिक संगठन ने इसे ‘ट्रांसजेंडर’ नाम दिया है यानि की तीसरा लिंग अर्थात तृतीय प्रकृति के लोग। हर राज्य में उन्हें अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है जैसे ‘तेलगु-नपुंसकुडु, कोज्जा या मादा, तमिल – थिरु नंगई, अरावनी, अंग्रेजी में – Eunuch / Hermaphrodite / LGBT, गुजरती-पवैय्या, पंजाबी – खुसरा, कन्नड-जोगप्पा भारत के अन्य जगह पर हिजरा, छक्का, किन्नर, खोजा, नपुंसक, थर्डजेंडर आदि”1।  

वैसे इनका इतिहास काफी पुराना है रामायण महाभारत के समय से हिजड़ों का इतिहास चला आ रहा है। रामचरितमानस में भी किन्नरों का उल्लेख मिलता है। वनवास जाते समय श्री राम अपने पीछे आए छोटे भाइयों सहित सभी स्त्री एवं पुरुष वापस लौट जाने के लिए कहते हैं। आदेश का पालन करते हुए सभी स्त्री एवं पुरुष वापस अयोध्या लौट आने को कहते हैं, किन्तु मध्य लिंगी अर्थात हिजड़े वापस नहीं लौटते। 14 वर्षों के बाद वनवास से वापस लौटते समय श्रीराम ने उनसे वहाँ रुके रहने का कारण पूछा, तन श्रीराम के कथन को किन्नरों ने स्पष्ट किया कि प्रभु आपने नर और नारी को वापस जाने की अनुमति दी थी, किनती हमारे संबंध में कोई आदेश नहीं किया था। इस प्रसंग का उल्लेख रामचरितमानस में तुलसीदासजी करते हैं –

“जथा जोगु करि विनय प्रनामा, बिदा किए सब सानुज रामा।

नारि पुरुष लघु मध्य बडेरे, सब सनमानि कृपानिधि फेरे॥

इसका उल्लेख ‘किन्नर कथा’ उपन्यास में महेंद्र भीष्म ने भी किया है। कहा जाता है कि हिजड़ों की इस निश्चल एवं निस्वार्थ भक्ति भावना को देखकर श्रीराम ने उन्हें वरदान किया कि कलयुग में तुम्हारा ही राज होगा और तुम लोग जिसको भी आशीर्वाद दोगे, उसका अनिष्ट नहीं होगा। रामचरितमानस में ही श्रीराम की भक्ति के संबंध में पात्रता का उल्लेख करते हुए लिखा कि –

पुरुष नपुंसक नारि वा, जीव चराचर कोई।

सर्व भाव भज कपत तजि, मोहि परम प्रिय सोई॥

अर्थात चराचर जगत में कोई भी जीव हो, चाहे वह स्त्री, पुरुष, नपुंसक, देव, दानव, मानव तिर्यक इत्यादि हो। अगर वह सम्पूर्ण कपट को त्यागकर मुझे भजता है, वह मुझे प्रिय है। रामायण काल में किन्नर वर्ग की विशेष उपस्थिती थी।

महाभारत में किन्नर के रूप में शिखंडी तथा बृहन्नला (अर्जुन) का उल्लेख मिलता है। अर्जुन ने शिखंडी को ढाल बनाकर ही भीष्म पितामह का वध करने में सफलता पायी थी। शिखंडी को सामने देखकर भीष्म पितामह ने कहा कि वह एक नपुंसक से युद्ध नहीं कर सकते और अपने शस्त्र नीचे डाल दिए थे”2। 

मुगल काल में राजा युद्ध जाने पर रानियों की देखभाल किन्नर करते थे। पहले कभी उनका अनादर नहीं हुआ। पौराणिक ग्रन्थों, वेदों, पुराणों और साहित्य तक भी किन्नर हिमालय के क्षेत्र में बसने वाली अति प्रतिष्ठित व महत्त्वपूर्ण आदिम जाति हैं।

किन्नर की शव यात्रा रात्री के समय निकलती है, किन्नर मुर्दों को जलाया नहीं जाता बल्कि उन्हें दफ़नाया जाता है। चौका देने वाली बात यह है कि वह किसी दूसरे किन्नर से नहीं बल्कि वह अपने भगवान से शादी करते हैं। जिन्हें अरावन के नाम से भी जाना जाता हैं। उन्हें शव पर किसी कि भी नज़र न पड़े यह मान्यता है। उनके शव पर चप्पलों से मारा जाता है क्यों पिछले जन्म के जो भी पाप है वह सब मीट जाए। उनके गुरु ही उनका परवर है। गुरु से ही वह शिक्षा पाते है।

किन्नर कहलाना किसी मर्द को अच्छा नहीं लगता, वह शब्द पिघला शीशा सा कानों में उतरना है और किन्नर को हिजड़ा कहने से उन्हें गाली लगती क्योंकि यह अपमान करने वाला शब्द है, पर कहीं अंतस तक उसके मन में कचोट जरूर होती है। आखिर ईश्वर ने उसके साथ अन्याय क्यों किया? क्यों हम उन्हें अपने से दूर सामाजिक दायरे से बाहर हाशिए पर रखते चले आ रहे हैं, उनके प्रति हमारी सोच में अश्लीलता का चश्मा क्यों चढ़ा रहता है, किसी हत्यारोपी के साथ बेहिचक घूमने, टहलने या उसे अपने ड्राईंग रूम में बैठकर उसके साथ जलपान करने से हम नहीं हिचकते हैं, फिर किन्नर तो ऐसा कोई काम नहीं करता, जो कि एक हत्यारोपी करता है तो हम किन्नरों से क्यों हिचकते हैं। वे हमारी तरह अपनी माँ की कोख से जन्मे अपने पिता की संतान हैं। वे ज्यादा नहीं मांग रहे हैं। ‘हमें किन्नर नहीं, इंसान समझा जाए। बस इतनी से मांग है।

स्त्री पुरुष की संरचना प्रकृति प्रदत्त है। जैविक आधार ने स्त्री-पुरुष और तृतीय लिंगी को शारीरिक-मानसिक भिन्नता प्रदान की है। मानव समाज में परस्पर भिन्न लिंगी मनुष्य एक-दूसरे के पूरक और सहयोगी रहे हैं, किन्तु मानव सभ्यता के विकास से ही लिंग भेद के कारण दमन, अन्याय, शोषण और असमानता का लंबा इतिहास भी है, विशेषकर तृतीय लिंगी समुदायों को एक समान नागरिक अधिकार प्राप्त हैं। उन्हें समाज या परिवार से वंचित नहीं रहना पड़ता है, क्योंकि सार्वजनिक और सरकारी कार्यों में उन्हें दोयम दर्जे से नहीं देखा जाता। पुरुष सत्तात्मक भारतीय समाज में लिंगविहीन लोगों को बहिष्कृत किया जाता है तथा उसके साथ मनुष्य कि तरह व्यवहार भी नहीं किया जाता, बल्कि उन्हें क्रूरता, मर्मात्मक पीड़ा और दर्दनाक स्थितियों का सामन करना पड़ता है। नयी सदी की कहानियों में तृतीय लिंगी समुदाय का ध्यान आकर्षक होना तथा उनकी अस्मिता को उद्घाटित करना नए यथार्थ की शरुआत है। हम भी इंसान है किन्नरों पर आधारित कहानियों का विशिष्ट संग्रह है। किन्नर समुदाय का परंपरागत पेशा अपनाना उनकी विवशता है। उनके पास शिक्षा के साधन नहीं है और न रोजगार प्राप्त करने के अवसर मिल पाते हैं। उन्हें मानवीय अधिकारों से वंचित रखा जाता था। अपमान और अलिंगी देह को लेकर उनका संघर्ष जन्म से लेकर मृत्यु तक चलता है। उन्हें स्वतंत्र जीवन जीने का अधिकार ही नहीं है बचपन में जब उन्हें  किन्नर होने का पता चल जाता है तब उन्हें किन्नर समुदाय में भेजा जाता है। सबसे बड़ा गुन्हा उनके साथ होता है।

इस प्रकार का भेद भाव पशु-प्राणियों में नहीं है मनुष्य एक घातक प्राणी है, मौका देखकर वार करता है किसी को ऊपर उठने नहीं देता बल्कि और नीचे दफनाने की कौशिश करता है। अपने ही अपनों के द्वारा घिराये जाते है। किसी के प्रति कोई संवेदना नहीं है। हम किसी के दुख का सहारा नहीं बनते बल्कि किसी के दुख को और कैसे बढ़ाया जाए बस इसी का मौका हम तलाशते रहते है। हर किसी को अपने हिसाब से जीने का अधिकार है किसी का दूसरों पर कोई अधिकार नहीं है, लेकिन अपने अहं के कारण हम दूसरों पर वर्चस्व करते है। अपना अधिकार जताते है। आज हम फॉर्म भरते है उसमें स्त्री, पुरुष तथा अन्य ऐसे लिखा होता है हमने अन्य में उन्हें जगह दी लेकिन हमने अपने साथ स्वीकार नहीं किया।

‘किन्नर’ शब्द को पढ़ा जाए तो मुश्किल से एक या दो सेकंड लगेंगे और समझने की कोशिश की जाए तो पंद्रह-बीस मिनट में कोई जानकार यह आसानी से समझा देगा कि किन्नर कौन होते हैं? वही किन्नर जिन्हें हम हिजड़ा या छक्का कहते है। मगर शायद ही हम इस दर्द को जानते हो। इसी दर्द को किन्नर को अपने सीने में दबाकर आम लोगों के सामने हथेली पीटने हुए नाचते हैं, दूसरों का मनोरंजन करते है। दूसरों को आशीर्वाद देते है और उसके बदले अपने हिस्से में दर्द दुख बटोरते है। लोगों से नफरत प्रताड्ना सुनते है लेकिन चेहरे पर हमेशा हँसी होती है। दो वक्त की रोटी के लिए ठुमका लगाते  और ताली पीटते। समाज से बहिष्कृत कर दिया गया, अपना एक ही धर्म मान लिया गया नाचना, गाना, ताली पीटना।

‘नाला सोपारा’ उपन्यास के माध्यम से हिजड़ों के जीवन से संबन्धित व्यक्तिगत एवं सामाजिक सरोकारों को पाठक के सामने परत खोलते हुए प्रस्तुत करने का प्रयास हैं। इस उपन्यास के लेखन के संदर्भ में ‘चित्रा मुद्गल’ कहती है “लंबे समय से मेरे मन में पीड़ा थी। एक छटपटाहट थी, आखिर क्यों हमारे इस अहम हिस्से को अलग-थलग किया जा रहा है। हमारे बच्चों को क्यों हमसे दूर किया जा रहा है। आजादी से लेकर अभी तक कई रूढ़ियाँ टूटी लेकिन किन्नरों के जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आया। उपन्यास एक बड़ा प्रश्न उठता है कि लिंग-पूजक समाज लिंगविहीनों को कैसे बर्दाश्त करेगा? उपन्यास इस प्रश पर गंभीरता से सोचने को विवश करता है कि आखिर एक मनुष्य को सिर्फ इसलिए समाज बहिष्कृत क्यों होना पड़े कि वह लिंग दोषी है?

समाज में मनुष्यता आज हाशिये पर है और हाशियाकरण की यह प्रक्रिया लंबे समय से मानवाधिकारों के हनन के रूप में सामने आती है। गुलाम मंडी उपन्यास में समाज ऐसा है जिसे अक्सर हम देखना पसंद नहीं करते। परंतु क्या यह समस्या का समाधान है क्या कबूतर के आँख बंद कर लेने से बिल्ली उसे नहीं खाएगी। उसी तरह हमारा आँखों को बंद कर लेना भर मानव तस्करी, यौन शोषण और यौन कर्मियों की समस्या का समाधान नहीं होगा। अक्सर लड़कियां इसमें फँसने के बाद बाहर आने का प्रयास नहीं करती और करती भी है तो इस डर से आगे नहीं आती, कि समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा। उपन्यास में जानकी के माध्यम से लेखिका इस समस्या पर रोशनी डालती हैं और समाज की मानसिकता में बदलाव की बात करती है ताकि यह लड़कियां वापस आ सके और सम्मानपूर्वक जीवन जी सके।    

1974 में जे. बी लेखिका उस व्यक्ति से मिली और उन्होंने अपने जीवन की व्यथा बताई लूले, लंगड़े बहरे होते है उन्हें घर से कोई बाहर नहीं निकालता लेकिन किन्नर जब लिंग से विकलांग पैदा होते ही उन्हें घर से बाहर निकाल दिया जाता है बिना कोई दोष के। किन्नर समाज के लोग अपनी अलिंगी देह को लेकर जन्म से मृत्यु तक अपमानित, तिरस्कृत और संघर्षमयी जीवन व्यतीत करते है तथा आजीवन अपनी अस्मिता की तलाश में ठोकरे खाते हैं। असीम यतनाओं की सजा उन्हें क्यों दी जाती है। यह लोग परिवार और समाज के साथ नहीं रह सकते इनके लिए शिक्षा, स्वास्थ सेवाओं और सार्वजनिक स्थानों पर पहुँच प्रतिबंधित है। अभी तक उन्हें सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में प्रभावी ढंग से भाग लेने से बाहर रखा गया है। राजनीति और निर्णय लेने की प्रक्रिया उनकी पहुँच से बाहर है।

2014 में एक ऐतिहासिक फैसले में सर्वोच न्यायालय में उन्हें अधिकार देने कि बात कही, लेकिन कहा उन्हें उनका अधिकार मिला।  शरीर एक पुरुष का, भावनाएँ एक नारी की अपनी असल पहचान स्थापित करने के लिए सहसपूर्ण संघर्ष की अद्भुत जीवन यात्रा जो 23 सितंबर, 1964 में शुरू होती है। जब दो बेटियों के बाद चित्तरंजन बंद्योपाध्याय के घर बेटा पैदा हुआ। बेटे सोमनाथ के जन्म के साथ ही पिता के भाग्य ने बेहतरी की ओर तेजी से ऐसा कदम बढ़ाया की लोग हँसते हुए कहते कि अक्सर बेटियाँ पिता के लिए सौभाग्य लाती हैं, लेकिन इस बार तो बेटा किस्मत वाला साबित हुआ। वे कहते हे चित्त! यह पुत्र तो देवी लक्ष्मी है। सोमनाथ जैसे-जैसे बड़ा होता गया उसमें लड़कियों जैसे हरकते, भावनाएँ पैदा होने लगी और लाख कोशिश करने के बाद दबा नहीं सकीं। बिना माता-पिता को बताए घर से बाहर निकल पड़ी।

बेशक, भारत में कानूनन तौर पर थर्ड जेंडर को मान्यता मिल गयी हो मगर भारतीय समाज ने अभी भी तीसरे लिंग वर्ग को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है। आज भी समाज में तिरस्कार, हिन भावना और अपमान की नज़रों से देखा जाता है। देश की पहली ट्रान्सजेंडर महिला प्रिन्सिपल बनी जिन्होंने विपरीत सामाजिक परिस्थितियों में अपने संघर्ष के बूते पर मुकाम हासिल किया। वर्तमान में मनोबी पश्चिम बंगाल के कृष्ण महिला कॉलेज में बतौर प्रिन्सिपल कार्यरत है।

5-6 साल की उम्र में लड़कियों के कपड़े पहनना अच्छा लगता था। वह कपड़े पहनने से माँ डाँटती लेकिन वह कपड़े पहनकर तृप्त सी हो जाती। जब स्कूल में पढ़ती थी तब तो उनसे कोई दोस्ती नहीं करता था यदि स्कूल नहीं जाती तो बीते दिन की पढ़ाई के बारे में नहीं बताता। ग्रेजुएशन में दाखिला लेने पर भी मज़ाक बनाया गया। 1995 में उन्होंने पढ़ाना शुरू किया। बच्चों ने नहीं सताया उतना अन्य शिक्षकों ने उन्हें दुख दिया। ट्रांसजेंडरों के लिए पहली पत्रिका निकली थी ‘ओब-मानब’ जिसका हिन्दी में अर्थ है ‘उप-मानव’। 2003 साल में उन्होंने सेक्स बदल दिया। 2006 में पी.एच.डी की। तिरस्कार का घूंट पल-पल पिती रही।  उनकी मदद कोई नहीं करता। उन्होंने रवीन्द्रनाथ टैगोर से बहुत कुछ सीखा है। ट्रांसजेंडर सामाजिक भेदभाव के कारण पढ़ाई से दूर हो जाते है और पूरी जिंदगी नाचकर ही गुजारा करते है। लेकिन कभी भी जीवन में हार नहीं मानी एक बच्चे को गोद लिया ‘देबाशीश’ नाम है। उन्हें जीवन दिया एक माँ को बच्चा मिला और एक बच्चे को उसकी माँ।  अपना जीवन एक कैद की तरह जीने के लिए मजबूर है। रोज आँसू के घूंट पीते है। क्या क्या नाम नहीं दिया उन्हें कोई कहता हिजड़ा, किन्नर छक्का, थर्ड जेंडर, आदि।

“अधूरी देह क्यों मुझको बनाया

बता ईश्वर तुझे ये क्या सुहाया

किसी का प्यार हूँ न वास्ता हूँ

न तो मंजिल हूँ मैं न रास्ता हूँ

अनुभव पूर्णता का न हो पाया

अजब खेल यह रह–रह धूप छाया”3

हिजड़ों का न आवाज है, न नाम है ना परिवार, इतिहास, प्यार, सोच, ना खुशी, ना गम, ना हक ना व्यक्तित्व। किन्नर अदृश्य है न केवल हमारे मुख्यधारा के समाज में बल्कि समाज के मन-मस्तिष्क के भीतर भी।    

जीवन में मनुष्य आदमी बनकर जन्म लेता है इसमें स्त्री और पुरुष दोनों आते है लेकिन मनुष्य के कर्म चाहे वह अच्छाई हो या बुराई लेकिन अपने कर्मों से मनुष्य से इंसान बनते है और यही से इंसानियत शुरू होती है। एक स्त्री को हमेशा से उपेक्षित किया गया है और हम आधुनिक समाज में इस बात को भले बदलने की कोशिश करे अगर हम ऐसा सोचते है तो हम गलत है।

कुछ समाज में ऐसे भी लोग है जिनकी ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया वह है ‘किन्नर समाज’। देवता को भी जन्म लेने के लिए स्त्री का गर्भ चाहिए ईश्वर भी स्त्री का ऋणी होता है,  लेकिन हम स्त्री के अस्तित्व को बार-बार भूलते है क्यों? यह प्रश्न पूरे मानव समाज से है।

किन्नर नाम सुनते ही लोग हँसते है, मुँह फेरते है देखकर भागते है उन्हें अपशब्द कहते है लेकिन हम यह क्यों भूल जाते है कि यह हमारे ही तरह साधारण इंसान है उन्हें भी जीने का और एक सम्मान का अधिकार है, लेकिन सम्मान की तो बात दूर हम आज भी उन्हें मनुष्य के रूप में अपना नहीं सके हम दूसरे ग्रह से कोई अजनबी की तरह बुरी नज़र से देखते है। लेकिन हम बार-बार क्यों भूल जाते है हम किसी को सुख दे नहीं सकते तो दुख देने का भी हमे अधिकार नहीं है किसी को अच्छे शब्द बोल नहीं सकते तो बुरा भी बोलने का हमें अधिकार नहीं है।

जानवर स्वावलंबी होते है लेकिन मनुष्य ऐसा प्राणी है जो जन्म से लेकर मृत्यु तक परस्वावलंबी होता है, लेकिन फिर भी अपने आप को महान समझते है। अक्सर हम कहते है इस संसार की रचना ईश्वर ने की है हम ईश्वर के संतान है लेकिन हम ईश्वर की रचना पर संदेश कर रहे है।

‘xy cromosones’ से ‘पुरुष’ और ‘xx cromosones’ से ‘स्त्री’ का जन्म होता है, लेकिन ‘xxx,yy,oo’ यह ‘cromosone disorder’ है। इससे किन्नर का जन्म होता है क्या इस तरह जन्म होना उनकी गलती है फिर घृणा दुख पीड़ा उन्हें क्यों? विज्ञान चिकित्सकों ने बताया है कि रक्त स्त्राव और cromones की मात्र समान होने पर किन्नर का जन्म होता है।

हमने अपने बच्चियों को मार दिया कूडे दान में फ़ेक दिया भ्रूण हत्या की। लेकिन उन्होंने बच्चियों को कूड़े दान से उठाकर उन्हें सुरक्षा प्रदान की। उन्हें पनाह दी उन्हें पढ़ाया, लिखाया समाज में रहने के काबिल बनाया। अपने पराए हो गए लेकिन अजनबी ने उन्हें नाम दिया। सिर्फ जन्म देने वाली माँ नहीं होती। पुरुष को भी उतना ही अधिकार है वह भी बच्चों को पाल सकते है।

हम शादी, बच्चे के जन्म पर उन्हें घर बुलाते है, क्योंकि वह आशीर्वाद देते है नाचते है लेकिन इनका जन्म सिर्फ इसी लिए हुआ है। यहाँ तक भीख मांगने के मार्ग तक पहुंचा दिया क्यों हम भील जाते है ऊँठा जन्म सिर्फ इसी के लिए नहीं हुआ। उन्हें भी स्वतंत्र जीवन जीने का अधिकार है। कोई उन्हें नौकरी घर नहीं देता, अपना घर परिवार होते हुए भी अपने उन्हें नहीं अपनाते। कोई किराए का घर भी नहीं देता झोपड़ियों में रहने के लिए विवश है। स्टेशन, घर-घर रास्ते पर भिख मांगते है लेकिन, लोग वहाँ पर भी धिक्कारते है। डरते कहते है “ताई मला बघून तुम्ही नाराज़ तर झाले नहीं नाआ” और लोग भागते है गालियाँ देते है मुह पर दरवाजा बंद करते हैं।  हमारे समाज में रहने वाले भाई, पिता, चाचा, मामा उनके पास जाते है लेकिन ‘sex worker’ का ठप्पा उनपर क्यों? वह अभिशप्त जीवन जीने के पीछे जिम्मेदार कौन है?

 किसी भी तरह का आवेदन फार्म भरते समय एक कॉलम आता है जेंडर यानि लिंग का, जिसमें विकल्प होता है महिला, पुरुष और अन्य। ‘अन्य’ के रूप में जगह मिल गयी लेकिन समाज में उन्हें जगह नहीं मिली। किन्नरों की यह शोचनीय स्थिति, आधुनिकता, समानता और मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता का दम भरने वाले समाज के मुँह पर जोरदार तमाचा है।   

भले हम आज अपने आप को मॉडर्न आधुनिक कहे लेकिन सोच विचारों से हम आज भी पिछड़े है। कोई खिलाड़ी जब गेंद को बेट से हिट करता तब सब छक्का मारा कहते है लेकिन इस बात को सकारात्मकता से देखते है लेकिन हमे छक्का यह शब्द गाली की तरह नकारात्मक दृष्टि से क्यों देखा जाता हैं। मनोबी ने बचपन में यह प्रश्न अपनी माँ से पूछा था, तब माँ ने उत्तर दिया था उनका बॉल बाउंड्री से बाहर जाना सकारात्मक है लेकिन यह शब्द तुम्हारे लिए mainstream boundary से बाहर कर दिया जाना हैं। उनके साथ कितने शोषण होते है लेकिन कोई उनके दुख को नहीं समझता। अपने जीवन को अभिशाप की तरह जीने के लिए मजबूर है। दर-दर भटकने के लिए मजबूर है। हम अपने देह को लेकर बहुत इतराते है लेकिन समझ, संवेदना, दुखकातरता नहीं है। हमने अपने बेटियों जन्म के बात कूड़ेदान में फेंक दिया। वही वे लोग बच्चे को पाने के लिए तरसते है। उन्हें घर, परिवार देते है, प्यार देते है नयी जिंदगी देते है शिक्षा देते है। सुभ अवसर पर उनकी जरुरत होती है उनका आशीर्वाद हमारे लिए मूल्यवान है लेकिन वह नहीं। अगर देखा जाए तो बुराई उनमें नहीं हम में है हमारे दृष्टिकोण विचारों में है हमने उनके प्रति हमारे मस्तिष्क में गलत विचारधारा बनाई है।

किन्नरों ने दिया शाप लगता है ऐसे लोग कहते है लेकिन यह सही है जिनको हमने जन्म से दुख दिया दुखी आत्मा के हृदय से निकला शाप तो जरूर लगेगा। वह एक दुखी आत्मा है। ईश्वर अर्धनारीश्वर शिव को हम पूजते है लेकिन उनको नहीं अपनाते। जितनी प्रताड्ना उनको पहले नहीं हुई उतना दुख हम आज उन्हें दे रहे है। कोई ठीक से नहीं बोलता, साथ में कोई नहीं बैठता जब किसी आम व्यक्ति के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है तब कितना बुरा लगता है। किसी ने कुछ कहा हम सहन नहीं कर सकते फिर वह तो दिन-रात लोगों की नफरत सहते है। उनकी शव यात्रा रात में निकलती है ताकि किसी भी मनुष्य की नज़र उन पर ना पड़े अन्यथा अगले जनम में फिर से किन्नर का जन्म होता है। मृत्यु के समय उन्हें चप्पल से मारा जाता है। अपने जीवन में वे कितना दर्द सहते है। मृत्यु के बाद भी। कितने होशियार होते है कितनी कलाएं उन्हें आती है वे गाते है नाचते है और भी कई चिजे उन्हें आती है लेकिन हमने उन्हें सामने आने का कभी मौका ही नहीं दिया।

कोई भाड़े का घर भी नहीं देते आज हमने झुग्गी बस्ती में रहने के लिए विवश कर दिया है। पैसे मांगने पर लोग कहते है पैसे नहीं कमा सकता भिख मांगने की आदत पद चुकी है लेकिन इस बात पर विचार किया जाए तो मुफ्तखोरी भी हमीने उन्हें सिखायी हैं। अगर कोई काम नौकरी घर परिवार नहीं रहा तो कोई व्यक्ति क्या करगा जो दूसरों को आशीर्वाद देते है उन्हें आशीष देते है उनकी झोली भर देते है लेकिन उनके दुख को कोई नहीं समझता। कितना बुरी तरह सुलुग किया जाता है हम उन्हें मरने के कगार पर पहुँचा दिया है। उसके आँसू किसी को नहीं दिख रहे कि वह किस परिस्थिति से गुजर रहे है। स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श, दलित विमर्श, किसान विमर्श, बाल विमर्श लेकिन किन्नर विमर्श यह ज्वलंत विषय ही और इसी विषय के जरिए हम उनके दुख को काम तो नहीं कर सकते लेकिन हम इससे रूबरू अवश्य होंगे।

संदर्भ सूची

  1. http://m.wikipedia.org/wiki/किन्नर
  • पुरुष तन में फंसा मेरा नारि मन, – मनोबि बंदोपाद्याय

राजपाल अँड सन्ज

1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली -110006

प्रथम संस्करण – 2018  

  • थर्डजेंडर विमर्श – संपादक शरद सिंह

सामयिक प्रकाशन

3320-21, जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग

दरियागंज, नई दिल्ली – 110002

संस्करण – 2019

 4 चित्रा मुद्गल, पोस्ट बॉक्स नं नलसोपारा, सामयिक पपेरबॉक्स, नई दिल्ली 2017

कोरोना संक्रमण और आपदाओं के संकट में आत्मनिर्भर भारत- सामाजिक संस्कृति के परिवर्तित परिप्रेक्ष्य में: रजनी

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कोरोना संक्रमण और आपदाओं के संकट में आत्मनिर्भर भारत– सामाजिक संस्कृति के परिवर्तित परिप्रेक्ष्य में

रजनी, 
शोधार्थी,
राजनीति विज्ञान विभाग,
दिल्ली विश्वविद्यालय ,
 ईमेल  riya7116@gmail.com,
संपर्क  9716452972

शोध सार

वर्तमान में, दुनिया कोरोना (कोविद -19) महामारी की समस्या से जूझ रही है। जिसके कारण दुनिया के कई देशों को तालाबंदी का आदेश जारी करना पड़ा है। इस ताले के प्रभाव को प्रकृति पर देखें तो वायु शुद्ध, जल शुद्ध, पृथ्वी शुद्ध, आकाश शुद्ध और अग्नि शुद्ध। कहने का आशय यह है कि पूरी दुनिया का पर्यावरण शुद्ध है। प्रकृति प्रदूशण की गुलाम थी। मनुष्य इस लॉक डाउन की स्थिति में स्वतंत्र प्रकृति का आनंद ले रहा है। इतिहास हमेशा हमें जितना हो सके उतना विकसित होने की चेतावनी देता रहा है की विकास से संस्कृति और प्रकृति पर आधात पहुंचाया जा रहा है जो की पतन की ओर मार्ग प्रश स्त करता है। गौतम बुद्ध ने कहा कि वीणा के तार को उतना ही कसो जितना कि मधुर ध्वनि निकलती है। वीणा के तार को इतना तंग न करें कि वह टूट जाए। यही है, विकास के तार को उतना ही कस लें जितना आवश्यक हो, अन्यथा विकास के दौरान, विकास के तार टूट जाएंगे।

मुख्य शब्द – संस्कृति, लॉकडाउन, प्रकृति, आत्मनिर्भर भारत।

शोध विस्तार

भारत जैसे विशाल  संस्कृतियों भरे देश  को एकता का प्रतीक माना जाता है जिसे कभी प्रश्न  के कटघरे में किसी ने खड़ा करने का प्रयास नहीं किया। यहां कि संस्कृति और परंपरा ही एकता का सबसे बड़ा स्रोत है। इस परंपरा को जो अब तक न हिला सका उसे एक संक्रमण ने हिला कर रख दिया। यह परिस्थिति केवल भारत में ही नहीं अपितु यह पूर्ण विष्व में एक महामारी के रूप में उभरी है जिसका प्रारंभ चीन से होकर भारत तक पहुंचा। जहां इसने भारत की व्यवस्था को जड़ से हिला दिया, इसने आर्थिक व्यवस्था के साथ-साथ राजनीतिक और सामाजिक, धार्मिक व्यवस्था को भी झुकने पर विवश  कर दिया है। इसका सबसे अधिक प्रभाव भारत में मंदिर, मस्जिद, चर्च के साथ लोकप्रिय उत्सव के रूप में मनाएं जाने वालों त्यौंहारों पर भी देखने को मिला जैसे नवरात्रे, हनुमान जयंती, श ब्ब-ए-रात, रोज़े इत्यादि। जिसे सरकार द्वारा दिषा-निर्देषों के उपरांत बंद करने के आदेश  के साथ भक्तों का दौरा करने पर भी पाबंदी लगा दी गयी, कन्या भोजन, ईद पर मिलने को निशिद्ध किया गया।

परंतु इस प्रकार के आदेश  के अंतराल में जनता के द्वारा किए जाने वाले पालन में कुछ ऐसे भी असामाजिक तत्व शामिल  थे जिन्होने अपने धार्मिक प्रकारों को राजनीतिक रंग चढ़ाने का कार्य करने में कोई कमी नहीं छोड़ी। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण है तब्लीगी जम़ात। 13-15 मार्च को इस समूह द्वारा आयोजित एक धार्मिक सभा ने भारत में सबसे बड़ा कोरोना वायरस फैलाने करने में अहम भूमिका निभाई है, उसी प्रकार जैनो द्वारा भी कुछ परिस्थितियां उत्पन्न की गई, परंतु इस पर सरकार द्वारा निंयत्रण करने के प्रसासों मे काफी सीमा तक सफलता प्राप्त की है।

भारत की प्रकृति, संस्कृति को संरक्षण  प्रदान करने का कार्य इतिहास ने भरपूर किया है, वहीं दार्शनिको ने भी अपने तरीको से समझाने का प्रयत्न किया है- जैसे हॉब्स द्वारा एक कथन में कहा गया कि व्यक्ति पशु  की भांति और स्वार्थी होता है जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को हानि पहुंचा सकता है और वैष्वीकरण के युग की हानि को रूसों ने अपने शब्दों में स्पश्ट किया कि विज्ञान और विवके ने समाज को क्श ति की ओर प्रेरित किया है तो वहीं भारतीय दार्शनिक स्वामी विवेकानंद का वेदों की ओर लौटो की ओर संकेत करते है। यह सभी कथन और विचार आज यर्थाथ प्रतीत होते है इन्हे वर्तमान युग में मान्य देखा जा सकता है जिसका आशय प्रकृति और मानव से लगाया जा सकता है। कहा जाता है की प्रकृति से सब की रचना है जिसमें मानव भी शामिल  है परंतु इसी मानव ने उसी प्रकृति को नष्ट  करने का भरपूर प्रयास किया है। भारतीय दर्शन जो सत्य की खोज के साथ अध्यात्म पर बल देता है वह नैतिकता और कर्मो की भाषा  को भी दर्शाता  है जिसका साक्ष्य वर्तमान युग में आने वाले जैसे कोरोना संक्रमण और उसके साथ में आने वाली आपदाओं के रूप में देखा जा सकता है जो इस बात का साक्ष्य है कि प्रकृति को जो हानि मानव द्वारा पहुंचाई गई है उसकी भरपाई अब प्रकृति स्वयं मानव से ही करने लगी है और यह प्रकृति का संकेत प्रथम बार नहीं है जो मानव को दिया गया है मानव सभ्यता को इस बात पर चेताया भी गया है, इसे तीन रूपों में देखा जा सकता है-

  1. संक्रमण के रूप में- संक्रमण के रूप से आशय जब कोई भी बीमारी कम समय में तीव्र गति से फैलने लगे तो महामारी कहा जाता है इसका प्रारूप प्राकृतिक और निर्मिती के आधार पर देखा जा सकता है और आज इसका रूप कोरोना के रूप में जाना जा रहा है। इस प्रकार के संक्रमण भारत या पूर्ण विश्व में प्रथम सूची में नहीं देखें जा सके यह आज के समय में 114 देषों से अधिक में फैला है जिसे डब्लू. एच. ओ. ने इसे महामारी घोशित किया है, परंतु इसका आगमन पुराने समय से विभन्न रूपों में देखा जा सकता है। महामारियों का अपना ही इतिहास है जिसने 14वीं शताब्दी में यूरोप के 70 प्रतिश त लोगो को प्रभावित कर जान ले ली थी। अंग्रेजी में महामारी के लिए 2 भिन्न श ब्द का प्रयोग होता है- प्रथम बिडेमिक अर्थात वो बिमारी जो किसी एक क्षेत्र या देश में तीव्र गति से फैले परंतु जैसे ही कोई बीमारी किसी देश  की सीमाओं से बाहर निकलकर दूसरे देश  में फैलने लगती है तो उसे पेनेडेमिक कहा जाता है और यह प्रथम बार नहीं है कि किसी बीमारी को महामारी घोशित किया गया हो। इससे प्रथम वर्ष  2009 में इसे महामारी घोषित किया जा चुका है तब पूर्ण विष्व में 200000 से अधिक लोग स्वाइन फ्लू की चपेट में आने से मारे गए थे। ऐसे ही भारत में स्वाइन फ्लू और कोरोना वायरस से पहले भी तीन महामारियां वर्ष  1940, 1970, 1995 में घोशित की जा चुकी है। 1994 में सितंम्बर के माह में गुजरात के सूरत में प्लेग से एक व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत इस मृत्यु के आकड़ों में वृद्धि हुई और स्वतंत्रता के उपरांत 25 प्रतिश त जनसंख्या ने पलायन किया जिसे स्वतंत्रता के बाद का का सबसे बड़ा पलायन कहा गया। जहां बिहार और उत्तर प्रदेश  की बड़ी संख्या रह रही थी जिसके पलायन से प्लेग अन्य स्थानों पर फैला और गांव के गांव समाप्त हो गए। सत्या्रह की एक रिर्पोट के अनुसार देश  में 108 हजार करोड़ की हानि हुई, लंदन में इण्डिया के प्लेन को ’’प्लेग प्लेन’कहा  गया वहीं ब्रिटिश  समाचार पत्रों में इसे मध्यकालिन श्राप की संज्ञा दी गई। गुजरात के बाद यह अहमदाबाद और हैदराबाद में फैला। प्लेग फैलने का कारण चूहों को बताया गया। 1853 में इसके लिए एक जांच कमीश न नियुक्त किया गया यह 1876,  1898, फैला। वहीं 1940 के दश क में फैला कॉलरा जिसे हैजा कहा जाता है जिसका मुख्य कारण दूषित  जल रहा। जिस पर बाद में 1975 में और 1990 के दशक में टीके के कारण इस पर नियंत्रण पाया गया। 1960 के आस-पास भारत में फैलने वाले चेचक से 18 वी. शताब्दी के प्रारंभ में ही हर वर्ष  4 लाख लोग मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे और 20वी. सदी में विष्व में करोड़ो लोगो की मौत हुई है।
  2. आपदा के रूप में- सूखा, बाढ़, चक्रवाती तूफानों, भूकम्प, भूस्खलन, वनों में लगनेवाली आग, ओलावृष्टि, टिड्डी दल और ज्वालामुखी फटने जैसी विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है, न ही इन्हें रोका जा सकता है, लेकिन इनके प्रभाव को एक सीमा तक कम अवष्य किया जा सकता है, जिससे कि जान-माल की कम से कम हानि हो। यह कार्य तभी किया जा सकता है, जब सक्श म रूप से आपदा प्रबंधन का सहयोग मिले। प्रत्येक वर्ष प्राकृतिक आपदाओं से अनेक लोगों की मृत्यु हो जाती है। परंतु इन आपदाओं का वर्तमान युग में एक विशेष  स्थान है जिसका कारण कोरोना संक्रमण को कहा जा सकता है इसे कुछ विशेष ज्ञों द्वारा ईष्वर की मानव पर दोहरी मार भी कहा जा रहा है क्योंकि जहां अभी विष्व में कोरोना जैसी बीमारी से सुरक्षा प्राप्त नहीं हुई है कि अन्य प्रकार की घटनाएं अपना प्रकोप दिखाने लगी है-उदाहरणस्वरूप भूकम्प जो भारत में 2 मई और फिर 15 मई और फिर इसकी संख्या में बढ़ोतरी देखने को मिली। अप्रैल और मई में चिली, मैक्सिको, इंडोनेषिया, कोलंबिया, ग्रीस, जापान, ब्रिटेन, साउथ कोरिया आदि में यह देखने को मिला। इसी प्रकार बिना मौसम के होने वाली निंरतर बारिश  जो मानवता को नष्ट  करने की ओर अग्रसर है जिसका हाल ही में उदाहरणस्वरूप इम्फान और निसर्ग जैसे तूफानों का दस्तक देना तो दूसरी ओर लोक्ट्स टिड्डी का आक्रमण रहा है।
  3. मानव निर्मित संकट- अभी हाल ही में भारत के विषाखापत्ट्नम और साउदी अरब में होने वाला गैस रिसाव, साउदी अरब जैसे कई देषो के कुछ इमारतों में लगने वाली भंयकर आग और भूख तथा लॉकडाउन के चलते लोगो का अपने वाहनों में गति के नियंत्रण में न होने के कारण दुर्घटनाओं का होना और रेल द्वारा लोगो की मृत्यु इत्यादि घटनाओं का होना मानव नियंत्रण में है जिसे रोका जा सकता है, परंतु यह सब राजनीति की चपेट में है।
  4. अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता

वैसे तो समकालीन दुनिया ने 2008 की मंदी का दौर भी देखा था, जब कंपनियां यकसाथ बंद हुईं थीं और एक साथ कई सौ-हजार लोगों को बेरोजगार भी होना पड़ा था। परंतु यह समय उससे भी अधिक खराब हो सकता है। क्योंकि उस समय तो एयर कंडिशन जैसी चीजों पर टैक्स कम हुए थे। तब, सामान की कीमत कम होने पर भी लोग उसे खरीद रहे थे, लेकिन लॉकडाउन में सरकार यदि अपना टैक्स जीरो भी कर दे तो भी उसे कोई खरीदने वाला नहीं है। लिहाजा, विशेष  ज्ञ मौजूदा स्थितियों को सरकार के लिए भी बहुत ही चुनौतीपूर्ण मान रहे हैं। क्योंकि अचानक ही उसके सामने कोरोना त्रासदी से उपजे लॉकडाउन जैसी एक विशाल समस्या आ खड़ी हुई है। यहां यह स्पष्ट कर दें कि 2008 के दौर में तो कुछ कंपनियों को आर्थिक सहायता देकर संभाला गया था। लेकिन, आज यदि सरकार ऋण भी दे तो उसे सभी को देना पड़ेगा। क्योंकि हर सेक्टर में उत्पादन और खरीदारी प्रभावित हुई है। किंतु सरकार सबको लोन देने का जोखिम कितना उठा पाएगी, यह समय बताएगा। बहरहाल, इस बात में कोई दो राय नहीं कि कोरोना वायरस का प्रभाव पूर्ण विष्व पर पड़ा है। चीन-अमेरिका जैसे बड़े देश और मजबूत अर्थव्यवस्थाएं भी इसके सामने लाचार दिखाई दे रहे हैं। इटली-फ्रांस की हालत से सभी वाकिफ ही हैं। इस कोरोना त्रासदी से भारत में विदेशी निवेश के जरिए अर्थव्यवस्था सुदृढ़ करने की कोशिशों को भी बड़ा धक्का पहुंचेगा। क्योंकि जब विदेशी कंपनियों के पास भी पैसा ही नहीं होगा तो वो निवेश में भी रूचि नहीं दिखाएंगी। हालांकि, जानकारों का यह भी कहना है कि अर्थव्यवस्था पर इन स्थितियों का कितना गहरा असर पड़ेगा, यह निकट भविष्य में घटित होने वाली दो बातों पर निर्भर करेगा। पहला तो ये कि आने वाले समय में कोरोना वायरस की समस्या भारत में और कितनी गंभीर होती है, और दूसरा ये कि कब तक इस पर काबू पाया जाता है। अब जो भी हो, लेकिन किसी भी नेतृत्व के लिए यह स्थिति किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। परंतु इस समस्या से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार देश के सामने ‘आत्मनिर्भर भारत’ का खाका पेश किया। सीआईआई की 125वीं सालगिरह पर पीएम मोदी ने कहा कि भारत को फिर से तेज विकास के पथ पर लाने के लिए, और अर्थव्यवस्था संभालने के लिए आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए 5 चीजें बहुत जरूरी हैं. ये हैं- Intent,  Inclusion,  Investment,  Infrastructure, InnovationA इन सभी की झलक लिए गए अब तक सभी निर्णयों में मिल जाएगी। महिलाएं हों, दिव्यांग हों, बुजुर्ग हों, श्रमिक हों, हर किसी को इससे लाभ मिला है। लॉकडाउन के अंतर्गत सरकार ने गरीबों को  8 करोड़ से ज्यादा गैस सिलेंडर उपलब्ध कराए हैं। साथ ही प्रवासी श्रमिकों के लिए भी मुफ्त राशन पहुंचाया जा रहा है। कोरोना के खिलाफ अर्थव्यवस्था को फिर से मजबूत करना, हमारी पहली प्राथमिकता में से एक है। अधिक कमाई के रास्तों को जैसे मदिरा के ठेके, दुकानों, रेस्टरॉन को पुनः प्रारंभ किया गया।

  1. सामाजिक व्यवहार और संस्कृति

जिस प्रकार भारत की अर्थव्यवस्था चरमराई है, उसी प्रकार इसका विपरित रूप सामाजिक व्यवहार में संबंधो को लेकर देखने को मिला है उदाहरणस्वरूप विवाह, षोक समारोह, जन्म समाहरोह या अन्य कोई भी पार्टी। इस प्रकार के समारोंह में जहां कोरोना से पूर्व दिखावे के जलसे अधिक देखनें को मिलते थे, लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती थी, सबसे बड़ी समस्या मध्यमवर्गीय के लिए उत्पन्न होती थी कि उसे अपनी हैसियत से अधिक देने के लिए विवश  होना पड़ता था, फिर भले ही विवाह हो या जन्म का समारोह। परंतु इस कोरोना के काल ने इस प्रकार की दिखावी परंपरा को तोड़ कर रख दिया है जिसका वर्णन हमारे षास्त्र भी नहीं करते। वहीं सबसे बड़ी राहत दहेज प्रथा पर बहुत हद तक रोक देखने को मिली है जिसके कारण कई लोग कर्जे के षिकार होते तो कई षोशण और अत्याचार और घरेलू हिंसा के तो कई आत्महत्या के षिकार होते थे। दहेज प्रथा को जिसे अब तक सरकार के लाख प्रयासों के बावजूद नियंत्रित न किया जा सका उसे इस कोरोना ने नियंत्रित कर दिया। वहीं सरकार के निर्देषो अनुसार 20 से 50 तक लोगो की संख्या सीमित कर दी गई। वहीं इसने पारिवारिक महत्वता की समझ को बढाया है जहां मनुष्य  अपने फोन, मोबाईल, ऑफिस जैसे कार्य और रोजगार के लिए परिवार से अलग होना महत्वपूर्ण समझता था वहीं आज उसे अपने परिवार तक पहुंचने के लिए प्रयास करना पड़ रहा है। अपने जीवन की चिंता किए बिना अपने परिवार के पास लौटने के लिए ललायित है। सामाजिक जीवन से अत्यंत प्रिय अब परिवार का साथ लगने लगा है। सनातन संस्कृति जो हाथ जोड़कर प्रणाम करना अपनी विरासत समझती थी, वह भी पश्चिम की नकल कर आलिंगन में ही आधुनिक होने की तस्वीर देख रही थी, ऐसे में जब विश्व गुरु कहलाने वाले विभिन्न देश ही हमारी संस्कृति की अनुगामी बनने को तैयार खड़ी हो।

  • आलोचनात्मक मूल्यांकन

21वीं सदी की दुनिया को लॉकडाउन किया गया है। जिस प्रकार प्रकृति खिलकर अपने यौवन को प्रदर्शित कर रही है, उसी प्रकार कोरोना की मार वैश्विक स्तर पर काफी व्यापक है। कोरोना की त्रासदी संग मानव जाति जीने की जीवंतता भी अभिव्यक्त कर रही, वह सुखद पहलू है। इन सब के बीच प्रकृति जैसे-जैसे अपने यौवन का श्रृंगार कर रही, ऐसे में वह कहीं न कहीं मानव समाज से अपने प्रतिशोध की खुशी व्यक्त कर रही है।

आज मनुष्य  घरों में प्रकृति के बंदी है, इंसानी गतिविधियाँ ठप्प हैं। इन सब के बीच आसपास का वातावरण और अन्य जीव-जन्तु कलरव कर यह संदेश दे रहे कि मानव मस्तिश्क भले कोरोना को “चीनी-वायरस” या अन्य नाम देकर अपनी कर्तव्यों से दूर भागने की कोशिश कर लें, लेकिन वास्तव में यह प्रकृति द्वारा ली गयी अंगड़ाई है। परंतु सामाजिक व्यवहार में होने वाले परिवर्तन ने कहीं न कहीं पष्चिमीकरण की ओर भी रूख किया है-जैसे व्यक्तिगत जीवन जीना जो हमारी संस्कृति में हमारे वेदो में नहीं देखने को मिलता। मानव से दूरी बनाए रखना जिसका परिणाम मनुष्य  ने मानवता से भी दूरी बना ली है। सामाजिक दूरी से मानवता से दूरी की ओर उन्मुख हुआ है, पिता, मां, भाई पत्नि की मृत्यु पर सहारा देने के बजाए उनसे मुंह मोड़ने लगे है, वहीं लोगो को भूखमरी, दरिद्रता, और आपदाओं जैसे संकट का सामना करना पड़ रहा है।

  1. निष्कर्ष

निष्कर्षतः कहा जा सकता है की कोरोना का संक्रमण न किसी धर्म से समाप्त हो सकता और न ही किसी राजनीति के धृणित खेल से, इसे समाप्त करने हेतु आवष्यकता है कि समाज को हिंदू-मुस्लिम जैसे साम्प्रदायिक श ब्दों में न जकड़कर पुनः एकता के साथ लोकतंत्र को बचाएं रखने का प्रयास करना आवष्यक है जिसे  सरकार के द्वारा दिए गए दिषा-निर्देषो का पालन करने के उपरांत ही प्राप्त किया जा सकता है। साथ ही इसके नकारात्मक प्रभाव के साथ इसके सकारात्मक प्रभाव देखने को मिले- प्रथम इसने परिवार षैली को अधिक बढ़ावा दिया जहां लोग परिवार से दूर रहने के लिए तत्पर रहते थे वह अब परिवार के पास लौटने के लिए जान की बाजी लगाने को भी तत्पर है। दूसरी ओर इसने वेदों की ओर लौटो जैसे मोदी जी द्वारा दिए गए ’दीये जलाने’ के संदेश  को  जो की ऊर्जा के स्रोत का प्रतीक है, वहीं तीसरा धार्मिक मान्यताएं जो लोगो में थी वह सभी परंपराओं को कोरोना घर पर बंद करके भी समाप्त नहीं कर पाया। नियमित होने वाले कार्यो में सभी कार्यो को भली-भांति संपन्न कि गया, चौथा कार्य कट्टर धार्मिकता को समाप्त कर समाज सेवा की ओर लोगो को अग्रसर होते देखा गया है। वहीं कुछ अस्पतालों और चिकित्सकों के साथ होने वाला दुश्कर्म जिसे मुसलमानों द्वारा जो तब्लीगी जमात से जुड़े हुए थे द्वारा होने वाली घटना जिसके कारण यह आरोंपो के घेरे में आए है उन्हें नकारा नहीं जा सकता।

वहीं इस प्रकार की होने वाली घटनाएं जो प्रकृति की मार के साथ मानव की ही मार मानव को नष्ट  करने पर उतारू है। कोरोना जैसा संक्रमण अपने साथ प्राकृतिक और मानव आपदा दोनो को ही साथ लेकर आया है। जहां प्रकृति ने स्वयं की भरपाई मानवता से करने का प्रयास किया है उदाहरणस्वरूप वर्तमान में होने वाली सभी प्रकार की नदियों का जल षुद्धता में गुणवत्ता को प्राप्त करने में अधिक सफल रहा है, वहीं दूसरी ओर प्रकृति की वायु में फैली विशैली वायु ने स्वयं को स्वच्छता प्रदान की है। इसी प्रकार अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए गांवों को सशक्त किया जाएँ। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दी जाएँ। इससे दो फायदे होंगें- आगामी भविष्य में कभी संकट काल आएगा तो सम्पूर्ण देश एकाएक बन्द नहीं होगा और दूसरा लोगों को अपने आसपास के क्षेत्रों काम मिल पाएगा। चौथी बात हमें ही नहीं सम्पूर्ण विश्व को विकास के साथ प्रकृति के संरक्श ण की बात को हमेशा जेहन में रखनी होगी। इसके अलावा जिस दिन मानव समाज ईमानदारी के साथ पर्यावरण के प्रति वफादारी और शाकाहार के साथ अपने पुरातन संस्कार को आत्मार्पित कर लेगा, कोरोना जैसी विपदा से डरकर घर में छिपने की नौबत नहीं आएगी।

संदर्भ

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  • “17 मई तक लॉकडाउन विस्तारित: क्या खुलेगा, बंद रहेगा”। Livemint। 1 मई 14 मई 2020 को लिया गया।
  • रे, देवराज; सुब्रमण्यन, एस।; वांडेवेल, लोर (9 अप्रैल 2020)। “भारत का तालाबंदी”। भारत मंच।

भारतीय समाज में दिव्यांगों का महत्व-अनिल कुमार पाण्डेय

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भारतीय समाज में दिव्यांगों का महत्व

अनिल कुमार पाण्डेय

मेवाड़ वि.वि. चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)

शोध सार:

भारतीय संस्कृति अनादि काल से ही मानवतापूर्ण रही है। जहाँ पर ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’’ का आदर्शवाक्य जपा जाता था क्योंकि इस परम पवित्र भूमि पर सबको समाप रूप से जीने और रहने का अधिकार है। चाहे वह किसी धर्म-जाति वर्ग या स्तर का हो। मानवतापूर्ण संस्कृति में सभी समान है दिव्यांग हो या अनाथ यह सबको साथ लेकर चलने वाली संस्कृति है। क्योंकि अनेक दिव्यांगों और अनाथों ने देश तथा समाज को नई दिशा देकर भारत ही नही दुनिया को रास्ता दिखाया है इसलिए सभी को सम्मान दें चाहे वह अनाथ हो या दिव्यांग प्रतिभा और प्रखरता सबमें पाई जाती है चाहे वह जिस रूप में हो।

बीज शब्द: दिव्यांग, लोकतंत्र, संस्कृति, प्रतिभा

शोध विस्तार:

भारतीय लोकतंत्र में दिव्यांगों की सामाजिक दशा

तन्त्र और समाज में त्रासित दिव्यांग–

दिव्यांगता कोई अभिशाप या पूर्व जन्मों की सजा या परिवार के पापों का शाप नही वरन् शरीरिक अंगों में कुछ कमी का कारण है जो कि ज्यादातर लोगों में होती है। कुछ कमियों का प्रभाव समझ में नही आता तथा कुछ कमियाँ हमारे जीवन को प्रभावित कर देती है किसी का एक अंग बेकार होने से वो निःशक्त नही हो जाता है।

दिव्यांगता क्या है? निःशक्त व्यक्ति अधिनियम 1995 के अनुसार चिकित्सीय दृष्टि से किसी प्रकार की शरीरिक कमी का प्रतिशत 40 से अधिक होता है तो वह दिव्यांगता की श्रेणी में आता है।

दिव्यांगता ऐसा विषय है जिसके बारे में समाज और व्यक्ति कभी गंभीरता से नहीं सोचते। क्या हमने सोचा होगा कि कोई छात्र या छात्रा अपने पिता के कंधे पर बैठकर भाई के साथ साईकिल चलाकर ज्ञान लेने स्कूल जाता है किन्तु सीढ़ियों पर ही रूक जाता है क्योंकि रैम्प नहीं है। वो कैसे अपनी व्हील चेयर की सीढ़ियों पर चढ़ाये।

उसके मन में एक कसक उठती है कि क्या उसके लिये ज्ञान के दरवाजे बन्द हैं? क्या शिक्षण संस्था में उसके लिये जगह नहीं मिल सकती? शौचालय तो दूर उसके लिये एक रैम्प वाला शिक्षण कक्ष भी नहीं है। जहाँ वह स्वाभिमान के साथ वह अपनी व्हील चेयर चलाकर ले जा सके एवं ज्ञान प्राप्त कर सके।

कोई दफ्तर, बैंक, ए.टी.एम., पोस्ट ऑफिस, पुलिस थाना कचेहरी, नहीं है जहां पर दिव्यांगों की सुविधाएँ उपलब्ध हों। सामान्य दिव्यांगो की तो छोड़िए यहाँ के दिव्यांग कर्मचारियों को भी कोई सुविधाएं नहीं है। अगर दिव्यांगों को बराबर का अधिकार है तो नजर कहाँ आता है?

ट्रेन की बात कर लेते हैं क्या ट्रेनों में दिव्यांग अकेले यात्रा कर सकते है। यहाँ तक कि टेªनों में चढ़ने के लिये भी दिव्यांगों को दूसरों की सहायता चाहिए। उनके लिये कई मूलभूत सुविधायें नही है किसी तरह डिब्बे में चढ़ भी जाये तो ट्रेनों में दिव्यांगों के लिये शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं है। घर में बैठकर सभी सामान्य लोग ऑनलाइन टिकट की बुकिंग कर सकते है लेकिन दिव्यांगों के लिये प्लेटफार्म पर लाईन में लगकर ही टिकट लेनी पड़ती है।

मतदान केन्द्रों पर भी दिव्यांग लोगो को कोई अलग से सुविधा नहीं दी जाती है अधिकांश मतदान केन्द्रों पर रैम्प न होने के कारण दिव्यांग मताधिकार से वंचित हो जाते हैं यह तंत्र एवं समाज के लिये सोचनीय और शर्मनाक बात है।

हर साल दिव्यांगों के लिये भारी सहायता राशि की घोषणा बजट में की जाती है। कागज पर योजनाएँ एवं सुविधाएँ उकेरी जाती हैं लेकिन क्या अभी तक कोई भी तंत्र उन्हें उनके मौलिक अधिकार एवं सुविधाएँ दे सका है। ताकि वे स्वाभिमान के साथ स्कूल-कॉलेज, दफ्तर या सार्वजनिक स्थल पर जा सकें। उसपर शायद कोई नहीं दे सकता है।

हमारा समाज तमाशे का बड़ा शौकिन है जहाँ हटकर कुछ देखा कि तमाशबीन बन गये। दिव्यांगता भी हमारे समाज में तमाशा है। थोथी संवेदनाओं का केन्द्र है। विकलांगों से सभी सहानुभूति रखते हैं। लेकिन उन्हें दोयम दर्जे का व्यक्ति मानते हैं। बेचारे, पंगु, निर्बल, निःशक्त ऐसे ही न जाने कितने संवेदना सूचन शब्दों से लोग अपने को श्रेष्ठ कर लेते हैं।

कितनी ही सरकारी योजनाएँ विभाग बन गये लेकिन क्या दिव्यांगों को हम सबल बना पाये है? क्या उनको राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़कर राष्ट्र निर्माण में उनका योगदान ले पाये है? शायद नही? इसके जिम्मेवार हम सभी है। हम एक भीड़ है जो तमाशा देखती है। अभी इंसान नही बन पाये हैं क्योंकि इंसान में संवदेनाए होती है।

दिव्यांगों के अधिकारों को आवाज देता ‘‘संयुक्त राष्ट्र दिव्यांगता समझौता’’ विश्वव्यापी मानवाधिकार समझौता है। यह समझौता स्पष्ट रूप से दिव्यांगों के अधिकारों एवं विभिन्न देशों की सरकारों द्वारा निर्बाध रूप से विकलांगों के पुनर्वास एवं बेहतर सुविधा की पैरवी करता है।

भारतीय संसद में दिव्यांगों के पुनर्वास एवं उन्हें देश की मुख्य धारा से जोड़ने के लिये दिव्यांग व्यक्ति समाज अवसर अधिकारों का संरक्षण, पूर्ण भागीदारी अधिनियन 1995 दिव्यांगता अधिनियम पारित किया गया। स्वाभाविक तौर पर आसक्त लोगों के अधिकारों को प्रतिपादित करते हुये भारत में संयुक्त राष्ट्र संघ के Rights of persons with disabilities (CRPD) कन्वेंशन में कही गयी बातों को 2007 में अंगीकार किया एवं दिव्यांग व्यक्तियों के लिये बने अधिनियम 1995 संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पारित कन्वेन्शन जिस पर 2008 में अमल शुरू हुआ। के आधार पर बदलों की बात कही।

‘‘दिव्यांग व्यक्ति (समान अवसर, अधिकारों संरक्षण पूर्ण भारीदारी अधिनियम 1995’’ के अनुसार निःशक्त व्यक्तियों के निम्न अधिकार हैं।

  1. 1. अदिव्यांग व्यक्तियों की तरह समान अवसर का अधिकार।
  2. 2. जीवन के कार्यों में सामान्य व्यक्ति के बराबर पूर्ण भागीदारी का अधिकार।
  3. 3. दिव्यांग जनों को कानूनी मान्यता का अधिकार।
  4. 4. दिव्यांग जनों को कानूनी सुरक्षा का अधिकार।
  5. 5. दिव्यांग जनों की देखभाल, पुनर्वास एवं जीवन की मुख्यधारा में शामिल करने के लिये प्राधिकारणों का यह दायित्व है कि वे प्रावधानों के अन्तर्गत दिव्यांगजनों के प्रति कर्तव्यों का निर्वहन करें।
  6. 6. केन्द्र एवं राज्य सरकार का यह दायित्व है कि वे दिव्यांगता को रोकने के लिये तमाम संसाधनों को जुटाये ताकि दिव्यांगता की रोकथाम हो सके।
  7. 7. प्रत्येक दिव्यांग बच्चे को 18 वर्ष तक निःशुल्क शिक्षा का अधिकार है। सरकार को विशेष शिक्षा प्रदान करने वाले स्कूलों क स्थापना करनी चाहिए एवं दिव्यांग बच्चों को प्रशिक्षण के अवसर मुहैया करानी चाहिए।
  8. 8. पाँचवी तक पढ़ाई कर चुके बच्चे मुफ्त स्कूलों एवं विश्वविद्यालयों में अपनी शिक्षा जारी रख सकेंगे एवं उन्हें विशेष पुस्तकें व निःशुल्क उपकरण प्राप्त करने का अधिकार है।
  9. 9. सरकार का कर्तव्य है कि वो दिव्यांग छात्रों के लिये विशेष शिक्षा संबंधी योजनाएँ, पाठ्यक्रम एवं शिक्षक प्रशिक्षण के स्थान स्थापित करें।
  10. 10. सभी श्रेणियों के दिव्यांगों को सरकारी नौकरियों के पदों में आरक्षण होना चाहिए।
  11. 11. दिव्यांजनों को रोजगार देने के लिये विशेष रोजगार केन्द्र होने चाहिए।
  12. 12. आवास पुनर्वास के लिये रियायती दरों में जमीन का आवंटन निःशक्त लोगों के लिये होना चाहिए।
  13. 13. दिव्यांगों के लिये विशेष परिवहन सुविधाओं का विस्तार किया जाना चाहिए एवं यात्रा में विशेष रियायती छूट देनी चाहिए।
  14. 14. गंभीर दिव्यांग व्यक्ति के संस्थानों की मान्यता निर्धारित होंगी।
  15. 15. मुख्य आयुक्त एवं राज्य आयुक्त दिव्यांग व्यक्ति के अधिकारों से सम्बन्धित मामलों की जाँच करेंगे।
  16. 16. गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर स्थानीय प्राधिकरण दिव्यांग व्यक्ति के लिये बीमा योजनाएँ बेरोजगारी भत्ता की योजना बनायेंगे।
  17. 17. छलपूर्वक तरीके से दिव्यांग व्यक्तियों के लाभ लेने वालों को दो वर्ष की सजा या 20,000 रूपये का अर्थदंड लगेगा।

राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण के 58 चक्रों के अनुसार देश में लगभग 1,85,00000 दिव्यांग हैं। जबकि रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया की ओर से जारी रिपोर्ट में देश में दिव्यांगों की संख्या दो करोड़ 68 लाख है। 75 प्रतिशत दिव्यांग ग्रामीण क्षेत्रों में हैं 49 प्रतिशत दिव्यांग साक्षर है एवं 34 प्रतिशत दिव्यांग रोजगार प्राप्त हैं।

मध्य प्रदेश में कुल 11 लाख 31 हजार 405 लोग दिव्यांग हैं।

  1. 1. 4,12,404 लोग दिव्यांग बेरोजगार हैं।
  2. 2. 2,87,052 दिव्यांग दैनिक रूप से आय अर्जित कर जीवन यापन करते हैं।
  3. 3. 2,81,670 दिव्यांग स्वयं का धंधा करते हैं।
  4. 4. 1 हजार रूपये से कम कमाने वाले दिव्यांगों की संख्या 5,05,472 है।
  5. 5. सरकारी क्षेत्र में केवल 15,955 दिव्यांग कार्य करते हैं।
  6. 6. प्रदेश में कुल सर्वेक्षित दिव्यांग जनसंख्या के 80 प्रतिशत यानि 8,89,755 दिव्यांग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करते है।
  7. 7. केवल 19,667 दिव्यांग व्यक्तियों को स्वरोजगार हेतु सरकारी सहायता मिलती है।
  8. 8. सिर्फ 66,962 दिव्यांगों को ही सामाजिक सुरक्षा पेंशन का लाभ मिल सकता है।

सेटर फार इंटरनेट एण्ड सोसायटी द्वारा कुछ वेबसाइड का सर्वेक्षण कराया गया कि कितनी वेबसाइटों की पहुँच दिव्यांगों तक है इनमें से 95 प्रतिशत वेबसाइट विकलांगों की पहुँच से बाहर है जिसमें चुनाव आयोग की वेबसाइट भी शामिल है। ये आंकड़े दर्शाते है कि ये स्थिति कितनी भयावह है। समाज एवं तंत्र दिव्यांगों के प्रति कितना असंवेदनशील है। शिक्षा एवं रोजगार ही दिव्यांगता से लड़ने के मुख्य अस्त्र हैं किन्तु इन दोनों की स्थिति इतनी दयनीय है कि दिव्यांग व्यक्तियों का आत्मबल दम तोड़ देता हैं। फिलहाल करीब 40 कम्पनियाँ दिव्यांगों को नौकरयाँ दे रही हैं। गैर सरकारी संस्थानों की यह पहल निश्चित रूप से दिव्यांगों के जीवन में नये रंग भर सकती हैं।

            आज आवश्यकता है कि दिव्यांगों के समान अधिकार देने, सम्मानपूर्वक व्यवहार करने एवं उन्हें जीवन की मुख्य धारा से जोड़ने कि ताकि वे देश के निर्माण में अपना योगदान दे सकें। उन्हें दया से ज्यादा हमारे साथ एवं संवेदनाओं की जरूरत है।

संदर्भ–

  1. 1. दिव्यांगता अधिनियम 1995।
  2. 2. संयुक्त राष्ट्र संघ दिव्यांगता अधिनियम 2000।
  3. 3. भारतीय जनगणना 2011।
  4. 4. सेंटर फार इंटरनेट सोसायटी।
  5. 5. रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इण्डिया की रिपोर्ट के अनुसार।
  6. 6. राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण।

नारी-विमर्श की दृष्टि से ‘कौन नहीं अपराधी’ उपन्यास में नारी संघर्ष: प्रो. राजिन्द्र पाल सिंह जोश,

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नारी–विमर्श की दृष्टि से ‘कौन नहीं अपराधी‘ उपन्यास में नारी संघर्ष

प्रो. राजिन्द्र पाल सिंह जोश                                                                                       अनुराधा कुमारी

हिंदी विभाग                                                                                                                        शोधार्थी

स्नातकोत्तर राजकीय कन्या महाविद्यालय                                                                              पंजाब विश्वविद्यालय

सेक्टर 42, चंडीगढ                                                                                                                    चंडीगढ़                                                         

शोध सार:

नारी विमर्श की दृष्टि से उपरोक्त विवरण के आधार पर यह स्पष्ट है कि ’कौन नही अपराधी’ उपन्यास नारी संघर्ष की अभिव्यक्ति है । नारी बचपन से ही संघर्ष करना आरम्भ करती है और इस समाज में उसे आयुपर्यन्त संघर्ष ही करना पड़ता है । इस तथ्य को लेखिका ने अनेक पात्रों के संघर्षमयी जीवन से दर्शाया है चाहे नायिका सीमा हो, रीमा, उम्मी, अंशु, प्रमिला, कमला, विमला, महिमा, आसफा, सरिता इत्यादि कोई भी प्राप्त हो वह कहीं न कहीं, किसी ना किसी प्रकार के शोषण से ग्रस्त है। शोषण होने के पश्चात भी उसमें संघर्ष की हिम्मत और असंगत के प्रति रोष है। स्त्री को स्वयं सक्षम बनना होगा।

बीज शब्द: नारी, संघर्ष, उपन्यास, चिंतन, मुक्ति, सशक्तिकरण

शोध विस्तार

विमर्श को चिंतन मनन की प्रक्रिया के रूप में समझा जा सकता है और जब इस चिंतन, मनन के केंद्र में नारी व् उसकी स्थिति आ गई तो यह नारी-विमर्श में परिवर्तित हो गया| वास्तव में नारी विमर्श किसी प्रकार की बहस का मुद्दा नहीं है | यह तो नारी जाग्रति और उसके अधिकारों के लिए है| नारी-विमर्श शब्द की उत्पत्ति इन दोनों शब्दों के योग से हुई है| अत: यह सपष्ट ही है की इसमें नारी चिंतन, उत्पीड़न, शोषण, संघर्ष, मुक्ति की चाह, सशक्तिकरण शामिल है |  नारी की स्थिति चिंता का विषय रही है जब उस पर गहन चिंतन आरम्भ हुआ तो नारी विमर्श उभर कर सामने आया | रथ के दो पहियों की भांति नर-नारी का जीवन समान महत्वपूर्ण है परन्तु जब नारी को हिन् दृष्टि से देख सम्मानजनक महत्वपूर्ण स्थान न मिला तो नारी को प्रतिष्ठित स्थान दिलाने का कार्य नारी-विमर्श ने किया |   

            हिन्दी साहित्य में एक सुपरिचित और प्रतिष्ठित नाम है ’कृष्णा अग्निहोत्री’ जिन्होंने अपने साहित्य में समाज के चिरशोषित वर्ग नारी को सार्थक अभिव्यक्ति प्रदान की है। उन्होंने कहानियों और उपन्यासों दोनों पर ही अपनी कलम चलाई और हर रचना के केन्द्र में नारी को ही चुना है। कृष्णा अग्निहोत्री अपने उपन्यासों के माध्यम से न केवल पाठकों और आलोचकों को,  स्थितियों की,  विद्रूपता दिखा कर चौंका  देती हैं बल्कि, उन्हें सोचने और विचारने के लिए भी मजबूर कर देती है। यदि इन्हें शोषित महिलाओं की बेबाक प्रवक्ता कहा जाए तो ये बिल्कुल भी असंगत नहीं होगा। दिनेश द्विवेदी आपके सम्बन्ध में लिखते हैं-’’पुरूष के सामन्ती और भोगवादी केक्टसी नज़रिये से चुभी और बिंधी हुई समर्पित नारी की मूक चीत्कार को यदि किसी ने अपने सशक्त कथानकों और तिलमिला देने वाली समस्याओं से व्यक्त किया है तो वह है-कृष्णा अग्निहोत्री।’’¹यह पूर्णतः सत्य भी है क्योंकि कृष्णा अग्निहोत्री की रचनाओं के केन्द्र में नारी ही है।

नारी चाहे किसी भी वर्ग की हो अमीर-गरीब, चाहे कितनी भी पढ़ी लिखी हो या अनपढ़, चाहे घरेलू हो या फिर कामकाजी, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उनका प्रत्येक स्तर पर शोषण ही होता रहा है। इसी कटु सत्य को आधार बनाकर कृष्णा अग्निहोत्री बार-बार पाठकों के सामने पेश करती हैं तभी उनकी रचना की कथावस्तु के केन्द्र में नारी ही रहती है। उनका ऐसा ही एक उपन्यास है ’कौन नहीं अपराधी’ जिसके केन्द्र में फिर से नारी को रखा गया है। इस उपन्यास की भूमिका में कृष्णा अग्निहोत्री स्वीकार करती हुई कहती है-’’जी हां, पुनः मैनें ’नारी’ को इस उपन्यास का प्रमुख पात्र बनाने की हिम्मत जुटायी है, क्योंकि सच्चाई यह है कि जितनी सूक्ष्मता से मैं उनके अन्दर प्रवेश कर सकती हूँ उतनी

 सहजता से अन्यत्र नहीं।’’² वास्तव में नारी जीवन से जुड़ी हुई समस्याएँ अनन्त हैं जिनका अन्त होता नज़र नहीं आता और उन्हें समाज के समक्ष रखना भी अत्यन्त आवश्यक है।

            ’कौन नहीं अपराधी’ उपन्यास अपने आप को सार्थक करता हुआ समाज के अपराधीपन को उद्घाटित करता है तथा समाज के प्रत्येक तबके से यह प्रश्न करता है कि आखिर नारी की ऐसी स्थिति के लिए अपराधी कौन नहीं है ? अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति इस अपराध में शामिल है चाहे वो नारी ही क्यों न हो, जो ऐसी नियति को स्वीकार करती है। परन्तु इसके बावजूद भी समाज में ऐसी नारियाँ मौजूद है जो संघर्ष करती हैं और अपनी स्थिति को बदलने के लिए प्रयत्नशील हैं। इस उपन्यास में एक ऐसे ही पात्र को लिया गया है जिसमें अनेक गुण विद्यमान हैं, बावजूद इसके उसे समाज का चौतरफा शोषण सहना पड़ता है। कृष्णा अग्निहोत्री ने इस पात्र के चरित्र के सभी पहलू पाठकों के सम्मुख रखकर सचमुच में एक जीवंत पात्र की संकल्पना की है। यह पात्र कहीं न कहीं समाज की नग्न सच्चाई को भी पाठकों के समक्ष पेश करता है कि समाज एक पति परित्यक्ता स्त्री के साथ कैसे पेश आता है। इस उपन्यास की नायिका का नाम सीमा है। सीमा की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए ’डाॅ. बालाजी श्रीपती भुरे’ अपनी पुस्तक ’कृष्णा अग्निहोत्री के उपन्यासों में नारी’ के अन्तर्गत लिखते हैं-’’पुरूष वर्चस्व ने जब चाहा नारी को बाँधा, जब चाहा छोड़ दिया। जीवनसंगिनी बनाया और कुछ क्षणों के बाद परित्यक्ता का खिताब दे डाला। झोली में एक बच्ची का उत्तरदायित्व डाला और विदेश भाग गये।’’ङ इस अचानक से आई स्थिति के कारण सीमा का सारा जीवन संघर्षों से घिर जाता है।

सीमा जो कि इस उपन्यास की नायिका है लेखिका ने उसके अन्दर अनेक गुण दिखाए हैं। वह एक सम्माननीय व्यक्तित्व की स्वामिनी है तो साथ ही अनेक मानवीय गुणों से भरपूर है। उसके हृदय में सभी के लिए स्नेह और दयाभाव है, परन्तु उसके जीवन की कटुता तो देखो कि बचपन से ही उसकी माँ और बहन रीमा उसके साथ बस सौतेला व्यवहार ही करते रहे । कभी-कभी तो उसे लगता भी है कि यह शायद उसकी सगी माँ नहीं अपितु सौतेली है। परन्तु फिर भी उसने ऐसे ख्याल को अपने मन पर कभी हावी नहीं होने दिया। सीमा का विवाह जल्दी हो गया और कुछ समय पश्चात् ही उसने बेटी को जन्म दिया। जिसका नाम उम्मी रखा गया। बेटी के जन्म के पश्चात् बिना किसी कारण के सीमा का पति उसे छोड़ कर विदेश चला जाता है । इस पर भी उसकी बहन रीमा ताना कसती हुई कहती है-’’भाई सबको अपनी समस्याएँ सुलझानी पड़ती है। आप जानो, मैं तो इतना जानती हूँ कि पत्नी में दमखम हो तो पति हाथ से बाहर नहीं जा सकता है।’’4इतना सुनते ही सीमा सकते में आ जाती है कि- क्या यह उसकी सगी बहन है जिसे उसकी हल्की सी भी चिंता नहीं। सीमा अपनी नन्हीं सी बेटी को लेकर किराए का कमरा लेकर रहने लगती है और  उसका जीवन संघर्षों से भर जाता है। सीमा डेकोरेटर का काम आरम्भ करती हुई अपनी बेटी को एम. ए. करवाने के बाद एक शिक्षिका बनाती है। सीमा के माध्यम से कामकाज़ी महिलाओं की समस्याओं की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया है।

            नारी को समाज में अपना स्थान बनाने के लिए अत्यन्त संघर्ष करना पड़ रहा है। मुख्यतः समाज में उसका शोषण करने वाले लोग ही अधिक मिलते है। चाहे यह शोषण शारीरिक स्तर पर हो या मानसिक धरातल पर। उम्मी जोकि अपने नंपुसक पति द्वारा छली जाती है वह उसे प्रत्येक कदम पर मानसिक और शारीरिक पीड़ा पहुँचा कर संतोष प्राप्त पाता है। लेखिका पति द्वारा छली गई उम्मी की पीड़ा को व्यक्त करती हुई कहती है-’’क्या आज बिस्तर पर घटित उसके इस आहत तन व मन की कोई साक्षी समाज को सौंपी जा सकती है ? उसके इस घाव से रिसते रक्त को कोई देख सकता है ? एक बन्द कमरे में बीते ऐसे कलुषित नकारें क्षणों का किसे निर्णायक होना चाहिए, भोक्ता या श्रोता को ?’’5उम्मी जो घर से बाहर नौकरी करे और वहाँ भी अनेक समस्याओं से संघर्ष करे उसे ही घर आकर पति की मार सहनी पड़ती है। उम्मी बिना वजह अपने पति की मार सहन करती है परन्तु लेखिका ने उसमें परिवर्तन दिखाया और उम्मी अपने पति का विरोध करती हुई कहती है-’’तुमने मेरे हाथों में अदृश्य बेडि़याँ डाल रखी है, अब मैं इन्हें सह नहीं सकुंगी। अच्छी तरह समझ रही हूँ कि इन्हें मुझे ही काटना पड़ेगा। मैं कोई चाभी का खिलौना नहीं जिसे तुम जब चाहो चलाओ, फेंको और तोड़ डालो समझे।’’6उम्मी के भीतर यहीं से विद्रोह की चेतना का उन्मेष होता हुआ दिखाई देता है।

इस उपन्यास के माध्यम से कृष्णा अग्निहोत्री ने समाज की ऐसी स्त्रियों को संघर्ष के मैदान में उतारा है जो पति परित्यक्ता हैं, समाज द्वारा शोषित हैं या पति द्वारा प्रताडि़त हैं अथवा जिनके पति नपुंसक हैं। मध्यवर्ग की उम्मी हो या फिर उच्च वर्ग की सरिता, हिन्दु समाज की शुभाहो या मुस्लिम धर्म की आसफा या ईसाई महिला कमला। सभी किसी न किसी तरह की त्रासदी को भोगने के लिए विवश है। उपन्यास की एक पात्र है -विमला। जिसका बॉस उसका शारीरिक शोषण करता है और विद्रोह करने पर धमकी देता हुआ कहता है-’’यदि विमला मेरे साथ खुशी से रहो तो तुम्हें धन भी मिलेगा और प्रमोशन भी। यदि मुँह खोलोगी तो तुम्हारे मुँह पर तेजाब फिंकवा दूँगा।’’7विमला उसकी धमकी से डरती नहीं है बल्कि जीवन में उससे कभी न मिलने का निर्णय लेते हुए नौकरी छोड़ कर विवाह कर लेती है।

            यह उपन्यास मात्र सीमा की ही गाथा नहीं है अपितु चार पीढि़यों की गाथा है जिसमें सबसे पहली पीढ़ी सीमा की माँ है। दूसरी पीढ़ी सीमा और उसकी बहन रीमा। तीसरी पीढ़ी के अन्तर्गत सीमा की बेटी उम्मी और रीमा की बेटी रवीना। चैथी पीढ़ी में उम्मी की बेटी अंशु शामिल है। ये पीढि़याँ किसी भी आयुवर्ग की हो पर जीवनयापन के लिए संघर्ष प्रत्येक पीढ़ी को करना पड़ता है । इनके संघर्षों के कारण यह उपन्यास केवल नारी मुक्ति तक ही सीमित नहीं अपितु इसमें राजनीतिक भ्रष्टाचार, व्यवस्था की कुरूपता का भी चित्रण किया गया है। ईसाई धर्म की कमला की बेटी महिमा का उसके मौसेरे भाई द्वारा बलात्कार किया गया, यही नहीं इस के बाद वो अपने चार दोस्तों से भी उसका बलात्कार करवाता है कि कहीं वो अपना मुँह न खोल दे। इस जघन्य हत्याकाण्ड को भ्रष्ट व्यवस्था की वजह से भुला दिया गया। लेखिका कहती है-’’पचासी लाख रूपयों के मोह में प्रांत की पुलिस ’महिमा कांड’ भूल गयी। धीरे से वह चैकीदार भी गायब हो गया और गुड्डू के अपराध की फाइल न जाने थाने के किस शैल्फ में ऐसे चिपकी की ढूँढने पर भी नहीं मिली।’’8ऐसे भ्रष्ट तन्त्र से न्याय के लिए एक अकेली महिला कब तक अपना संघर्ष जारी रख सकती है? 

उपन्यास में एक विशिष्ट पात्र रीमा है जो कि सीमा की छोटी बहन है। सीमा से वह बचपन से ही ईष्र्या करती है। कहीं न कहीं उसमें अपने आपको अधिक श्रेष्ठ दिखाने की चाह है। परिवार वालों के विरोध करने के बावजूद भी वो असगर नाम के मुस्लिम युवक से विवाह कर विदेश चली जाती है। जब भी भारत आती है तो अपनी अमीरी का रौब सबके ऊपर झाड़ती है। ऊपर से दिखने में सीमा जितनी संयत और सफल वैवाहिक जीवन वाली लगती है भीतर से वो उतनी ही उलझी और परेशान है। परन्तु वह फिर भी समस्याओं से निपटती हुई उन्हें सुलझाती है। रीमा के पति का पहला विवाह हो चुका है और पहली पत्नी से बच्चे भी है। रीमा को यह बात बहुत बाद में पता चलती है और वो साफ शब्दों में असगर से कह देती है कि मैं यह बिल्कुल सहन नहीं कर सकती। जब असगर अपनी पहली पत्नी और उसकी बेटी की वजह से भारत आकर बसना चाहता है तो रीमा तीव्र विरोध करती हुई अपनी माँ से कहती है-’’मैं कैसे एकाएक सब छोड़कर यहाँ रोने आ जाऊँ। प्लान करना पड़ता है, अपनी जड़ें उखाड़ने के लिए जब तक इनका यह सिलसिला जारी रहेगा, मैं वापस नहीं आ सकूँगी।’’9रीमा के अंदर संघर्षों से लड़ने की जुझारू प्रवृत्ति नजर आती है।

               उपन्यास के अन्य पात्रों के माध्यम से नारी स्वावलम्बन को भी उजागर किया गया है। एक ऐसा ही पात्र है –शांति, जोकि सीमा की कामवाली बाई है और एक निम्न परिवार से है। उसका पति शराबी है और रोज रात को शराब पीकर उसे मारता है। शांति अनपढ़ है परन्तु कर्मठ है। वो जो भी मेहनत करके कमा के लाती है उसे उसका पति छीन कर शराब पी जाता है। सीमा शांति का साथ देती है और उसे समझाती है कि उसे हार नहीं माननी चाहिए बल्कि अपने पति का डटकर मुकाबला करना चाहिए। सीमा की बातों से ही प्रभावित होकर शांति, संघर्ष करती हुई अपने पति को लच्छन सुधारने के लिए कहती है। वह सीमा को इस बारे में बताती है-’’कह दिया है लच्छन सुधार ले, वरना घर में भी ताला डाल दूँगी। दे किराया और खोल ताला।’’10नारी को संघर्ष से यदि मुक्ति चाहिए तो उसका मुख्य आधार नारी का आर्थिक स्वालंबन ही है।    

सरिता एक समाज सेविका है जो कि उच्च वर्ग से सम्बन्ध रखती है। अपने पति के पैसे और प्रेमी की पहुँच के कारण वो नगरपालिका चुनाव जीत जाती है। परन्तु नगर की भलाई के लिए वो कोई भी उचित निर्णय नहीं ले सकती क्योंकि एक तरफ उसका पति कुछ कहता है और दूसरी तरफ उसका प्रेमी सूरजभान कुछ और करवाना चाहता है। उसका जीवन इन दोनों के कारण अनेक संघर्षों में फंस कर रह जाता है। जब वह नगर सुधार के लिए कार्य करना चाहती तो उसका विरोधी ’पालीवाल’ सरिता और सुरजभान के बेहूदा चित्र अखबार में प्रकाशित करवा देता है। यदि किसी औरत को कमजोर करना हो तो सबसे पहला हथियार उसका चरित्र हनन करना है और यही कार्य पालीवाल करता है। इस पर टिप्पणी करते हुए सरिता सीमा से कहती है – ’’मै मानती हूँ कि सूरजभान मुझे पसन्द करते हैं लेकिन मै वेश्या नही हूं कि सारे नेताओं का बिस्तर गरम करूंगी।’’11 जब सरिता अधिक विद्रोह करती है तो संदिग्ध अवस्था में अधजली हुई लाश उसी के घर में मिलती है । कुछ लोग कहते है कि सरिता ने आत्महत्या कर ली तो कुछ लोग दबी हुई आवाज में कहते है कि सरिता की हत्या कर दी गई।

निष्कर्ष –  नारी विमर्श की दृष्टि से उपरोक्त विवरण के आधार पर यह स्पष्ट है कि ’कौन नही अपराधी’ उपन्यास नारी संघर्ष की अभिव्यक्ति है । नारी बचपन से ही संघर्ष करना आरम्भ करती है और इस समाज में उसे आयुपर्यन्त संघर्ष ही करना पड़ता है । इस तथ्य को लेखिका ने अनेक पात्रों के संघर्षमयी जीवन से दर्शाया है चाहे नायिका सीमा हो, रीमा, उम्मी, अंशु, प्रमिला, कमला, विमला, महिमा, आसफा, सरिता इत्यादि कोई भी प्राप्त हो वह कहीं न कहीं, किसी ना किसी प्रकार के शोषण से ग्रस्त है। शोषण होने के पश्चात भी उसमें संघर्ष की हिम्मत और असंगत के प्रति रोष है। स्त्री को स्वयं सक्षम बनना होगा। इस संदर्भ में रमणिका गुप्ता लिखती हैं- ’’स्त्रियां स्वयं सक्षम बने और कानूनों का उपयोग करें। झूठी इज्जत, बर्बर और गैर जिम्मेवार परिवार व जड़ समाज की प्रतिष्ठा की भावना को अपने मन से निकाले बिना या इन संस्थाओं को ध्वस्त किए बिना, एक ऐसा नया समाज नहीं बन सकता, जहां स्त्री भी एक मनुष्य समझी जाए।’’ यह सत्य भी है कि नारी को अपनी स्थिति सुधारने के लिए स्वयं ही प्रयास करना होगा। समाज में प्रचलित रूढ़ मानसिकता, पितृसत्तात्मक व्यवस्था, अंधविश्वासों. गल चुके रीति -रिवाजों के द्वारा नारी शोषण की जो प्रिक्रिया चलती आ रही है उससे भी नारी को स्वतंत्रता दिला कर स्वयं का अस्तित्व कायम करने में सहायता करना नारी विमर्श का लक्ष्य है| 

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची

  1. 1. गीते, नीहार, कृष्णा अग्निहोत्री सम्पूर्ण साहित्य का मूल्यांकन, कानपुर: अमन प्रकाशन, पृष्ठ-45
  2. 2. अग्निहोत्री, कृष्णा, कौन नहीं अपराधी, कानपुर: अमन प्रकाशन, पृष्ठ-7
  3. 3. भुरे, बालाजी श्रीपति, कृष्णा अग्निहोत्री के उपन्यासों में नारी, कानपुर: शैलजा प्रकाशन, पृष्ठ-118
  4. 4. अग्निहोत्री, कृष्णा, कौन नही अपराधी, कानपुर: अमन प्रकाशन, पृष्ठ-29
  5. 5. वही, पृष्ठ-51
  6. 6. वही, पृष्ठ-65
  7. 7. वही, पृष्ठ-251
  8. 8. वही, पृष्ठ-237
  9. 9. वही, पृष्ठ-211
  10. 10. वही, पृष्ठ-240
  11. 11. वही, पृष्ठ-291
  12. 12. गुप्ता, रमणिका, स्त्री मुक्ति संघर्ष और इतिहास, नई दिल्ली: सामयिक प्रकाशन पृष्ठ-1
 
 

 

 

 

 

आधुनिक युग के स्त्री-प्रश्न:अंजलि कुमारी

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आधुनिक युग के स्त्री–प्रश्न                                                                

                                                           अंजलि कुमारी 
                                   शोधार्थी (पी.एचडी)
हिन्दी विभाग
दिल्ली विश्वविद्यालय
ई-मेल- anju11091992@gmail.com

सारांश– प्रस्तुत आलेख में स्त्री-जीवन से संबन्धित उन समस्याओं की चर्चा की गयी है आधुनिक युग की स्त्रियों के समक्ष खड़ी हैं । आधुनिक स्त्री हमारे समाज में दोहरी भूमिकाओं में प्रस्तुत है । नयी स्त्री की ये समस्याएँ नए स्त्री प्रश्नों को जन्म देती हैं । अपनी प्रवृत्ति में ये प्रश्न प्राचीन स्त्री-प्रश्नों की ही भाँति गंभीर और उलझे हुये हैं । इनके सुलझने में केवल स्त्री नहीं वरन उसके आस-पास के पूरे परिवेश, स्त्री से जुड़े प्रत्येक स्तर एवं प्रत्येक व्यक्ति का सहयोग अपेक्षित है जो इसे एक जटिल प्रक्रिया बनाता है । यह आलेख उन्हीं सब मुद्दों व उनके समाधान के विभिन्न प्रस्तावों के एक प्रयास को समेटता है । स्त्री के व्यक्तिगत एवं व्यावसायिक जीवन की विविध परिस्थियों के माध्यम से हम इन स्त्री-प्रश्नों को समझने का प्रयास करेंगे ।

की–वर्ड्स–  आधुनिकता, स्त्री-प्रश्न, सेल्फ-आइडेंटिटी, स्त्री का नया अवतार (सुपर-वूमेन), विवाह का प्रश्न, स्त्री की दोहरी भूमिका, स्त्री स्वातंत्र्य और सामंजस्य 

शोध विस्तार

आधुनिक युग के आगमन के साथ ही ‘मनुष्य’ केंद्र में आता है । इस ‘मनुष्य’ शब्द में केवल ‘पुरुष’ अंतर्निहित नहीं है, अब ‘स्त्री’ भी इस धारा में शामिल है । ‘सेल्फ आइडेंटिटी’ की अवधारणा ने इस दौर में अपनी जगह बनायी और पारंपरिक युग में जो दहलीज़ के पीछे, दरवाज़े की ओट में, पर्दे के भीतर छिपी खड़ी थी, वह स्त्री अब कदम बढ़ाकर चौखट के बाहर आयी है । दो गज़ का घूँघट अब उठ चुका है, ओट अब ‘नेतृत्व’ में परिवर्तित हो चुका है । घर की लक्ष्मी अब धनर्जन हेतु घर से बाहर आकर काम करने लगी है । ऐसे में भारतीय समाज में सदियों से पैठ जमाये संकुचित परिवेश और मानसिकता, रूढ़ियों एवं कुरीतियों से स्त्री कुछ उबर पायी है और अपना अस्तित्व स्थापित करने के नवीन अवसर उसे प्राप्त हुये हैं । अब उसका कार्यक्षेत्र विस्तृत है और इसके विस्तार के साथ ही स्त्री हेतु  उत्तरदायित्वों ने भी विस्तार पाया है, उनका कार्यभार बढ़ गया है । आज स्त्रियाँ घर और बाहर की दोहरी भूमिकाओं में नज़र आती हैं । स्त्री आज अपने नए अवतार में ‘सुपर वूमेन’ के रूप में प्रस्तुत है जिसे आजकल ‘पावर वूमेन’ भी कहा जा रहा है । “यह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर, अपनी उपलब्धियों पर गर्व करने वाली, आत्मविश्वास, अधिकार और समृद्धि से भरी ‘पावर वूमेन’ है जो पुरुषों की बॉस भी हो सकती है ।”1  यह स्त्री अपनी और परिवार की आवश्यकताओं हेतु सदैव तत्पर है । किन्तु नए दायित्व नयी चुनौतियों को जन्म देते हैं, इससे आज की स्त्री अछूती नहीं है । हम स्त्री-जीवन की कुछ स्थितियों के आधार पर इसकी चर्चा करेंगे ।

                        लड़की जब अपने मता-पिता के संरक्षण में है माँ-बाप उसकी प्रतिभा को पहचानते हुये उसे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं । अच्छा परिणाम प्राप्त होने पर सभी उसकी सराहना करते हैं । एक रोज़ वह होनहार लड़की अपनी मेहनत से अच्छी नौकरी प्राप्त कर लेती है ।  वह परिवार की आर्थिक व्यवस्था में अपना योगदान देना आरंभ करती है । वह अब अपने लिए भौतिक संसाधन जुटाने में सक्षम है । ऐसे में उसे पुरुष की कुछ खास आवश्यकता अपने जीवन में महसूस नहीं होती । अब विवाह और संतति से वह कतराने लगी है क्योंकि यह उसके जीवन की स्वच्छंदता में बाधक हो सकते हैं । विवाह के बाद उसे परवश हो जाने का भय सताता है । “जिस असुरक्षा के कारण औरत पति के घर को छोड़ नहीं पाती थी, उस आर्थिक सुरक्षा को आज औरत ने पा लिया है और जब उसे लागने लगा है कि यदि पति उसका आदर नहीं करता और उसे घर और बाहर कि ज़िम्मेदारी स्वयं पूरी करनी है, बच्चे पैदा करने के बाद उनका लालन–पालन स्वयं करना है, तो फिर पति नाम के रिश्ते कि ज़रूरत क्या है? तनख्वाह वह लाती है । समाज में उसे कुर्सी के चलते सम्मान मिला हुआ है । वह अपने मातहतों पर हुक्म चलती लेती है । सहकर्मियों से समय पड़ने पर सहायता मिल जाती है, फिर यह विवाह किसलिए? पिटने, जलने, लड़ने, या फिर तलाक़ के लिए ? इससे बेहतर है, शादी की ही न जाए । उसकी जगह भौतिक सुखों को अपनी मेहनत से प्राप्त कर चैन–भरी ज़िंदगी गुज़ारी जाए ।“2  यह उन्हें अधिक सहज प्रतीत होता है । अब जब स्त्रियाँ सुशिक्षित, आत्मनिर्भर और स्वच्छंद हैं तब माँ-बाप कि पसंद से शादी करने का दबाव भी उन पर नहीं  रह गया है । हाँ, यह ज़रूर है कि उन्हें अब जीवन में ‘पति’ के रूप में  ऐसे पुरुष की आवश्यकता है जो उनको समझ सकें, उनके अस्तित्व और उनके काम की कद्र करें, कार्यस्थल पर स्त्री के पुरुष सहयोगियों को लेकर मन में कोई शंका न रखें, स्त्री के पारिवारिक-व्यावसायिक जीवन के भार को हल्का बनाने में उन्हें सहयोग दें, दोहरे काम के बोझ तले उनकी स्थिति को समझते हुये उनके साथ खड़े रह सकें । विवाह को आपसी सहयोग से केवल स्त्री के लिए संकट का कारण बनने से बचायें ।  अन्यथा ‘विवाह’ कामकाजी स्त्रियों हेतु ‘सिर पर लदा भारी बोझ’ मात्र बनकर रह जाएगा । समस्या यह है की सभी स्त्रियों को ऐसा साथी मिल पाना मुश्किल है, चाहे वह उन्हें स्वेच्छा से ही क्यों न चुनें । पुरुष दंभ को त्याग स्त्री का सहचर बन सकने वाले साथी का समाज में अभाव है । इसके लिए पुरुष-मानसिकता में परिवर्तन अपेक्षित है ।

                       दूसरी स्थिति वह है जहाँ नौकरीपेशा स्त्री का विवाह हो गया और वह संयुक्त परिवार वाले ससुराल में चली गयी ।  नयी पीढ़ी तो आधुनिक है किन्तु पुरानी पीढ़ी के लोग जो घर के ‘गार्जियन’ हैं, वे पारंपरिक और रूढ़िवादी मूल्यों-मान्यताओं का अनुसरण करने वाले होते हैं । ऐसे में ‘सास’ के रूप में जो स्त्री वहाँ मौजूद है वह अपने जीवन की परिस्थितियों द्वारा ही नयी पढ़ी-लिखी बहू का मूल्यांकन करेगी । बहू से की जाने वाली अपेक्षाओं का पतिगृह में कोई अंत नहीं होता । प्राचीन और नवीन मूल्यों की टकराहट से सम्बन्धों में बिखराव का खतरा बढ़ जाता है । पुरानी पीढ़ी तो लकीर का फकीर बनी अपनी मानसिकता पर अडिग अटल रहेगी । समंजस्य स्थापित कर सकने का सम्पूर्ण दायित्व नयी पीढ़ी का ही होगा और वो भी केवल बहू रूपी स्त्री पर । इस स्थिति में स्त्री सबसे ज़्यादा ‘एडजस्टमेंट’ करती है । पति के घर वालों को बहू के धन कमाने का तो सुख महसूस होगा किन्तु साथ ही घर के काम में तनिक भी ढील वे बर्दाश्त नहीं कर सकते । नौकरी के लिए जाने से पहले और नौकरी से लौटकर स्त्री घर के सभी काम समय से पूर्ण करने को विवश है, अन्यथा वह घरेलू आलोचना का शिकार बनती है । कार्यस्थल के निश्चित समय या अत्यधिक कार्यभार के कारण यदि स्त्री घरेलू कामकाज में कुछ अक्षमता महसूस करे तो उस पर चारों ओर से अपना काम ठीक तरह से  करने का दबाव बना रहता है और यदि कार्य संभाला नहीं जा रहा तो पति या उसके घरवालों की ओर से उसे नौकरी छोड़ने तक की सलाह दे दी जाती है ।  इन परिस्थितियों से कुशलतापूर्वक निपटने के लिए पतिगृह के लोगों का घरेलू कार्यों में सहयोग एवं ‘मौरल सपोर्ट’ अपेक्षित है । ऐसा न होने पर स्त्री हर प्रकार के कार्यभार से त्रस्त मानसिक यंत्रणा, चिड़चिड़ापन व ‘स्ट्रैस एवं फ्रस्ट्रेशन’ का शिकार हो सकती है । “पारंपरिक विवाहिता और स्वावलम्बी बने रहने में स्त्री पर जिम्मेवारियों में वृद्धि होती है, बदले में उसे तनाव व थकान मिलती है । पुरुष प्रधान परिवेश में परवरिश स्त्री से ‘अधिकारों का त्याग‘ मांगता है और स्वावलंबन ‘अधिकारों की चाह‘, इन दोनों के बीच बँटी हुयी स्त्री निरंतर तनाव झेलती है और टुकड़ा–टुकड़ा जीती है ।“3  इस प्रकार बाहरी श्रम में तो स्त्रियाँ भागीदार बन चुकी हैं किन्तु घरेलू श्रम में पति या पतिगृह के लोग स्त्री के साथ वह श्रम बाँटना नहीं चाहते । पितृसत्तात्मक दंभ इसके आड़े आता है ।

आधुनिक युग में एकल परिवारों की संकल्पना बढ़ रही है, किन्तु संयुक्त परिवार अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुये हैं । और एकल परिवारों में पति-पत्नी यदि आपसी सहयोग-सामंजस्य से घर चला भी लेते हैं तो वहाँ फिर दूसरी तरह की समस्यायें सामने आती हैं ।

                       तीसरी स्थिति में स्त्री के समक्ष चुनौती है उसके ‘मातृत्व का प्रश्न’ । इसे भी हम संयुक्त एवं एकल परिवार के आलोक में समझेंगे । “विवाह के परंपरागत एवं मुख्य उद्देश्यों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य संतानोत्पत्ति है । स्त्री के मातृत्व को उसकी पूर्णता और गरिमा से जोड़ा जाता है । स्त्री का समस्त अभिनंदन उसके मातृ रूप में संस्थित होने का अर्चन है ।”4  संयुक्त परिवारों में कामकाजी स्त्रियाँ यदि अपने करियर पर ध्यान देना चाहती हैं तब भी संतानोत्पत्ति हेतु उन पर पारिवारिक दबाव बना रहता है । परिवार की वंशावली में वृद्धि विवाह के बाद स्त्री का मूल कार्य समझा जाता है ।  “मातृत्व स्त्री पर अतिरिक्त भार डालता है एवं उसके कार्य को लगभग तिगुना कर देता है । यह अतिरिक्त कार्य स्त्री के कामकाजी होने पर समस्या को बढ़ा देता है । कैरिअर और आत्म–विकास की दृष्टि से जो वर्ष महत्वपूर्ण होते हैं उन्हीं वर्षों को वैज्ञानिक दृष्टि से माँ बनने के लिए उपयुक्त माना जाता है । मानव–शिशु के परनिर्भरता की अवधि लंबी होती है ।”5  एकल परिवार में यदि स्त्री कामकाजी है तो मातृत्व-सुख के लिए पूरी योजना के साथ पति-पत्नी को तैयार होना आवश्यक है ।  स्त्री और पुरुष दोनों के नौकरीपेशा होने के साथ संतान के दायित्व का प्रश्न चिंता का विषय हो जाता है । किसी पारिवारिक देखभाल करने वाले के अभाव में स्त्री को अपनी संतान को बहुत छोटी उम्र में ही या तो किसी ‘बेबी डे केयर सेंटर’ में ‘बेबी-सिटर’ के पास छोड़ना होगा या किसी आया के भरोसे । ऐसे में बच्चे की सही देखभाल और सुरक्षा का प्रश्न बड़ा प्रश्न साबित होता है । कार्यस्थल पर कार्यरत स्त्री का अधिकतर ध्यान अपनी संतान पर केन्द्रित होता है और वह अपने काम से लगातार ‘डिस्ट्रेक्ट’ रहती है ।  कोई विकल्प न होने पर स्त्री बच्चे की अच्छी परवरिश के लिए अपनी नौकरी छोड़ने पर विवश होती है ।  इस प्रकार की परिस्थितियों में संतानोत्पत्ति स्त्री के लिए एक अतिरिक्त कार्यभार बन जाता है । करियर और मातृत्व में से किसी एक का चुनाव नवीन स्त्री-प्रश्नों में शामिल है ।

                       सदियों से मुक्ति की आकांक्षा में छटपटाती स्त्री आधुनिक युग में पिछली शताब्दियों की तुलना में स्वतंत्र हो चुकी है । अब उसके समक्ष किसी के अधिकार-क्षेत्र की वस्तु बन कर जबरन जीवन-यापन करने की कोई विवशता नहीं है । जो वर्षों से अपने जीवन में समझौतावादी रुख अपनाती आयी  थी, आज वह घर और बाहर की बागडोर अपने हाथों में संभाले एक अधिक ज़िम्मेवार स्त्री के रूप में खड़ी है ।

                     चौथी स्थिति में स्त्री के व्यक्तिगत जीवन में समझौता न कर अपने अनुसार जीने की कला को उसके आत्मकेंद्रित होने का परिचायक समझा जाता है । जिन मुद्दों पर पहले परिवार में स्त्री के झुकने-दबने की शर्त पर सुलह हो जाया करती थी आज वह स्त्री के आत्म-सम्मान का प्रश्न बन चुके हैं और स्त्री उन प्रश्नों पर बोलने का साहस करना और दृढ़ता से खड़े होना अब जानती है । ऐसे में स्त्री के न दबने का एवं उसके प्रतिरोध का परिणाम पारिवारिक विघटन के रूप में सामने आ जाता है । तलाक़शुदा एकाकी जीवन सम्बन्धों की आत्मीयता एवं विश्वास को तो ठेस पहुँचाता ही है, साथ ही, कुंठा, संत्रास, अवसाद आदि मानसिक विकारों का कारण भी बनता है ।

निष्कर्षतः हम देखते हैं कि आधुनिक युग स्त्री-स्वातंत्र्य का युग है । अपनी इच्छानुसार जीने की चाह स्त्री के भीतर पनपी है और वह इस दिशा में अग्रसर है । इस दौर में पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने का हुनर स्त्री ने सीखा है । वह सपने देखती है, उन्हें अपने दम पर, अपनी मेहनत से पूरा करती है । किन्तु युग-परवर्तन और स्त्री की स्थिति में बदलाव के साथ उसके समक्ष नयी चुनौतियाँ भी प्रस्तुत हुयी हैं । स्त्री के जीवन में आज नवीन भूमिकायें शामिल तो हुयी हैं किन्तु प्राचीन भूमिकाओं के स्थानापन्न के साथ नहीं अपितु उनके साथ जुड़ कर । इन नूतन भूमिकाओं के साथ उत्पन्न हुयी हैं कुछ ऐसी समस्याएँ जो स्त्री के व्यक्तिगत एवं व्यावसायिक जीवन में द्वंद्व की स्थिति पैदा करती हैं ।  इन्हीं समस्याओं से जन्म होता है नए स्त्री-प्रश्नों का । बदलते युग के स्त्री-प्रश्न भी प्राचीन युग की ही भाँति विकट एवं जटिल हैं । ऐसे में अपने जीवन में सामंजस्य की स्थिति को स्थापित कर पाना आज की स्त्री के समक्ष एक बड़ा सवाल है ।

संदर्भ ग्रंथ सूची :-

  1. ‘स्त्री चिंतन की चुनौतियाँ’ – रेखा कस्तवार, पृष्ठ-92, दूसरा संस्करण-2016, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली-110002
  2. ‘औरत के लिए औरत’ – नासिरा शर्मा, पृष्ठ-137, संस्करण-2014, सामयिक प्रकाशन, नयी दिल्ली-110002
  3. ‘स्त्री चिंतन की चुनौतियाँ’ – रेखा कस्तवार, पृष्ठ-93 (द्वितीयक स्त्रोत)
  4. वही ” , पृष्ठ-141 (द्वितीयक स्त्रोत)

वही ” , पृष्ठ-142

ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियों में दलित जीवन का यथार्थ-डॉ. सुधांशु शर्मा

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ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियों में दलित जीवन का यथार्थ

                     डॉ. सुधांशु शर्मा 
                               कुम्हारिया, कांके
            रांची, झारखंड
                           8877541225
   Sudhbharti@gmail.com

शोध सारांश

ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी कहानियों में समाज के यथार्थ रूप की बेखौफ अभियक्ति की है । कहानियों की भाषा– शैली बेजोड़ है । दलित जीवन का दर्द, अदम्य लालसा, उसकी मनोस्थिति को जिन शब्दों में अभिव्यक्ति दी है उससे कहानी पढ़ते हुए सम्पूर्ण दृश्य सामने दिखाई देते हैं, जो कहानी के महत्व को बढ़ाती हैं । साहित्य का काम समाज के हर उस रूप को सामने लाना है जो समाज में विद्यमान है जिससे समाज में फ़ैली विसंगतियों को समझा जा सके जिससे निराकरण के उपायों को विस्तार मिल सके ।

बीज शब्द: दलित, यथार्थ, कहानी, समाज, अभिव्यक्ति

शोध विस्तार

ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी रचनाओं से हिंदी दलित साहित्य को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है ।  दलित समाज के प्रति होने वाले उपेक्षित व्यवहार को अपनी रचनाओं के माध्यम से न केवल हिंदी दलित साहित्य को प्रासंगिक बनाया बल्कि साहसपूर्ण ढंग से अपने समाज के यथार्थ को सामने लाने के लिए दलित वर्ग को प्रेरणा देने में भी सफल रहे । महात्मा बुद्ध, ज्योतिबा फुले, डॉ.अंबेडकर, प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन, दया पवार, एलेक्स हेली, जेम्स वाल्डविन आदि के विचारों व साहित्य ने इन्हें प्रेरित किया व पूरे शोषित वर्ग की पीड़ा को अभिव्यक्त करने का एक अनवरत संघर्ष जारी रहा । इनकी कहानियां दलित जीवन का प्रतिबिंब है जिसमें दलित जीवन संघर्ष की विविध स्थितियाँ दिखाई देती हैं । कहीं सामाजिक तिरस्कार,अपमानित व्यवहार है तो कहीं गरीबी,अशिक्षा, बेरोजगारी की त्रासदी तो कहीं अन्याय के खिलाफ आवाज आदि ऐसे कई परिस्थितियों से जूझती इनकी कहानियों में दलित जीवन के यथार्थ के साथ ही दलित जीवन के विकास की सार्थकता के लिए जागरूकता दिखाई देती है । 

ओमप्रकाश वाल्मीकि स्वयं इस जातिगत भेदभाव को भुगतते रहे और अपने अनुभवों को लेखनी के माध्यम से सामने लाकर दलित साहित्य को अग्रसर करने में महत्वपूर्ण योगदान देते रहे । ‘दलितों के प्रति अमानवीय व्यवहार और दोहरे मापदंड’ में वह लिखते हैं कि “एक दलित लेखक के अपने निजी अनुभव, उसके सामाजिक अनुभव कितने भयावह और कमजोर करने वाले होते हैं, इसका अंदाज दूर खड़ा कोई लेखक,आलोचक, संपादक नहीं लगा पाता है । अनुभवों का अंत:करण में रूपान्तरण उन भावनाओं में होता है, जो उसे संघर्ष, आक्रोश की ओर ले जाती है और अंततः करुणा, प्रेम के रास्ते कविता, कहानी और आत्म–कथा के रूप में सामने आती है । इन्हीं अनुभवों ने अनेक दलित लेखक पैदा किए हैं, जिनके अंतद्वंद उन्हें दूसरों से अलग करते हैं ।”[1] 

दलितों के प्रति छुआछूत का व्यवहार हमारे समाज में एक भयावह बीमारी है । मनुष्य होते हुए दूसरे मनुष्य को उसकी जाति के आधार पर उपेक्षित दृष्टि से देखना उसके साथ खान-पान में दूरी रखना समाज की रीति है । छूआछूत और तिरस्कार की त्रासदी से कई दलित अपनी असली पहचान को छुपाने के लिए मजबूर होते हैं । ‘कहाँ जाए सतीश’ कहानी में सतीश अपनी पहचान छुपाकर इसलिए रह रहा था क्योंकि समाज के उपेक्षापूर्ण व्यवहार से वह तंग हो गया अब वह अपनी बस्ती से दूर किराए में रहकर अच्छे से पढ़ाई करता, शाम में फ़ैक्टरी में काम करता जिससे वह अपना खर्चा चलाता अपने भविष्य को सम्मान के साथ जीने की चाहत में वह तमाम कोशिशों में लगा रहता । व्यवहार कुशल सतीश से मकान मालिक खुश था । लेकिन सवर्ण परिवार को सतीश की जाति का पता चलते ही उसके प्रति उनके मन में नफरत का सैलाब उमड़ जाता है । दिसंबर की ठिठुरन रात में सतीश को घर से बाहर कर दिया जाता है । वह समझ नहीं पाता कि आखिर उसका क़ुसूर क्या है? मानवीय रिश्ते जाति के आधार पर क्यों बनते हैं? –“उसने मुझे राखी बाँधी थी साहब…पर आज…उन्हें पता चल गया कि मेरी जाति क्या है । साहब, भंगी होने से रिश्ते टूट जाते हैं ? मैं इस भंगीपन से छुटकारा पाना चाहता हूँ साहब ।” [2] वह उलझन में है लेकिन उसके सवालों का कहीं कोई जवाब नहीं है । सर्द रात में वह अपनी फैक्टरी में रात बिताने की सोचकर जाता है परंतु उसे वहाँ भी ठिकाना नहीं मिलता है । इसी तरह ‘घुसपैठिए’ कहानी में भी राकेश की पत्नी इन्दु नहीं चाहती कि पड़ोस में किसी को उनकी जाति के बारे में पता चले वह समाज के उपेक्षित व्यवहार से अपने परिवार को बचाना चाहती है । उसे अपने पति का दलितों के प्रति सोहार्दपूर्ण व्यवहार पसंद नहीं । वह कई बार अपने पति को इनसे दूर रहने को कहती है –“तुम चाहे जितने बड़े अफसर बन जाओ, मेल–जोल इन लोगों से ही रखोगे, जिन्हें यह तमीज भी नहीं है कि सोफ़े पर बैठा कैसे जाता है…तुम्हें इनसे यारी–दोस्ती करना है तो घर से बाहर ही रखो…आस–पड़ोस में जो थोड़ी बहुत इज्जत है, उसे भी क्यों खत्म करने पर तुले हो…गले में ढोल बाँधकर मत घूमो…यह जो सरनेम लगा रखा है…यही क्या कम है…कितनी बार कहा है कि इसे बदलकर कुछ अच्छा–सा सरनेम लगाओ….बच्चे बड़े हो रहे हैं….इन्हें कितना सहना पड़ता है । कल पिंकी की सहेली कह रही थी…रैदास तो जूते बनाता था….तुम लोग भी जूते बनाते हो…पिंकी रोते हुए घर आई थी…मेरा तो जी करता है बच्चों को लेकर कहीं चली जाऊँ…।”[3] दरअसल इन्दु के भीतर का यह डर समाज में व्याप्त अमानवीय मान्यताओं का परिणाम है । वह नहीं चाहती कि उसके बच्चों को  सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़े । इन्हीं कारणों से कई अच्छे पदों पर कार्यरत दलित अपनी जाति के बाकी लोगों से ही दूरी बनाने लगते हैं । हमारे समाज में जातिगत ऊंच-नीच की प्रतिस्पर्धा बहुत ज्यादा है । इसलिए प्रत्येक जाति दूसरी जाति से आगे बढ़ने की हौड़ में लगी रहती है । ऐसा नहीं है कि जातिगत भेदभाव सवर्णों के बीच में ही मौजूद है दलित जातीय भी इससे अछूती नहीं हैं । ‘शवयात्रा’ कहानी में चमार और बल्लहार जाति के बीच भेदभाव इतना अधिक है कि बल्लहार की पोती सलोनी की तबीयत खराब होने पर गाँव का डॉक्टर उसे अपने दवाखाने में नहीं आने देता क्योंकि उसे अपना दवाखाना बंद हो जाने का डर है । शहर के अस्पताल पहुँचने से पहले बच्ची सलोनी दम तोड़ देती है । ऐसी परिस्थिति में भी कोई उनकी सहायता करने नहीं आता है । यहाँ तक कि शव जलाने के लिए लकड़ियां देने से भी मना करना यह सारी घटनाएं विचलित कर देती हैं । जातिगत अंतर्विरोध की यह स्थितियाँ सामाजिक भेदभाव को रोकने की बजाय बढ़ावा दिलाती हैं । ‘सलाम’ कहानी में दलित हरीश के सवर्ण दोस्त कमल को गाँव का चायवाला इसलिए चाय नहीं पिलाता क्योंकि वह दलित की शादी में बाराती बनकर आया है । ‘चूहड़ों की बारात में बामन’ आए यह उसके लिए अकल्पनीय है । इसलिए वह चिल्लाकर अपनी खीझ को भीड़ में शामिल लोगों के सामने प्रकट करता है-“चूहड़ा है । खुद कू बामन बतारा है । जुम्मन चूहड़े का बाराती है । इब तुम लोग ही फ़ैसला करो । जो यो बामन है तो चूहड़ों की बारात में क्या मूत पीणे आया है । जात छिपाके चाय मांग रा है मैन्ने तो साफ कह दी । बुद्धू की दुकान पे तो मिलेगी ना चाय चूहड़ों–चमारों कू, कहीं और ढूढ़ ले जाके ।”[4] समाज में फ़ैली अस्पृश्यता की समस्या इतनी गहरी है कि उसे हटाने के लिए तो कम परंतु बनाए रखने और विस्तार देने में सहयोग की भावना अधिक दिखाई देती है । मेहमान की तरह आए बाराती कमल को चाय के बजाय ब्राह्मण होकर दलित की बारात में आने के लिए अपमानित किया जाता है । दलितों के प्रति छुआछूत का भाव चाहे उनकी जाति के आधार पर हो या उनके लिए बनाए गए कामों के आधार पर किसी भी रूप में यह सभ्य समाज का उदाहरण नहीं है । लेकिन अपने आप को तथाकथित सभ्य व सुसंस्कृत समझने वाला समाज अमानवीय कुरीतियों का महिमामंडन करने को सदैव तत्पर रहता है ।

सामाजिक संगठन सामाजिक परिवर्तन के लिए बहुत आवश्यक है तभी समाज से छुआछूत की दूषित भावना को हटाया जा सकता है । जहां एक तरफ वाल्मीकि की कहानियों में दमन,अपमान की पीड़ा है तो वहीं इसकी मूल जड़ों का विरोध भी है । ‘सलाम’ कहानी में पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का विरोध दिखाई देता है । दलित युवक हरीश अपनी शादी में गाँव के सवर्णों के पास सलाम करने जाने से मना कर देता है । दलित होते हुए इस तरह परम्पराओं का विरोध करते देख गाँव वाले के बहुत समझाने पर भी हरीश व उसके पिता ने घर-घर जाकर अपमानित होना अस्वीकार किया । अपने आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाकर कुछ कपड़े, पैसों का लोभ देकर वह सवर्णों के वर्चस्व को कायम रखने की प्रथा को बढ़ावा नहीं देना चाहता है ।  हरीश के सलाम करने न जाने की खबर सुन सवर्णों का आगबबूला होना यह दर्शाता है कि उन्हें यह बिलकुल बर्दाश्त नहीं हो पाता है कि दलित अपने मान – सम्मान की पहल करें । गाँव के सवर्ण बल्लू का हरीश के ससुर को परंपरा का विरोध कर अपने सम्मान के विषय में सोचने के लिए धमकाना यह साबित करता है कि दलित समाज का चेतनाशील होना इन्हें समाज के लिए घातक लगने लगता है – “तभी तो कहूँ– जातकों (बच्चों) कू स्कूल ना भेजा करो । स्कूल जाके कोण–सा इन्हें बालिस्टर बणना है । ऊपर से इनके दिमाग चढ़ जांगे । यो न घर के रहेंगे न घाट के । गाँव की नाक तो तूने पहले की कटवा दी जो लौंडिया कू दसवीं पास करवा दी । क्या जरूरत थी लड़की कू पढ़ाने की, गाँव की हवा बिगाड़ रहा है तू । इब तेरा जंवाई ‘सलाम’ पर जाने से मना कर रहा है … उसे समझा दे… ‘सलाम’ के लिए जल्दी आवे…।”[5] सवर्णों का यह सोचना कि सम्मानित सारे कामों में सिर्फ हमारा अधिकार है और अपमानित होते रहना और चुपचाप सहना दलितों की नियति है, यह विचार हमारे समाज की उन्नति में बाधक होने के बावजूद अपना परचम लहराता है ।

दलितों पर शोषण का प्रमुख कारण अशिक्षा और गरीबी है । शिक्षा से उन्हें रोका गया जिस कारण वह अपने अधिकारों को अच्छे से समझ ही नहीं पाये इसी कारण लगातार उन पर अन्याय किया गया और वह इसे अपनी नियति मानते गए । इसकी पड़ताल वाल्मीकि की कहानी ‘पच्चीस चौका डेढ़ सौ’ करती है । सुदीप के पिता की तरह समाज में ऐसे कई दलित हैं जिन्हें जीवन भर चौधरी जैसे धोखेबाज लोगों ने अच्छे सहायक का मुखौटा पहनकर लूटा है । सुदीप को समझ नहीं आता कि किताब में भी और स्कूल में मास्टर भी तो ‘पच्चीस चौका सौ’बताते हैं  फिर उसके पिता को चौधरी ‘डेढ़ सौ’ क्यों बताता है । जिस पर उसके पिता को इतना अंधविश्वास है कि वह सभी की बातों को गलत लेकिन चौधरी को सर्वज्ञाता मानता है –“तेरी किताब में गलत भी हो सके… नहीं तो क्या चौधरी झूठ बोल्लेंगे । तेरी किताब से कहीं ठाड्डे (बड़े) हैं चौधरी जी । उनके धोरे (पास) तो ये मोट्टी–मोट्टी किताबें हैं… वह जो तेरा हेडमास्टर है वो भी पाँव छुए है चौधरी जी के । फेर भला वो गलत बतावेंगे…मास्टर से कहणा सही–सही पढ़ाया करे…।”[6] शोषित वर्ग के आँखों पर लगी इस पट्टी को हटाने के उपाय है शिक्षित होना, अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना । जिस तरह सुदीप ने अपने पिता के सामने चौधरी के षडयंत्र का पर्दाफाश किया उसी तरह दलित समाज के लोगों को अपने कर्तव्यों का बोध होना बहुत जरूरी है तभी तो वह पीढ़ियों से की जा रही इस तरह की धोखेबाज़ी को समझ पाएंगे क्योंकि उनकी मेहनत, ईमानदारी, सहजता को हमेशा दरकिनार कर उन्हें प्रताड़ित किया जाता रहा है । गरीबी की मार को झेलता दलित दिन-रात कठिन मेहनत के बावजूद भुखमरी के हालातों से गुजर रहा है । जातिगत आधार पर काम का विभाजन भी इनकी गरीबी का बड़ा कारण है इनसे काम तो ज्यादा मेहनती व घृणित करवाए जाते हैं परंतु इनकी आमदनी बहुत कम है । ‘बैल की खाल’ कहानी का काले और भूरे गांवों में जानवरों के डॉक्टर के आने से दुखी है क्योंकि जानवर मरेंगे नहीं तो वह खाएँगे क्या । उन्हें कोई दूसरा काम भी नहीं देता “गाँव भर की नजर में ये सबसे निकक्मे जीव थे, मरे जानवर की खाल खींचने वाले ।” [7] इनकी जरूरत गाँव वालों को तभी होती जब गाँव में कोई जानवर मर जाता वरना यह जीवित हैं या नहीं इसकी परवाह किसी को नहीं थी । अत्यधिक कठिन श्रम के बावजूद यह  अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं को भी पूरा नहीं कर पाते हैं । दूसरों की तरह सम्मान से खाने, पक्के मकान में रहने की  इच्छाओं को पूरा करने के लिए तमाम तरह के उत्पीड़न के बावजूद दलित मजदूर अपने लिए एक छोटा सा घर नहीं बना पाता है। ‘ख़ानाबदोश’ कहानी की मानो और सुकिया अपने लिए भी पक्की ईटों का मकान बनाना चाहते हैं, लेकिन उनका यह ख्याल धराशायी कर दिया जाता है । सूबेसिंह दलित स्त्री मानो को अपने जाल में तमाम प्रलोभन  के बाद भी किसनी की तरह नहीं फंसा पाया तो उसे काम से निकालने की साजिश रचता गया तो वहीं ‘गोहत्या’ कहानी में सुक्का को मुखिया के आदेश का पालन न करने की सजा गोहत्या की साजिश में फसांकर दी जाती है। सुक्का का अपनी बीवी को हवेली लाने से मना करना मुखिया के वर्चस्व को आघात पहुंचाता है –“औकात में रह सुक्का । उड़ने की कोशिश ना कर, बाप–दादों से चली आई रीत है ।” लेकिन सुक्का का अप्रत्याक्षित जवाब मुखिया को तिलमिला देता है “मुखिया जी काम करता हूँ तो दो मुट्ठी चावल देते हो…. वह हवेली नहीं आएगी ।” [8]सुक्का को इस विरोध की सजा लाल दहकती लौ से हाथ जलाने की मिलती है जिससे मुखिया के भीतर की प्रतिशोध की ज्वाला तो शांत हो जाती है लेकिन सुक्का की चीत्कार से पूरा गाँव दहल जाता है । दलितों पर अपना अधिकार जमाने वाले लोग कई तरह की मनगढ़ंत रीतियाँ बनाकर उनका शारीरिक, मानसिक शोषण सरेआम करते रहे हैं फिर भी समाज में वह सम्मानित समझे जाते हैं और जिन्हें प्रताड़ित किया जाता है वह असभ्य । इसलिए शोषक वर्ग कभी नहीं चाहता कि शोषित अपने अधिकारों को समझे उन्हें परेशान करना वह अपना अधिकार समझते आए हैं । 

 ‘घुसपैठिये’ कहानी में उच्च संस्थानों में दलित छात्रों के साथ भेदभाव की स्थिति का अंजाम आत्महत्या के लिए मजबूर करता है । शारीरिक, मानसिक प्रताड़ना की अथाह ने मेडिकल छात्र सोनकर को मरने पर मजबूर किया वह लड़ता रहा परंतु साज़िशों के इन चक्रव्यूहों से लड़ते-लड़ते हार गया । आरक्षण से आए बच्चों को परेशान करना उनकी कई शिकायतों के बावजूद कोई कार्यवाही नहीं करना उन्हें ही चुप रहने, सहने की सलाह देना, मेहनती होने के बावजूद उन्हें परीक्षाओं में कम नंबर देना, इस तरह के उपेक्षापूर्ण रवैयै से उन्हें कितनी तकलीफ होती है इसका एहसास ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियों में बहुत गहरा है । इसी तरह आरक्षण की वजह से काबिलयत पर शक करने, आपसी मनमुटाव, द्वेष की स्थिति ‘कुचक्र’ कहानी में भी दिखाई देती है । अकसर उनकी सफलता की तुलना आरक्षण के साथ की जाती है । काम के प्रति कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार, जानकार होने के बावजूद उन्हें हेय समझा जाता है । दलित युवक आर. बी. का प्रमोशन गैर दलितों को उचित नहीं लगता है । उनकी बौखलाहट उसके प्रति कुचक्र की तरफ बढ़ने लगती है । उसके लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करना उसकी बाकी अधिकारियों से बढ़ा-चढ़ा कर झूठी शिकायत करना,चोरी के इल्जाम में फंसाना । इस तरह के कई स्तरहीन योजनाओं द्वारा अपने मन को तसल्ली दी जाती है – “रीढ़–वीढ़ कुछ नहीं शर्मा जी…मर–मरकर काम करें हम और प्रमोशन मिले इन भंगी– चमारों को…बस शर्मा जी अब तो सेंटर में बदलाव आना ही चाहिए…नहीं तो ये लोग देश को तबाह कर देंगे…।” [9] शर्मा जी के उकसाने पर निशिकांत का यह मनोभाव दलितों के प्रति समाज में प्रचलित धारणाओं को उजागर करता है ।

ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी कहानियों में समाज के यथार्थ रूप की बेखौफ अभियक्ति की है । कहानियों की भाषा- शैली बेजोड़ है । दलित जीवन का दर्द, अदम्य लालसा, उसकी मनोस्थिति को जिन शब्दों में अभिव्यक्ति दी है उससे कहानी पढ़ते हुए सम्पूर्ण दृश्य सामने दिखाई देते हैं, जो कहानी के महत्व को बढ़ाती हैं । साहित्य का काम समाज के हर उस रूप को सामने लाना है जो समाज में विद्यमान है जिससे समाज में फ़ैली विसंगतियों को समझा जा सके जिससे निराकरण के उपायों को विस्तार मिल सके । इसी संदर्भ में डॉ.जयप्रकाश कर्दम का मानना है कि “यथार्थ पर आधारित होने के कारण दलित साहित्य ‘वाह’ का नहीं ‘आह’ का साहित्य है । इसमें दलित जीवन का दंश, दर्द और आह सर्वोपरी है क्योंकि यह समाज का सबसे बड़ा कटु और भयावह यथार्थ है । दलित उत्पीड़न और संवेदना के जितने भी पक्ष हो सकते हैं हिन्दी की दलित कहानियों में लगभग उन सभी को प्रतिपाद्य बनाया गया है ।”[10] दमित जीवन की समस्याओं को सामने लाकर उनके अधिकारों के लिए लड़ती ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियाँ प्रेरणाशील रही हैं ।  दलितों को अपने सम्मान के लिए लड़ना होगा, प्रतिरोध करना होगा हर उस नियम का जिससे उसकी अस्मिता को ठेस लगे । स्वाभिमान से सम्मानपूर्ण जीने का हक सभी का है चाहे वह किसी भी जाति का हो, जब जाति मानवीय सम्बन्धों में बाधक बनने की बजाय स्नेहपूर्ण समानता को महत्व देगी तभी नवनिर्मित समाज की परिकल्पना को सफलता मिल सकती है ।

[1] वाल्मीकि,ओमप्रकाश.मुख्यधारा और दलित साहित्य. नई दिल्ली:सामयिक प्रकाशन. पृ. सं. 68      

[2] वाल्मीकि,ओमप्रकाश.सलाम. कहानी संग्रह. ‘कहाँ जाए सतीश’. नई दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन. पृ. सं. 55         

[3] वाल्मीकि,ओमप्रकाश.घुसपैठिये. नई दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन. पृ.सं. 15   

[4] वाल्मीकि,ओमप्रकाश.सलाम. नई दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन. पृ.सं. 13     

[5] वही,पृ.सं.18   

[6] वहीं, ‘पच्चीस चौका डेढ़ सौ’. पृ. सं. 80   ’ 

[7] वही, ‘बैल की खाल’. पृ. सं. 35    

[8] वही, ‘गोहत्या’. पृ. सं. 59    

[9] वही,’कुचक्र’. पृ. सं. 105    

[10] कर्दम, डॉ. जयप्रकाश. दलित विमर्श:साहित्य के आईने में. गाजियाबाद : साहित्य संस्थान. पृ सं. 111       

आदिवासी समाज, साहित्य एवं संस्कृति: वर्तमान चुनौतियाँ-शिलाची कुमारी

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आदिवासी समाज, साहित्य एवं संस्कृति: वर्तमान चुनौतियाँ

शिलाची कुमारी 
पीएच.ड़ी. शोधार्थी
हिंदी विभाग
झारखंड केन्द्रीय विश्वविद्यालय
Shilachikandhway11@gmail.com
Mob: 8335878688

सारांश

आदिवासी शब्द से ही पता चलता है आदिम युग की जाति– जंजातियाँ । जो अपनी सभ्यता और संस्कृति की धरोहर को युगों से सँजोये हुए हैं । वास्तव में ये राष्ट्र के असली वारिस कहे जा सकते हैं । आदिवासी इस संसार के अभिन्न अंग रहे हैं उनका योगदान हमारी सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण रहा है ।ये हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति के सदैव संवाहक रहे हैं । जबकि ये स्वयं मुख्य धारा से कटे हुए ही रहे हैं।  ये अपने अस्तित्व की लड़ाई वर्षो से लड़ते आ रहे हैं । आदिवासी जो वास्तविक इस देश के उतराधिकारी है हमारी व्यवस्था ने उनसे ही अपने अस्तित्व के अधिकार के साथ जीने का अधिकार छिन लिया है  ।  आदिवासी साहित्यकारों के पास संसाधनों का अभाव रहता है पर यह कहने में क्यों हिचका जाए की संपादकों द्वारा भी उनकी उपेक्षा की जाती है। इसका परिणाम यह हुआ कि अच्छा, सरल, सहज, प्रमाणिक व विश्वसनीय लिखने वाले लेखक चर्चा में नहीं आ पाये। आदिवासी केन्द्रित जो कहानियां हिंदी में लिखी गयी हैं। वे विभिन्न पत्रिकाओं की फाइलों में दबी पड़ी हैं। तमाम विडंबनाओं के बावजूद आदिवासी जन जीवन , साहित्य , काला संस्कृति हमारे राष्ट्र की मूल धरोहर है और इसकी वास्तविकता पर  प्रश्न उठाना विमर्श करना चर्चा परिचर्चा ज्वलंत मुद्दा है । तथा भारतीय समाज के ये अभिन्न अंग है ये मुख्य धारा से अलग होने के बावजूद अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है ।

बीज शब्द: सभ्यता –संस्कृति , अस्तित्व , अधिकार , साहित्य, शिक्षा , संसाधन, विमर्श परिचर्चा 

शोध विस्तार

आदिवासी शब्द से ही पता चलता है आदिम युग की जाति- जंजातियाँ । जो अपनी सभ्यता और संस्कृति की धरोहर को युगों से सँजोये हुए हैं । वास्तव में ये राष्ट्र के असली वारिस कहे जा सकते हैं । आदिवासी इस संसार के अभिन्न अंग रहे हैं उनका योगदान हमारी सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण रहा है ।ये हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति के सदैव संवाहक रहे हैं । जबकि ये स्वयं मुख्य धारा से कटे हुए ही रहे हैं । आखिर कारण क्या है ? इसका मुख्य कारण अंधविश्वास , जड़ता रूढ़िवादी परंपरा रही है । दूसरा कारण यह भी की ये अत्यंत सीधे सरल वह संकोची स्वभाव के रहे है इन्हे एकांत एवं प्रकृति से विशेष प्रेम है । इनका जीवन अभावग्रस्त रहा है क्योंकि ये समाज से दूर पहाड़ों, दूरदराज़ के इलाकों मे आधुनिक सुविधाओं से दूर दमन एवं शोषण से ग्रसित रहे है ।

 इनके अधिकारो हितों को प्रकाश मे लाने के लिए विमर्श तो चंद साल पहले शुरू हुए है । परंतु ये अपने अस्तित्व की लड़ाई वर्षो से लड़ते आ रहे है । कोई विमर्श तभी  विमर्श बनता है जब वह सभ्यता संस्कृति, भाषा अस्मिता की पहचान हाशिये पर चला जाता है । आदिवासी जो वास्तविक इस देश के उतराधिकारी है हमारी व्यवस्था ने उनसे ही अपने अस्तित्व के अधिकार के साथ जीने का अधिकार छिन लिया है  ।  प्रकृति की गोद में ही इनके जीवन का संचालन होता आया है । “आदिवासियों का समाज वस्तुतः वनों में निवास करने वाले कृषकों का समाज है | कृषि और वन्य उत्पादकों के सहारे प्रकृति और उसके संततियों के सहचर्य में सहयोगी बनकर जीवन जीने की कला इन आदिवासियों ने युगों से आत्मसात कर रखी है | यही कारण है कि आदिवासियों के अस्तित्व के लिए जल, जंगल और जमीन का होना आवश्यक है |”

 हमारा समाज आज भी इन्हे हेय की दृष्टि से देखता है इसका कारण है असंवेदनशीलता ।      भारतीय समाज मे रहने वाले आदिवासी कबीलों को  भारतीय संविधान के अंतर्गत अनुसूचित जनजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है । आदिवासी समाज स्वछंद विचारों तथा उत्कृष्ठ जिजीविषा वाला समुदाय है । इनके विषय मे अनेक मिथक धारणा बनी है की ये  बार्बर होते है । आज आदिवासी समाज का अस्तित्व वह अस्मिता संकट में है , आज आदिवासी समाज लोकतान्त्रिक लाभ लेने में असमर्थ है । यह समुदाय विकास के प्रभावों से कोसो दूर है । इस वंचित तबके का विकास तभी संभव है जब हम उन्हे उनकी जीवन -शैली , सुरक्षा और उनके भविष्य के लिहाज से अधिकार समपन्न रखें । विकास की सभी योजनाओं से लाभान्वित कर उन्हे उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करें ।

भारत के विभिन्न प्रदेशों में निवास कर रहे आदिवासियों ने अपने-अपने भू-भागों में अपने अधिकारों और अस्तित्व के लिए विभिन्न विद्रोह किये हैं। अंग्रेजों, साहुकारों, महाजनों और सूदखोरों के अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध आंदोलन किए। परंतु आज के समय में विडंबना यह है कि इनके इस विद्रोह को विद्रोह न कहकर नक्सलवाद कहा जाता है। रमणिका गुप्ता आदिवासियों की आर्थिक स्थिति का विवेचन करते हुए लिखती हैं,”जंगल माफ़िया कीमती पेड़ उससे सस्ते दामों पर खरीदकर, ऊँचे दामों पर बेचता है और करोड़पती बन जाता है। पेड़ काटने के आरोप में आदिवासी दंड भरता है या जेल जाता है। सरकार की ऐसी ही नीतियों के कारण आदिवासी ज़मीन के मालिक बनने के बजाए पहले मज़दूर बने फिर बंधुआ मज़दूर।”( रमणिका गुप्ता-आदिवासी विकास से विस्थापन – पृ. 12)

दरअसल आदिवासी समाज की प्रतिबद्धता औऱ उनके नैसर्गिक गुणों को शब्दों में या श्रेणियों में नहीं बाँटा जा सकता। आदिवासियों की आदिवासियत को न तो आप वर्गीकृत कर सकते हैं न ही किसी मानक से नाप सकते हैं क्योंकि यह तो विरासत में मिला हुआ वह गुण है जिसे कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता और न ही उसे कोई खारिज कर सकता है। किसी व्यक्ति की आदिवासियत को आप इस बात से तय नहीं कर सकते कि उसमें आदिवासी खून कितना है।

शिक्षा किसी भी समाज के विकास की नीव होती है। आदिवासी समाज के विकास में भी शिक्षा की भूमिका निर्णायक है। आदिवासी समाज के लिए एक बेहतर शिक्षा की आवश्यकता व चुनौती है जिसे स्वीकार करना है। मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था से आदिवासियों का कोई भला नहीं होना है। उन्हें उन्हीं की भाषा में शिक्षा दी जानी चाहिए, जिससे उनमें अधिगम की सुगमता का विकास हो सके। आदिवासी क्षेत्रों में विकास संबंधी क्रियाकलाप तो राष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्राथमिकताओं के अनुसार बढ़ते जा रहे हैं पर इन सभी संभावनाओं के बीच अवस्थित आदिवासी स्वयं को इससे कटा हुआ ही महसूस कर रहा है। आदिवासी के लिए उस शिक्षा या विकास का कोई मतलब नहीं, जिसमें उनकी सहभागिता न हो। अतः यह महत्त्वपूर्ण है कि उनकी इस चुनौती पर गम्भीरता से विचार किया जाय साथ ही एक सार्थक समाधान की तलाश की जाय।

        इतना सबकुछ होने के बावजूद  भी आदिवासी कुछ नहीं बोलते हैं । उसे अपने हक़ के लिए आवाज उठाने का परिणाम मालूम है ।  लेकिन, उसके पास प्रश्न हैं । कई ऐसे प्रश्न जिनके उत्तर हममें से किसी के पास नहीं है । ऐसे में क्या करे, कहाँ जाये आदिवासी ? हरिहर लिखते हैं कि – “ जब मैं विगत कई दशकों से घट रही घटनाओं के सम्बन्ध में गहराई से विचार करता हूँ तब न जाने मुझे क्यों ऐसा लगता है कि यह कोई सोची – समझी साजिश तो नहीं आदिवासियों को समूल नष्ट करने की! मेरी इस धारणा का कारण स्पष्ट है । न आदिवासी रहेगा और न उसकी समस्याएँ ! बात ख़त्म! तो क्यों न समस्या की जड़, यानी आदिवासी को ही समूल नष्ट कर दिया जाये ! कुछ इस तर्ज पर कि ग़ुरबत मिटाने के लिए गरीबों को ही मिटा दें । ग़ुरबत अपने आप दूर हो जायेगी । यही तो हो रहा है न, अपने इस महादेश में ? बताइये, मैं कहाँ ग़लत हूँ ?” (क्यों बेजुबान हैं, आदिवासी ? – हरिहर वैष्णव, यश पब्लिशर्स   एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स – दिल्ली 110032, प्रथम संस्करण : 2018, पृष्ठ – 7

आदिवासियों पर हिंदी में लिखी गयी कहानियां इन पर लिखे गये उपन्यासों के बाद देर से चर्चा में आयी। इसलिए कई पाठकों को कभी कभार ऐसा लगने लगता है जैसे आदिवास्यों पर कहानियां लिखी ही नहीं जा रही है। आदिवासी साहित्यकारों के पास संसाधनों का अभाव रहता है पर यह कहने में क्यों हिचका जाए की संपादकों द्वारा भी उनकी उपेक्षा की जाती है। इसका परिणाम यह हुआ कि अच्छा, सरल, सहज, प्रमाणिक व विश्वसनीय लिखने वाले लेखक चर्चा में नहीं आ पाये। आदिवासी केन्द्रित जो कहानियां हिंदी में लिखी गयी हैं। वे विभिन्न पत्रिकाओं की फाइलों में दबी पड़ी हैं। कुछ कहानी संग्रह जो प्रकाशित हुए हैं वे या तो चर्चा में नहीं आ पाये हैं या उनमें से कुछेक कहानियाँ ही ऐसी हैं जो आदिवासी केन्द्रित हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि रामदयाल मुंडा शिक्षाविद, विचारक और नेता के अलावा एक संवेदनशील साहित्यकार भी थे। उनकी कविताओं और कहानियों में आदिवासी समाज का बिल्कुल सहज व पारदर्शी रूप देखने को मिलता है। उनकी कहानी ‘उस दिन रास्ते में’ सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में एक महत्वपूर्ण कहानी है। इसकी तुलना केवल हिंदी की मशहूर कहानी ‘उसने कहा था’ से ही की जा सकती है। अफ़सोस की बात है कि महाश्वेता देवी , सुरेन्द्र अवस्थी, रमणिका गुप्ता जैसे लेखक-लेखिकाओं के सतही आदिवासी साहित्य और उसके प्रचार की आंधी में ऐसे सच्चे आदिवासी साहित्य पर विद्वानों-पाठकों का ध्यान नहीं जा पाया।

विमर्शों के शुरुआती दौर पर दृष्टिपात करें तो आदिवासी विमर्श, चर्चित विमर्शों में भी हाशिए पर दिखाई पड़ता है। स्त्री विमर्श और दलित विमर्श, ये दो ऐसे बड़े विमर्श हैं जिनपर साहित्यिक और सामाजिक, दोनों क्षेत्रों में लगातार विचार-विमर्श और संगोष्ठियों का दौर चल रहा है परंतु आदिवासियों की तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। आदिवासी कौन हैं? वे कहाँ से आए हैं? इस प्रश्न पर विचार करें तो आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की ये पंक्तियाँ सहज ही मन के किसी कोने में     जीवंत हो उठती हैं कि “भारत में रहने वाली प्रत्येक जातियाँ अपने से नीचे एक और जाति ढूंढ़ ही लेती हैं।” द्विवेदी जी के इस कथन से यह स्पष्ट हो जाता है कि आदिवासी समुदाय और कोई नहीं हमारे समाज की जातिव्यवस्था की उपज हैं। इस संबंध में डॉ. विनायक तुमराम ने ‘हाशिये की वैचारिकी’ नामक पुस्तक में लिखा है कि “वर्तमान स्थिति में ‘आदिवासी’ शब्द का प्रयोग विशिष्ट पर्यावरण में रहने वाले, विशिष्ट भाषा बोलने वाले, विशिष्ट जीवन पद्धति तथा परंपराओं से सजे और सदियों से जंगल-पहाड़ों में जीवन-यापन करते हुए अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को संभाल कर रखने वाले मानव-समूह का परिचय करा देने के लिए किया जाता है और बहुत बड़े पैमाने पर उनके सामाजिक दु:ख तथा नष्ट हुए संसार पर दु:ख प्रगट किया जाता है। उनके प्रश्नों तथा समस्याओं पर जी तोड़कर बोला जाता है।” (डॉ. विनायक तुमराम की पुस्तक  ‘हाशिये की वैचारिकी’ (पृ. 251

 

निष्कर्ष

अत: आदिवासी वर्ग के उत्थान के लिए हुमे आगे आना होगा हम उनके जीवन परंपरा सभ्यता को अपनाए और  उनमे फैले विषाक्त अंधविश्वास , जड़ता और दोजे वर्ग के जीवन से बाहर निकालें तथा कदम से कदम मिलाकर  चलने हेतु प्रेरित करें । और इनके अधिकार  और  सुख सुविधाओं से परिचित कराया जाए । इसके आदिवासी विमर्श , साहित्य के विभिन्न पक्षो पर कार्य करने वाले रचनाकारों को प्रकाश मे लाया जाए । आदिम जातियों तथा जनजातियों पर गहन अध्ययन तथा शोध कार्य अटठारहवीं शताब्दी से ही ,प्रारम्भ हो गये थे। अंग्रजो के शासन काल के समय से ही इस दिशा में सामग्री संकलन व प्रकाशन का कार्य प्रारम्भ हुए थे । परंतु सुविधाओं के आभाव में ये हमेशा उपेछित रहे जिस कारण इसे विमर्श का रूप लेने में लंबा समय लग गया ।  आदिवासी साहित्य की मौखिक रूप की एक लंबी परंपरा रही है परंतु अशिक्षा की  वजह से उनमें कोई इतिहास नही लिखी गई । और जब इतिहास का विषय बनाया गया तो बीएस प्रकृति पर  ही निर्भर कर  छोड़ दिया गया । उसके उत्थान के लिए आवश्यक कदम नही उठाए गए । राष्ट्र निर्माण की नीतियों के कारण इंका जंगल से अधिकार समाप्त कर  दिये गए ओर अधौगिकारण ने इन्हे जल जंगल जमीन से बेदखल कर दिया । आदिवासी मुद्दों पर  विचार व्यक्त करते हुए  वंदना टेटे लिखती हैं – पुरखा कथाओं में दर्ज/ कोनजोगा टूट रहा है

पुरखा कथाओं में दर्ज/ जतरा के ढोल की आवाज

दफ़न हो रही है/छेनी और हथोड़े की आवाज में

पाना, मारतुल और घन ठोंक रहे हैं/ सीने पर कोनजोगा के

सरकारी नुमाएंदे/ ठेकेदार और मुंशी

तमाम विडंबनाओं के बावजूद आदिवासी जन जीवन , साहित्य , काला संस्कृति हमारे राष्ट्र की मूल धरोहर है और इसकी वास्तविकता पर  प्रश्न उठाना विमर्श करना चर्चा परिचर्चा ज्वलंत मुद्दा है । तथा भारतीय समाज के ये अभिन्न अंग है ये मुख्य धारा से अलग होने के बावजूद अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है ।

 

संदर्भ सूची 

  1. गुप्ता, रमणिका. (2008). विकास से विस्थापन. नई दिल्ली: राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड. अंसारी रोड दरियागंज.
  2. आदिवासी विमर्श :अवधारणा  और आंदोलन – कुमार कमलेश –तेज प्रकाशन – पहला सं -2014
  3. रमणिका गुप्ता-आदिवासी विकास से विस्थापन – पृ. 12
  4. क्यों बेजुबान हैं, आदिवासी ? – हरिहर वैष्णव, यश पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स – दिल्ली 110032, प्रथम संस्करण : 2018, पृष्ठ – 7
  5. डॉ. विनायक तुमराम की पुस्तक ‘हाशिये की वैचारिकी’ (पृ. 251)

सहायक–पुस्तकें–

  1. आदिवासी स्वर और नयी शताब्दी, सं. रमणिका गुप्ता, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008
  2. हाशिये की वैचारिकी, सं. उमाशंकर चौधरी, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा.) लि., नई दिल्ली, 2008
  3. आदिवासी भारत, योगेश अटल और यतीन्द्रसिंह सिसोदिया, रावत पब्लिकेशन्स, जयपुर, 2011
  4. आदिवासी समाज और आधुनिकता, डॉ. पूरणमल यादव व नटवर लाल बुनकर, आविष्कार पब्लिशर्स, डिस्ट्रीब्यूटर्स, जयपुर, 2008
  5. आदिवासी साहित्य विविध आयाम – संपा. डॉ. रमेश सम्भाजी कुरे
  6. बास्ता सोरेन, आदिवासी कौन- संपादक- रमनिका गुप्ता
  7. चन्द्रिका पाण्डेय, दण्डकाराण्य: आदिवासियों की समानांतर व्यवस्था और भारतीय राजसत्ता (सम्प्रेषण के विविध आयाम),
  8. बास्ता सोरेन, आलेख- सरना: आदिवासी की पहचान, ‘आदिवासी कौन- संपादक- रमनिका गुप्ता
  9. सं. महाश्वेता देवी और अरुण कुमार त्रिपाठी, वर्तिका, अंक- अक्तूबर-दिसंब
  10. प्रो. वीरभारत तलवार, व्याख्यान- आदिवासी विमर्श: धर्म, संस्कृति और भाषा का सवाल कहाँ है?

मुख्यधारा का साहित्य और आदिवासी साहित्य की वैचारिकता-डॉ. अमित कुमार साह

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मुख्यधारा का साहित्य और आदिवासी साहित्य की वैचारिकता

डॉ. अमित कुमार साह,
महद्दीपुर, खगड़िया, बिहार
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शोध सारांश

समकालीन हिन्दी साहित्य को अगर देखा जाय तो दो धाराओं को लेकर, दो विचारधाराओं को लेकर, दो समाज को लेकर लिखा जा रहा हैं। इसके बारें में यों कहे तो की हिन्दी साहित्य में समाज का यथार्थ का दो भागों में बांटा गया है। प्रथम धारा मुख्यधारा का हैं, तो दूसरा धारा हाशिए का समाज रहा है। आधुनिक काल के साहित्यकारों के द्वारा अधिकांशतः मुख्यधारा केन्द्रित साहित्य की ही रचना की जा रही हैं। विद्यापति, तुलसी, जायसी, सूरदास, घनानंद, बिहारी और आधुनिक कालीन आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी अन्य की रचनाओं में मुख्यधारा की झलक विशेष तौर पर दिखती है। इन्हीं का गुणगान दिखता है। हाशिए के समाज में दलित, स्त्री और आदिवासी समाज की मूलतः गणना की जाती है। यह समाज का वैसा उपेक्षित वर्ग रहा है, जिसके साथ भेदभाव करके सदियों से अलग रखा गया है; क्योंकि भारतीय समाज का निर्माण कर्म के आधार पर अलग–अलग वर्गो व समुदाय को बांटा गया है। अब इन तीनों समाज को हाशिए के समाज में रखा गया है। दलित समुदाय जो सदियों से समानता और हक के लिए संघर्षशील रहा है। वही स्त्री पितृसमाजत्मक और पुरूषवादी मानसिकता वाले समाज से मुक्त होना चाहती है। जबकि आदिवासी विमर्श अस्तित्व और अस्मिता के लिए जुझ रहा है।

बीज शब्द: समाज, मुख्यधारा, हाशिए, दलित, आदिवासी, स्त्री, भाषा, संस्कृति

शोध विस्तार

वर्तमान के साहित्य में जोरों से विमर्श की धारा में कई मुद्दों पर धारा प्रवाह से लेखन का कार्य किया जा रहा है। साहित्य की धारा में समकालीन तत्व की प्रधानता दिखने को मिलती है; क्योंकि साहित्य की विशेषता सामाजिक सरोकार से हैं, जिसमें समाज का प्रतिबिंब दर्ज है। इस सरोकार में समाज के सबल पक्ष फलीभूत हैं, जिसमें समाज के सच्चे यथार्थ को अभिव्यक्त किया जा रहा है। जब भी भारतीय साहित्य पर बात की जाएगी, तब उसमें सामाजिक और राजनीतिक का मिश्रण जरूर देखने को मिलेगा। भारतीय साहित्य की सामाजिकता यहाँ की सांस्कृतिक विरासत पर टिकी रहती हैं; क्योंकि हम जब साहित्य में समाज, समाज और संस्कृति की बातें करते हैं, तो सबसे पहले साहित्य के केन्द्र में वर्णित जन-जीवन को देखते हैं। इसलिए साहित्य में अभिव्यक्त सामाजिक यथार्थ ही साहित्य सृजन का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए।

समकालीन हिन्दी साहित्य को अगर देखा जाय तो दो धाराओं को लेकर, दो विचारधाराओं को लेकर, दो समाज को लेकर लिखा जा रहा हैं। इसके बारें में यों कहे तो की हिन्दी साहित्य में समाज का यथार्थ का दो भागों में बांटा गया है। प्रथम धारा मुख्यधारा का हैं, तो दूसरा धारा हाशिए का समाज रहा है। अब हम आपको मुख्यधारा पर केन्द्रित साहित्य की ओर चलते हैं, जहाँ देखते हैं कि हिन्दी साहित्य का इतिहास लगभग हजार वर्षो का है; जिसमें मोटेतौर पर हिन्दी साहित्य के केन्द्र में मुख्यधारा को स्थान दिया गया हैं, चाहें वह आदिकाल हो या मध्यकाल या फिर आधुनिक काल। जब हम प्रत्येक काल के साहित्यिक इतिहास को पलटते हैं तो इसमें मुख्यतः समाज के उस वर्ग को चिन्हित किया गया है, जो सदियों से उन्नत, समृद्ध और शिक्षित रहा हैं। जो अपने परिचय के लिए किसी का मोहताज नहीं रहा है। ना किसी की गुलामी की और न ही किसी की प्राधीनता स्वीकार की है। इसकी स्थिति उच्चे दर्जे की रही है। इनके जीवन स्तर, जीवन दर्शन, वेश-भूशा एवं जीवन जीने की प्रणाली तक इस बात के साक्ष्य हैं कि मुख्यधारा का सामाजिक स्तर सामान्य नहीं था और अब भी सामान्य नहीं है। साहित्य ने मुख्यधारा के सामाज के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पक्ष को अपने में भरपूर स्थान दिया है। जब हम साहित्य में मुख्यधारा के राजनीतिक पक्ष को देखते हैं, तो अचरज होता है कि ये समाज की संरचना का निर्माण एक जाल के समान करते हैं। जो वर्ग और धर्म के आधार पर कर्म में बंटा हुआ है। इसी समाज का एक वर्ग शासक भी है। राजा भी है। महाराजा भी है। मालिक भी है। दूसरा वर्ग शोषितों का है। जो नौकर भी है। मजदूर और मजबूर भी है। जो किसी के द्वारा बनाएं गए सामाजिक विधि में जीता है। यह समाज का वह वर्ग है जिसे एक लम्बे समय से किसी खासवर्ग के द्वारा शोषित किया जाता रहा है।

जब हम मुख्यधारा के आर्थिक पक्ष को देखते हैं, तो जो काफी गहनता के साथ समृद्ध रहा है; क्योंकि उनके द्वारा तब से लगातार, ये समाज को संचालित हो रहे हैं। मनमाने तरीके से लोगों से वसूल कर अपने घर भर रहे हैं। उनके पास बहुत जमीन और आजीविका के कई स्त्रौत रहे हैं। नौकरी, कृषि, पशुपालन, व्यावसायिक-धनधंधे व अन्य तरीके उपलब्ध थे। मुख्यधारा का सांस्कृतिक पक्ष विविध परंपराओं के गठजोड़ से अभीभूत रहा है; क्योंकि इनके जीवन दर्शन, उत्सव और संस्कृति बिल्कुल ही पूरी सुविधा से लैस रही है।

आधुनिक काल के साहित्यकारों के द्वारा अधिकांशतः मुख्यधारा केन्द्रित साहित्य की ही रचना की जा रही हैं। विद्यापति, तुलसी, जायसी, सूरदास, घनानंद, बिहारी और आधुनिक कालीन आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी अन्य की रचनाओं में मुख्यधारा की झलक विशेष तौर पर दिखती है। इन्हीं का गुणगान दिखता है। जो अतिशयोक्तिपूर्ण है। हमारे सामने सर्वप्रमुख प्रश्न यह आता है कि सामाजिक संरचना का निर्माण एक पक्षीय क्यों हैं? क्योंकि समाज के निर्माण में सबों की भागीदारी होती है। श्रमिक और पूंजीपति, दोनों का होना अनिवार्य है। उसी तरह मुख्यधारा के साथ हाशिए का भी समाज होना चाहिए। दोनों का बराबर स्थान रहा है। इन्हीं चीजों का साहित्य में भी समावेश होना चाहिए। तभी जाकर साहित्य की उपादेयता निर्भर करेगी। मुख्यधारा से सम्बन्धित साहित्य के इतिहास को देखा जाय तो अचरज होगा क्योंकि इन इतिहास में हाशिए का नाम मात्र चित्रण है। बौद्धिक वर्गो ने अपने अपने हित साधने के लिए किसी खास समुदाय को अपने रचनाओं में स्थान दिया; जिसकी एक लम्बी परंपरा सी चलती रही है। राजा-महाराजा, सेठ-साहूकारों को बड़े ही सहजता से चित्रित किया गया; किन्तु वहीं मजदूर, किसान, दलित और आदिवासी को छोड़ दिया गया। सीधे तौर पर कहा जाय तो साहित्य का इतिहास भी मुख्यधारा को ही प्रवाहित है।

हाशिए के समाज में दलित, स्त्री और आदिवासी समाज की मूलतः गन्ना की जाती है। यह समाज का वैसा उपेक्षित वर्ग रहा है, जिसके साथ भेदभाव करके सदियों से अलग रखा गया है; क्योंकि भारतीय समाज का निर्माण कर्म के आधार पर अलग-अलग वर्गो व समुदाय को बांटा गया है। अब इन तीनों समाज को हाशिए के समाज में रखा गया है। दलित समुदाय जो सदियों से समानता और हक के लिए संघर्षशील रहा है। वही स्त्री पितृसमाजत्मक और पुरूषवादी मानसिकता वाले समाज से मुक्त होना चाहती है। जबकि आदिवासी विमर्श अस्तित्व और अस्मिता के लिए जुझ रहा है। यह तीनों समाज भूतकाल से लेकर वर्तमान तक ब्राह्मणवाद और मनुवाद के चक्कर में पिसता चला जा रहा है; क्योंकि इस वाद के जरिये मुख्यधारा वालों ने समाज की संरचना को एक जाल बना दिया है। जिसका संचालन कर वे घर बैठे अपनी झोली भरते हैं। इसलिए ब्राह्मम्णवाद वह सर्प है जिसे एक बार डस लिया उसका विष जल्द उतरता ही नहीं है। ये तीनों वर्ग भी इसी विष के शिकार हो रहे हैं।

हिन्दी साहित्य में हाशिए के समाज पर बहुत कुछ नहीं लिखा गया है; किन्तु कबीर, रैदास, ज्योतिवा फुले, बिरसा मुंडा, तिलका माझी ने जरूर इन परंपरा को आगे बढ़ाया है। हाशिए के समाज में आदिवासी साहित्य थोड़ा हटके के है; क्योंकि इस साहित्य में आदिवासी जीवन के उस भाग को चित्रित किया गया जो अपने सम्पूर्ण जीवन को अभिव्यक्त करता है। दलित और स्त्री विमर्श की अवधारणा से इनके दर्शन भिन्न हैं। आदिवासी साहित्य के विमर्श में अस्मितामूलक प्रतिरोध की बात की गई है; जिसमें वह अपने दुनियाँ में बाहरी समाज के हस्तक्षेप से बर्दास्त नहीं करता है। वह अपने समाज के अस्तित्व, संस्कृति और हक के आधार को बनाये रखने में सम्पूर्ण जीवन को लगा देता है। आदिवासियों में मुख्यधारा के तरह एकल परिवार की धारणा नहीं है वह संयुक्त परिवार में जीता है। आदिवासी जीवन के दर्शन ही प्रमुखतम रूप से सामूहिक सामाजिकता को बरकरार रखा है। आज आदिवासी समाज को लेकर मुख्यधारा का चिंतन सटीक नहीं है। इस समाज को लेकर मुख्यधारा के चिंतन में ‘‘जिसको हम डोमिनियन (वर्चस्ववादी) समाज कहते हैं, जब यह बहुसंख्यक वर्चस्ववादी समाज समझेगा कि आदिवासी की दुर्गती करने में हम भी सहयोगी रहे हैं; हम इसके जिम्मेदार हैं, तो आगे बढ़ने का रास्ता खुलेगा। बड़ी सभ्यता, बड़ा समाज वही होता है जो उसके अन्दर के छोटे लोग छोटी हैं; उनके लिए जगह बनाये। दूसरों को हेय समझने वाला समाज बड़ा समाज नहीं कहलाता है।’’1 समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जो किसी एक निम्न वर्ग पर शासन करके उसको मानसिक गुलाम बनाकर रखा है एवं उसके अस्तित्व व अस्तित्व को हीन कर दिया है; क्योंकि ये ‘‘मुख्यधारा’ का हिस्सा बनाने का लालच देकर हाशिए पर पडे़ लोगों को अस्तित्वहीन किया जा रहा है। आज के समय और समाज के यथार्थ के ये सभी आयाम वैचारिक दुनिया में विभिन्न अस्मितावादी विमर्शो के रूप में हलचल मचा रहे हैं। दलित-विमर्श, स्त्री-विमर्श, आदिवासी-विमर्श आदि के रूप में इस हलचल को सहज ही देखा जा सकता है। ये दोनों प्रक्रियाएं समानान्तर चल रही हैं और एक दूसरे को प्रभावित कर रहा है और वैचारिक दुनिया के नित नए तर्क, गहन चिंतन से उपजे नए-नए निष्कर्ष पूरे विश्व में हलचल मचा रहे हैं। भारतीय समाज और चिंतन भी इस उथल-पुथल से अछूता नहीं है।’’2 यही भारतीय समाज की विडम्बना है कि यहाँ का समाज किसी एक वर्ग विशेष के द्वारा संचालित होते रहा है।

इसलिए सभी भलीभाँति परिचित हैं कि आदिवासी किस तरह के जीवन जीते थे; किन्तु आज ‘‘आदिवासियों को आज हाशिए की जिन्दगी जीने के लिए विवश होना पड़ रहा है। आज आदिवासियों की दशा किसी से छिपी हुई नहीं है। हम इसके बारे में जानते हैं; पर आदिवासियों की दिशा क्या है और क्या होनी चाहिए? इस सवाल पर विस्तारपूर्वक चर्चा करने की आवश्यकता है। आदिवासी चेतना का ही परिणाम है कि आज आदिवासी ऐजेण्डे में आ रहे हैं; लोग मानें या न मानें। लोग कहते हैं कि आदिवासी हाशिए पर हैं लेकिन वास्तव में कालक्रम में आदिवासी ही केन्द्र में थे जिनको धीरे-धीरे हमने हाशिए पर धकेल दिया।’’3 जिस प्रकार आज हमारे समाज में आदिवासियों की स्थिति है, वैसी ही दशा हिन्दी साहित्य में आदिवासी विमर्श को लेकर धारणा है। इसलिए ‘‘समूचे भारत में लिखित आदिवासी साहित्य नगण्य है। आदिवासी साहित्य के नाम पर हमारे पास आदिवासी वाचिक साहित्य है जिसे हम आदिवासी लोक साहित्य कह सकते हैं। कुछ ईसाई मिशनरियों ने आजादी से पूर्व जो आदिवासी साहित्य संकलित किया था उसकी लिपि रोमन है।’’4 प्रस्तुत कथन से साबित होता है कि आदिवासियों के पास भाषा थी; किन्तु लिपी नहीं रही है। ईसाई मिशनरियों ने आदिवासी से संबंधित साहित्य को रोमन लिपि में प्रकाशित करवाया था। क्योंकि आदिवासी अपनी मातृभाषा में भले ही आदिवासी समाज को अभिव्यक्त करने में सहज महसूस करते है। किन्तु इनका दायरा सीमित हो जाता है। लिपि के बिना किसी भी समस्या या जीवन दर्शन को वैश्विक पटल पर नहीं उठाया जा सकता है।

हिन्दी साहित्य के विमर्श की चर्चा में लोग दलित और आदिवासी को एक समझने की भूल कर बैठते हैं; किन्तु यह भम्र है। दोनों का अपने-अपने अलग प्रश्न है अपने विमर्शो को लेकर। कोई समतामूलक समाज के लिए लड़ता है तो कोई सदियों के अस्तित्व व पहचान के लिए संघर्षरत है। इसलिए ‘‘दलित साहित्य और आदिवासी साहित्य के मध्य की सीमा रेखा को गंभीरता से समझने की जरूरत है। दलित साहित्य के पास कोई भी स्वतंत्र भाषा-बोली नहीं है जो आदिवासी के पास है। हिन्दी भाषा आदिवासी भाषा नहीं है, किन्तु हिन्दी दलित वर्ग की भाषा है, क्योंकि अधिकांश दलित साहित्य हिन्दी में लिखा गया हैं।’’5 इसलिए दलित और आदिवासी साहित्य की भिन्न है। आदिवासी साहित्य में आदिवासियत है। जो सरोकार के लिए जहोजद्द है। ‘‘आदिवासी सिर्फ आदिवासी है और उसका साहित्य भी आदिवासी या जनजातीय साहित्य है। आदिवासी साहित्य को दलित साहित्य की श्रेणी में किसी भी कीमत पर नहीं रखा जा सकता है, क्योंकि आदिवासी साहित्य की अवधारणा और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अलग प्रकार की है। भारत में ही नहीं संसार में सभी जनजाति समुदायों की भाषा और संस्कृति अन्य गैर आदिवासियों से भिन्न है। आर्थिक पिछड़ेपन और अशिक्षा के कारण सभी दलित हैं, किन्तु आदिवासी दलित नहीं हैं।’’6

क्योंकि आदिवासी जीवन का इतिहास सदियों की परंपरा में कायम है। आदिवासी साहित्यकार ही इसे समझ सकता है। जैसा सभी जानते है कि ‘‘आदिवासी-साहित्य का कुल वातावरण ही आदिम जीवन के दुःखों की खोज करने वाला, आदिम हंुकारों से भड़का हुआ और अंधेरे से लड़ने वाला है। आदिमों के अंतर्मन की तिलमिलाहट इस वातावरण द्वारा संजोकर रखी गई है।’’7 आदिवासियों की पहचान संस्कृति में निहित है। जिसे वे अब भी बचाकर रखे हुए हैं।

देश की आजादी और राष्ट्र के विकास में हाशिए वाले समाज का प्रत्येक सदी में योगदान रहा है। भारत पर जब भी आक्रमण हुआ तो सबसे पहले ये पीड़ित समाज ही आगे बढ़े हैं। अलग-अलग रूपों में इसका योगदान रहा है। विविध संस्कृति और राजनीतिक तालमेल में हाशिए की पहचान रही है। ‘‘वस्तुतः यह हाशिए का समाज ही राष्ट्र समाज की प्रमुख मानवता है जिसकी महत्वपूर्ण भूमिका सभ्यता व संस्कृति के विकास में हुई तथा उत्पादन का कार्य भी इसी वर्ग द्वारा किया गया। इसलिए जब राष्ट्र निर्माण में मानव संसाधन के अवदान पर चर्चा की जायेगी तो श्रम सम्बद्ध इसी हाशिये के समाज को केन्द्र में रखा जायेगा न कि वर्चस्वकारी पराश्रयी प्रभु वर्ग को।’’8

 

 

आज मुख्यधारा की सोंच में गुमान जरूर देखे जा सकते है।  वे अपने को ही इस देश का मूल निवासी कहते हैं। किन्तु ये गलत है; क्योंकि वे दूसरे देशों से आये हुए आर्य हैं। भारत के मूल वासी को अजनबी का दर्जा दे दिया गया है। आज ‘‘जिसे हम हाशिये का समाज कहते हैं उसका अधिकांश ज्ञात स्तर पर देश का मूल निवासी है। इस देश की सभ्यता व संस्कृति का निर्माता है। इस राष्ट्र की भूमि का असली वारिस है। जो मानसिकता समानता, सामूहिकता, प्रकृति व प्राणियों के साथ सहअस्तित्व, श्रम की महत्वता आदि में विश्वास नहीं करती उसे राष्ट्र हित के द्यौतक माना जाना चाहिए।’’9

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र वाले देश में आज अगर हाशिए की समाज के प्रतिनिधित्व को देखा जाय तो कुल आबादी का 70 प्रतिशत है; लेकिन फिर भी ये सब मुट्ठी भर लोगों के गुलाम बने हुए है। इसमें स्त्रियां भी शामिल हैं। इस ‘‘लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनसंख्या एवं मतदाताओं का निर्णय शासन संचालन के लिए प्रमुख शक्ति-स्त्रौत होता है। इस दृष्टि से देखा जाये तो दलित, आदिवासी, अति पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक (महिलाओं सहित) क्रमशः 16, 12, 22 व 20 (कुल 70 प्रतिशत) एवं 30 प्रतिशत प्रभु वर्ग का 50 प्रतिशत अर्थात् कुल का 15 प्रतिशत स्त्रियों को मिलाकर तथाकथित हाशिये समाज का यह वर्ग भारत की 85 प्रतिशत जनसंख्या बनती है और इसी अनुपात में मतदाता। इस बहुजन को हाशिये का समाज कैसे कहा जा सकता है?’’10

इसलिए हाशिये को शिक्षा के बल पर ही अपनी पहचान मिल सकती है। उसे देश की व्यवस्था में दखल देना होगा तभी हमारे समाज की काया पलटेगी। इसलिए ‘‘मुक्ति का मार्ग एक ही है कि हाशिये के जिस समाज को अब हम बहुसंख्यक समाज कहने की स्थिति में हैं उस समाज के विभिन्न घटक एकजुट होकर राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक मोर्चों पर लामबंद हों और शिक्षा, जागृति व नेतृत्व को विकसित करें एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपना सशक्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करें, ताकि निर्णय उनके पक्ष में सम्भव हो सकें और साथ ही वर्चस्वकारी वर्ग को यह आत्मानुभूति हो कि परम्परा-दर-परम्परा उसने जो चालाकियां की हैं वे अन्ततः समग्र मानव समाज के हित में नहीं हैं। ये हरकतें मनुष्य विरोधी हरकतें रही हैं; जिनसे स्वयं वह वर्ग भी सुरक्षित नहीं रह पायेगा।’’11 यह सर्वविदित है कि आदिवासी समाज सदियों से शिक्षा से कटा हुआ है। शिक्षा के बल पर ही ये अपने अधिकारों के लिए आम आदिवासियों के बीच जागृति ला सकते हैं।

आदिवासी समाज की संस्कृति में ईश्वर की धारणा का आधार कभी नहीं था; अपितु ‘‘आदिवासी संस्कृति में ईश्वर या आत्मा नहीं, प्रकृति प्रमुख है, जिसके साथ मनुष्य जीता, पलता, बढ़ता है और फिर खत्म हो जाता है। मरकर भी वह प्रकृति के विकास के लिए खाद बन जाता है। उसका कंकाल, उसकी हड्डिया धरती को उर्वर बनाती हैं, धरती पर कब्जा नहीं करतीं। आदिवासी मान्यताओं के अनुसार उसका मिट्टी का अंश मिट्टी में, पानी का पानी में, ऊर्जा आग में बदल जाती है और श्वास हवा में मिल जाता है। यह आस्थाएं ‘आदि-धर्म’ में भी चिहिृत हैं।’’12 बल्कि यह मुख्यधारा की करतूत और षडयंत्र की उपज है जिसके कारण ये मानसिक गुलाम बना दिए गए हैं। वह प्रकृति की पूजा इसलिए करता है; क्योंकि उसका उपयोग करता है। जाहिर है कि जिसका प्रयोग किया जाता है उसे संरक्षित रखा जाना चाहिए। आदिवासी समाज में आस्था की पहचान उसके समूह को लेकर है। इस तरह हम मुख्यधारा और आदिवासी साहित्य में अंतर देखने को मिलता है।

यद्यपि आदिवासी केन्द्रित उपन्यासों को देखते हैं जिसे आदिवासी और गैर आदिवासी कथाकारों ने अपने-अपने तरीके से आदिवासी साहित्य को समझने का प्रयास किया है। इसलिए दोनों के तुलनात्मक दृष्टि से विचार कर निदान तक पहुँचे जा सकते हैं जिसके कारण मुख्यधारा और आदिवासी के चिंतन में आदिवासी साहित्य की समझ स्पष्ट हो जाएगे।

सर्वप्रथम आदिवासी जीवन के सामाजिक समस्याओं को देखते हैं, जिसमें अशिक्षा भी सामाजिक समस्यों में एक है। जिसे उपन्यासों के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। अशिक्षित रहने के कारण आदिवासियों की विडम्बना यह है कि अपने ऊपर हो रहे शोषण का प्रतिकार अशिक्षित रहने के कारण कानूनी ढ़ंग से नहीं कर पाते हैं। परिणाम यह होता है कि साहूकार, जमींदार, विचैलिऐ, ठेकेदार आदि लोग हर तरह से इस समाज का शोषण करने में सफल हो जाते हैं। गैर आदिवासी कथाकार राकेश कुमार सिंह के ‘पठार पर कोहरा’ उपन्यास में सुगना मुंडा पात्र कहता है कि ‘‘साहू सेर-भर अनाज का चैथाई नमक बदले में देता है तुम्हें। जानते हो, शहर में नोन पैसों पर मिलता है और अनाज रूपयों से। तुम पढ़े-लिखे होते तो साहू यँू लूट नहीं सकता था तुम्हें।’’13 आज भी और कल भी शिक्षा का महत्व हर समाज में रहा है और रहेगा।

वहीं आदिवासी कथाकार पीटर पौल एक्का ‘मौन घाटी’ उपन्यास में कहते हैं कि आज आदिवासियों के लिए शिक्षा ही वह माध्यम है जिसके बल पर वह अपने पूरे समाज को सुधार सकता है। इसी के बल पर दिकुओं से केश भी लड़ सकता है। इसी शिक्षा के महत्व को स्वीकारते हुए लेखक अभिव्यक्त करते हैं। काका से किशोर से कहते हैं कि ‘‘तब गाँव-घर के लिए कुछ कर सकोगे बेटे। हम तो जहाँ तक हो सका रास्ता दिखाने का कोशिश किया। अंगरेजों के जमाने में दूसरी जमात तक पढ़कर कितना कर पायेगा। उकील, बेरिस्टर, हाकिम-हुकूम हो जावोगे तो केस मोकदमा में मदद कर सकोगे।’’14 ये सच है कि आदिवासियों में शिक्षा की कमी है। जो भी शिक्षित हुआ है वह अपने अनुकूल समाज में काम करता है। भले ही दिकुओं से मुकदमा ही क्यों न लड़ना पड़े वे इससे पीछे नहीं हटेगे।

प्रस्तुत कथन से अभिव्यक्त होता है कि गैर आदिवासी के चिन्तन में अशिक्षा की समस्या तभी हो पाऐगी जब आदिवासी शिक्षा के महत्व को समझने की कोशिश करेंगे। जब आदिवासी कथाकार भी मानना है कि शिक्षा के बल आदिवासी अपने भविष्य को सुरक्षित रख सकते हैं।

इसके बाद आदिवासियों के सांस्कृतिक समस्या को देखते हैं। आदिवासियों के बीच धर्मान्तरण की समस्या प्रमुख रूप से देखने को मिलते हैं; जिसे समकालीन कथाकारों ने अपने उपन्यासों में अभिव्यक्त किया है। गैर आदिवासी कथाकार मधु काँकरिया के ‘खुले गगन के लाल सितारे’ उपन्यास में धर्मान्तरण की समस्या देखने को मिलते हं;ै जो कि अन्य उपन्यासों से भिन्न है। इसी पर लेखिका लिखती हैं कि ‘‘अपनी संस्कृति और प्रकृति-प्रेम में पूरी तरह डूबे एवं अपनी जातीय स्मृति पर गर्वित है इस समाज के बारें में मिशनरियों द्वारा धर्मान्तरण की जो इतनी बातें आए दिन सुनने को मिलती हैं, क्या है आधार इनका …?……हाँ धर्मान्तरण की ढेर सारी घटनाएँ यहाँ मिल जाएँगी आपको, लेकिन इतना बता देता हँू, किसी आर्थिक प्रलोभन या क्षैक्षिक प्रलोभन के चलते आदिवासी अपना धर्म नहीं छोड़ते हैं। बड़ा स्वाभिमानी है यह समाज लेकिन मृत्यु-दुख, जानलेवा व्याधि, सन्तान या पत्नी की मृत्यु जैसे चरम टूटते क्षणों में ही होता है यह धर्मान्तरण। कहीं-कहीं महज एक क्रोसिन की टेबलेट के चलते एक पूरे परिवार ने गले में क्रांस पहन लिया; क्योंकि पास में रहते हुए भी आप लोगों ने कभी सुध नहीं ली, वरन् हर तरह से उन्हे लूटा। उनकी सूध ली सात समुन्दर पार से आए उन विदेशी मिशनरियों ने। भले ही अपने विश्वासों के आधार पर किन्हीं भी कारणों से ली हो उन्होंने सुध लेकिन ली तो। आप लोगों ने तो उन्हें उनके अपने परम्परागत किसानत्व से भी दुर कर उनके वनों को काट उन्हें भारी संख्या में खेतिहर मजदूर या कारखानों के कैजुअल मजदूर बना डाला है।’’15 इस कथन से जाहिर है कि आदिवासियों ने भले ही आर्थिक मजबूरी के कारण धर्म परिवर्तन किए हों; किन्तु वे अपने आदिवासीपन को अब तक नहीं भूले हैं। यहां पर दिकुओं ने आदिवासियों का धर्म परिवर्तन कराकर मुख्यधारा की मानसिकता को स्पष्ट कर दिये हैं। 

आदिवासी कथाकार हरिराम मीणा ने अपने ‘धूणी तपे तीर’ उपन्यास में धर्मान्तरण की समस्या को अभिव्यक्त किया है। इस उपन्यास के प्रमुख पात्र गोविन्द गुरू हिन्दू धर्म से प्रभावित होते दिखते हैं; क्योंकि गोविन्द गुरू के ऊपर गुरू राजगिरी गोसाई और आर्य समाज के संथापक दयानंद सरस्वती का प्रभाव पड़ा था। गुरू राजगिरी गोसाई ने प्रथमतः औपचारिक शिक्षा दी थीं। इसके बाद दयानंद सरस्वती से उदयपुर के दरबार में मुलाकात और कुछ समय बीताने के पश्चात् वे हिन्दू दर्शन से प्रभावित हुए जिसके बाद उनके व्यक्ति पर प्रभाव दिखने लगा था। इसके बाद वे हिन्दुत्व के पथ पर संप सभा को लक्ष्य करके उसके लक्ष्य निर्धारित करने लगे। धूणी धाम की स्थापना, धर्म प्रचार, भगत का कर्म, मृत्यु के बाद उसके क्रिया-कर्म के साथ कई दृश्य दिखते हैं। लेखक ने इसी ओर संकेत करते हुए लिखा है कि ‘‘धर्म-प्रचार अर्थात्, भक्ति भाव भरे गीतों और भजनों को याद किए रहना, नया सृजन करना, तथा भजनों और वक्तव्यों के माध्यम से सम्प सभा के धार्मिक विचारों का प्रचार करना जिसमें साफ-सफाई से रहना, स्नान करना, तुलसी की माला पहनना, कंठी-जाप करना, चंदन-तिलक लगाना, धूणी में हवन के उह्नेश्य से घी डालना, घी का दीपक जलाना, मुख्य तिथियों पर और विशेषकर पूर्णिमा के अवसर पर नारियल चढ़ाना आदि इस में शामिल था। इस सारे कार्य का जो रचनात्मक पक्ष था वह था नैतिक गुणों का विकास करना और अच्छा मनुष्य बनाना।’’16 इस सामंतवादी मनुवादी व्यवस्था के साठगांठ में गुरू गोविन्द जी आदिवासियों से हवन तक करवा लेते हैं। जो बाद में आदिवासी समाज के पतन का कारण भी बना था। आदिवासियों का अपना धर्म है। इस कथन में अंधविश्वास की भावना को दिखाया गया है जो कि मुख्यधारा की मानसिक उपज है। अंत मे आदिवासी भी स्वीकारते हैं कि अगर खुलकर आमने-सामने अंग्रेजों का सामना करते तो शायद परिदृश्य ही कुछ ओर होता।

उपर्युक्त दोनों के कथन से स्पष्ट होता है कि मुख्यधारा की मानसिकता के कारण अंधविश्वास की परंपरा आदिवासियों के बीच कायम हुआ है। इस कारण आदिवासियों को वर्षो से इस परंपरा का खामियां भुगतना पड़ा है। ऐसा मत् गैर आदिवासी और आदिवासी कथाकारों के हैं।

इसके बाद आदिवासियों के आर्थिक एवं राजनीति समस्याओं को देखते हैं। जिसमें भष्ट्राचार दोनों तरह के समस्याओं में पाऐ जाते हैं। किसी भी अर्थव्यवस्था को चैपट करने में भष्ट्राचार भी हाथ होता है। आदिवासियों के लिए सरकार के तरफ से मुआवजे के लिए जो राशि आती हैं तो बड़े-बड़े साहब, अधिकारी की मिली भगत से गिल लिये जाते हैं और कुछ बचते हैं तो कुछ ही आदिवासियों को वह राशि पाते हैं। यह राशि बहुत कम होते हैं। इसी आदिवासी कथाकार पीटर पौल एक्का कहते हैं कि ‘‘अब तक जितने गांव खाली कराये जा चुके थे उनकी मांगे कागज फाइलों में ही दबी रह गयी थीं। मुआवजा के थोड़े बहुत पैसे मिले थे वे भी उन गरीबों के हाथ आते-आते आधा से भी कम हो गये थे। जमीन दिलाने-बसाने की बात भुला दी गयी थी।’’17 आदिवासी विकास के लिए सरकारी योजना से आई राशि का घटोला हो जाता है।

उपर्युक्त कथन से साबित होता है कि अगर आज आदिवासी आर्थिक मामले में जूझ रहे हैं तो इसके कारण बाहर से आए दिकुओं का हस्तक्षेप है; क्योंकि ये अपने सूझ-बूझ से आदिवासियों का शोषण करते हैं। इन दिकुओं का संबंध मुख्यधारा से जुड़े हुए हैं; क्योंकि आदिवासी समाज सरल, सहज और अबोध होते हैं। मुख्यधारा की सोच आदिवासियों के लिए कभी सही नहीं रहा है ऐसा मानना है आदिवासी कथाकारों का; किन्तु गैर आदिवासी अपने मत में कहते हैं कि आदिवासियों का विकास मुख्यधारा के कारण हो रहा है; क्योंकि वे उसका अनुकरण कर रहे हैं। लेकिन यह सच है कि आदिवासी उनका अनुकरण कर रहे हैं; किन्तु इसके कारण वे अपने पहचान को भी खाते जा रहे हैं।

अब आदिवासी केन्द्रित उपन्यासों में कथाकारों के भाषा-शिल्प को समझने का प्रयास किया जाय, जो उपन्यासों में अभिव्यक्त है। इसके लिए गैर आदिवासी कथाकार राकेश कुमार सिंह के ‘पठार पर कोहरा’ उपन्यास में भाषा-शिल्प को देखते हैं ‘‘पहले तो पक गया था। मेथी कल्हार (भूनकर) माई ने पीसकर लगा दिया तो घाव फूट गया। अब रखतेला रखेंगे घाव पर। रखतेला क्या ? कोई जड़ी-बूटी ?….. गोईठे की राख होती है न…खूब महीन, उसमें करू तेल (सरसों का तेल) फेंटकर घाव पर लगाते हैं। घाव ठीक हो जाता है और का… तुम जाना नई….अभी आते हैं।’’18 यहाँ आदिवासियों के दैनिक जीवन की आम बोलचाल की शब्दावली का प्रयोग किया है। वैसे कुछ शब्द ऐसे भी हैं जो आम समाज के समझ के बाहर हैं जैसे – कल्हार, रखतेला। इसमें पूर्णतः ग्रामीण शब्दों की प्रचुरता है। लेकिन प्रयोग किए गए शब्दों में कहाँ तक वास्तविकता है कि ये आदिवासी के शब्द हैं।

इसके बाद आदिवासी कथाकार पीटर पौल एक्का के ‘मौन घाटी’ उपन्यास में झारखण्ड के आसपास के मुंडा आदिवासी की बोलियों एवं उसके भाषा का प्रयोग किया गया है। वे आदिवासी क्षेत्रों में सरकार के द्वारा दिये गए सुविधाओं के दुर्दशा पर लिखते हैं कि ‘‘गाँव का इस्कूल देखो। साल में कै बार कलास होवे है। दूर आखर के पढ़ाई भी नी होता है। गाँव का इसपिताल देखा है तुमलोग। मलेरिया होगा तो कंपोडर निरोध दे के जायगा। इस्कूल और इसपिताल तो गोदाम ही गवे है। ई सब बनाइ-के-सजाइके हमत तोहर फरिज है। जे जे मरद है, मोंछ है, तो साथ में चलो और नही ंतो इसतरी मन लेखे जनाना कुर्ता-धोती पहिन के चूड़ी लागाइये चूल्हा फुँके रहा। कोई दोसर आके ई काम हमर वास्ते करेगा क्या। आपलोग कहो।’’19 प्रस्तुत कथन में हमे देखने को मिलता है कि इसमें स्थानीय बोलियों के शब्दों में इस्कूल, इसपिताल, फरिज, दोसर प्रमुख शब्द दिखने को मिलते हैं। इसके साथ व्यवहारिक जीवन शैली के शब्द भी दिखने को मिलते हैं।

उपर्युक्त देखा जाय तो मुख्यधारा और आदिवासी साहित्य में विशेष तौर पर अंतर दिखता है। मुख्यधारा की सोच सामंती प्रवृति की है जबकि आदिवासी इनसे अब भी अंजान है। वही मुख्यधारा की शब्दावली कर्कश है और आदिवासी की शब्दावली में कर्कश शब्द ही नहीं दिखने को मिलते हैं। मुख्यधारा का साहित्य सहानुभूति पर लिखा जाते रहा है; जबकि आदिवासी आदिवासी स्वानुभूति को लेकर प्रतिबद्ध है। मुख्यधारा की चिंतन प्रणाली में केवल व्यक्ति स्वार्थ दिखने को मिलता है; जबकि आदिवासी की चिंतन प्रणाली सामूहिकता को लेकर है।

 

निष्कर्ष

निष्कर्ष: समकालीन आदिवासी लेखक और दिकु आदिवासी लेखन के तुलनात्मक अध्ययन पाया गया कि हिन्दी साहित्य में गैर आदिवासियों ने भी आदिवासी लेखन में आदिवासी रचनाकारों की तुलना में कई रचनाएं रची जिससे हम वाखिफ है। इस रचनाओं के माध्यम से आदिवासी जीवन की दशा को सहानुभूति के बल पर भले ही पेश किया गया हो, किन्तु यह भी सच है कि आदिवासी साहित्य को समृद्ध करने में गैर आदिवासी रचनाकारों का सराहनीय योगदान रहा है। इसके बाद एक ओर सत्य की ओर मैं इशारा करना चाहूँगा कि मुख्यधारा के साहित्य में आदिवासी की क्या स्थिति है ? वह सर्वविदित है। मुख्यधारा का समाज मनुवाद पर कायम है जबकि आदिवासी समाज की धारणा स्व रचित सामूहिकता में कायम है।

संदर्भ सूची

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