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सात फेरों की चुभन-डॉ.वर्षा कुमारी

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सात फेरों की चुभन

           –डॉ.वर्षा कुमारी

जीतू- सृष्टि इतना क्यों रो रही हो? चुप भी हो जाओ अब। तुम अकेली ऐसी लड़की नहीं हो न जिसकी शादी हुई है? और तुम कोई पराए घर थोड़ी ना आई हो। यहाँ से तुम्हारा मायका 4घंटे की दूरी पर ही तो है। जब तुम्हारा मन करे चली जाना सबसे मिलने। यहाँ तुम्हे किसी चीज की कोई कमी नहीं होगी।

सृष्टि- जी,माँ-पापा घर में अकेले हैं। उन्हें अब खाना कौन बना कर देगा। उनका ख्याल कौन रखेगा? माँ की आँखों से भी ठीक प्रकार से दिखाई नहीं देता। इन्हीं सब बातों की चिंता हो रही है।

माँ जी- बहू आज तुम्हारा रसोईपुजन कर देते हैं। फिर तुम खाना बनाना शुरू कर देना।

सृष्टि- जी, माँ जी।

जीतू- सृष्टि से, माँ का हमेशा खयाल रखना। वो जैसा बोले वैसा ही करना। उसकी बातों को कभी ना नहीं बोलना।

सृष्टि ने एक दिन सोचा क्यों न माँ-पापा से मिलने चली जाऊँ। बिना माँ-पापा को बताए ही जाऊँगी वो एहसास कितना अलग होगा न? इसी खुशी में एक दिन जीतू से बोलते हुए- मुझे माँ से मिलने का बड़ा मन कर रहा है। मुझे ले चलोगे क्या माँ के पास?

जीतू- अच्छा ठीक है। माँ से पूछता हूँ मैं।

माँ- अभी-अभी तो बहू घर में आई है। मायके जाने की भी सोचने लगी। कुछ दिन के बाद चली जाएगी ।

 

 

जीतू- अच्छा ठीक है माँ। जैसा आप उचित समझे। मैं समझा दूँगा सृष्टि को बाद में कभी चलेंगे।

एक माह बाद………….

जीतू- सृष्टि तुमने मुझे आज जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी दी है। मैं पापा बनने वाला हूँ।

माँ- जीतू, अब तो बहू का कहीं आना-जाना बंद हो गया। ऐसी हालत में सफर करना अच्छा नहीं होता है। बच्चे पर बुरी नजर लगती है समझे।

सृष्टि अब अंदर-ही-अंदर घुटती जा रही थी। देखते-देखते चार महिने हो गए। उसे अपने माँ-पापा की बहुत याद आ रही थी।

एक दिन सृष्टि के मायके से फ़ोन आया कि माँ की तबीयत ठीक नहीं है। सृष्टि से मिलना चाहती हैं।

सृष्टि- माँ जी, अगर आपकी इजाजत हो तो एक दिन के लिए मैं जा सकती हूँ क्या माँ से मिलने? घर पास में ही तो है। अगर आप बोलें तो एक दिन में ही माँ से मिलकर वापस भी आजाऊंगी। बहुत दिन हो गए हैं। माँ-पापा को  देखने का बड़ा मन कर रहा है।

माँ जी- बहू मैंने पहले ही कहा है कि ऐसी हालत में कहीं जाना बच्चे के  लिए  खतरे से खाली नहीं होगा। फिर भी तुम मुझसे ऐसी बात पूछ रही हो? खुदा ना खासता अगर बच्चे को कुछ…….ना बाबा ना …….। माँ बीमार हीं तो हैं, ठीक हो ही जाएँगी। तुम मेरे होने वाले वारिस को क्यों मुसीबत में डालने की सोच रही हो।

जीतू- सृष्टि, रो-रो कर तुमने अपनी कैसी हालत बना ली है? अपना नहीं तो बच्चे का ख्याल तो रखो। माँ ने मना किया है तो कुछ सोच समझ कर ही।

 

सृष्टि को इस बात की चिंता खाए जा रही थी कि घर में उसके बूढ़े माँ -बाप अकेले हैं। माँ बीमार हैं। उनका ख्याल रखने वाला कोई नहीं है। मैं होती तो माँ की देख-रेख करती।

सृष्टि एक दिन विचारती हुई जीतू से बोलती है – क्यों न माँ-पापा को यहीं बुला ले। वहाँ अकेले रहते हैं। माँ भी बीमार है। खाना बनाने वाला भी कोई नहीं हैं।

जीतू अपनी माँ से पूछते हुए- माँ, सृष्टि बोल रही थी माँ-पापा को यहीं बुलाने के लिए।

माँ – ऐसा भी कहीं होता है क्या? जो लड़की के माँ-बाप रहते हों अपनी बेटी के ससुराल में? नहीं बेटा ऐसा नहीं हो सकता। बहू को समझा दो।

सृष्टि- एक दिन माँ जी से विनती करती है। प्लीज आप माँ-पापा को यहाँ आकर रहने दें। यहाँ मैं उनका ध्यान तो रख सकती हूँ। आपलोगों को तो मालूम है कि मेरे सिवाय कोई और नहीं है उनके लिए। मैं ही एकमात्र सहारा हूँ माँ-पापा के लिए ।आपके पास तो बेटा और बहू दोनों है। उनके पास तो बेटे का भी सहारा नहीं है। फिर बहू तो दूर की बात है।

सृष्टि को अपने बूढ़े माँ-बाप की चिंता ने तोड़ कर रख दिया था। बेसहारा महसूस करने लगी खुद को। सोचने लगी कि शादी करके मैंने जीवन की सबसे बड़ी गलती कर दी है। बेटी के माँ-बाप बोझ होते हैं क्या? शादी से पहले तो जीतू ने हाजार बाते बोली थी। पर अब क्या हो गया जीतू को। माँ सझदार नहीं है तो क्या जीतू तो पढ़ा लिखा है। उसे तो माँ को समझाना चाहिए कि जैसे आपलोग मेरे माँ-पिताजी हैं वैसे ही वो लोग भी मेरे माँ-पिता हैं। क्या शादी होने से सिर्फ लड़की की ही ज़िम्मेदारी बढ़ती है। लड़के को भी तो चाहिए कि वो

 

लड़की के माँ-पिता की ज़िम्मेदारी निभाए। ये सब बातें सोचते- सोचते एक दिन वो बड़ा कदम उठाने पर मजबूर हो गई।

माँ- सुबह-सुबह बहू….बहू चिल्लाये जा रही थी। माँ की आवाज सुन कर जीतू भी सृष्टि को आवाज देने लगा। सृष्टि का घर में कहीं पता नहीं चला। सब परेशान हो गए कि सृष्टि ऐसी हालत में कहाँ जा सकती है। जैसे ही जीतू अपने कमरे गया उसे बिस्तर पर रखा एक लिफाफा दिखा। उसमें लिखा था……..

            जीतू, आप माँ जी और पिताजी का ख्याल रखना। उनके खाने का लिस्ट मैंने इसमें लिख दिया है। कौन- कौन सी दवाई कब खानी है ये भी लिखा है। मैं माँ के घर जा रही हूँ। क्योंकि माँ-पापा को मेरी जरूरत है। क्या हुआ कि मैं बेटा नहीं बेटी हूँ। बेटियां क्या किसी से कम होती हैं? बूढ़े माँ-बाप का सहारा उनके बच्चे ही तो बनते हैं। आप भी तो अपने माँ-पिता का सहारा हो। मैं आज वही फर्ज पूरा करने जा रही हूँ। आपलोग मुझे मेरे मायके भेजने के लिए तैयार नहीं थे। मैंने बोला की माँ -पापा को ही बुला लेते हैं। उस बात के लिए भी माँ जी नहीं तैयार हुई। इसीलिए मुझे आज ऐसे कदम उठाने पड़े। पता है आपको, मुझे विदा करते वक़्त माँ- पापा ने क्या कहा था- “ससुराल में सबसे ज्यादा अपने सासु माँ और पिताजी का ख्याल रखना। अब से वही तुम्हारे माँ-बाप हैं। बुढ़ापे की लाठी बनना उनके। सोचना की तुम हमलोगों की सेवा कर रही हो। उनकी बातों को कभी दिल पर नहीं  लेना। हमलोगों की तो जीवन की नैया पार हो गई बेटी। अब तो हमलोग तुझे ससुराल में खुश देखना चाहते हैं।” बोलते-बोलते माँ-पापा की आँखे भर आई थी। मैंने बचपन से सोचा था कि मैं माँ-पापा को हमेशा अपने पास ही रखूँगी। बेटी का घर कोई पराया

 

थोड़ी ना होता है। उन्हें भी पूरा अधिकार है अपनी बेटी के घर रहने का। पर ये मेरे नसीब में नहीं था। अब मैं हमेशा माँ-पापा के साथ ही रहूँगी। माँ-बाप का कर्ज कोई नहीं उतार सकता। क्योंकी अपने बच्चों के प्रति उनका बलिदान निःस्वार्थ होता है। शादी हो जाने से माँ-बाप से रिश्ते खत्म नहीं होते। मैं पहले एक बेटी हूँ,फिर पत्नी, बाद में एक बहू। आज मैं अपने फर्ज को चुन रही हूँ।

  मुझे क्षमा कर देना सृष्टि

एक वर्ष बाद……….

जीतू बेटा,तेरे नाम का एक रजिस्ट्री आया है। मुझे तो पढ़ना आता नहीं, तेरे कमरे में मैंने रखा है। देख तो क्या है?

जीतू- लिफाफा खोलते हुए रुँधे गले से, तलाक के नोटिस है पापा। सृष्टि मुझसे तलाक चाहती है।

पिताजी- तुमलोगों की बात यहाँ तक पहुँच गई। लड़के होकर एक लड़की को काबू में नहीं कर सके। तुमने उसे ज्यादा ही बढ़ावा और छूट दे रखी थी। अब भुगतो। तलाक नहीं देना। अरे, उसकी चलेगी क्या? बड़ी आई तलाक लेने।

जीतू- नहीं पापा, सृष्टि ने बिल्कुल सही फैसला लिया है। उसके फैसले का मैं सम्मान करता हूँ। तलाक तो मुझे देना ही पड़ेगा। पापा, सृष्टि एक पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की है। वो पराधीन होकर नहीं जीना चाहती है। हमारी सोच बहुत पुरानी और छोटी है। ये समाज हम जैसे लोगों के लिए नहीं है पापा। आज लड़कियां स्वावलंबी बनना चाह रहीं है। हमने सृष्टि पर हमेशा अपनी मर्जी सौपीं थी। फिर भी उसने हमारा मान रखा था। उसने कभी हमलोगों को गलत जवाब नहीं दिया। हमें सृष्टि से कुछ सीखने की जरूरत है पापा। मैं आज ही तलाक के नोटिस पर हस्ताक्षर कर के भेज दूँगा। बोलते-बोलते जीतू को सृष्टि के साथ लिए सात फेरे धुंधले नजर आने लगे।

डॉ. वर्षा कुमारी

संप्रति: स्वतंत्र लेखन तथा ब्लॉगर।

मो. 7569961990

मेल- drwarshagupta29@gmail.com 

ब्लॉग- https://bhawnaonkasansar.blogspot.com

संपर्क : कर्ण विहार पार्ट-4 नई दिल्ली

कविता

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पुरूषोत्तम व्यास की कविताएँ

अघोषित युध्द….

कहाँ…कहाँ नही

विचारों में

चौराहों में

हर नगर गांव की गलीयों में

 

बच नही पाता कोई

न कोई बडे-बडे टेक

न कोई मशीनगन

फिर भी चल रहा

अघोषित युध्द… 

 

बोझा पहाड-सा

इसको पकडू

इसको जकडू

नफरत फैलाने वाले आदोंलन…

 

अलग मैं

मेरे विचार अलग

मेरा झंडा अलग

मेरा एजेडा अलग

मै सबसे अलग…

 

हिड्डियाँ का साम्राज्य

भडक रहा…तूफान.

नई-नई योजनाओं संग

नये-नये नारों के संग

अघोषित युध्द……

 

 

 

वेक्यूमकिनर 

 

कितना डर समेटे रहता

नही मालूम 

कौन से कोने से

डर भरे विचार आ

जाते…..

 

तोड़ते रहते हिम्मत

चारों तरफ

टूट टूट के गिर रहे

पहाड़ चारो ओर

हा-हाकार…..

कीजड़ कीजड़

फैली हजारों लाशे

फट पडे बादल…..

 

स्थिती अतिभयानक

मौंत का ताड़व

भूखे प्यासे भटक रहे…….

 

टूटा/ टूटा

फटा/ फटा

कटा /कटा

मिटा /मिटा

चल रहे अधंकार के

तरफ…….

 

सीधी-सरल जीवन शैली

शून्य/ शून्य 

दिवश/ दिवश  बीत रहे 

चितायें दीमक की तरह

शरीर को खाई जा रही……..

 

स्थितीयों पर बस नही

ईष्या..

घ़ृणा…

के भाव पालते हुयें……

 

धोखा….

षड़यत्र…..

लूट खसोट

पेड़ो पर चमगादड़ लटकते हुयें

मांस नोचते हुयें बाज

पखों की घड-घड आवाज

कमरे में गुजंती हुई……….

 

कहाँ उड़ो मैं

पिघल गई

हिमशिलायें

पूर्ण रूप से झनझोर

देना चाहता विचारो को……..

 

आरसी में

जब भी आपने आप को देखता

आखों में नफरत ही दिखती…… 

   

विचारो की श्रृंखला

खून चूसते हुयें

कीड़े…….

वहम का बहुत बड़ा

साम्राज्य

टूट टूट के गिर रहे

हरे हरे पत्ते…….

 

मंथता रहता

बस मे नही

करवटे बदलती रहती…

स्थितीयाँ

अभिशाप

प्रेम के फूल महकते

नही

भड़की हुई आग

धुआँ का अता पत्ता नही

बारिस का मौसम

टिन पर बूदों की आवाज…….

 

दिवारों पर पपड़ीयाँ

घाव भी हरे हो जाते….

समझोंता

गंदगी मन-में

कोनसे वेक्यूमकिनर का उपयोग किया जायें…….।

 

 

पुरूषोत्तम व्यास

C/o घनश्याम व्यास

एल.जी 63 नानक बगीचे के पास

शांतीनगर कालोनी

नागपुर(महाराष्ट)

ई–मेल pur_vyas007@yahoo.com

मो. न. 8087452426

 
 
 
 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

कवि (डॉ.) शैलेश शुक्ला की कविता

“बंधु! सच बताओ …”

बंधु! सच बताओ

इतनी कड़वाहट

कहां से लाते हो?

कैसे करेले

और नीम को भी

तुम

हमेशा ही हराते हो?

 

बंधु! सच बताओ …

किसी का

एक कदम भी

आगे बढ़ना

भला क्यों

तुम्हें खटकता है?

किसी का

एक सीढ़ी भी

ऊपर चढ़ना

क्यों तुम्हें

अखरता है?

इतना ज्यादा

मैलापन मन में

भला कैसे उपजाते हो?

 

बंधु! सच बताओ …

 

मेहनत करे कोई और

तो पसीना

तुमको क्यों आता है?

सफलता किसी को

तनिक भी मिलना

क्यों तुम्हारा

 

 

 

खून सुखाता है?

क्यों बेमतलब

यहाँ-वहाँ

अपनी टांग अड़ाते हो?

बंधु! सच बताओ …

तुम सदा ही चाहो

कि सब तुम्हारी ही 

जय जयकार करें

तुम ही हो ‘सर्वोसर्वा’

सब सदा स्वीकार करें

आखिर क्यों

खुद पर

इतना इतराते हो?

 

बंधु! सच बताओ …

जो तुमने बोया

वो सब सदा

तुमने ही तो काटा है

भला कब किसने

तुमसे आकर

कुछ बांटा है?

फिर भला क्यों

दूसरे की थाली में

अपने दांत गड़ाते हो?

 

बंधु! सच बताओ …

खुद को ही

तुम तुर्रम खां समझो

ऐसी भी क्या मजबूरी है?

सब तुम्हारा ही

गुणगान करें

 

क्या ये 

सदा जरूरी है?

क्यों बस

अपनी ही डपली

हर वक्त बजाते हो?

बंधु! सच बताओ …

 

कवि (डॉ.) शैलेश शुक्ला

दोणिमलै, बेल्लारी, कर्नाटक

poetshailesh@gmail.com

8759411563

 

 पंडित विनय कुमार की कविता

नदियों से बातचीत

तुम नदी हो

 तुम्हें देखकर मन खुश हो जाता है हर रोज

तुम्हारे भीतर जीवन है

तुम जीवनदायिनी हो

तुम्हें देखकर अच्छी लगती है दुनिया

क्योंकि तुम सदैव प्रसन्न दिखती हो

तुम्हारे भीतर रहने वाले

सभी जीव- जंतु तृप्त रहते हैं

तुम्हारे भीतर कितना आनंद है ?

कल-कल  निनादित करती,

जगत को प्रसन्न करती रहती हो हर वक्त;

तुम एक जीवन हो

और अनंत जीवन का सृजन करती हो तुम

तुम पयस्विनी हो धरा की

मैं तुमसे रोज बातें करता हूं

मैं तुम्हें रोज प्रणाम करता हूं

रोज राह में आते- जाते तुम्हें देखता हूं देर तक

लेकिन तुम मौन रहती हो

तुम्हारी भाषा नहीं समझ पाता मैं

मुझे भी देखती हो गौर से

देर तक

मेरी आंखों को

शायद मेरे भीतर के भावों को पढ़ती हो

हम से डरती  भी हो तुम

तुम अबला हो

तुम असहाय हो

तुम सदियों से सताई गई हो

तुम दबाई गई हो

क्योंकि सारी उच्छृंखलता  को

तुम ही वरण करती हो

इसीलिए तुम श्रेष्ठ हो !

 

हरेक संस्कार तुम्हारे सहयोग के बगैर

संपन्न नहीं होते

जन्म से लेकर अंतिम संस्कार में

तुम बार-बार पूजित होती हो

तुम मेरे कुटुंबी जन की तरह हो

तेरे चरणों में हम आकर कृतार्थ होते हैं

तुम्हारे आशीष के बगैर

नहीं संपन्न होता विवाह और अन्य मांगलिक कार्य

और हत्याएं – आत्म हत्याएं– तक

 तुम्हारी गोद में ही तो होती हैं हर रोज…

अखबारों में खबरें आती रहती हैं

कि किसी युवती ने कूदकर आत्महत्या की है

तब तुम क्यों नहीं उठ खड़ी होती हो ?

धरा के इस दैहिक कष्ट से मुक्ति दिलाने के लिए —

शायद कभी मरने से रोक सको तुम।

कहीं न कहीं से हत्या कर तुम्हारी गोद में

फेंक देने की खबरें आती रहती हैं  तब

क्यों न उसके अपराध का गवाह बन कर

 उठ खड़ी होती हो  तुम ?

तुम मां हो !

न जाने कब से तुम मेरे घर के सामने

बहती रही हो —

मेरे पुरखों ने तुम्हें शीश नवाए हैं

मेरे लिए, मेरे परिजनों के लिए

तुम ही तो जीवन बनी हो

तुम रहोगी– तभी हम रहेंगे

और रहेंगी हमारी आनेवाली पीढ़ियां…

 

हिन्दी शिक्षक

शीतला नगर रोड नंबर 3

पोस्ट गुलजार बाग

अगमकुआँ

पटना, बिहार

 

 

 

पंकज मिश्र ‘अटल‘ की कविता

 

हो चुकीं हैं आवाजें आजाद

वह

आ रहा है सबके बीच

महसूस हो गया

माहौल के मिजाज़ से

लोगों के चेहरों पे बदलने

लगे हैं रंग

बढ़ रही है छटपटाहट

कंपकंपा रहीं हैं आवाजें

थरथरा रहा है शोर भी

क्योंकि

फड़फड़ाने लगे हैं

वर्दियों में कैद कुछ उसूलधारी

जो कुछ देर के लिए

हो जाते हैं संवेदनहीन,

उसकी आंखों में

डूब चुकीं हैं संवेदनाएं

वह केवल खर्च करता है

उतने ही शब्द

जिनसे कायम रह सके

उसका तथाकथित अस्तित्व,

बना रहा है

पूरी जनता को अभ्यस्त, कि

मान ले नहीं है कोई दूसरा विकल्प

पी रहा है

सभी की आंखों की चमक

जिससे देख सकें

सब उसी की नज़र और नज़रिए से

और कुछ भी कहने के लिए

इस्तेमाल करें

उसी के आवंटित शब्द

 

वह वो चुका है

कुछ अदद शब्द और

बना दिया है भीड़ को गूंगा

वह चला रहा है

अपने ही तरीके से

हो चुकी शब्दमय भीड़ को

क्योंकि उसके शब्दों में

छिपा है तिलिस्म

और वह जानता है

बखूबी खेलना शब्दों से

मौन है भीड़

सोचती नहीं

न ही है देखती,

छा रही है धुंध

बिखर चुकीं हैं

आवाजें, दर्द और शोर

महसूस करने लगे हैं

कंकरीली ज़मीन को

माहौल में

बहती है गरमी पिघल कर

उड़ रहे हैं भाप बन कर

ढेरों लिजलिजे शब्द

बेचैन चेहरे और टांगों के हुजूम

बढ़ रहे हैं

काफ़ी तेज़ी से

उत्तेजित और

घबराए से

जंतर- मंतर की ओर

अब उनके पास हैं

अपने शब्द

अपनी चीखें

अपनी आवाजें

भर गए हैं हवा में, दिशाओं में

ढेरों बेख़ौफ़ शब्द

 

और दर्ज़ हो जाते हैं

अख़बारी हेडलाइंस में कि

आवाज़ें आजाद हो चुकीं हैं

डूब चुकी है भीड़ धुंध में क्योंकि

हो चुकीं हैं आवाज़ें आजाद,

आवाजें आजाद हो चुकीं हैं।

 

जवाहर नवोदय विद्यालय, सरभोग, बरपेटा, आसाम

वैश्विक महामारी कोरोना के संदर्भ में: साहित्य की भूमिका-सारिका ठाकुर

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वैश्विक महामारी कोरोना के संदर्भ में: साहित्य की भूमिका

सारिका ठाकुर शोधार्थी,
विनोबा भावे विश्वविद्यालय
हजारीबाग,झारखंड
Sarikathakur406@gmail.com
मो.नं.-9403758576
स्थायी पता - आदर्श नगर, हीरापुर,
धनबाद, झारखण्ड 826001

शोध सार

वर्तमान समय में फैली वैश्विक महामारी(कोरोना) ने न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य को भी प्रभावित किया है,  इसके प्रभाव का ही परिणाम है कि आज देश–विदेश की आर्थिक,  सामाजिक,  राजनीतिक,  धार्मिक,  पारिवारिक व शैक्षिक स्थिति चरमरा गई है| दो कदम आगे बढ़ने की बजाय दो सौ कदम पीछे जा चुके हैं हम| ऐसे में जब हर वर्ग, हर समुदाय अपने स्तर पर इस समस्या के समाधान हेतु निरंतर प्रयासरत हैं, ऐसे में साहित्य भी  प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहा है।

बीज शब्द: कोरोना, महामारी, भविष्य, साहित्य

शोध विस्तार:

         “शक्ति के विद्युत्तकण  जो व्यस्त

           विकल बिखरे  हैं, हो निरूपाय,

           समन्वय उसका करें समस्त

           विजयिनी मानवता हो जाए “

                           (कामायनी – जयशंकर प्रसाद)

इस प्रकार सदैव ही मानवता के,  मानक समूह के विजय व विकास हेतु साहित्य ने अग्रिम भूमिका निभाई हैं| मानव की संवेदना को बचाए रखने का कार्य साहित्य ही  करती आई है| वह साहित्यकार ही है जो दूसरों के दु:ख से दु:खी और दूसरों की प्रसन्नता से पुलकित हो उठता है| यथा; “इन दिनों हिंदी साहित्य में ‘हा हा हा हा’ की आवाजें खूब सुनाई देती है,  जैसे कोई हंसने की कोशिश कर रहा हो और पूरी तरह हंस ना पाकर आधे मन से हंस रहा हो”

              सुधीर पचौरी, हिंदुस्तान दैनिक अखबार| आम व्यक्ति की पीड़ा और विषमता को अपना मान उसकी वेदनामय अभिव्यक्ति करता है, समाज में व्याप्त विद्रूपताओं, अंधविश्वासो व विषमताओं पर प्रहार करता है, समाज में नूतन परिवर्तन हेतु अपना समस्त जीवन होम कर देता है और मैं शैली को अपनाता हैं| जो काम तोप और तलवार नहीं कर सकती वह साहित्य द्वारा संभव है और इसके लिए एक साहित्यकार कलम  को अपना हथियार बनाते हैं| समाजोचित दिशा एवं दशा हेतु सदैव प्रयासरत रहते हैं| साहित्य मानव,  समाज और संस्कृति को न केवल जिलाये रखती है अपितु उसका संरक्षण एवं संवर्धन भी करती है और गढ़ती  है एक नई संस्कृति जो मानवकल्याण के लिए हो|

                          वर्तमान समय में फैली वैश्विक महामारी(कोरोना) ने न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य को भी प्रभावित किया है,  इसके प्रभाव का ही परिणाम है कि आज देश-विदेश की आर्थिक,  सामाजिक,  राजनीतिक,  धार्मिक,  पारिवारिक व शैक्षिक स्थिति चरमरा गई है| दो कदम आगे बढ़ने की बजाय दो सौ कदम पीछे जा चुके हैं हम| ऐसे में जब हर वर्ग, हर समुदाय अपने स्तर पर इस समस्या के समाधान हेतु निरंतर प्रयासरत हैं, ऐसे में साहित्य भी  प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहा है उदाहरणस्वरूप:-

                 फंसी हुई दुनिया कैसे

                 अपने ही पांसो में

                 एक वायरस टहल रहा

                आदम की सांसों में

                अवरोध लग गए

                पांव में आवाजाही के

               कितने खौफनाक मंजर है यह तबाही के

                                     ( अज्ञात कवि )

हिंदी साहित्य के कई साहित्यकार प्रकृति के अनुरागी रहे हैं, जिसका प्रमाण हम हिन्दी साहित्य विशेषकर छायावाद में देख सकते हैं, कि प्रकृति उनके लिए सर्वस्व है|  हमारी परंपरा में भी प्रकृति पूजनीय  रही है, किंतु उसका दोहन व दुरुपयोग भी आज इस महामारी के प्रमुख कारणों में संभवत सम्मिलित है| ऐसे में एक साहित्यकार अपनी रचना के किसी भी विधा द्वारा प्रकृति के साथ किए अन्याय के लिए न केवल चेताते हैं, अपितु मनुष्य को प्रकृति के प्रति प्रेम और अनुराग का भाव जगाकर  नतमस्तक होने को भी अभिप्रेरित करते हैं| आज रचनाकार को पुनः मानव और प्रकृति के अटूट संबंध को नवीन रूप में व्यख्यायित करने की आवश्यकता है|

      यह सत्य है कि हम आज बहुत आगे बढ़ चुके हैं|  हमारा रहन-सहन, बात-व्यवहार व जीवन शैली आदि  सब कुछ आधुनिकता के रंग में रंग चुकी है और बाह्य वातावरण इंद्रधनुष के रंग की भांति सतरंगी हो चुका  है| किंतु हमारा मानवतावादी दृष्टिकोण बहुत पीछे छूट चुका है, जो अंतःकरण के अंधेरे में उसे टटोल रहा है| आम जन की पीड़ा, त्रासदी से पूर्व हम अपनी  आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के पीछे अविराम दौड़ लगा रहे हैं| ऐसे में आमजन, मजदूर वर्ग, कृषक वर्ग के प्रति हमारा व्यवहार व हमारा विचार बिल्कुल संकुचित सा है| उनकी वेदना,  उनकी करुणा,  उनकी टीस, उनकी बेबसी,  उनकी लाचारी, उनके जीवन की भयावहता को प्रकट करने में साहित्य विशेष रूप से अपनी भूमिका का निर्वहन कर सकता है| सबके हृदय में प्रेम का, सहयोग का,  अपनत्व का,  मानवता का आलोक साहित्य ही जगा सकता है| एक रचनाकार मात्र रचनाकार नहीं अपितु दूरद्रष्टा भी होता है| इसका प्रमाण हम मुक्तिबोध के रूप में देख सकते हैं,  जो अंधेरे में लंबी कविता के माध्यम से प्रकट होती है| लगभग 50 वर्ष पूर्व की दूरदर्शिता सत्य में परिवर्तित होती नजर आती है, ऐसे में दूरदर्शितापूर्ण  दृष्टिकोण द्वारा वह आगामी समय की ओर जनसमुदाय को जागरुक कर साहित्य में योगदान दे सकते हैं|

              अपनी साहित्यिक कृतियों के माध्यम से महामारी की भयावहता का चित्रण, समाज की परिस्थितियों का रेखांकन,  के साथ व्याप्त विसंगतियों गड़बड़ियों और सामाजिक संघर्षों का चित्रण कर समाज की विद्रुपताओं को समाप्त भी कर सकते हैं साथ ही पर्दे की आड़ में चल रही षडयंत्रों का पर्दाफाश करते हुए जन को जागरूक करने का प्रयास भी कर सकते  है| यही रचनाएं साहस,  उत्साह और स्फूर्ति  का स्रोत बन इस महामारी से लड़ने की आत्मबल प्रदान कर सकती है|

          आज बहुत ही रचनाएं देखने को मिल रही है विशेषकर, सोशल मीडिया में अधिकांश कविताएं लिखी  लिखी जा रही है जो कि कृषकों की दशा,  मजदूरों की स्थिति, सामान्य जन की आर्थिक व पारिवारिक संघर्ष,  वैश्विक संबंधों व आगामी भविष्य से संबंधित है;

इस प्रकार एक रचनाकार कवि, लेखक, नाटककार व उपन्यासकार समय-समय पर लेखन कार्य करते हैं| इनमें से कुछ रचनाएं तत्काल हमारे समक्ष आ जाती है और कुछ बाद में,  क्योंकि तुरंत प्रतिक्रिया या विचार को कृति में लिखना संभव नहीं,  उसके लिए विचारों को संजोना  पड़ता है, उन्हें तर्क के आधार पर पुष्ट  करना पड़ता है,  पात्रों व भूमिकाओं का निर्धारण करना पड़ता है, कथानक की निर्मिति करनी पड़ती है और एक विधा के रूप में अभिव्यक्ति देनी पड़ती है और यह कार्य आज साहित्य के क्षेत्र में चल रही है और इसके लिए निरंतर प्रयास करने की आवश्यकता है| इस प्रकार नवीन परिस्थितियां, नवीन समस्याएं समाज के साथ साहित्य में भी परिवर्तन की ओर बढ़ता है और एक सशक्त रचनाकार का दायित्व है कि वह इस परिवर्तन के लिए समाज को, व्यक्ति को तैयार करें|

                 आज “सोशल डिस्टेंस”  की बात जोरों से चल रही  हैं और उसका पालन किया जा रहा हैं या प्रशासन द्वारा करवाया जा रहा है,  जो अत्यंत ही आवश्यक है इस महामारी को फैलने से रोकने के लिए| जिस प्रतिस्पर्धा के दौर में हम जी रहे हैं, जहां ज्ञान नहीं अपितु सूचनाओं का जंजाल फैला है| उसने बहुत पहले संबंधों को प्रभावित कर दिया है| जिसे हम मोहन राकेश के आधे अधूरे या उपेंद्र नाथ अश्क रचित अंजों  दीदी आदि तमाम कृतियों के माध्यम से देख व समझ सकते हैं| संबंधों का विच्छेद, पारिवारिक बिखरन,  संयुक्त परिवार का टूटन आदि ने भारतीय समाज और संस्कृति को एक अरसे से प्रभावित किया है जिसकी मार हम अब भी झेल रहे हैं,  जो एक गंभीर समस्या बन चुकी है परिवार से, पास पड़ोस से, मित्र-सहयोगी से,  कार्यस्थल के कर्मियों से,  अपने गांव से, अपने देश से वह आत्मीयता  समाप्त हो चुकी है| ऐसे में साहित्य इन दु:ख-दर्दों को पहले से कृतिमय अभिव्यक्ति द्वारा आगामी भविष्य की ओर संकेत करता आया है| ऐसे में संक्रमण के भय  ने और भी अग्रिम भूमिका निभाई है| लोगों का  मेल-मिलाप,  सामाजिक सांस्कृतिक गतिविधियां बंद हो चुकी है| सबकुछ ठहर सा गया है और यह ठहरना क्षणिक नहीं अपितु लंबे समय का है,  ऐसे में आवश्यक है कि साहित्य द्वारा संवेदना के तार को पुनः झकझोरी जाए और संवेदनात्मक दूरी को पाटने का कार्य किया जाए| यह उदाहरण प्रस्तुत किया जाए कि नियमों का पालन करते हुए,  सावधानियों को बरतते हुए भी अपनत्व और सहयोगात्मक दृष्टिकोण को अपनाकर हम एक हो इस संघर्ष में,  इस युद्ध में विजय का पताका लहरा सकते हैं| यही वह वक्त है जो हमारे लिए  जब हम वैश्विक रूप से एक दूसरे का सहयोग कर,  एक दूसरे से साझा कर पृथ्वी को कोरोना के मार  से मुक्त कर सकते हैं और अगर ऐसा करने में हम  असफल रहे तो, अंततः सब समाप्त हो जाएगा| बचेगी तो केवल हाड़,  संवेदनाओं की भांति मांस और प्राण भी समाप्त हो जाएंगे| इसलिए उसे पुनः जगाने की आवश्यकता है|

                साहित्य के क्षेत्र में कार्यरत साहित्यकारों व साहित्य प्रेमियों का एक दायित्व यह भी रहा है कि वह साहित्य के अध्येताओं ,  साहित्य के पुरोधाओं  को साहित्य क्षेत्रों हेतु तैयार करें,  उन्हें निपुण बनाएं, उनका मार्गदर्शन करें उन्हें साहित्य की विभिन्न विधाओं,  विभिन्न रचनाओं तथा  विभिन्न रचनाकारों के  विभिन्न दृष्टिकोणों,  विभिन्न वादों को जानने समझने,  उनका विवेचन -विश्लेषण करने व अनुसंधान हेतु सहयोग करें| विभिन्न संस्थाओं द्वारा इसके लिए समय-समय पर कार्यक्रम जैसे कवि सम्मेलन,  गोष्ठी और सेमिनार का आयोजन करती आई हैं| व्यवस्थित रूप से  संस्थाओं में विधिवत सेमिनार ओर कार्यशाला न संचालित होने पर वेबीनार, ऑनलाइन कार्यशाला आदि एक विकल्प के रूप में प्रयोग किया जाना सराहनीय कार्य है| तमाम साहित्यिक व सामाजिक विषयों पर प्रसिद्ध साहित्यकारों का वेबीआर द्वारा विद्यार्थियों से जुड़ना,  एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में मूल्यों  के हस्तांतरण  द्वारा भी साहित्यकार  साहित्य की भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं, ताकि साहित्यकर्म  बाधित ना हो| इसे और भी व्यापक फलक पर देखने और नित्य नूतन रूप से देकर साहित्यकर्म  को फलीभूत किये  जाने की आवश्यकता हैं| साथ ही यह भी प्रयास करने की आवश्यकता हैं की  हिंदी का स्वरूप इससे पहले जो था वह स्वरूप आने वाले समय में भी बना रहे, क्योंकि खतरा यह भी बनता है कि तकनीकी संदर्भों को व्यक्ति जैसे ही जोड़ता है किसी विषय के साथ तो,  कहीं ना कहीं तकनीकी अपनी भाषा विकसित करती चली जाती है,  तो उस विषय विशेष में, जैसे:- हम हिंदी साहित्य की बात करें तो बहुत बार शब्दों के अपभ्रष्ट हो जाने का खतरा बना रहता है| बहुत बार अंग्रेजी शब्दों के  अधिक युक्त हो जाने से  हम पाश्चात्य विचारधारा की ओर चले जाते हैं और पाश्चात्य विचार धारा हमारी भारतीय विचारधारा पर हावी हो जाती है| ऐसे में इस पर भी कार्य करने की आवश्यकता है भारतीकारण  भी साहित्य का ध्येय था,  है और आने वाले समय में भी पूर्णरूपेण उसको साहित्य के केंद्र में रखने की आवश्यकता है|

                  साहित्य का दायित्व स्वस्थ समाज के साथ-साथ मनुष्य को भी स्वस्थ बनाना है| इस महामारी में शारीरिक उपचार  जितना आवश्यक है,  उससे कहीं ज्यादा मानसिक स्वास्थ्य| अपनी रचनात्मक कृतियों  एवं आलेखों  द्वारा वर्तमान परिस्थितियों का चित्रण व  विश्लेषण करने के साथ-ही-साथ आज व्यक्ति के मस्तिष्क को स्वस्थ रखना,  चिंता-अवसाद मुक्त करना भी साहित्य का कार्य होना चाहिए| निश्चित दिनचर्या,  मनोरंजन,  परिवार के साथ व्यतीत क्षणों की सुखद अनुभूति के साथ-साथ सकारात्मक दृष्टिकोण के विकास हेतु भी साहित्य को पहल करने की आवश्यकता है| इसके लिए साहित्यकार प्रयासरत हैं और निरंतर प्रयासरत रहने की आवश्यकता है| जनमत को  नवीन संदर्भों को जोड़ने की आवश्यकता है,  नवीन संभावनाओं की ओर उन्मुख करने की आवश्यकता है,  शोध में नवाचारों को जोड़ने की आवश्यकता है और शोध जनमानस को आधार मानकर अर्थात सामाजिक संदर्भों को आधार मानकर शोध को बढ़ावा देने की आवश्यकता है| इस महामारी के दौर में जीवन यापन कैसे करें इस पर भी अपनी व्यापक और गहरी दृष्टि का परिचय देने की आवश्यकता है,  गहराई से इस पर मनन और विश्लेषण की आवश्यकता है| आज के समसामयिक समस्याओं को फलीभूत और चरितार्थ करने में, स्वयं को पुनः  प्रतिस्थापित करने हेतु सफलतापूर्वक साहित्य को अपना योगदान करना होगा ताकि एक नवीन युग का सूत्रपात हो सके|

 

सन्दर्भ ग्रन्थ :-

  1. अशोक वाजपेयी -साहित्य आज तक
  2. https://youtu.be/QLeyrt56NZ4
  3. प्रसून जोशी – साहित्य आज तक
  4. https://youtu.be/MocfOYnJHes
  5. असगर वजाहत-साहित्य आज tak
  6. https://youtu.be/nyY8_9hsnaM
  7. महामारी में साहित्य – डॉयचे वेले में शिवप्रसाद जोशी
  8. हिंदुस्तान दैनिक अख़बार, पृष्ठ सं.-8/23/05/2020
  9. हंसी ही काट हैं – सुधीर पचौरी
  10. हिंदुस्तान दैनिक अख़बार, पृष्ठ सं.-8/24/05/2020

 

          सारिका ठाकुर, ℅–मनीष सिंह

         आकांशा धर्म कांटा, पटना रोड, पटेल नगर

         दाउदनगर, औरंगाबाद, बिहार 824143

खोरदेकपा परंपरा की जटिलताएं और ‘सोनम’ उपन्यास-डॉक्टर स्नेह लता नेगी

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खोरदेकपा परंपरा की जटिलताएं और ‘सोनम‘ उपन्यास

डॉक्टर स्नेह लता नेगी,
                                       हिंदी विभाग,
                                   दिल्ली विश्वविद्यालय
                                             दिल्ली।

शोध सार

आलोच्य उपन्यास ‘सोनम‘ भूटान के साकतेंग और मिरोक क्षेत्र में तथा अरुणाचल के पश्चिमी श्रेत्र कामेंग और तवांग के आसपास बसने वाले ब्रोक्पा (पशुपालक) आदिवासी समाज की अनोखी एवं विशिष्ट संस्कृति पर आधारित है।  इस उपन्यास की कथा याक, चंवरी गाय, भेड़– बकरी और घोड़ा आदि का पालन करने वाले ब्रोक्पा समुदाय जो बहुपति प्रथा का पालन करते हैं के इर्द–गिर्द घूमती है। जिन की सामाजिक–सांस्कृतिक परिवेश और प्रथाओं की समाजशास्त्रीय दृष्टि से व्याख्या करने की भी जरूरत है।

बीज शब्द: उपन्यास, सोनम, भूटान, आदिवासी, समाज, संस्कृति,

शोध विस्तार

भारत के पूर्वोत्तर में स्थित अरुणाचल प्रदेश के छोटे से गांव ‘जिगांव’ में येशे दोरजी थोंगछी का जन्म हुआ। थोंगछी जी अरुणाचल की शेरदुकपेन आदिवासी समुदाय से आते हैं। थोंगछी जी बहुभाषाविद हैं। उन्होंने अपनी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत असमिया भाषा से की। कविता कहानी और उपन्यास लेखन में वह बहुत सक्रिय रहे हैं। उनकी महत्वपूर्ण कृतियां ‘सोनम’, ‘पापोर  पुखुरी'( पाप का पोखर), ‘बा फूलोर गोंधो’ (बांस फूल की गंद), ‘विष कोन्यार देशोत’ (विष कन्या के देश में), ‘ शो काटा मानुह’ ( शव काटने वाला आदमी), ‘ मौन ओंठ मुखौर हृदोय’ (मौन होंठ मुखर हृदय) आदि महत्वपूर्ण हैं। सन 2005 में ‘ मौन होंठ मुखर हृदय’ को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया । अब तक उनकी रचनाओं का अंग्रेजी, हिंदी, बांग्ला और रूसी भाषा में अनुवाद हुआ है।  ‘शव काटने वाला आदमी’, ‘सोनम’, ‘मौन होंठ मुखर हृदय’ का अनुवाद हिंदी में हुआ है । थोंगछी जी की रचनाओं में अरुणाचल की प्राकृतिक सौंदर्य और वहां की अनेक जनजातियों की संस्कृति, रीति-रिवाज, परंपराएं, आचार विचार और उनके आपसी संबंधों का  सुंदर चित्रण देखने को मिलता है। प्रस्तुत आलेख में उनकी अनुदित उपन्यास ‘सोनम’ पर मुख्य रूप से विचार होगा। राष्ट्रपति के रजत कमल पुरस्कार से सम्मानित इस उपन्यास पर फिल्म भी बन चुकी है। जिसे अनेक अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में सराही गई है।आलोच्य उपन्यास ‘सोनम’ भूटान के साकतेंग और मिरोक क्षेत्र में तथा अरुणाचल के पश्चिमी श्रेत्र कामेंग और तवांग के आसपास बसने वाले ब्रोक्पा (पशुपालक) आदिवासी समाज की अनोखी एवं विशिष्ट संस्कृति पर आधारित है।  इस उपन्यास की कथा याक, चंवरी गाय, भेड़- बकरी और घोड़ा आदि का पालन करने वाले ब्रोक्पा समुदाय जो बहुपति प्रथा का पालन करते हैं के इर्द-गिर्द घूमती है। जिन की सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश और प्रथाओं की समाजशास्त्रीय दृष्टि से व्याख्या करने की भी जरूरत है। उपन्यास में ब्रोक्पा समुदाय के खोरदेकपा परंपरा और उससे प्रभावित नायिका सोनम और उसके दो पतियों लबजांग और पेमा वांगछू के बीच  संबंधों के बनते बिगड़ते समीकरणों का गहन आंकलन किया है।

     ब्रोक्पा यानी पशुपालक समुदाय जो साल के छः महीने दुर्गम पहाड़ियों के चरागाहओं में अपनी जीविका का एकमात्र स्रोत संग प्रवास करता है और जाड़े में अपने गांव लौट आता हैं। युवा लबजांग  का खानदानी व्यवसाय भी यही है। आरंभ में लबजांग और सोनाम दोनों बहुत ही सुखी वैवाहिक जीवन जीते हैं। चुंकि लबजांग के परिवार में अन्य कोई सदस्य नहीं है तो लबजांग को ही छ:  महीने के लिए चरागाहों में पशुओं के साथ पहाड़ियों पर रहना पड़ता है और  सोनाम गांव में अकेली पड़ जाती है। ऐसे में पेमा वांगछू मौके का फायदा उठाकर प्रेम याचना लेकर हमेशा ही सोनम के पीछे लगा रहता है। और एकांकी जीवन व्यतीत करती सोनम के मन में भी पेमा के लिए प्रेम का भाव जागृत होता है और यहीं से  उपन्यास प्रेम त्रिकोण की जटिलताओं के साथ आगे बढ़ता है। सामान्यता एक पुरुष की अनेक पत्नियां तो हम मुख्यधारा के समाजों में देखने के आदी हैं और हम उसे स्वीकार भी करते हैं क्यों कि अनेक स्त्रियों के साथ पुरुष रह रहा है, पुरुष तो पुरुष है उसे अधिकारी है वह जो चाहे कर सकता है। लेकिन एक स्त्री की एक से अधिक पति देखने की आदत बहुसंख्यक समाज को नहीं है। ऐसे में स्वीकार करने की बात तो सोच ही नहीं सकते हैं। परन्तु ब्रोक्पा समुदायों में एक अनूठी परंपरा है जिसे यहां की भाषा में खोरदेकपा  कहा जाता है। जहां दो तीन भाइयों की  एक ही स्त्री के साथ विवाह कर दिया जाता। जिसे समाजिक मान्यता प्राप्त है। जो लंबे समय से चली आ रही है ।

उपन्यास का मुख्य पात्र लबजांग की मां भी उसी खोरदेकपा परंपरा का पालन करते हुए अपने दोनों पतियों के साथ सुखद जीवन व्यतीत कर चुकी थी । इस संदर्भ में यह पंक्तियां महत्वपूर्ण हैं: “बर्फीली पहाड़ियों के इस अंचल के ब्रोक्पा समाज में मान्य प्रथा के अनुरूप लबजांग की मां ने उसके पिताजी से विवाह के साथ साथ ही उसके चाचा जी के साथ भी खोरदेकपा अर्थात समानाधिकारिक विवाह किया था। दोनों को अपने पति के रूप में ग्रहण किया था। उन तीनों का जीवन बिना किसी झगड़ा झंझट, बिना किसी प्रकार के मन-मुटावे के बड़े सहज सुंदर ढंग से बीता था”1 इसी तरह योनतन, टिकरा और दवा आदि गांव के सभी ब्रोक्पा परिवार इसी तरह के संबंधों का निर्वाह करते हैं। ब्रोक्पाओं में प्रचलित खोरदेकपा प्रथा अरुणाचल के अलावा पश्चिमोत्तर हिमालय के किन्नौर, लाहौल- स्पीति, और लद्दाख आदि क्षेत्रों में भी रही है। इन क्षेत्रों के कबीलाई समुदाय भी ब्रोक्पाओं की तरह ही पशुपालक रहे हैं। यहां भी साल के कुछ महीने घर का पुरुष चरागाहों  में अपने पशुधन के साथ रहता और सर्दियों में गर्म इलाकों की ओर प्रस्थान करता। यह सभी कबीलाई पशुपालक हिमालय क्षेत्र में एक स्थान से दूसरे स्थान पर चरागाहों की तलाश में घूमते रहे हैं और देश के अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर बस भी गए। अरुणाचल के ब्रोक्पा कबीला लद्दाख में भी ब्रोक्पा के नाम से भी जाना जाता है।इन सभी समुदायों की धार्मिक आस्था, सामाजिक- सांस्कृतिक व्यवहार आदि बहुत कुछ मिलता जुलता है। इन समुदायों में प्रचलित परंपरा की सामाजिक संरचना को यहां समझने की जरूरत है। चुंकि ब्रोक्पा समुदाय पशुपालक समाज है जिसके पास आय का एकमात्र स्रोत यही है। तो दूसरी और अन्य हिमालयी क्षेत्र की स्थिति भी कमोबेश वैसी ही रही है। पशुपालन के साथ इनके पास कृषि योग्य भूमि बहुत ही सीमित है। सीमित संपत्ति का बंटवारा ना हो और परिवार के बीच एकता बनी रहे इसी दृष्टिकोण से यहां खोरदेकपा परंपरा को सामाजिक मान्यता प्राप्त है। चुंकि उपन्यास का नायक लबजांग को ऐसी कोई सुविधा प्राप्त नहीं है। क्योंकि अपने माता-पिता का वह एकमात्र संतान है। जबकि खोरदेक्पा एक ही माता-पिता के संतानों में ही होता है ।

‘ सोनाम’  उपन्यास में खोरदेकपा के कारण तीनों ही पात्रों के संबंधों में जटिलता आती है। क्योंकि पेमा वांगछू लबजांग के जाति बिरादरी का नहीं है। जाति बिरादरी का ना होते हुए भी पेमा वांगछू को सोनम के साथ खोरदेकपा कर  लाने के लिए गांव के सरपंच के साथ लबजांग पेमा वांगछू के घर उस के माता- पिता को मनाने जाता है जिसमें वह   सफल होता है और पेमा वांगछू, लबजांग और सोनम खोरदेकपा के पवित्र बंधन में बंध जाते हैं।

“निर्णय के दो दिन बाद एक सादे समारोह में संक्षिप्त सा वैवाहिक संस्कार आयोजन करके सोनम का दूसरा विवाह पेमा वांगछू के साथ संपन्न हो गया। उसी दिन दुपहरियो से ही एक-एक कर गांव के स्त्री पुरुष लबजांग के घर आ -आ कर इकट्ठे होते गये। अपनी ओर से उपहार के रूप में लाई गई खाटा उन्होंने सोनम और पेमा वांगछू को तो पहनाई ही लबजांग को भी खाटा पहनायी….. स्त्रियां बोलने लगीं ….अरे आज ही वह सचमुच की ब्रोक्पा पत्नी लग रही है”2 हर समाज अपनी भौगोलिक पृष्ठभूमि उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक  गठन और आर्थिक व्यवस्थाओं के आधार पर जीवन को सुगम बनाने की कोशिश करता है और उसी सामाजिक प्रक्रिया के तहत जीवन यापन करता है। ब्रोक्पा समुदाय भी इससे अछूता नहीं है। इसीलिए यहां खोरदेकपा जैसी परंपराएं प्रचलित हैं। जो उसकी भौगोलिक, सामाजिक – सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुकूल उन्हें लगता है।

जिस तरह बहुपत्नी प्रथा में पत्नियों के बीच आपसी ईर्ष्या, द्वेष के कारण गृह कलह आम बात   है। ठीक उसी तरह की समस्या इस उपन्यास में दृष्टिगोचर होता है और यहीं से संबंध बिगड़ कर द्वद्वं पूर्ण आकार लेने लगता है। एक तरफ पेमा सोनम के मन में लबजांग के खिलाफ उसके अन्य स्त्री के साथ संबंध आदि को लेकर भड़काता रहता है तो वही आलसी पेमा चरागाह में जाने से जी चुराने लगता है। जब भी उसकी बारी चरागाह जाने आती थी तो वह वहां लापरवाही से काम करता और पशुओं का ध्यान नहीं रखता। हमेशा ही कुछ न कुछ नुकसान करता जिसके कारण लबजांग की आर्थिक स्थिति भी खराब होने लगती है। “आगे चलकर लबजांग और सोनाम का वैवाहिक जीवन, उनकी अपनी घर- गृहस्थी, सुखी और स्वस्थ नहीं रह पायी, अनुकूल परिस्थिति और अवसर की तलाश में लगा रहने वाला पेमा वांगछू सोनाम के कान में लबजांग की ऐसी ढेर सारी मनगढ़ंत बातें घुसेडता रहता।….इन्हीं सब कारणों से वह लबजांग की अपेक्षा पेमा वांगछू के अधिक करीब हो गयी। हालात यहां तक बढ़ गई कि दोनों पतियों को जो एक समान रूप में प्यार करने, दोनों के प्रति समान रूप से आदर भाव रखने का जो उसका पवित्र उत्तरदायित्व था, धीरे-धीरे वह उस में असफल होने लगी”3 अगर यहां पेमा वांगछू की जगह खोरदेकपा में लबजांग का अपना सगा भाई होता तो शायद समस्या इस रूप में नहीं उभरती। पेमा किसी दूसरे जाति बिरादरी का व्यक्ति है। जिसे ना तो लबजांग के घर-गृहस्थी, चरागाह और पशुओं से कोई लगाव है। इसीलिए वह इतनी लापरवाही से काम करता है। क्योंकि नुकसान उसका नहीं बल्कि लबजांग का हो रहा है इसलिए पेमा के मन में अपनत्व का भाव कभी भी नहीं आता है। जबकि खोरदेकपा के नियमानुसार लबजांग पेमा को अपनी संपत्ति, घर-द्वार और पशु संपत्ति में बराबरी का हिस्सा देता है। “जिस दिन से तुमने मेरे साथ खोरदेकपा किया तुम मेरे द्वारा पाले गए इन सभी पशुओं के मालिक हो गए हो”4 इसके बावजूद भी पेमा वांगछू के व्यवहार में किसी भी प्रकार का बदलाव दिखाई नही देता। संपत्ति में बराबरी का हिस्सा मिलने पर भी पेमा में घर – गृहस्थी के प्रति किसी भी तरह का लगाव लबजांग के परिवार के साथ स्थापित करता हुआ  दिखाई नहीं देता। यहां रचनाकार पेमा के आलसी और अवसरवादी व्यक्तित्व के माध्यम से यह दर्शाने की कोशिश करते हैं कि पेमा जैसा व्यक्ति किस तरह समाज की मान्य परंपराओं का दुरुपयोग अपने फायदे के लिए करता है। जिस भाव के साथ सोनाम और लबजांग पेमा के साथ खोरदेकपा करते हैं और उसे अपने परिवार का अभिन्न हिस्सा मानते हैं। लेकिन पेमा का व्यवहार इसके बिल्कुल विपरीत दिखाई देता है। वक्त गुजरने के साथ-साथ पेमा सोनाम से भी ऊब चुका था और उससे छुटकारा पाने की सोचने लगा। इसीलिए सोनाम जब बीमार रहने लगी और लबजांग चरागाह में पेमा के भरोसे सोनाम और बच्चों  को छोडकर जाता है तब भी वह अपने परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से वह दूर भागता है। बीमारी में भी सोनाम दिन रात काम करती और परिवार का भरण-पोषण करती जिसके चलते सोनाम ने एक दिन खटिया पकड़ लिया तो उसके बाद अंतिम यात्रा तक उस खटिया से उठ नहीं पाई। उपन्यास अंत तक आते-आते सोनाम की मृत्यु के साथ खोरदेकपा परंपरा की खामियों की तरफ भी हमारा ध्यान आकर्षित करता है। जहां उपन्यास अंत में आकर ट्रेजिक  हो जाता है।

ब्रोक्पा समुदाय मूलता बौद्ध धर्मावलंबी हैं। सोनाम कई वर्षों से संतान सुख से वंचित रहती है तो पति-पत्नी विचार करते हैं कि उन्हें तवांग गोंफा  में जाकर पलदेन लामो (आराध्य देवी) और शाक्य टोबा (गौतम बुद्ध )की शरण में संतान प्राप्ति के लिए यात्रा पर निकलना चाहिए और दोनों तवांग की यात्रा के लिए निकलते हैं। उन्हें विश्वास है कि पलदेन लामो  उनकी मनोकामना पूर्ण करेंगी । जब सोनाम गर्भ धारण करती है तो पलदेन लामो  के प्रति  उनकी आस्था और गहरी हो जाती है। सोनाम लबजांग से कहती है “हमारे परम पूज्य पलदेन लामो और टोम्बा  शाक्या दावा देवताओं ने हमारी प्रार्थना सुन ली है, क्या इस बात को तुम जान पाए हो, उन्होंने हमारी प्रार्थना स्वीकार कर ली है। और हमारी इच्छा के अनुरूप हमें इच्छित वरदान भी दे दिया है।”5 उपन्यास में तवांग गोम्पा (बौद्ध विहार)  के बनने के पीछे का संक्षिप्त इतिहास भी हमें मिलता है। जिससे हमें ज्ञात होता है कि तवांग गोम्पा तिब्बत देश की राजधानी ल्हासा के पोतला गोम्पा ( पोतला पैलेस) के बाद संसार में द्वितीय स्थान पर इस की ख्याती है। सन 1681 में अरुणाचल के मनपा जनजाति के विद्वान मेरा लामा धार्मिक शिक्षा ग्रहण कर तिब्बत से लौटने के बाद तवांग गोम्पा के निर्माण कार्य में जुट गए थे । तवांग नाम के पड़ने के पीछे भी यहां कई तरह की दंत कथाएं प्रचलित हैं। मेरा लामा गोम्पा निर्माण के लिए उचित स्थान की तलाश में पहाड़ियों पर अपने घोड़े पर चढ़कर विभिन्न स्थानों का निरीक्षण करने जाते थे। एक दिन असावधानी के चलते घोड़ा गायब हो गया तो उसे खोजते हुए वह पहाड़ी पर पहुंचे तो वह देखते हैं कि घोड़ा अपने दोनों खुरों से उस पहाड़ी को खोदकर गड्ढा बना रहा है। तो मेरा लामा के अंतर्मन में आभास हुआ कि घोड़ा उसी पवित्र स्थान को चिन्हित कर दिखा रहा है। और वहीं तवांग गोम्पा (बौद्ध विहार) का निर्माण हुआ। “चुंकि वह स्थान घोड़े के आशीर्वाद से धन्य हुआ था। इसी से उसका नाम रखा गया। तवांग, इस संयुक्त शब्द में पहले अंश- ‘त’ का अर्थ है घोड़ा और ‘वांग’ का अर्थ है –आशीर्वाद”6 समय बीतने के साथ-साथ जनसाधारण में यह गोम्पा तवांग के नाम से विख्यात हुआ। उस समय इस क्षेत्र में तिब्बत का शासन चलता था। तिब्बत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में मेरा लामा इस गोम्पा का प्रशासन देखते थे और यहां के लोग राजस्व कर, मालगुजारी, धर्म का दान-दक्षिणा तवांग गोम्पा में जमा करते थे।

 

ब्रोक्पा समुदाय पुनर्जन्म में विश्वास रखता है। वह मानते हैं कि सभी प्राणी पुनः जन्म लेते हैं। उपन्यास में एक प्रसंग आता है जब लबजांग का   वफादार कुत्ता डब्बू हिमबाघ का शिकार होता है और मर जाता है। गांव में सभी लोग मानते हैं कि लबजांग की बेटी रिनचिन जांमू के रूप में डब्बू ने पुनर्जन्म  लिया है । रिनचिन जांमू चार-पांच साल की उम्र में पूर्व जन्म में अपने साथ घटित घटना को अपने पिता लबजांग को वैसा ही सुनाती है जैसे वास्तव में डब्बू के साथ घटित हुआ था। “फिर उसी भय की अवस्था में लड़खड़ाती आवाज में कहने लगती है-“समझ रहे हैं ना पिताजी। उस बाघ ने मुझे अपने पंजों में जकड़ लिया था । मेरी गर्दन पर अपने दांतो से काट खाया था। फिर मुझे उस बर्फिली घाटी में घसीटते-घसीटते बहुत दूर तक लिए चला गया था। उस समय मुझे जो असहनीय कष्ट हुआ था उसके बारे में अब आपको कैसे बतलाऊं।” 7 यह पंक्तियां ब्रोक्पाओं की पुर्नजन्म के प्रति उनके विशवास को और प्रबल करती है।  आदिवासी समाज किसी भी क्षेत्र का क्यों ना हो उसकी अपनी विशिष्ट पारंपरिक विश्वास और आस्था उन्हें दुसरे समाजों से अलग करती है जिनका अनुपालन हर आदिवासी समुदाय करता है।

जहां तक आदिवासी स्त्रियों का सवाल है वह अपने समाज में अधिकांश मामलों में पुरुष के समान अधिकार रखतीं हैं। यहां स्त्रियां भी पुरुषों के समान अपनी शारीरिक क्षमता के अनुरूप श्रम करती हैं। इसलिए उसे घर गृहस्थी से लेकर अपने लिए निर्णय लेने का स्वतंत्र अधिकार है। दूसरे समाजों की अपेक्षा आदिवासी स्त्रियों की स्थिति सम्मानजनक है। आलोच्य उपन्यास की बात करें तो हम पाते हैं कि खोरदेकपा में रहना है या नहीं इसका अंतिम निर्णय स्त्री के हाथ में है। इसलिए अगर चाहे तो वह मना भी कर सकती है। सोनाम पेमा वांगछू के साथ खोरदेकपा करना चाहती है तभी लबजांग पेमा के घर खोरदेकपा का प्रस्ताव लेकर जाता है। दूसरी ओर खोरदेकपा में रहते हुए संतान पैदा होने पर किस पति का संतान है इसका निर्णय लेने का अधिकार भी स्त्री को ही प्राप्त है। अन्य आदिवासी समाजों की तरह ब्रोक्पा समुदाय में भी स्त्री-पुरुष दोनों के लिए पुनर्विवाह बहुत ही आसान है । कोई भी स्त्री पुरुष पति-पत्नी में से एक के ना रहने पर एक वर्ष के बाद दूसरे साथी का चयन कर घर गृहस्थी बसाने का अधिकार रखता है। ब्रोक्पा समुदाय की यह खासियत है कि वह जीवन की सतत गतिशीलता में विश्वास रखता है। इसलिए जीवन को संबंधों के साथ खुशहाल और सुखी संपन्न बनाने का हर संभव कोशिश करता है । यहां इस संदर्भ में उल्लेखनीय है “किसी भी एक दंपत्ति में से पति या पत्नी किसी एक की मृत्यु हो जाने पर जीवित बचा हुआ दूसरा साथी एक वर्ष काल की अवधि तक प्रतीक्षा करता है, इस समय के अंदर कोई दूसरा विवाह नहीं करता, किंतु साल बीतते ही कोई दूसरा जीवन संगी चुनकर विवाह कर नयी गृहस्थी बसा लेता है।”8 यह समाज जीवन में परंपराओं से ऊपर मनुष्य की संवेदनाओं को महत्व देने में विश्वास रखता है। यह उसका जीवन अमूल्य है इसलिए हर दुख के बाद जीवन को नई ऊर्जा के साथ संचालित करने में विश्वास रखता है।

रचनाकार ने इस उपन्यास के माध्यम से ब्रोक्पा समुदाय के पर्व त्योहार और उनकी सांस्कृतिक विशेषताओं के साथ प्रेम की एकनिष्ठता तथा स्त्री की स्वतंत्रता जैसे गंभीर मुद्दों को अपने सधे हुए कलम से उकेरा है। मनुष्य सुलभ कमजोरियों को सहजता के साथ प्रस्तुत करने में तथा जिस रूप में आदिवासी जीवन उस अंचल में है उसी रूप में उसे प्रस्तुत करने में थोंगछी जी सफल हुए हैं। उपन्यास की कथा संरचना सुगठित और व्यवस्थित है। कथा पाठक को अंत तक बांधे रखती है कहीं किसी तरह का बिखराव कथावस्तु में हमें नहीं मिलता है। आंचलिक शब्द ब्रोक्पा समाज की परंपराओं की वास्तविकता को जानने समझने में सहायक सिद्ध होता है।  यहां कहा जा सकता है कि आदिवासी साहित्य अभी भी अपने शैशवावस्था में है।  ऐसे में थोंगछी जी जैसे रचनाकारों से भविष्य में आदिवासी साहित्य लेखन समृद्ध होगा ऐसी मेरी परिकल्पना है।

संदर्भ:

1 सोनाम, येसे दर्जे थोंगछी, अनुवादक: डॉ.   महेंद्रनाथ दुबे, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2009, पृष्ठ 8-9.

2 वही, पृष्ठ  64.

3 वही, पृष्ठ 151.

4 वहीं, पृष्ठ 76.

5 वहीं, पृष्ठ 141.

6 वहीं, पृष्ठ 107.

7 वहीं, पृष्ठ 153.

8 वहीं, पृष्ठ 238.

मानस की भाषिक पूर्वपीठिका के रूप में संस्कृत का अवदान: एक संक्षिप्त विवेचन-डॉ. के. आर महिया

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मानस की भाषिक पूर्वपीठिका के रूप में संस्कृत का अवदान: एक संक्षिप्त विवेचन

डॉ. के. आर महिया
सहायक आचार्य, संस्कृत
राजकीय कन्या महाविद्यालय, अजमेर
Krmahiya2027@gmail.com 

शोध सार

तुलसीदास निःसंदेह मध्ययुग की महत्त्वपूर्ण वैचारिक क्रांति की चरम परिणति थे परन्तु साथ ही उन्होंने जिन मूल्यों की स्थापना की वे आज भी मानव–समाज की मूल्य–रिक्तता को भरने में पूर्णरूपेण सक्षम है। नवीन बौद्धिक चेतना से संबंधित आज का युव–मानस पुराने मूल्यों को नकार रहा है पर उनके समक्ष नवीन जीवन मूल्यों का कलेवर स्पष्ट नहीं हो पा रहा है  ऐसे में तुलसी के सामाजिक परिवेश, उनकी लोकमंगलवादी मान्यता और भक्ति–संबंधिनी विशिष्ट दृष्टि से हम अपनी समस्याओं को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।

बीज शब्द: मध्यकालीन, तुलसीदास, भाषा, परंपरा, देशज, शब्द

 

शोध विस्तार:

तुलसीदास निःसंदेह मध्ययुग की महत्त्वपूर्ण वैचारिक क्रांति की चरम परिणति थे परन्तु साथ ही उन्होंने जिन मूल्यों की स्थापना की वे आज भी मानव-समाज की मूल्य-रिक्तता को भरने में पूर्णरूपेण सक्षम है। नवीन बौद्धिक चेतना से संबंधित आज का युव-मानस पुराने मूल्यों को नकार रहा है पर उनके समक्ष नवीन जीवन मूल्यों का कलेवर स्पष्ट नहीं हो पा रहा है  ऐसे में तुलसी के सामाजिक परिवेश, उनकी लोकमंगलवादी मान्यता और भक्ति-संबंधिनी विशिष्ट दृष्टि से हम अपनी समस्याओं को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।

 

प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वैबर कहते हैं भारतीय समाज के मूल्य धर्म शब्द के अंतर्गत पूर्णरूपेण समाहित हो जाते हैं। उनकी निर्गुण-सगुण, द्वैत-अद्वैत, शैव-वैष्णव संबंधिनी अवधारणाएँ स्पष्ट हैं अतएव वे वैषम्य के स्थान पर समरसता उत्पन्न करती है। प्रस्तुत आलेख में धर्म के इस पक्ष से इतर तुलसी के मानस की शाब्दिक व आर्थी योजना पर विचार करते हुए उसके समसामयिक रूप और उपादेयता को प्रस्तुत किया जाएगा ।तुलसी ने सर्वग्राह्य बनाने के लिए अनेक ठेठ  देशज शब्दों का प्रयोग मानस में किया है। तुलसी एक परंपरावादी कवि हैं उन्होंने शब्दों का प्रयोग उन्हीं अर्थों में किया है जो अर्थ  साहित्य अथवा शास्त्र में प्रसिद्ध हो । मानस में देशज शब्दों की भरमार है। वस्तुतः जिन शब्दों का तत्सम रूप संस्कृत में नहीं खोजा जा सकता, जो लोक से उत्पन्न हुए हों और जिनका विदेशी भाषाओं से कोई संबंध नहीं है वे ‘देशज’ शब्द कहलाए। डॉ. शंभुनाथ पांडेय ने मानस के देशज शब्दों को तीन कोटियों में विभाजित किया है-

“1. अज्ञात व्युत्पत्ति वाले देशज शब्द

  1. 2. यदृच्छाव्युत्पन्न तद्भव शब्द
  2. 3. अपने तत्सम रूप से संस्कृत भाषा में प्रचलित शब्द।

 

अज्ञात व्युत्पत्ति वाले देशज शब्दों में उन संज्ञापदों (बेगि,कानि,घमोई,घालि,झगुली, झारी,ठीका, नैहर, भनु,  भानस, भटभेरा, माजा,सख,साउज आदि), विशेषण पदों (अरगानी, अरगाई, खेर, खाटी,गहबरि)और क्रिया अथवा कृदंत पदों(छुहँ, टेई, छहकि, पाँछि, बुताइ आदि) को रखा गया है, जिनका तत्सम रूप या व्याख्या कोशग्रंथों में नहीं दी गई है।

  1. 2. यदृच्छाव्युत्पन्न तद्भव शब्द वे शब्द हुए जो संस्कृत में खोजे गए हैं परन्तु संस्कृत से प्राकृत और अपभ्रंश के विकास-काल के कोई सूत्र इनमें नहीं दिए गए और रूप-परिवर्तन के कोई नियम भी नहीं निर्धारित किए गए। यथा- छरे, छयल, फीका,चपेटा, ओहार, कोहाब, गाँडर, थाती, दमक, अँगबनिहारे, ठाढ़ा, अनट, जुबराजु, प्रबोधु, विरोधु,आजू, बिनतहि, धीरजु,धरिहु, सेवकाई, सोहागु, राजू,जीभ, सालू (श्याल-साला-सालु)बिनती,जगतपति, उच्छाहु, प्रान आदि।
  2. 3. तृतीय श्रेणी के वे शब्द हैं जिसकी न तो वैज्ञानिक व्युत्पत्ति निर्धारित की गई है और न जिसके संस्कृत अथवा प्राकृत रूपों का प्रयोग ही उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। वे जिस अर्थ में मानस में प्रयुक्त हुए हैं उस अर्थ में उनके तत्सम रूपों का प्रयोग संस्कृत साहित्य में नहीं मिलता, अतः इन्हें तद्भव कहना संदेहास्पद है। इस कोटि के शब्द निम्नलिखित हैं-

(अ)संज्ञापद- अनट , अएजा, अवसेरी, आरौ, काखासौती, कुरी, काछिय, कूँडि, कोहवर,चाँकी, निरजोसु, निहोरा,पहुनाई, रहस, लहकौरि।

(ब) विशेषण- अटपटे, फुर

(स) क्रिया-पद- अढुकि, कोरि, डेराई, ढरकें।

(द) क्रियाविशेषण- अवचट,उताइल तथा बगमेल। ”1

मानस के कुछ प्रमुख अंशों में प्रयुक्त शब्दों का विवरण यहाँ सक्षेप में प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि सामान्य अध्येता मानस की भाषा का वैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन करते हुए मानस में प्रयुक्त भाषा के लाक्षणिक अर्थ से परिचित हो पाएँ ।

मानस में प्रयुक्त देशज शब्द-व्युत्पत्ति: अर्थ एवं प्रयोग

  1. अनभल- यह पुंल्लिंग संज्ञा शब्द है , जो कि संस्कृत के ‘अन्’ से विकसित तद्भव उपसर्ग ‘अन’ के साथ हिन्दी के देशज शब्द ‘भला’ शब्द से निर्मित हुआ है। यह शब्द पद्य में प्रयुक्त हुआ है तथा व्याकरणसम्मत नहीं होते हुए भी देशज शब्द की श्रेणी में रखा जा सकता है।

        “जेहिं राउर अति अनभल ताका, सोइ पाइहिं यहु फलु परिपाका।”2

            उपाऊ- यह संज्ञा शब्द , उपाय इस संस्कृत शब्द से निर्मित है।

‘‘भामिनि करहू त कहौं उपाऊ।’’3

इसी तरह राऊ, साँची, कहिहु, सुधि, लखइ, कहसि,पाहीं , घोरी, कठोरी,बनबासू, हुलासू, राजू, घोरी आदि देशज प्रयोग प्राप्त होते हैं, जो अवधी भाषा के भाषा-वैज्ञानिक लक्षणों को स्पष्ट करते हैं।

  1. अँगरी- यह शब्द संस्कृत के अंगरक्षिका से बना है। इसकी व्युत्पत्ति अंगरक्षिका-अँगरखा शब्द से भी मानी गई है जो कि एक सामान्य परिधान है।

‘‘अंगरी पहिरी कूँड़ि सिर धरहीं।’’4  

निबाहनिहारा- निर्वाह करने वाले के अर्थ में। इसमें निबाह का तत्सम रूप निर्वाह है तथा उसी में निहारा का योग हुआ है।

“को रघुवीर सरिस संसारा। सीलु सनेहु निबाहनहारा।’’5

अँगवनिहारे- अंगों  पर सहने वाले, यह अंग तत्सम शब्द से निर्मित हुआ है।

“सूल कुलिस असि अँगवनिहारे” (वही)

  1. अढ़ुकि- हिन्दी में अढ़ुकना शब्द मिलता है , जिसका अर्थ है ठोकर। अढ़ुक संज्ञा पुल्लिंग शब्द है। जिससे अढ़ुकना या अढ़ुकि देशज शब्द निर्मित हुआ है।

“अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछे।”6  

  1. अनैस – अनैस संज्ञा शब्द संस्कृत के अनिष्ट से बना है जिसका अर्थ बुरा हुआ। यहाँ अनैसे अनिष्ट के हेतु वाली रोष मुद्रा के लिए गोस्वामी ने मानस में किया है। इससे लोक में जो क्रिया शब्द बनता है वह अनैसना हुआ, जिसका मंतव्य बुरा मानना या रूठना हुआ। क्रिया रूप में ही अनैसे शब्द भी मिलता है , जिसका अर्थ हुआ बुरे भाव से। इससे जो विशेषण शब्द बना वो अनेसा हुआ अर्थात् जो अप्रिय है, बुरा है, खराब है वह।

कह मुनि राम जाइ रिस कैसे। अजहूँ अनुज तव चितव अनैसे।7

सकउँ तोर अरि अमरउ मारी। काह कीट बपुरे नर नारी।। (अयोध्या काण्ड)

  1. अमरउ- संस्कृत के अमर शब्द से व्युत्पन्न यह विशेषण शब्द चिरजीवी के अर्थ में प्रयुक्त होता है। अमर शब्द है । मृ धातु से निष्पन्न यह शब्द हिन्दी के ‘अ’  उपसर्ग के योग से बना है जो यहाँ लोक में अमरउ के रूप में प्रयुक्त हुआ है। देव के स्त्रीलिंग रूप में यही अमरता, अमरा व अमरी रूप में प्रयुक्त हुआ। इसी से अमरत्व भाववाचक संज्ञा शब्द निर्मित होता है जिसका देशज प्रयोग अमरता है। देवता, पारा, अमरकोश आदि अर्थों में अमर शब्द प्रयुक्त होता है। यहाँ एक रोचक बात है कि अमर में यदि ख का योग हो कर ‘अमरख’ बना  दें तो इसका अर्थ क्रोध, रिस, गुस्सा हो जाता है।
  2. बरु-

रघुकुल रीति सदा चलि आई।

प्राण जाहुँ बरु बचन न जाई।। (रामचरितमानस) इसी तरह एक अन्य स्थान पर गोस्वामी लिखते हैं-

राम सरिस बरु दुलहिनि सीता। समधी दशरथु जनकु पुनीता।

वैसे तो चलि,जाहुँ,बचन, जाई आदि प्रयोग भी छंदानुकूल व देशज प्रभाव के कारण ही हैं परन्तु बरू शब्द पर देशज प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित है। अवधी का ‘बरु’ अव्यय शब्द संस्कृत के वरन् शब्द से निर्मित है। ‘बरू’ अव्यय भले ही, चाहे ही,कुछ हर्ज़ नहीं के अर्थ में प्रयुक्त होता है। जायसी ने भी ठेठ अवधी में लिखा है- मनहुँ कला शशिमान।

  1. जोरी-

सोहति सीय राम कै जोरी, छबि सिंगारु मनहूँ एक ठोरी।

अर्थ है सीताराम की जोड़ी इस प्रकार सुशोभित हो रही है मानो सुंदरता और शृंगार रस एकत्र हो गए हों। यहाँ जोरी और मनहूँ शब्द पर विशेष ध्यान देते हैं। जोड़ी संज्ञा शब्द जोड़ा से बना है जिसका अर्थ है एक ही जैसी दो वस्तुएँ, पदार्थ या सत्ता। जोरी शब्द तद्भव और देशज प्रयोग है।

मनहुँ शब्द देशज विशेषकर अवधी में मनहुँ रूप में प्रयुक्त होता है यहाँ गोस्वामी जी ने छंदानुसार दीर्घ का प्रयोग किया है। मनहुँ अव्यय शब्द है जो हिन्दी के मानों से निर्मित हुआ है जिसका अर्थ जैसे , यथा आदि हुआ।

  1. जाननिहारा

रामहि केवल प्रेमु पियारा, जानि लेउ जो जाननिहारा।

यहाँ प्रेमु, पियारा, जाननिहारा आदि शब्द देशज रूप हैं। इस काव्यांश का अर्थ है श्रीरामचंद्रजी को केवल प्रेम प्यारा है; जो जानने वाला हो, वह जान ले। जाननिहारा शब्द जाननहार की ही परिपाटी पर प्रयुक्त हुआ है।

हम न मरि मरिहै संसारा,हमहु मिला है जियावनहारा। यहाँ कबीर ने भी ऐसी ही शब्दावली का प्रयोग किया है; मध्यकाल की भाषा के भाषिक अध्ययन में यह समत्व की स्थिति को परिलक्षित करता है।

  1. राम-राम कहि जे जमुहाहीं, तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं।

अर्थात् जो लोग राम-राम कहकर जमुहाई लेते हैं अर्थात् आलस्य में भी जिनके मुँह से राम-नाम का उच्चारण हो जाता है, पापों के समूह उनके सामने नहीं आते। यहाँ समुहाहीं शब्द पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। समुहा वस्तुतः तत्सम शब्द सम्मुख से बना है। मुख शब्द से निर्मित सम्मुख हुआ, मुख का तद्भव मुँह हुआ इसी से समुहा निर्मित हुआ । समुहा विशेषण के रूप में सामने का अर्थ में ध्वनित हो रहा है यही अकर्मक क्रिया के रूप में समुहाना बना। इसी से अवधी में समुहाहीं बना।

जमुहाहीं भी स्त्रीवाचक संज्ञा तद्भव रूप है जो तत्सम शब्द जँभाई से बना है जो संस्कृत के जृंभा से निर्मित है। सामान्य भाषा में इसे ही उबासी भी कहा जाता है।  

 

 

  1. ‘राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि। यह निरजोसु दोसु विधि बामहि।।’

अर्थात् श्रीराम  भक्तों को प्यारे हैं और आप भक्त श्रीराम को प्यारे हैं। दोष तो प्रतिकूल विधाता को है। यहाँ निरजोसु शब्द का अर्थ निचोड़ या निर्णय है जो संस्कृत के निर्यास से बना है।

 

इस प्रकार भाषिक दृष्टि से मानस में तद्भव शब्दों का भण्डार है। रामकाव्य का मूल ही वस्तुतः वाल्मीकि रामायण है। परंतु, इसके विभिन्न प्रसंगों में नवीन उद्भावनाओं का समावेश, भाषिक दृष्टि से परिवर्तन संस्कृत के परवर्ती रामकाव्य से प्रेरणा लेकर होता रहा है; गोस्वामी ने स्वयं लिखा है-

“नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्रामायणे निगदितं व्वचिदन्यतोपि।

स्वान्तःसुखाय तुलसीरघुनाथगाथा भाषानिबंधमतिमंजुलमातनोति।।” -मानस

 

कथाओं के साथ-साथ भाषा में भी तुलसी ने समन्वय दिखाया है। अपने ज्ञान और अनुभव को उन्होंने कुछ ही व्यक्तियों तक सीमित न रखकर उन्होंने किसी एक भाषा को महत्त्व नहीं दिया। “का भाषा का संस्कृत, प्रेम चाहिए साँच”, कहकर उन्होंने कही जाने वाली बात को अधिक महत्त्व दिया। इतना ही नहीं उन्होंने एक व्यापक राष्ट्रभाषा के विकास का मार्ग भी दिखाया है। वे इस अवधारणा पर अड़े रहते हैं कि सर्वाधिक प्रचलित भाषा और उसके प्रयोगों का  ढाँचा लेकर हमें आवश्यकतानुसार उसके रूप को भरने,सजाने,सँवारने के कार्य में विभिन्न भाषाओं के उपयुक्त शब्दों को लेते रहना चाहिए, पर यह कार्य मूल भाषा को बिगाड़ने वाला न होकर उसे अधिक प्रांजल और समृद्ध बनाने वाला होना चाहिए। अपने ग्रंथों में अवधी या ब्रज के मूल रूप को लेकर उसमें उन्होंने संस्कृत, अरबी, फारसी, बँगला, गुजराती, मराठी आदि भाषाओं के शब्दों को यथास्थान स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं किया। उन्होंने मानस में भी मुख्य पारिभाषिक शब्दावली संस्कृत से लेकर उन्होंने उसे लोक-भाषा में ढालकर प्रस्तुत किया है; अतः वे हमारी वर्तमान भाषिक समस्याओं को सुलझाने में भी हितकारी है। यही समन्वयात्मक दृष्टिकोण और दर्शन गांधी-दर्शन के भी निकट है।

 

संदर्भ–

 1.तुलसी ग्रंथावली,तृतीय खण्ड- नागरीप्रचारिणी सभा,मानस का देशज शब्दभंडार लेख से पृ. 408-409)

 2.(20, अयोध्याकाण्ड)

3.(वही)

  1. 4. वही(2.191.5)
  2. वही (24.2, अयोध्याकाण्ड)
  3. वही 2.143.6
  4. 7. वही(1.279.7)

पहाड़िया साम्राज्य के आदि विद्रोह एवं बलिदान की समरगाथा: हुल पहाड़िया उपन्यास-विकास पराशर,डॉ विनोद कुमार

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पहाड़िया साम्राज्य के आदि विद्रोह एवं बलिदान की समरगाथा: हुल पहाड़िया उपन्यास

विकास पराशर1 (पी.एच.डी शोधार्थी),
डॉ विनोद कुमार2  (निर्देशक)
हिंदी विभाग,
लवली प्रोफैशनल यूनिवर्सिटी, फगवाड़ा, पंजाब

शोध सार

भारत को परतन्त्रता की बेड़ियों से मुक्त करवाने में यदि किसी ने योगदान दिया तो वह पहाड़ियां समाज के वीर नायक बाबा तिलकामांझी थे। जिन्होंने अपने अदम्य साहस और शौर्य से ईस्ट इंडिया कंपनी के झंडे को ललकारा और अनेक क्रांतिकारी गतिविधियों से कंपनी की दमनकारी योजनाओं का विनाश किया।  इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि भारत को स्वतंत्र कराने में समय–समय पर अनेक प्रकार के आंदोलन और विद्रोह हुए। जिन्होंने ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया लेकिन इन सभी आंदोलनों के नायक तो आदि नायक अर्थात् आदिवासी ही थे। हुल पहाड़िया उपन्यास यथार्थ के धरातल को व्यक्त करने वाला एक ऐसा उपन्यास है। जिसमें इतिहास को यथार्थ के धरातल पर पाठकों के समक्ष लेखक ने बड़ी मेहनत के साथ प्रकट किया है।  इतिहास के वीर नायकों को आधुनिक पीढ़ी से रूबरू कराने में कुल पहाड़िया उपन्यास सर्वदा सार्थक सिद्ध हुआ है।

बीज शब्द: आदिवासी, नायक, संघर्ष, आजादी, विद्रोह, उपन्यास

शोध विस्तार

बाहरी शक्तियों द्वारा किसी समाज या समुदाय विशेष की पहचान और अस्मिता के अतिक्रमण तथा उसके विरोध की कड़ियों के दस्तावेजीकरण से इतिहास की श्रंखला का एक बड़ा हिस्सा तैयार होता रहा है। इसके समानांतर एक सच यह भी है कि घुसपैठ और विद्रोह की ना जाने कितनी द्वंद्वात्मक संघर्ष गाथाएँ इतिहास का हिस्सा बनने से रह जाती हैं या फिर जानबूझकर उन्हें इतिहास से बेदखल कर दिया जाता है। भारत के आदि-निवासियों की प्रमुख जनजाति पहाड़िया का स्वतंत्र संघर्ष इतिहास में दर्ज होने से छूट गया या छोड़ दिया गया। भारत को परतन्त्रता की बेड़ियों से मुक्त करवाने में यदि किसी ने योगदान दिया तो वह पहाड़ियां समाज के वीर नायक बाबा तिलकामांझी थे। जिन्होंने अपने अदम्य साहस और शौर्य से ईस्ट इंडिया कंपनी के झंडे को ललकारा और अनेक क्रांतिकारी गतिविधियों से कंपनी की दमनकारी योजनाओं का विनाश किया।  इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि भारत को स्वतंत्र कराने में समय-समय पर अनेक प्रकार के आंदोलन और विद्रोह हुए। जिन्होंने ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया लेकिन इन सभी आंदोलनों के नायक तो आदि नायक अर्थात् आदिवासी ही थे। जिनमें तिलका मांझी (जबरा) का नाम सर्वोपरि है। जो काम सभ्य लोगों ने किया। वही काम इतिहासकारों ने किया। पहाड़िया साम्राज्य के इतिहास को अस्तित्वहीन कर दिया। आदि नायकों की वीर गाथाओं का चित्रण शून्य स्तर पर किया। जिसके कारण लोगों तक उनके शौर्य की गाथाएँ पहुँच नहीं पाई। राकेश कुमार जी इसी बात को उद्घाटित करते हुए। अपने उपन्यास हुल पहाड़िया में लिखते हैं “गुलामों को महिमामंडित कैसे कर सकते थे गोरे? हमारे भारतीय इतिहासकार भी अंग्रेजी की मानसिक दासता से कहां मुक्त हो सके। इनकी आधार सामग्री भी तो वहीं थी। अंग्रेज अफसरों के संस्मरण, डायरियां अंग्रेजों द्वारा तैयार गजेटियर्स।”1 भारत में ऐसे बहुत वीर नायक हुए। जिनकी शौर्य गाथाएं सिर्फ मौखिक रूप में ही रह गई। उन्हें ठोस रूप देने में सदैव इतिहासकारों ने हिचकिचाहट की। जब किसी भी समाज के अस्तित्व, अस्मिता और उनकी स्वतंत्रता में बाहरी हस्तक्षेप होता है तो विद्रोह का नगाड़ा स्वयं ही बजे उठता है। जिसके कारण संघर्ष की उत्पत्ति होती है और जब संघर्ष अपनी चरम सीमा की ओर बढ़ता है तो विद्रोह को जन्म देता है। जो आगे चलकर भीष्म युद्ध की उत्पत्ति करता है। यही हालात पहाड़ियां समाज के थे। ईस्ट इंडिया कंपनी ने जबरदस्ती उनकी जमीनों को अपने अधिकार में लेना शुरू कर दिया। उनकी स्वतंत्रता को परतंत्रता की जंजीरों में जकड़ना आरम्भ कर। जिसके फलस्वरूप उन्हें तीरों के स्थान पर हथियार उठाने उड़े। “तिलका बाबा को विवश किया था। ईस्ट इंडिया कंपनी की दमनकारी नीतियों ने। कैप्टन ब्रूक, ब्राउन और क्लीवलैंड की अंग्रेज तिकड़ी ने।” 2 साल 1784 में उन्होंने भागलपुर पर हमला किया और 13 जनवरी 1784 में ताड़ के पेड़ पर चढ़कर घोड़े पर सवार अंग्रेज कलेक्टर अगस्टस क्लीवलैंड को अपने जहरीले तीर का निशाना बनाया और मार गिराया। कलेक्टर की मौत से पूरी ब्रिटिश सरकार सदमे में थी।  उन्होंने सपने में कभी सोचा न था कि जंगलों रहने वाला कोई आम आदिवासी ऐसी हिमाकत कर सकता है। जंगल के बेटे ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया और न ही कभी समपर्ण किया और न ही वह अंग्रेजों के प्रहारों से डरे। स्थानीय सूदखोर और ज़मीदारों, अंग्रेज़ी शासकों को जीते जी चैन की नींद सोने नहीं दिया। तिलका मांझी आदिवासियों की स्मृतियों और उनके गीतों में हमेशा जिंदा रहेंगे ना जाने कितने ही आदिवासी लड़ाके के तिलका के गीत गाते हुए फांसी के फंदे पर चढ़ गए। गीतों तथा कविताओं में तिलकामांझी का विभिन्न रूपों में याद किया जाता है।

“तुम पर कोड़ों की बरसात हुई

 तुम घोड़ों में बांधकर घसीटे गए

 फिर भी तुम्हे मारा नहीं जा सका

 तिलका मांझी, मंगल पाण्डेय नहीं

 तुम आधुनिक भारत के पहले विद्रोही थे।” 3

पहाड़िया आदिवासी मुगल अफगान और मराठे तीन-तीन आक्रमणकारियों से लड़े थे। उन्होंने अपने पुरखों द्वारा स्थापित राज्यों पर दीकूओं का वर्चस्व कभी स्वीकार नहीं किया। रक्तबीज के वंशधर थे। राजमहल की पहाड़ियां। बार बार हारते थे। पर टूटते नहीं थे। गिर-गिर कर खड़े होने वाले हटी पहाड़िया लोगों का लड़ाका मनोबल अक्षुण्ण रहा था। ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रत्येक षड्यंत्रकारी योजनाओं को मिट्टी में धूमिल कर दिया था तिलका मांझी पहाड़िया साम्राज्य के नायक ने। जो उपन्यास के इस संवाद से स्पष्ट हो जाता है। “ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी सन्न थे। अजब घटित हुआ था। कंपनी का खजाना लूट गया था। दिन-दहाड़े जंगलतराई के क्षेत्र में पहली बार कंपनी के खजाने की लूट हुई थी।” 4 ऐसा नहीं है कि आदिवासियों के राजनीतिक चेतना प्रखर नहीं है। वे विरोध करना जानते ही नहीं, सत्ता पक्ष की हर भाषा को जानते हैं। समझते हैं। उनके हर वास्तविक इरादों का मुकम्मल जवाब भी दे सकते हैं। वे राजनीति में उथल-पुथल भी मचा सकते है। वे अपने क्षेत्र में ही सही लेकिन अंग्रेजों को करारी टक्कर दे रहे थे। औपनिवेशिक युग में जितने विद्रोह आदिवासियों ने किए। उतने भारत की किसी भी जाति ने नहीं किए। इसका कारण था कि औपनिवेशिक सत्ता ने आदिवासियों के जंगल जमीन का वास्तविक आधार ही छीन लिया था।  सबसे ज्यादा विद्रोह झारखंड में हुए और इसमें मुंडा, संथाल, हो तथा भूमिज आदिवासियों ने निर्णयकारी भूमिका अदा की। इनके आंदोलनों में निरंतरता है। जोड़ने वाली कड़ी है। जो समाज सुधार से लेकर राजनीतिक स्वायत्तता तक जाती है। रवि कुमार ने अपनी कविता पुस्तक आदिवासी अभिव्यक्ति में तिलका मांझी और इतिहास के वीर नायकों की गाथा को समाज के समक्ष प्रकट किया है। जिसे सदैव साहित्यकारों ने हाशिये की सीमा से पार नहीं किया।  

“दहक उठी थी सन 1774 में

 अंग्रेज विरोधी थी वह क्रांति  

 1824 में तिलका मांझी ने

 मार गिराया अंग्रेज कमिश्नर।” 5

हुल पहाड़िया उपन्यास यथार्थ के धरातल को व्यक्त करने वाला एक ऐसा उपन्यास है। जिसमें इतिहास को यथार्थ के धरातल पर पाठकों के समक्ष लेखक ने बड़ी मेहनत के साथ प्रकट किया है।  इतिहास के वीर नायकों को आधुनिक पीढ़ी से रूबरू कराने में कुल पहाड़िया उपन्यास सर्वदा सार्थक सिद्ध हुआ है। ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक कंपनी थी। धीरे-धीरे व्यापार के साथ-साथ उन्होंने पूरे भारत को अपने साम्राज्य में मिला लिया और पूरे भारत पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। ईस्ट इंडिया कंपनी के राज्य काल में प्रत्येक व्यक्ति को दुख और दरिद्रता के इलावा कुछ हासिल नहीं हुआ। कंपनी ने आदिवासी समाज की रीढ़ की हड्डी को तोड़ डाला। अनेक प्रकार के उन पर प्रतिबंध लगा दिए। जल, ज़मीन, जंगल को उनसे छीन लिया गया और कर, लगान व्यवस्था को लागू कर दिया गया। जिसके कारण स्वतंत्र अस्तित्व वाले पहाड़िया आक्रोशित थे उन्होनें विद्रोही रूपी स्वर में कहाँ, “जंगलतराई में पठान आए। मुगल आए और वह भी गए। किसी बादशाह, राजा, पेशवा या सूबेदार ने कभी भी स्वतंत्र पहाड़िया लोगों से कर नहीं मांगा था।”6 पहाड़िया आदिवासी अब तक स्वतंत्र रहते आए थे। उन्हें अपने ऊपर किसी भी प्रकार का अधिकार स्वीकार्य नहीं था। अपने स्वतंत्र को किसी के सामने गिरवी रखना उन्हें मंजूर नहीं था। स्वच्छंद एवं स्वतंत्र जीवन जीने वाले पहाड़िया को मजबूरी में भी किसानी सीखना मंजूर नहीं था। उन्होंने अंग्रेजों की नीतियों से विद्रोह करने की ठान पकड़ ली थी। सारे पहाड़िया समाज एक ही सपना था। कंपनी से आजादी। तिलका ने हमेशा से ही अपने जंगलों को लूटते और अपने लोगों पर अत्याचार होते देखा था। गरीब आदिवासियों की भूमि खेती, जंगली वृक्षों पर अंग्रेजी शासकों ने कब्जा कर रखा था।  आदिवासी और पर्वती सरदारों की लड़ाई अक्सर अंग्रेजी सत्ता से रहती थी। लेकिन पर्वतीय जमीदार अंग्रेजी सत्ता का साथ देते थे। तिलका मांझी राष्ट्रीय भावना जगाने के लिए भागलपुर में स्थानीय लोगों को सभा में संबोधित करते थे। जाति और धर्म से ऊपर उठकर लोगों को देश के लिए एकजुट होने के लिए प्रेरित करते थे। उन्होंने को ज्ञात था कि एकता ही स्वतंत्रता की चाबी है। उपन्यास के एक पात्र दीना ने अपनी एकजुटता को परिचय देते हुए कहा, “बाघ, भालू, हाथी अजगर सबसे लड़े हम। जंगल काटने में कितने पहाड़िया बीत गए। तब जाकर हमने गांव बसाए हैं।  अब अपने दम पर थोड़ी जमीन बनाई तो दूसरों को लगान क्यों दे? खेती किसानी नहीं करते फिर लगान कैसा?7 शोषण उत्पीड़न और विस्थापन जैसी समस्याओं को निरंतर झेलने वाले आदिवासियों की आर्थिक स्थिति बड़ी बदतर है। पहले तो वे प्राकृतिक संसाधनों, खनिजों जड़ी बूटियों, लकड़ियों को बेचकर कुछ न कुछ पैसे अर्जित कर लिया करते थे। लेकिन जब से पूंजीपतियों ने अपने अतिक्षमतावान यंत्रों के द्वारा उनके प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करना शुरू कर दिया।  तब से यह बेचारे आदिवासी भूमिहीन तथा उत्तरोत्तर कंगाल होते गए। अब उन्हें अपनी रोजमर्रा के जीवन को चलाने के लिए पूर्णतया बाज़ार पर ही निर्भर होना पड़ रहा है। स्वतंत्रता से पहले भी उनकी स्थिति ऐसी थी और आज भी वैसी ही है। आदिवासी साहित्य में हमें विद्रोह की चेतना सर्वाधिक मुखरता के साथ देखने को मिलती है। उन्होंने अपने जीवन के संघर्ष को अपनी अस्मिता का संघर्ष बना दिया है। आज वे उन ताकतों का मुखर विरोध करती है। जिसने उसकी आत्मा को अपमानित किया है। दिल पर गहरे जख्म दिया है। उनके हर चीजों को छीना है। उनके सपनों को रौंद कर रख दिया है। “उसे अपनी पहचान के संघर्ष को अपने स्वाभिमान से जोड़कर संघर्ष और मूल्यों का पर्याय बना दिया है। उसका साहित्य अपनी कोई या कहीं छीनी गई इज्जत या मर्यादा को अपने मूल्यों में तोल कर अपने शब्दों, प्रतीकों, मिथकों में बाँधने लगा है।”8 आज आदिवासी साहित्य जो केवल लोकसाहित्य तक ही सीमित था आगे निकल गया है और समकालीन साहित्य का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है। आदिवासियों के जीवन में मुगलों के आक्रमण और अन्य   बाहरी आक्रमणों से बदलाव शुरू हुआ। किंतु यह बदला बहुत प्रभावशाली नहीं रहे। मुगलों के पश्चात जब अंग्रेजी सत्ता भारत में काबिज हुई तो उन्होंने देखा कि असली धन का भंडार तो आदिवासियों के पास जंगलों में हैं। उन्होंने वन कानून में अपनी मर्जी से संशोधन किया और जंगलों में मार्ग का निर्माण किया और आदिवासियों के जीवन में सड़क मार्ग ने विष घोलने शुरू कर दिया। विद्रोह की ज्वाला भी धीरे-धीरे भड़कने लगी थी आदिवासी भले ही जंगलों में निवास करते है।  लेकिन अपनी अस्मिता और अस्तित्व के लिए मर मिटने को तैयार हो जाते हैं। ब्रिटिश फौजों ने जब पहाड़िया राज्य की सीमा को लांघना शुरू कर दिया तो विद्रोह की ज्वाला ने भी उनकी सहनशीलता की सीमा को पार कर दिया। प्रत्येक पहाड़िया अपने साम्राज्य की अस्मिता के लिए संघर्ष रूपी मशालें  लेकर खड़ा हो गया और सभी ने एकजुट होकर तीर ध्वनि के साथ विजय गीत गाया। “विजयी मशालें जल उठी थीं। रणक्षेत्र बने नाले की रेत पर नाचने लगे थे पहाड़िया। पलटन काटेंगे हम। जैसे हमारे पुरखों ने बाघ काटा था। कम्पनी को काटेंगे हम।” 9 विद्रोह की आग जब जलती है तो दुश्मनों की सीनों को छलनी कर देती है। स्वत्रंता का अहसास उनके अंदर विजय का शंखनाद कर देता है। यह शंखनाद समस्त जन-जीवन को सकारात्मक से भर देता है। असत्य पर सत्य की जीत को प्रकट करता है। तीर और कमान आदिवासी की पहचान रहे हैं। आज यह कलम की शक्ति के रूप में उद्घाटित हो रही है। जैसे-जैसे जागृत और चेतना बढ़ रही है। ज्ञान की रोशनी से जंगलवासी परिचित हो रहे हैं। वैसे-वैसे उन्हें अपने स्तत्व बोध और अस्मिता का ज्ञान होता जा रहा है। जीवन के बुनियादी हकों के लिए वह संगठित हो रहे हैं। भारतीय इतिहास ने प्राचीनकाल से आज तक उनकी पहचान, उनकी अस्मिता को सामने नहीं लाया, अपितु उन्हें राक्षस, दास, दस्यु, किरात, चपटी नाकवाले, कलूटे, चोर, डकैत, जंगली, वनवासी, शराबी, आलसी, अंधविश्वासी आदि हीनत्व बोधक उपाधियाँ देकर उनका उपहास ही किया “अश्वेत लेखिका टोनी माँरिसन कहती है इतिहास जहां मौन होता है। वही साहित्य मुखर होता है। मैं जो कुछ लिखती हूँ। वह साहित्य भी है और इतिहास भी। हम ऐसे देश में रहते हैं। जहाँ अतीत मिटाया जाता है और भविष्य निर्दोष हुआ करता है। 10

निष्कर्ष: देश की स्वतंत्रता के लिए प्राणों की आहुति देने वाले क्रांति के अग्रदूत तिलका मांझी की सशक्त संघर्ष गाथा है पहाड़िया उपन्यास। इतिहासकारों की उपेक्षा का शिकार बाबा तिलका मांझी की समर गाथा को संवेदनशील रचनाकार राकेश कुमार सिंह ने अत्यंत लगन से सरल प्रभावमयी  शैली में ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर नियुक्त किया है। इतिहासकारों में नया मौलिक अधिकार निर्मित करनी की इच्छा जगनी चाहिए। तभी भारत के महान क्रांतिकारियों को इतिहास में अपेक्षाकृत स्थान मिलेगा। महान लेखक राकेश कुमार सिंह ने शौर्य और वीरता की मूर्ति तिलका मांझी की स्मृति को ‘हुल पहाड़िया’ उपन्यास के माध्यम एक मूर्त रूप प्रदान किया जिसे वह जन-जन तक पहुँच पाया । 

 

 

 

 

सन्दर्भ सूची

  • राकेश कुमार सिंह, ‘हुल पहाड़िया’, नई दिल्ली: सामयिक बुक्स, 2014 पृ 94
  • राकेश कुमार सिंह, ‘हुल पहाड़िया’, नई दिल्ली: सामयिक बुक्स, 2014 पृ 95
  • https://hindi.thebetterindia.com/11842/tilka-manjhi-was-the-first-indian-freedom-fighter/
  • राकेश कुमार सिंह, ‘हुल पहाड़िया’, नई दिल्ली: सामयिक बुक्स, 2014 पृ 51
  • रविकुमार गोंड़, ‘आदिवासी अभिव्यक्ति’, दिल्ली: अनंग प्रकाशन, 2015 पृ 29
  • राकेश कुमार सिंह, ‘हुल पहाड़िया’, नई दिल्ली: सामयिक बुक्स, 2014 पृ 101
  • राकेश कुमार सिंह, ‘हुल पहाड़िया’, नई दिल्ली: सामयिक बुक्स, 2014 पृ 124
  • डॉ धीरेन्द्र सिंह, ‘प्रतिरोध की संस्कृति और आदिवासी कविता’, नई दिल्ली: अनंग प्रकाशन, 2017 पृ 74
  • राकेश कुमार सिंह, ‘हुल पहाड़िया’, नई दिल्ली: सामयिक बुक्स, 2014 पृ 130
  • विशाल शर्मा, ‘आदिवासी साहित्य एवं संस्कृति’, नई दिल्ली: स्वराज प्रकाशन, 2014 पृ 74

 

 

विकास पराशर

शोधार्थी

स्थान: लवली प्रोफ़ैशनल यूनिवर्सिटी, फगवाड़ा (पंजाब)

पता: मकान संख्या 180 अशोक नगर,

बाज़ार वकीला, होशियारपुर, पंजाब

संपर्क सूत्र: 7986100904

विकास पराशर, पी.एच.डी शोधार्थी

 
 

Vikasnk98prashar@gmail.com

प्रेमचंद के उपन्यास साहित्य में चित्रित पत्रकारिता संदर्भ  :डा. पवनेश ठकुराठी

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प्रेमचंद के उपन्यास साहित्य में चित्रित पत्रकारिता संदर्भ                                 

-डा. पवनेश ठकुराठी,
अल्मोड़ा (उत्तराखण्ड) – 263601
ई. मेल- pawant2015@gmail.com
वेबसाइट- www.drpawanesh.com

शोध सार          

प्रेमचंद के उपन्यासों की पत्रकारिता विभिन्न समाचार पत्रों–पत्रिकाओं के संपादन एवं उनमें प्रकाशित होने वाले समाचार नोटिस आदि को व्यक्त करती है। इनके उपन्यासों में व्यक्त पत्रकारिता से पता चलता है कि आजादी से पूर्व के भारतीय समाचार– पत्र जनता एवं ब्रिटिश सरकार की गतिविधियों को प्रसारित करने का कार्य किया करते थे। ज्यादातर पत्रों में देशभक्ति और स्वदेश को महत्व दिया जाता था। प्रेमचंद के उपन्यासों में कमला, सरस्वती, जगत, हिंदुस्तान–रिव्यू, गौरव, आर्य–जगत्, प्रजा–मित्र बिजली आदि पत्रों के संपादन से संबंधित प्रसंग व्यक्त हुए हैं।

बीज शब्द: प्रेमचंद, उपन्यास, पत्रिकाएँ, संपादक, कहानी, पत्रकारिता

शोध विस्तार:

एक ऐसा कथाकार जो स्वयं एक सफल पत्रकार रहा हो, उसके कथा साहित्य में पत्रकारिता से संबंधित संदर्भ व्यक्त न हों, ऐसा कम ही देखने में आता है। कथाकार प्रेमचंद एक सफल पत्रकार रहे थे, यही कारण है कि उनके कथा साहित्य में पत्रकारिता से संबंधित विविध संदर्भ व्यक्त हुए हं। प्रेमचंद के उपन्यास और कहानी साहित्य दोनों में पत्रकारिता से जुड़े विविध संदर्भ दिखाई देते हैं।

            प्रेमचंद के प्रेमा, वरदान, सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि, गोदान आदि उपन्यासों में पत्रकारिता से संबंधित विविध संदर्भों का निरूपण हुआ है। इनके ‘प्रेमा’ उपन्यास में अमृतराय के समाचार पत्रों में सामाजिक सुधार पर लेख लिखने का उल्लेख हुआ है: ‘‘इसके उपरांत उन्होंने देहातों में जा-जाकर सरल-सरल भाषा में व्याख्यान देना शुरू किया और समाचार पत्रों में समाजिक सुधार पर अच्छे-अच्छे लेख भी लिखे।’’1 इसी उपन्यास में मुंशी बदरीप्रसाद और बाबू अमृतराय के अखबार पढ़ने का भी उल्लेख हुआ है। संबंधित उदाहरण दृष्टव्य हैं-

  1. कई मिनट तक मुंशी बदरीप्रसाद अखबार पढ़ते रहे।2
  2. अखबार पढ़ते-पढ़ते सो गये।3

            इनके ‘वरदान’ उपन्यास में ‘कमला’ और ‘सरस्वती’ नामक पत्रिकाओं से संबंधित संदर्भ व्यक्त हुए हैं। ‘कमला’ में ‘भारत महिला उर्फ विरजन’ की कविताएं प्रकाशित होती निरूपित हुई हैं। दो उदाहरण दृष्टव्य हैं –

  1. प्रयाग से उन दिनों ‘कमला’ नाम की अच्छी पत्रिका निकलती थी। प्राणनाथ ने ‘प्रेम की मतवाली’ को वहां भेज दिया।4
  2. अब प्रतिमास ‘कमला’ के पृष्ठ विरजन की कविता से सुशोभित होने लगे और ‘भारत महिला’ के लोकमत ने कवियों के सम्मानित पद पर पहुंचा दिया।5

            विरजन की लोकप्रियता से प्रभावित होकर ही प्राणनाथ ‘भारत महिला’6 के शीर्षक से एक प्रभाव पूरित लेख लिखता है। इसी प्रकार बालाजी उर्फ प्रतापचंद्र विरजन की कविताओं की समालोचना ‘सरस्वती’ में लिखता है: ‘‘वे अपनी प्रभावशालिनी वक्तृताओं और लेखों में बहुधा उसी के वाक्यों का प्रमाण दिया करते थे, उन्होंने ‘सरस्वती’ में एक बार उसके संग्रह की सविस्तार समलोचना भी लिखी थी।’’7 वस्तुतः ‘सरस्वती’ पत्रिका प्रेमचंद के काल में प्रकाशित होती थी किंतु ‘सरस्वती’ की स्थापना 1900 ई0 में हुई थी और 1903 से 1920 तक इस पत्रिका का संपादन महावीर प्रसाद द्विवेदी ने किया और इसे लोकप्रियता के उत्कर्ष तक पहुंचाया।

            इनके ‘सेवासदन’ उपन्यास के चरित्र प्रभाकर राव का परिचय कथाकार ने हिंदी पत्र ’जगत’8 के संपादक के रूप में कराया है। वेश्या समस्या से संबंधित प्रस्ताव पर लेखमाला वे अपने इसी पत्र में निकालते हैं: ‘‘लेकिन महीना पूरा भी न हो पाया था कि प्रभाकर राव ने अपने पत्र में इस प्रस्ताव के संबंध में एक लेखमाला निकालनी आरंभ कर दी। उसमें पद्मसिंह पर ऐसी ऐसी मार्मिक चोटें करने लगे कि उन्हें पढ़कर वह तिलमिला जाते थे।’’9 इस उपन्यास का युवा चरित्र सदनसिंह भी अपने लेख प्रकाशित करने के लिए ‘जगत’ के संपादक के नाम भेजता है:‘‘उसने दो-तीन लेख लिखे और प्रभाकर राव के पास डाक द्वारा भेजे। कई दिन तक प्रकाशित होने की आशा करता रहा।’’10 जब लंबे समय बाद भी उसके लेख प्रकाशित नहीं होते, तो वह स्वयं ‘जगत’ के संपादक को धमकाने उनके कार्यालय पहुंच जाता है: ‘‘संध्या समय एक मोटा-सा सोटा लिए हुए ‘जगत’ कार्यालय में पहुंचा। कार्यालय बंद हो चुका था। पर प्रभाकर राव अपने संपादकीय कुटीर में बैठे हुए कुछ लिख रहे थे।’’11 प्रभाकर राव द्वारा उसकी शंका का समाधान होने पर ही वह वापस घर लौटता है। वस्तुतः सदनसिंह को शक होता है कि प्रभाकर राव ने द्वेष भाव के कारण उसके लेखक नहीं छापे।

            इनके ‘प्रेमाश्रम’ उपन्यास का उच्चवर्गीय चरित्र ज्ञानशंकर जब अपने विचारों को एक अंग्रेजी पत्रिका में प्रकाशित कराता है, तो पूरे नैनीताल में हलचल मच जाती है: ‘‘किंतु जब ज्ञानशंकर ने अपने विचारों को एक प्रसिद्ध अंग्रेजी पत्रिका में प्रकाशित कराया तो सारे नैनीताल में हलचल मच गई।’’12 इस उपन्यास में एक अंग्रेजी पत्र में दवाओं के मनोरंजक  विज्ञापन छपे होने का उल्लेख भी हुआ है: ‘‘एक अंग्रेजी पत्र लेकर पढ़ना चाहा पर उसमें जी न लगा। दवाओं के विज्ञापन अधिक मनोरंजक थे। दस मिनट में उन्होंने सभी विज्ञापन पढ़ डाले।’’13 वस्तुतः जिस अंग्रेजी समाचार पत्र में ज्ञानशंकर का लेख छपा होता है, उस अंग्रेजी समाचार पत्र का नाम ‘हिंदुस्तान रिव्यू’ होता है और इसी समाचार पत्र में छपे लेख को पढ़कर प्रेमशंकर विदेश से भारत लौट आता है; तभी तो वह ज्ञानशंकर से कहता है: ‘‘… ‘हिंदुस्तान रिव्यू’ में तुमने नैनीताल के जीवन पर जो लेख लिखा था उसे पढ़कर मैंने आने का निश्चय किया।’’14 इस उपन्यास में ‘तिलक’ नामक समाचार पत्र की कार्यप्रणाली और रूढ़िवाद को पोषित करने की प्रवृत्ति का निरूपण करते हुए कथाकार लिखता है: ‘‘‘तिलक’ एक स्थानीय समाचार पत्र था। उसमें इस विषय पर खूब जहर उगला जाता था।’’15 वस्तुतः यह विषय ज्ञानशंकर द्वारा भाई प्रेमशंकर पर लगाये गये झूठे आरोपों एवं आक्षेपों का पुलिंदा मात्र था।

            इस उपन्यास में सैयाद ईजाद हुसैन उर्फ मिर्जा साहब भी अपने ‘इत्तहादी यमतीखान’े की प्रशंसा अखबारों में तलाशते निरूपित हुए हैं: ‘‘इसके बाद समाचार पत्रों की बारी आई, लेकिन मिर्जा की निगाह लेखों या समाचारों पर न थी। वह केवल ‘इत्तहादी अनाथालय की प्रशंसा के इच्छुक थे। पर इस विषय से उन्हें बड़ी निराशा हुई। किसी पत्र में भी इसकी चर्चा न दीख पड़ी।’’16 इस उपन्यास में गायत्री द्वारा सनातन धर्म सभा को पचास हजार के गहने दान में देने की खबर का समाचार पत्रों में छपने का उल्लेख हुआ है: ‘‘उसने ज्ञानशंकर को, जो सभा के मंत्री थे, बुलाया और अपने गहनों का संदूक देकर बोली, इसमें पचास हजार के गहने है, मैं इन्हें सनातन धर्म सभा को समर्पण करती हूँ। समाचार पत्रों में यह खबर छप गई। तैयारियाँ हो लगी।’’17 इतना ही नहीं सनातन धर्म महोत्सव का समाचार भी अखबार में प्रमुखता से छपता है: ‘‘एक दिन संध्या समय प्रेमशंकर बैठे हुए समाचार पत्र देख रहे थे। गोरखपुर के सनातन धर्म महोत्सव का समाचार मोटे अक्षरों में छपा हुआ दिखाई दिया। गौर से पढ़ने लगे।’’18 सनातन धर्म महोत्सव की खबर के अलावा अदालत में होने वाली कार्यवाहियों का समाचार भी अखबारों में छपने का उल्लेख इस उपन्यास में हुआ है: ‘‘ज्यों ही दशहरे की छुट्टियों के बाद हाईकोर्ट खुला, अपील दायर हो गई और समाचार पत्रों के कालम उसकी कार्यवाही से भरे जाने लगे।’’19 इस उपन्यास के समझदार और सजग बाल चरित्र मायाशंकर का लेख भी एक पत्र में छपता निरुपित हुआ है: ‘बारहवें दिन उन्होंने पत्र खोला तो मायाशंकर का लेख नजर आया। आद्योपांत पढ़ गए।’’20  इसके अलावा इस उपन्यास में काशी के समाचार पत्र ’गौरव’ द्वारा डाक्टर प्रियनाथ की प्रशंसा करने का उल्लेख हुआ है: ‘‘काशी का प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘गौरव’ उनका पुराना शत्रु था। पहले उन पर खूब चोटें किया करता था। अब वह भी उनका भक्त हो गया। उसने अपने एक लेख में यह आलोचना की: ‘काशी के लिए यह परम सौभाग्य की बात है कि बहुत दिनों के बाद उसे ऐसा प्रजावत्सल, ऐसा सहृदय, ऐसा कर्तव्यपरायण डाक्टर मिला। चिकित्सा का लक्ष्य धनोपार्जन नहीं, यशोपार्जन होना चाहिए और महाशय प्रियनाथ ने अपने व्यवहार से सिद्ध कर दिया है कि वह इस उच्चादर्श का पालन करना अपना ध्येय समझते हैं।’’21

            इनके ‘रंगभूमि’ उपन्यास में प्रभु सेवक द्वारा अपनी बहन सोफिया के गायक होने की सूचना समाचार पत्रों में देने का उल्लेख हुआ है: ‘‘पुलिस के दफ्तर में दिन-भर में दस-दस बार जाता और पूछता कुछ पता चला? समाचार पत्रों में भी सूचना दे रखी थी। वहां भी रोज कई बार जाकर दरियाफ्त करता।’’22 इस उपन्यास में सोफिया द्वारा विनयसिंह की माता रानी जान्हवी को समाचार-पत्र सुनाने और राजा महेन्द्र कुमार सिंह उर्फ राजा साहब के पत्र पढ़ने का उल्लेख भी हुआ है। संबंधित उदाहरण नीचे दिए जा रहे हैं –

  1. एक दिन रात को भोजन करने के बाद सोफिया रानी जाह्नवी के पास बैठी हुई कोई समाचार पत्र सुना रही थी कि विनयसिंह आकर बैठ गए।23
  2. दूसरे दिन राजा साहब ने दैनिक पत्र खोला तो उसमें सेवकों की यात्रा का वृतांत बड़े विस्तार से प्रकाशित हुआ था।24

            इसके अलावा इस उपन्यास में प्रभु सेवक द्वारा ‘हिंदुस्तान-रिव्यू’ में कविता लिखने, इंदु के समाचार पत्र पढ़ने और अफसर साहब के समाचार-पत्र पढ़कर एक-दो बजे घर जाने का उल्लेख हुआ है। संबंधित उदारण दृष्टव्य हैं –

  1. प्रभु सेवक ने हास्य भाव से कहा सच पूछिए, तो यह उस कविता का फल है जो मैंने ‘हिंदुस्तान रिव्यू’ में लिखी थी।25
  2. तब आज का समाचार-पत्र खोलकर देखने लगी। पहली ही शीर्षक था-’शास्त्रीजी की महत्वपूर्ण वक्तृता।’26
  3. तखमीने के अफसर साहब बारह बजे घर से आते, अपने कमरे में दो-चार सिगार पीते, समाचार-पत्र पढ़ते, एक-दो बजे घर चल देते।27

इसके ‘कायाकल्प’ उपन्यास के नायक चक्रधर के ‘सरस्वती’ नामक पत्रिका में लेखक छपा करते थे; इसीलिए तो यशोदानंदन उनके एक लेख को पढ़कर उनसे कहते हैं: ‘‘अबकी ‘सरस्वती’ में आपका लेख देखकर चित्त बहुत प्रसन्न हुआ। इस वैषम्य को मिटाने के लिए आपने जो उपाय बताए हैं, वे बहुत ही विचारपूर्ण हैं।’’28 इनके इस उपन्यास में ठाकुर साहब के समाचार-पत्र पढ़ने और मनोरमा द्वारा आगरे के समाचार अखबारों में पढ़ने का भी उल्लेख हुआ है। संबंधित उदाहरण दृष्टव्य हैं –

  1. ठाकुर साहब धूप में बैठे एक पत्र पढ़ रहे थे।29
  2. मैं पत्रों में रोज ही वहां का समाचार देखती थी और सोचती थी कि आप यहां आयेंगे, तो आपकी पूजा करूंगी।’’30

इस उपन्यास के नायक चक्रधर और उनकी पत्नी अहिल्या दोनों समाचार पत्रों में लेख लिखकर अपने परिवार की आजीविका चलाते चित्रित हुए हैं। प्रारंभ में चक्रधर दो-तीन समाचार पत्रों में लेख लिखकर अपनी जरूरत पूरी कर लेते थे, किंतु बाद में उनके लेख विदेशों के पत्रों में भी छपने लगे थे, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होने लगी थी: ‘‘उन्हें काफी धन मिलता था। योरप और अमेरिका के पत्रों में भी उनके लेख छपते थे।’’31 इसी तरह उनकी पत्नी अहिल्या भी ‘एक मासिक पत्रिका में अपनी एक सहेली का लेख’32 देखकर लेखन हेतु प्रेरित होती है और स्वयं भी पत्रिका को लेख भेजती है। पति चक्रधर के पूछने पर वह उन्हें बताती है: ‘‘… अबकी मैंने ‘आर्य-जगत्’ को दो लेख भेजे थे। उसी के पुरस्कार के तीस रुपये मिले। आजकल एक और लेख लिख रही हूँ।’’33

            इनके ‘गबन’ उपन्यास में कथानायक रमानाथ के घर से गायब होने पर उनका विज्ञापन प्रयाग के दैनिक पत्र में छापा जाता है: ‘‘प्रयाग के सबसे अधिक छपने वाले दैनिक पत्र में एक नोटिस निकल रहा है, जिसमें रमानाथ को घर लौट आने की प्रेरणा दी गई है; और उनका पता लगा लेने वाले आदमी को पंच सौ रुपये इनाम देने का वचन दिया गया है; मगर अभी कहीं से कोई खबर नहीं आई।’’34 रमानाथ कलकत्ता में इस विज्ञापन को पढ़कर आश्चर्य में पड़ जाता है: ‘‘हां, जब खूब अंधेरा हो जाता है तो वह एक बार मुहल्ले के वाचनालय में जरूर जाता है। अपने नगर और प्रांत के समाचारों के लिए उसका मन सदैव उत्सुक रहता है। उसने यह नोटिस देखी जो दयानाथ ने पत्रों में छपवाई थी; पर उस पर विश्वास न आया।’’35 इस उपन्यास की नायिका जालपा अपने पति रमानाथ का पता लगाने हेतु एक शतरंज के नक्शे को हिंदी दैनिक पत्र में छपवाती है: ‘‘यह नक्शा वहां के एक हिंदी दैनिक पत्र में छपा था और उसे हल करने वाले को पचास रुपये इनाम देने का वचन दिया गया।’’36 इस उपन्यास में रमानाथ और देवीदीन के वार्तालाप के माध्यम से भी ‘प्रजामित्र’ अखबार और उसके संपादक के व्यक्तित्व का उद्घाटन हुआ है: ’‘देवीदीन अभी आग सुलगा रहा था कि रमानाथ प्रसन्न मुख आकर बोला दादा, जानते हो, ‘प्रजा मित्र’ अखबार का दफ्तर कहां है? देवी-जानता क्यों नहीं हूँ। यहां कौन अखबार है जिसका पता मुझे न मालूम हो। ‘प्रजा मित्र’ का संपादक एक रंगीला युवक है, जो हरदम मुंह में पान भरे रहता है। मिलने जाओ, तो आंखों से बातें करता है; मगर है हिम्मत का धनी। दो बेर जेहल हो आया है।’’37

            इसी तरह रतन और जालपा के संभाषण भी ‘प्रजामित्र’ अखबार की स्थिति को उद्घाटित करते हैं। वस्ततुः जालपा ‘प्रजामित्र’ में शतरंज का एक नक्शा छपवाना चाहती है-’वहां तो प्रजामित्र की बड़ी चर्चा थी। पुस्तकालयों में अक्सर लोग उसी को पढ़ते नजर आते थे।’

’तो प्रजामित्र को ही लिखूंगी; लेकिन रुपए हड़पकर जाए और नक्शा न छापे तो क्या हो?’38

            इस प्रकार जालपा ‘प्रजामित्र’ अखबार में जब नक्शा छपवाती है, तो रमानाथ उस नक्शे का हल निकाल लेता है। तब जालपा के पास प्रजामित्र कार्यालय से पत्र और रमानाथ के हस्ताक्षर युक्त रुपयों की रसीद आती है: ‘प्रजामित्र कार्यालय का पत्र भी दिखाया। पत्र के साथ रुपयों की एक रसीद थी, जिस पर रमानाथ का हस्ताक्षर था।’’39 जालपा को रमानाथ से संबंधित मुकदमे का फैसला भी एक दैनिक समाचार पत्र के माध्यम से पता चलता है: ‘‘आज बड़े सवेरे घर के काम-धंधों से फुर्सत पाकर जालपा दैनिक पत्र वाले की आवाज पर कान लगाये बैठी थी, मानो आज उसी का भाग्य निर्णय होने वाला है। इतने में देवीदीन ने पत्र लाकर उसके सामने रख दिया। जालपा पत्र पर टूट पड़ी और फैसला पढ़ने लगी। फैसला क्या था, एक ख्याली कहानी थी, जिसका प्रधान नायक रमानाथ था। जज ने बार-बार उसकी प्रशंसा की थी।’’40 वस्तुतः रमानाथ को न्याय दिलाने में समाचार-पत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समाचार-पत्र ही जालपा और जोहरा का बयाना छापते हैं और इनके बयान पुलिस की बखिया उधेड़ देते हैं: ‘‘एक पत्र ने जालपा से मुलाकात की और उसका बयान छाप दिया। दूसरे ने जोहरा का बयान छाप दिया। इन दोनों बयानों ने पुलिस की बखिया अधेड़ दी।’’41

            इनके ‘कर्मभूमि’ उपन्यास के अमरकांत का राजनैतिक ज्ञान समाचार- पत्रों को पढ़कर ही विकसित होता है: ‘‘दैनिक समाचर-पत्रों के पढ़ने से अमरकांत के राजनैतिक ज्ञान का विकास होने लगा। देशवासियों के साथ शासक मण्डल की कोई अनीति देखकर उसका खून खौल उठता था। जो संस्थाएं राष्ट्रीय उत्थान के लिए उद्योग कर रही थीं, उनसे उसे सहानुभूति हो गई। वह अपने नगर की कांग्रेस कमेटी का मेम्बर बन गया और उसके कार्यक्रम में भाग लेने लगा।’’42 अमरकांत की सास रेणुका देवी भी अमरकांत से खबरें पढ़वाकर सुनती थी: ‘‘दैनिक समाचार और सामयिक साहित्य से भी उसे रुचि थी, विशेषकर इसलिए कि रेणुका रोज-रोज की खबरें उससे पढ़वाकर सुनती थी।’’43 अमरकांत की पत्नी सुखदा पति-पत्नी के बदलते रिश्तों और रूढ़ियों पर पत्रों में लेख लिखती है: ‘‘अब कोई इस भ्रम में न रहे कि पति चाहे जो करे उसकी स्त्री उसके पांव धो-धोकर पीयेगी, उसे अपना देवता समझेगी, उसके पांव दबायेगी और वह उससे हंसकर बोलेगा, तो अपने भाग्य को धन्य मानेगी। वह दिन लद गये। इस विषय पर उसने पत्रों में कई लेख भी लिखे है।’’44 इस उपन्यास के शांतिकुमार नगरपालिका की समस्या के निदान हेतु समाचार-पत्रों एवं व्याख्यानों द्वारा जनक्रांति करने पर बल देते हैं । इसीलिए तो वे सुखदा से कहते हैं: ‘‘अब तो समाचार-पत्रों और व्याख्यानों से आंदोलन करना होगा।’’45 इस उपन्यास के लाला समरकांत सुखदा से गांव की क्रांतिकारी गतिविधियों की खबर समाचार-पत्रों में छपने की बात कहते हैं: ‘‘अब तो वहां का हाल समाचार-पत्रों में भी छपने लगा।’’45

इनके ‘गोदान’ उपन्यास में पडित ओंकारनाथ का परिचय कथाकार ‘बिजली’ दैनिक पत्र के संपादक के रूप में देता है: ‘‘आप दैनिक पत्र ‘बिजली’ के यशस्वी संपादक हैं, जिन्हें देश चिंता ने घुला डाता है।’’46 इस उपन्यास में प्रेमचंद ने संपादक ओंकारनाथ के बहाने तत्कालीन समय में प्रकाशित होने वाले ‘स्वराज’, ‘स्वाधीन भारत’ और ‘हंटर’47 पत्र-पत्रिकाओं का भी उल्लेख किया है। संपादक ओंकारनाथ मजदूरों की हड़ताल आदि से संबंधित खबरंे अपने ‘बिजली’ पत्र में छापते हैं, यही कारण है कि मजदूरों के बीच उनके पत्र की लोकप्रियता बढ़ती जाती है: ‘‘ मिल में असंतोष के बादल घने होते जा रहे थे। मजदूर ‘बिजली’ की प्रतियां जेब में लिए फिरते और जरा भी अवकाश पाते, तो दो-तीन मजदूर मिलकर उसे पढ़ने लगते। पत्र की बिक्री खूब बढ़ रही थी। मजदूरों के नेता ‘बिजली’ के कार्यालय में आधी रात तक बैठे हड़ताल की स्कीमें बनाया करते और प्रातःकाल जब पत्र में यह समाचार मोटे-मोटे अक्षरों में छपता तो जनता टूट पड़ती और पत्र की कापियाँ दूने-तिुगने दाम पर बिक जाती।’’48

            इस प्रकार प्रेमचंद के उपन्यासों की पत्रकारिता विभिन्न समाचार पत्रों-पत्रिकाओं के संपादन एवं उनमें प्रकाशित होने वाले समाचार नोटिस आदि को व्यक्त करती है। इनके उपन्यासों में व्यक्त पत्रकारिता से पता चलता है कि आजादी से पूर्व के भारतीय समाचार- पत्र जनता एवं ब्रिटिश सरकार की गतिविधियों को प्रसारित करने का कार्य किया करते थे। ज्यादातर पत्रों में देशभक्ति और स्वदेश को महत्व दिया जाता था। प्रेमचंद के उपन्यासों में कमला, सरस्वती, जगत, हिंदुस्तान-रिव्यू, गौरव, आर्य-जगत्, प्रजा-मित्र बिजली आदि पत्रों के संपादन से संबंधित प्रसंग व्यक्त हुए हैं। इनके उपन्यासों में व्यक्त सरस्वती, हिंदुस्तान-रिव्यू, आर्य-जगत्, प्रजा-मित्र आदि पत्र तो प्रेमचंद के काल में प्रकाशित होते थे। सरस्वती, आर्य-जगत्, प्रजा-मित्र आदि पत्र तो भारतीय जनता को जागृत करने और उनकी आवाज को मुखरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे, जबकि हिंदुस्तान-रिव्यू एक अंग्रेजी दैनिक पत्र था। यह उच्च वर्ग में अधिक लोकप्रिय था।

संदर्भ सूची–

  1. मंगलाचरण, पृ0159
  2. वही, पृ0177
  3. वही, पृ0222
  4. वरदान, पृ098
  5. वही, पृ098
  6. वही
  7. वही, पृ0103
  8. सेवासदन, पृ0121
  9. वही, पृ0185
  10. वही, पृ0188
  11. वही, पृ0189
  12. प्रेमाश्रम, पृ083
  13. वही, पृ088
  14. वही, पृ089
  15. वही, पृ093
  16. वही, पृ0207
  17. वही, पृ0208
  18. वही, पृ0238
  19. वही, पृ0291
  20. वही, पृ0326
  21. वही, पृ0232
  22. रंगभूमि, पृ036
  23. वही, पृ078
  24. वही, पृ0134
  25. वही, पृ0207
  26. वही, पृ0284
  27. वही, पृ0368
  28. कायाकल्प, पृ014
  29. वही, पृ035
  30. वही, पृ040
  31. वही, पृ0197
  32. वही, पृ0195
  33. वही, पृ0195
  34. वही, पृ0196
  35. गबन, पृ011
  36. वही, पृ0116
  37. वही, पृ0127
  38. वही, पृ0129
  39. वही, पृ0151
  40. वही, पृ0165
  41. वही, पृ0225
  42. कर्मभूमि, पृ022
  43. वही, पृ021
  44. वही, पृ0142
  45. वही, पृ0181
  46. गोदान, पृ041
  47. वही, पृ052
  48. वही, पृ0222

डॉ. रामविलास शर्मा के पत्रों में विविध सामाजिक पक्ष:राहुल श्रीवास्तव

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डॉ. रामविलास शर्मा के पत्रों में विविध सामाजिक पक्ष

राहुल श्रीवास्तव, 
शोधार्थी (हिन्दी)
यूजीसी नेट, जे.आर.एफ.,
जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर (म.प्र.)
ई-मेल- rahul.shrivastava93@gmail.com
+91-9617425975

शोध–सार

            हिन्दी साहित्य के विकास की एक समृद्ध परम्परा रही है, जिसमें विविध विधाओं का विकास समयानुसार होता रहा है और उन साहित्यिक विधाओं में विभिन्न सामाजिक पक्षों का वर्णन किया गया है, जो साहित्यकार की लेखनी को सामाजिक दृष्टि से समृद्ध करता है। इसी क्रम में पत्र विधा भी हिन्दी साहित्य जगत में अपना विशिष्ट स्थान रखती है, जिसमें लेखक और उसके मित्रों के मध्य हुऐ सम्वाद जो विभिन्न विषयों से सम्बन्धित होते हैं, समाहित रहते हैं। हिन्दी साहित्य के अन्तर्गत डॉ. रामविलास शर्मा का पत्र–साहित्य अपना एक विशेष स्थान रखता है। उनके पत्रों में वे अपने मित्रों के साथ विभिन्न साहित्यिक विषयों के साथ–साथ सामाजिक और समसामयिक विषयों पर भी मंत्रणाएँ करते नजर आते हैं और इस आलेख के माध्यम से उन सामाजिक विषयों पर डॉ. रामविलास शर्मा की दृष्टि को समझने और उस विषय के सम्बन्ध में उनके सरोकार को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर डॉ. रामविलास शर्मा की बेबाक राय उनके पत्र–साहित्य में देखने को मिलती है।

बीज शब्द– पत्र, सामाजिक, मुद्दे, साहित्य, पक्ष।

शोध विस्तार–

                        हिन्दी साहित्य विभिन्न विधाओं के माध्यम से समृद्ध हुआ है। हिन्दी के साहित्यकारों ने विविध विधाओं के माध्यम से साहित्य सृजन के क्रम में अपनी लेखनी चलाकर हिन्दी साहित्य जगत को समृद्ध किया है। विविध विधाओं के माध्यम से विभिन्न सामाजिक पक्षों और मूल्यों को उजागर करने का प्रयास हिन्दी साहित्यकारों द्वारा किया  गया है। साहित्य समाज का दर्पण हैं यह बात अक्षरशः सत्य है, किन्तु जब हम पत्र-साहित्य की चर्चा करते हैं तो यह बात और भी पुष्ट हो जाती है क्योंकि साहित्य की अन्य विधाओं में साहित्यकार समाज के पक्षों पर अकेले ही दृष्टि डालता है और उसे समझ पाता है एवम् उसे लेखनीबद्ध कर देता है, किन्तु पत्र-साहित्य में इसका दूसरा स्वरूप उभरकर सामने आता है, क्योंकि पत्रों में विविध सामाजिक पक्षों पर, दो मित्रों के मध्य सहज सम्वाद होता है, जिसमें शब्दों का तालमेल और भावों की बनावट जैसा कोई पक्ष नहीं होता है वह तो सहज सम्वाद होता है, जिससे सामाजिक पक्ष स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आता है। इस दृष्टि से सामाजिक पक्षों के क्रम में पत्र-साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा के रूप में सामने आता है।

                        डॉ. रामविलास शर्मा के पत्र-साहित्य की अगर बात की जाए तो इन सब दृष्टियों से उनका पत्र-साहित्य हिन्दी साहित्य जगत में अपना एक विशेष स्थान रखता है क्योंकि वे जितने उच्च कोटि के विद्वान साहित्यकार थे, अपने सामाजिक जीवन में वे उतने ही सरल, सहज प्रकृति के थे और जब उनके पत्रों पर दृष्टि जाती है तो उनकी सामाजिक विषयों से सम्बन्धित उसी सरल सहज समझ जो हर व्यक्ति से सरोकार रखती है, दिखाई देती है। आज के समय में सामाजिक समरसता और सामाजिक विषयों के सम्बन्ध में मूल्यों का जो ह्रास हुआ है वह बहुत विचारणीय है। चूँकि साहित्य समाज में घटित होने वाली घटनाओं को तो दिखाता ही है, इसके साथ ही समाज को राह दिखाने का कार्य भी करता है। साहित्य की अन्य विधाओं में यह कल्पना के सहारे दिखाया जाता है, जबकि पत्र-साहित्य में यह सब सामाजिक समरसता और पारिवारिक मूल्य स्वयं लेखन और मित्रों के व्यक्तित्व और किसी पारिवारिक या मित्र के सम्बन्ध में उनके व्यवहार से दिखाई देता है और प्रेरणा देने का कार्य करता है। इसी तरह का सामाजिक समरसता और मित्रों के दुःख-दर्द बांटने वाला पक्ष डॉ. रामविलास शर्मा के पत्रों में देखने को मिलता है। वे केदारनाथ अग्रवाल को लिखे एक पत्र में इस विषय में लिखते है-

                        ‘‘यहाँ एक बहुत दुःखद घटना हो गई। 8 जनवरी की रात को स्वर्गीय बलभद्र दीक्षित जी के लड़के बुद्धिभद्र का भी देहान्त हो गया। खेतों में सर्दी लग जाने से निमोनिया हो गया था। केवल पांच दिन बीमार रहे। बीमारी की खबर पाकर में गया, लेकिन विलम्ब से पहुँचा भेंट न हो सकी। मौखिक सहानुभूति के बदले में चाहता हूँ कि उनके मित्र उनके परिवार के लिए कुछ मासिक बचाया करें, परन्तु इसका विज्ञापन न होना चाहिए। यह अपने मित्रों तक ही रहे।’’1

                        इस तरह के सामाजिक सहयोग के उदाहरण रामविलास शर्मा के पत्र-साहित्य में अनेक स्थान पर मिलते हैं। इस तरह की सामाजिक समरसता और सद्भाव की भावना जिसका कि आज के समय में मिलना दुर्लभ हो गया है। वह डॉ. रामविलास शर्मा के पत्रों में दिखती है। सामाजिक ताने-बाने के विविध पहलू होते हैं, जो समाज को जोड़कर रखते हैं। परिवार उनमें से सबसे महत्वपूर्ण पहलू के रूप में होता है। पारिवारिक सम्बन्ध ही वह आवश्यक अंग होते हैं। जो समाज को जोड़े रखने का कार्य करते हैं। डॉ. रामविलास शर्मा अपने पत्र-साहित्य में इस तरह के अनेक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जो पारिवारिक सम्बन्धों की सुदृढ़ता के माध्यम से समाज को जोड़ने का कार्य करते हैं। परिवार में होने वाले हर प्रसंग से अपने मित्रों को अवगत कराना और उनमें उनकी सहभागिता सुनिश्चित करना जैसे सुकृत्य सामाजिक और पारिवारिक समरसता के श्रेष्ठ उदाहरण के रूप में हमारे सामने आते हैं, जो वर्तमान समाज को एक स्वस्थ समाज के रूप में विकसित होने की ओर ले जाने का कार्य करते हैं। इसी तारतम्य में एक सन्दर्भ डॉ. रामवलिास शर्मा के पत्रों से उल्लेखनीय है, जिसमें डॉ. रामविलास शर्मा अपने मित्र केदारनाथ अग्रवाल को लिखते हैं-

                        ‘‘13/5 को सेवा का ब्याह है, सबसे पहले तुम्हें इस पत्र द्वारा सपरिवार आने के लिए निमंत्रण दे रहे हैं’’2

                        इस तरह का पारिवारिक सौहार्द विरले ही देखने को मिलता है। इसी तरह का एक और पारिवारिक प्रसंग देखने को मिलता है, जो रामविलास शर्मा के द्वारा सामाजिक और पारिवारिक सौहार्द और आपसी प्रेम के सम्बन्ध में दिखाने का कार्य करता हे। आज जहाँ समाज में सम्बन्धों में औपचारिकता का भाव आ गया है वहीं डॉ. रामविलास शर्मा जी अपने पत्रों के माध्यम से सम्बन्धों में औपचारिकता के भाव को समाप्त कर उसे नई ऊँचाईयाँ देने का कार्य करते हें, वे इस प्रसंग में केदारनाथ अग्रवाल को लिखते हैं ‘‘तुम्हारी बहन के विवाह में आने की कोशिश करूँगा। यद्यपि उस समय तुम्हें फुर्सत तो क्या होगी।’’3

                        इस तरह के सामाजिक और पारिवारिक सुदृढ़ता के सम्बन्ध डॉ. रामविलास शर्मा के पत्र-साहित्य में देखने को मिलते हैं।

                        राजनीति भी समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होती है और दोनों ही एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। या कहा जाए कि एक-दूसरे के पूरक होते हैं, तो ठीक ही होगा। डॉ. रामविलास शर्मा के पत्रों में कई जगहों पर राजनीतिक परिचर्चाएँ देखने को मिलती हैं, जो समाज में राजनीति के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव के सम्बन्ध में उनकी समझ को बताने का कार्य करते हैं। साहित्य जो कि समाज का एक महत्वपूर्ण अंग है। समाज के इसी अंग और दूसरे अंग राजनीति के सम्बन्ध में वे इस प्रकार लिखते हैं।

                        ‘‘मैंने सोचा है ‘हिन्दी साहित्य और राजनीति’ पर बोला जाए- ‘हिन्दुस्तानी राजनीति की कमजोरियाँ, क्या साहित्य उससे सहानुभूति रख सकता है ? और हिन्दी राजनीति के घातक प्रभाव से अपनी रक्षा कर साहित्य ने राजनीतिज्ञों के चलने के लिए एक स्वतंत्र और आत्म-सम्मान युक्त मार्ग छोड़ दिया है।’’4

                        राजनीति के सम्बन्ध में उसके अनेक पहलुओं के सम्बन्ध में पर्याप्त प्रकाश उनके पत्रों में डाला गया है। वे इस समय के राजनीतिक परिदृश्य को अपने पत्रों में चर्चाओं के माध्यम से स्पष्ट रूप से उजागर करते हैं और अगर उस समय राजनीतिक परिदृश्य और आज के परिदृश्य को समझने का प्रयास किया जाए तो बहुत हद तक सफलता मिलती दिखाई देगी। रामविलास शर्मा के मित्र केदारनाथ अग्रवाल अपने पत्र में इन्दिरा गांधी के सम्बन्ध में लिखते हैं जो उनके राजनीतिक चिन्तन को व्यक्त करता है।

                        ‘‘इन्दिरा गांधी को अभी जनता से पूरी वाकफियत नहीं है। वरना वह भी अपना विचार बदलतीं। देश की राजनीति और अर्थ नीति दोनों ही साधारण जन के लिए संकटमय हैं। भविष्य भयंकर लग रहा है।’’5

                        समाज में राजनीति के प्रभाव और सामाजिक तथा न्याय व्यवस्था पर उसके गलत प्रभाव के सम्बन्ध में भी डॉ. रामविलास शर्मा अपने मित्रों से विचार विमर्श करते नजर आते हैं। भृष्टाचार जो कि किसी भी समाज के लिए दीमक का कार्य करता है और वह उसकी जड़ों को खोखला कर देता है। इस विषय के सम्बन्ध में भी प्रकाश डाला गया है केदारनाथ अग्रवाल जो कि एक साहित्यकार के साथ ही बान्दा में वकील थे, वे राजनीति के दुष्प्रभाव के सम्बन्ध में लिखते हैं-

                        ‘‘मुकदमें में जैसी दृष्टि से तहकीकात करनी चाहिए वैसी तहकीकात दारोगा नहीं करते। इससे सफलता नहीं मिलती और अधिकतर अभियुक्त छूट जाते हैं, जो दोषी भी होते हैं। गवाहान् भी वैसे होते हैं, और झूठ का अम्बार लगा देते हैं। यहाँ भी कातिल आल्हा-ऊदल की परम्परा में अब भी काम करते हैं। अदालत में न्याय न पाकर लोग बाहर स्वयं न्याय कर लेते हैं। हत्याएँ होती रहती हैं। अदालत तो एक विशिष्ट प्रणाली और सिद्धान्त से काम करती है। इससे वह विवश होकर छोड़ती है।’’6

                        राजनीति के सम्बन्ध में इस तरह की धारणाएँ और विचार रामविलास शर्मा के पत्र-साहित्य में देखने को मिलती है, आर्थिक विषय भी समाज का एक महत्वपूर्ण पक्ष होता है और समाज के लिए इसकी भी अन्य विषयों के समान उतनी ही प्रासंगिता होती है। आर्थिक गतिविधियाँ समाज को ठीक उसी प्रकार प्रभावित करती हैं, जिस प्रकार अन्य। समाज लोगों से मिलकर बनता है और लोगों के जीविकोपार्जन के लिए आर्थिक पक्ष का मजबूत होना आवश्यक हो जाता है। डॉ. रामविलास शर्मा और उनके मित्रों के मध्य इस सम्बन्ध में कई तरह के विचार देखने को मिलते हैं। रोटी जीवन का एक आवश्यक अंग है और बिना रोटी के जीवन सम्भव नहीं है। अगर देखा जाए तो सारी आर्थिक गतिविधियाँ रोटी के लिए ही की जाती हैं। रामविलास शर्म के मित्र केदारनाथ अग्रवाल रोटी के महत्व को प्रतिपादित करते हुए लिखते हैं-

                        ‘‘रोटी के पैदा होते ही

                        बुझी आँख में जुगनू चमके

                        और थका दिल फिर से हुलसा

                        जी हाथों में आया

                        और होंठ मुसकाये

                        घर में मेरा वीरान वीरान पड़ा

                        आबाद हो गया।’’7

                        महँगाई भी आर्थिक पक्ष को उजागर करने का ही एक माध्यम है। महँगाई ही आम जन को सर्वाधिक प्रभावित करती है। अगर महँगाई के अनुपात में आय के स्त्रोतों में वृद्धि न हो तो आम जन किस तरह संघर्ष करता है, उसकी वानगी भी उनके पत्रों में देखने को मिलती है। राजनीति और अर्थनीति जब सुचारू रूप से नहीं चलती है तब ऐसी स्थिति में देश की हालत किस तरह की होती है इस सम्बन्ध में उनके पत्रों का यह सन्दर्भ अवश्य विचारणीय है, जिसमें डॉ. रामविलास शर्मा, केदारनाथ अग्रवाल को लिखते हैं-

                        ‘‘बाँदा में भी लोग गेहूँ, दाल-चावल के भाव की बातें करते होंगे। गल्ले की कमी हो सकती है, लेकिन माल होते हुए भी मिलता नहीं है, चोरी छिपे भले ही लोग ले आएँ दिन पर दिन हालत खराब होती जाती है। लड़ाई के जमाने से हमारा अर्थ तंत्र हर झटके के बाद कुछ सम्भलता है और उसके बाद दूसरा झटका पहले से तगड़ा लगता है। श्रीमती इन्दिरा गांधी लोगों को समझा रही हैं कि देश की उन्नति करने में ऐसा होता ही है। काँग्रेस से गाड़ी सम्भल नहीं रही है। राजनीतिक और आर्थिक संकट दोनों हैं। क्रान्तिकारी परिस्थिति में जब क्रान्ति नहीं होती तब क्रान्ति होती है। भविष्य कुछ ऐसा ही है।’’8

                        जिस प्रकार उस समय में भी महँगाई समाज का एक मुख्य आर्थिक विषय था उसी तरह आज भी बना हुआ है और उस समय भी इस विषय पर उसी प्रकार चर्चाएँ देखने को मिलती हैं, जिस प्रकार आज। रामविलास शर्मा के एक और अभिन्न मित्र अमृतलाल नागर के एक पत्र में भी इस गम्भीर आर्थिक पक्ष पर प्रकाश डालने का सार्थक प्रयास किया गया है।

                        ‘‘बड़ी महँगाई है रामविलास, हमें महाकाल याद आ रहा है। उसके चित्र चारों ओर डोल रहे हैं। महँगाई एक प्रश्न बन गई है।’’9

                        आर्थिक पक्ष समाज को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है और उसके प्रभाव के नकारात्मक प्रभाव हमें समाज में सहज ही देखने में सुलभ हो जाते हैं। जहाँ समाज का एक वर्ग आर्थिक रूप से बहुत ही सम्पन्न और सक्षम है वहीं दूसरा वर्ग आर्थिक रूप से बहुत ही विपन्न है और दो वक्त का खाना भी नहीं जुटा पाता है। ऐसी स्थिति में सम्पन्न वर्ग किस तरह से अपने आयोजनों में भोजन का अपव्यय करता है, जिससे रामविलास शर्मा और उनके मित्रों को जो पीड़ा होती है उसकी स्पष्ट झलक उनके पत्रों में देखने को मिलती है, जो उनके पत्रों के आर्थिक पक्ष को बहुत ही सुस्पष्ट रूप से हमारे सम्मुख रख देता है। वे इस तरह के फिजूलखर्ची के सम्बन्ध में एक पत्र में अपनी पीड़ा को दर्शाते हुए लिखते हैं-

                        ‘‘ब्याज बारात में जाने पर सभ्यता की नुमाईश देखने को मिलती हे। जी घिनाता है, हम पैसे वाले हैं, हमारे ठाठ देखो, महिलाओं की चमकदार साड़ियाँ देखो, दाल्दा में सना पकवान चखो, भीतर से सब खोखले।‘‘10

                        जिस प्रकार कहा गया है कि दरिद्रता सबसे बड़ा दुःख है। यह सर्वथा उचित है। अर्थ के अभाव में समाज की स्थिति बड़ी ही गम्भीर हो जाती है। इसी सन्दर्भ में डॉ. रामविलास शर्मा के पत्रो में पर्याप्त उदाहरण देखने को मिलते हैं जिनमें वे आर्थिक विपन्नता के दुष्प्रभावों से अवगत कराते प्रतीत होते हैं, जो आर्थिक पक्ष को समाज के प्रमुख पक्ष के रूप में प्रस्तुत करते हुए नजर आते हैं। अर्थ के अभाव में एक व्यक्ति की स्थिति किस तरह की हो जाती है, जिसकी झलक हमें निराला जी के सम्बन्ध में उनके एक पत्र में की गई चर्चा से पता चलता है।

                        ‘‘निराला जी की हालत पहले से बहुत खराब है, राशन वगैरह का प्रबन्ध करते नहीं हैं, साग उबालकर जब तब खा लेते हैं। बिना एक आदमी के उनके पास रहे उनका प्रबन्ध ठीक से नहीं हो सकता। मैंने रामकृष्ण को लिखा है कि वहीं रहें और उनकी देखभाल वही करें। रामकृष्ण अपने संगीत से कुछ कमा लेंगे लेकिन आरम्भ में उन्हें हमीं लोगों पर निर्भर रहना होगा। मैं चाहता हूँ कि तुम इस मद में मदद करो। पैसा यहीं भेजना।’’11

                        इस तरह की आर्थिक परिस्थितियों के सम्बन्ध में अनेक चर्चाएँ रामविलास शर्मा के पत्र-साहित्य में मिलती हैं, जो आर्थिक विषमता या परेशानी के समय में अपने लोगों की मदद के लिए प्रेरित करने हेतु प्रोत्साहित करते हैं।

                        लोक कलाएँ वर्तमान समाज को अपने समृद्ध अतीत से परिचित कराने का एक श्रेष्ठ माध्यम है जो विविध वर्गों को आपस में जोड़े रखती हैं और युवा पीढ़ी को अपने पूर्वजों द्वारा संग्रहित और संरक्षित श्रेष्ठ परम्परा से परिचित कराने का कार्य करती हैं। इसी श्रेष्ठ परम्परा के समाज के साथ जुड़ाव की व्याख्या रामविलास शर्मा के पत्र-साहित्य में कई स्थानों पर देखने को मिलती है, जो समाज को अपने अतीत पर गर्व महसूस कराने के पल प्रदान करती है और सामाजिक सद्भाव के ताने-बाने को बुनकर एक श्रेष्ठ समाज का निर्माण करते हैं। इसी सन्दर्भ में डॉ. रामविलास शर्मा केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं को लोक कला का स्वरूप मानते हुए लिखते हैं।

                        ‘‘तुम्हारी कविताओं में सबसे बड़ा गुण यह है कि वह लोक कला के इतने नजदीक है कि उसका एक अंग सा बन गई है। वह जनता द्वारा तुरन्त अपनाई जा सकती हैं और उसके जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकती है। इसलिए तुम बाबू लोगों की राय की चिन्ता न करके उन्हीं भूमिसुतों के लिए लिखो जिनके तुमने गीत गाए हैं।’’12

                        प्रकृति जिसकी गोद में समाज विकसित होता है और उससे सिर्फ लेता ही लेता है, भी समाज का एक प्रमुख पक्ष है, जिसकी रक्षा करना हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी है ताकि एक स्वस्थ प्रकृति की गोद में एक स्वस्थ समाज निर्मित हो सके। सुन्दर प्रकृति हमेशा से ही समाज को हर्षित करने वाली रही है। इसी सम्बन्ध में प्रकृति की सुन्दरता को व्यक्त करते हुए रामविलास शर्मा ने लिखा है-

                        ‘‘तुम यह भूल गए हो कि इस समय जमुना और जलधर दोनों ही आपा खोए एक तीसरे ही आनन्द में मग्न हैं। यह वही आनन्द है, जिसने धेनु, गोपी, ग्वाल, अंकुरित पुष्प, मदन और मनोज सभी को एक डोर में बांध दिया है। उसी डोर में जमुना और जलधर भी बन्धे हैं। फिर जलधरों को क्या पड़ी है, जो जमुना पर झुके वहां तो जमुना ही रात्रि की लैम्प बुझाती हुई कवि पत्नी की तरह उमंग रही है। जमुना और जलधरों की श्यामता के साथ पुंजों की हरीतिमा कैसी मिल गई है।’’13

                        डॉ. रामविलास शर्मा के मित्रों साथ सम्बन्ध अपने जीवन के अन्तिम वर्षों तक रहे और उन अन्तिम वर्षों तक हुए सम्वाद में अनेक सामाजिक सन्दर्भ से जुड़े परिवर्तनों को उन्होंने नजदीक से देखा। उसी की चर्चाएँ उनके पत्रों में विस्तृत रूप से अपने मित्रों के साथ साझा की गई है।ं समाज से सम्बन्धित हर पहलू पर चाहे वह आर्थिक हो, पारिवारिक हो, राजनीतिक हो, सभी पर नजदीक से दृष्टिपात किया गया है, उन्होंने समाज से सम्बन्धित हर विषय को छुआ और उस विषय पर अपने मित्रों के साथ विचारों का आदान-प्रदान किया। जो एक अमूल्य निधि के रूप में साहित्य में स्थापित हुआ और समाज के विविध पक्षों से अवगत कराया।

सन्दर्भ–

1-        सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-1, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 58, पत्र दि. 11.01.1943

2-        सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-2, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 137, पत्र दि. 17.04.1975

3-        सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-1, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 53, पत्र दि. 21.02.1940

4-        सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-1, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 52, पत्र दि. सितम्बर 1939

5-        सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-2, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 52, पत्र दि. 19.10.1964

6-        सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-2, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 49, पत्र दि. 22.07.1964

7-        सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-1, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 202, पत्र दि. 11.04.1958

8-        सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-2, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 52, पत्र दि. 07.10.1964

9-        सं.डॉ. विजय मोहन शर्मा, डॉ. शरद नागर, सन् 2013, अत्र कुशलं तत्रास्तु, किताब घर प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.सं. 110-111, पत्र दि. 09.09.1958

10-      सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-2, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 262, पत्र दि. 12.12.1988

11-      सं.डॉ. विजय मोहन शर्मा, डॉ. शरद नागर, सन् 2013, अत्र कुशलं तत्रास्तु, किताब घर प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.सं. 63, पत्र दि. 13.03.1946

12-      सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-1, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 128, पत्र दि. 17.01.1955

13-       सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-1, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 191, पत्र दि. 12.09.1957

नव वैश्विक युवाओं की संघर्ष गाथा ‘डार्क हार्स’

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नव वैश्विक युवाओं की संघर्ष गाथा ‘डार्क हार्स’

धर्मेन्द्र प्रताप सिंह
कक्ष संख्या-214, सिंधु ब्लॉक
केरल केन्द्रीय विश्वविद्यालय
dpsingh777@gmail.com

शोध सारांश :

            नीलोत्पल मृणाल का यह उपन्यास आज के युवाओं की अंतरगाथा है। पारिवारिक और सामाजिक दबाव में युवा किस तरह जकड़ा है, यह उपन्यास में बखूबी स्पष्ट किया गया है।  आज वैश्वीकरण के युग में आने वाली पीढ़ी की जरूरतें रोटी, कपड़ा और मकान तक सीमित न रहकर एक एलीट वर्ग की जीवन शैली अपना रही है जिसे उपन्यास में दिखाया गया है। एक नौकरी की आकांक्षा में आज का युवा अपने परिवार सहित सर्वस्व कुर्बान करने के लिए तत्पर है। इन्हीं समस्याओं को विवेच्य उपन्यास स्वर प्रदान करता है।

की–वर्ड :

            किस्सागोई, ग्लोबलाइजेशल, लोकलाइजेशन, अजनिबियत, चिरंजीवी, अप्रत्याशित, जोजिला दर्रे।

शोध विस्तार :

‘डार्क हार्स’ नीलोत्पल मृणाल का लघु उपन्यास है जिसमें आज की प्रतियोगी परीक्षा यू0पी0एस0सी देने वाले संघर्षरत पीढ़ी की जीवंत तस्वीर उकेरी गई है। यह कृति अपने कथ्य में देश के उन 60 फीसदी युवाओं को समेट लेती है जो पढ़ाई पूरी करने के बाद माँ-बाप के सपने आँखों में संजोकर स्वयं की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार हैं। उक्त कृति की महत्ता इससे भी सिद्ध होती है कि इसे साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार 2016 से सम्मानित किया जा चुका है। इस उपन्यास में रचनाकार ने सिविल परीक्षाओं की तैयारी करने वाले जितने भी सकारात्मक और नकारात्मक चरित्र हो सकते हैं, सभी को अपनी लेखनी द्वारा मूर्त रूप प्रदान कर पाठकों के सम्मुख उपस्थित किया है। कथानायक संतोष, मनोहर, रायसाहब, जावेद, विमलेन्द्र, पायल, विदिशा, मयूराक्षी, श्यामल, इलियास मियां, गोरेलाल यादव, भरत, प्रफुल्ल बटोहिया, गुरूराज सिंह, विरंची पाण्डे, दशरथ बाबू रितुपर्णो महापात्रा, गणपति महापात्रा आदि चरित्रों के माध्यम से कथा को आधार प्रदान किया गया है। कहानी के अंत में संतोष और विमलेन्द्र मनोहर जो कि बिहार का रहने वाला था, सिविल परीक्षाओं में असफलता के बाद मोतीहारी में सीमेंट व्यवसायी के रूप में प्रतिष्ठा पाता है।

उपन्यास के प्रारंभ में ही बिहार कैडर के आई0ए0एस0 मिथिलेश मिश्रा उपन्यास के संदर्भ में अपनी सटीक राय रखते हैं जिससे मैं सौ फीसदी पूरी तरह सहमत हूँ कि- ‘‘डार्क हार्स का कथानक मात्र एक कल्पना न होकर सिविल सेवा की तैयारी कर रहे छात्रों में हर एक की आत्मकथा है, जिसमें तैयारी से जुड़ा हर एक पहलू चाहे कोचिंग हो या अखबार या टिफिन का डिब्बा या नेहरू विहार, सब कुछ अपने को बेबाक तरीके से हमारे सपने की पृष्ठभूमि में खोलकर रख देता है।’’ (डार्क हार्स, पृष्ठ-9)

            उपन्यास में यदि कथानायक की बात की जाय तो संतोष का चरित्र भले ही आगे आता है लेकिन दिल्ली का मुखर्जी नगर ही विवेच्य उपन्यास का नायक है जो अपने अतःस्थल में कच्चामाल लेकर देश के सर्वोच्च पद को संभालने वाले कैडर तैयार करता है। विनायक सिन्हा संतोष के पिता हैं जो मध्यवर्गीय ग्रामीण परिवार के हैं और उन अभिभावकों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो अपने बच्चों को आज के भूमण्डलीय समाज में एक सम्मानजनक नौकरी पाने का सपना अपनी आँखों में संजोकर रखते हैं। इसके साथ ही गाँवों में रहकर खेती-किसानी से आजीविका चलाने वाले को अपने परिवार का पालन-पोषण करने वाले अभिभावकों का संघर्ष भी परिलक्षित होता है। हमारे देश में विशेषकर हिंदी पट्टी क्षेत्र में पिता तब तक अपने बेटे को गले नहीं लगाता जब तक कि वह खुद कमाने न लगे। उपन्यासकार बाप-बेटे के इस रिश्ते के संदर्भ में लिखता है कि- ‘‘असल में एक सिविल अभ्यर्थी और बेटे और बाप के बीच रिश्ते का आधार इन्हीं दो परम सत्य के आस-पास मंडराता है। पिता पैसे को लेकर निश्चिन्त करता है और बेटा परिणाम को लेके। बेटे को खर्च चाहिए और पिता को परिणाम।’’ (डार्क हार्स, पृष्ठ-15)

संतोष की माँ का चरित्र विनायक बाबू की भांति ही मध्यवर्गीय परिवार की माँ का प्रतिनिधित्व करता है जिसकी पलके बेटे के सपने के साथ खुलती और बंद होती हैं। वह अपने बेटे के खर्च के लिए अपने जेवर तक गिरवी रखकर पति से लड़ने को सदैव तैयार रहती है- ‘‘देखना उदास मत होना, खूब पढ़ना बढ़िया से, यहाँ का चिन्ता एकदम नहीं करना, खर्चा के भी मत सोचना, सब भेजेंगे पापा, तुम बस जल्दिए खुशखबरी देना।… माँ का गला भर आया और आँसुओं की धार फूट पड़ी, जो माँ ने घंटों से रोके रखा था और इन आंसुओं में भी एक खुशी थी, एक उम्मीद थी। आखिर बेटे के भविष्य का सवाल था। कलेजे पर पत्थर रखना ही था।’’ (डार्क हार्स, पृष्ठ- 14) इसी प्रकार जावेद की माँ का चरित्र भी उपन्यास में महत्त्वपूर्ण है जो पति के न होते हुए भी बेटे की तैयारी के लिए अपनी जमीन बेचती चली जाती है और बीमारी में अपना इलाज तक नहीं करवाती। किसी भी बेटे के लिए इससे बुरा और क्या हो सकता है कि वह अपनी माँ के अन्तिम दर्शन भी नहीं कर पाता। जावेद जैसे चरित्र को गढ़कर उपन्यासकार ने युवाओं के सामाजिक और पारिवारिक संघर्ष को जीवन्तता प्रदान की है। कथाकार ने अपने चरित्रों को इतने सलीके से गढ़ा है कि वे सीधे पाठकों के अंतःकरण में प्रवेश कर जाते हैं। जावेद के माध्यम से एक उदाहरण देखिए- ‘‘जावेद खान मूलतः बिहार के छपरा जिले के एक गाँव महादेवपुर का रहने वाला था। पढ़ाई में बचपन से अव्वल था। जब इंटर में था तब पिता चल बसे। बचपन में ही पिता चल बसे। कुछ खेती लायक जमीन थी। उसी के भरोसे पहले छपरा से स्नातक किया और फिर सिविल की तैयारी के लिए जिन्दगी का एक जुआ खेलने दिल्ली आ गया।’’ (डार्क हार्स, पृष्ठ-106) गोरलाल यादव आजमगढ़ का रहने वाला था। कभी न छूटने वाला गहरा पक्कका रंग, पांच फीट पांच इंच की लम्बाई, आँखों में रेगिस्तान वाली प्यास, होठों से लगतार टपकती चाहत, काम भर सर पर बाल, सामने दो दाँत के बीच जोजिला दर्रे जैसा फासला, कुल मिलकर उसका व्यक्तित्व लोगों को एक नज़र में आकर्षित जरूर करता था कि आखिर ये आदमी कौन है। (डार्क हार्स, पृष्ठ- 116)

प्रतियोगी परक्षाओं की तैयारी करने वाला छात्र समाज के पढ़े-लिखे वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है लेकिन जी-तोड़ मेहनत के बावजूद जब उसे सफलता नहीं मिलती तो वह तनाव में आ जाता है। इस तनाव के संदर्भ में न वह अपने परिवार से कह पाता है और न ही गुरूजनों से। लेकिन उसका यह तनाव संतोष के इस कथन में साफ-साफ दिखाई देता है- ‘‘बहुत चूतिया फील्ड है यूपीएससी, पढ़ कर मर गये साला पर पीटी नहीं हुआ।’’ (डार्क हार्स, पृष्ठ- 147) इसी प्रकार यूपी में ‘झटुआना’ आदमी के खिन्न होने की चरम अवस्था को कहते हैं। यह शब्द अवसाद के समय में प्रयुक्त किया जाता है। शब्दों को लेकर थोड़ी अपत्ति जरूर की जा सकती है लेकिन आज भूमण्डलीकरण के युग में जब हम ग्लोबलाइजेशल से लोकलाइजेशन की ओर बढ़ कर अपनी छोटी-छोटी अस्मिताओं के लिए जूझ रहे हैं तो हमें इन शब्दों को किसी न किसी रूप में स्वीकार करना पडे़गा क्योंकि युवा पीढ़ी में ऐसे शब्द स्वीकार किए जा चुके हैं।

            लेखक द्वारा उठाई गई पृष्ठभूमि देश के ऐसे सभी स्थानों पर देखी जा सकती हैं जहाँ प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्र रहते हैं। कथा को मुखर्जी नगर या दिल्ली तक समेट देना रचना का दायरा सीमित कर देगा। युवा कथाकार नीलोत्पल मृणाल ने इस उपन्यास में भाषा बड़ी ही चुटीले और सहज अंदाज में प्रस्तुत की है जिसे इस उदाहरण के माध्यम से देखा जा सकता है- ‘‘पीटी के प्रेशर से पूरा मुखर्जी नगर उबल रहा था। हर कान से भांप निकल रही थी और हर दिमाग की सीटी बजी हुई थी। आखिर वो दिन आ गया, जिसके लिए लाखों विद्यार्थी देश के कोने-कोने से यहाँ आते थे। आज पीटी का एग्जाम था। किसी के लिए कयामत का दिन तो किसी के लिए जिंदगी को बदलने के लिए शुरूआत का दिन। छह बजे सुबह ही बत्रा पर अपने-अपने सेंटर पर जाने वालों की इतनी भीड़ थी मानो माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने रामलीला मैदान में मजदूरों की रैली रखी हो। (डार्क हार्स, पृष्ठ-114)

            युवाओं पर पड़ने वाला पारिवारिक और सामाजिक दबाव उन्हें अवसादग्रस्त बना देता है। हमारी युवा पीढ़ी किस तनाव और दबाव में जीवनयापन करती है, रायसाहब के चरित्र के माध्यम से देखा जा सकता है। उन पर घर वापसी के साथ-साथ शादी का दबाव भी बढ़ रहा था। गुरु ने संतोष के संदर्भ में कहा कि ‘‘डार्क हार्स मतलब, रेस में दौड़ता ऐसा घोड़ा जिस पर किसी ने भी दांव नहीं लगाया, जिससे किसी ने जीतने की उम्मीद न की हो और वही घोड़ी सबको पीछे छोड़ आगे निकल जाए। वही ‘डार्क हार्स’ है मेरे दोस्त। संतोष एक अप्रत्याशित विजेता है। मैंने तुम्हारे आने से पहले श्यामल सर और हर्षवर्द्धन सर दोनों को काल लगाया था। संतोष लगातार इन दोनों के संपर्क में था। पीटी हाने के बाद ही उसने अपना कमरा संत नगर की ओर ले लिया था। उसने सर स अनुरोध किया था कि उसके बारे में किसी को कुछ न बतायें। जो भी हो किस्मत पलट दी उसने, भाग्य को ठेंगा दिखा कर अपनी मेहनत से अपनी तकदीर खुद गढ़ ली इसने भाई।’’ (डार्क हार्स, पृष्ठ-159)

प्रतिष्ठित महिला कथाकार चित्रा मुद्गल इस उपन्यास पर अपनी राय रखते हुए कहती हैं कि- ‘‘अपने पहले ही उपन्यास में नीलोत्पल ने बड़ा साहस दिखाते हुए बेबाकी से यथार्थ की तलछत को कुदेरते हुए एक ऐसी दुनिया का सच लिखा है, जिस पर पहले कभी इतना नहीं लिखा गया। ये भोगे गये यथार्थ का दस्तावेज है। एक ऐसी रोचक और बौद्धिक दुनिया की गर्म भट्टी का सच लिखा, जिसमें कई लोग तप कर सोना हो जाते हैं तो कई जल कर खाक। ‘डार्क हार्स’ अंधेरे रास्ते से हो कर उजाले तक का सफर है। नीलोत्पल की भाषा में रवानगी है, व्यंग्य में धार है, संवादों में संवेदना के गहरे उतार-चढ़ाव हैं। किस्सागोई का अपना अलग अंदाज है, जो पाठकों को पढ़ाने के लिए मजबूर करता है।’’ (डार्क हार्स- फ्लैप)।

            रचनाकार ने देश की परंपरागत शिक्षा प्रणाली की नाकामियों को उजागर करता है। संतोष ऐसी ही शिक्षण पद्धति में अध्ययन कर सिविल परीक्षाओं की तैयारी करने दिल्ली पहुँचता है जिसमें उसे आधारभूत ज्ञान ही नहीं दिया जाता- ‘‘आज के समय जब देश में आयोजित किसी भी क्षेत्र की प्रतियोगिता परीक्षा में विज्ञान, तकनीक, गणित और अंग्रेजी का महत्त्व बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया जाने लगा था ऐसे में इन विश्वविद्यालयों से इतिहास, राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, दर्शनशास्त्र जैसे विषयों को लेकर पढ़े छात्रों की डिग्री बस शादी के कार्ड में जिक्र करने के काम आती है। अन्यत्र कहीं नहीं। जैसे चिरंजीवी फलना, बीए, एमए, एमफिल, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी।’’ (डार्क हार्स, पृष्ठ-151) हमारे देश की शिक्षा प्रणाली हमेशा से ही प्रश्नों के घेरे में रही है। प्रसिद्ध कहानीकार उदय प्रकाश अपनी कहानी ‘मैंगांसिल’ में शिक्षा की खामियों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि इस देश में ज्यादा पढ़े-लिखे लोग कम पढ़े-लिखे लोगों के नौकर या गुलाम होते हैं औ हमारे स्कूल और कालेज नौकर पैदा करने के कारखाने हैं। अमेरिका, जापान, फ्रांस जैसे देशों हम उन सिद्धांतों की नकल कर रहें हैं जो हमारे अनुकूल नहीं हैं लेकिन वहाँ की शिक्षा पद्धति को हम नहीं उठा पा रहे हैं। हमारे युवाओं को दक्षतापूर्ण शिक्षा की आवश्यकता है जिससे वे अपने लिए रोजगार और आजीविका चला सकें। हमारे देश के युवाओं की अधिकतर ऊर्जा और उम्र पुस्तकीय ज्ञान में ही निकल जाती है और जब उनका ज्ञान और अनुभव समाज को फायदा पहुचाने लायक होता है तो उनमें नया करने का उत्साह खत्म हो जाता है। शिक्षा पद्धति की एक खामी यह भी है कि हमारे देश में विद्यार्थी का सम्पूर्ण अध्ययन जिस क्षेत्र का होता है प्रायः नौकरी उससे इतर किसी अन्य क्षेत्र में मिल जाने से सेवा क्षेत्र में कुशलता नहीं मिल पाती। छात्रों की आधरभूत शिक्षा ही कमजोर होती है जिसे रायसाहब के इस कथन में देखा जा सकता है- ‘‘अभी छह महीने खुद से कमरे पर एनसीआरटी की किताबे पढ़ लें फिर कोई कोंचिंग ज्वाइन करें।’’ (डार्क हार्स, पृष्ठ-40)

            आज के समय में कोचिंग सेंटरों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है जो हमारी शिक्षण व्यवस्था की खामियों की ओर इशारा करती है। देश में अधिकतर प्रतियोगी परीक्षाओं के पाठ्यक्रम स्नातक स्तर के ही होते हैं। यह बात सोचनीय है कि छात्र स्नातक करने के बावजूद उसी स्तर की परीक्षाओं में सफलता के लिए कोचिंग सेंटर का सहारा लेता है और माँ-बाप की कठिन कमाई लुटाता है। रायसाहब का आईएएस का प्रयास खतम हो चुका था, पीसीएस भी नहीं हो पा रहा था। घर से वापसी के साथ-साथ शादी का दबाव भी अब बढ़ने लगा था। रायसाहब ने बीएड कर रखा था और मास्टरी का फार्म डाल आये थे।

            कथाकार ने उपन्यास में यह भी दिखाने का प्रयास किया है कि आज के युवाओं में संवदेनाएँ किस तरीके से मर चुकी हैं। लड़के-लड़की के बीच विकसित होने वाले सम्बन्ध उपयोगिता पर ही केन्द्रित होकर रह गये हैं। लड़कियाँ उन्हीं को पसन्द करती हैं जो उनके लिए परीक्षा सम्बन्धी नोट्स तैयार कर दे सकें और नोट्स मिलने के बाद वे दूध में पड़ी मक्खी की भांति लड़कियों द्वारा बाहर कर दिए जाते हैं। लड़के भी इसके लिए पूरी तरह तैयार रहते हैं। गुरू और मयूराक्षी के बीच कुछ इसी तरह का सम्बन्ध विकसित होता है जहाँ न तो प्रेम है न ही दोस्ती जैसा कोई रिश्ता।

निष्कर्ष :

            1991 में भारत द्वारा अपनाई गई उदारीकरण की नीति को वैश्विक परिवर्तन का मूल आधार माना जाता है और समय उससे काफी आगे निकल चुका है। आज के नव-वैश्विक युग में समस्याओं का अंबार दिखाई दे रहा है। हमारे देश की युवा जनसंख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है। लेकिन पर्याप्य संसाधन, दिशा-निर्देश और रोजगार के अभाव में हम अपनी युवा शक्ति का सम्यक उपयोग नहीं कर पा रहे हैं जिससे बेरोजगारों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है और बिना काम के युवा अवसादग्रस्त हो रहे हैं। वे पारिवारिक और सामाजिक जीवन में अजनिबियत के शिकार हो रहे हैं। विवेच्य कृति में इसी बिन्दु को युवा रचनाकार नीलोत्पल मृणाल ने स्वर प्रदान करने का प्रयास किया है।

संदर्भ सूची :

डार्क हार्स- नीलोत्पल मृणाल, शब्दारंभ प्रकाशन, संस्करण- 2015

Comparative Study of HDFC Bank and SBI:Mr. Anilkumar Nirmal,

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Comparative Study of HDFC Bank and SBI

Mr. Anilkumar Nirmal
Ph.D Scholar,Parul
Institute of Management & Research,
Faculty Of Management ,
Parul University, Vadodara, Gujarat -391760
Adjunct Faculty,Faculty of Commerce,
Parul University, Vadodara, Gujarat -391760
dranilkumarnirmal@gmail.com


Dr. Purvi Derashri
Associate Professor,
Faculty of Commerce,
Parul Institute of Commerce
Parul University, Vadodara, Gujarat - 391760
purvi.derashri@paruluniversity.ac.in

Abstract:  In the current scenario in June, 2020 if we think about the two largest of banks of India one from the private segment and other from the public sector segment, there is no doubt about it being HDFC Bank from the Private sector and SBI from the Public sector looking at their balance sheet, reach and customer base. In the private banking space HDFC Bank is one of bank large bank having more than 5,000 branches across the country and most commercially successful bank with net profit 21078 crores being the highest across the banking industry with lowest Gross NPAs below 2% for the FY 2018-19. At the same time if we look at the SBI which is most prominent public sector bank in the public sector space and oldest bank of India with more than 200 years background doing better as compare to its peer public sector banks but not as good as it’s private sector peers in different parameters like profitability, NPAs management, annual growth and key parameter management. However bank has managed to post the net profit of 862.23 crores in the fiscal 2018-19.

Key Words: HDFC Bank, SBI, Gross NPAs, Net Profit, PCR, CAR

  1. Introduction of NPA

 NPA is in limelight since last 2015 and from almost 4 year now as the government has started observing the defaulters and once started focusing on the bank’s profitability and employee productivity. PNB has also been in limelight due to some wrong reasons but after that they have come out very strongly from there.

Below is the regulator guidelines and guidance on about the NPAs,

An asset, including a leased asset, becomes non-performing when it ceases to generate income for the bank.

A non performing assets (NPAs) is a loan or an advance where;

  • Interest and/ or installment of principal remain overdue for a period of more than 90 days in respect of a term loan,
  • the account remains ‘out of order’, in respect of an Overdraft/Cash Credit (OD/CC),
  • Thebillremainsoverdueforaperiodofmorethan90daysinthecaseof bills purchased and discounted,
  • The installment of principal or interest thereon remains overdue for two crop seasons for short duration crops,
  • the installment of principal or interest thereon remains overdue for one crop season for long duration crops,
  • The amount of liquidity facility remains outstanding for more than 90 days, in respect of a securitization transaction undertaken in terms of guidelines on securitization dated February 1, 2006.
  • In respect of derivative transactions, the overdue receivables representing positive mark-to-market value of a derivative contract, if these remain unpaid for a period of 90 days from the specified due date for payment.

In case of interest payments, banks should, classify an account as NPA only if the interest due and charged during any quarter is not serviced fully within 90 days from the end of the quarter.

2.1 ASSET CLASSIFICATION

Type of NPAs

Banks are required to classify non-performing assets further into the following three categories based on the period for which the asset has remained non-performing and the reliability of the dues:

  • Substandard Assets
  • Doubtful Assets
  • Loss Assets

2.1.1 Substandard Assets

With effect from March 31, 2005, a substandard asset would be one, which has remained NPA for a period less than or equal to 12 months. Such an asset will have well defined credit weaknesses that jeopardize the liquidation of the debt and are characterized by the distinct possibility that the bank will sustain some loss if deficiencies are not corrected.

2.1.2 Doubtful Assets

With effect from March 31, 2005, an asset would be classified as doubtful if it has remained in the substandard category for a period of 12 months. A loan classified as doubtful has all the weaknesses inherent in assets that were classified as sub- standard, with the added characteristic that the weaknesses make collection or liquidation in full, – on the basis of currently known facts, conditions and values –highly questionable and improbable.

2.1.3 Loss Assets

A loss asset is one where loss has been identified by the bank or internal or external auditors or the RBI inspection but the amount has not been written off wholly. In other words, such an asset is considered uncollectible and of such little value that its continuance as a bankable asset is not warranted although there may be some salvage or recovery value.

  1. Literature Review

 

Research on the banking sector in India or Public sector banks or private sector banks or group of banks are published. We found some of the related paper for the study purpose and we have anlysed them. Research paper alone on PNB is not found but few papers were found where PNB was one of the integral part of study,

3.1       Avani Ojha and Hemchandra Jha, has done the study on impact of NPAs on working of the SBI and PNB by using the different research methods and tested the hypothesis from the complete study they have concluded that NPAs are contributing significantly. NPAs have huge impact on the profitability of banks as they majorly related to the productivity, profitability and asset liability management of the banks. NPAs are the result of under recovery or non-recovery of asset within certain period of time. They have recommended the constant analysis of NPAs by the banks purpose wise, borrower wise, region wise etc. there should the methods and proper examinations of the borrowers before sanctioning the credit. Information on the financial position should be analyzed (Avani Ojha, 2018) extensively.

 

3.2 Dr.  Ganesan and R. Santhanakrishnan has did the study on NPAs of state Bank of India for the duration of 2002-03 to 2011-12 by keeping the objective of deployment of funds, examining gross NPAs, investigate the impact of NPAs, measures to be suggested to control the NPAs. They have tested the hypothesis by calculating the mean and standard deviation and concluded the result on the mentioned objectives. They have concluded that banking industry has undergone many fold changes after the first phase of economic liberalization and due to this importance of credit management emerged. NPAs have increased with the economic growth and aggressive lending of the banks. After some default banks also become the cautious and government has taken the measures and ultimately it looks quite in control so far.

 

3.3 Manisha Raj, Aashita Jain, Shruti Bansal, Tanya Verma has done the study on NPAs and conducted the “A comparative study of SBI & ICICI Bank from 2014-17”. They have majorly done the study on NPAs and to check the trend of NPAs in 4 years from 2014-17 of SBI and ICICI Bank. Also they have compared the total advances, net profit, gross NPAs and net NPAs of SBI and ICICI Bank. Also during the study, they have checked for a linear relationship in net profit and net NPAs in both the banks. They have concluded after study that management of NPAs is daunting task for every bank in the banking industry. After the study of figures for the given years it is found that it seems biggest challenge as far as liquidity is concern for both the banks as NPAs has increased and profitability has gone down. Even though SBI having higher NPAs than the ICICI Bank. As SBI is public sector bank, it is more vulnerable to give up the returns if the loans extended to general public. In the case of ICICI Bank their study found that there is no major profit or loss has been declared but the NPAs are settled against the profitability of the bank from time to time. In case SBI situation is worse as losses have increased due to increasing NPAs.

3.4 Swathi.M.S, Sridhar.K , has did the study of NPAs from year 2006-07 to to 2012-13 to analyze the ways in which NPAs can be fixed for the public sector, private and other categories of the banks. They have majorly used the secondary data released by the banks at the quarter end and at the year end and the RBI annual report. From the data extracted from secondary sourced they have took the net and gross NPAs to analyze and to find the fact and figures. They have majorly studies the cause and factor affecting the NPAs. The main point in the central light was willful default by the customers of the banks. Other reasons they found of the default was lenient lending norms, industrial crises, diversification of the funds, higher leverage and borrowing cost, sudden capital market downfall. Also remedies are suggested by them for the problems are in terms of Lok Adalat, Enactment of SARFAESI Act, Asset Reconstruction Company, Corporate debt restructuring etc.

 

  1. The Design of Study and Research methodology

4.1 Need for the Study

NPAs are the big challenges for the banking system in entire world. As far as Indian banking system perspective NPAs has grown drastically in last few years since year 2014. There are number of reasons for this but foremost reason being the prevailing transparency now days in the system since then 2014. Total NPAs has reached more than 10.25 lakhs crores and it was became the matter of concern for the banks. There for different studies has been conducted on the same. HDFC Bank is one of most prominent private sector bank who has managed the best NPAs ratios and SBI is one of public sector bank who has maintained the better asset class as compared to its peers so here we are comparing both the banks.

4.2 Statement of Problem

Definition of NPAs has been changes in India from time to time and hence NPAs in India in banking sector has also been changes in increasing order. Since many years NPAs has been seen as big monster in every corporate for different good reasons for which one of the reason being more transparency taken in to the picture especially in banking. To study these dynamic changes in NPAs for different banks become very important and we have chosen the HDFC Bank and SBI for the study purpose for being these banks most prominent and best in their category.

Present study has focused on the different component like CAR, Gross Profit, and PCR by keeping NPAs ratios in the central for the study of non-performing assets of Punjab National Bank.

4.3 Scope of the study:

The scope of the study is to analyze the HDFC Bank and SBI for the duration of 2010 to 2019.

4.4 Objectives:

  1. To analyze NPAs correlation of HDFC Bank to CAR, PCR and net profit.
  2. To analyze NPAs correlation of SBI Bank to CAR, PCR and net profit.
  3. To compare the HDFC Bank and SBI’s ratios to understand their neck to neck standing.

4.5 Methodology:

Methodology describes the research route to be followed, the instruments to be used, universe and sample of the study for the data to be collected, the tools of analysis used and pattern of deducing conclusions.

For the purpose of the study, we will collect the required data from the Annual reports of Punjab National Banks which published every year and half yearly report of current year. The study is based on secondary data. To supplement the data, the researcher elicits other relevant data available from the annual reports of PNB.

4.5.1. The Sample:

The universe of the study consists of all the different ratios and variables of HDFC Bank and SBI for the study purpose. Here, research has been done on HDFC Bank and SBI’s correlation analysis of their ratios and comparative study of both banks.

4.5.2. Period of the study:

The study has been carried out from 2010 to 2019. The study is based on secondary data.

4.6 Data collection tool and techniques

As per the nature of study following tools and techniques are used for testing the hypotheses,

  • Tools – Ratio Analysis, Excel
  • Statistical Techniques – Mean, Standard deviation and T – test, Correlation Analysis

4.7 Data Analysis

The Data analysis is the core of the research. Scientific methods are been used now a days to get the output or study made authentic and can also suffice the purpose what the study meant for. The collected data now a day’s analyzed by using the Microsoft excel with the inbuilt formulas and helpful to researchers as well.

To reach certain relevant results, the data collected from all resources have been tabulated, analyzed and interpreted with the help of appropriate statistical techniques. In order to analyze the data and draw conclusions in this study, various statistical tools like Excel. The study is confined to a period of ten years that is from 2010 to 2019.

4.8 Limitations of the study:

The present study has the following limitations such as,

  1. Comparison is restricted to the HDFC Bank and SBI only.
  2. The study is based on secondary data as published in various publications of RBI and other reports. These data are based on historical accounting concept.
  • The study, as limitations, is confined only to the selected and restricted indicators and the study is confined only for a period of ten years.

 

  1. Data Analysis and Interpretation

As below mentioned data is collected from the different sources mentioned in the references section like RBI website, Annual reports of Banks etc. below mentioned belongs to HDFC Bank and State bank India and also ratios collected from the annual reports are shown in the below table.

 Figures in Cr

Years

Gross NPAs

CAR

Net Profit

PCR Ratio

HDFC BANK

2010

1.43

17.44

2948

78.42

HDFC BANK

2011

1.05

16.22

3926

82.51

HDFC BANK

2012

1

16.52

5167

82.38

HDFC BANK

2013

0.95

16.8

6726

79.91

HDFC BANK

2014

0.91

16.1

8478

72.57

HDFC BANK

2015

0.89

16.8

10216

73.93

HDFC BANK

2016

0.25

15.5

12296

69.94

HDFC BANK

2017

1.04

14.6

14550

68.67

HDFC BANK

2018

1.28

14.8

17487

69.78

HDFC BANK

2019

1.35

17.1

21078

71.36

SBI

2010

3.05

13.39

9166

59.23

SBI

2011

4.44

11.98

8265

64.95

SBI

2012

5.3

13.86

11707

68.1

SBI

2013

4.75

12.92

14105

66.58

SBI

2014

4.95

12.44

10891

62.86

SBI

2015

4.25

12

13102

69.13

SBI

2016

6.5

13.12

9951

60.7

SBI

2017

6.9

13.11

10484

65.95

SBI

2018

10.91

12.6

-6547

66.17

SBI

2019

7.53

12.72

862

78.73

 

            Above table shows the data of HDFC Bank and State bank of India for the analysis purpose. From the above data there are the 3 kind of correlation analysis we are performing. First is the both banks common correlation analysis and other 2 analysis we are doing is there individual analysis.

5.1 Correlation analysis of variables with Gross NPAs of both the Banks

 

Gross NPAs

CAR

Net Profit

PCR Ratio

Gross NPAs

1.00

   

CAR

-0.77

1.00

  

Net Profit

-0.45

0.08

1.00

 

PCR Ratio

-0.45

0.68

-0.30

1.00

 

As per the correlation study of the both the banks together we can see that Capital adequacy ratios to gross NPAs seems to be negative and showing the negative strength of association. This shows that there is strong inverse relationship between both the variables if we look at the case of Gross NPAs to Capital Adequacy ratios. In the another variable Gross NPAs to Net profit analysis of both banks shows that strength of association is negative between both the variables. This shows that both share the inverse relationship to each other however it is not stronger like CAR. Gross NPAs to PCR ratios analysis of correlation shows that both share the negative strength of association. This shows that once the gross NPAs of the bank are increasing maintaining the PCR ratios becomes the challenges for the bank and hence showing the negative strength of associations.

If we look the CAR to net profit it shows the both share the week positive strength of association, this means both having the similar set of association to each other. Also to maintain the CAR it is necessary to have profits with banks. Also CAR and PCR are showing the positive strength of association to each other. This shows that both the variables requirement of maintenance is same. This means if one banks is able to maintain CAR then it is also able to maintain the PCR ratios.

Net profits to PCR ratios are showing the negative correlation to each in the case to both banks if we put them together to study. It shows that net profits are hampered to maintain the PCR ratios.

5.2 Correlation Analysis of HDFC Bank

 

Gross NPAs

CAR

Net Profit

PCR Ratio

Gross NPAs

1.00

 

 

 

CAR

0.30

1.00

 

 

Net Profit

0.07

-0.41

1.00

 

PCR Ratio

0.17

0.59

-0.82

1.00

 

As per the correlation study of HDFC Bank the bank, we can see that Capital adequacy ratios to gross NPAs seems to be weak positive and showing the positive strength of association. This shows that there is similar relationship between both the variables if we look at the case of Gross NPAs to Capital Adequacy ratios. In the another variable Gross NPAs to Net profit analysis of both banks shows that strength of association is neutral between both the variables. This shows that both share the no association to each other. This shows HDFC Bank has managed the NPAs to net profit in a efficient manner hence net profit is not decreasing.  Gross NPAs to PCR ratios analysis of correlation shows that both share the positive strength of association. This shows that gross NPAs of the bank and PCR ratios both the maintained the by the bank in very systematic manner so that NPAs and PCR share showing the positive strength of association.

If we look the CAR to net profit it shows the both share the negative strength of association, this means both have inverse set of association to each other. Also to maintain the CAR it is necessary to have profits with banks. Also CAR and PCR are showing the positive strength of association to each other. This shows that both the variables requirement of maintenance is same. This means if one banks is able to maintain CAR then it is also able to maintain the PCR ratios.

Net profits to PCR ratios are showing the negative correlation to each in the case to both banks if we put them together to study. It shows that net profits are hampered to maintain the PCR ratios.

5.2 Correlation Analysis of State Bank of India

 

Gross NPAs

CAR

Net Profit

PCR Ratio

Gross NPAs

1.00

 

 

 

CAR

-0.02

1.00

 

 

Net Profit

-0.83

0.14

1.00

 

PCR Ratio

0.33

-0.17

-0.31

1.00

 

As per the correlation study of the SBI we can see that Capital adequacy ratios to gross NPAs seems to be negative and showing the negative strength of association. This shows that there is strong inverse relationship between both the variables if we look at the case of Gross NPAs to Capital Adequacy ratios. In the another variable Gross NPAs to Net profit analysis of both banks shows that strength of association is strong negative between both the variables. This shows that both share the inverse relationship to each other however it is not stronger like CAR. Gross NPAs to PCR ratios analysis of correlation shows that both share the positive strength of association. This shows that once the gross NPAs of the bank are increasing maintaining the PCR ratios not becomes the challenges for the bank and hence showing the positive strength of associations.

If we look the CAR to net profit it shows the both share the week positive strength of association, this means both having the similar set of association to each other. Also to maintain the CAR it is necessary to have profits with banks. Also CAR and PCR are showing the negative strength of association to each other. This shows that both the variables requirement of maintenance is different. This means if one bank is able to maintain CAR then not necessary it is also able to maintain the PCR ratios.

Net profits to PCR ratios are showing the negative correlation to each in the case to both banks if we put them together to study. It shows that net profits are hampered to maintain the PCR ratios.

 

 

  1. Findings and Conclusions of the study

5.1 Finding: From the correlation analysis of the above mentioned two banks there are different finding we have observed. Below are the lists of findings which we observed in both banks.

  1. HDFC Banks net profits is being not declining with NPAs as reason being NPAs are also found steady in case if this bank.
  2. Also gross NPAs and net profits are not showing any correlation to each other that shows the efficiency of NPAs management by the HDFC Bank.
  • Correlation analysis shows that the capital adequacy ratio of HDFC Bank is positive with Gross NPAs that shows that at given level of NPAs, bank is able to maintain the CAR and also its being showing the positive strength of association.
  1. Here provision coverage ratios also showing the week but positive correlation to GNPAs, this indicates that banks having enough capacity in terms of gross profits to maintain the PCR as when NPAs and PCR showing the positive strength of associations.
  2. CAR and net profits are showing the negative strength of association and at the same time HDFC Bank is managing all the ratios as per requirement of regulator at individual level. But correlation between both the variable suggests that HDFC Bank should focus in future on both ratios as both are showing the inverse relationship.
  3. State Bank of India’s net profits is being strongly negatively associated with Gross NPAs. This shows that NPAs and net profits are not correlated and moving in the inverse direction to each other. This also states that these GNPAs are hammering the bank net profits.
  • Also gross NPAs and net profits are not showing strong negative correlation to each other that shows the inefficiency of NPAs management by the SBI.
  • Correlation analysis shows that the capital adequacy ratio of SBI is negative but if we look at the data it is neutral with Gross NPAs that shows that at given level of NPAs, bank is able to maintain the CAR and also its being showing the neutral strength of association.
  1. Here provision coverage ratios also showing the week but positive correlation to GNPAs, this indicates that banks having enough capacity in terms of gross profits to maintain the PCR as when NPAs and PCR showing the positive strength of associations. But at the same time PCR are showing the negative strength of association with the net profit. This suggest that requirement of PCR is hampering the profits of the banks.
  2. CAR is showing the positive strength of associations with net profits in case of SBI, this show that SBI managing the net profits with CAR in a systematic way in order to maintain the ratios as required by regulators.

5.2 Conclusions:

            After the above study on comparative study of HDFC Bank and State Bank India, it is found that both the banks managing their ratios at the best in their capacities in given boundaries. However if we compare both the banks it suggests that HDFC Bank having the edge on the SBI reason being HDFC Bank having lower NPAs than the SBI. HDFC Bank having Gross NPAs less than 1.5% while SBI having the GNPAs near about 7.5% as per the annual report of both banks for the fiscal 2019. Also the comparative study of both bank shows the NPAs never been easy handling for the state bank of India and in every two to three year they are doing the provisioning of their NPAs while in case of HDFC Bank these restructuring incidents are rare. However findings of the study are suggesting that HDFC Bank has managed their ratios like NPAs, CAR and PCR in a very efficient manner and managed the net profits in a systematic way and paying the great role of successful commercial bank while in case of SBI they are managing their ratio but are not that much efficient in case of Net profits and NPAs while CAR and PCR are being managed by them. SBI need to be more focused on managing the net profits and NPAs part to be a commercially successful bank.

 

 

 

Bibliography

 

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