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उषा गांगुली से साक्षात्कार

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उषा गांगुली से साक्षात्कार

उषा गांगुली, जन्म- 1945, जोधपुर आप कोलकाता में रहकर हिंदी रंगकर्म करती हैं। आपने 1976 में ‘रंगकर्मी’नामक अपनी नाट्य –संस्था की स्थापना की। उषा गांगुली द्वारा अभिनीत एवं निर्देशित प्रमुख नाटकों में महाभोज, लोककथा, होली,खोज, वामा, बेटी आई, मय्यत, रुदाली, मुक्ति और काशीनामा इसके अलावा आपने ब्रेख्त के नाटक ‘मदर करेज’ को ‘हिम्मतमाई’ के नाम से निर्देशित एवं स्वयं माँ की भूमिका को निभाया। ‘माँ’ की सजीव भूमिका के लिए 1982 -83 में सरकार द्वारा आपको ‘लेबदेब’ पुरस्कार से नवाजा गया। आपको 1998 में आपको संगीत नाटक अकादमी ने श्रेष्ठ निर्देशक के रूप में पुरस्कृत किया साथ ही उ.प्र.संगीत नाटक अकादमी ने सफ़दर हाशमी पुरस्कार से नवाजा।         

सुरभि: आप ब्रेख्तीय थियेटर की तकनीक और वैचारिकी के  विशेषज्ञ रहीं हैं, उनपर काम करते समय आपकी खुद की अंतःप्रक्रिया के अनुभवों को साझा कीजिये।

उषा गांगुली: मैं करीबन 45 वर्षों से थियेटर से जुड़ी हुई हूँ हर दौर से कुछ सीखा है, आज भी मैंकितना परिपक्व हुई हूँ पता नहीं। ये जो आप ब्रेख्त की तकनीक की बात कर रहीं हैं तो मैंने ब्रेख्त को खूब पढ़ा है, उनके नाटक देखें हैं और मैंने खुद भी किया है। ब्रेख्त का जो सबसे बड़ा थियेटर करने का तरीका था वह था लोगो से जुड़ने का, वह मानवीय राजनीति और human roots पर बहुत विश्वास करते थे। लेकिन जब हम थियेटर की बात करते हैं तो सामूहिकता एवं जन माध्यम की बात करते हैं कि नाटक जन माध्यम का सबसे सशक्त साधन है। लेकिन आज हम इस जन माध्यम से जन को छोड़ते जा रहें हैं। ब्रेख्त ने पहली       बार उस जगह को पकड़ने की कोशिश की है। ब्रेख्त को किसी भी वैचारिकी से बांध नहीं सकते वह खुले हुये हैं। कभी -कभी दिक्कत तब होती है जब ब्रेख्त को करते समय उनकी शैली को हम भूल जाते हैं। जैसे ढेर सारा साज–सज्जा, आलीशान सेट इत्यादि के बीच कहानी घुट कर रह जाती है। सही मायने में ब्रेख्त ने सब कुछ जन को केंद्र में रखकर किया है। मैंने शुरू से तो नहीं लेकिन बाद में जब ब्रेख्त के नाटक को देखा और पढ़ा तब से कहीं न कहीं उन्हें अपने नाटकों का हिस्सा मानने लगी।मैंने लगभग 50 लोगों को लेकर पहला नाटक ‘महभोज’ किया था, उसकी साज-सज्जा में इतनी सादगी थी मैं खुद भी कभी-कभी सोचने की कोशिश करती हूँ कि मेरे अंदर ये कला कहाँ से आ गई। चूंकि मैं नृत्य सीखी हूँ इसलिए मैं स्पेस का इस्तेमाल समझती हूँ, मैं चित्र समझती हूँ,इसलिए आप मेरे अधिकतर नाटकों में देखेंगी कि संगीत, नृत्य, लय आपको दिखेगा साथ ही साथ अभिनेता के शरीर का प्रयोग भी अभिव्यक्त होगा। जिससे वे सीधे-सीधे दर्शक से जुड़े।‘रंगकर्मी’ नाट्य दल अब तक जितने भी नाटक किए सभी अलग-अलग रहें उनमें से किसी भी नाटक को दोहराया नहीं है। हर नाटक नया मुद्दा कभी युवा की समस्या है तो कभी रुदाली जैसे नाटक जो बिल्कुल भिन्न हैं। मैं सच बोलू तो ब्रेख्त को करने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी मैं अपने नाटकों में अंदर ही अंदर ब्रेख्त की शैली को अपना रही थी। लेकिन सीधे तौर पर उनकी स्क्रिप्ट को नहीं कर पा रही थी। एम.के. रैना ने जब ‘माँ’ नामक नाटक किया तो मैंने उसमें माँ का चरित्र निभाया, उस चरित्र ने मुझे अंदर से आंदोलित कर दिया था, जिसका प्रभाव आगे चलकर दिखता है। फिर मैंने ‘Mother Courage’ ‘हिम्मतमाई’ जिसे नीलाभ जी ने अनुवाद किया है, उसे करने की ठानी और एक बेहतर प्रोडक्शन तैयार हुआ। जिसकी प्रस्तुति ढाका से लेकर कई देशों में हुई। उसमें भी ब्रेख्त की सादगी को बरकरार रखा।

 

सुरभि: आपने जब ‘हिम्मतमाई’ को मंचित किया तो उसमें ब्रेख्तीय शैली को कितना लागू किया?

उषा गांगुली: मैं ऐसा नहीं  सोचती हूँ कि ये ब्रेख्त की तकनीक है या ब्रेख्त की शैली है या मुझे इसी ढांचे में बंध कर करना चाहिए। मेरे ख्याल से ब्रेख्त भी ऐसा नहीं चाहते थे। मेरे नाटक को फ्रिट्ज़ बेनेविच ने देखा। मैंने उनसे कहा कि ब्रेख्त को पढ़ा है, उनकी तकनीक को जाना है, जो मेरे नाटक की सहजता में दिखाई देता है। मैं अपने नाटकों से समाज में एक      प्रश्न खड़ा करती हूँ और दर्शकों को धक्का देती हूँ। अपने नाटकों  के विषय से, उद्देश्य से उन्हे डिस्टर्ब करती हूँ कि वे भी सोचें।

 

 सुरभि: आपके अनुसार ब्रेख्त का वैश्विक रंगमंच पर क्या प्रभाव पड़ा ?

उषा गांगुली:मुझे ऐसा लगता है कि प्रगतिशील खेमे के व्यक्ति जो ब्रेख्त थे, उन्होने व्यवस्था के खिलाफ धक्का देने की कोशिश की।इस सच को कोई भी झुठला नहीं सकता। सारी दुनिया के मनुष्य में प्रगतिशीलता का चिंतन नहीं रह सकता तब तक ब्रेख्त को नहीं समझा जा सकता है। इसीलिए आप सारी दुनिया में देखिये जहां-जहां ब्रेख्त के नाटक गंभीरता से हुए हैं, वहाँ-वहाँ तीर की तरह प्रभाव डाला है और जहां सिर्फ संगीत पक्ष को लिया गया है वहाँ सिर्फ मनोरंजन बनकर रहा गया है। दर्शकों का सिर्फ मनोरंजन करना ब्रेख्त नहीं है, मैं बहुत ही खरी और सच बात कहती हूँ। ट्रीटमेंट में बहुत कुछ निर्भर करता है। ब्रेख्त के नाटक दुनिया को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं। कई लोग ये भी कहते है कि ब्रेख्त का जमाना गया, मैं कहती हूँ नहीं थियेटर की यात्रा सागर की तरह होता है जो लहर की तरह आती और जाती है इसी तरह आज जिस तरह बजारवाद सारी दुनिया पर हावी है इस पर कौन प्रहार कर सकता है, कौन अपनी बात कह सकता है? सिर्फ ब्रेख्त के नाटकों में छिपे हुये तथ्य ही है जो इन सब पर प्रहार कर सकते हैं। वही अस्त्र की तरह लड़ सकते हैं। बशर्ते यदि कोई उन्हे अच्छे तरीके से प्रस्तुत कर सके। ब्रेख्त का एलियनेशन क्या है? जो द्वन्द्वात्मक सत्ता हमारे भीतर है, उस भीतरी मुखौटे को वे निकालने की कोशिश करते हैं।     जिससे समाज का सत्य है और मैं भी ऐसी ही हूँ मुझे हेपोक्रेसी पसंद नहीं है। मैं दो रूप नहीं     देख सकती। मेरे साथ ब्रेख्त के चिंतन में कहीं न कहीं बहुत मेल है जो मेरे हर नाटक में उभर कर आया है।

                                     विगत 40 सालों से थियेटर करते हुये मुझे लगा है कि थियेटर की भाषा क्या होती है? क्या वह जर्मन होती है, या हिन्दी, गुजरती, मराठी, या बंगला होती है? मुझे लगता है थियेटर की अपनी भाषा होती है। मैं जब जर्मनी में ‘काशीनामा’ नाटक लेकर गई थी कुछ देर बाद दर्शकों ने subtitle देखना छोड़ दिया था और सिर्फ नाटक को ही देख रहें थे जबकि जर्मनी में लोग हिन्दी नहीं समझते हैं। फिर भी सभी ने बहुत सराहा। जहां तक बंगाल की बात है मेरे नाटकों के दर्शक हिन्दी से ज्यादा बंगाली हैं इसलिए मुझे लगता है की भाषा की रुकावट नहीं होती।

सुरभि: ब्रेख्त का प्रभाव पूरे भारत में पड़ा, आप इसे बांग्ला रंगमंच के संदर्भ में कैसे देखती हैं?

उषा गांगुली:बंगाल में तो 60,70,80 में भयानक रूप से ब्रेख्त हो रहे थे, ब्रेख्त की लहर थी। उस समय ‘गुड वुमेन ऑफ सेत्जुवन’ के तीन तरह की प्रस्तुति देखी है। बंगाल में रुद्र बाबू, विभाष दा, अजितेश बंधोपाध्याय एवं सोहाग सेन ने भी ब्रेख्त को खूब किया।

 

सुरभि: ब्रेख्त को विचार और शैली के रूप में आप कैसे देखती हैं?

उषा गांगुली: ब्रेख्त के नाटक कथ्य,वैचारिक और शैलीगत रूप से मानवीय अनुप्रेरणा के लायक हैं। ब्रेख्त जिस तरह उधेड़ देते थे वैसे ही उधेड़ना आना चाहिए।

 

सुरभि: ब्रेख्त से  प्रभावित भारतीय नाटककार,निर्देशक कौन हैं /

उषा गांगुली:भारत में बहुत सारे निर्देशक हैं जैसे एम. के. रैना, बंसी कौल, हबीब तनवीर, विजया मेहता, जब्बार पटेल, रुद्र दा, विभाष दा आदि सभी ने ब्रेख्त को किया है। और आज भी कर रहे हैं।

 

सुरभि:वर्तमान भारतीय सामाजिक,राजनीतिक,आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य में ब्रेख्त की उपयोगिता के विषय में बताएं।        

उषा गांगुली:भारत वर्ष का वर्तमान सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक ढांचा जब तक रहेगा  लोग ब्रेख्त के नाटक करते रहेंगे और कामयाब होते रहेंगे। क्यों कि यह सीधे-सीधे इस पर प्रहार करता है। कहानी की तरह सहजता से  ब्रेख्त ने जब एशिया के लोक से सब कुछ लिया चाहे वह चीन हो,वर्मा हो तो जहां से उन्होने लोक तत्व लिया वहाँ तो ब्रेख्त को तो सफल होना ही था। और सबसे ज्यादा सफल जर्मनी के बाहर हुये। पूरे विश्व ने ब्रेख्त को स्वीकारा और अपनी-अपनी भाषा में किया।

 

सुरभि:आप मेरा शोध विषय-‘ब्रेख्त का भारतीय रंगमंच पर प्रभाव, विशेष संदर्भ हिन्दी, बांग्ला और मराठी’ को कैसे देखती हैं?

उषा गांगुली: आप इस विषय पर शोध कर रही हैं, यह बहुत ही बड़ा काम है, नहीं तो थियेटर पर लिखा कहाँ जाता है, कौन थियेटर की बात करता है, प्रकाश की बात करता है? क्योंकि कई बच्चे नाटक अच्छा करते हैं लेकिन सैद्धांतिकी उन्हें पता नहीं होती है। यह जानकारी यदि आप से मिले तो बहुत ही अच्छी बात है। आपको बहुत-बहुत धन्यवाद जो अपने इस विषय को लिया।अब तक मेरे पास बहुत सारे लोग साक्षात्कार लेने आए लेकिन यह पहला विषय है जो ब्रेख्त से संबन्धित है। आप इतना गहन विषय पर शोध कर रहीं है मुझे बहुत अच्छा लगा।यह काम नयी पीढ़ी के लिए लाभकारी होगा। आपको बहुत-बहुत बधाई।

सुरभि:1976 से लेकर अब तक आपने जितने भी नाटक किए, किसी न किसी छोर पर ब्रेख्त से मिलती हैं? 

उषा गांगुली:मैं यह कहना चाहती हूँ कि मैं सामाजिक हूँ। मैं जितना ज्यादा ब्रेख्त से अनुप्रेरित हुई हूँ किसी से नहीं हुई।मैं ब्रेख्त के टेक्स्ट का बहुत ही सम्मान और पसंद करती हूँ। यही कारण है कि मैंने उनके विचारों को अपनाया है।

 

वरिष्ठ व्यंग्यकार और कवि गोपाल चतुर्वेदी से डॉ. संतोष विश्नोई की बातचीत

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वरिष्ठ व्यंग्यकार और कवि गोपाल चतुर्वेदी से डॉ. संतोष विश्नोई की बातचीत

            प्रतिष्ठित व्यंग्यकार और कवि गोपाल चतुर्वेदी जी का नाम वरिष्ठ साहित्यकारों की शृंखला में शीर्षस्थ पर है। आपके दो काव्य-संग्रह -‘कुछ तो है’ और ‘धूप की तलाश’ तथा अनेक व्यंग्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। ‘सारिका’, ‘इंडिया टुडे’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘हिन्दुस्तान’, ‘दैनिक भास्कर’, ‘साहित्य अमृत’ जैसे अनेक पत्र-पत्रिकाओं में आप वर्षों से नियमित लेखन कार्य कर रहे हैं। अब तक आपको अनेक पुरस्कारों से सम्मानित भी किया जा चुका हैं। आपके ‘आदमी और गिद्ध’, ‘अफसर की मौत’, ‘सत्तापुर के नकटे’, ‘दुम की वापसी’, ‘राम झरोखे बैठ के’, ‘फाइल पढ़ि पढ़ि’, ‘जुगाड़पुर के जुगाडू’, ‘धाँधलेष्वर’, ‘कुरसीपुर का कबीर’, ‘फार्म हाउस के लोग’, ‘भारत और भैंस’ आदि प्रमुख व्यंग्य संग्रह रहे हैं। सरकार में उच्च पदों पर वर्षों रहने के बावजूद आपने लेखन के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। वर्तमान जीवन की चाहे कोई छोटी से छोटी विसंगति हो अथवा बड़ी से बड़ी समस्या आपने उन पर तीखे और मार्मिक प्रहार कर एक जागरुक व सफल साहित्यकार की भूमिका निभाई हैं। आपने अपने व्यंग्य के माध्यम से युगीन सच्चाइ्र्र एवं विपरीत परिस्थितियो को देखा-परखा तथा उन्हें अपनी बेबाक, विषयानुसार शैली में मुक्त भाव से व्यक्त किया है। अतः आपसे व्यंग्य, उसके स्वरूप, परम्परा तथा साहित्य की विविध विधाओं में इसके प्रयोग आदि पर आपका दृष्टिकोण जानने की दृष्टि से आपसे प्रश्नावली आधारित साक्षात्कार प्रस्तुत है-

  1. आज व्यंग्य चेतना प्रभावी हो गई है कि साहित्य की विविध विधाओं में अपनी पैठ बना चुकी है। आपके विचार में सभी विधाओं में लिखी जाने के कारण भी क्या व्यंग्य को एक स्वतन्त्र विधा माना जा सकता है? एक व्यंग्यकार होने के नाते आपकी निजी मान्यताएँ क्या है?

उत्तर – मैं व्यंग्य को स्वतंत्र विधा नहीं मानता हूँ। व्यंग्य चेतना आज हर विधा में वर्तमान है। व्यंग्य को अलग विधा बनाकर उसे सीमित करना अनुचित है। व्यंग्य, लेखन की एक लोकप्रिय षैली है और उसे महत्त्वपूर्ण बनाने के लिए इतना ही पर्याप्त है। पहले व्यंग्य का आलोचना शास्त्र विकसित होना आवश्यक है जो आज नहीं है।

  1. आरम्भ से ही व्यंग्य के साथ हास्य शब्द जुड़ता चला आ रहा है। जहाँ भी व्यंग्य की चर्चा होती है, हास्य उपस्थित होता है, किन्तु हास्य–व्यंग्य एक दूसरे के पूरक होने के बावजूद भी पारस्परिक भिन्नता रखते हैं। आपके विचार में हास्य का प्रयोग व्यंग्य में अनिवार्य है, क्या हास्य के बिना भी श्रेष्ठ व्यंग्य लिखा जा सकता है?

उत्तर – हास्य और व्यंग्य की उलझन होरेस और जुवैनल के जमाने से चली आ रही है। हिन्दी व्यंग्य प्रारम्भ से ही हास्य से जुड़ा रहा है। इस में भारतेन्दु से लेकर, बेढब बनारसी, पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी तथा केशवचन्द्र वर्मा जैसे अनेक नाम गिनाये जा सकते हैं। इस का कारण शायद तत्कालीन विदेषी शासन था। स्वतन्त्रता के बाद से जहाँ परसाई जी ने सतत प्रहार के समक्ष व्यंग्य लिखे, वहीं शरद जोशी और रवीन्दनाथ त्यागी के लेखन में हास्य भी व्यंग्य के साथ घुला-मिला है। महत्वपूर्ण तथ्य है कि जहाँ सायास हास्य व्यंग्य को कमजोर करता है वहीं उस की स्वाभाविक उपस्थिति व्यंग्य को

रोचक और सामथ्र्यवान बनाने में समर्थ है। मेरे विनम्र मत में बिना हास्य के भी सार्थक व्यंग्य लिखा जा सकता है और हास्य के साथ भी।

  1. अच्छा व्यंग्य आप किसे मानते हैं। आपके विचार से व्यंग्य की परिभाषा क्या हो सकती है?

उत्तर – अच्छा व्यंग्य वह है जो बिना किसी व्यक्तिगत आक्षेप के प्रवृत्त्तियों का चित्रण करें, पाठक को सामाजिक विषमताओं से परिचित कराये, प्रचार से बनी सियासी छवियों को वास्तविकता के चित्रण की क्षमता रखे और पढ़ने वाले को सोचने पर विवश करे। सब के मन में एक आदर्श समाज की अवधारणा होती है। आदर्ष और यथार्थ के अंतर की अभिव्यक्ति ही व्यंग्य है।

  1. व्यंग्य लिखना साधारण लेखन से किस प्रकार अलग होता है? व्यंग्य लिखने के तहत् कैसी रचनात्मक अनुभूति होती है?

उत्तर -अधिकतर रचनात्मक लेखन सत्य की तलाश है, व्यंग्य उसी लगन से झूठ की खोज करता है। जाहिर है कि व्यंग्यकार का परिस्थितियों, घटनाओं और व्यक्तियों के व्यवहार को देखने के नजरिये में फर्क हो। इसी से रचनात्मक अनुभूति का अंतर नजर आता है।

  1. हरिषंकर परसाई, शरद जोशी और रवीन्द्रनाथ त्यागी तीन भिन्न स्कूल के व्यंग्यकार रहे हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार परसाई, जोशी तथा त्यागी हिन्दी हास्य–व्यंग्य की त्रयी है। इन व्यंग्य रचनाकारों के रचना–कर्म के विषय में आप क्या कहना चाहेंगे?

उत्तर – त्यागी, जोशी और परसाई व्यंग्य की ऐसी त्रयी है जिनका लेखन आजादी के बाद के दर्षकों का वास्तविक दर्पण है। परसाई जी सतत प्रहार के धनी हैं, शरद जोशी गुदगुदाते पाठक को रूलाने की सामथ्र्य रखते हैं और त्यागी जी का विपुल अध्ययन उन के व्यंग्यों में झलकता है। समानता यह है कि भाषा की रोचकता तीनों की विशेषता है। मेरी प्रतिक्रिया एक सामान्य पाठक की है, किसी व्यंग्य के विशेषज्ञ की नहीं।

  1. किसी भी रचना का मूल्यांकन करने के लिए कुछ तत्व निर्धारित रहते हैं। सभी विधाओं के अपने तत्त्व निर्धारित है, आज विद्वानों ने व्यंग्य विधा के अनेक तत्त्वों का उल्लेख किया है। आपके विचार से कौन–कौन से तत्त्व व्यंग्य में जरूरी है?

उत्तर- प्रभावी और रोचक भाषा, व्यापक विषय वस्तु, निजी शैली और जीवन मूल्य किसी भी सार्थक व्यंग्य लेखन के आवश्यक तत्त्व हैं। जहाँ व्यंग्य व्यक्तिगत स्तर पर चोट करता है, उस की धार कुन्द हो जाती है।

  1. आजकल अख़बार व्यंग्य अधिक दिखाई दे रहा है, क्या ऐसा व्यंग्य साहित्य को समृद्ध दे सकता है?

उत्तर – जोशी और परसाई ने भी अखबारी व्यंग्य लिख कर व्यंग्य को समृद्ध किया है। रचना की गुणात्मकता पर निर्भर है।

  1. आप एक रचनात्मक लेखक हैं, आपके समकालीन लेखकों में अनेक सफल व्यंग्यकार रह चुके हैं और वर्तमान में है भी। अन्य सृजनषील व्यंग्यकार आप किन्हें मानते है? वर्तमान में नई पीढ़ी का नेतृत्व

करने वाला कोई सशक्त व्यंग्यकार है? वर्तमान के हास्य–व्यंग्यकारों के व्यंग्य लेखन पर अपने विचार प्रकट कीजिए?

उत्तर – आज कई सशक्त व्यंग्यकार अपना योगदान दे रहे हैं। नाम गिनाकर बहुतों के छूटने का डर है। व्यंग्य में किसी के नेतृत्व का प्रश्न नहीं, सब को अपनी अपनी रचनात्मक लड़ाई खुद ही लड़नी है। ज्ञान चतुर्वेदी वर्तमान में प्रमुख व्यंग्यकार है जिन्होंने उपन्यास, निबंध, कथा सब में अपना योगदान दिया है।

  1. इसमें सन्देह नहीं कि आज का व्यंग्य वर्तमान युग की विसंगतियों, विडम्बनाओं, विद्रूपताओं, कथनी और करनी पर प्रकाश डालता है। मात्र हँसने के लिए लिखा नहीं जाता। आज आम आदमी जिस दुष्चक्र में फँसकर घुट रहा है, व्यंग्य उसके दुःख को कम करने में कितनी सार्थक भूमिका निभा सकता है?

उत्तर – व्यंग्य विसंगति, विडम्बना, विद्रूप को प्रगट या अभिव्यक्ति करने का माध्यम है, दुःख कम करना या घटाना इस का लक्ष्य नहीं है। गालिब ने भी कहा है कि ‘‘दर्द का हद से गुजरना है, दवा हो जाना।’’ हद से गुजरना शायद सड़क की लड़ाई है, व्यंग्य का इससे वास्ता नहीं है।

साक्षात्कार दिनांक – 21.07. 2016

पता: 9/5 राणा मार्ग, लखनऊ

 

अरुणाचल की लोक संस्कृति (अरुणाचल प्रदेश के त्यौहारों के विशेष संदर्भ में) :

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अरुणाचल की लोक संस्कृति

(अरुणाचल प्रदेश के त्यौहारों के विशेष संदर्भ में)

मदालसा मणि त्रिपाठी
शोधार्थी, हिंदी विभाग,
राजीव गाँधी विश्वविद्यालय
दोइमुख, ईटानगर

भारत के पूर्व  एवं पूर्वोत्तर, प्राकृतिक बुनावट के कारण उसका  न केवल अभिन्न भाग है बल्कि भारत की समृद्धि में उसकी भूमिका बहुआयामी है । उत्तरपूर्व की भाषाओं की विविधता ही नहीं, बल्कि लोक संस्कृतियों की उच्चता भी अलग से आकर्षित करती है। पूर्व एवं पूर्वोतर के आठ राज्यों में क्रमशः असम, नागालैंड, मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम तथा सिक्किम भारतीय राज्य के कुछ ऐसे राज्य है जिनकी वर्तमान जानकारी समाचारों के माध्यम से भारत के नागरिकों को तो है किन्तु उनकी संस्कृति, भाषा उनके त्यौहार आदि के बारे में बहुत कम आधिकारिक जानकारी शेष भारत को उपलब्ध है। इन राज्यों का इतिहास भी अपने आप में एक रोचक विषय है। यहाँ के लोगो के जातीय ढांचे का अध्ययन तो विद्वानों ने किया है किन्तु मात्रसत्तात्मक वृति की रेखाएँ तो इन प्रांतो की यात्रा से ही पहचानी जा सकती हैं।

       इन पूर्वोत्तर राज्यों का ढांचा जनजातिय रहा है जिसके कारण इनके त्यौहारों और इनकी संस्कृति में इनकी धार्मिक आस्था और विश्वास झलकता है। इन सभी पूर्वोत्तर राज्यों में सभी भिन्न संस्कारों के लिए भिन्न सांस्कारिक क्रिया- कलाप तथा अलग पर्व एवं त्यौहार है। लेकिन वास्तविकता यही है कि इतनी विविधता होते हुए भी सब एक दूसरे के उत्सव और त्यौहारों में हाथ बटाते हैं और उतनी ही श्रद्धा और विश्वास के साथ उन त्यौहारों को मानते भी है। जैसे की अरुणाचल प्रदेश में

भिन्न- भिन्न जातियों के भिन्न त्यौहार है- निशी जनजाति का न्योकुम, आदि-गालो जनजाति का मोपिन, आपातानी का मोरोम आदि। अरुणाचल प्रदेश के इन पर्व त्यौहारों को  जानने से ही इन राज्यों की संस्कृति को जाना जा सकता है।

कई अलग-अलग जनजातियाँ हैं जो अरुणाचल प्रदेश में निवास करती हैं और जो इसे विविध संस्कृतियों और परंपराओं का एक बड़ा मिश्रण बना देती है। ये विभिन्न जनजातियाँ कृषि, धार्मिक और सामाजिक, सांस्कृतिक उत्सव मनाती हैं, जहां वे नाचते, गाते, प्रार्थना करते हैं, एक समुदाय के रूप में आभार और भोज करते हैं। इन त्यौहारों का अनुष्ठान पुजारी द्वारा किया जाता है और अन्य व्यवस्थाएँ लोगों द्वारा सामुदायिक स्तर पर की जाती हैं। अरुणाचल प्रदेश में अधिकांश त्यौहारों में पशु बलि दी जाती है, यह अरुणाचल का एक सामान्य अनुष्ठान है। अधिकांश त्यौहार कृषि से जुड़े होते है और बड़े पैमाने पर देवताओं को खुश करने और अच्छी फसल के लिए देवताओं को धन्यवाद करने के लिए मनाया जाता है। त्यौहारों को पूरे वर्ष विभिन्न जनजातियों द्वारा मनाया जाता है। अरुणाचल के ऐसे ही कुछ कृषि, पशु बलि, प्रार्थनाओं से जुड़े त्यौहार इस प्रकार है:-

 

 

  • सोलुंग त्यौहार

सोलुंग आदि जनजाति का एक बहुत ही प्रमुख सामाजिक-धार्मिक त्यौहार है, जिसे मुख्यतः सितम्बर माह में मनाया जाता है, परंतु हर वर्ष इसकी तिथि बदलती रहती है। यह ईस्ट सियांग, वेस्ट सियांग और दिबांग वेली जिलों में प्रमुखता से मनाया जाता है। सोलुंग त्यौहार फसल से जुड़ा त्यौहार है जो कृषि से संबन्धित है, जिसमें धान के बीजों को खेतों में रोपने के बाद मनाया जाता है। यह त्यौहार पाँच से अधिक दिन भी रेहता है तथा इसके तीन मुख्य भाग होते है, जिसमें प्रथम दिन पूजा की तैयारी से शुरू होता है, जिसमें आगे के दिनों में बलि देने के साथ सहभोज किया जाता है और शाम को पूनुंग नृत्य और संगीत की व्यवस्था होती है। पूनुंग एक गीत होता है जिसमें विभिन्न प्रकार के जानवरों की उत्पत्ति की कथाएँ कही जाती है जिसे “लिमिर लिबांग आबांग’ भी कहते हैं। यह त्यौहार देवी-देवताओं अर्थात किने-नाने और दोइंगबोते  को प्रसन्न करने हेतु, अच्छी फसल और लोगों की सुख-शांति की कामना के साथ मनाया जाता है। इस त्यौहार के अंतिम दिन पोपुंग नृत्य किया जाता है जिसमें तरह-तरह के हथियारों की उत्पत्ति की कहानी गीतों के रूप में गया जाता है।

यह एक ऐसा अवसर है जहां लोग अपने कालातीत विश्वासों और परंपराओं को फिर से स्थापित करते हैं और विभिन्न अनुष्ठानों के मध्याम से आध्यात्मिकता के साथ अपने संबंधों को नवीनीकृत करते हैं।

  • मोपिन त्यौहार

मोपिन, अरुणाचल प्रदेश के आदि जनजाति के गालो समुदाय का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है और हर साल इसे पूरे राज्य में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह त्यौहार प्राकृतिक आपदा, रोग, बुरी आत्माओं के प्रभाव से छुटकारा पाने के लिए और स्वास्थ्य, धन और समृद्धि पाने के लिए मनाया जाता है। इस त्यौहार के दौरान मोपिन देवी जिन्हें प्रजनन क्षमता और समृद्धि का जनक भी माना जाता है उनकी पूजा की जाती है। त्यौहार के दौरान महिलाएं अपने पारंपरिक उज्व्वल रंग के गाले और गालुक पहनती है, सिर पर बांस निर्मित ऊपर से खुली टोपी के साथ पीले मूँगों की माला पहनती है जिसे ‘तादोक’ कहते है और यह पोशाकों और आभूषणों से लोगों को मंत्रमुग्ध करती हुई लोकप्रिय ‘पोपिर’ नृत्य करती है। इस त्यौहार में मिथुन की बलि और चावल के आटे का घोल एक-दूसरे पर लगाना आदि कुछ महत्वपूर्ण क्रियाएं हैं। इस प्रकार मोपिन त्यौहार द्वारा अप्रैल माह के शुरुवात में पांच दिनों तक शुभकामनाओं का आदान-प्रदान किया जाता है।

  • न्योकुम त्यौहार

न्योकुम के विषय में लेखक धर्मराज सिंह अपनी पुस्तक ‘अरुणाचल के त्यौहार’ में स्पष्ट रूप से कहते है की “ ‘न्योकुम’ निशी जनजाति का सर्वप्रमुख त्यौहार है। न्योकुम दो शब्दों के संयोग से (न्योक+उम) बना है, इनकी भाषा में  ‘न्योक’ का अर्थ है सम्पूर्ण धरती और ‘उम’ का अर्थ है चीजों को एक जगह इकट्ठा करना अर्थात न्योकुम का अध्यात्मिक अर्थ है पृथ्वी पर के सभी देवी और देवताओं को ‘न्योकुम’ देवी के पास किसी मुख्य स्थान पर तथा निश्चित समय पर एकत्र करके सब की पूजा एक साथ सामूहिक रूप से करना।’’

           

यह पूजा लोअर वेली के निशी मनाते है। इस पूजा में किसी जाति, धर्म, भाषा, सामाजिक स्तर को महत्त्व नहीं दिया जाता। निशी जनजाति के सभी लोग धन, वैभव, प्रसन्नता, कृषि में अच्छी उपज तथा बिमारियों से बचने के लिए, यह पूजा बड़ी श्रद्धा और लगन के साथ सामूहिक रूप से प्रतिवर्ष 24 फ़रवरी से 28 फरवरी के मध्य करते है। निशी लोग यह भी मानते है की पृथ्वी पर कई देवता और आत्माएं हैं। ये पहाड़, नदी, जंगल, जानवर, फसल, गृहस्थी आदि के देवता और आत्माएं है और मनुष्य इस पृथ्वी पर शांति और समृद्धि का जीवन तभी जी सकता है, जब मनुष्य, देवता और प्रकृति के बीच पूर्ण सामंजस्य बना रहे। इनके मुख्य प्रार्थना के स्थान पर बांस से बनी संरचना होती है, जहाँ बलि देने वाले जानवरों को रखा जाता है। पुरुष एवं स्त्रियाँ सुन्दर पारंपरिक कपड़े पहनते है, पुरुष सफ़ेद सूती पोशाक पहनते है जो उनके कंधे पर लिपटा हुआ होता है और सर पर लकड़ी की टोपी पहनते है जिस पर हार्नबिल की चोच लगी होती है। इस त्यौहार में सामूहिक रूप से नाच-गाना किया जाता है। आमतौर पर पुरुष और महिलाएं गोलाकार वृत्त बनाकर, हाथ पकड़कर एक साथ गाते हैं और नृत्य करते हैं। इस त्यौहार को वार्षिक कृषि पर्व के रूप में भी मनाते हैं, जिसमें मेल-मिलाप और भाई-चारे के दृश्य देखने को मिलते हैं।

 

  • ताम्लाडू त्यौहार–

ताम्लाडू त्यौहार मुख्य रूप से दिगारू मिशमी जनजाति द्वारा मनाया जाता है। प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा के लिए यह लोग पानी के देवता बुयुया और पृथ्वी के देवता ‘दुयुया’ से प्रार्थना करते हैं। इस त्यौहार को अत्यंत उत्साह और श्रद्धा के साथ प्रत्येक वर्ष मार्च महीने में मनाया जाता है और यह नव वर्ष का सूचक होता है। इस पर्व में मुख्यतः जेबमालू की पूजा करके प्रार्थना की जाती है कि वे उनको हर प्रकार की सुख-समृद्धि दे, मानव जाति का कल्याण करें। इस त्यौहार का मुख्य आकर्षण नृत्य और संगीत होता है। यह नृत्य और संगीत सूर्य भगवान को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है।

बूरीबूत त्यौहार–

बूरीबूत अपर वेली के निशी जनजाति का बड़ा ही महत्वपूर्ण त्यौहार है, ये नए बने कामले जिला के निशियों का उत्सव है। यह त्यौहार फरवरी माह के तीसरे सप्ताह में प्रतिवर्ष मनाया जाता है। इनकी भाषा में बूरीबूत का तात्पर्य है- पूर्ण एकता अर्थात् ऐसी एकता जिसमें धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर या सामाजिक स्तर के नाम पर किसी भी प्रकार का अंतर न हो। इस त्यौहार का मुख्य आकर्षण पुरूषों, महिलाओं और बच्चों द्वारा स्थानीय पुजारी के नेतृत्व में निकाला जा रहा जुलूस  होता है, जिसके लिए सभी अपने पारंपरिक परिधानों में तैयार होते हैं। इस त्यौहार में भी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए मिथुन और अन्य जानवरों की बलि दी जाती है। यह हिलमिरी लोगों की एकता और सौहार्द का त्यौहार है।

सी दोन्यी त्यौहार–

सी-दोन्यी तागिन जनजाति का सर्वप्रमुख त्यौहार है। धान की फसल कट जाने के बाद ही यह त्यौहार सामूहिक रूप से समस्त ग्रामीणों द्वारा एक जगह मनाया जाता है। ‘सी’ पृथ्वी का प्रतीक है और ‘दोन्यी’ सूर्य का प्रतीक है। तागिन लोगों का मानना है कि सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी मनुष्य के दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस त्यौहार के दौरान चावल के आँटे में अपोंग (चावल की शराब) मिलायी जाती है और सभी को इसे उदारतापूर्वक पिलाया जाता है। सी

 

दोन्यी उत्सव को बड़े पैमाने पर आयोजित किया जाता है जिसमें सभी अपनी क्षमतानुसार योगदान देते है, इसलिए यह एक सामूहिक उत्सव भी बन जाता है। तागिन जनजाति के बुजुर्ग सी-दोन्यी समिति के सदस्यों का गठन करते हैं और चयनित निबू (पुजारी) के निर्देशन में सी दोन्यी उत्सव मनाते हैं। यह माना जाता है कि सी दोन्यी उत्सव मनाने से, इस सृष्टि के निर्माता सी और दोन्यी न केवल संतुष्ट होंगे बल्कि लोगों को अच्छी फसल के साथ उन्हें बीमारियों से बचने का आशीर्वाद भी देंगे। यह समृद्धि, सफलता और प्रचुरता के लिए मनाया जाने वाले त्यौहार है। इस त्यौहार के दौरान लड़के-लड़कियाँ बाँस के डोंगर के साथ रंगीन पोशाक पहनते हैं तथा साथ में गीत और नृत्य का प्रदर्शन भी करते हैं।

द्री त्यौहार–

द्री त्यौहार आपातानी जनजाति का बड़ा महत्वपूर्ण तथा आनंददायक त्यौहार है। यह प्रति वर्ष जुलाई माह में तीन दिनों तक मनाया जाता है। इस त्यौहार में देवताओं को जानवरों की बलि समर्पित की जाती है। इस त्यौहार के दौरान तमू, मति, दानी और हारनियांग नामक देवताओं को पूजा जाता है। इन देवताओं को खुश करने के लिए ही यह त्यौहार मनाया जाता है। इस द्री उत्सव के दौरान हर घर में अपोंग तैयार किया जाता है और घरों और उसके आसपास की सफाई का जाती है। प्रधान पुजारी इन समारोहों और अनुष्ठानों के नेता के रूप में कार्य करते है। त्यौहार के लिए स्थान का निर्धारण गांव के पुजारी और बुजुर्ग लोग करते हैं। दानी भगवान की प्रार्थना रक्षा और समृद्धि के लिए की जाती है, पौधों को हानिकारक कीटों और कीड़ों से बचाने के लिए तमू की प्रार्थना की जाती है और मति से अकाल और महामारी के संक्रमण से बचने के लिए प्रार्थना की जाती है। हारनियांग से मिट्टी को स्थिर रखने और धान के पौधों को सूखने से रोकने के लिए प्रार्थना की जाती है। इस उत्सव में लड़के-लड़कियाँ साथ मिलकर प्री नामक नृत्य करते हैं।बूढ़े लोगों के सम्मानार्थ उनको लोग अलग से विशेष रूप से चावल की शराब देते हैं।

द्री के विषय में लेखक धर्मराज सिंह अपनी पुस्तक ‘अरुणाचल के त्यौहार’ में वर्णन करते है की “पूजा के समय जमीन को खोदना या खेतों में हल चलाना वर्जित है कहा जाता है कि इस समय धरती माँ उत्पत्ति विषयक विशेष शक्ति का अर्जन करती है। अतः हल चलाकर या मिट्टी खोदकर उसे क्षति नहीं पहुँचाना चाहिए। आपातानी लोग पूजा के तीन दिनों तक किसी भी प्रकार की हरी साग-सब्जी नहीं तोड़ते हैं, घास और वृक्ष भी नहीं काटते।’’ इस प्रकार द्री त्यौहार में आपसी मिलना-जुलना कई दिनों तक चलता है।

लोसर त्यौहार– 

लोसर त्यौहार वेस्ट कामेंग के मोन्पा तथा तवांग के शेरदुक्पेन के लोग बड़े उत्साह और धूमधाम के साथ नये साल के प्रथम दिवस के रूप में मनाते हैं। यह त्यौहार आम तौर पर फरवरी के अंतिम दिनों या मार्च के शुरूवाती सप्ताह में पड़ता है। यह त्यौहार आठ से पंद्रह दिनों तक रहता है और खुशी और उत्साह से मनाया जाता है। लोसर आरंभ होने से पहले ही सभी लोग खाप्से, चामर, चांगफुल आदि स्वादिष्ट व्यंजन बनाते है। पूजा आरंभ होने पर इन स्वादिष्ट पकवानों को भगवान को समर्पित करते हैं।

बुद्धिष्ट वर्ष के प्रथम महीने के प्रथम दिन से लोसर पूजा आरंभ होती है। पूजा के प्रथम दिन को ‘लामा लोसर’ कहते हैं। उस दिन नए लामा लोग पुराने लामाओं के पास जाकर उनका अभिवादन करते हैं, उन्हें सम्मान देते हैं। पूजा का दूसरा दिन ‘राजा लोसर’ के रूप में मनाया जाता है। इन लोगों का ऐसा विश्वास है कि प्राचीन काल में लोसर पूजा के समय

 

आज के दिन राजा अपनी प्रजा से मिलने के लिए उनके घरों में आते थे। इसी भावना से प्रेरित होकर सभी लोग एक दूसरे के घर जाते हैं और नव वर्ष के उपलक्ष्य में अपनी शुभकामनाएँ व्यक्त करते हैं।  

भविष्य की कामना और अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना की जाती है और लोग अपने घरों में धार्मिक झंडे फहराते हैं। सभी घरों में मक्खन से दीपक जलाये जाते है और जनजातीय लोग अपनी भूमि को बुरी नज़र अथवा किसी आपदा से बचने के लिए प्रार्थना करते है। यह त्यौहार स्थानीय जनजातीय परम्पराओं और रीती-रिवाजों का गवाह है। इस त्यौहार से ‘मोन्पा’ लोगों के सामाजिक सांस्कृतिक और ग्रामीण जीवन को जाना जा सकता है।

इन उपरोक्त त्योहारों के अतिरिक्त अरुणाचल प्रदेश में कई और भी त्यौहार मनाये जाते है जैसे की मेम्बा जनजाति का ‘दूबा’ त्यौहार, इदु-मिशमी जनजाति का ‘रेह’ त्यौहार, वांचू जनजाति का ‘ओजीएल’ उत्सव, सिंग्फो जनजाति का ‘संजो’ नामक उत्सव आदि। अरुणाचल में जनजातियों की जितनी विविधता है उतनी ही विविधता त्योहारों और उत्सवों में भी है। परन्तु एक बात जो गौर करने वाली है वह यह है की अरुणाचल की सभी जनजातियों के त्यौहारों के नाम भले ही अलग-अलग क्यों न हो परन्तु सभी त्योहारों का उद्देश्य और मर्म एक ही है। सभी त्यौहार लोगों की सुख-शान्ति, फसल की अच्छी उपज, प्राकृतिक आपदाओं से मुक्ति की कामना ही करते है और सभी जनजातियों के देवता प्रकृति से सम्बंधित है। अरुणाचल के सभी त्यौहारों में मिथुन, मुर्गी, बकरे की बलि, आपोंग और चावल के आटे का सेवन, विभिन्न रंग के पारंपरिक पोशाक और मालाएं-मनके पहनना, बांस से विभिन्न वस्तुओं का निर्माण करने के मिलते-जुलते रिवाजों की प्रमुखता है।

अतः अरुणाचल के इन त्यौहारों को देखकर अनेकता में एकता याद आती है ।

सहायक पुस्तकें और वेबसाईट

  1. Batem, Pertin, 2018, Folksongs of Arunachal Pradesh, The Directorate of Research, Arunachal Pradesh, Itanagar, ISBN: 181 751 6185X
  2. Batem, Pertin, 2014, Ethnic Communities of Arunachal Pradesh, The Directorate of Research, Arunachal Pradesh, Itanagar, ISBN: 81 751 61351
  3. Vidyarthi, L.P., 1986, Art and Culture of North-East India, Publications Division, Ministry of Information and Broadcasting, Government of India.
  4. सिंह, रामवीर, अंक 3, जुलाई-सितम्बर, 2008, समन्वय पूर्वोत्तर (त्रैमासिक पत्रिका), केन्द्रीय हिंदी संस्थान (गुवाहाटी,दीमापुर, शिलांग)
  5. सिंह, धर्मराज, 1995, अरुणाचल के त्यौहार, अनुसंधान निर्देशालय, अरुणाचल प्रदेश सरकार, ईटानगर
  6. Wikipedia
  7. com
  8. http;//www.indianholiday.com
  9. com
  10. gktoday.com

 

अरुणाचल की लोक संस्कृति

(अरुणाचल प्रदेश के त्यौहारों के विशेष संदर्भ में)

मदालसा मणि त्रिपाठी                                        

शोधार्थी, हिंदी विभाग,

राजीव गाँधी विश्वविद्यालय

दोइमुख, ईटानगर

 

 

 

 

भारत के पूर्व  एवं पूर्वोत्तर, प्राकृतिक बुनावट के कारण उसका  न केवल अभिन्न भाग है बल्कि भारत की समृद्धि में उसकी भूमिका बहुआयामी है । उत्तरपूर्व की भाषाओं की विविधता ही नहीं, बल्कि लोक संस्कृतियों की उच्चता भी अलग से आकर्षित करती है। पूर्व एवं पूर्वोतर के आठ राज्यों में क्रमशः असम, नागालैंड, मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम तथा सिक्किम भारतीय राज्य के कुछ ऐसे राज्य है जिनकी वर्तमान जानकारी समाचारों के माध्यम से भारत के नागरिकों को तो है किन्तु उनकी संस्कृति, भाषा उनके त्यौहार आदि के बारे में बहुत कम आधिकारिक जानकारी शेष भारत को उपलब्ध है। इन राज्यों का इतिहास भी अपने आप में एक रोचक विषय है। यहाँ के लोगो के जातीय ढांचे का अध्ययन तो विद्वानों ने किया है किन्तु मात्रसत्तात्मक वृति की रेखाएँ तो इन प्रांतो की यात्रा से ही पहचानी जा सकती हैं।

       इन पूर्वोत्तर राज्यों का ढांचा जनजातिय रहा है जिसके कारण इनके त्यौहारों और इनकी संस्कृति में इनकी धार्मिक आस्था और विश्वास झलकता है। इन सभी पूर्वोत्तर राज्यों में सभी भिन्न संस्कारों के लिए भिन्न सांस्कारिक क्रिया- कलाप तथा अलग पर्व एवं त्यौहार है। लेकिन वास्तविकता यही है कि इतनी विविधता होते हुए भी सब एक दूसरे के उत्सव और त्यौहारों में हाथ बटाते हैं और उतनी ही श्रद्धा और विश्वास के साथ उन त्यौहारों को मानते भी है। जैसे की अरुणाचल प्रदेश में

भिन्न- भिन्न जातियों के भिन्न त्यौहार है- निशी जनजाति का न्योकुम, आदि-गालो जनजाति का मोपिन, आपातानी का मोरोम आदि। अरुणाचल प्रदेश के इन पर्व त्यौहारों को  जानने से ही इन राज्यों की संस्कृति को जाना जा सकता है।

कई अलग-अलग जनजातियाँ हैं जो अरुणाचल प्रदेश में निवास करती हैं और जो इसे विविध संस्कृतियों और परंपराओं का एक बड़ा मिश्रण बना देती है। ये विभिन्न जनजातियाँ कृषि, धार्मिक और सामाजिक, सांस्कृतिक उत्सव मनाती हैं, जहां वे नाचते, गाते, प्रार्थना करते हैं, एक समुदाय के रूप में आभार और भोज करते हैं। इन त्यौहारों का अनुष्ठान पुजारी द्वारा किया जाता है और अन्य व्यवस्थाएँ लोगों द्वारा सामुदायिक स्तर पर की जाती हैं। अरुणाचल प्रदेश में अधिकांश त्यौहारों में पशु बलि दी जाती है, यह अरुणाचल का एक सामान्य अनुष्ठान है। अधिकांश त्यौहार कृषि से जुड़े होते है और बड़े पैमाने पर देवताओं को खुश करने और अच्छी फसल के लिए देवताओं को धन्यवाद करने के लिए मनाया जाता है। त्यौहारों को पूरे वर्ष विभिन्न जनजातियों द्वारा मनाया जाता है। अरुणाचल के ऐसे ही कुछ कृषि, पशु बलि, प्रार्थनाओं से जुड़े त्यौहार इस प्रकार है:-

 

 

  • सोलुंग त्यौहार

सोलुंग आदि जनजाति का एक बहुत ही प्रमुख सामाजिक-धार्मिक त्यौहार है, जिसे मुख्यतः सितम्बर माह में मनाया जाता है, परंतु हर वर्ष इसकी तिथि बदलती रहती है। यह ईस्ट सियांग, वेस्ट सियांग और दिबांग वेली जिलों में प्रमुखता से मनाया जाता है। सोलुंग त्यौहार फसल से जुड़ा त्यौहार है जो कृषि से संबन्धित है, जिसमें धान के बीजों को खेतों में रोपने के बाद मनाया जाता है। यह त्यौहार पाँच से अधिक दिन भी रेहता है तथा इसके तीन मुख्य भाग होते है, जिसमें प्रथम दिन पूजा की तैयारी से शुरू होता है, जिसमें आगे के दिनों में बलि देने के साथ सहभोज किया जाता है और शाम को पूनुंग नृत्य और संगीत की व्यवस्था होती है। पूनुंग एक गीत होता है जिसमें विभिन्न प्रकार के जानवरों की उत्पत्ति की कथाएँ कही जाती है जिसे “लिमिर लिबांग आबांग’ भी कहते हैं। यह त्यौहार देवी-देवताओं अर्थात किने-नाने और दोइंगबोते  को प्रसन्न करने हेतु, अच्छी फसल और लोगों की सुख-शांति की कामना के साथ मनाया जाता है। इस त्यौहार के अंतिम दिन पोपुंग नृत्य किया जाता है जिसमें तरह-तरह के हथियारों की उत्पत्ति की कहानी गीतों के रूप में गया जाता है।

यह एक ऐसा अवसर है जहां लोग अपने कालातीत विश्वासों और परंपराओं को फिर से स्थापित करते हैं और विभिन्न अनुष्ठानों के मध्याम से आध्यात्मिकता के साथ अपने संबंधों को नवीनीकृत करते हैं।

  • मोपिन त्यौहार

मोपिन, अरुणाचल प्रदेश के आदि जनजाति के गालो समुदाय का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है और हर साल इसे पूरे राज्य में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह त्यौहार प्राकृतिक आपदा, रोग, बुरी आत्माओं के प्रभाव से छुटकारा पाने के लिए और स्वास्थ्य, धन और समृद्धि पाने के लिए मनाया जाता है। इस त्यौहार के दौरान मोपिन देवी जिन्हें प्रजनन क्षमता और समृद्धि का जनक भी माना जाता है उनकी पूजा की जाती है। त्यौहार के दौरान महिलाएं अपने पारंपरिक उज्व्वल रंग के गाले और गालुक पहनती है, सिर पर बांस निर्मित ऊपर से खुली टोपी के साथ पीले मूँगों की माला पहनती है जिसे ‘तादोक’ कहते है और यह पोशाकों और आभूषणों से लोगों को मंत्रमुग्ध करती हुई लोकप्रिय ‘पोपिर’ नृत्य करती है। इस त्यौहार में मिथुन की बलि और चावल के आटे का घोल एक-दूसरे पर लगाना आदि कुछ महत्वपूर्ण क्रियाएं हैं। इस प्रकार मोपिन त्यौहार द्वारा अप्रैल माह के शुरुवात में पांच दिनों तक शुभकामनाओं का आदान-प्रदान किया जाता है।

  • न्योकुम त्यौहार

न्योकुम के विषय में लेखक धर्मराज सिंह अपनी पुस्तक ‘अरुणाचल के त्यौहार’ में स्पष्ट रूप से कहते है की “ ‘न्योकुम’ निशी जनजाति का सर्वप्रमुख त्यौहार है। न्योकुम दो शब्दों के संयोग से (न्योक+उम) बना है, इनकी भाषा में  ‘न्योक’ का अर्थ है सम्पूर्ण धरती और ‘उम’ का अर्थ है चीजों को एक जगह इकट्ठा करना अर्थात न्योकुम का अध्यात्मिक अर्थ है पृथ्वी पर के सभी देवी और देवताओं को ‘न्योकुम’ देवी के पास किसी मुख्य स्थान पर तथा निश्चित समय पर एकत्र करके सब की पूजा एक साथ सामूहिक रूप से करना।’’

           

यह पूजा लोअर वेली के निशी मनाते है। इस पूजा में किसी जाति, धर्म, भाषा, सामाजिक स्तर को महत्त्व नहीं दिया जाता। निशी जनजाति के सभी लोग धन, वैभव, प्रसन्नता, कृषि में अच्छी उपज तथा बिमारियों से बचने के लिए, यह पूजा बड़ी श्रद्धा और लगन के साथ सामूहिक रूप से प्रतिवर्ष 24 फ़रवरी से 28 फरवरी के मध्य करते है। निशी लोग यह भी मानते है की पृथ्वी पर कई देवता और आत्माएं हैं। ये पहाड़, नदी, जंगल, जानवर, फसल, गृहस्थी आदि के देवता और आत्माएं है और मनुष्य इस पृथ्वी पर शांति और समृद्धि का जीवन तभी जी सकता है, जब मनुष्य, देवता और प्रकृति के बीच पूर्ण सामंजस्य बना रहे। इनके मुख्य प्रार्थना के स्थान पर बांस से बनी संरचना होती है, जहाँ बलि देने वाले जानवरों को रखा जाता है। पुरुष एवं स्त्रियाँ सुन्दर पारंपरिक कपड़े पहनते है, पुरुष सफ़ेद सूती पोशाक पहनते है जो उनके कंधे पर लिपटा हुआ होता है और सर पर लकड़ी की टोपी पहनते है जिस पर हार्नबिल की चोच लगी होती है। इस त्यौहार में सामूहिक रूप से नाच-गाना किया जाता है। आमतौर पर पुरुष और महिलाएं गोलाकार वृत्त बनाकर, हाथ पकड़कर एक साथ गाते हैं और नृत्य करते हैं। इस त्यौहार को वार्षिक कृषि पर्व के रूप में भी मनाते हैं, जिसमें मेल-मिलाप और भाई-चारे के दृश्य देखने को मिलते हैं।

 

  • ताम्लाडू त्यौहार–

ताम्लाडू त्यौहार मुख्य रूप से दिगारू मिशमी जनजाति द्वारा मनाया जाता है। प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा के लिए यह लोग पानी के देवता बुयुया और पृथ्वी के देवता ‘दुयुया’ से प्रार्थना करते हैं। इस त्यौहार को अत्यंत उत्साह और श्रद्धा के साथ प्रत्येक वर्ष मार्च महीने में मनाया जाता है और यह नव वर्ष का सूचक होता है। इस पर्व में मुख्यतः जेबमालू की पूजा करके प्रार्थना की जाती है कि वे उनको हर प्रकार की सुख-समृद्धि दे, मानव जाति का कल्याण करें। इस त्यौहार का मुख्य आकर्षण नृत्य और संगीत होता है। यह नृत्य और संगीत सूर्य भगवान को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है।

बूरीबूत त्यौहार–

बूरीबूत अपर वेली के निशी जनजाति का बड़ा ही महत्वपूर्ण त्यौहार है, ये नए बने कामले जिला के निशियों का उत्सव है। यह त्यौहार फरवरी माह के तीसरे सप्ताह में प्रतिवर्ष मनाया जाता है। इनकी भाषा में बूरीबूत का तात्पर्य है- पूर्ण एकता अर्थात् ऐसी एकता जिसमें धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर या सामाजिक स्तर के नाम पर किसी भी प्रकार का अंतर न हो। इस त्यौहार का मुख्य आकर्षण पुरूषों, महिलाओं और बच्चों द्वारा स्थानीय पुजारी के नेतृत्व में निकाला जा रहा जुलूस  होता है, जिसके लिए सभी अपने पारंपरिक परिधानों में तैयार होते हैं। इस त्यौहार में भी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए मिथुन और अन्य जानवरों की बलि दी जाती है। यह हिलमिरी लोगों की एकता और सौहार्द का त्यौहार है।

सी दोन्यी त्यौहार–

सी-दोन्यी तागिन जनजाति का सर्वप्रमुख त्यौहार है। धान की फसल कट जाने के बाद ही यह त्यौहार सामूहिक रूप से समस्त ग्रामीणों द्वारा एक जगह मनाया जाता है। ‘सी’ पृथ्वी का प्रतीक है और ‘दोन्यी’ सूर्य का प्रतीक है। तागिन लोगों का मानना है कि सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी मनुष्य के दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस त्यौहार के दौरान चावल के आँटे में अपोंग (चावल की शराब) मिलायी जाती है और सभी को इसे उदारतापूर्वक पिलाया जाता है। सी

 

दोन्यी उत्सव को बड़े पैमाने पर आयोजित किया जाता है जिसमें सभी अपनी क्षमतानुसार योगदान देते है, इसलिए यह एक सामूहिक उत्सव भी बन जाता है। तागिन जनजाति के बुजुर्ग सी-दोन्यी समिति के सदस्यों का गठन करते हैं और चयनित निबू (पुजारी) के निर्देशन में सी दोन्यी उत्सव मनाते हैं। यह माना जाता है कि सी दोन्यी उत्सव मनाने से, इस सृष्टि के निर्माता सी और दोन्यी न केवल संतुष्ट होंगे बल्कि लोगों को अच्छी फसल के साथ उन्हें बीमारियों से बचने का आशीर्वाद भी देंगे। यह समृद्धि, सफलता और प्रचुरता के लिए मनाया जाने वाले त्यौहार है। इस त्यौहार के दौरान लड़के-लड़कियाँ बाँस के डोंगर के साथ रंगीन पोशाक पहनते हैं तथा साथ में गीत और नृत्य का प्रदर्शन भी करते हैं।

द्री त्यौहार–

द्री त्यौहार आपातानी जनजाति का बड़ा महत्वपूर्ण तथा आनंददायक त्यौहार है। यह प्रति वर्ष जुलाई माह में तीन दिनों तक मनाया जाता है। इस त्यौहार में देवताओं को जानवरों की बलि समर्पित की जाती है। इस त्यौहार के दौरान तमू, मति, दानी और हारनियांग नामक देवताओं को पूजा जाता है। इन देवताओं को खुश करने के लिए ही यह त्यौहार मनाया जाता है। इस द्री उत्सव के दौरान हर घर में अपोंग तैयार किया जाता है और घरों और उसके आसपास की सफाई का जाती है। प्रधान पुजारी इन समारोहों और अनुष्ठानों के नेता के रूप में कार्य करते है। त्यौहार के लिए स्थान का निर्धारण गांव के पुजारी और बुजुर्ग लोग करते हैं। दानी भगवान की प्रार्थना रक्षा और समृद्धि के लिए की जाती है, पौधों को हानिकारक कीटों और कीड़ों से बचाने के लिए तमू की प्रार्थना की जाती है और मति से अकाल और महामारी के संक्रमण से बचने के लिए प्रार्थना की जाती है। हारनियांग से मिट्टी को स्थिर रखने और धान के पौधों को सूखने से रोकने के लिए प्रार्थना की जाती है। इस उत्सव में लड़के-लड़कियाँ साथ मिलकर प्री नामक नृत्य करते हैं।बूढ़े लोगों के सम्मानार्थ उनको लोग अलग से विशेष रूप से चावल की शराब देते हैं।

द्री के विषय में लेखक धर्मराज सिंह अपनी पुस्तक ‘अरुणाचल के त्यौहार’ में वर्णन करते है की “पूजा के समय जमीन को खोदना या खेतों में हल चलाना वर्जित है कहा जाता है कि इस समय धरती माँ उत्पत्ति विषयक विशेष शक्ति का अर्जन करती है। अतः हल चलाकर या मिट्टी खोदकर उसे क्षति नहीं पहुँचाना चाहिए। आपातानी लोग पूजा के तीन दिनों तक किसी भी प्रकार की हरी साग-सब्जी नहीं तोड़ते हैं, घास और वृक्ष भी नहीं काटते।’’ इस प्रकार द्री त्यौहार में आपसी मिलना-जुलना कई दिनों तक चलता है।

लोसर त्यौहार– 

लोसर त्यौहार वेस्ट कामेंग के मोन्पा तथा तवांग के शेरदुक्पेन के लोग बड़े उत्साह और धूमधाम के साथ नये साल के प्रथम दिवस के रूप में मनाते हैं। यह त्यौहार आम तौर पर फरवरी के अंतिम दिनों या मार्च के शुरूवाती सप्ताह में पड़ता है। यह त्यौहार आठ से पंद्रह दिनों तक रहता है और खुशी और उत्साह से मनाया जाता है। लोसर आरंभ होने से पहले ही सभी लोग खाप्से, चामर, चांगफुल आदि स्वादिष्ट व्यंजन बनाते है। पूजा आरंभ होने पर इन स्वादिष्ट पकवानों को भगवान को समर्पित करते हैं।

बुद्धिष्ट वर्ष के प्रथम महीने के प्रथम दिन से लोसर पूजा आरंभ होती है। पूजा के प्रथम दिन को ‘लामा लोसर’ कहते हैं। उस दिन नए लामा लोग पुराने लामाओं के पास जाकर उनका अभिवादन करते हैं, उन्हें सम्मान देते हैं। पूजा का दूसरा दिन ‘राजा लोसर’ के रूप में मनाया जाता है। इन लोगों का ऐसा विश्वास है कि प्राचीन काल में लोसर पूजा के समय

 

आज के दिन राजा अपनी प्रजा से मिलने के लिए उनके घरों में आते थे। इसी भावना से प्रेरित होकर सभी लोग एक दूसरे के घर जाते हैं और नव वर्ष के उपलक्ष्य में अपनी शुभकामनाएँ व्यक्त करते हैं।  

भविष्य की कामना और अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना की जाती है और लोग अपने घरों में धार्मिक झंडे फहराते हैं। सभी घरों में मक्खन से दीपक जलाये जाते है और जनजातीय लोग अपनी भूमि को बुरी नज़र अथवा किसी आपदा से बचने के लिए प्रार्थना करते है। यह त्यौहार स्थानीय जनजातीय परम्पराओं और रीती-रिवाजों का गवाह है। इस त्यौहार से ‘मोन्पा’ लोगों के सामाजिक सांस्कृतिक और ग्रामीण जीवन को जाना जा सकता है।

इन उपरोक्त त्योहारों के अतिरिक्त अरुणाचल प्रदेश में कई और भी त्यौहार मनाये जाते है जैसे की मेम्बा जनजाति का ‘दूबा’ त्यौहार, इदु-मिशमी जनजाति का ‘रेह’ त्यौहार, वांचू जनजाति का ‘ओजीएल’ उत्सव, सिंग्फो जनजाति का ‘संजो’ नामक उत्सव आदि। अरुणाचल में जनजातियों की जितनी विविधता है उतनी ही विविधता त्योहारों और उत्सवों में भी है। परन्तु एक बात जो गौर करने वाली है वह यह है की अरुणाचल की सभी जनजातियों के त्यौहारों के नाम भले ही अलग-अलग क्यों न हो परन्तु सभी त्योहारों का उद्देश्य और मर्म एक ही है। सभी त्यौहार लोगों की सुख-शान्ति, फसल की अच्छी उपज, प्राकृतिक आपदाओं से मुक्ति की कामना ही करते है और सभी जनजातियों के देवता प्रकृति से सम्बंधित है। अरुणाचल के सभी त्यौहारों में मिथुन, मुर्गी, बकरे की बलि, आपोंग और चावल के आटे का सेवन, विभिन्न रंग के पारंपरिक पोशाक और मालाएं-मनके पहनना, बांस से विभिन्न वस्तुओं का निर्माण करने के मिलते-जुलते रिवाजों की प्रमुखता है।

अतः अरुणाचल के इन त्यौहारों को देखकर अनेकता में एकता याद आती है ।

सहायक पुस्तकें और वेबसाईट

  1. Batem, Pertin, 2018, Folksongs of Arunachal Pradesh, The Directorate of Research, Arunachal Pradesh, Itanagar, ISBN: 181 751 6185X
  2. Batem, Pertin, 2014, Ethnic Communities of Arunachal Pradesh, The Directorate of Research, Arunachal Pradesh, Itanagar, ISBN: 81 751 61351
  3. Vidyarthi, L.P., 1986, Art and Culture of North-East India, Publications Division, Ministry of Information and Broadcasting, Government of India.
  4. सिंह, रामवीर, अंक 3, जुलाई-सितम्बर, 2008, समन्वय पूर्वोत्तर (त्रैमासिक पत्रिका), केन्द्रीय हिंदी संस्थान (गुवाहाटी,दीमापुर, शिलांग)
  5. सिंह, धर्मराज, 1995, अरुणाचल के त्यौहार, अनुसंधान निर्देशालय, अरुणाचल प्रदेश सरकार, ईटानगर
  6. Wikipedia
  7. com
  8. http;//www.indianholiday.com
  9. com
  10. gktoday.com

 

भारतीय लोक साहित्य में पर्यावरण: विकास कुमार गुप्ता

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भारतीय लोक साहित्य में पर्यावरण

विकास कुमार गुप्ता
होजाई, असम पिन-782435
Vikashg891@gmail.com
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आदि काल से ही नहीं बल्कि युगो-युगो से है और यह एक दूसरे के पूरक हैं । इन दोनों का संबंध सदियों से स्थापित है और दिनों दिन यह और भी विस्तार होते जा रहे हैं । इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारतीय साहित्य हो या पर्यावरण जब भी इनकी चर्चा की जाती है तो भारत की संस्कृति, लोक साहित्य और धर्म का विषय हमारे सामने खुद-ब-खुद उभरकर आ ही जाता है इसका एक ही कारण है कि इनका आपसी में घनिष्ठ संबंध । इसलिए अगर आप इन किसी भी विषय पर अगर चर्चा करते हैं तो यह एक दूसरे के पूरक बनकर हमारे सामने आएंगे ही इसे हम नकार नहीं सकते ।

                भारत में लोक साहित्य और पर्यावरण का संबंध आपको पूरे भारत में सभी राज्यों में भिन्न-भिन्न जाति जन-जातियों , धर्मों आदि में आपको इन दोनों का संबंध पूर्ण रूप से देखने को मिलेगा । इससे वंचित रह कर कोई भी व्यक्ति अपनी दैनिक कार्य हो या कोई विशेष कार्य वह अपनी कार्य की पूर्ति नहीं कर सकता । पर्यावरण का संबंध हर उस वस्तु जीव-जंतु प्रकृति से है जिसमें प्राण है । पर्यावरण का जिक्र आपको तब अधिक मात्रा में पूरा होने का पता चलेगा जब आप किसी धार्मिक स्थल पर उपस्थित हो या आप खुद कोई धार्मिक कार्य अनुष्ठान करा रहे हो तब आपको पर्यावरण से संबंधित वस्तुओं का आभास और उस वस्तु की इच्छा अधिक प्रतीत होती है । जिसमें सबसे पहले

पर्यावरण से संबंधित मनुष्य, पेड़-पौधे (नीम, आम, बेल, वट, केले, बरगद, चंदन, तुलसी, पीपल) आदि जीव जंतु (गाय, मुर्गी, मछली, कछुआ, सर्प) आदि सूर्य, चंद्र, मिट्टी, जल आदि पर्यावरण से संबंधित सभी वस्तुएं खाद्य पदार्थ आदि की हमें खासकर पूजा पाठ में जरूरत होती है । जिसमें मनुष्य प्रकृति और पर्यावरण की पूजा करता है और स्वस्थ रहने की कामना भी करता है । भारत में सूर्य देव, नदियों, वृक्षों, चंद्रदेव, तुलसी, वटवृक्ष, गाय, बरगद, आदि अनेक चीजों की पूजा सदियों से करता आ रहा है जिसका सीधा संबंध हमारे पर्यावरण और पर्यावरण का धर्म से और धर्म का जाति जनजातियों की अलग-अलग संस्कृति और लोक आस्था से है जो कि मनुष्य की आस्था का प्रतीक है । वह साफ-साफ हमें आपसी तालमेल होने का दिखाई पड़ता है इससे भारत की कोई भी राज्य छुटी नहीं है उस राज्य में भले ही विभिन्न जातियां रहती हूं उनका संबंध पर्यावरण और धर्म से है ।

              भारत में हमेशा चिंतन के विविध पहलू रहे हैं भारत हमेशा विश्व को प्रेरणा देने वाला देश रहा है आज वर्तमान में चल रहे पर्यावरण  से संबंधित समस्या को भारत ही रास्ता दे सकता है इसमें हम सिर्फ पर्यावरण का जो संबंध धर्म से है बस उसका सही सही सदुपयोग करना है जैसे:-

लोक साहित्य और नदियां :-  हम नदियों को लोकमाता कहकर पुकारते हैं शास्त्रों में भी स्नान करते समय शप्त नदियों को याद करने का विधान है । विश्व की किसी भी संस्कृति में नदी और इसकी महत्ता को लेकर इतनी चिंतित नहीं है फिर भी आज विकास की अंधी दौड़ की वजह से हमारे देश में नदियां प्रदूषित हो रही है और भी ऐसे अनेक कार्य है जिससे नदियां प्रदूषित हो

रही हैं नदियों का प्रदूषण ना हो और उनका अच्छी तरह से उपयोग हो यही हमारी संस्कृति की सीख है ।

लोक साहित्य और धरती :- सुबह उठते ही हम सर्वप्रथम धरती माता को वंदन करते हैं एवं उनसे क्षमा याचना करते हैं कि हम उन पर ना चाहते हुए भी पैर रख रहे हैं धरती हमारी बोझ को ग्रहण करती है और हमारी ज्यादातर प्रक्रिया धरती पर ही होती है एवं धरती का हमारे ऊपर विशिष्ट योगदान है । इसलिए हमें धरती का उपकारी रहना चाहिए यदि सभी लोग धरती को इसी तरह मां मानने लगे तो हम लोग धरती के प्रदूषण को तो दूर करेंगे ही अपितु पूरी पृथ्वी की रक्षा भी कर सकेंगे । हमने तो वसुधैव कुटुंबकम का विचार विश्व के समक्ष रखा जिसका अर्थ यह होता है कि पूरी वसुधा यानी कि पृथ्वी हमारे लिए एक कुटुंब जैसी है विश्व के हर एक पशु पक्षी और वनस्पति के प्रति मित्रता भाव यही हमारी संस्कृति है ।

लोक साहित्य और वृक्ष या पेड़–पौधे :-  हर हिंदू के घर में प्रायः तुलसी का पौधा रहता ही है । तीज त्यौहार पर घर में उसकी पूजा-अर्चना भी होती है हमारे देश में ईश्वर को चढ़ाने वाले भोग (प्रसाद) में भी तुलसी का पत्र रखा जाता है तुलसी के बिना पूजा अधूरी है । हम तो माला में भी तुलसी का उपयोग करते हैं उसी तरह बरगद, नीम, पीपल आदि के पेड़ों का भी विशिष्ट महत्व है । गीता में भी श्री कृष्ण कहते हैं कि पीपल का वृक्ष सबसे ज्यादा प्राणवायु अर्थात ऑक्सीजन देता है । हमारी सबसे पौराणिक चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद ही इस बात का प्रमाण है कि हम पूर्व से ही वनस्पति के अभ्यास के आदि रहे हैं । हमने वनस्पति की प्रकृति महत्व और उससे उगने वालों स्थानों के बारे में सोचा है हमें हमारे पूर्वजों से वनस्पति और वृक्षों के बारे में इतना ज्ञान देने

के लिए आभार व्यक्त करना चाहिए । वृक्षों का काटने के बजाय उनका संवर्धन हो ऐसी व्यवस्था बनाने की जरूरत है । वृक्ष का महत्व एक संस्कृत सुभाषित में दिखाया गया है वृक्ष खुद धूप में खड़े होकर दूसरों को छाया प्रदान करते हैं अन्य को फल प्रदान करते हैं हमें इसकी संरक्षण करना चाहिए । करवा चौथ और  वट सावित्री के व्रत तो हमारे प्रकृति पूजा के साक्षात उदाहरण हैं । ऋग्वेद की एक ऋचा में फसल के कितने भाग किन पशु को देनी चाहिए  उसका भी वर्णन है । हमारे यहां लोग  नदी स्नान , पर्वत पर तीर्थ यात्रा कर रहे हैं । इत्यादि का महत्व मनुष्य को धार्मिक मान्यताओं को पर्यावरण के साथ जागृत करना है ।

                सभी धर्मों का अवलंबन पर्यावरण है । प्रकृति को अलग करके धर्म की कल्पना भी नहीं की जा सकती । इहलोक और परलोक के बीच ईश्वर का साक्षात स्वरूप प्रकृति ही है वस्तुतः पंचतत्व ही पंच परमेश्वर है यही अंतर पर्यावरण और धर्म है । धर्म ना बाहरी आडंबर है और ना ही कर्मकांड धर्म तो धारण करने की अवस्था है धर्म वह है जिसे धारण किया जाए । पर्यावरण ना तो नया नाम है और ना ही उसकी अवधारणा ही नयी है । धर्म के नाम पर तो बहुत काम हुए लेकिन ईश्वरीय संरचना पर कुछ भी काम नहीं । हमें ईश्वरीय संरचना पर काम करना अति आवश्यक है जिससे पर्यावरण और धर्म दोनों की रक्षा की जा सके ।

                लोक साहित्य और पर्यावरण का संबंध अगर आप आगे देखते हैं तो हमारे त्योहारों में भी भली-भांति नजर आती है । जिसमें उत्तराखंड का उत्तरायण पर्व हो या केरल का ओणम पर्व कर्नाटक की रथ सप्तमी हो या फिर बिहार का छठ पर्व आदि देख सकते हैं । इसके अलावा आप आंचलिक पर्व और त्योहारों को

भी देख सकते हैं इसमें अरुणाचल प्रदेश में द्योनी पोलो पर्व हो या असम का बिहू नृत्य भी इसमें शामिल है । पूरे भारत में संक्रांति के दिन ही अलग-अलग राज्यों में भी प्रकृति से संबंधित त्यौहार को मनाया जाता है इसमें पोंगल लोहड़ी इत्यादि शामिल है और भी ऐसे अनेक राज्य है जिसमें पर्यावरण से संबंधित धर्म को लोक आस्था का प्रतीक मानकर पूजा किया जाता है । यह हमारी भारतीय संस्कृति का एक अटूट हिस्सा है जो प्रकृति ने हमारे पूर्वजों को दिया और आज भी किसी न किसी रूप में हम पर्यावरण को ध्यान में रखकर इसकी समय-समय पर पूजा-पाठ और प्रार्थना भी करते हैं और संरक्षण भी जो कि पूरे भारतवर्ष के लिए फलदायी है ।

         आत: हम स्पष्ट रुप से कह सकते हैं कि पौराणिक कालो से ही पर्यावरण का संबंध मानव  से है जो आज भी आधुनिक काल में भी विभिन्न धर्मों के लोग भिन्न-भिन्न तरीके से इसकी पूजा अर्चना कर प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापन करते हैं और इसका भली-भांति संरक्षण आदि  भी करते हैं और आगे भी करते रहेंगे इसमें मनुष्यों को थोड़ा सही दिशा देने की आवश्यकता

हरसिल गाँव और  महापंडित  राहुल सांस्कृत्यायन की कुटिया:-संतोष बंसल

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हरसिल गाँव और  महापंडित  राहुल सांस्कृत्यायन की कुटिया

–संतोष बंसल

उत्तरकाशी में कंक्रीट के मलबे को देख मन में उस प्रलय का बिम्ब बार बार उभर रहा था और यही ख्याल आ रहा था कि पहाड़ों की खूबसूरत दुनिया को इंसान अपने ही हाथो उजाड़ रहा है। इस कटु चित्र को लिए हम बस से आगे बढ़ते हुए रात होने से पहले हर्षिल पहुँचने की फ़िक्र में थे । शाम के लगभग चार -साढ़े चार का समय था  कि हम ऐसे स्थल पर पहुंचे ,जो कुदरत का बेहतरीन नगीना था। सामने दूर ऊंचाई पर पहाड़ो के ऊपर सफ़ेद बर्फ सूरज की किरणों में रुपहली हो चमक रही थी ,उसके साथ ही बादल भी धुनती रूईयों के से गोले  बन आसमान में तैर रहे थे और इन सबके बीच सूरज जैसे एक सितारे की तरह सुनहरा सतरंगी बिम्ब बना रहा था।यह चित्र वैसा ही था ,जैसा की हम बचपन में सूरज को रेखांकित करने के लिए बीच में गोला और फिर उसके चारो तरफ किरणों की  रेखाएं  खींच देते थे। यह टकनौर  ग्राम था ,जो नीचे तलहटी में बसा था। लेकिन  जहां हम खड़े थे ,वहां से बहुत नीचे था वह ,जहाँ कई जल धाराएं पहाड़ों से निकल कर बह रही थी। हमारे सामने सड़क के उस पार  सेब के छोटे छोटे पौधे लगे थे ,जिनमे फल लगने के लिए अभी  कई वर्ष लगेंगे। लेकिन इस जगह  लाल राजमा की खेती बहुत अधिक मात्रा में होती है  और  यहां से पूरे भारत में सप्लाई  होता है। वहां बने विश्राम स्थल पर खड़े होकर नीचे हरी -भरी घाटी की ओर झांका तो बचपन में देखी फिल्म ‘गीत ‘का  वह गाना मन में  गूंजने लगा। ‘आजा तुझको पुकारे मेरे गीत ‘के स्वर वाला वह गाना ,सिल्वर जुबली ‘कुमार के नाम से विख्यात स्वर्गीय राजेंदरकुमार पर फिल्माया गया था। 

 

पहाड़ी पोशाक में बांसुरी बजाते हुए नायक की पृष्ठभूमि यानी ‘लोकेशन ‘ हूबहू बिलकुल ऐसी ही थी। हमसे  पूर्व यात्रा कर चुके मित्र ने बताया कि यहाँ  हर्षिल में स्वर्गीय राजकपूर की अंतिम फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली हो गयी ‘की शूटिंग हुई थी और फिल्मकारों को यह स्थल विशेष प्रिय है। एवं  सामने दिखने वाली  पर्वत श्रृंखला ही गंगोत्री स्थल है और वहीँ

से और  आगे बढ़ते हुए गौमुख  है जहाँ के ग्लेशियर से गंगा निकलती है।

हमने उस दृश्य को  देखने के लिए सिर ऊपर उठाया तो निगाह थम कर रह गयी। पहाड़ों पर बिछी बर्फ से उठती धुंध की लहरे जैसे अपनी लय  और गति से  गीत -संगीत बुनती हुई चित्रों की विविध छवियों की अपार छटा बिखेर रही थी। अगर कल्पनाओं के घोड़े दौड़ाएं तो उन बदलती रूप -रेखाओं में असंख्य भाव चित्रों को देखा जा सकता था। उनमे पहाड़ों की परिया भी निहारी जा रही थी ,तो स्वर्ग की अप्सराएं भी रथ पर सवार देखी जा सकती थी। वह शब्दातीत दृश्य था ,जिसे वर्णित नहीं किया जा सकता। वहां से बस में आगे बढ़ते हुए हम करीब पांच  बजे हर्षिल पहुंचे ,तब तक सूरज छिप गया था ,किन्तु अँधेरा अभी घिरा नहीं था। पुलिया पार करते हुए पानी के तेज शोर से यह ज्ञात हुआ कि हम गाँव की सरहद में प्रवेश कर चुके हैं एवं पानी की यह तेज धारा भागीरथी नदी की थी ,जो अब सिर्फ बस में बैठे हुए सुनाई दे रही थी। चूँकि भारतीय सेना की छावनी भी हर्षिल के ही इलाके में है ,इसीलिए उसी सड़क पर मिल्ट्री के बहुत से ट्रक खड़े थे। सड़क के दोनों ओर छुटपुट दुकाने थी, जिनमे रोजमर्रा की जरुरत का सामान ही बिकता है। चूँकि रात होने वाली थी ,इसीलिए हमने जल्दी से होटल में अपना सामान छोड़ा और गर्म  कपडे

 

पहनकर अपने ग्रुप के साथ जल्द ही बाहर निकल आये। वहां से कुछ ही दूरी पर चौक से  आगे खुला स्थल था ,जहाँ एक बहुत पुराना वटवृक्ष था और जिस पर बहुत सी लाल झंडिया लगी हुई थी। अगर हम किसी स्थान पर जाए और वहां की परम्पराये जाने तो लोक जीवन की सही पहचान तभी होती है। वह एक ऐसा चौराहा था ,जहाँ से कई दिशाओं के मार्ग गुजर रहे थे लेकिन हमने बाई तरफ जाने की ठानी। सड़क पर थोड़ा आगे बढ़ने पर एक  पुल  नजर आया जो दोनों तरफ ऊँची लोहे की मजबूत सलाखों की ‘ग्रिल ‘से ढका था । इसी बीच हलकी -हलकी बूंदा बांदी शुरू हो गयी ,जिससे बचने और नदी को नजदीक से देखने के लिए हम सभी लोग पुलिया के नीचे और उसकी दीवार की ओट में खड़े हो गए। पत्थरों के बड़े -छोटे असंख्य टुकड़ों के बीच साफ़ स्वच्छ धारा कुलांचे भर रही थी। यह पूरा स्थल एक कटोरे की तरह था ,जिसका इधर का हिस्सा  पूरी तरह पत्थरों से पटा  हुआ था और उधर गाँव तथा छावनी बसी थी। ऐसा लग रहा था मानो कोई बड़ा पहाड़ टूट कर टुकड़े टुकड़े हो प्रचंड जलधारा के साथ बहता हुआ यहाँ आकर फ़ैल गया हो।

                                                                      हरसिल वासी इसे विष्णु गंगा या कंकड़ गंगा के नाम से बुलाते हैं, लेकिन यह भागीरथी से भिन्न अलग ‘कन्दोमती पर्वत ‘से निकलने वाली धारा है। इसके  पीछे एक पौराणिक कथा है जो अभी तक हमने सरसरी तौर पर कार्तिक माह में देव उठनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह पर पुरोहितों से सुनी थी। इस कथा में तुलसी का विवाह शालिग्राम से होता है ,जो विष्णु के ही रूप हैं। किन्तु इस स्थल पर उसके साक्ष्य प्रतीक रूप से उस कथा से कैसे सम्बंधित हैं ?यह मैं देख और जांच रही थी। दूसरे

 

किसी ने इसका नाम कंकड़ गंगा ठीक ही रखा था ,क्योंकि चारो  ओर बड़े गोल कंकड़ ही फैले हुए थे। इस आधे किलोमीटर का एरिया इसी तरह का था ,संभवतःनदी में  जल  की मात्रा बढ़ने पर इस पूरे मैदान में पानी पहुँच जाता होगा। हम सभी को श्री निलय उपाध्याय जी  अपनी अगुवाई में इससे आगे ले गए। अब तक उबड़ -खाबड़ लेकिन समतल मैदान में चलते हुए तभी  एक उठी हुई मेढ़ सी दीवार दिखी ,जो  उस घाटी से थोड़ा ऊंचा स्थल था। और यहाँ भी एक छोटी पुलिया थी ,जो दोनों ओर से लोहे की ऊँची जाली से  घिरी थी ,जिससे हम नीचे झाँक पाने में भी असमर्थ थे। इस नदी का सम्बन्ध भी उसी पौराणिक कथा से जुड़ा है एवं  इसे जालंधरी या जलद्री  नदी के नाम से जाना जाता है।निलय जी ने यह भी बताया कि इसी गाँव में वह प्राचीन लक्ष्मी नारायण मंदिर  है ,जहाँ विष्णु देवता जालंधर की पत्नी वृंदा द्वारा शाप ग्रसित होकर शिला बन गए थे। और हरि  यानी विष्णु के शिला बनने की वजह से ही इस गाँव का नाम ‘हरसिल ‘पड़ा। चूँकि यह सब सुनने में इतना रोचक लग रहा था कि इस पौराणिक कथा को पूर्ण रूप से जानने की मेरी  इच्छा बनी रही। यह सारा वृत्तांत यात्रा के कई वर्षो बाद  अब जान पाई हूँ, जिसका विवेचन मैं  आगे करूंगी। उस समय  तो यह भी सुना  कि इसके पार ‘भोटिया ‘लोग रहते हैं ,जो मूलतः तिब्बती हैं और बहुत पहले से यह व्यापार के लिए प्रयुक्त होने वाला रास्ता है। और तिब्बत के इसी रास्ते से महापंडित  श्री राहुल सांकृत्यायन जी हर्षिल आये थे ,जो उन्हें इतना अच्छा लगा कि उन्होंने लम्बा अरसा यहाँ गुजारा।

चूँकि रात घिर आई थी और ठण्ड भी ज्यादा थी ,दूसरे अगले दिन सुबह ही हमें गंगोत्री के लिए प्रस्थान करना

 

था इसीलिए हम लोग होटल लौट आये और अगली दिन तड़के ही गंगोत्री के लिए चल दिए। रस्ते में गंगनानी के निकट पहुँचते ही इस रास्ते और स्थल का भूगोल कुछ भिन्न नजर आने लगा। अब हम पहाड़ के साथ बहुत ऊंचाई पर जा रहे थे ,और गंगा की धारा उन पहाड़ो के बीच संकरी खाइयों से गुजर रही थी , जिनमे आस पास की अन्य जल धाराएं भी मिलती रहती हैं। तभी हम रास्ते में पड़ने वाले एशिया में सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित पुल को देखने के लिए उतरे तो उसके बिलकुल नीचे एक अन्य प्राचीन लकड़ी का छोटा पुल भी नजर आया। हमारे साथ मौजूद मित्रों ने अपना कैमरा निकाल कर उस स्थान की फोटोग्राफी की और बातों में तभी  पता चला कि नीचे धारा के बिलकुल नजदीक ‘बॉटम ‘में दिखाई देने वाला लकड़ी का पुल स्थानीय लोगो तथा गंगोत्री जाने वाले यात्रियों के लिए अंग्रेज विलसन ने ही बनवाया था। लेकिन उस के बावजूद इस पहाड़ को पार करने के लिए बहुत लम्बा रास्ता तय करना पड़ता था।इसी लिए  ‘कैंटीलीवर ब्रिज ‘का निर्माण हुआ ,जो इन पहाड़ो की ऊपरी छत का मध्य में सबसे भीतरी हिस्सा है। पुल के दोनों तरफ झाँकने पर आगे -पीछे बहुत ही गहराई में बहती गंगा की क्षीण सी जलधारा दिखी।यहाँ चारो तरफ ऊँचे पहाड़ों और नीचे बनी कुदरती खाइयों को देख अचानक  मरे दिमाग में परमात्मा शिव  द्वारा अपनी जटाओं में गंगा के वेग को धारण कर उसे पृथ्वी पर उतारने की बात समझ में आई। साथ ही प्रसिद्ध  साहित्यकार डॉक्टर हजारीप्रसाद दिवेदी की हिमालय क्षेत्र को शिव की जटाओं की अवधारणा मानना बिलकुल उचित लगा ।वास्तव में यदि हम ब्रह्माण्ड के अक्स को शिव रूप  में मानकर कैलाश को उनका सिर तथा इस क्षेत्र में फैली धाराओं को उनकी जटाओं के रूप में माने तो वह बिम्ब सही लगता है। और

 

फिर हरिद्वार क्षेत्र में जाकर वह मैदानी इलाकों में गंगा नदी के रूप में बहने लगती है।हमारे ऋषि मुनियों में भौगोलिक तथ्यों को स्पष्ट करने के लिए कितना सुंदर कथात्मक रूप दिया है ,यह देखकर और उनके अर्थ जानकार कर  आसानी से समझा जा सकता है।

 खैर ,हम लोग गंगोत्री धाम के दर्शन करके दोपहर दो बजे तक हरसिल लौट आये थे और तब यह तय किया गया कि चार बजे यहाँ के लक्ष्मी नारायण मंदिर के दर्शन के साथ उसके प्रांगण में ही कवि गोष्ठी का आयोजन होगा।हम लोग समया नुसार होटल से निकले और गाँव के थोड़ा बाहर की ओर सेब के कतारबद्ध बगीचों के समीप बने लक्ष्मी नारायण मंदिर गए। मंदिर में प्रवेश करते हुए चारो तरफ फूलों के असंख्य पौधों के साथ  एक ताल में कमल के बहुत से नीले  फूल मैंने यहाँ पहली बार देखे। मंदिर में सचमुच विष्णु देवता की वही शिला मौजूद थी ,जिसमे विष्णु द्वारा जालंधर की पत्नी वृंदा यानी जालंधरी के शील भंग होने पर उसके द्वारा उन्हें शापित करने  की बात आती है। यधपि यह कथा बहुत लम्बी है ,किन्तु इसका महत्व और अर्थ प्रकृति के चौमासा चक्र से ही सम्बन्धित है। वर्षा ऋतू के इस पूरे क्रम को समझाने के लिए ही इस गाथा का ताना बाना बुना  गया है। हुआ यह  कि इंद्र के घमंड से क्रुद्ध शिव भगवन ने अपना तेज पुंज क्षीर सागर में डाल  दिया ,जिससे उन्ही के अंश जालंधर की व्युत्पत्ति हुई ,जो अत्यंत बलशाली था और उसकी पत्नी वृन्दा विष्णुभक्त और  अत्यंत पतिव्रता स्त्री थी। चूँकि सिंधुपुत्र जालंधर शक्तिशाली था और उसने सभी देवताओं को युद्ध में हरा समुद्र मंथन से प्राप्त उनके रत्न आदि पर अधिकार कर लिया था।,इसीलिए सभी देवता बैकुंठ में विष्णु देवता के पास गए और उनसे मदद की प्रार्थना की। विष्णु अपने

 

गरुड़ पर बैठ युद्धभूमि में जाने लगे तो समुद्र तन्या लक्ष्मी ने अपने भाई जालंधर की प्राण रक्षा की याचना की।तब विष्णु ने पत्नी लक्ष्मी को उसके प्राणो का वचन दे युद्धभूमि की ओर  प्रस्थान किया। वहां दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ ,किन्तु अंत में मायावी विष्णु ने मेघवानी में जालंधर से वर मांगने को कहा। तिस पर जालंधर ने उनसे अपनी बहिन लक्ष्मी और सारे कुटुम्बियों के साथ उसके घर पर  निवास करने का वर माँगा।

अगर प्रकृति चक्र से समझा जाए तो आषाढ़ मॉस की एकादशी से देव शयन शुरू हो जाता है और भगवन शिव सृष्टि चक्र का कार्य स्वयं संभाल लेते हैं। जो कार्तिक मॉस के शुक्ल पक्ष की प्रबोधनी एकादशी पर देव उठने तक रहता है। इस बीच सारे देवताओं ने  शंकर भगवान से विष्णु के पाताल निवास और अपने परबश होने की बात कह दुःख बताया ,तब शंकर भगवान ने स्वयं उसके वध करने की बात कही। इधर नारद की बातों  में आकर जालंधर अपनी ही माता पारवती पर कुदृष्टि डालता है ,जिससे रुष्ट हो गौरी विष्णु को दैत्य जालंधर की पत्नी के पतिव्रत को भ्रष्ट  करने की आज्ञा देती है क्योंकि अजेय जालंधर को युद्ध में तभी कोई मार पायेगा। इस आज्ञा के तहत विष्णु जालंधर का रूप धर उसकी पत्नी वृंदा के समक्ष जाते हैं और उसके साथ विहार करते हैं। किन्तु एक बार उसे पहचान कर वृंदा उसे शापित करती है कि तुमने अपनी माया से जो दो राक्षस उसे दिखाए थे ,वही अगले जन्म में उनकी पत्नी का अपहरण करेंगे। ऐसा कहकर पतिव्रता वृंदा अग्नि में प्रवेश कर गयी और युद्धभूमि में शंकर भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से जालंधर का खात्मा किया।तब ब्रह्मा देवता वृंदा की चिता  भूमि पर

 

कुछ बीज डाल  देते हैं ,जिससे तुलसी का जन्म हुआ और वृंदा की भक्ति से मोहित विष्णु उसे यह वर देते हैं कि वे शालिग्राम के रूप में उनसे विवाह करेंगे ,तभी कार्तिक में तुलसीदल से विष्णु देवता की आराधना होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि वर्षा ऋतू में समुन्दर  में उठनेवाले ज्वार या तूफ़ान बेहद विध्वंसकारी होते हैं। जिन्हे कोई नर या  नारायण काबू में नहीं कर सकता और वेउस पूरे  काल में पाताळ में राजा बलि के यहाँ ,यानी पृथ्वी के नीचे के संसार के  साथ निवास करते है। ऐसे समय सृष्टि का संचालन परमात्मा शिव के नियंत्रण में रहता है। और तुलसी की पौध जो सावन में बोई जाती है ,उसकी पूजा यानी उपयोग सर्दियों की शरुआत से ही स्वास्थ्यकारी होता है। लेकिन अचरच की बात है किअब यह सारा कथाक्रम ढकोसलों और कर्मकांडों में तब्दील हो गया है। इसके वास्तविक अर्थ से कोसो दूर है

आम जनजीवन ?

           खैर उस पौराणिक महत्व वाले छोटे मंदिर के सामने बने नए मंदिर का निर्माण सन १८८३ ईसवीं में किया गया था और इसी के पीछे भागीरथी नदी और जालंधरी नदी का संगम होता हैं। इन दोनों धाराओं के मिलने से यहाँ नदी का वेग तेज और प्रवाह फैला हुआ था , जिसकी कल -कल ध्वनि  और पत्थरों पर पछाड़ लहरों की आवाज हमें सुनाई दे रही थी। नदी के इस पार पानी की बूँदे  उछल कर फुहार सी बरस रही थी तो उस पार पहाड़ों पर ऊँचे देवदार वृक्षों के साथ पूरा स्थल हरा भरा नजर आ रहा था। यह दृश्य देख मुझे हरसिल को ‘मिनी स्विट्जरलैंड ‘कहने की बात समझ में आई । क्योंकि बिलकुल ऐसी ही पहाड़ों और वादियों की तस्वीरें हमने कैलेंडरों में स्विट्जरलैंड की देखी

 

थी।अपना रास्ता  खुद बनाती हुई निर्बंधन नदी का असली कुदरती रूप तो पहाड़ों में ही दिखता है, नहीं तो अभी तक हर जगह गंगा नदी का बांधो में बंधा शिथिल मायूस रूप ही नजर आया था।दोनों मंदिरों के मध्य पीछे दिखने वाली कुटिया में ही (पंडित जी के निवास के साथ )हिंदी के प्रकांड विद्वान और यायावर श्री राहुल सांस्कृत्यायन जी ने काफी अरसा यहाँ गुजारा था। हम सभी गंगा मित्रों ने उसके सामने ग्रुप फोटो खिंचवाई ,जो हम सबके लिए अमिट स्मृति है। और फिर वहां से बगीचे के बीचोबीच बड़ी दरी  बिछाकर कवि  गोष्ठी आयोजित की गयी। इस आयोजन में निलय भाई ने ध्रुव गुप्त ,पुष्पा पटेल ,रविकेश मिश्रा जी ,विजेंदर कुमार और भी बहुत से पटना से आमंत्रित साहित्यिक लोग थे। यह अनुभूति ही अपने आप में उस गोष्ठी को ऊंचा दर्जा प्रदान कर रही थी कि हम पुरोधा साहित्यकार की कुटिया के सम्मुख ,यहाँ काव्य पाठ कर रहे हैं। अध्भुत रस बह रहा था ,जिसमे सभी सारोबार हो रहे थे। तभी वक्त के अहसास के साथ सभी उठ खड़े हुए और एक दूसरे की रचना पर चर्चा करते हम  होटल लौट आये।

 लेकिन मैं और मेरे पति चाय पीकर संध्या के समय छावनी की तरफ पैदल निकल गए ,जो हर्षिल की सीमा रेखा ‘भागीरथी नदी ‘के निकट ही थी।’क्रिस्टल ‘यानी पारदर्शी  साफ़ स्वच्छ जल की धारा लिए यहाँ भागीरथी का सौम्य और शालीन बहाव था ,जिसके साथ ही पीछे की तरफ सेना की छावनी बनी हुई थी। पता लगा कि यहाँ चीन का बॉर्डर पास होने के कारण ‘ गढ़वाल स्काउट्स ‘ एवं ‘इंडो तिब्बतन बॉर्डर पुलिस ‘ के बेस कैंप बने हुए हैं। उन्ही के बीचोबीच एक पथरीली पटरी पर चलते हुए हमने वहां एक डिस्पेंसरी भी देखी ,जहाँ इस समय केवल एक

 

चौकीदार था। मेरे पति के पूछने पर उसने बताया कि यहाँ डॉक्टर भी नियुक्त हैं ,जो यहां से दो किलोमीटर दूर धराली गाँव में निवास करते है।और रोज सुबह से शाम तक  यही मिल्ट्री डिस्पेन्सरी में रहते है। लेकिन एमरजेंसी सर्विस के लिए दूर तक कोई अस्पताल नहीं है। और ऐसे में उत्तरकाशी ही जाना पड़ता है।आसपास ज्यादतर टेंट्स के कैंप ही लगे हुए थे ,कहीं – कहीं बकरियां बंधी हुई थी ,सम्भवतः यहाँ दूध की पूर्ति इनसे होती होगी। अँधेरा घिरता देख हम लोग लौट आये। चूँकि अगले दिन हमें नाश्ते के बाद हरिद्वार लौटना था इसीलिए सुबह ही हमने सैर  के बहाने यहाँ आस -पास घूमना तय किया। एक तो मैं मुखबा ग्राम देखना चाहती थी ,जहाँ  दिवाली के बाद देवी गंगा की मूरत यहाँ उनके मायके में लाई जाती है। इस बीच शीत  ऋतू में गंगोत्री धाम के कपाट बंद होने से यहीं गंगा देवी की  आराधना  होती है और फिर सर्दियां समाप्त होने के बाद गाँववासियों  द्वारा गाजे -बाजे के साथ डोली  में विदा किया जाता है।फिर  ज्येष्ठ मास  में गंगा दसहरा के अवसर गंगा के पृथ्वी अवतरण के उत्सव पर उ त्तराखंड के सभी  निवासी गंगोत्री धाम जाते हैं।मुझे याद आया कि तीन दिन बाद ही गंगा दसहरा है , सम्भवतः इसीलिए रास्ते में हमें स्थानीय  निवासियों का हुजूम गाते -बजाते गंगोत्री की तरफ जाते हुए नजर आया था।

दूसरे  मुखबा गाँव से ही ब्रिटिश  भगोड़े  सेनानी फ्रेडरिक विल्सन की कहानी  जुडी हुई है,जिसमे  अपने विश्वस्त मुलाजिम मंगतू चंद की ख़ूबसूरत कन्या ‘रैताला ‘से उसने विवाह किया था। किन्तु संतान न होने पर उसने मंगतू की ही बहन गुलाबी से दूसरा विवाह किया ,जिससे उसके तीन बच्चे पैदा हुएथे । किन्ही कारणों से सन १८५७ ईस्वी में फ़ौज से निष्कासित हो ,वह बचता

 

छिपता दुर्गम पहाड़ी  रास्ते से यहाँ गढ़वाल पहुंचा था। और फिर वह हर्षिल में ही निवास करते हुए इतना शक्तिशाली बन गया था कि  उसने अपनी अलग मुद्रा यानी ताम्बे के सिक्के बनवा लिए थे  ,जो स्थानीय स्तर पर प्रयोग में भी आने लगे थे। ‘पहाड़ी राजा ‘और ‘हुलसिन साहेब ‘के नाम से विख्यात विल्सन ने जल्द ही  सं १८६४ में यहाँ अपनी कॉटेज बना ली थी किन्तु वह १९९९ में जलकर ख़ाक हो गयी। इतने प्रभुत्वशाली व्यक्ति के धनी विलसन ने ही सेब और राजमा तथा आलू  की  फसल की तकनीक  यहाँ के निवासियों को मुहैया कराई। लेकिन यहाँ के सारे जंगलो को काटने   के साथ ही पशुओं की खाल एवं कस्तूरी इत्यादि का भी उसने व्यवसाय  किया। अपनी तीक्ष्ण बुद्धि के प्रयोग से  वह भागीरथी नदी के बहाव के साथ सारी साल की लकड़ी को   हरिद्वार तक भेज देता और फिर उसके आदमी  उन्हें एकत्रित कर  सरकार को बेच देते थे। उसी लकड़ी के ‘स्लैब्स ‘उस समय बन रही भारतीय रेल की पटरियों में लगाईं गयी। अंततः वह इतना शक्तिशाली हो गया था की टिहरी के नरेश भवानी शाह का भी उस पर नियंत्रण न रहा। यह भी जानकारी हासिल हुई कि  मंसूरी में उसने ‘ चार्ली विला ‘नामक होटल बनाया था ,जिसमे आजकल भारतीय प्रशासनिक सेवा की ट्रेनिंग के लिए लाल बहादुर शास्त्री एकेडमी है। मसूरी में ही उसकी कब्र है और वहां रह रहे अंग्रेज लेखक रस्किन बांड उसके जीवन पर किताब लिखना चाहते थे ,किन्तु पर्याप्त जानकारी उपलब्ध न होने से वह अधूरी रह गयी।

इसीलिए अगली सुबह जल्दी ही हम मुखबा गाँव के पहाड़ी रास्ते की ओर चल दिए।बिलकुल कच्चे पथरीले पथ पर संभल संभल कर चलते हुए हम  गोल -गोल घूम रहे थे और पहांड़ों का  चिरपरिचित

 

कोहरा और किसी भी आदमी की आवा -जावी न होने से शून्य सा माहौल लग  रहा था। हमें बार बार यह महसूस हो रहा था की कहीं हम गलत दिशा में तो नहीं जा रहे। फिर सोचा कि अगर सही नहीं हुआ तो वापिस लौट आएंगे ,पहाड़ पर सैर ही सही। लेकिन लगभग दो किलोमीटर चलने के बाद हम रास्ते के जिस मुहाने पर पहुंचे ,वहां से नीचे न केवल गंगा की धारा  दिखी ,बल्कि उसके दूसरी तरफ ‘हैली पेड ‘बना हुआ नजर आया।चारो धाम पर जाने वाले हैलीकॉप्टर इसी प्राइवेट हैली पैड से उड़ान भरते हैं ,जो कि नदी के समीप ही  तलहटी  में बना हुआ था। इसके साथ ही उगते हुए सूरज की सुनहरी किरणों का प्रतिबिम्ब भी हमें नीचे पानी पर पड़ता हुआ नजर आया। लेकिन आसमान का सूर्य अभी पहाड़ के पीछे हमारी आँखों से ओझल था। तभी लकड़ी के बने अत्यंत प्राचीन पहाड़ी घर नजर आये और  जागते हुए इंसानो की चहल -पहल  और उन का स्वर भी सुनाई देने लगा। ये घर सारे पुराने और सिर्फ लकड़ी से बने हुए थे ,जिसमे जोड़ने के लिए कीलों का नहीं ,लकड़ी की ही पतली खपच्चियों का इस्तेमाल किया गया था और ढंड और बर्फ में  ये घर गर्म रहते हैं। पहाड़ की ढलाव पर सीढ़ीदार खेत बने हुए थे ,जिनकी बॉउंड्री पर पेड़ों  के साथ पत्थर की दीवार बनी हुई थी। किसी राहगीर से पूछने पर पता लगा कि मुखबा  गाँव यहाँ से अभी काफी दूर है तथा रास्ते में ‘लैंड स्लाइड ‘यानी भू स्खलन होने से रास्ता भी बंद है।सम्भवतः  इसीलिए यह  रास्ता इतना सुनसान हो रहा है और अब हमारा वहां जाना भी मुश्किल है ,यह सोच हम वापिस लौट आये।

वहां से लौटते हुए मैं कुख्यात और विख्यात दोनों शब्दों पर गौर करने के साथ इस क्षेत्र से जुड़े दो व्यक्तियों के विषय में भी चिंतन कर रही थी। पहाड़ी राजा का तो

 

नामोनिशाँ न रहा  था वहां ,किन्तु जो  व्यक्ति तिब्बत से खच्चरों की पीठ पर लाद कर बौद्ध धर्म की पाली में लिखित पुस्तके लाया था। वे न जाने कितनी अमूल्य धरोहर थी ,जिन के अध्ययन के  लिए उन्होंने पाली भाषा सीखी और भारत में पुनः बौद्ध धर्म की विस्तृत जानकारी उपलब्ध  करवाई। वास्तव में मध्यकाल में नालंदा के पुस्तकालय में लगाई आग से  यहाँ का ज्ञान कोष पूरा  विनष्ट हो चूका था और नालंदा के ही बहुत से भिक्षु अपने साथ पुस्तकों को लेकर एशिया के अन्य देशो में चले गए थे। इसी कारण घुमक्कड़ी प्रवृति के श्री राहुल सांस्कृत्यायन जी चार  बार तिब्बत गए और जो जानकारी भारतीय  पटल से लुप्त हो गयी थी ,उसे साहित्यिक जगत के सम्मुख पुनः प्रकशित किया। चाहे वह बौद्ध धर्म के विषय में हो या कि लुप्त सरस्वती नदी के बारे में। छत्तीस भाषाओ के जानकार इस इतिहासविद और बौद्ध धर्म के ज्ञाता और प्रकांड पंडित को बाद में काशी पंडितों ने ‘महापंडित ‘की उपाधि दी।  एक तरह से हमारा वहां जाना और काव्यगोष्ठी करना  ,वहां ‘महापंडित ‘ जी के प्रति भी हमारा पूज्य भाव ही था।मैं यह भी सोच रही थी कि अगर पर्यटन की दृष्टि से यहाँ विकास हो तो ?क्या सचमुच यह स्विट्जरलैंड को भी मात दे देगा या फिर कुछ और ही हो जायेगा ?।  यधपि विकास के नाम पर हरसिल वही पौराणिक ग्राम है, किन्तु आज जिस ‘रेड डिलिशिस ‘या गोल्डन डिलिशिस ‘सेब की मांग देश -विदेशों में है ,उस मशहूर सेब की पहली पौध अंग्रेजी सेना छोड़ने वाले भगोड़े विलसन द्वारा ही लगाईं गयी थी।

A 1/7 मीनावली नगर,

पश्चिम विहार,

दिल्ली -110087

संस्मरण-बहादुर:उर्मिला शर्मा

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संस्मरण

बहादुर

उर्मिला शर्मा,
सहायक प्राध्यापक,
अन्नदा महाविद्यालय,
हजारीबाग (झारखंड)

             जब से ब्याहकर आई, तब से इस परिवार में मैनें बहादुर को एक सेवक के रूप में काम करते देखा । लंबा कद, मध्यम रंग, मध्यम तीखी नाक , अपेक्षाकृत छोटी आँखें व सपाट चेहरा। उम्र कोई पैंतीस के आसपास । अत्यंत सरलमना। यानि कि कुल मिलाकर वह प्रथम दृष्टया नेपाली तो कहीं से भी नहीं लगता था। आमतौर पर अपने देश से बाहर नेपालियों को प्रायः गार्ड की ड्यूटी पर ही देखी थी। किंतु बहादुर, उसका मूल नाम रामबहादुर थापा था, कई कामों में पारंगत था। इस प्रकार नेपालियों के लिए ‘बहादुर ‘ नाम रूढ़ सा हो गया है ।

        मैंने सुना था कि अपने युवावस्था के दिनों से ही वह बिहार रोजी-रोटी के लिए आया । विवाहोपरांत पत्नी को भी साथ लाया था, लेकिन उसका मन यहाँ न रमा। अतः उसे पुनः नेपाल छोड़ आया । वह चार-पांच सालों पर अपने मुल्क अपने घर जाता था । किसी भी काम को वह बड़े मनोयोग से किया करता था । स्वामी भक्ति भी खूब थी उसमें । साधु प्रकृति का व्यक्ति था वह। ईमानदार तथा लालच तो जैसे छूकर भी नहीं गया था उसको।

               एक बात जिसे लेकर सब उसका परिहास उडाया करते थे ।वह यह था कि बीच-बीच में वह एक-दो बार बडी प्रसन्नता से अपने संतानोत्पत्ति की खबर

 

सुनाया करता था। उसी के समवयस्क मेरे पति या उनके भाई मजाक में पूछते-‘बहादुर ये तो बताओ, तुम तो यहाँ हो तो तुम्हें संतान प्राप्ति कैसे हुई ?’ इस बात नर बहादुर निश्छल रूप से मुस्कुराकर रह जाता था। और इनलोगों का कुतुहल मन में ही धरा रह जाता । घर में बहादुर सबका कुछ न कुछ काम करता रहता था। किंतु मुख्यतः माताजी के निर्देशों का पालन करता था। चूंकि घर संयुक्त था इसलिए सभी जेठानियों और देवरानियों में उससे अपने निजी  काम करवाने के लिए होड़ मची रहती थी। वह भी मौन रूप से बिना किसी आपत्ति के सबके काम करता रहता था। इन सारे भाग-दौड़ को देखते हुए मै उससे कम से कम अपने निजी कामों से मुक्त रखने की कोशिश करती । मेरा तो उसके साथ सदा संवेदनशील व्यवहार होता था। लेकिन परिवार में सबके अलग-अलग मिजाज हुआ करते हैं । पति के बड़े भाई व उनकी पत्नी जो सख्त मिजाज तथा श्रेष्ठताबोध से ग्रसित थे, उनका व्यवहार न केवल हम सबके साथ बल्कि बहादुर को भी भारग्रस्त रखता था। बड़े भाई की पत्नी के मुख से निकला हुआ काम वह सब छोड़ कर पहले करता था ।

       अच्छा! इतने सालों के अंतराल में वह कभी-कभी बेहतर वेतन के उम्मीद में कहीं किसी अन्य स्थान पर काम करने लगता था । लेकिन घुमा फिर कर वह हमारे घर ही टिकता। शायद उसे भी हमारे यहाँ की आदत लग चुकी थी या अपनापन भा गया था ।

               वह सुबह 7-8 बजे घर आ जाता था तथा रात को हमारे होटल में गार्ड की ड्यूटी करता था । मेरा बेटा जब एक-देढ़ साल का था तब वह सुबह बहादुर को देखते ही मेरी गोद से उसके पास जाने के लिए मचलने लगता था । जब बहादुर उसे लेकर थोड़ी देर सड़क पर

घुमा देता था,  तभी वह खुश होता था। मै  कभी-कभार उससे उसकी पत्नी और बच्चों के बारे में और तस्वीरें देखना चाहती थी जो कि उसके पास अनुपलब्ध हुआ करता था। फोनपर भी वो अपने परिवार से कम ही बात कर पाता था क्योंकि काल दर तब बहुत ज्यादा हुआ करता था । मैं उसे लेकर सोचती थी कि इंसान पेट के लिए कहाँ से कहाँ तक का सफर करता है । उसमें भी तो आम मनुष्य की तरह ही अपने परिवार को लेकर संवेदनाएं होंगी लेकिन आर्थिक विवशता …। सुबह आने के बाद वह ज्वाला के यहाँ से दून लाने के बाद दून उबालता और सबके लिए चाय बनाता।  फिर सब्जी काटना व अन्य काम निपटाकर वह सौदा-सुलह के लिए बाजार जाता । उसके बाद खर्च का ब्यौरा माताजी को देता। तत्पश्चात प्रतिद्वंदिता की भावना से ग्रस्त देवरानी-जापानियों की ओर से वह इधर से उधर लुढ़काया जाता । इन दोनों में से कोई जब अपने मायके जाती तब वह कभी-कभी रसोई का भी काम महीनों संभालता। बड़ा ही स्वादिष्ट भोजन भी वह बनाता था । इसके अलावा वह शहर के किसी सर्राफ की दुकान में कारीगर का भी काम कर लिया करता था जो कि उसका खानदानी पेशा था। यानि कि बेहतर आय के लिए वह दिनरात बिना किसी शिकायत के अथक परिश्रम करता रहता ।

                    हमारे पति के पत्नी भक्त बड़े भाई जब-तब उसे डाँटा करते थे,  जब उनकी पत्नी बहादुर के खिलाफ कान भरा करती थी। कारण वही उनकी हुक्म बजाने में जरा देर हो जाना । मुझे यह सब अमानवीय लगता था । परन्तु मैं बेबस थी। मेरी भी स्थिति उस घर में बहुत बेहतर नहीं थी। इसके लिए स्वयं पर क्षोभ भी होता था। एक दिन दोपहर को जब मैं अपने कमरे में थी, तभी पति के बड़े भाई के गरजने की आवाज सुनाई पडी । बाहर निकलने पर देखती हूँ कि वो आंगन में बहादुर

 

को पीट रहे हैं,  पत्नी की हुक्म बजाने में देरी की वजह से । मैं स्वयं जाकर दखलंदाजी कर बीच-बचाव करने में असमर्थ थी। इसलिए इधर-उधर भागकर पति को ढूंढने लगी कि उन्हें भेज इस कुकृत्य को रोका जा सके,  किंतु वो नहीं दिखे। इस घटना ने मुझे झकझोर कर रख दिया । पति के आते ही मैंने उन्हें सारी बात बताई । इसपर वे मात्र अफसोस जताकर खामोश रह गये। उस दिन के बाद से महीनों बहादुर घर नहीं आता था। वह रात में ड्यूटी कर वही  होटल में ही सोता था। मुझे उसके लिए बड़े बुरा लगता था । बीच-बीच में पति से बहादुर के विषय में पूछती रहती थी। कुछ महीनों बाद शायद पति के कहने पर बहादुर घर आने लगा   लेकिन इस बार मुझे बहादुर कुछ बदला,  कुछ अलग सा लगा। फिर कुछ ही समय बाद वह नेपाल अपने घर चला गया । जाते समय उसे मैंने कुछ वस्तुएं व कुछ रूपये दिए तथा उसे पुनः वापस आने के लिए कहा। उसने आने का वादा भी किया । विगत वर्षों में वह जब भी नेपाल जाता था तब वह कहता था -” ओ साब जी! अब नहीं आएगा इंडिया,  वहीं काम करेगा। ” लेकिन फिर वापस आ ही जाता था । किंतु इस बार उसके गये लगभग पंद्रह साल तो हो ही गये हैं,  पर वह नहीं आया   आखिर गरीब का भी आत्मसम्मान तो होता ही है न। इस बीच नेपाल का महाप्रलय भी मेरे मन को अनहोनी आशंकित करता है । हृदय से यही निकलता है कि, वो जहाँ भी हो, सुखी रहे। उसकी स्मृति जब-तब जुड़ आती है । यदा-कदा पति से बहादुर के विषय में पता लगाने को कहती रहती हूँ । किंतु मेरे सिवा उसके प्रति संवेदनशील होकर कौन सोचता है जो उसे याद रखेगा ?

मुल्क की शान (गज़ल)-अनुज पांडेय

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मुल्क की शान (गज़ल)

 

             वे महफूज़ आवाम की जान रखते हैं

             ख़ुद मिटकर मुल्क की शान रखते हैं।

 

            छोड़के आशियाना,आकर सरहद पर

            मां की खिदमत का अरमान रखते हैं।

 

           आएंगे कभी लौटकर, मिलने इक बार

           दोस्तों, परिजनों से वे जुबान रखते हैं।

 

           ख़ुदगरजी को तवज्जो नहीं देते कभी

            मुल्क खातिर हमेशा ईमान रखते हैं।

                  

           घर जाने की इक बार वे भी सोचते हैं

           मगर इस अरमान को बेजान रखते हैं।

 

           मुफ़लिसी जैसी वो जह्मत झेल लेते हैं

        मुल्क की खि़दमत करने का गुमान रखते हैं।

                                       रचनाकार- अनुज पांडेय

 

 

जीवन और मृत्यु

                             ( कविता)

 

विप्लव ने दसवीं की

परीक्षा के लिए

प्राणांतक परिश्रम किया।

मगर परिणाम दुखद आया

वो केवल एक अंक से चूक गया।

 

निराश मन से बोला

” मैंने इतनी मेहनत की,

मगर अनुत्तीर्ण हो गया।

मेरे लिए जीना पाप है।”

 

यह सब कहकर उसने

अपने जीवन का अंत कर लिया

पंखे से लटककर।

 

शायद नहीं जानता था वो

कि नाकामी जीवन का भाग है

संघर्ष ही जीवन।

हाथ पर हाथ धरके बैठ जाना

नाकामी से निराश हो जाना

निराश होकर प्रयत्न छोड़ देना

ये सब मृत्यु समान हैं।

 

 

 

पता– ग्राम– पड़ौली, पोस्ट –ककरही, जिला– गोरखपुर

आपके उत्तर का इंतजार रहेगा।

मोबाइल नंबर– 8707065155

आत्मनिर्भर-दिलीप तेतरवे

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आत्मनिर्भर

–दिलीप तेतरवे

घोषणा सुनते ही रामा स्वावलम्बी चेरियन ने कहा- मुझे भी आत्मनिर्भर बनना है। वह बीते हुए दिनों की घटनाओं पर सोचने लगा, जिनका सम्बन्ध उससे, उसके गाँव और उसके देश से था-

     -पिछली बार हमारे विधायक तांडेश्वरम् जी आए थे, हमारे गाँव को आत्मनिर्भर बनाने के लिए। थाना बनवा गए। सत्तर बरस का राधालिंगम स्वामी मेरे गाँव का पहला शातिर चोर घोषित हो गया! हमारे गाँव की बकरियाँ फोकट में खाद्य बन गईं और सब्जियाँ दस्तूरी में खप गईं। थाने में एसपी साहब ने सभी को डाँटा- अपनी तोंद दो महीने में कम करो !

   -फिर विधायक तांडेश्वरम् जी ने दर्शन दिए, हमें और आत्मनिर्भर बनाने के लिए। मेरे पहाड़ी गाँव तक सड़क बन गई। सड़क बन गई तो पता चला कि जमींदारी क्या चीज होती है- बीडीओ ने अपने कर्म से गाँववासियों को ज्ञान दान किया। कई बच्चे शिक्षा त्याग कर ब्लॉक में जबरन दास बना दिए गए।

– गाँववासियों का नूतन विकास हुआ, नूतन चेतना मिली कि ब्लॉक के अधिकारी और कर्मचारी गाँव के लोगों के सहयोग से आत्मनिर्भर हो गए हैं और हम बड़े त्यागी जीव हैं। पता चला कि जिले का एक विधायक बॉस झेपियन मंत्री बना और अत्यधिक आत्मनिभर हो गया, जिले के लोगों के सुलभ सहयोग से।और, मुख्यमंत्री दादों का दादा परमेश्वरम् तो वाकई में राज्य के लोगों के बेशर्त सहयोग से राजेश्वर हो गया।

– ऊपर के लोग नीचे से ऊर्जा पाकर आत्मनिर्भर होते जा रहे थे। गाँववासियों को लगता कि उनकी भी बारी आएगी।फिलहाल तो आत्मनिर्भरता का जो अभियान विधायक तांडेश्वरम् जी ने शुरू किया था, पता चला कि

 

वे हाईकमान के आदेशपालक थे।मंत्री झेपियन मुख्यमंत्री परमेश्वरम् के द्वारपाल थे।और,  मुख्यमंत्री परमेश्वरम् प्रधानसेवक घोषेश्वरम्म  के अनुकम्पा पर थे।

– यह भी ज्ञात हुआ कि घोषेश्वरम् जी महोदय अपने सभासदों, एक सौ पचीस करोड़ देशवासियों के स्वतः अनुभूत सहयोग से अपनी आत्मनिर्भरता का भोग कर रहे हैं।

– हम गाँववासी ज्ञानी होते जा रहे थे कि हमारे गाँव को आत्मनिर्भर बनाने के लिए घोषेश्वरम्म जी महोदय अपने चार मंत्रियों, पचास अधिकारियों और दो सौ व्यापारियों के साथ विदेश इसी माह गए थे। सुखद यात्रा पर करीब चार सौ करोड़ खर्च हुआ। अब उम्मीद जग रही थी कि हमारा गाँव तो आत्मनिर्भरता का सर्टिफिकेट बन जाएगा। – फिर हम गाँववासियों ने उस विदेश यात्रा पर देश का हर समाचार माध्यम विज्ञापन से जगमग था।बोलते मीडिया में यात्रा सम्बन्धी जो विज्ञापन थे, उनमें पिनअप हेरोइन और शर्टहीन हीरो ने हमारे गाँव को स्मार्ट बनाने के सपने दिखाए थे। साला, पियांक हरिहरन यह विज्ञापन बार बार देखता है। और, पेग पर पेग ढाल कर देश की अर्थ व्यवस्था को मजबूत करता है- बड़ा त्यागी है। हाल में उसकी बेटी बिना इलाज के कालकलवित हो गई !

– फिर भी हम गाँववासियों को पक्का विश्वास होने लगा कि अब हम सब आत्मनिर्भर हो जाएँगे।

– रात भर आत्मनिर्भरता को ले कर अच्छे बुरे खयाल आते रहे।सुबह होते ही ज्ञान का प्रकाश कौंधा।कुदाल ले कर खेत में चला आया।मैंने खुद से पूछा- बीज किसने खरीदा? खेत किसने जोते ? किसने खेत में बीज, खाद, पानी डाले ? किसने फसल काटी ? किसने सोने जैसे गेहूँ

 

 

के दाने तैयार किए? सभी प्रश्नों का जवाब आया- मैंने !! यानी हम तो पहले से आत्मनिर्भर थे और जो नहीं थे वे हमारे सहयोग से ही हमसे ज्यादा आत्मनिर्भर हो गए!

संपर्क– 423, नई नगरा टोली, राँची–834001,

मो-93044534797

हास्य व्यंग्य लेख-तुम कब जाओगी कोरोना !: नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

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हास्य व्यंग्य लेख

तुम कब जाओगी कोरोना !

  –नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

कल मैं अपने गाँव के एक मित्र से फोन पर बात कर रहा था तभी उसने मुझे सुझाव दिया कि’मित्र आप केवल कविता लिखते हो कभी गद्य की विधा लेख आदि क्यों नहीं लिखते ? उनकी बातों से मैं जोश में आ गया और ‘कोरोना’ जो कि ज्वलंत मुद्दा बनी हुई है को बिषय बनाकर लिखना शुरू किया।

           अभी देश में परदेश में यानी हर जगह कोरोना काल चल रहा है।कोरोना होम मेड नहीं है बल्कि शुद्ध रूप से आयातित बीमारी है।जैसे इम्पोर्टेड मॉल का अलग क्रेज़ होता वैसे ही इस बीमारी का क्रेज़ भी धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है।जैसे ही हम विदेशी वस्तुओं को इम्पोर्टेड मॉल कहकर भाव देना शुरू करते हैं वैसे ही वह शीघ्रता से पूरे देश में ये फैल जाता है।विदेशी चीजों का प्रयोग उच्च वर्ग से शुरू होकर मध्यम वर्ग होते हुए निम्न वर्ग तक धड़ल्ले से पहुँच जाता है।इम्पोर्टेड माल सोचकर इसके प्रयोग को हम अपने गर्व (प्राइड) की भावना से जोड़ लेते हैं और जब हम इन्हीं विदेशी चीजों की आदि हो जाते हैं फिर “विदेशी भगाओ, स्वदेशी अपनाओ” का नारा लगाते हुए बहिष्कार करते हैं।जैसा की इतिहास रहा है कि विरोध का स्वर हमेशा मध्यम वर्ग से उठता है।उच्च वर्ग तो हमेशा जिसका विरोध करना है उसमें खुद भी शामिल होता है सो विरोध करने का सवाल ही नहीं उठता।जहां तक निम्न वर्ग की बात है ये बड़े संतोषी जीव होते हैं।इन्हें न तो उधौ का लेना है न माधव का देना है।इस वर्ग के लोग जितना ‘प्राप्तियों’ में संतुष्ट होते हैं उतना ही ‘अभावों’ में भी संतुष्ट नज़र आते हैं।लगता है कि इनके जीन्स में विरोध के गुण ही नहीं

 

होते।हाँ, यह वर्ग भीड़ बढ़ाने में ज़रूर काम आते हैं चाहे इनका उपयोग मध्यम वर्ग वाले आंदोलन के लिए करे या फिर उच्च वर्ग वाले इनका प्रयोग अपने काम साधने के लिए करे। इन्हें तो बस पीना-खाना मिल जाए और एक दिन की रोज़ी फिर जिधर चाहे जोत लो इन्हें भीड़ या भीड़ का हिस्सा बनने में कोई परहेज़ नहीं होता।

            ख़ैर,मैं अपनी बात निगोड़ी कोरोना से स्टार्ट किया था और वर्गभेद वर्णन के चक्कर में उलझ गया।सबसे अहम सवाल तो ये है कि देश में कोरोना को हवाई रास्ते से ससम्मान लाने वाले’भद्रजन’ आख़िर कौन थे? उन मेज़बानों का आखिर क्या हुआ जो मेहमान कोरोना को इतने बड़े देश में लाकर रास्ते पर छोड़ दिया है?कोरोना को लाने वाले चालाक लोग तो बच निकले और चंगुल में फंस गई है देश की भोली-भाली जनता।ये कोरोना भी ऐसी ढीठ मेहमान है कि एक बार आने के बाद जाने का नाम नहीं ले रही है।आदरणीय शरद जोशी जी ने शायद कोरोना जैसे निपट चिपकू मेहमान के लिए ही अपना लेख “तुम कब जाओगे अतिथि ! लिखा रहा होगा। कोरोना दुष्टा ने तो हमारे अपनों में ही बड़ी चतुराई से फूट डालने का काम कर रही है। कोई अपने घर का सदस्य ही क्यों न हो यदि एक बार छींक मार दे तो हम उसे बड़ी संदेह भरी नज़रों से देखने लग जाते हैं।भले ही वह बेचारा नाक में मच्छर घुस जाने के कारण छींक मारा हो।हम इस चिपकू मेहमान के डर से दरवाज़े पर कुंडी लगाकर घर में ऐसे घुसे रहते हैं कि कहीं कोरोना हमारे घर में दस्तक़ न दे जाए। दूधवाला भी घर की घंटी बजाता है तो यह शंका होने लगती है कि कहीं यह हरक़त कोरोना का तो नहीं है।कुलमिलाकर हम अपने ही घर में कैदियों की तरह डरे-सहमे जैसे-तैसे दिन काट रहे हैं।इस समय लोग डर के मारे न्यूज़ चैनलों को लगभग

 

देखना ही बंद कर दिया है।जो व्यक्ति रोज़ शाम में न्यूज़ चैनल पर डिबेट सुनने का आदी था अब वह उस समय में भी सीरियलों और फिल्मों के चैनल देखकर ही दिन बिता रहा है।मनोरंजन चैनल भी अपने ब्रेक को ‘कोरोना ब्रेक’ कहकर डराने लगे हैं।इसी बीच दूरदर्शन चैनल ने मौका देख ज़ोरदार चौका मारा है।जहाँ एक ओर रामायण-महाभारत दिखाकर डरे -सहमे लोगों में धार्मिकता और आत्मविश्वास को ज़िंदा रखने का काम किया है वहीं दूसरी ओर अपनी लूटी-पीटी टी आर पी को भी पटरी पर ले आया है।

           कवियों और लेखकों को जैसे अचानक नया विषय मिल गया है।वे कोरोना पर कविता ,कहानी, लेख आदि लिखकर खूब कलम चला रहे हैं।पूरा साहित्कार बिरादरी वही पुराने विषयों कश्मीर,अनुच्छेद-370 ,एन आर सी और शाहीन बाग़ पर लिख-लिखकर बड़े बोर हो चुके थे।अभी हालात ऐसे हो गए हैं कि राजनीति में भी नए मुद्दों का टोटा लग गया है।राजनेताओं का मुंह खुजला रहा होगा कि उन्हें आख़िर पैर खींचने और कीचड़ उछालने जैसे शुभ अवसर कब मिलेंगे।वे मन ही मन कोरोना बैरी को यह सोचकर कोस रहे होंगे कि उसने सारे मुद्दों को दबाकर ख़ुद अकेले अहम मुद्दा बने बैठी है।

          कोरोना का दुःसाहस तो इतना बढ़ गया है कि अपने प्रताप से देशव्यापी लॉकडाउन तक करवा दी है फिर भी मानने को तैयार नहीं है।देश में सभी जगह ताले लग चुके हैं।कोर्ट बंद है,दफ़्तर बंद है,दुकानें बंद है,मोटर-गाड़ी बंद है,आना-जाना बंद है यहाँ तक लोगों की बोलती भी बंद हो गई है।रोड पर पुलिस वाले भी बात नहीं कर रहे हैं ज़रूरत के मुताबिक बस डण्डा चमका रहे हैं।अस्पताल में डॉक्टर केवल इशारों से काम चला

 

रहे हैं।अब तो ज़बान की कोई क़ीमत ही नहीं बची है उसकी क़ीमत लगभग माइनस पर जा चुकी है।अब सड़कें भी बिलकुल बेआवाज़-सूनी हो गई हैं जिसके किनारे-किनारे कभी रेहड़ी, गुमटी, खोमचे और ठेलावालों के पास गरमी की शाम में गुपचुप, पिज़्ज़ा, बर्गर, चाउमीन और मंचूरियन का लुफ़्त उठाते लोगों की भीड़ वाली रौनक बनी होती थी वह गायब हो चुकी है।

           कोरोना ने दिल्ली जैसे महानगरों में रोज़ की कमाई कर रोज़ खाने वाले मज़दूरों का जीना हराम कर रखा है।फैक्टरियों के बंद हो जाने पर काम से हकाले गए मजदूर रातोंरात सड़क पर आ गए हैं।दरबदर भटकते इन मजदूरों को जैसे कोरोना से कोई भय ही नहीं है।ये खुलेआम बड़े आराम से सड़कों पर ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ जैसे आयातित शब्द से अंजान और ‘लॉकडाउन’ का मख़ौल उड़ाते हजारों की झुण्ड में दिखाई पड़ते हैं। सच तो यही है कि इन मज़दूरों के लिए पापी पेट के सवाल और भूख रूपी वायरस से लड़ना ही सबसे बड़ी चुनौती है जिसके सामने कोरोना की चुनौती छोटी नज़र आती है।

            दिल्ली के मुख्यमंत्री को एक चीज़ के लिए कोरोना को जरूर धन्यवाद कहना चाहिए वो ये कि दिल्ली के प्रदूषण को दूर करने एवं आसमान पर छाए धूएं के ग़ुबार को कम करने के लिए गाड़ियों को ऑड-इवन चलाने जैसे जतन ख़ूब किए पर पसीने छूट गए लेक़िन धुएं कम नहीं हुए। वहीं कोरोना के आशीर्वाद से मात्र इक्कीस दिन का लॉकडाउन करना पड़ा  और देखते ही देखते बीमार पर्यावरण का स्वास्थ्य एकदम से चंगा हो गया है।गंगा और यमुना को अपना साफ पानी देखकर यक़ीन ही नहीं हो रहा है कि यह उसका ही पानी है।दोनों

 

 

को यह याद नहीं कि आखिरी बार इतना साफ़ पानी कब देखा था।

              जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की विविधता वाले इस देश को कोरोना से यह तो जरूर सीखना चाहिए कि आदमी सब एक समान होता है।हम बेवज़ह भेदभाव और अलगाव की बेकार बातों में पड़े होते हैं। कोरोना को देखो वह कैसे सभी जाति और धरम वालों को बिलकुल समान भाव से निपटा रही है।हम मान गए कोरोना तुमने साबित कर दिया है कि तुम्ही सच्ची समदर्शी हो”समदर्शी नाम तिहारो।”

              हमारे देश का बाज़ार चीन से बनी हुई चीज़ों से भरी पड़ी है।चायनीज मोबाईल, चायनीज खिलौने, चायनीज इलेक्ट्रॉनिक गुड्ज़, चायनीज लाइट्स-झालरें, चायनीज फटाके-फुलझड़ियां आदि आदि बड़े धड़ल्ले से बेचे और ख़रीदे जाते रहे हैं।इतना ही नहीं चायनीज फूड और चायनीज मसालों के इतने दीवाने हो गए हैं कि हम अपने देशी खानों को भूलते जा रहें हैं।हमें हर चीज में चायनीज माल प्रयोग करते देख वक़्त ने उपहार स्वरूप बीमारी भी चायनीज दे दिया है। यह बताने की जरूरत नहीं कि चीन कितना दगाबाज़ मुल्क़ है जो पूरी दुनियां को कोरोना में झोंक दिया है और खुद स्वान्तः सुखाय में लिप्त हो गया है।

           यूं तो कोरोना ने  सारे महाद्वीपों पर अपने पांव जमा लिए हैं फिर भी अमेरिकी और योरोपीय उन देशों के नाक पर दम कर रखी है जिन्होंने विकसित राष्ट्र होने का तमगा पहन रखा था।कोरोना के वार से अमेरिका,इटली, स्पेन, ब्रिटेन जैसे दंभी देशों की हेठी निकलकर बाहर आ गई है।अपने ज्ञान-विज्ञान और आर्थिक विकास पर इतराने वाले सारे शक्तिशाली देश

 

छोटी-सी कोरोना जो ढंग से दिखाई भी नहीं देती के सामने असहाय दिखाई पड़ रहे हैं।

            धार्मिकों ने भी अपने सारे धार्मिक क्रियाकलापों पर कुछ दिन के लिए विराम लगा दिया है।पुजारियों, मालवियों और पादरियों की दुकानें चल नहीं रही है।हालात देखकर उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई है उन्हें लग रहा है कि कहीं लोगों के मन से धार्मिकता ही न उठ जाए । कहीं ऐसा हुआ तो उनका तो व्यवसाय ही बंद हो जाएगा।मन ही मन सोच रहे होंगे कि “हम हैं तो निठल्ले कोई काम करने की आदी भी नहीं हैं फिर करेंगे क्या ?

                  ऐसे डरे-सहमे,हताश-निराश और उदासी के इस आलम में प्रधानमंत्री जी देश की जनता को बार-बार संदेश का कैप्सूल दे रहें हैं।उन्हें यह विश्वास है कि उनका यह संदेश जनता में एनर्जी सोर्स की तरह ‘सप्लीमेंट्री फ़ूड’ का काम करेगी।जनता बड़ी कृतज्ञता से घंटी-थाली बजाकर और दीये-मोमबत्ती जलाकर अपने एनर्जी लेबल का सबूत भी दे रही है।इस बीच फेसबुकी और वाटसेपी ज्ञानियों द्वारा ख़ूब ज्ञान और उपदेश बांटा जा रहा है।वही-वही मैसेज घूम फिरकर बार-बार पढ़ने और सुनने को मिल रहा है कि “घर में रहिये, सुरक्षित रहिये।” इतने बार याद दिलाने से कभी-कभी ख़ुद पर भी भ्रम हो जाता है कि कहीं मैं सचमुच घर से बाहर तो नहीं आ गया हूँ।

                    बहरहाल यह बड़ी कठिन परीक्षा की घड़ी है। इस घड़ी में हमारे संकल्प और संयम दोनों को खरा उतरना होगा। वैसे तो हम भारतीय विपरीत और कठिन परिस्थितियों में भी हास्य निकाल लेने की कला में माहिर होते हैं।बस कुछ दिन और कमरों में रहे ताकि घरवाली की यह शिकायत भी दूर हो जाए कि “आप तो

 

जी हमेशा बाहर रहते हो,घर में रहते ही नहीं।” इस भौतिक संसार में हर चीज़ क्षणभंगुर है,अस्थाई है,परिवर्तनशील है,आनी-जानी है अतः यह तय मानिए जो कोरोना संकट बनकर आई है वह एक दिन जरूर जाएगी भी..। तब तक बस यही दोहराते रहिए–“तुम कब जाओगी कोरोना !?”

                          नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

                                सहायक प्राध्यापक

                            शास. स्नात. महाविद्यालय,

                                 कवर्धा(छत्तीसगढ़)

                              

लघुकथा – झूठे रिश्ते: मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

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लघुकथा – झूठे रिश्ते

– मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

देर शाम तक मौसम रौद्ररुप दिखाता रहा। ओलों भरी बरसात ने मई के महीने को जनवरी जैसा ठण्डा बना दिया था। मौसम के इस बदलाव को रामेश्वर सहन नहीं कर पाये। रात बारह-एक बजे के बीच उनकी तबियत एकदम से बिगड़ गई। सर्दी-जुकाम ने उनके गले को बंद कर दिया। उन्हें घुटन सी महसूस हुई तो अपनी पत्नी को नींद से जगाकर सारा हाल बता दिया।

पत्नी भागी-भागी गई और बड़े बेटे के कमरे का दरवाजा खटखटाने लगी। बड़ी मुश्किल से बेटा जागकर बाहर आया।

‘क्या हुआ माँ ?’ उवासी भरता हुआ बोला।

रामेश्वर की पत्नी ने सारा घटनाक्रम बताया तो बेटे ने एकदम से अपने सिरपर दोनों हाथ मारे और बोला -‘ये लक्षण तो कोरोना के हैं।’

कोरोना का नाम सुनते ही सारे घर में हलचल सी मचगई। एक भयंकर डर ने सभी के सोचने-समझने की क्षमता को शून्य कर दिया। आनन-फानन में रामेश्वर के कमरे को बाहर से ताला लगा कर बंद कर दिया गया।

बेचारे रामेश्वर सुबह तक खाँसते-हाँफते हुए किसी तरह जिंदा बने रहे। सुबह तड़के सरकारी एम्बुलेंस आई और उन्हें ले गयी। पूरा परिवार दूर से ही उन्हें जाता देखता रहा। रामेश्वर जी को लग रहा था कि वे हास्पिटल नहीं यमपुरी को जा रहे हैं।

कुछ दिन बाद पता चला कि रामेश्वर को कोरोना नहीं हुआ था, क्योंकि उनकी हर रिपोर्ट निगेटिव आई थी। मौसम के बदलाव की वजह से सामान्य खांसी जुकाम

 

 

ने उनके शरीर में कोरोना वायरस संक्रमण जैसे लक्षण पैदा कर दिये थे।

रामेश्वर के घर वालों को उनके पूर्ण स्वस्थ होने का समाचार जैसे ही मिला। बेटा-बहू, पत्नी सब उन्हें लेने हॉस्पीटल पहुँच गये। पर यह क्या रामेश्वर ने घर जाने से स्पष्ट मना कर दिया। वे शहर के वृद्धाश्रम में जाने का फैसला पहले ही कर चुके थे, क्योंकि उस रात उन्हें झूठे रिश्तों की असलियत पता चल चुकी थी।

रामेश्वर की घरवाली दूर खड़ी मुंह में साड़ी का एक कोना दबाये रो रही थी तो दूसरी ओर खड़े बेटा-बहू रामेश्वर को मिलने वाली तीस हजार प्रतिमाह की पेंशन के मातम में फूट-फूटकर रो रहे थे, और रामेश्वर जी मुस्कराते हुए वृद्धाश्रम की गाड़ी में बैठकर चले गये।

ग्राम रिहावली, डाक तारौली गुर्जर,

फतेहाबाद, आगरा 283111

9627912535