संपादकीय: संक्रमण कालीन समय में मनुष्यता और विमर्श का दायित्व
हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जहाँ बदलाव की गति हमारी कल्पना से कहीं अधिक तेज है। तकनीक, समाज और राजनीति के मोर्चों पर रोज़ नए समीकरण बन और बिगड़ रहे हैं। इस संक्रमण कालीन समय में जहाँ एक तरफ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और भाषा प्रौद्योगिकी हमारे सोचने, लिखने और संवाद करने के तौर-तरीकों को बदल रही है, वहीं दूसरी तरफ सामाजिक और आर्थिक स्तर पर मध्यवर्ग नए अंतर्विरोधों से जूझ रहा है। जब तकनीक इंसानी मेधा की जगह लेने का दावा करने लगे और वैश्वीकरण के दौर में स्थानीय संस्कृतियाँ हाशिये पर जाने लगें, तब अकादमिक पत्रिकाओं का यह दायित्व बनता है कि वे समाज को केवल एक दिशा में बहने से रोकें और उसे तार्किक कसौटी पर परखें।
‘जनकृति’ का यह संयुक्त अंक (फरवरी-अप्रैल 2026) इसी बदलते समय की नब्ज को पकड़ने का एक ईमानदार प्रयास है। इस अंक में जहाँ डिजिटल माध्यमों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उभार के बीच हिंदी भाषा के भविष्य और उसकी तकनीकी चुनौतियों पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत किया गया है, वहीं उदारीकरण के दौर में भारतीय मध्यवर्ग के भीतर पनप रहे द्वंद्वों और सामाजिक सचाइयों को भी रेखांकित किया गया है। यह दिखाता है कि तकनीक चाहे जितनी आगे बढ़ जाए, उसके सामाजिक और मानवीय प्रभावों का मूल्यांकन अंततः इंसानी संवेदना ही कर सकती है।
इसके साथ ही, समाज के उन स्वरों को मंच देना हमारा निरंतर संकल्प रहा है जो मुख्यधारा की बहसों में अक्सर पीछे छूट जाते हैं। इस अंक में शामिल ‘दलित एवं आदिवासी-विमर्श’, ‘स्त्री-विमर्श’ और ‘क्वीर विमर्श’ (तृतीय लिंग का समाजशास्त्रीय अध्ययन) के आलेख महज अकादमिक शोध नहीं हैं, बल्कि यह उस अस्मिता और गरिमा की तलाश है जो हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। जब हम संविधान सभा में दक्षिणायनी वेलायुधन की मुखर आवाज को याद करते हैं या समकालीन उपन्यासों में जेंडर के नए आयामों को टटोलते हैं, तो हम वास्तव में एक अधिक समावेशी समाज की नींव मजबूत कर रहे होते हैं।
प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता आज सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रहा है। बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं के इस युग में भारत-नेपाल सीमा पर आपदा प्रबंधन और पूर्व चेतावनी प्रणालियों को लेकर किया गया पारिस्थितिकीय अध्ययन यह याद दिलाता है कि सीमाएं इंसानी हो सकती हैं, लेकिन प्राकृतिक आपदाएं किसी भूगोल को नहीं मानतीं। इसके समाधान के लिए हमें अपनी पारंपरिक ज्ञान परंपरा, योग और संस्कारों के समन्वय के साथ-साथ आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण को भी अपनाना होगा।
साहित्य, कला और रंगमंच हमेशा से समाज के प्रतिरोधी और रचनात्मक स्वर रहे हैं। प्रेमचंद, त्रिलोचन और हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्य से लेकर पारंपरिक नाटक और सिनेमा के बदलते स्वरूप तक, इस अंक की सामग्री पाठक को इतिहास-बोध और वर्तमान की चुनौतियों दोनों से एक साथ जोड़ती है। जैसा कि नामदेव जी ने एक साक्षात्कार में बहुत सटीक कहा है कि “बिना इतिहास बोध के कोई भी आलोचना सिर्फ शब्दों का जाल है।” ‘जनकृति’ शब्दों का जाल बुनने के बजाय इसी इतिहास बोध और सामाजिक सरोकारों को आपके सामने रखने का माध्यम है।
यह अंक देश-दुनिया के विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों, शोधार्थियों और रचनाकारों के इसी साझा वैचारिक मंथन का प्रतिफल है। आशा है कि ये शोध आलेख और रचनात्मक विमर्श आपको न केवल सोचने पर मजबूर करेंगे, बल्कि इस संक्रमण कालीन दौर में सही और तार्किक रास्ता चुनने में भी मदद करेंगे।
डॉ. कुमार गौरव मिश्रा
विषय सूची
कला-विमर्श
Tradition and Transformation:
Reimagining the Aesthetic Conventions and Principles of Traditional Theatre in Post-colonial Indian Theatre) / Dr. Chavan Pramod R. 9
भारतीय दर्शन और मिथकीय संरचनाओं का सिनेमाई सन्दर्भ/ प्रो. (डॉ.) रमा, डॉ. विजय कुमार मिश्र 27
रंगमंच का बदलता स्वरूप / डॉ. प्रदीप कुमार 38
दलित एवं आदिवासी -विमर्श
दक्षिणायनी वेलायुधन: भारतीय संविधान सभा की मुखर दलित आवाज/ डॉ. सुमीत कुमार गुप्ता, डॉ. प्रीति कुमारी 49
प्रेमचंद संबंधी विमर्श और दलित आलोचना/ भगवान साहु 80
दिव्य आलोक और गद्दी जनजाति : एक समाजशास्त्रीय अध्ययन / डॉ. अशोक कुमार, अक्षय कुमार 89
स्त्री-विमर्श
Standpoint Theory: A Feminist Approach / Kalyani Singh 102
भारत में महिलाओं के संवैधानिक एवं कानूनी अधिकार: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन / हिमांशु नागदा 114
मातृत्व : स्नेह, संवेदना, चरित्र और राष्ट्र निर्माण की यात्रा / डॉ.मनोज शर्मा 123
क्वीर विमर्श
21वीं सदी के हिंदी उपन्यासों में तृतीय लिंग – एक समजशास्त्रीय अध्ययन/ डॉ. गुड्डू कुमार 129
मीडिया-विमर्श
हिंदी डिजिटल मीडिया : आर्थिक प्रासंगिकता और विज्ञापन प्रभाव / डॉ. श्रीप्रकाश पाल 143
हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों की कलम, कर्म और क्रांति की कालजयी कथा / डॉ. शैलेश शुक्ला 154
शिक्षा-विमर्श
Educating for a Sustainable future: NEP 2020 and its role in the Development of Odisha / Rukadhara Chhatria, Dr. Subhadra Maharana 159
Bhagavad Gita and Teacher Education: A Framework for Ethical and Reflective Teaching Practices / Shrutika Sahu 172
भाषिक-विमर्श
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और हिंदी भाषा का भविष्य: अवसर और चुनौतियाँ / प्रदुन कुमार 186
भाषा प्रौद्योगिकी में कृत्रिम मेधा की बढ़ती भूमिका / डॉ. दिनेश कुमार गुप्ता 203
राजनीतिक -विमर्श
सरदार वल्लभ भाई पटेल का रियासतों की विलय में योगदान / अनिल 214
एक युग का समापन: लालू से नीतीश और उत्तर-नीतीश बिहार तक / डॉ. सीमा कुमारी 224
पारिस्थितिकीय -विमर्श
Enhancing Cross-Border Resilience: Integrating Community-Based Disaster Risk Reduction with Indo-Nepal Flood Early Warning Systems. / Dr. Anand Bijeta, Mr. Mukund Kumar 232
समाजशास्त्रीय -विमर्श
उदारीकरण और भारतीय मध्यवर्ग: स्वरूप, चुनौतियाँ और अंतर्विरोध / डॉ. अनूप श्री विजयिनी 239
साहित्यिक-विमर्श
लोकांचल में गहन संपृक्ति से उपजी कविताएं / डा. सत्यनारायण स्नेही 250
मेहरुन्निसा परवेज़ के ‘कोरजा’ उपन्यास में चित्रित समस्याएँ / डॉ. सुफियाबानु सब्बीरहुसेन मनसुरी 269
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंधों में भारतीय ज्ञान परंपरा / प्रभात मिश्रा 276
कृष्ण भक्त कवियों द्वारा राम कथा का वर्णन / डॉ. धर्म दास अटवाल 286
जन सरोकारों के कवि त्रिलोचन / डॉ. प्रेम कुमार 292
अंजना वर्मा की कविताओं का संवेदना-आलोक / डॉ० मनोज कुमारी 303
प्रेमचंद और फकीर मोहन सेनापति के कथा-साहित्य में सामाजिक यथार्थ / डॉ. करूणा खलखो 320
मुंडा आदिवासी समुदाय : सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक विशिष्टता / एमलेन बोदरा 329
‘चारू चन्द्रलेख’ में विन्यस्त मध्यकालीन भारतीय समाज और उसकी समकालीन प्रासंगिकता / प्रवीण कुमार विश्वकर्मा 341
लोक-सांस्कृतिक विमर्श
लोकप्रिय संस्कृति और भारत/ विपिन यादव 352
अनुवाद एवं निर्वचन विमर्श
हिंदी अनुवाद और वैश्वीकरण / रितिका भारद्वाज 364
साक्षात्कार
कथाकार राकेश कुमार सिंह के साथ साहित्यिक संवाद / साक्षात्कारकर्ता: दिव्या रानी 374
साहित्यिक रचनाएँ
साहित्यिक रचनाएँ: कविता
प्रियंका अनीता 388
साहित्यिक रचनाएँ: कहानी
खूनी सड़क / संजय अलंग 390
साहित्यिक रचनाएँ: व्यंग्य
भला आदमी / हनुमान मुक्त 396
पुस्तक समीक्षा
‘उपेक्षित’ को ‘अपेक्षित’ महत्त्व/ समीक्षक: सर्वेश मिश्र 401
हिंदी के समकालीन स्त्री कथा साहित्य में क्वीर विमर्श
डॉ. हेमा नारायण
सहायक आचार्य एवं विभाग अध्यक्षा,
हिंदी विभाग, कुरियाकोस एलियास कॉलेज, मान्नानम, कोट्टायम, केरल
मोबाईल: 7306246093
ईमेल: Hemanarayanan@kecollege.ac.in
सारांश
मनुष्य समाज में विभिन्न लैंगिक पहचान के लोग रहते हैं। मुख्यधारा समाज इनमें से क्वीर को नकारते हैं लेकिन समकालीन स्त्री लेखन सबको अपनाता है। क्वीर के जीवन संघर्षों की अभिव्यक्ति स्त्री लेखन में सशक्त रूप से हम देख सकते हैं। क्वीर के प्रति स्त्री लेखन की दृष्टि मानवीय है।
विविधता दुनिया का शर्त है। इस दुनिया में हर एक चीज एक दूसरे से भिन्न है। विविधता उनकी पहचान भी है। मनुष्य जाति में भी विविधता है। यौनता (sex) तथा लिंग(Gender) के आधार पर मनुष्य में विविधता हम देख सकते हैं। आमतौर पर इन दो शब्दों को पर्यायवाची शब्द माने जाते हैं। लेकिन दोनों में भिन्नता हैं। यौनता का संबंध मनुष्य के जैविक शरीर से है। लिंग का संबंध मनुष्य की इच्छाओं से है। स्त्री पुरुष के लैंगिक संबंध को मुख्य धारा समाज माने जाते हैं। लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर आदि सब हमारे बीच है। इन विविधता को समाज नकारते हैं। इसका कारण हमारी अज्ञाता, सत्ता एवं अंधपरंपरा है। अनादिकाल से यह लोग भी हमारे बीच मौजूद है। लेकिन सत्ता उन्हें दबाते थे । स्त्री-पुरुष के लैंगिकता को मान्यता देते रहे थे।इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि इस संबंध का आधार वंश वृद्धि से है। इसके आधार पर पारिवारिक, सामाजिक धार्मिक संस्थाओं का निर्माण हुआ। अपने मानवीय अधिकारों से वंचित ये अल्पसंख्यक लोग खुद अपने आप से, इस समाज से भाग रहे थे। समकालीन संदर्भ में यह लोग अपने अधिकार का मांग करते हैं। यह मांग उनकी आत्मस्वीकृति का प्रतिफलन एवं अस्मिता की स्थापना है।
क्वीर (Queer)
डॉ के वनजा ने क्वीर विमर्श नामक अपने पुस्तक में इस शब्द को यों परिभाषित करती है कि-” क्वीर (Queer) अंग्रेजी शब्द है, अर्थ है- स्ट्रेंज( Strange) ,आँड (Odd), पेक्युलियर(Peculiar), अनयूज्अल (Unusual), एक्सेंट्रिक(Eccentric) आदि। इसका मतलब वह कुछ विशेष है,साधारण स्वभाव का नहीं है, अजनबी है। यहाँ क्वीर शब्द एलजीबीटी का प्रतिनिधित्व करता है, एलजीबीटी आंदोलन ने अपने को द्योतित करने के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया।”( डॉ के वनजा – क्वीर विमर्श- पृष्ठ-28)। इस शब्द में लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर, ट्रांजैक्शन, ट्रांसमेन, ट्रांस वूमेन, इंटरसेक्स, आलैंगिक, कोत्ती, पान्ती, डबल डेकर, क्रॉसड ड्रेसर आदि सब कुछ इस शब्द में समाहित हो जाते हैं।
समकालीनता
समकालीनता अंग्रेजी के कंटेंपरेरी शब्द का पर्यायवाची हिंदी शब्द है। इस शब्द को दो दृष्टि से व्याख्यायित कर सकते हैं । समय सीमा को पार करते हुए हर एक काल के साथ चलने वाली रचनाओं को समकालीन रचनाएंँ कहा जा सकता है। तत्कालीन समय में लिखित रचनाओं को समकालीन रचनाओं के अंतर्गत रख सकते हैं। इन रचनाओं में वर्तमान समय की विडंपनायें, विद्रोह, प्रतिरोध आदि सब कुछ देखने को मिलते हैं। यहाँ लेखक वर्तमान समय पर पैनी दृष्टि रखते है। वर्तमान समय की सूक्ष्म आलोचना भी करते हैं। इसके आधार पर नवीन रचनाओं का निर्माण भी करते हैं। इन रचनाओं द्वारा लेखक समाज को अवगत कराने की कोशिश करते हैं। आधुनिक रचनाओं का विकसित रूप है समकालीन रचनाएँ। आधुनिक साहित्य में मनुष्य की चर्चा हम देख सकते हैं। लेकिन समकालीन साहित्य में आते समय मनुष्य की परिकल्पना में काफी विकास हम दे सकते हैं। हाशियेकृत लोगों की चर्चा यहाँ प्रमुख रूप से हो रही है। इनमें एक है क्वीर। उनकी चर्चा करते हुए जनता के मन में उनके प्रति जो नकारात्मक दृष्टि मौजूद है उसमें परिवर्तन लाना, उनको अपना अधिकार दिलाना, उनको एक बेहतर जिंदगी प्रदान करना आदि सब लेखक का प्रमुख लक्ष्य होते हैं। अपनी रचनाओं के ज़रिए लेखक उनको मानवीय रूप प्रदान करते हैं। समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की कोशिश भी करते हैं।
स्त्री लेखन
स्त्री द्वारा लिखित रचनाओं को स्त्री लेखन या महिला लेखन नाम से जाने जाते हैं। इनमें स्त्री के जीवन दृष्टि, जीवन अनुभूतियां ,परेशानियां, देवी हुई भावनाओं, स्वत्व, प्रतिरोध आदि सब देखने को मिलते हैं। पुरुष संकल्पना उनसे भिन्न एक नया स्त्री रूप यहाँ हम देख सकते हैं। यह नवीन स्त्री रूप आदर्श स्वरूपों का विरोध करते हुए अपने यथार्थ रूप की अभिव्यक्ति करता है। प्रारंभिक काल के स्त्री लेखन पुरुष लेखन का अनुकरण था। लेकिन बाद में परिवर्तन आया है। इस परिवर्तन का प्रमुख आधार स्त्री मुक्ति आंदोलन और स्त्रीवाद की विभिन्न धाराएँ हैं। शुरुआती दौर में स्त्री सिर्फ अपनी जिंदगी के बारे में सोचती थी। लेकिन अब वह समझती है कि स्त्री की दुनिया मात्रा उसकी इर्द-गिर्द में सीमित नहीं है। उसकी दुनिया विशाल है। वहांँ परिवार, समाज, समाज के हर एक हिस्से, शोषित-पीड़ित आम जनता, हाशिए कृत लोग आदि सबके लिए अपना स्थान है। उन सबके प्रगति के बिना अपना प्रगति नामुमकिन है। अपने समाज शोषित पीड़ित लोगों के प्रति हमदर्दी दिलाकर स्त्री लेखन उनको बेहतर जिंदगी प्रदान करने की कोशिश करता है। इसलिए क्वीर विमर्श भी स्त्री लेखन का अंश बन गया है।
हिजड़ा
हिजड़ा स्त्री- पुरुष से भिन्न है। मुख्य धारा समाज में स्त्री- पुरुष के लिए स्थान है। एक लिंग में जन्म लेकर दूसरी लिंग की इच्छाओं को प्रकट करने वाले लोगों को ट्रांसजेंडर नाम से पुकारे जाते हैं। स्त्री के शरीर और पुरुष के मन के साथ जन्म लेने वाले, पुरुष के शरीर और स्त्री के मन के साथ जन्म लेने वाले लोग इसमें शामिल होते हैं। शल्य चिकित्सा के जरिए लिंग परिवर्तन करने वाले लोगों को ट्रांस सेक्सुअल कहे जाते हैं। इसमें ट्रांस मैन और ट्रांस विमन दोनों शामिल हैं ।जन्म से सेक्स का पहचान न करनेवाले लोगों को इंटर सेक्स कहा जाता है। उनमें स्त्री और पुरुष के लिंग दोनों एक में हैं। इन सबको आम समाज हिजडा नाम से पुकारते हैं । ये सब लोग बचपन से ही शोषण का शिकार है।
समकालीन स्त्री लेखन में उनके जीवन के यथार्थ को हम देख सकते हैं। उनके जीवन के आदि से अंत तक संघर्ष हम देख सकते हैं। उनका संघर्ष स्वत्व निर्माण से जुड़े हुए हैं ।चित्रा मुदगल के पोस्ट बॉक्स नंबर 203 नाला सोपरा में हिजड़ा अपनी अम्मा के लिए चिट्ठी लिखती है। बच्चे के जन्म से लेकर मुख्यधारा समाज उन्हें स्त्री और पुरुष के रूप में विभाजित करते हैं। किसी और के लिए वहाँ कोई स्थान नहीं है। इस रचना के हिजड़ा को भी घरवालों ने विनोद नाम दिया है। लेकिन उसने वह नाम को छोड़ दिया है क्योंकि उनके भीतर एक स्त्री रहती है। अपनी पहचान को बनाने के लिए वह अपना घर छोडती है।
हिजड़ा लोग अपने शरीर से संघर्ष करती है। यमदीप उपन्यास में नाजबीवी एक इंटरसेक्स है । उसके शरीर में स्त्री तथा पुरुष दोनों की विशेषताएं हैं। वह कहती है कि-” एक तो भगवान ने हमसे मजाक करके भेजा है… इंसान अलग देख हंसता है”( नीरजा माधव- यमदीप- पृष्ठ-20)। यहाँ वह अपने शरीर को अपूर्ण समझती है। उनका मानसिक संघर्ष इन शब्दों में व्यक्त है। नारी उधार ग्रह में स्त्रियों के प्रति होनेवाले अत्याचार देखकर नाजबीबी ऐसा कहती है कि-” … भगवान ने मुझे हिजड़ा बनाकर ठीक ही किया। अगर यह ना बनाता तो मुझे जरूर औरत बनाता और तब यह सारे अत्याचार मुझे भी खेलना पड़ते।”( नीरजा माधव- यमदीप- पृष्ठ- 287) इससे हमें पता चलता है कि शोषण का कारण शरीर नहीं, बल्कि हमारी दृष्टि है। उसमें परिवर्तन लाना है।
बचपन से होने वाले पारिवारिक व सामाजिक शोषण की वजह से ज्यादातर हिजड़ा लोग अशिक्षित व अल्पशिक्षित हो जाते हैं। उनके जीवन यथार्थ को व्यक्त करते हुए यमदीप उपन्यास के मेहताब गुरु कहता है कि -” किसी स्कूल में आज तक किसी हिजरा को पढ़ते लिखते हुए देखा है ? किसी कुर्सी पर हिजडा बैठा है ?” ( नीरज माधव- यमदीप- पृष्ठ- 94)। वर्तमान संदर्भ में हिजडा लोग अपने इस अधिकार के लिए आवाज़ उठाते हैं । इसके फलस्वरूप आज वे पढ़ते हैं, उच्च स्थान पर नौकरी करते हैं। यह सब उनके प्रतिरोध का फल है।
अशिक्षित व अल्प शिक्षित हिजडा लोग आजीविका चलाने के लिए दूसरों के घर में खुशियों के अवसर पर नाचते हैं, गाते हैं, कुछ लोग भीख मांगते हैं और अन्य कुछ लोग वेश्यावृत्ति भी करते हैं। कहीं लोग यौन रोगों से पीड़ित होते हैं। कुछ लोग दूसरों की गिरिया यानी रखैल और कोती यानी रखैल हिजडा बन जाते हैं। महानगरों के लोग अपने आप में सीमित हो गये हैं। हिजडा लोगों की आमदनी में कामी आयी है। हिजडा लोगों के साथ यौन संबंध रखने वाले लोग भी दूसरों के सामने उन्हें छिपाते हैं। यमदीप उपन्यास नाजबीबी अपने जीवनसाथी के बारे में कहती है कि- ” वह क्या जाएगा मेरे साथ? रिक्शे में कभी-कभार साथ बैठकर चलता है तो अपने मुंह पर गमछा लपेट लेता है, ताकि कोई पहचान ना ले” ( नीरजा माधव- यमदीप- पृ- 46)। हिजडा लोग को सब हीन दृष्टि से देखते हैं। सोना की पढ़ाई हेतु नाजबीबी स्कूल में जाती है। तब वहाँ सब लोग उस पर मजाक करते हैं। समाज की वजह से नाजबीवी की पढ़ाई बंद हो गई है। उसके भाई जी ने उससे कहा- ” तुम परिवार में रह नहीं सकती, हम रख दे नहीं सकते। इसलिए यह समझ लो कि तुम अनाथ हो। कोई नहीं तुम्हारा दुनिया में।”( नीरजा माधव- यमदीप- पृष्ठ- 82)। यात्रा के समय हिजड़ा लोगों के साथ बैठने के लिए कोई तैयार नहीं होता है। हिजडा लोगों के लिए जगह मिलना भी मुश्किल है। मुख्य धारा समाज उन्हें हाशियेकृत किये हैं। उनके जीवन यथार्थ के चित्रण के जरिए जनता के नज़रिए में परिवर्तन लाने की कोशिश करते हैं समकालीन स्त्री लेखन।
हिजड़ो के यौन शोषण करने वाले लोग भी हमारे समाज में है। गीतांजलि चाटर्जी का उपन्यास तीसरे लोग में किसना नामक का हिजडे का यौन शोषण करता है मिश्र। लेखिका कहती है कि- ” समस्त सीमा रेखा को लांघते हुए वासना के अंधे हुए उस वृद्ध ने अभागे किसना को किसी भयभीत हिरणशावक सा अपने चौडे खुरदरे पंजों में दबोच लिया और उसके भरे रसीले अधरों से खेलने लगा। किसना ने काफी मन्नतें की। अपने को बचाने की कोशिश भी कींं। रोया, गिड़गिड़ाया, पर उस कामांध राक्षस की शक्ति के समक्ष वह गरीब दब के रह गया।”( गीतांजलि चटर्जी -तीसरे लोग- पृष्ठ- 46 ) यहाँ मालिक किसना का बलात्कार करता है। बार-बार होने वाले यौन शोषण से मुक्ति पाने के लिए किसना मिश्र जी की हत्या करके भाग जाता है। वह खुद यौन कर्मी बन जाता है। ये सब कुछ का प्रतिरोध है। अंत में ऐयिड्स से पीड़ित वह मर जाता है। यहाँ किसना का प्रतिरोध, विवशता, जीवन यथार्थ आदि सब हम देख सकते हैं।
हिजड़ा लोग वेश्यावृत्ति करते हैं। लेकिन उनके लिए अपना नियम है। यमदीप उपन्यास के नाजबीबी रहती है कि- ” हम लोग सुधरे हैं तो क्या हुआ? कुछ उसूल है हमारा भी। हम वेश्या थोड़े ही है। एक तो जल्दी हम ये करम फानते नहीं, और किसी मजबूरी में गिरिया बना ही लिया किसी को तो जीवन भर निभाते हैं। वह भले ही हमें छोड़ दे, पर हम वफादार कोती की तरह तमाम उम्र बिता देते हैं।” ( नीरज माधव- यमदीप- पृष्ठ-137) हिजरा लोग मूलतः मनुष्य है। इसलिए मानवीय भावनाओं के लिए उनकी जिंदगी में सबसे महत्वपूर्ण स्थान है।
हिजडा संस्कृति का जिक्र समकालीन स्त्री लेखन में है। नीरज माधव का यमदीप नामक उपन्यास में हिजडा लोगों के बीच प्रयुक्त कई शब्दों का प्रयोग लेखिका ने किया है। जैसे- छिबरी( लिंग रहित हिजड़ों के लिए प्रयुक्त सांकेतिक भाषा), टेपका (नवजात शिशु), आदि। यह भाषा उनकी संस्कृति का अंश है। हिजडा बस्ती का चित्रण भी इस उपन्यास में है। लेखिका कहती है कि- ” बीस पच्चीस छोटे- बड़े घरों वाली यह हिजरा बस्ती शहर में रहते हुए भी शहर से बहुत दूर है। दिन में अपने-अपने क्षेत्र में गा- बजा कर अपना जीवन यापन करने वाले यह लोग आपस में मिल- जुल कर रहते हैं। एक दूसरे के सुख-दुख में बराबर भागीदार। कभी-कभी झगड़ा होते भी है तो गुरुजी( मेहताब गुरु) के यहां जाकर सब शांत हो जाता है। गुरुजी पूरे शहर के हिजड़ों के गुरु हैं। हिजड़ा समुदाय में उनकी ही बात चलती है। उनका अनुशासन ही सर्वोपरि है। उनका निर्णय सर्वमान्य है। कब किस किसे किस क्षेत्र में नाचना गाना है? किसी के बीमार होने पर किसे उसकी सेवा टहल करनी है? उसकी कमाली ना होने पर भी उसका एक हिस्सा गुरुजी के पास सुरक्षित हो जाता है। वैसे वैसे अपनी कमाई का एक मोटा सा हिस्सा गुरुजी के पास ईमानदारी से जमा कर देना शहर के तमाम हिजड़ो का प्रतिदिन का नैतिक दायित्व है।” ( नीरजा माधव -यमदीप -पृष्ठ-16 )। हिजड़ा लोग शहर के हिस्सा है ,लेकिन शहर से अलग रहते हैं। उनके बीच माननीय भावनायें है। गुरु के लिए उनकी जिंदगी में हम सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। वे बेसरा माता की आराधना करते हैं। भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृति में जन्म होने के बावजूद वे एक ही संस्कृत में लीन हो जाते हैं।
समलैंगिक
स्त्री पुरुष के यौन संबंधों को मुख्य धारा समाज मानते हैं। लेकिन एक स्त्री और दूसरी स्त्री के बीच( लेस्बियन ) तथा एक पुरुष और दूसरे पुरुष के बीच( गे) के यौन संबंधों को समाज ह न दृष्टि से ही देखता है। लेकिन यह कोई मानसिक विद्ररूपता या नई बात नहीं है। नारीवाद के विभिन्न दशाओं में पुरुष के प्रति अपना विद्रोह प्रकट करने के लिए कई स्त्रियों ने खुद समलैंगिकता को स्वीकार किये थे। लेकिन विद्वानों की राय में समलैंगिकता का निर्धारण मनुष्य मस्तिष्क ही करता है।
गीतांजलि चटर्जी का उपन्यास है तीसरे लोग। इसमें स्मारक नामक पात्र गे है। वह कहता है कि- ” ….. मैं स्वयं पुरुष के रूप में होने पर भी किसी अन्य पुरुष के काया से ही उत्तेजना पाता हूँ, बिल्कुल सामान्य नियम के विरुद्ध और यही सबसे बड़ी विडंबना है कि यह पुरुष काया के भीतर समस्त स्त्रीयोजित गुण है, लालसा है, कामना है, जो तुम्हारे या अन्य किसी भी स्त्री के भीतर होती है xxxx आई एम ए गे ।” ( गीतांजलि चाटर्जीजी- तीसरे लोग- पृष्ठ-37) वह दूसरे पुरुष के साथ यौन संबंध जोड़ना चाहता है। उसे अपने जीवनसाथी के रूप में देखना भी चाहता है। लेकिन उसको समझने में उसके पारिवारिक लोग असमर्थ हो जाते है। उसकी पत्नी उससे पूछता है कि-” क्या उचित चिकित्सा द्वारा आप एक साधारण पुरुष नहीं बन पाएंगे?” ( गीतांजलि चाटर्जी- तीसरे लोग -पृष्ठ -69) अपनी पत्नी को समझाते हुए स्मारक कहता है कि-“… इलाज तो बीमारी का होता है। समलैंगिकता कोई रोग नहीं एक प्रवृत्ति है। एक बिहेवियर..xxx मैं पैदाइशी समलैंगिक हूँ, जिसमें मेरा कोई दोष नहीं । दूसरे पुरुषों की तरफ मेरी भी मानसिकता, मेरी सोच भी नॉर्मल है, फर्क इतना है कि मेरी तरह तीसरे किस्म के लोग दोहरी जिंदगी जीते हैं।” ( गीतांजलि चटर्जी- तीसरे लोग- पृष्ठ -69,70)। अपने व्यक्तित्व के बारे में स्मारक को सही पता है। वह कभी-कभी गे क्लबों में जाता है। वहाँ आने वाले लोगों के साथ वह अपने मानसिक सामाजिक दशा के बारे में चर्चा करता है।
क्रॉस ड्रेसर / ट्रांस्वेस्टीज
मुख्यधारा समाज स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग कपड़ा निर्धारित किया है । लेकिन मनुष्य में ऐसे भी लोग हैं जो यौन संबंधों में विपरीत लिंग के कपडा पहनते हैं। ऐसे लोगों को क्रॉस ड्रेसर कहते हैं। डॉक्टर के वनजा की राय में -” यदि पुरुष स्त्रियों का वेश पहनता है तो उसे क्रॉसड्रेसर कहते हैं वैसे ही स्त्री पुरुष के लिए निर्धारित ड्रेस पहनती है तो वह भी क्रोस ड्रेसर है।” ( डॉ. के वनजा – क्वीर विमर्श- पृ 30) हिंदी के समकालीन महिला कथा साहित्य में ऐसे लोगों को हम देख सकते हैं। गीतांजलि चटर्जी के तीसरे लोग नामक उपन्यास में जोगिया नामक एक पात्र है। उसके पति विप्लव कई स्त्रियों के साथ संबंध रखने वाले एक पुरुष था। शादी के बाद उसने अपनी पत्नी को सिर्फ एक जिस्म के रूप में ही देखा। उनके संबंधों में दरार आया। विप्लव अपने मित्र माइक के साथ यौन संबंध करता है। इसके बारे में जोगिया इस प्रकार कहती है कि-” विप्स ने मेरी साड़ी पहनी हुई थी। गले में हीरों का हार ।होंठों में लिपस्टिक, माथे पर बिंदिया और दोनों कामांध वासना की विकृत मनोवृति के लिए इस तरह से लिप्त थे और ऐसी भी वीभल्स, पाश्विक कामलीला में मग्न थे, जो मैं बात नहीं सकती।”( गीतांजलि चटर्जी तीसरी लोग पृष्ठ- 120 ) अपने पति के इस मनोवृत्ति के बारे में वह आगे कहती है कि -” ही इस ए ब्लडी ट्रांस्वेस्टीज।xxx ट्रांस्वेस्टीज उन लोगों को कहते हैं जो अपोजिट सेक्स के कपड़े पहन कर उनकी तरह श्रृंगार करके रतिक्रिया में उत्तेजना का अनुभव करते हैं । यह एक प्रकार का मनोरोग है। पुरुष जनाना कपड़े पहनना पसंद करता है और स्त्री मर्दाना।”(गीतांजलि चटर्जी तीसरी लोग पृष्ठ-121) । अपने पति की इस दशा को समझने में असमर्थ हो जाती है। जोगिया अपने पति से तलाक लेती है। हिंदी साहित्य में इस मनोवृति पर ज्यादा विश्लेषण अभी तक नहीं हुआ है। मनुष्य की विभिन्नता को सूचित करने का एक कोशिश यहाँ हम देख सकते हैं।
क्वीर के प्रति स्त्री लेखन की दृष्टि
क्वीर के प्रति हिंदी के स्त्री लेखन की दृष्टि हमेशा सकारात्मक तथा प्रगतिशील है। उर्मिला शुक्ला की कहानी है मैं फूलमती और हिजड़ा। इस कहानी का केंद्र पात्र एक अर्ध पौरुषवाले हिजड़ा है। वह फूलमती नामक एक यौनकर्मी के साथ संबंध जुड़ाने के लिए आता है। फूलमती उसके साथ संबंध जोड़ती है। वह यह जानना चाहती है कि एक पुरुष और हिजड़ा में क्या अंतर है। अन्य पुरुषों के साथ उसने संबंध जोड़ दिया था। लेकिन उन संबंधों में प्यार का अभाव थे। फूलमती को एक हिजडा से सबसे पहले जिंदगी में प्यार और सम्मान मिला है। लेखिका कहती है कि-” सारी दुनिया जिसे हिजरा कहती थी फूलमती के लिए वही संपूर्ण पुरुष था। वह पुरुष जिसने प्यार दिया, सम्मान दिया और अधिकार दिया।”( सं. हरिनारायण- कथादेश मार्च-2011, पृ-58)। हिजडा के प्यार की वजह से फूलमती ने वेश्यावृत्ति की छोड़कर उसे अपना जीवनसाथी बनाया। यहाँ हिजडा कि प्रति फूलमती की दृष्टि सकारात्मक है। उसने उसे एक मानव के रूप में देखा, प्यार किया, सम्मान किया। हिजड़ा ने भी फूलमती के साथ एक मनुष्य के समान व्यवहार किया।
तीसरे लोग नामक उपन्यास में किसना नामक एक हिजड़ा का चित्रण किया गया है। एड्स रोग से त्रस्त किसना के प्रति संवेदनशील व्यवहार करती है नूरा। उसने उसे अस्पताल में पहूँचाती है। वहाँ उसका ख्याल रखती है फाल्गुनी। फाल्गुनी ने उसे अपना भाई समझती है। किसना की मृत्यु की बाद उसकी रचनाओं को पुस्तककार देकर समाज की ओर पहुंँचाती है फाल्गुनी। फाल्गुनी की दृष्टि भी सकारात्मक एवं मानवोचित है।
इस उपन्यास के स्मारक एक समलैंगिक है। पारिवारिक जबरदस्ती की वजह से वह फाल्गुनी के साथ शादी करता है। वह फाल्गुनी से अपना असलियत व्यक्त करता है। फाल्गुनी उसे मानती है। समाज से उसकी असलियत को छिपाती है। समाज से वह कहती है कि वह माँ बनने में असमर्थ है ।स्मारक की इच्छा था एक अस्पताल का निर्माण करना। फाल्गुनी उसकी पूर्ति के लिए स्मारक का पूरा सहयोग देती है।
चित्रा मुद्गल का उपन्यास पोस्ट बॉक्स नंबर 203 नाला सोपरा में विमली की माँ हमेशा उसके प्रति संवेदनशील है। विमली हिजडा है। उसने घर छोड़ दिया था। लेकिन अपनी मां के साथ हमेशा संबंध रखती थी। घर के अन्य सभी लोगों ने विमली की उपेक्षा की है। विमली के भाई से माँ कहती है कि-” मेरे पेट में जन्मे को तू काली परछाई कह रहा है। तू भी उसी कोख में जन्मा है। “( सं. एकांत श्रीवास्तव-वागर्थ- फरवरी-2014-पृ- 17) इन शब्दों में माँ की ममता प्यार आदि सब हम देख सकते हैं। उसे अपने अन्य संतानों के समान वह दिखती है। तीसरे लोग उपन्यास में सरसुतिया अपना संतान किसना के प्रति बहुत प्यार करती है। उसे अमानत के रूप में समझती है वह। हिजडा होकर भी माँ के मन में अपने संतान की प्रति सकारात्मक दृष्टि है।
नीरजा माधव के यमदीप उपन्यास में नाज बीवी के मां-बाप अपने संतान से बहुत प्यार करते थे। नाजबीबी इंडस्टेक्स है। लेकिन उसके मां-बाप एक लडकी के रूप में उसका पालन पोषण करते हैं। अपनी संतान की सुरक्षा हेतु वे एक ही जगह में कई दिनों तक ठहरते नहीं हैं। विभिन्न कारणों के वजह से नाजबीवी को अपना घर छोड़ना पड़ा। लेकिन हिजडा बस्ती में रहते समय भी उसके माँ-बाप उससे मिलने के लिए आते थे। मुझे वापस ले जाने में भी तैयार थे।नाजबीबी ने इनकार किया। वह फोन में अपने मां-बाप से बातें भी करती है। उपन्यास की सोना अपनी माँ नाजबीबी से बहुत प्यार करती है। नाजबीबी हिजडा है । लेकिन उसने सोने का पालन पोषण किया। सोना उससे कहती है कि-” जब मैं बड़ी होकर पढ लिख लूंगी और नौकरी करने लगूँगी तो तुमसे तुम्हारा धंधा छुड़ा दूंगी।” ( नीरजा माधव -यमदीप- पृष्ठ-261)। सोना अपनी माँ की असलियत जानकर भी उससे बहुत प्यार करती है। उसके लिए वह पूर्णतः माँ है ना हिजड़ा। इन सभी संदर्भों में मानवीयता का चमक हम देख सकते हैं।
समाज के प्रति क्वीर की दृष्टि
सालों से समाज से शोषित- पीड़ित जनसमूह है क्वीर। समाज के हिस्सा होकर भी सभी लोगों ने उन्हें अनदेखा कर दिया। लेकिन क्वीर लोग समाज के प्रति अपने मानवोजित दायित्व निभाते हैं। नीरजा माधव के यमदीप नामक उपन्यास में प्रसव पीड़ा से तड़पने वाली पगली की सहायता करती है हिजड़ा लोग। उसकी सहायता करने के लिए कोई और तैयार नहीं थे। उसकी पीड़ा देखकर नाजबीबी कहती है कि -” अब कोई पुछनहार नहीं है इसका तो क्या हम भी छोड़ जाएंगे? अरे हम हिजडे हैं, हिजड़े… इंसान है…।” ( नीरजा माधव -यमदीप- पृष्ठ- 12)। प्रसूति के बाद हिजडा नाजबीबी उस पगली की बेटी को अपनी बेटी के समान देखकर उसका देखभाल करती है। एक हिजडा के पास एक लड़की रहना समाज की दृष्टि में बहुत बुरी बात है। लेकिन नजीबीबी सभी मुसीबतों का सामना करती है। वह लड़की को शिक्षा प्रदान करती है। एक माँ के रूप में नाजबीबी खुद बहुत खुशी महसूस करती है।
लोग धर्म के नाम पर आपस में लड़ते हैं ।यह देख कर यमदीप उपन्यास में नाजबीवी कहती है कि-” अपने देश के लिए तो देखिए हम लोग मर मिटेंगे। जिस तरह फौज में एक सिपाही भर्ती होता है, पुलिस होता है… सरकार हमें भी हथियार दे दे। मैं तो लडूंगी । लड़ते-लड़ते हिंदुस्तान के पीछे अपना जान दे दूंगी।”( नीरजा माधव- यमदीप- पृष्ठ -163)। हिजड़े लोगों के बीच हिंदू- मुसलमान जैसे कोई धार्मिक अलगाव नहीं है। सभी धर्म में उनकी दशा एक समान है। इसलिए भी उन सब से अलग होकर मनुष्य के सामान रहते हैं। लेकिन समाजों ने मनुष्य के रूप में देखने के लिए तैयार नहीं है। यह उनकी दृष्टि की कमी है। इसमें परिवर्तन लाना है।
यमदीप उपन्यास के छैलू अपना घर छोड़ता है। वह एक हिजड़ा है ।उसके माँ-बाप ने उससे बहुत प्यार किया था। उसकी वास्तविकता को छुपा कर उसका पालन पोषण किया। लेकिन परिवार की बदनामी से भयभीत होकर अपना घर छोड़ता है। यहाँ छैलू अपने घर वालों से बहुत प्यार करता है। इस उपन्यास के नाज बीवी अपने मां-बाप से बहुत प्यार करती है। उसने खुद अपना घर छोड़ दिया। क्योंकि उसकी उपस्थिति में उसकी बहन की शादी होना नामुमकिन थी। दूसरों की भलाई के लिए वे खुद दुख का वरण करती हैं। यहाँ उनके मन की विशालता हम देख सकते हैं।
निष्कर्ष
हिंदी के समकालीन महिला लेखन की दृष्टि लोग हितकामी है। दुनिया में सकारात्मक परिवर्तन लाने की कोशिश महिला लेखन में हम देख सकते हैं। क्वीर को मानवीय रूप प्रदान करने में हिंदी के समकालीन महिला लेखन सक्षम हुए हैं। क्वीर के सभी मुद्दों की चर्चा यहाँ हम नहीं देख सकते हैं फिर भी यह एक शुरुआत है। उसकी महत्ता कम नहीं है।
संदर्भ सूची
क्वीर विमर्श- डॉ. के वनजा – वाणी प्रकाशन- नई दिल्ली( 2021 प्रथम संस्करण)
नीरजा माधव -यमदीप- सुनील साहित्य सदन- नई दिल्ली(2002 प्रथम संस्करण)
रीतिकालीन दरबारी काव्य सामंती ताकतों से नियंत्रित था; जहाँ सुरा एवं सुंदरी का बोलबाला था। चूंकि दरबारी साहित्य के अधिकतर रचनाकार पुरुष थे जो न केवल सामंती परिवेश में पल-बढ़ रहे थे बल्कि उस मानसिकता से भी परिचालित थे जो उन्हें परंपरा से प्राप्त थी; ऐसी स्थिति में तत्कालीन रीति काव्य का मूल्यांकन अधूरा ही माना जाना चाहिए। यद्यपि रीतिकालीन कवियों के पास भले ही उनकी जीविका का प्रश्न गंभीर रहा हो तथापि रचना में स्त्री को वस्तु के रूप में प्रस्तुत करना नितांत ही उपेक्षणिय और निंदनीय है। रितिकाव्या में स्त्री की बड़े पैमाने पर नायिका भेद के अंतर्गत दृश्यमान्यता भले ही उसे पुरुषों के समक्ष खड़ा करती है लेकिन यह तत्कालीन अभिरुचि के अनुकूल ही जान पड़ता है; जहाँ स्त्री ‘वस्तु’ के रूप में निरंतर पेश की जाती है। रीतिकाव्यों की भाषा भी नितांत स्त्री विरोधी है जो उसे पुनः शोषण के चक्र में जकड़ती है। इस रूप में प्रस्तुत शोध आलेख स्त्री विमर्शीय दृष्टि से तत्कालीन रीतिकाव्य को समझने की एक जरूरी कोशिश है क्योंकि आलोच्य काल का स्त्रियों से सीधा संबंध है।
बीज शब्द –रीतिकाव्य, दरबारी, जेंडरवादी, वस्तु, शोषण, कामशास्त्र, स्त्री, पुरुषवादी
शोध आलेख
रीतिकालीन संपूर्ण दरबारी काव्य न केवल आश्रयदाता शासकों के आश्रय में पली-बढ़ी बल्कि दरबारी शान-शौकत और चाटूकारिता की प्रवृत्ति से भी अपना पीछा न छुड़ा सकी। मध्यकालीन परिवेश और सामंती मानसिकता तत्कालीन काव्य को निर्मित करने के आधार बिन्दु रहें। तत्कालीन कवियों के सामने चाहे आर्थिक लाचारी का बड़ा कारण भले ही उपस्थित रहा हो लेकिन उनकी निर्मित हो चुकी सामंती मानसिकता और पुरुषवादी दृष्टिकोण स्त्री को लेकर पिछड़ेपन और शोषण संबंधी मानसिकता से प्रेरित रही। रीतिकालीन प्रायः बड़े दरबारी कवियों द्वारा भी कामशास्त्र की उत्तरवर्ती परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास किया गया जहाँ स्त्री को मानवी रूप से अधिक ‘कामिनी, ‘परकीया, ‘नायिका’ के रूप में देखा गया और उसे दरबारी शान-शौकत के अनुरूप ‘भोग्या’ का रूप प्रदान किया गया। स्त्री के समस्त शारीरिक हाव-भाव, मानसिक आवेगों और सामाजिक क्रिया-कलापों को ‘कामशास्त्र’ के संकुचित दृष्टिकोण में बाँधकर देखा गया। स्त्री को मनोरंजन के सस्ते उपकरण के रूप में कविता के माध्यम से सामने प्रस्तुत किया गया। तत्कालीन युग में काव्य के माध्यम से जीविकोपार्जन का यह तरीका नितांत हेय और निंदनीय माना जाना चाहिए क्योंकि ‘‘इस काल में स्त्री काव्य-रचना व मनोरंजन का उपकरण मात्र दिखाई देती है, भावहीन व संवेदनाहीन देहमात्र। यह विभेद स्त्री के सेक्सुअली सन्तुष्टि प्रदान करने की विभिन्न डिग्रियों का ही सारणीकरण प्रतीत होता है। नायिका-भेद व उसके उपभेदों पर दृष्टिपात करते ही उस समय की स्त्री की दयनीय व उपेक्षणीय स्थिति को डिकोड किया जा सकता है। स्वकीया, परकीया व वेश्या अथवा, प्रवेष्या व सामान्या आदि भेदों से स्त्री के प्रति उपभोगवादी सामाजिक नजरिया उजागर होता है। प्रेमगर्विता, अन्यसंभोगदुःखिता, सौन्दर्यगर्विता, प्रोषितपतिका स्त्री की जेंडर ट्रेनिंग ही नहीं, उसके सामाजिक अस्तित्व की नगण्यता को भी इंगित करते हैं। कुलटा या अधमा जैसे विभेद एक सेक्सुअल आब्जेक्ट के रूप में इस्तेमाल होने वाली स्त्री की सामाजिक नियति का अंदाजा कराते हैं। इस विभेदीकरण का निहितार्थ यह है कि पारिवारिक संरचना में अपने स्थान के लिए संघर्ष करती स्त्री को अपना स्थान तभी मिल सकता है, जब वह रूपवती व काम प्रवीण होकर नायक के लिए काम्य हो। इस तरह के विभेद स्त्री की यौनिक पहचान को कई शरीरेतर व मनोभावेतर कारकों से जोड़ते हैं; स्त्री के सोचने, महसूस करने या उसमें दखल देने के लिए बहुत कम स्पेस या कहें कि कोई स्पेस नहीं छोड़ते । ”1
‘नायिका-भेद’ की तत्कालीन काव्यधरा के अन्तर्गत् इतनी विशद चर्चा केवल परिवेश और युग-विशेष की माँग ही नहीं कही जा सकती बल्कि इसके मूल में पुरुषवादी रसिक-वृत्ति और विलास-वृत्ति भी प्रधान है। चूँकि विभिन्न प्रकार की नायिकाओं के भेद पुरूषों के विलासी प्रेम और रसिकता के अनुरूप ही किया गया है। इस विशद नायिका-भेद को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि प्रायः सभी नायिकाओं का अपने शरीर मन और यहाँ तक कि सामाजिक क्रियाकलाप तक पर अपना कोई अधिकार नहीं है, सब कुछ पुरूषों के सामंती अभिरूचि के अनुरूप है। ‘स्वकीया’ नायिका को आदर्श नायिका के रूप में परिगणित किया गया है; जो कि एक गृहिणी और सुशील पतिव्रता स्त्री है। यही कारण है कि युग की मूल प्रवृत्ति के अनुरूप ‘स्वकीया’ नायिका का वर्णन अत्यधिक नहीं किया गया। डॉ. बच्चन सिंह के अनुसार- ‘‘नैतिक दृष्टि से विचार करने पर स्वकीया आदर्श नायिका ठहरती है। जो विवाहिता स्त्री मन, वचन, कर्म से पति के अनुकूल रहकर स्वप्न में भी पर-पुरूष का चिंतन न करे, वह स्वकीया है। वह पतिव्रता, शीलवान, लज्जावती तथा पति के घर के बड़ो और गुरुजनों के प्रति विनम्र भाव रखने वाली होती है। ‘देव’ ने नायिका के जिन आठ लक्षणों का उल्लेख किया है, वे ही उनकी स्वकीया के भी लक्षण हैं। इसके आधार पर कहा जा सकता है कि वे सिद्धांतत: स्वकीया को ही नायिकापद का अधिकारी समझते थे। इन्होंने स्वकीया, परकीया और सामान्या का अंतर स्पष्ट करते हुए लिखा है-
भूषन, जीवन, रूप, गुन, विभव, सील, कुल, प्रेम ।
आठों अंग सुकियाहि के, परकिया बिन कुल प्रेम।।
सामान्या बिन सील, कुल, प्रेम, विभौ पहिचानि।
भूषन, जोबन, रूप, गुन सहित उत्तमा जानि।।
-भवानी विलास
भूषण, यौवन, रूप, गुण, वैभव, शील, कुल और प्रेम स्वकीया के अंग माने गए हैं। परकीया में स्वकीया के ‘कुलनेम ’ के अतिरिक्त अन्य सभी गुण सन्निहित हैं। सामान्या कुल, शील और प्रेम से रिक्त होती है।”2
भारतीय समाज में ‘रूदन’ को स्त्री का प्रधान गुण माना जाता है। प्रायः साहित्य में इसी ‘रूदन’ को वियोगमूलक शृंगार के अंतर्गत देखा गया। यद्यपि प्रियतम के परदेश-गमन के कारण जो दुःख होता है तथा उससे उत्पन्न असह्य वेदना प्रकारांतर से साहित्य में विरह-वियोग का कारण मानी जाती रही है। लेकिन तत्कालीन सामंती परिवेश में स्त्रियों के दुःख, पीड़ा, वेदना और मानसिक हलचलों को रसिक मनोरंजन के निमित्त और कामी स्वभाव के अन्तर्गत ही अत्यधिक वर्णित किया गया। स्त्रियों के दुःख और पीड़ा का न केवल अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन किया गया बल्कि उन्हें मजाक की हद तक भी सीमित कर दिया गया। इस संबंध् में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कथन है- ‘‘बिहारी की उन उक्तियों में जिनमें विरहिणी के शरीर के पास ले जाते शीशी का गुलाबजल सूख जाता है, उसके विरह-ताप की लपट के मारे माघ के महीने में भी पड़ोसियों का रहना कठिन हो जाता है, कृशता के कारण विरहिणी साँस खींचने के साथ दो-चार हाथ पीछे और साँस छोड़ने के साथ दो-चार हाथ आगे उड़ जाती है, अत्युक्ति का एक बड़ा तमाशा ही खड़ा किया गया है। कहाँ यह सब मजाक, कहाँ विरह की वेदना।”3
‘प्रेम’ दो व्यक्तियों के मध्य उत्पन्न एक सहज आकर्षण है। ‘प्रेम’ केवल ज्ञानेन्द्रियों तक सीमित शारीरिक सुख ही नहीं बल्कि इससे बहुत आगे मानसिक और आध्यात्मिक आनंद भी है। किन्तु रीतिकालीन साहित्य में जिस प्रकार का प्रेम परिभाषित होता है वह शारीरिक स्पर्शजन्य सुख ही है, जिसमें रसिकता, मांसलता, वासना और काम ही प्रधान है। प्रायः सभी रीतिकालीन दरबारी कवियों के यहाँ प्रेम का यही स्वरूप परिलक्षित होता है। बिहारी के अनेक दोहे इस बात की पुष्टि करते हैं; एक दोहे के अनुसार – नायक- नायिका को छींके पर दहेंड़ी रखते हुए देखता है और अपने रसिक तथा कामी स्वभाव के कारण नायिका से कहता है कि वह उसी अवस्था में कुछ देर रहे – “अहे दहेंड़ी जिनि धरै, जिनि तूँ लेहि उतारि। नीकै है छीकैं छुवै, ऐसै रहि, नारि।।“4 इसी प्रकार कामी नायक एक अन्य दोहे में नायिका को किसी ऊंचे वृक्ष से फूल तोड़ता हुआ देखता है तो उसके उभरे हुए कुचों और त्रिवली को देखकर आनंद विभोर हो उठता है- “बढ़त निकसि कुच-कोर-रुचि, कढ़ती गौर भूजमूल। मनु लूटि गौ लोटनु चढ़त, चोटत ऊँचे फूल।।”5 रीतिकालीन दरबारी काव्य में वर्णित प्रेम के स्वरूप पर टिप्पणी करते हुए डॉ. बच्चन सिंह लिखते हैं कि- ‘‘एक ओर दरबारी वातावरण और दूसरी ओर काव्य रूढ़ियों के बंधनों में पनपा हुआ प्रेम (शारीरिक सुखोपभोग के आकांक्षी) रसिकों के अनुकूल अधिक होगा, उदात्त चित्तवृत्ति वालों के अनुकूल कम। इस तरह से प्रेम में साहस, रोमांस, त्याग आदि चित्तवृत्तियों को बल मिलने का प्रश्न ही नहीं उठता । ऐसे प्रेम में या तो नायक संयोगकालीन परिरंभ तथा रतिरंग में आकंठमग्न होता है या फिर मानिनी खंडिता और धीरादि नायिकाओं की क्षोभपूर्णवाणी सुनकर और सहकर पुनः विहार में संलग्न हो जाता है। समग्रतः यहाँ प्रेम के इसी रूप के दर्शन मिलेंगे।”6 जेंडरवादी नजरिए से देखें तो यहाँ प्रेम स्त्री को स्वतंत्र नहीं करता बल्कि उसे पुरुष के रसिक एवं कामी वृत्ति को तुष्ट करने वाले माध्यम के रूप में प्रस्तुत करता है। स्त्री का प्रत्येक बनाव, शृंगार तथा उसकी आत्ममुग्धता पुरुष को रिझाने और उसके वासनात्मक प्रेम के परितोष के लिए है जहाँ प्रेम की गम्भीरता, त्याग और आत्म-समर्पण का लेश भी नहीं है।
रीतिकालीन दरबारी काव्य में नायिका-भेद के अन्तर्गत् स्त्रियों की वाक्-पटुता, उलाहना और रोष भी रसिकता को बनाये रखने के लिए ही सृजित किया गया। कवियों के अन्तर्गत् चाहे घनानंद की ‘सुजान’ की बात करें या केशवदास के ‘राय प्रवीण’ की सभी की वाक-चतुरता पुरुषों के घेरे से बाहर नहीं निकल पाई है। संभव है कि यह तत्कालीन परिवेश के कारण हो लेकिन इसी ‘नायिका-भेद’ के माध्यम से स्त्री की इतनी नकारात्मक छवि को प्रकारांतर से प्रस्तुत किया जाता रहा है, जिसके कारण तथाकथित रूढ़िवादी समाज और पुरुष-वर्ग के द्वारा स्त्रियों को निरंतर शोषित और उत्पीड़ित किया जाता रहा है। तत्कालीन परिवेश में स्त्रियों के प्रति निर्मित होने वाले विशेष प्रकार के दृष्टिकोण को लक्षित करते हुए डॉ. बच्चन सिंह लिखते हैं कि- ‘‘सामन्तों से नारी के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण की आशा ही क्या की जा सकती थी। मुगलों की छत्रछाया में ये विलासी सामन्त निर्भय विलास का सुख लूट रहे थे। उनके लिए ‘तिय-छवि, ‘छाया ग्राहिनी’ से कम न थी। उन्हीं के मनस्तोष के लिए तो नायिका-भेद का विपुल-साहित्य तैयार हुआ था। बिहारी ने नायिका-भेद के लक्षण-उदाहरण तो नहीं प्रस्तुत किए पर नायिकाओं की अनेकानेक भंगिमाओं, चेष्टाओं, मनोदशाओं आदि के चटकीले चित्र खींचे। उन्हें घर में, घाट-बाट में, कुंज-वन में सर्वत्र शोखी से भरी हुई देखा।… नायिकाओं के सहज-सौन्दर्य और भोलेपन से उनको कुछ विशेष लेना-देना नहीं था। वे उनके अन्दाज और शोखी पर फिदा थे- जो एक विशेष प्रकार के दृष्टिकोण का द्योतक था।”7
निष्कर्षत: स्त्री की उत्पत्ति का इतिहास जितना प्राचीन है उतना ही प्राचीन उसके दमन और उत्पीड़न का इतिहास भी है। स्त्री को देखने और समझने का व्यावहारिक और सामाजिक नजरिया उसकी ऐतिहासिक निर्मिति का प्रतिफलन है। भूमंडलीकरण के दौर में जब समस्त विश्व एक परिवार है और इसी से उपजी भगिनीवाद की अवधारणा के समतुल्य समस्त स्त्रियों की पीड़ा और शोषण की त्रासदी भौगोलिक और परिवेशगत विभिन्नता के बावजूद लगभग एक है। दरअसल पूंजीवादी और उपभोक्तावादी संस्कृति ने स्त्री को पूरी तरह से बाजार का एक उपकरण बनाकर छोड़ दिया है। मसलन बाजार मांग-पूर्ति पर आधारित अर्थव्यवस्था की एक महत्वपूर्ण इकाई है। यही कारण है कि स्त्री के शारीरिक गठन और रूपरेखा की बारीकी से जांच की जाती है तथा विभिन्न प्रकार की सत्ताओं द्वारा स्त्री की छवि का मानकीकरण इसी का परिणाम है। चूंकि रीतिकाल के विशेष संदर्भ में ही स्त्री को मनुष्य से पृथक एक उत्पाद के रूप में देखे जाने में कामशास्त्र की परंपरा पर आधारित ग्रंथों का विशेष योगदान रहा है। कहना चाहिए कि स्त्री को उपभोग का साधन बनाने में इन ग्रंथो का प्रकारांतर से उपयोग किया गया, जिसके कारण रीतिकालीन दरबारी परिवेश में नायिका-भेद पर आधारित अनेक ग्रंथों का रसिक दृष्टि से न केवल प्रणयन किया गया अपितु अनुकरण और पिष्टपेषण की प्रवृत्ति भी खूब रही। स्त्रियों के विषय में लिखे जाने के संबंध में पुरुषीय मानसिकता और दृष्टि का व्यापक आधार ग्रहण किया गया तथा स्त्री को इतिहास में सत्ता-वर्ग के हाथ की कठपुतली के रूप में दर्ज करने की एक अनुचित कोशिश की गई।
संदर्भ सूची
मुकेश गर्ग (संपा०); स्त्री की नज़र में रीतिकाल, वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2020, नई दिल्ली, पृष्ठ 48-49 (डॉ० नीलिमा चौहान के लेख-‘रीतिकाल में स्त्री यौनिकता का सवाल उर्फ़ देह अपनी बाक़ी उनका’ से उद्धृत अंश)
डॉ० बच्चन सिंह; रीतिकालीन कवियों की प्रेम व्यंजना, लोकभारती प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2005, इलाहाबाद, पृष्ठ 305
आचार्य रामचंद्र शुक्ल; चिंतामणि (भाग-एक), संजय बुक सेंटर, प्रथम संस्करण 2006, वाराणसी, पृष्ठ 102
समकालीन हिंदी कथा – साहित्य की अग्रणी हस्ताक्षर श्रीमती चित्रा मुद्गल जी से नेहा झा की बातचीत
साक्षात्कार्ता: नेहा झा
समकालीन हिंदी कथा – साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली अग्रणी हस्ताक्षर श्रीमती चित्रा मुद्गल प्रतिष्ठित लेखिका है। समाज के विविध वर्गों से आम पात्रों का चुनाव कर उन्हें अपनी लेखनी के माध्यम से केंद्र में लाकर उनकी समस्याओं की पुरजोर तरीके से समाज के समक्ष रखा है। चित्रा मुद्गल की कहानियों में सवेंदनाओं के विविध धरातल मूर्त रूप में उपस्थित हुए है ।
चित्रा मुद्गल जी ने समाज में घट रही सभी समस्याओं के खिलाफ अपनी लेखनी के द्वारा आवाज उठाई है। चित्रा जी की रचनाओं में हमें विविधितायें स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है । ठीक इसी प्रकार इन्होने नारी के भी विभिन्न पक्षों पर अपनी कलम चलाई है । मैंने इनके कहानी साहित्य को पढ़ते हुए ‘जिनावर’ कहानी संग्रह पर लघु शोध (M.phill) किया है । इस शोध में मैंने ‘जिनावर’ कहानी संग्रह में विशेषतः नारी के विविध रूप तथा उनकी कहानियों में समाज के विभिन्न पक्षों को समझने का प्रयास किया है। ‘जिनावर’ कहानी संग्रह में भी इनके कथा साहित्य की तरह विविध रूप देखने को मिलते है। शोध के दौरान उनका लिया गया साक्षात्कार –
प्रश्न –1 आपकी उपन्यासिक कृति आंवा में श्रमिक जीवन की जो बारीकी विवेचना मिलती है वह भोगा हुआ यथार्थ प्रतीत होता है। उस यथार्थ को आपने कैसे गढ़ा ?
उत्तर – जिस तरह से मैंने उस यथार्थ को गढ़ा है, वह आवाँ उपन्यास में रूपायित हुआ है.यह उपन्यास पाठको को गहरी छुआ है, कथ्य के निर्वाह मे उस जींवत यथार्थ को उतारने में लेखक को सफलता मिली है, ऐसा मानना चाहीए। जहां तक यह प्रश्न है की आवां एक भोगा हुआ यथार्थ है, तो ये में स्वीकार करती हूँ कि मैंने उस यथर्थ को जिया है, मैं उसका हीस्सा रही हूँ । में बकायदा अपने कॉलेज के जीवन के शुरुआत से ही सक्रिय सदस्य रही हूँ , ‘दत्ता सावंत’ के ‘ट्रेड यूनियन कामगार आघारी’ और जो कुछ मैंने उस समय देखा, महसूस किया और उस लड़ाई में बराबर की भागीदारी रही। मजदूरों के संघर्ष को अपना संघर्ष समझा लेकिन आवाँ लिखने के जरूरत मुझे तब महसूस नहीं हुई थी जब मैं ट्रेड यूनियन सक्रिय सदस्य थी।
आवाँ लिखने के विषय मे मैंने तब सोचा जब “नियोगी हत्याकांड” हुआ। शायद 28 सितंबर 1991 के आसपास नियोगी हत्याकांड बिलासपुर के निकट पूर्वा के आसपास घटा और छत्तीसगढ़ में उनकी हत्या हुई। तो कहीं न कहीं मेरे मन मे यह बात आई कि ट्रेड यूनियन के भीतर अंतर्विरोधों को रेखाकिंत करते हुए उपन्यास लिखने की जरूरत है। नियोगी जी की हत्या का अर्थ है कि पूंजी ने तो उन्हें मारकर मजदूरों की समस्या का अंत जिस रूम में सोचा था लेकिन उस रूप में वो उसे क्रियान्वित नहीं कर सकते थे। यदि किसी न किसी घर के भेदी ने नियोगी जी के बारे जरूर ये खबर दी कि कब किस वक्त कहाँ होंगे, कितने बजे वह अपने घर पहुंचेंगे और कहाँ किस खिड़की के करीब घर मे सोते है, ताकि जहां से उनके खरीदे गए हत्यारे के माध्यम से वह हत्या करवा सकें। तो कहीं न कहीं बाहर के आदमी ने सूचना तो नहीं दी होगी पूंजी को। निश्चय ही किसी न किसी बहु[1]त निकटस्थ रहने वाले मजदूर को फोड़ा होगा और फोड़कर के उसका उपयोग अपने हीत मे किया होगा।
तो यह जो उनकी लड़ाई नियोगी जी लड़ रहे थे और जिनके बुनियादी हको के लिए पूँजीपतियों से लोहा ले रहे थे। वो उन्हीं में से किसी ने पूंजी के हाथों बिक कर उनकी हत्या करवा दी। तो यह जो अंर्तविरोध स्वयं जिनके लिए जो नेता संघर्षरत था उसकी हत्या संभव हुई। कोई न कोई मजदूर बिका पूंजी के हाथों। चाहे उसकी जो भी मजबूरी रही हो लेकिन ये उन अंतर्विरोधों को रेखांकित करता है कि कहीं न कहीं पूरे न पूरे मजदूर आंदोलन में कुछ चीजें ऐसी जरूर रह जाती है जिनके प्रति स्वयं मजदूरों में असंतोष अपने नेता के प्रति होता है। उन्हें लगता है कि उनका जो नेता है, वह उनके साथ उतना न्याय नहीं कर रहा है या उनकी समस्या के सहारे नेता अपनी नेतई की नींव को पुख्ता कर रहा है। यानी उनके जो हीत है उनकी परवाह उतनी नहीं करता या यह भी कहीं भ्रम रहा हो कि पूंजी के इशारे पर वो उनके जो अधिकार है, उनकी लड़ाई जिस तरीके से लड़ी जानी चाहीए ईमानदारी से नहीं लड़ रहा है, किन कारणों से वह बिकता है, किन कारणों से उसकी हत्या संभव होती है। नियोगी जी की इस चीज ने मुझे हीला कर रख दिया। फिर मैंने तय किया मैं अपने जीवन के भोगे हुए यथार्थ यानी ‘ट्रेड यूनियन’ में अपनी भागीदारी के समय जिस मनोयोग जिस निष्ठा के साथ मैं मजदूर आन्दोलनों से जुड़ी रही हूँ, अपने जीवन के 15-20 वर्षों तक तो कहीं न कहीं मुझे लगा कि कुछ न कुछ असंतोष या अंतर्विरोध है जिनको रेखांकित किया जाना चाहीए। क्योकि मजदूरों का जितना भला होना चाहिए उतना नहीं हो पाता है। बल्कि उनका नेता मजदूरों को वोट बैंक बनाकरके उनके भरोसे लोकसभा के चुनाव में खड़ा होता है, जीतकर के चला आता है। लोकसभा मे कितना मजदूरों का हित आगे कर पाता है या नहीं कर पाता लेकिन अपना हित तो पूरा होता है जरूर। तो यह आवाँ समय का आवाँ है जो भोगे हुए यथार्थ को मैंने लिखा। मैंने ‘नियोगी हत्या’ कांड की जो बात की उन दिनों मैं दिल्ली में थी, मुंबई छोड़ चुकी थी। ‘ट्रेड यूनियन’ से मेरा नाता काफी कुछ खत्म हो गया था क्योकि एक जो नियमित भागीदारी होती है उससे मैं वंचित थी। दूर रहकर के मैं कभी कभी किसी मीटिंग में जा पाती थी। कहीं न कहीं मुझे यह लगा यह क्या हो गया है, कैसे संभव हुआ, कैसे पूंजीपति यह मानकर चलता है कि उसे नेता को खत्म कर दिया जाए तो इनका आंदोलन स्थिल हो जाएगा, कोई नेतृत्व हीन आंदोलन चल नहीं सकता, जी नहीं सकता, ज्यादा दिन तक। छत्तीसगढ़ में नियोगी की जब हत्या हुई 28 सितम्बर 1991 तो मुझे लगा कि मुझे अब कहीं न कहीं लिखना चाहीए। उन अंतर्विरोधों को जो हमारी हार का कारण बनती है, आंदोलन की हार का कारण बनती है। आंदोलन भीतर से खोखला होता है। अंतर्विरोधों में फंसा हुआ आंदोलन भीतर से खोखला होता है तो आवाँ को मैंने लिखने का निश्चय किया। पता नहीं में कितना न्याय कर पाई।
प्रश्न –2 एक ज़मीन अपनी, प्रेतयोनी, सौदा, लकड़बग्घा,जब तक विमलाए है, केंचुली, लेन, मुआवजा इन सभी रचनाओं में जो स्त्री चरित्र है वो ज्यादती के खिलाफ प्रतिरोध करती है, क्या वह प्रतिरोध किताबी पन्नों से निकल कर समाज में भी घटित होता है ?
उतर- वह प्रतिरोध इन रचनाओं के पन्नों से निकल करके निश्चित रूप से कहीं ना कहीं समाज के उन पक्षों को प्रभावित जरूर करता है। उसके अंदर जो सत्य है वह प्रभावित करता है कि स्त्री पात्रों के साथ जो कुछ हुआ वह कहीं ना कहीं पितृसत्तात्मक समाज के अहंकार का नतीजा है, पितृसत्तात्मक समाज के उच्च अहंकारी बर्ताव उसकी परिणीति है कि वह कभी बर्दाश्त नहीं कर पाते की स्त्री अपने गले में प्रतिरोध की आवाज रखें। वह आवाज उनके क्रियाकलापों तथा उनके निर्णय के विरुद्ध जाकर खड़ा हो क्योंकि कहीं ना कहीं उसकी गूंज बाकी रहती है। वह चाहे लकड़बग्घा में पछाँहवाली की बिटिया के रूप में हो चाहे, ‘एक जमीन अपनी भी’ की ‘नीता’, ‘बावजूद इसके’ की ‘प्रीति’, ‘सौदा’ की ‘मंगला’ या ‘फिर जब तक बिमलायें हैं’ की ‘बिमला’ अगर ये लोग पढ़ लिख जाएगी, अपने निर्णय खुद लेगी, सही गलत का निर्णय भी लेने लगेगी, अपने अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई भी लड़ेगी, और इन्ही से डर कर इसी सबको खत्म करने का पितृसत्तात्मक समाज सोच रहा सोचता है और इसी का परिणाम है ‘लकड़बग्घा’ का अंत। ‘लकड़बग्घा’ कभी बड़ों को उठाकर नहीं ले जाता है सेठ गांव के लोगों को ना समझ सोचकर यह प्रचारित करवा देता है परंतु जो भी यह रचना पढ़ेगा वह निश्चय उस पितृसत्ता की चालाकी को जरूर समझेगा और इस तरह यह कहानी प्रतिरोध की कहानी बनती है और प्रतिरोध पात्र के मार दिए जाने के बाद भी जिंदा रहता है। प्रतिरोध कभी मरता नहीं है बल्कि प्रेरणा बन कर पढ़ने वालों के दिल और दिमाग में बैठ जाता है। तो कहीं ना कहीं यह कहानियां मेरे हीसाब से अपने प्रतिरोध को समाज में एक प्रेरणा की तरह निरूपित और प्रेरित करती है कि गलत के खिलाफ खड़े रहना जरूरी है चाहे वह औरत ही क्यों ना चाहे वह औरत को निरीह ही क्यों ना समझते हो। तो प्रतिरोध जिंदा रहता है भले ही वह किताब के पन्नों में हो या व्यवहारिक जीवन में।
प्रश्न –3 आपकी दो रचनाएं ‘गेंद’ और ‘गिल्ली गुड्डू’ हिंदी साहित्य में वृद्ध विमर्श को गति देती है। आपको इनकी प्रेरणा कहा से मिली ?
उतर- भारतीय समाज में कोटम्भी जीवन के क्षरण से वृद्ध समस्या आई क्योंकि भारतीय समाज में कभी हमने सुना नहीं था कि अनाथ आश्रम की जरूरत है और वृद्ध आश्रमों की जरूरत है। अनाथ रिश्तेदारों में कहीं ना कहीं किसी संबंधी के सहारे जी लेता था और अपना भविष्य पा लेता था चाहे वह विधवा बहन का बच्चा हो चाहे दूर किसी रिश्तेदार का। बूढ़े-बुजुर्ग घर के दरवाजे के बरगद थे, बिना उनके पैर लगे कोई घर के भीतर नहीं घुसता था। जिस समाज में बुजुर्गों के आशीर्वाद को भगवान के आशीर्वाद के समान माना गया उस समाज में वृद्धों को अब अपने घर में रहने की इजाजत नहीं है। उपभोक्तावादी संस्कृति का यह नतीजा है जो वस्तु हमारे उपयोग में नहीं आती है उसका अपने पास होना निरर्थक है। तो वृद्धावस्था किसी भी रूप में, परिवार के क्रियाकलापों में सहायक नहीं होती है, होती भी है तो लोग उनके अनुभवों का लाभ उठाना नहीं चाहते। लोगों को अपनी सजी सजाई बैठक में खस्ता हुआ वृद्ध अच्छा नहीं लगता है। एकल परिवारों का जो चलन रोजगार के चलते या पाश्चात्य जीवन शैली के चलते हमारे यहां बढ़ा है ‘हम दो हमारे दो’ वहां वृद्धों के लिए जगह नहीं है। ऐसा कोई पोस्टर दिखाई नहीं देता कि ‘हम दो हमारे दो’ के नारे में बुज़र्गों यानी सास-ससुर के लिए कोई जगह हो। तो यह सारा का सारा जो है इस तरह की विडंबना पूरे वातावरण भारतीय समाज में व्याप्त रहा है तो वह मेरे लिए तो दिल दहलाने वाला है। मैं बांद्रा 55 सेक्टर के ‘आनंद निकेतन’ से जुड़ी हुई हूँ। मानसिक रूप से भी और शारीरिक रूप से भी। अच्छे-अच्छे घरों की माताओं को इस रुप में देखती हूँ कि उनके खुद के बनाए घरों में ही कोई ठौर ठिकाना नहीं है। यह सब देखकर इतना दुख हुआ कि यह सब हो क्या रहा है समाज में ? ‘गिल्ली गुड्डू’ और ‘गेंद’ उसे दुख और चोट की प्रेरणा से लिखा गया है। और मैं यह मानती हूँ भारत अपने कोटम्भी जीवन की वजह से, सौहार्द्र की वजह से जाना जाता है। उसकी जो पहचान है वह खंडित होगी , जो हो रहा है या जो होता चला जा रहा है तो वह कहीं ना कहीं भारतीय संस्कृतिक , सभ्यता यह सारी पहचान खो देगी। यानी भारतीय संस्कृति अपनी पहचान खो देगी।
प्रश्न –4 थर्ड जेंडर जैसे लगभग अछूते विषय पर आपने नाला सोपारा को विषय वस्तु क्यों चुना ?
उत्तर – इस विषय ने मुझे बहुत गहरे रूप में उद्वेलित किया। मैं एक सोशल एक्टिविस्ट होने का दम ओढ़े हुए कभी इन लोगों को अपनी ओर आते हुए पाया तो मैं खेद से भर जाती थी। कहाँ से चले आते हैं यह मांगने के लिए, हमारे पास पैसे है या नहीं इनकी इसकी कोई परवाह नहीं और ढीठ की तरह हमारे पास खड़े रहते हैं ताली बजाते हैं। जिस दिन मेरी नरोत्तम से मुलाकात ट्रेन यात्रा के दौरान 1999 में हुई जब मैं दिल्ली से मुंबई जा रही थी। इससे मिलने के बाद मैंने अपने आप को कटघरे में खड़ा पाया क्यों हमने, हमारे समाज ,धर्म ,बिरदरी ने इनके साथ ज्यादती की है? क्यों मनुष्य ने अपने लिंग से विकलांग बच्चे को घर से निकाल देता है। जब नरोतम से भेट के बाद मैंने इन चीजों पे गौर किया तो लगा समाज सेवा का आडंबर ओढ़े हुए मैं इतनी क्रूर हूँ। समाज के उपेक्षित लोगो मे स्त्री को भी घर आंगन मिला हुआ था, दलितों को भी समाज में रहने की इजाजत मिली हुई थी लेकिन लिंग विकलांग के लिए समाज मे मुट्ठी भर जगह नहीं थी उस समाज के उपेक्षित हीस्से के रूप में। हाशिये के लोगो को भले ही मरैया नसीब हुआ हो लेकिन अपना घर तो था। इन किन्नरो का तो अपना घर है ही नहीं समाज ने इन्हे अपने घर से बाहर फेंकने के लिए विवश किया और खासकर धर्म ने ही समाज को प्रेरित किया कि ऐसे यौन विकलांग बच्चे तुम्हारे घर में होने का मतलब अमंगल , कलंक। इनकी घर में कोई उपयोगिता नहीं है न घर में न समाज में। धर्म , समाज , राजनीति और मनुष्य इन 4 चीजों ने मिलकर इन बच्चों के साथ जो सदियों से घोर अमानवीय व्यवहार किया वह अछम्य है। और हमारे तथाकथित जागरूक समाज ने कभी यह सोचने की कोशिश नहीं की अब भी हम उनसे ऐसे ही घृणा करते हैं जैसे सदियों पहले सब का मानसिक आंदोलन बना था कि इन्हें बाहर करो तो इस अक्षम्य अपराध के लिए दोषी कौन है? हम मनुष्य हैं।
मैंने सोचा इग्नू में मैं उसका दाखिला करवा दूँ जो बनना चाहता है वह बने, लेकिन जब एडमिशन के लिए फॉर्म भरने गया वहां जेंडर में सिर्फ मेल और फीमेल थे थर्ड जेंडर नहीं। यह कितना बड़ा अपमान है। इनके धड़ के ऊपर मस्तिष्क भी है और वह उतना ही उर्वरा है जितना कि किसी सामान्य व्यक्ति का। सिर्फ निचले हीस्से की विकलांगता ने इन्हें कहीं का नहीं छोड़ा। इन्हे सामाज से वंचित कर दिया गया। यही एक कारण रहा कि ‘नरोत्तम’ से जब मेरी मुलाकात हुई और उसने बताया कि वह बोरीवली उतरेगा और ‘नालासोपारा’ लोकल ट्रेन पकड़ कर जाएगा और रात भर से स्टेशन पर गुजारेगा। सुबह उसकी मां उससे मिलने स्टेशन पर आएगी। मैंने पूछा क्यों तुम्हारा घर नहीं है? उसने कहा मेरा घर तो है लेकिन मेरे घर में अब मैं नहीं हूँ। मुझे घर की सदस्यता से खारिज कर दिया गया। अब मेरा कोई हक नहीं है। ट्रेन दौड़ती रही और मैं उसके साथ उसकी जिंदगी के पृष्ठों को पढ़ती रही। मैं उसे अपनी बेटी की सीट पर सोने के लिए दे दी वह तो सो गया पर मैं बची कुची रात में भी पलकें नहीं झपका सकी। मैं अपने ऊपर धिक्कार करती रही कि मैंने इससे घृणा कैसे की? मैं आडंबर में जीती हूँ कि मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता हूँ मैं जागृत कैसे हो सकती हूँ जब हमारे ही बिरादरी का एक बच्चा ऐसी हजारों बच्चे कई सालों से इस पीड़ा के दंश को सड़को पर भीख मांगते झेल रहे है।
यह मेरी धिक्कार की संतान एक लेखक का पश्चाताप है समाज में माफी मांगने का उपक्रम है ‘पोस्ट बॉक्स नंबर 203 नालासोपारा’ उपन्यास।
प्रश्न- 5 आप की कथा कीर्ति विभिन्न तरह के चरित्र मिलते हैं,ये पात्र आपको कहाँ से मिले ?
उतर – मैं समाज के कई तरह के लोगों के साथ रहती हूँ। ए॰सी कार में बैठकर नहीं बल्कि उनके साथ चॉल में रहकर सामाजिक कार्य करती हूँ तो कई तरह के पात्र, कई तरीके की समस्याएं दिखती हैं। वंचित समाजो का मेरे कथानक में उनकी उपस्थिति स्वभाविक है क्योंकि मुझे लगता है हम उन वंचितों को उनके अधिकारों से वंचित करने के लिए हम जिम्मेदार हैं तो यह एक सोशल एक्टिविटीज के जरिए मेरे अनुभवों का दायरा विस्तार पाता है। ऐसा नहीं है कि मैंने संपन्न वर्ग के लिए नहीं लिखा मैं जिस खानदान से हूँ मैं उसकी रईसी से और दुर्गुणों से भी वाकिफ हूँ।
प्रश्न –6 स्त्री विमर्श को आप किस दृष्टि से देखते हैं?
उतर – स्त्री विमर्श बहुत जरूरी है क्योंकि हाशिये के भीतर दबी हुयी औरतों को बाहर निकालना उसकी बुनियादी मानवीय अधिकारों को उसे वापस सोपना जरूरी था लेकिन यह भी उसके साथ बहुत जरूरी है कि स्त्री विमर्श का एक संतुलित समाज विमर्श के रूप में भी देखा जाना चाहीए। कहीं ना कहीं वह संतुलन विवेकपूर्ण न होकर पटरी से उतरता है तो समाज का संतुलन बिगड़ता है।
प्रश्न – 7 आपका सबसे पसंदीदा पात्र?
उतर – अभी तो सिर्फ और सिर्फ ‘बिन्नी’ उर्फ ‘नरोत्तम’ है।
Agrawal Mahila Teacher’s Training College, Gangapur city
Distt.- Sawai Madhopur (Rajasthan) 322201
Mail: dineshg.gupta397@gmail.com
Mobile: 9462607259
Abstract
ICT is a big buzz word for its use in education. A lot of emphases is on the integration of ICT technologies in the teaching-learning process. Consequently, the teaching learning process is shifting from chalk and talk to online mode. The pandemic COVID-19 exponentially accelerated this process in education. But this also created a lot of hitches in front of the stake holders, the paper presents a wide-ranging overview of the use of ICT in the teaching-learning process. It also discusses abundant digital tools which can be used to make teaching learning more effective.
Introduction- The exponential development of technology and easier access to information has brought tremendous changes in the social, political, economic and educational fields. This change further accelerated due to the Covid-19 pandemic. The pandemic brought the whole world to instil, including education. That’s why the use of digital technology in education has already gained acceptance. The need is to educate the teachers, students, parents and school administrations to manage the new technologies, become able to solve the problem with the help of technologies and make a decision. This has tipped the balance between skills and knowledge slightly more in the direction of skills, particularly problem solving and thinking skills. The teachers, researchers and experts in the field of education are continuously putting their effort to raise the standard of the student’s achievements in their learning process by examining how students learn effectively. To deal with the sudden transition from face-to-face teaching mode to online teaching mode, the institutions have developed some alternative plans, under the guidance of various agencies like the ministry of health, MHRD and UGC, etc. The UGC has issued guidance to conduct online classes smoothly in which UGC suggested reducing the curriculum, flexible timing of online classes, alternative ways of assessment and evaluation. The teacher education institution also shifted to online mode. At an earlier stage, most of the teachers were not prepared to deal with such a situation because they were not skilled enough to use online platforms for the teaching-learning process (TLP). Universities organized several workshops, short-term courses and webinars to train the teachers to harness the opportunities in this diverse situation. These initiatives play a significant role in enabling teachers to utilize online resources fruitfully. As we know the Covid-19 pandemic pushed the teachers to the limit in every aspect of life but the leverage of technology, especially digital technology, provides learning continuity when the students cannot be present in the classroom (Anna Dabrowaski, 2020). However, there are several barriers to the success of the online TLP ranging from teachers’ and students’ preparedness, easy access to the online resources and devices and student support at home.
ICT Resources- ICT is a diverse set of technological tools and resources used to communicate and to create, disseminate, store and manage information”. According to National Policy on ICT in School Education (2012) “ICTs are defined as all devices, tools, content, resources, forums, and services, digital and those that can be converted, into or delivered through digital forms, which can be deployed for realizing he goals of teaching-learning, enhancing access to and reach of resources, the building of capacities, as well as management of the educational system. ICT tools can be employed to improve the learners’ ability of understanding. GarcíaValcárcel (2014) goes so far as to say that the ICT becomes the channel for communication and information that is essential for guaranteeing learning environments that are open, interactive, replete with incentives, sources of information, motivating for students, and focused on developing skills. The use of ICT as a resource of TLP has the following functions:
1. It promotes, arouses and maintains the learner’s interest.
2. It enables the learner to organize information, create new knowledge, link the knowledge and apply it to new situations.
3. Provide an environment for learners to create and express ideas.
4. It guides the learners’ learning.
5. It provides the opportunity for learners to assess knowledge and skills.
6. It provides an environment for observation, exploration and experiments with simulation, animation and videos.
ICT aids are employed in the teaching and learning process, it involves most of the sensory organs of students and also makes learning more real to students (Abdulai & Akaglo,2020). In Edgar Dale cone of experiences, the cone shows the progression of learning experiences from concrete to abstract rather than as a prescription for instruction with media (Lee & Reeves,2007). Edgar Dale introduced the modern media in education, postulated the “Cone of Experience”. The arrangement of Dale’s cone of experiences is not based on difficulty level but abstraction and also several senses involved in learning. The cone of experiences can be categorized into 11 stages starting from concrete experiences at the bottom of the cone and becoming more and more abstract as we move upward to the peak of the cone. Thus, the moving from verbal symbol (Peak of the Cone) to direct and purpose experiences, the degree of abstraction gradually decreases and learners become more participative Edgar Dale’s cone experience recommends more learning from reality, simulation and various types of active and experiential learning (Lee & Reeves,2007; Abdulai & Akaglo,2020). The ICT resources use multiple senses in the formation of experiences. The selection of these resources or tools is responsible for bringing a change in the classroom environment. The availability of a wide range of such teaching-learning material will catalyze the transformation of classrooms into ICT-enabled classrooms. Therefore, the teacher must be competent enough to select and critically evaluate digital content and resources. Initially, the teachers may start with the computer lab, later on, more classrooms can be equipped with appropriate ICT resources making way for ICT-enabled classrooms. ICT Resources for the TLP The development of digital technology provides an abundance of ICT resources and tools to enhance the teachinglearning environment. Various ICT resources can be analyzed based on their use in the TLP. The ICT can be categorised as:
• Informative resources
• Collaborative resources
• Learning resources
• Resources for assessment and evaluation
• Resources for professional development
ICT as an Information Resource- The use of ICT has become increasingly important in academics and most of the academic activities are switching over to ICT-based resources and services. It has opened new avenues like online learning, e-education, e-journal, CDROM Database, e-books, web-based resources, etc. (Singh, Krishna & Jaiswal, 2014). The major resources of learning before the invention of digital resources were libraries only. The development of ICT-based technologies forced most libraries, not only in India but all over the world to go online and become a rich source of information. The National Digital Library of India (NDLI) is a huge resource of digitally available learning resources written by millions of authors across various subjects in different languages. The National Repository of Open Educational Resources (NROER) is another huge resource of learning materials for school and teacher education. Similarly, DIKSHA (Digital Infrastructure for Knowledge Sharing) also considered as One Nation One digital Platform is a storehouse of educational resources which is available as a portal and app as well for easy access to all. This highly developed digital environment provided a scenario to teachers and learners with ample flexibility and an abundance of learning content and direct access to it. The internet enables the teachers as well as learners to find out additional information to address a topic from basic to advanced levels. For example, if you search ‘teaching and learning’ on Google, you will get billions of pages in less than one second. Thus, the internet becomes a huge resource of information. Online databases are also some other ICT resources that provide information.
ICT as collaborative resources- The learning environment depends on engagement among stakeholders. No engagement means no attention, no attention leads to no effective instruction, no effective instructions lead to no sufficient development regardless of whether the technology is used or not. The learning environment can be enhanced by the collaborative learning process. The collaborative learning approach involves teamwork and is based on the constructivist theory of learning. The constructivist theory of learning refers to the learners constructing their knowledge upon the foundation of their previous learning. This type of learning has many academic, psychological and social benefits. Collaborative learning is a way of constructivist learning and it encourages students to see situations from different perspectives, creates an environment where they can practice social and leadership skills (social benefits) and provides a satisfactory learning experience that significantly reduces anxiety (psychological benefits) (García-Valcárcel, 2014). Collaborative learning works very efficiently with ICT; it places the learners in the process of generation, managing and sharing of information by interaction with each other in a virtual community driven by ICT resources. Thus, collaboration is the cornerstone for the success of technology-enhanced learning in the classroom. At this time, most of the learners use the internet through their smart mobile. Therefore, most of the social networking sites, the forum moved to inform of the app. Face book, Whats App, Google classroom, Edmodo, YouTube, email, blogs, wikis are some of the examples of collaborative tools in the TLP. The Edmodo and Google classrooms are very easy to use among all collaborative resources.
ICT as a learning resource- ICT learning resources offer the possibility of acquiring knowledge, attitude and procedure during the TLP (Gonzalez, 2011). ICT can supplement learning activities by using several ways, such as digital educational resources, interactive tutorials, simulation, eBooks and open knowledge reinforcement exercises. ICT-based learning resources provide a lot of teaching-learning materials created by teachers, educators, experts, researchers and learners. Interactive tutorials provide enriched learning materials with pictures, animations, simulations and videos. The most interactive resource for learning can be simulation. The simulation is a type of modelling that provides an opportunity for the learner to engage in the construction of knowledge and experiences by experimenting with the model. Thus, the simulation provides a constructivist environment in which the learner learns the thing by “learning by doing approach”. Just as children do simulation activities by role-playing, adults use computer simulations to understand complex systems, real situations or dynamic processes. The simulation model is very useful for science subjects. The virtual laboratory allows the learners to perform experiments from anywhere at any time without using the actual laboratory (Bajpai, 2013). The educational electronic books (eBooks), audios and videos, podcasts are other digital resources that enable learners to enhance and create their knowledge (Gonzalez, 2011). There are various e-resources where anyone can find a large number of e-books, videos and audios on different educational subjects. E Pathshala, a digital initiative of NCERT provides a large number of eBooks, videos, audios and other educational resources for students, teachers, parents and researchers.
ICT as resources for assessment- The term ‘assessment’ in education means the procedure that is used to collect information about the knowledge, attitude and skills of a learner. Based on the assessment, the teacher judges the student and gives feedback on their progress, strength and weakness. Thus, the assessment plays a vital role in the educational process. The rapid development of ICT in education enables the teachers to use different technologies and their applications to assess the students’ progress. ICT-based assessments can be various types i.e. computer or laptopbased and mobile device-based. With the help of ICT, a teacher can assess the students’ performance in different formats i.e. text, image, audio, video and simulation-based.
• Computer-Assisted Assessment or Computer-Aided Assessment (CAA);
• Computer-Based Assessment (CBA)
Computer-assisted Assessment- Computer-assisted assessment refers to the use of a computer to facilitate, manage and support the assessment and evaluation of the learners’ progress. A teacher can use CAA at any stage of the TLP. CAA is mostly used for scoring multiple-choice questions and questions with short-answer responses using an optical mark reader (OMR). The CAA can be used to identify the learners’ difficulty in the subject of trends and patterns within the learners’ group. It can be also used diagnostically to identify students who would benefit from extra direction or support.
Computer-based assessment- Computer-based assessment (CBA) is generally done by the computer. It is used mostly in digital tools for assessment-related activities. It can be used for summative, formative or diagnostic purposes. This type of assessment includes multiple-type questions (MCQ), other objective type questions, essays and short answer questions. This type of assessment can be used from anyplace and anywhere with laptops, tablets and smart phones. This type of assessment is an integral part of e-learning teaching and training. For example, the assessment tools of google classroom are computer-based assessments. The concept mapping tools are also part of it.
ICT as a Resource for Professional Development- The professional development of the teachers is another important factor that can influence the teachinglearning environment in the classroom. Professional development means the acquisition of skills for personal and career development. There are various courses such as in-service and pre-service courses, designed for the professional development of the teachers. Ahmad & Chopra (2015) emphasized that the teachers have to be fully equipped to integrate ICT in their pedagogy. For this, they need extensive training on how to use ICT in their TLP. The pandemic COVID-19 also established the fact that teachers need a Continuous Professional Development program on ICT integration in TLP. The enhancement of ICT especially, MOOCs provided the opportunity to design and develop tailor-made courses for career advancement. Different institutions and organizations developed and are developing a large number of courses according to the needs of the learners. There are various platforms that provide these courses either free of cost or on nominal fees such as Coursera, edX, Udacity, Ivercity, NovoEd, Udemy, SWAYAM, etc. The SWAYAM is developed by the Government of India, which provides a platform of learning for various courses of school education, graduation, postgraduation, professional education of different streams. Besides this, the teachers can also use BLOGS, social sites, social bookmarking, podcasts and YouTube to share ideas, opinions and understanding of any topic.
Final discussion- The COVID-19 shifted the whole education system online. This sudden shift created a lot of problems in front of the stakeholders of education i.e. teachers, students, parents and school administration. Where it created a lot of problems, it also provided the solution to various problems. Due to this online education, the TLP has been continuously moved on. But the use of technology in education gives us some lessons also, such as;
• No technology is a panacea for education- Most current, capable digital technology resources do not offer quick easy or universal solutions for educational problems. The digital technologies, materials and strategies are usually tools in a larger system and must be integrated carefully with other resources and with teaching activities. The pandemic COVID-19 forced stakeholders of the education system to shift to digital technologies for continuing education. But the overuse of digital technologies can create more problems than the solution provided by it in education. Judicious and realistic planning is necessary to harness the potential of digital technologies in education (Roblayer, 2011).
• Teachers usually do not develop the teaching materials and curriculum- Teaching is one of the most time and labour-intensive jobs in society. Generally, the teachers do not develop software or create complex technology-based teaching materials. Most of the time the companies, personnel in funded projects at different levels develop the learning materials. This is one of the most crucial issues in the field of digital education. Because those developers develop the learning materials by generalized needs. Therefore, these learning materials fail to cater to the local needs. Unless teachers are not involved in the field of material development, the local needs will always be left out.
• Technically possible but not equally desirable and feasible- A popular saying is that today’s technology is yesterday’s science fiction. But science fiction also shows us that technology brings undesirable as well as desirable changes. For example, ICT has allowed attending professional conferences online, rather than travelling to another location, but it is also correct that people continue to want to travel and meet face to face (Roblayer, 2011). Human cloning is technologically possible but not acceptable in society. Technology demands us to become a critical consumer of its power and capability and also decide which science fiction can become reality.
• Things change faster than teachers can keep up- The resources and methodologies of teaching are changing continuously. Technological development further accelerated this change. Gone were those days-if, indeed, they ever existed, when a teacher could rely on the same handouts, homework, or lecture notes from year to year. It is very difficult to predict the new technological development in the field of education but it would be different from the present. That’s why, the teachers must anticipate and accept the inevitability of change and the need for continual investment of their time (Roblayer, 2011).
Conclusion- The development of ICT technologies changes the teaching-learning environment. The teaching-learning process is now moving from traditional chalk and talks to an ICT-enabled environment. The real change in classroom teaching will be visible when the teachers will be able to integrate the ICT in every spare part of the TLP, whether it is an objective formulation, contents selection and methodology of teaching or evaluation in the classroom. A good education depends upon the good teacher, in the same way, the effective integration of ICT in the TLP depends upon the teachers with good ICT skills. There are various ICT resources especially, MOOCs which provide tailor-made courses for teachers’ professional development. Besides this, Blogs, digital bookmarking, simulation tools, podcasts, YouTube, etc. provide the opportunity for the teachers to develop their professional skills related to a different field. Thus, the teachers need to keep themselves upgraded with new ways of teaching. Today is the age of videos and podcasts and children can easily learn through this interactive media and hence teachers of the current era need to keep up with the current technology (Rani & Surana, 2015). A good teacher needs to explore themselves and try innovative educational measures to teach children.
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AI-integrated Education and Teaching Effectiveness
Dr. Dinesh Kumar Gupta
Assistant Professor
Agrawal Mahila Teacher’s Training College, Gangapur city (Raj.)
Mail: dineshg.gupta397@gmail.com
Mobile: 9462607259
Abstract:
The 21st century has been regarded as the era of information and technologies and also proving it very much through the advent of Artificial Intelligence (AI). As a technological tool AI has changed the faces of society and markets a lot. Siri, Alexa, chatbots and so on, the promising tools of AI, are being used in deducting the customers’ preferences in making choices in on line shopping based on their past actions and experiences. Queries support system of banks, airlines, telecom companies and so on are being handled by AI enabled system too. Similarly, education sector has also become one of the subject matters of AI. It is a computer programme also known as machine learning system that can think, act, recognise the faces, deduct the objects and images, and follow the instructions as a human being can do. Many of the scientists are opined that AI is the future of education system and days are not far away when the entire educational activities including teaching-learning process may fall dependent on AI driven education system. Considering the potential applications and effectiveness of AI in education system, present article posits to explain the meaning, concepts, potential applications, effectiveness and challenges of AI with respect to Indian education system. Like any technology, AI also has some pros and cons in regard to its applications. AI driven education system may have some negative impacts like deterioration of values, threat to human civilisation, potential health risk of learners and staff, reduction in employment opportunities for traditional teachers, complete dependency on technology, learning gap, issues of data management and cyber securities and so on.
The future of Indian education system is seem to be technology oriented as it got serious consideration in the NEP-2020. Considering the key factors associated with success of education system of developed countries, policy makers have arrived at the conclusion that educations system must be transformed and restructured to make the people ready to receive Artificial Intelligence (AI) that has the capacity to transform the entire education system and can lead it to the path of improvement as needed. Acknowledging the fact, AI has been given due emphasis over the traditional means of technologies used in education system. Along with AI, Code Language and 3-D Graphics are also given place in NEP-2020 (Ministry of Education, 2020) so that in future, foundations of education can be visualised as technology oriented. Technology enabled education system is considered to have potential to make shift the entire education system as per the need of hours. Like the MOOCs, a recent online, prerecorded education programme has made significant impact on the education system particularly in on going covid-19 pandemic when the teachers and students are restricted to attend the offline academic programmes, AI may also play vital role in catering the needs of millions of students of different realm of education system if the education system is ready to involve or make use of AI in educational functions including the teaching and learning process. AI has been recognised globally as a promising and potential effective educational tool to be used for different purposes in the field of education.
Artificial Intelligence (AI): Meaning and Concept
The history of Artificial Intelligence (AI) can be traced from 1950 when Allen Turing, recognised as the father of AI, developed a ‘Turing Machine’ which was enabled with like a computer programme that shows human like intelligence. But, the term AI coined by John McCarthy in 1956 who has defined AI as “the science and engineering of making intelligent machine.” Further, he defined it as “the study (of artificial intelligence) is to proceed on the basis of the conjecture that every aspect of learning or any other feature of intelligence can be in principle be so precisely described that a machine can be made to simulate it” (in Russel & Norvig, 2010). Artificial Intelligence (AI) is a machine which is considered to have the ability to perform assignments and resolve the certain issues and problems as a human being does. It may also be explicated as a system of computer programme which can do tasks which generally required human intelligence like resolving complicated problems, making choices and decisions, objects deduction, images and faces recognition and so on. (Zulekha, 2019). In general, it is an electro mechanical process of a machine that thinks, understands the languages, solves the problems, perceives and anticipates the environment, adapts the situations, anticipates the actions and so on. Adaptability, learning and anticipatory actions are considered as the key characteristics of AI (Ilkka, 2018, p.7).
Stages, Types and Domains of Artificial Intelligence (AI)
Following are the Stages, Types and Domain of Artificial Intelligence as categorised and explained by Zulekha (2019).
Stages of Artificial Intelligence (AI)
Following are the three stages of AI.
Artificial Narrow Intelligence (ANI): It is also called as weak AI. It is the stage where AI includes machines that can do only specifically defined set of tasks. At this juncture, machines can carry out only those tasks which are predefined as it do not have thinking abilities. For examples-Siri, Alexa, Sophia, Alfa Go, the self-driving cars and so on.
Artificial General Intelligence (AGI): It is also recognised as strong Artificial Intelligence (AI) and is considered as the advancement of AI where machines will have the thinking abilities and will able to make decisions as human beings do in general. But at present, we do not have such machines and it is being anticipated that scientists must come up with the machines which will be as smart as human beings. Whereas, many scientists has opined that the AI is considered as the menace to human civilization. Moreover, Stephen Hawking pointed out that the “development of full Artificial Intelligence could spell the end of human race.”
Artificial Super Intelligence (ASI): By this stage of AI, computers’ abilities will outshine the human beings’. Though, it is considered as the assumed or hypothetical stage showed in scientific movies and science fiction books where things are shown that how the machines will take over the world in future.
Types of Artificial Intelligence (AI)
Based on the functions, AI can be categorised into four types.
1. Reactive Machine Artificial Intelligence (RMAI): Such kinds of machines work only on present data by considering the present situations. RMAI cannot decipher inferences from the data in connection to evaluations of their futures course of actions.
2. Limited Memory Artificial Intelligence (LMRI): As the name advocates, it has limited memory and can have refined, informed and improved decisions from the memory of its past data. This kind of AI has the memory useful to store past experiences and for the evaluation of future course of actions.
3. Theory of Mind Artificial Intelligence (TMAI): It is regarded as the advanced kind of AI, and is predicted to have vital role in human psychology. The theory of Mind Artificial Intelligence puts emphasis on emotional intelligence for having better understanding about the pattern of human thoughts and believed. However, such kind of AI is not found fully developed yet but in this perspective many researches are going on round the clock. .
4. Self-aware Artificial Intelligence (SAAI): It comprises the machines which may have the power of their own developed consciousness that may lead to become self-aware. Like the theory of Mind Artificial Intelligence, it is also not developed yet. In this regard, Elon Musk (n.d.) has warned that “AI is a fundamental risk to the existence of human civilization.”
Domains of Artificial Intelligence
Following are the different domains Artificial Intelligence (AI).
Machine Learning: It is a science that gets involve the machines in order to solve the problems by processing, analysing and interpreting the data. Machine learning can supervise the unsupervised and reinforcement learning.
Deep Learning: It is also called as neuron network. The deep learning is concerned with executing neuron networks on high demands data to deal with insights and formulate solutions. The logics behind it are the face verification algorithm on Facebook and self driving cars that said to have assistants like Siri and Alexa.
Robotics: It emphasises on the applications of robots. AI robots are like the artificial agent which works in real world situations for producing results by taking into account the some actions. Sophia is named as the good example of the AI in robotics.
Expert Systems: It is a domain of AI in which computer system learns as well as reciprocates with the ability of decision making of a human expert. It can use its logic notions in resolving the complex problems. Expert System domain of AI does not depend on the conventional programming system rather on more advanced programme. It is used in information management there seen to use in fraud deduction, virus deduction and also in managing medical and hospital records and so on.
Fuzzy Logic: It is a computing based approach where it works on the principle of degree of truth. Fuzzy Logic is the Boolean Logic. It has the utility in medical field in terms of resolving complex problems including decision making issues. Moreover, it is also useful in performing the task of automating the gas system in cars.
Natural Language Processing (NLP): It is a system of processing the natural language which is called as the science of drawing insights from the natural language of human being. NLP is used in order to communicate with machines and online businesses, and the examples of NLP are Twitter and Amazon. Twitter uses NLP to analyse the fake news and abusive languages, and to filter out the terroristic languages from the tweets whereas Amazon uses NLP to understand and analyse the customers’ feedbacks and improves the users experience as well.
Indian Education System and Artificial intelligence (AI)
The Indian education system particularly in regard to AI has been devoid of reflecting any intention to accommodate and adapt AI till the New Education Policy (NEP-2020) got cabinet nod for implementing at nationwide in July 2020. Academic discourses within the institutional boundaries are negligible except few that too in the discipline of computer science, engineering and management studies. We would say that AI in the common or general education system is at infancy stage where it has just started scrolling slowly as the Ministry of Education has put promising emphasis on introducing the Machine Language, AI and 3-D graphics in the education system of India so that the Indian education system can be at par to the global education system in which education is being imparted through AI of much advance level from years before. However, Central Board of Secondary Education (CBSE), New Delhi, India has decided to incorporate the AI in its school curriculum.
As per an article only 15 % teacher of government schools are trained in handling the computer. Whereas, only 3 % of the government and private school teachers of the states like Bihar, Madhya Pradesh and Mizoram were reported trained in computer as compared to the states like Goa, Punjab and Maharashtra where more than 50% school teachers including government and private were found trained in the same (Sen, Nihalani & Radhakrishnan, n.d.). As per the report of Ministry of Education-UDISE (2019-20) that only one forth teachers in India were reported trained to deal with the technology oriented teaching learning process where as 83.43% of the total schools of all management (government, government aided & private) had electricity supply, however only 80.16% schools were reported to have functional electricity connection. While, only 22.28% of all management schools in India had internet facility. Moreover, only 38.54% schools of all management of which only 30.03% of government, 62.97% government aided and 59.88% of private schools had computer facility. Similarly only 37.13% of the all management schools in India of which only 28.55% of the government, 61.84% of government aided and 58.48% of the private schools were found to have functional computer facility.
In spite of National Policy on ICT in school education (2012) through which ICT enabled teaching leaning process and enhancement of ICT literacy and competency was given top priority, the reality of facts and figures mentioned in UDISE-2019-20, realising the conceptualisation of AI in general education system of Indian including schools and universities is not like a bed of roses rather hard nut to crack as even in 21st century the significant proportion of teachers are untrained in technologies, limited schools have functional electricity supply, internet connections and computer facilities which have been recognised as inevitable to go with the potential, effective and promising uses of AI in the different realms of education system. In this connection, a revolutionary and insightful efforts like National Literacy Mission (1988) and Operation Blackboard (1987) is needed to launch at nationwide to revamp and establish the essential infrastructures required for AI, it would be better to have a National Policy on AI including Code Language and 3-D graphics in school and university education similar to the National Policy on ICT (2012).
Artificial Intelligence: Promising Applications and Potential Effectiveness
AI has become globally recognised as a techno potential tool which could fetch effectiveness in educational functions and practices if uses properly and effectively. Having been establishment of its effectiveness by many scientists of the world, it has also been regarded as the threat to human life as well. However, business houses and educational field has the vast scope of its promising applications and potential effectiveness, but the range of potential effectiveness is determined by the intentions and objectives of its uses.
Decades ago futurists, science fictions, scientific movies and many more scientists were insinuating and predicting about the cataclysmic and catastrophic changes may happen in the life of people and in society too with the advent of fast changing face of AI and its applications. Widespread of AI in the 21st century has been creating the avenue of its effective, reliable, potential and promising uses particularly in auto driven cars, business houses like Amazon & Flipkart. Moreover, queries support system of airlines, banks, food delivery apps and other virtual sopping platforms are using AI driven chatbots (Makkar, 2019). Similarly, education is also one of the sectors where AI can make effective and potential changes.
In connection to potential effectiveness, promising applications of AI in educational functions and practices are explained as follows.
Personalised Learning Opportunity: AI Driven teaching learning process could come with more suited teaching techniques and strategies and could adapt to the students’ learning pace and behaviour easily. In AI enabled personalised learning, students will gets learning experiences as per their needs; those comfortable with audio and video materials will has that, students comfortable with text materials will get that and so on.
Delivery of Quality Content: Preparation and delivery of smart contents is the key matter of pedagogical aspects. AI assisted and driven system can create and deliver the quality content in the forms of audio and video and also by turning the traditional text books into digital one. New learning interface can be created that can be helpful to the students of all levels and grades. Cram101 and Netex is helpful to teachers and enable them in developing e curriculum, AI devices driven more comprehensive syllabus with much illustrated audios and videos (Agarawal,2020).
Equality and Equity in Learning Opportunity: If we keep all the constraints neutral, AI enabled education system is considered as a tool to ensure equity in access to education for everyone. Millions of learners are either studying or trying to enrol in schools, colleges and universities deserve to access good education. AI enabled education system can ensure more equalise and equity learning opportunities to the learners as the personalised e-curriculum, tutorial programme, skill based learning applications are being developed at global level wherein AI driven system will bring classrooms at fingertips and can empower the learners to access the education as per their needs and abilities and may also get upgrade themselves with the trends of global education.
Interactive Teaching-Learning: AI enabled education system is consider to be more interactive as it provides individualised opportunities of interaction. Algorithms, a machine learning and AI driven programme can follow the instructions of learners as many times as can be. This enables the learners to have queries, clear doubts, understand the concepts, revisit and customise the contents without much effort.
Remote Learning: Remote learning is one of the subjects of AI driven system of education. AI can make possible to everyone who wishes to attend classes from home or remote as it can stream the e-content in the forms of audio and audio-visuals on instructions. AI can be a boon to millions of rural learners who may be unable to attend the institutions but can access the AI driven electro-mechanised education system at their fingertips.
Curriculum Up gradation: AI enabled education system can have predictions about the worthiness and compatibility of curriculum with the students. It can evaluate and suggest the methods, skills and strategies of teaching; contents, activities, examinations patter and system suited to the different students. It can enable the education system to have regular up gradation of curriculum as per the need, interest and compatibility of the students by providing feedback and future predictions.
Dropouts Management: Drop outs are caused by various reasons. It is quite tough to analyse ever reason causing to potential drop outs but it is predicted that AI driven system can identify the list of potential drop outs. However, government of Andhra Pradesh, along with Microsoft AI, has successfully piloted a project of identifying and managing drop outs in Vishakhapatanam (Bhaduri, 2020). AI enabled device can make predictions through actions recognition, performance and reasons analysis of the students’ performance, actions and potential causes lead to dropping outs them from the schools.
Assessment and Grading: AI can do assessment and grading concurrently that teachers required days to do. AI driven system can do it by making audio and video streaming, recognise the images and faces as the human can do during the proctored assessment while writing examinations. So it can recognise and understand the actions of examinees, read the answer script and do the grading with accuracy as per the performance and merits of the students. Moreover, AI enabled tool may also reduce the marathon exercises of conducting home and competitive examinations as it can do all exercises through image, face, actions and instructions recognition abilities.
Research Activities: It is predicted that AI may also helpful in research activities through text, script, image, face and voice recognition ability. Finding related studies, selection of research design with reasons, coding, weeding out data, analysis, interpretations and so on may be possible in future if AI enable technologies become common in use.
Assistant to Differently abled Learners: AI driven teaching learning process could meet out the needs of differently abled learners as it can map the each and every learner’s needs and capacity by their faces, images and voice recognition that help AI to help them out individually in all teaching and learning matters. It could also be succeed in establishing inclusive learning environment and could come up with the best teaching methods and learning materials suited to them than a normal teacher could fail in doing so. Moreover, it can make huge difference by doing swat analysis of such students and can understand their learning gap as well and adjust to their pace and style of learning accordingly.
Remote Proctoring: AI enabled teaching learning process, examinations and other activities of leaners could be monitored from the remote by AI through face, voice, and actions recognition abilities it has. As with the help of algorithms, AI receives as well understands human instructions and actions, and transmits the same to the required ends.
Resources and Events Management: AI may be helpful in optimising the use of institutions’ resources. It may locate where the files or records are kept and also furnish the record whatever and whenever needed. In Events management, AI enabled robot or algorithms may reduce the manual exercises as it could do the works of many staff required at different points and time through face and actions recognition; object deduction, and by following the instructions as human being could.
Feed Back: By the virtue of unique ability of face, script, image recognition and deduction, and by following the instructions including human actions AI can give the immediate feedback as it keeps on working on the students’ performance trends individually while carrying out the teaching learning process or other activities. Immediate feedback to the students and as well other concerned on students current and future academic performance can be possible in AI enabled teaching learning process.
Training and Skills Development: Studies predict that training and skill development programmes for the teachers and others staff can be possible efficiently by using AI. As the AI enabled computer programme may read the instructions, recognise the faces and images of participants as the human being does. Instilling the skill into the teachers is possible by devising the AI enabled training programme. Need based one to one training shall also be possible. Moreover, AI can follow the instructions (voice or actions) and reciprocate accordingly. Apart from the points explained, an AI enabled education system can ease the administrative tasks, protect the data, ensure cyber security, ensure accuracy and accessibility, and also assist the teachers and intuitions in many aspects.
(i) Resistant from society and parents to accept the AI driven education system fully, (ii) Socio-religious taboos in adapting AI, (ii) Socio-economic back ground of learners, (iv) Government’s casual approach,(v) No dedicated policy on AI at national level, (vi) Schools’ inability to adapt the AI driven education system, (vi) Financial exchequer, (vii) Poor infrastructures at every ladder of education, (viii) Sustained functional electricity supply, (ix) Sustained functional internet connectivity, (x), AI trained staff, (xi) Awareness gap among the students, (xii), Public and Private; Urban and Rural gap among the students’ approach to AI, (xiii) Absence in emotional aspects, (xiv) No physical involvement of teachers, (xv) Possibility to deterioration of value system, ( xvi) Teachers’ place and respect at risk, (xvi) Sharp cut in employment opportunity for teachers and other staff, (xvii) Threat to cyber security, (xviii) Data management issues, (xix) Issues of correct programming of AI, (xx) equality and equity in access to AI enabled education system, (xxi) Potential threat to human civilisation and race, (xxii), Information and data based education than knowledge based, (xxiii) Staff and Students’ at potential health risk, (xxiv) Potential encouragement to materialistic society, (xxv) Arts and Humanities subject at the risk of fading away, (xxvi), Possibility of centralised control of entire education system, (xxvii) No chance of guidance and counselling, (xxviii) Over AI dependent education system and so on.
Conclusion
Artificial Intelligence is regarded as a system of machine learning or computer programme that can do what a human being can do. If any technology that has the capacity to cast catastrophic impact and bring change in the society of 21st century we would name to the Artificial Intelligence. AI has become one of the highly debate inviting issues among the scientists, educationists, policy makers and other stakeholders of education system. AI is considered to be the custodian of future education system at every level if it gets full coverage in implementation and application in the educational realms as it has the promising applications in education system with respect to teaching learning process, administrative tasks, managing resources and events, assessment and grading, equal opportunity in access to education, remote and proctored learning, curriculum up gradation, predictions about potential drop outs, inclusion oriented education system and so on. However, AI enabled education system is still in infancy stage. Socio religious taboos, students’ abilities, proper policy on AI, essential infrastructures, financial constraints and so on are the potential issues and challenges pertaining to AI enabled education system. Moreover, functional and sustained electricity connection, internet connectivity and trained staff in AI programming is inevitable to ripe the effective and desired results out of its potential uses in the education sector.
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स्वामी विवेकानंद के विचार और समकालीन भारतीय शिक्षा प्रणाली
डॉ. आशीष कुमार ‘दीपांकर’
सहायक आचार्य, हिन्दी (भाषा विभाग), स्वामी विवेकानन्द सुभारती विश्वविद्यालय, मेरठ, उत्तर प्रदेश
मोबाइल- 9795508915
ईमेल: ashishdipankar27@gmail.com
सारांश
प्रकृति का न्याय सदैव समान रूप से निर्मम और कठोर होता है। सर्वाधिक कुशल व्याक्ति जीवन को न तो भला कहेगा और न ही बुरा। प्रत्येक सफल मनुष्य के स्वभाव में कहीं विशाल सच्चरिता तो कहीं सत्यनिष्ठा छिपी रहती है। इसी कारण उसके जीवन में लगातार सफलता ही सफलता होती है। अर्थात यह भी कह सकते है कि जो व्यक्ति प्रेम और स्वतंत्रता से अभिभूत होकर अपने कार्य के प्रति ईमानदार होता है, सफलता उसके कदम चूमती है। आपने हमारे देश के लिए एक सपना ऐसा देखा था जहां सभी लोगों के विकास के लिए समान अवसर हो, समाज के सभी व्यक्तियों को समान ज्ञान और धन हो। जिससे सभी के लिए शिक्षा के समान अवसर प्राप्त हो सकें। इस समानता-अपमानता के बीच स्वामी विवेकानन्द का जन्म हुआ। विवेकानन्द ज्ञान और विचारों से ओत-प्रोत करने वाले युवाओं के प्रेरणास्रोत है। युवा पीढ़ी आज जो उच्च शिक्षा के पायदान पर क़दम रख रही है उन्हें भावी भारत का सही निर्माण करना है। इसके लिए उन्हें जरूरी है स्वामी विवेकानन्द के विचारों एवं साहित्यिक कृतियों से रु-ब-रू होना।
स्वामी विवेकानन्द का जन्म कलकत्ता महानगर में 12 जनवरी 1863 ई. दिन सोमवार को एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। इनका परिवार दान, शिक्षा एवं व्यक्ति स्वातंत्र्य के मूल्यों से ओत-प्रोत था। इनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त और माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। पितामह दुर्गाचरण दत्त फ़ारसी, संस्कृत और विधि शास्त्र के विद्वान थे। पुत्र विश्वनाथ के जन्मोपरान्त केवल 25 वर्ष की आयु में ही गृहत्याग कर वे एक विरक्त सन्यासी हो गए। स्वामी विवेकानन्द के बचपन का नाम नरेन्द्र नाथ दत्त या नरेन था। बाल्यावस्या में नरेंद्रनाथ एक चंचल प्रकृति के विनोद प्रिय बालक थे। इनका अध्यात्मिक क्षेत्र में अद्भुत आकर्षण रहा। 1884 ई० में विवेकानन्द ने स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। साहस और समाज सेवा इनके स्वभाव में शुरू से था। विवेकानन्द ने जातिवाद, शिक्षा, निरपेक्षतावाद एवं मानवतावाद पर विचार प्रस्तुत किए हैं। इनकी शिक्षाओं पर उपनिषद्, गीता के दर्शन, ईसा मसीह एवं बुद्ध के उपदेशों का प्रभाव है।
‘राष्ट्र झोपड़ियों में बसता है।’ स्वामी विवेकानन्द ऐसा स्मरण कराते हैं। उनका मानना है कि कोई भी मतवाद हमारा तब तक उद्धार नहीं कर सकता जब तक हम स्वंय मनुष्योचित चरित-बल प्राप्त न कर लें। विवेकानन्द ने मनुष्य को तरह-तरह के बंधनों से मुक्त रहकर सही मनुष्य बनने की सलाह दी तथा समन्वय विचारधारा की बात की है। स्वामी विवेकानंद का मानना है कि- “मनुष्य निर्माण करना ही मेरे जीवन का उद्देश्य है (Man-Making is my mission)।”1
स्वामी विवेकानन्द का व्यक्तित्व समृद्ध, गहन एवं बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे अपने त्याग से असंयमित, प्रेम में असीम, कर्म में अथक, विद्या-बुद्धि में गहन एवं भावुकता में अतिरेकी तथा संघर्ष में निर्मम थे। हमारे इम जगत में उनके जैसा लोगों का व्यक्तित्व मिलना दुर्लभ है। विवेकानन्द शिक्षा पर जोर देते हुए अक्सर कहा करते थे कि हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जिससे हम मनुष्य बन सकें। हमें ऐसे सिद्धांतों की जरूरत है कि जिससे हम मनुष्य हो सकें। हमे ऐसी शिक्षा चाहिए जो सर्वांगीण विकास के साथ-साथ हमें मनुष्य भी बनाये रखें। भगिनी निवेदिता ने अपनी पुस्तक मेरे गुरुदेव : जैसा मैंने देखा (The Master as I saw him) में लिखा है कि- “उनके आराधना की देवी उनकी मातृभूमि थी।”2
स्वामी विवेकानन्द युवाओं के प्रेरणास्रोत रहे हैं। वह अपने जीवन-दर्शन, ज्ञान एवं विचारों से भारत विश्व को भी आत्मसात कराया है। इसका सबसे प्रभावशाली असर शिक्षा ही रहा। क्योंकि शिक्षा अंतः करण के ज्ञान को प्रकाशवान करती है। शिक्षा मानव के बेहतर चरित्र का निर्माण करती है। हमें ऐसी बेहतर शिक्षा की जरूरत है कि जिससे हम आपस में एक-दूसरे के प्रति स्नेह एवं प्रेम बनाए रहे। स्वामी विवेकानन्द का मानना है कि- “प्रत्येक व्यक्ति स्वंय में पूर्णता निहित है, जिसकी अभिव्यक्ति शिक्षा द्वारा संभव है। स्पष्ट है कि पूर्णता का प्रगटीकरण शिक्षा है। जिसमें जिस अंश तक पूर्णता प्रगट होती है, वह व्यक्ति उसी अंश तक शिक्षित है। वे कहते है कि- शिक्षा आत्म का संगीत है जिनकी सुमधुर ध्वनि में समग्र जीवन मधुमय हो जाता है। उन्हीं के शब्दों में- यदि शिक्षा का अर्थ जानकारी होता, पुस्तकालय संसार के बड़े संत हो जाते और विश्व कोश महान् ऋषि बन जाते। सत्यता यह है कि बालक में अनन्त अन्तनिर्हित शाक्तियों का भंडार है। उसको प्रकाश में लाना और बालक को क्रियाशील बनाना ही शिक्षा है।”3
शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे हम मनुष्य बन सके तथा समाज का सर्वांगीण विकास हो सकें। हमें ऐसी शिक्षा की कतई जरूरत नहीं है जो कि साधारण व्यक्ति को जीवन संग्राम के लिए समर्थ नहीं बना सकती एवं परहित भावना के समान साहस नहीं ला सकती, वह भी कोई शिक्षा है? हमें तो ऐसी शिक्षा चाहिए जो मनुष्य-मनुष्य के बीच चरित्र निर्माण हो सके तथा विकसित भारत में अपना महत्वपूर्ण योगदान कर सकें। जिससे हमारे देश की युवा पीढ़ी अपने पैरों पर खड़ा होकर सामाजिक न्याय के पहलू को उठा सकें। स्वामी विवेकानन्द का मानना है कि संस्कृत द्वारा ही हम अपने संस्कृति के वास्तविक पहलुओं से परिचित हो सकते है। इसलिए संस्कृत का जीवन में ज्ञान होना अति आवश्यक है। स्वामी विवेकानन्द संस्कृत साहित्य पर जोर देते हुए कहते है कि- “मनुष्यों को बोलचाल की उनकी भाषा में ही शिक्षा देनी होगी। किन्तु साथ ही संस्कृत की शिक्षा भी अवश्य चलती रहनी चाहिए। क्योंकि शब्दों की ध्वनि मात्र ही राष्ट्र को एक प्रकार की प्रतिष्ठा शक्ति एवं तेज प्रदान करती है।”4
शिक्षा एक ऐसी संपत्ति है जिसे न तो कोई खरीद सकता है और न ही कोई बेच सकता है। इसके लिए निरन्तर अभ्यासरत रहने की जरूरत है। विवेकानन्द का मानना था कि राष्ट्रीय पद्धति पर आधारित शिक्षा को हमें घर-घर पहुँचाना है। जो लोग हमारे पास किसी कारणवश आ नहीं सकते, उनके पास हमें जाकर शिक्षा की ज्योति जलाना होगा। शिक्षा वह है जो हमारे अंदर श्रद्धा को जन्म देती है। शिक्षा आवश्यकता अनुरुप ही होनी चाहिए अर्थात जो शिक्षा राष्ट्रीय पद्धति अपनाते हुए सामाजिक, शैक्षिक, वैचारिक, आर्थिक, राजनीतिक इत्यादि बिन्दुओं को जानने एवं समझने का अवसर प्रदान करें, वही असली शिक्षा के मायने है। व्यक्ति जिस भाषा को समझने में सहजता प्रदान करें उसे उसी माध्यम से समझाने का प्रयास किया जाना चाहिए।
किसी ने स्वामी जी से कहा कि- ‘संस्कृत’ तो मृत भाषा है।’ तब स्वामी विवेकानन्द ने जबाब देते हुए कहा कि- “हर किसी को संस्कृत पढ़ाइये। हमें संस्कृत अध्ययन के प्रसार के लिए सतत प्रयास करना चाहिए। क्योंकि हमारी मौलिक विद्वता के रत्न इसी भंडार में छिपे है। मानव के उच्चतम दर्शन बिंदु इसी भाषा में निहित है। अपने अज्ञान के कारण हम इस संपत्ति से वंचित हैं। संस्कृत शिक्षा हमें अन्य धर्मों के संबंध में भी सम्यक जानकारी करा सकती है।”5
जो शिक्षक यह कहता है कि मैं शिक्षा देता हूँ, उससे बढ़कर कोई दूसरा मुर्ख नहीं। जैसे- कोई भी व्यक्ति पौधे को उगा नहीं सकता, वैसे ही बच्चे को कोई जबरदस्ती पढ़ा भी नहीं सकता। जैसे पौधे के विकास के लिए समय-समय पर मिट्टी, खाद, पानी, दवा आदि की व्यवस्था करते हैं उसी भाँति बच्चे के शिक्षा के लिए उचित वातावरण बनाना पड़ता है। जिसमें बच्चों को वातावरण के अनुरूप शिक्षक उसे ढालने का प्रयास करता है। हमें ऐसी शिक्षा पद्धति को भी बदलना पड़ेगा जो मारपीट कर गधों को घोड़ा बनाती है। हर बच्चों में असंख्य अलग-अलग वृत्तियाँ है। हमें उनकी रुचियों एवं भावनाओं को समझकर उनके लिए उसी क्षेत्र में अवसर और सुविधाएं प्रदान करनी होंगी। जिसमें बच्चों का समुचित विकास सम्भव हो सकें। स्वामी विवेकानन्द का मानना था कि- “एक अकेले मनुष्य में सारा ब्रह्माण्ड छिपा है। यदि मैं जीवन में एक व्यक्ति को भी आत्म-स्वातंत्र्य की साधना में सहारा दे सका तो जानूँगा कि मेरा पारिश्रम सफल हुआ।”6
“शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो जितना पीयेगा वह उतना दहाड़ेगा।” डॉ. आंबेडकर का ऐसा मानना था। अर्थात जिस शिक्षा से हम अपना जीवन-निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें चरित्र गठन कर सकें तथा विचारों का सामंजस्य कर सकें, वही वास्तव में शिक्षा है। शिक्षा का ध्येय ही है मनुष्य का सर्वांगीण विकास करना। विवेकानन्द कहते है कि- “हम मनुष्य ही अपनी वर्तमान अवस्था के लिए जिम्मेदार हैं और भविष्य में हम जो कुछ कहना चाहें, उसकी शक्ति ही हमीं में है।”7 शिक्षा हम सभी के उज्ज्वल भविष्य के लिए आवश्यक है। शिक्षा का उच्च स्तर लोगों को सामाजिक एवं व्यवहारिक पहचान दिलाने में मदद करता है। यह लोगों के सोच को साकारात्मक बनाती है। अंग्रेजी के कैम्ब्रिज अन्तर्राष्ट्रीय शब्दकोश के अनुसार- “आप जिस प्रकार के व्यक्ति हैं, वही आपका व्यक्तित्व होता है और वह आपके आवरण, संवेदनशीलता तथा विचारों से व्यक्त होता है।”8
प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में दिव्य है तथा उसमें महानता प्राप्त करने की क्षमता है। शिक्षा ही ऐसी कुंजी है जो सभी दरवाजों को खोल सकती है। अक्सर वह कहा करते थे कि जीवन को सफल बनाने के लिए साकारात्मक दृष्टिकोण रखना आवश्यक है। विवेकानन्द का कहना था कि व्यक्तिगत विकास और सामाजिक प्रगति दोनों के लिए शिक्षा अति आवश्यक है। विवेकानन्द ने अपनी शिक्षाओं में सशक्तिकरण और सामाजिक परिवर्तन के माध्यम से सर्व समाज को जागृत करने का कार्य किया है। उनका मानना था कि– “जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के लिए आत्म-त्याग करने में सफल हो चुका है, तभी उसे समाज के लिए आत्म-त्याग की बात करनी चाहिए, उसके पहले नहीं।”9
भाषा अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। यह एक ऐसी भाषा शक्ति है जो मनुष्य के विचारों और सन्दर्भों को अभिव्यक्त करती है। अर्थात मनुष्य-मनुष्य के मध्य अपनी इच्छा का आदान-प्रदान करने के लिए जिन ध्वनि संकेतों का प्रयोग किया जाता है भाषा कहलाती है। विवेकानन्द सच्चे देशभक्त थे। भाषा के संदर्भ में उनका कहना है कि- “भाषा का रहस्य है सरलता।”10 आज सम्पूर्ण विश्व अनेक प्रकार के द्वंदों से गुजर रहा है। कहीं देश, कहीं परिवार, कहीं सम्प्रदाय, कहीं शिक्षा तो कहीं भाषा।
स्वामी जी का मानना था कि समान व्यक्ति एवं समाज के विकास के लिए शिक्षा मेरुदण्ड है। हमारे संविधान में स्त्री और पुरुष दोनों को समान शिक्षा का अधिकार है। देश आजाद हुआ और संविधान द्वारा देश की तमाम महिलाओं को हक देने का अवसर आया तो एक बार पुनः मर्दवादी सोच का दो मुंहापन सामने आया। पढ़े-लिखे बहुतायत लोगों द्वारा भी अपने ही देश में परम्परा के नाम पर महिलाओं के ख़िलाफ़ लामबन्द होते देखा गया। पहले की तुलना में अब समय के साथ परिस्थितियों में बदलाव आया है। प्रतिभावान स्त्रियाँ घर के कामों से मुक्ति पाकर धीरे-धीरे शिक्षा की राह को अपना रही है। शिक्षा का वास्तविक तात्पर्य है मानसिक शक्तियों का विकास करना। इसी संदर्भ में स्वामी विवेकानन्द का भी मानना है कि भारत की स्त्रियों को ऐसी शिक्षा दी जाए, जिसमें वे निर्भय होकर भारत के प्रति अपने कर्तव्य को भली-भाँति निभा सकें और संघमित्रा, लीला, अहिल्याबाई तथा मीराबाई आदि भारत की महान् देवियों द्वारा चलाई गई परम्परा को आगे बड़ा सकें एवं वीरप्रसूता बन सकें।”11
शिक्षा का उद्देश्य तथ्यों को सीखना नहीं बल्कि शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मस्तिष्क को प्रशिक्षित करना है। जिससे मनुष्य आत्म-निर्भर बन सकें। शिक्षा सभी के लिए सुलभ होनी चाहिए। स्वामी जी शैक्षिक पाठ्यचर्या में मनुष्य के शारीरिक विकास हेतु भाषा, कला, इतिहास, भूगोल, राजनीति शास्त्र, संगीत, अर्थशास्त्र, गणित, विज्ञान इत्यादि विषयों पर बल दिया है। वे शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति को इहलौकिक और पारलौकिक दोनों जीवन के लिए तैयार करना चाहते थे। स्वामी विवेकानन्द की मान्यता थी कि- “शिक्षा का अभिप्राय व्यक्ति को आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर और सशक्त बनाना है।”12
स्वामी विवेकानन्द एक उच्चकोटि के विद्वान, समाजसेवी, आदर्शवादी विचारक तथा प्रख्यात लेखक थे। उनका मानना था कि पाश्चात्यों की सफलता का रहस्य ‘शिक्षा’ ही है। वे कहते थे कि भारत और अमेरिका का उच्च वर्ग तो एक ही समान है किन्तु हमारे यहाँ का निम्न वर्ग शिक्षा से वंचित है। अतः हमें समाज के सभी वर्गों तक शिक्षा को पहुँचाना है जिससे उस वंचित वर्ग का भी विकाम हो सकें। सामाजिक समरसता तब जाकर बराबर हो सकती है। हमें शिक्षा के माध्यम से व्यक्तियों का विकास करके उनमें महानात्माओं को समावेशित करना है। विवेकानन्द आगे कहते है कि- “अशिक्षा हमारे राष्ट्र की भारी कमी है और इसे दूर करना होगा। जनसाधारण को शिक्षित करो और ऊपर उठाओं। केवल तभी यह देश यथार्थ में राष्ट्र-रूप में खड़ा हो सकेगा। तुमने पढ़ा होगा मातृ देवो भव, पितृ देवो भव। अर्थात माता को देवता समझो, पिता को देवता समझो। किन्तु मैं कहता हूँ कि दरिद्र देवो भव, मुर्ख देवो भव्- इन गरीबों, अपढ़ों, अज्ञानियों और दुखियों को ही अपना भगवान मानो। स्मरण रखो केवल इनकी सेवा ही तुम्हारा परम धर्म है। यानि शिक्षा का मूल उद्देश्य मनुष्य में सेवा भाव पैदा करना है। “13
स्वामी विवेकानन्द का मानना है कि सत्य जितना महान होता है, उतना ही सहज बोध-गम्य भी होता है। स्वंय अपने अस्तित्व के समान सहज। स्वामी विवेकानन्द बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। यदि मैं कुछ घंटों में या कुछ दिन में इस शोध आलेख को लिखकर यह कहूं कि मैं उन्हें भली-भांति पढ़ और समझ लिया तो यह इस महापुरुष की महिमा के प्रति तनिक भी न्याय नहीं कर सकूँगा। वे स्वदेश एवं मानवता के नैतिक उत्थान के लिए सम्पूर्ण जीवन अर्पित कर दिए। मनुष्य निर्माण करना ही उनका प्रथम और आखिरी लक्ष्य रहा। शिक्षा का लक्ष्य तो जीवन का निर्माण है, चरित्र का निर्माण है। स्वामी विवेकानन्द निर्माण के शब्दों में- “हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जिसके द्वारा चरित्र का निर्माण होता है, मस्तिष्क की शक्ति बढ़ती है, बुद्धि का विकास होता है और मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है।”14 विवेकानन्द सैद्धांतिक शिक्षा के साथ-साथ व्यवहारिक शिक्षा पर विशेष जोर देते थे। उनका मानना था कि उच्च शिक्षा की अच्छी व्यवस्था करने तथा उसके माध्यम से देश में डाक्टरों, वकीलों, इंजीनियरों एवं प्रशासकों आदि की शिक्षा व्यवस्था पर जोर दिया है। जब तक हम प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भर नहीं हो जाते तब तक हम उन्नति नहीं कर सकते । उनका यह भी कहना था कि देश-विदेश में जो अच्छा एवं लाभकारी है उसे उचित स्थान दिया जाना चाहिए। वे विश्व बंधुत्व में विश्वास रखते थे क्योंकि देश की स्वाधीनता, एकता और अखंडता बनाएं रखने के लिए युवा पीढ़ी को जागरूक रखना है जिससे राष्ट्रप्रेम बना रहे। इसी कारण स्वामी जी के उपर्युक्त विचार आज भी प्रासंगिक हैं।
भारत की एक बड़ी आबादी अभी भी गरीबी में जीवन जीने के लिए विवश है तथा वंचित समुदाय की समस्याएँ अभी भी वैसी ही बनी हुई हैं । स्वामी जी ने कहा था कि- “गरीबों की उपेक्षा और उनका शोषण भारत के पतन और पिछड़ेपन का मुख्य कारण है। वह उन पहले आध्यात्मिक नेताओं में से थे, जिन्होंने जन-सामान्य के समर्थन में आवाज उठाई। उन्होंने देश में गरीबों की दुर्दशा के बारे में राष्ट्रीय जागरूकता पैदा करने की कोशिश की। उनके इस उद्घोष ने सैकड़ों युवाओं को समाज सेवा को जीवन पद्धति के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित किया था कि, ‘जब तक लाखों लोग भूख और अज्ञानता में रह रहे हैं, तब तक मैं हर उस व्यक्ति को देशद्रोही मानता हूं जिसने उनके पैसे से शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद उन पर थोड़ा भी ध्यान नहीं दिया।”15
निष्कर्ष
स्वामी जी के कर्म-आधारित जीवन की एक बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्हें अपने आस-पास के समाज में कितनी भी निराशा नजर आई पर उन्होंने इस निराशा को बहुत आशा के संदेश में बदल दिया। अंधविश्वासों व कर्मकांडों के प्रति उनके मन में विद्रोह था। जिस अशिक्षा और भेदभाव से वे उद्वेलित थे, उसे जगह-जगह देखकर वे निराश नहीं हुए अपितु इसे दूर कर एक नया देश बनाने, समाज व धर्म में सुधार करने का बहुत ओजस्वी संदेश उन्होंने बहुत असरदार ढंग से दिया। इससे भारतीय पुनर्जागरण में बहुत मदद मिली। लोगों का स्वाभिमान जगाने में बहुत सहयोग मिला।
स्वामी विवेकानंद के विचार और उनके आदर्श समाज के निमित्त सदा ही मार्गदर्शक की भांति पथ-प्रशस्त करते रहेंगे। आवश्यकता सिर्फ उनके विचारों को आचरण में उतारने की है। यदि विवेकानन्द के संकल्पना को साकार करना है तो असमानता, गैर-बराबरी अर्थात गरीबी को मिटाकर बराबरी का समाज बनाकर एक आदर्श समाज की संकल्पना को साकार किया जा सकता है।
संदर्भ सूची
नेताजी सुभाष के प्रेरणा पुरुष स्वामी विवेकानन्द, स्वामी विदेहात्मानन्द, अद्वैत आश्रम प्रकाशन विभाग, कोलकाता, संस्करण 2015, पृ० 44
वही, पृ० 56
राष्ट्रदेव स्वामी विवेकानन्द सार्धशती अंक, संपादक अजय मित्तल, उर्वशी ऑफसेट प्रिन्टर्स मेरठ तथा विश्व संवाद केन्द्र, मेरठ,21 दिसम्बर 2012, पृ० 8
विश्व में हिन्दू चेतना के प्रवर्तक स्वामी विवेकानन्द, संकलकर्ता राम लाल, शरद प्रकाशन आगरा, संस्करण 1993, पृ०23
वहीं, पृ0 5
विवेकानन्द, रोमां रोलां, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, संस्करण 2013, पृ० 76
व्यक्तित्व का विकास स्वामी विवेकानन्द, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी ब्रह्मास्थानन्द रामकृष्ण मठ, नागपुर, संम्करण 2017, पृ० 13
वही, पृ० 5
हे भारत! उठो! जागो!, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी ब्रह्मस्थानन्द रामकृष्ण मठ, नागपुर, संस्करण 2017, पृ० 45
सहायक प्राध्यापक, श्री रामकृष्ण बी. टी. कॉलेज (Govt. Aided.), दार्जिलिंग,
संपर्क – anandpcdas@gmail.com,
मोबाईल: 9382918401, 9804551685.
सारांश
भारतीय ज्ञान परंपरा एक प्राचीन धारा है, जो सामाजिक मुद्दों को समझने और इन मुद्दों पर अनुसंधान करने में सहयोग किया है। भारतीय शिक्षा व्यवस्था में बौद्ध दर्शन और उनकी शिक्षा प्रणाली के विभिन्न पक्षों का सूक्ष्मता से अवलोकन किया है। बौद्ध दर्शन और उसकी शिक्षा व्यवस्था ने भारतीय ज्ञान परंपरा को कितना प्रभावित किया और कितना समृद्ध बनाया; जिसे व्यवस्थित रूप से व्याख्यायित कर इसकी प्रासंगिकता सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। प्रस्तुत शोध पत्र का उद्देश्य नवीन ज्ञान और विचार के जरिए मानव और समाज के लिए उपयोगी बनाना साथ ही चिंतन शक्ति, विश्लेषण शक्ति एवं सर्जनात्मक शक्ति को मज़बूती प्रदान करना है।
बीज शब्द –बौद्ध, दर्शन, भारतीय, ज्ञान, परंपरा, शिक्षा, व्यवस्था
शोध आलेख
लगभग पांचवीं शताब्दी से भारतीय जनजीवन की परिवर्तित आवश्यकताओं की पूर्ति न कर सकने की वजह से धीरे-धीरे शिक्षा में विशृंखलता के चिन्ह दृष्टिगोचर होने लगे थे। भारत के सौभाग्य से इस देश की पावन भूमि पर महात्मा गौतम बुद्ध अवतरित होकर बौद्ध शिक्षा को जन्म दिया। तथागत बुद्ध द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त और दिए गये उपदेश ही दर्शन के रूप में विद्यमान है। जब इन्हीं सिद्धांतों और उपदेशों को शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग किया गया, तब उन्हें बौद्ध शिक्षा दर्शन के नाम से जाना गया। भारतीय ज्ञान परंपरा में बौद्ध दर्शन और उनकी शिक्षा व्यवस्था का विशेष स्थान है। भारतीय ज्ञान परंपरा को बौद्ध दर्शन और उनकी शिक्षा प्रणाली ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था का एक मानक रूप प्रदान किया था। बौद्ध दर्शन तथा बौद्धकालीन शिक्षा का सूत्रपात और प्रचार-प्रसार एक सामाजिक, धार्मिक तथा शैक्षणिक क्रांति के रूप में हुआ, जिसने एक सुनियोजित शिक्षा व्यवस्था एवं शिक्षा संस्थानों को जन्म दिया। बौद्ध धर्म ने शिक्षा के क्षेत्र में जो क्रांति लाई वह आज भी भारतीय ज्ञान परंपरा में जीवंत और प्रासंगिक है। वर्तमान संदर्भ में नई शिक्षा नीति 2020 ने भी प्राचीन ज्ञान परंपरा के महत्व को समझा है जिसके चलते ही भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा को केंद्र में लाने के लिए भरपूर प्रयास किया जा रहा है।
शोध प्रविधि – समस्त विचारों, तथ्यों व सूचनाओं को व्यवस्थित तरीक़े से प्रस्तुत करने का भरसक प्रयास किया है। अतीत से संबंधित सूचनाओं के साधनों का वैज्ञानिक पद्धति द्वारा परीक्षण कर प्राप्त तथ्यों को भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुरूप प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। प्रस्तुत लेख को विश्लेषणात्मक पद्धति, विवेचन पद्धति तथा ऐतिहासिक विधि तक समेटने की कोशिश किया है।
अध्ययन का विश्लेषण – भारतीय ज्ञान परंपरा में बौद्ध दर्शन और उनकी शिक्षा प्रणाली का गौरवशाली इतिहास रहा है। बौद्धकालीन शिक्षा-व्यवस्था को जानने, समझने व विश्लेषण करने से पूर्व तथागत बुद्ध से जुड़ी बुनियादी बातें और उनके दर्शन को जानना अति आवश्यक है। संध्या सिन्हा के शब्दों में – “वैदिककाल से चली आ रही शिक्षा की धारा ब्राह्मण काल तक ख़ूब फली-फूली। छठी शताब्दी ई. पू. के आते-आते यह धारा धर्म के मूल-सिद्धांतों से भटककर कर्मकाण्डों और आडंबरों के जंजालों में उलझ गई। वर्ण-व्यवस्था जाति-व्यवस्था में परिणत हो गए ‘ब्राह्मणत्व’ और याज्ञिक कर्मकाण्डों, पशुबलि, नर-बलि इत्यादि ने सामाजिक राष्ट्रीय जीवन को जटिल और दुष्कर बना दिया। शिक्षा पर ब्राह्मणों और उनकी ही मनमानी का अधिकार हो गया था। इन परिस्थितियों एवं रूढ़ियों से व्याकुल होकर आम जनता जीवन के सामाजिक-धार्मिक क्षेत्रों में क्रांतिकारी सुधार की आवश्यकता महसूस कर रही थी। ऐसे ही जटिल दौर ई. पू. 563 में गौतम बुद्ध (सिद्धार्थ) का जन्म शाक्य वंश के राजपारिवार में लुम्बिनी (अब नेपाल में) नामक स्थान पर हुआ। इनके द्वारा प्रतिपादित धर्म, बौद्ध धर्म कहलाया तथा जिस शिक्षा-व्यवस्था की स्थापना की गई वह बौद्धकालीन शिक्षा व्यवस्था कहलायी।”1 ठीक इसी प्रकार एस.एन. मुखर्जी का मानना है कि “Religion was reduced to a complicated ritual to be performed by Brahmana priest in a language hardly intelligible to any but a few. The formalism and exclusiveness of the Brahmana system where largely responsible for the birth of Buddhism.”2 प्रारंभ से ही गौतम बुद्ध शांत प्रकृति और चिंतनशील स्वभाव के थे। उनके पिता शुद्धोधन कपिलवस्तु के शाक्य गण के प्रधान व राजा थे। राजकुमारों के अनुरूप ऐश्वर्य एवं वैभव के माहौल में गौतम बुद्ध (सिद्धार्थ) की शिक्षा-दीक्षा और पालन-पोषण हुआ, परंतु ये विलास बहुल सुविधाएं व सुख-वैभव अपनी ओर ज़्यादा आकर्षित ना कर पाई। उनका हृदय दया, करुणा तथा मानवीय भावनाओं से परिपूर्ण था। घनश्याम जी अपने पुस्तक ‘बुद्ध और वेदान्त’ में लिखते हैं – “भगवान बुद्ध का सम्पूर्ण जीवन दया, करुणा, मैत्री, प्रेम, अहिंसा, बंधुत्व, समदृष्टि एवं समता से परिपूर्ण था। यदि उनके जीवन की प्रत्येक घटना का इस दृष्टि से विचार किया जाय तो उसकी एक ही शृंखला इसके विपरीत जाती न मिलेगी। तथागत की करुणा अथाह थी।”3 सांसारिक समस्याओं ने उनके जीवन का मार्ग बदल दिया। जरा, रोग तथा मृत्यु के दृश्यों ने सिद्धार्थ के अंतःकरण को झकझोर दिया। गृह त्याग करके इन कष्टों से ठोस समाधान पाने के उपायों को जानने के लिए उन्होंने कठोर तप किया और अंत में एक पीपल के वृक्ष के नीचे ‘ज्ञान’ प्राप्त हुआ। तभी से सिद्धार्थ ‘बुद्ध’ कहलाए। परम ज्ञान प्राप्त करने के लिए उन्हें चार अवस्थाएं प्राप्त करनी पड़ी थी- 1.पहली अवस्था वितर्क तथा विचार प्रधान थी। 2.दूसरी अवस्था एकाग्रता थी। 3.तीसरी अवस्था समुचित तथा जागरूकता की थी। 4.चौथी अवस्था में समचित्तता एवं पवित्रता तथा समचित्तता एवं जागरूकता का संयोग हुआ। ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात् वे सर्वप्रथम ऋषि पत्तन (सारनाथ) में उन्होंने अपना पहला उपदेश दिया था जिसे हम ‘धर्मचक्र परिवर्तन’ के नाम से जानते हैं। बुद्ध के ज्ञान तथा उपदेशों का सार ‘चार आर्य सत्यों’(Four Noble Truths) में निहित है। वे इस प्रकार हैं- 1.दु:ख, 2.दु:ख समुदाय, 3.दु:ख निरोध तथा 4.दु:ख निरोध मार्ग। दु:ख का मूल कारण तृष्णा है। तृष्णा अज्ञान के कारण उत्पन्न होती है। अज्ञान के दूर हो जाने से समाप्त हो जाती है। अतः ज्ञान ही दु:ख का कारण है। बुद्ध ने दु:ख दूर करने के लिए अष्टांगिक मार्ग दिखाया है – सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाक, सम्यक् कर्म, सम्यक् आजीविका, सम्यक् प्रयास, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि। बौद्ध दर्शन में मूल्यों को तीन भागों में विभाजित किया गया है- शील, समाधि और प्रज्ञा। इन्हें ‘त्रिरत्न’ भी कहते हैं। ‘शील’ का अर्थ है- सात्विक कर्म, ‘समाधि’ का अर्थ है- चित्त की नैसर्गिक एकाग्रता तथा ‘प्रज्ञा’ का अर्थ है- सत्य का साक्षात्कार। इसमें सदाचार को विशेष महत्व प्रदान किया गया है। तथागत बुद्ध ने ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ को दृष्टि में रखकर अपने उपदेश सरल स्थानीय (पाली) भाषा में दिए थे। ‘आत्म दीपो भव’ का आदर्श अपनाने की शिक्षा दी, साथ ही तृष्णा रहित नैतिक आचरण पर मुख्य जोर दिया था। पारलौकिकता की जगह इहलौकिकता को महत्व दिया, इंद्रिय-निग्रह एवं कठोरता के स्थान पर मध्यम मार्ग का सिद्धांत अपनाया। कालांतर में बौद्ध धर्म दो भागों- हीनयान और महायान में विभाजित हो गया। गुरुसरनदास त्यागी अपने शब्दों में बया करते हैं कि “जैन दर्शन के समान बौद्ध दर्शन भी प्रारम्भ में आचार-शास्त्र के ही रूप का था। बाद में बुद्ध के शिष्यों ने आध्यात्मिक रूप देकर उसके एक दार्शनिक शास्त्र बनाया। वस्तुतः दर्शनशास्त्र के दो अंग होते हैं- प्रथम, आचार या कर्मकाण्ड तथा दूसरा ज्ञानकांड या आध्यात्मिक चिंतन। इनमें पहले आचार के नियमों का पालन करना आवश्यक है। तत्पश्चात् आध्यात्मिक चिंतन का अवसर आता है। उपासना द्वारा अन्तःकरण की शुद्धि होने पर ही आध्यात्मिक विचार को समझने की शक्ति मनुष्य में आ सकती है।”4
भारतीय ज्ञान परंपरा में बौद्धकालीन शिक्षा-व्यवस्था ही एक प्रथम ऐसी व्यवस्था बन कर उभरी जो न केवल व्यवस्थित व सुसंगठित व्यवस्था की स्थापना की बल्कि औपचारीक शिक्षा का भी मार्ग प्रशस्त किया। पूनम मदान अपने पुस्तक ‘शिक्षा के दार्शनिक एवं समाजशास्त्रीय आधारगत परिप्रेक्ष्य’ में लिखतीं हैं- “सर्वप्रथम हमें बौद्ध शिक्षा प्रणाली में लोकतांत्रिक प्रणाली के बीज देखने को मिलते हैं। उन्होंने शिक्षा पर सभी का अधिकार बताया और जनसामान्य के लिए शिक्षा के द्वार खोल दिए, किंतु उच्च शिक्षा में योग्यता को महत्व दिया। यदि आज हम उच्च शिक्षा के क्षेत्र में यह प्रावधान लागू करें तो निश्चित ही शिक्षा में गुणात्मक सुधार होगा। अतः यह कहा जा सकता है कि भारत में शैक्षिक प्रशासन, शैक्षिक संगठन विद्यालय एवं विश्वविद्यालय शिक्षा की शुरुआत कर बौद्धों ने वर्तमान शिक्षा की नींव रख दी थी।”5 बौद्धकालीन शिक्षा संस्कार दो तरह से दिखाई देते हैं- प्रव्रज्जा और उपसम्पदा। भारतीय ज्ञान परंपरा में प्राचीन काल के समान बौद्ध काल में भी दो स्तर की शिक्षा की व्यवस्था थी, जिसे निम्नलिखित रूप में दृष्टिपात कर सकते हैं-
1.सार्वजनिक प्राथमिक शिक्षा (Public Elementary Education)
2.उच्च शिक्षा (Higher Education).
1. सार्वजनिक प्राथमिक शिक्षा (Public Elementary Education): बौद्धकालीन शिक्षा-व्यवस्था में प्राथमिक शिक्षा के द्वार सभी के लिए खुले थे। ‘जातक कथाओं’ के अध्ययन से हमें यह ज्ञात होता है कि प्राथमिक स्तर की शिक्षा केवल बौद्ध धर्मावालम्बियों को नहीं, वरन् सभी जातियों के बच्चों को उपलब्ध थी। यह शिक्षा मठों अथवा बौद्ध विहारों में दी जाती थी। प्रारंभ में यह शिक्षा पूर्णतया धार्मिक थी;समयानुसार लौकिक शिक्षा की भी व्यवस्था की गई थी। ह्वेनसांग (Hiuen Tsang) और इत्सिंग (I-Tsing) के लेखों में बौद्धकालीन प्राथमिक शिक्षा में प्रवेश की आयु 6 वर्ष दिखाई देती है। प्रारंभिक शिक्षा के लिए बच्चों को प्रथम छः माह सिद्धिरस्तु (Siddhirastu) नामक बालपोथी पढ़नी पड़ती थी। इस पोथी में 12 अध्याय और 49 वर्ण माला के अक्षर थे, जिनको विभिन्न क्रम में रखकर 300 से अधिक श्लोकों की रचना की गई थी। 16 माह बाद बालकों को पांच विद्याओं की शिक्षा दी जाती थी – शब्द विद्या (Grammar), तर्क विद्या (Logic), चिकित्सा विद्या (Medicine), आध्यात्म विद्या (Metaphysics) और शिल्प-स्थान विद्या (Arts and Crafts)। शिक्षण के लिए शिक्षक काठ की तख्ती पर वर्णमाला के अक्षरों को लिखकर उच्चारण करते थे, उसके बाद छात्र अनुसरण करके उस विषय को कंठस्थ करते थे। अल्बर्ट फ़िटके के अनुसार- “शिक्षण लकड़ी की तख्ती पर वर्णमाला के अक्षरों को लिखता था और उनका उच्चारण करता था। बालक शिक्षक के उच्चारण का अनुकरण करते थे। इस प्रकार, जब कुछ समय के बाद छात्रों को अक्षरों का ज्ञान हो जाता था, तब वे उनको लिखते थे। पाठ्य-विषय के शिक्षण में अध्यापक आगे-आगे बोलता था और बालक उसके कथन को उस समय तक दोहराते रहते थे, जब तक उनको पाठ्य-विषय कंठस्थ नहीं हो जाता था। इस प्रकार, शिक्षण विधि पूर्णतया मौखिक थी।”6 इस प्रकार वे मौखिक शिक्षण विधि को फॉलो करते थे, जिनकी भाषा पाली हुआ करती थी।
2. उच्च शिक्षा (Higher Education) : उच्च शिक्षा के द्वार सभी धर्मों और जातियों के छात्रों के लिए समान रूप से खुले हुए थे। प्राथमिक शिक्षा समाप्त करने के पश्चात् उच्च शिक्षा में प्रवेश कर सकते थे, जिसकी साधारणतया आयु बारह वर्ष की होती थी ताकि छात्र प्राचीन परंपरा के अनुसार पच्चीस वर्ष की आयु में किसी व्यवसाय या रोज़गारी का अवसर प्राप्त करके गृहस्थ जीवन व्यतीत कर सकें। उच्च शिक्षा में दो प्रकार के शिक्षा प्रचलित थीं – धार्मिक तथा लौकिक। धार्मिक विषयों में बौद्ध धर्म, साहित्य, त्रिपिटक, विनय, धम्म आदि की जीवनोपयोगी-व्यावहारिक शिक्षा दी जाती थी; वहीं लौकिक विषयों के पाठ्यक्रम में साहित्य, तर्क शास्त्र, न्याय शास्त्र, चिकित्सा शास्त्र आदि की शिक्षा दी जाती थी। वैसे उच्च शिक्षा का माध्यम सामान्य रूप से पाली भाषा थी, परंतु वैदिक साहित्य की शिक्षा संस्कृत माध्यम से दी जाती थी। इसके अतिरिक्त देश की अन्य प्रचलित भाषाओं का भी प्रयोग कर सकते थे।
शिक्षा के केंद्र – बौद्धकालीन शिक्षा-व्यवस्था में शिक्षा का मुख्य केंद्र मठ अथवा बौद्ध विहार था। छात्रों को निशुल्क शिक्षा, छात्रावास, भोजन, वस्त्र, चिकित्सा आदि की सुविधा प्रदान की जाती थी। कुछ मठों और बौद्ध विहारों ने तो विश्वविद्यालय के रूप में विकसित होकर इतनी ख्याति प्राप्त कर ली थी कि देश की सीमा से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। अध्ययन करने के लिए चीन, जापान, नेपाल, कोरिया, तिब्बत, थाईलैंड, इंडोनेशिया, जावा, लंका आदि देशों के छात्र-छात्राएं भारत आते थे। इन छात्रों ने पठन-पाठन के साथ-साथ प्रमुख भारतीय ग्रन्थों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद भी किया था। डॉ॰ ए॰ एस॰ अल्तेकर के अनुसार “मठों ने उच्च शिक्षा में अपनी योग्यता से कोरिया, चीन, तिब्बत और जावा जैसे सुदूर देशों के छात्रों को की आकर्षित करके भारत की अंतरराष्ट्रीय ख्याति को ऊंचा उठा दिया।”7 बौद्ध काल में कई ऐसे विश्वविद्यालय विकसित हुए, जो वैश्वक पटल पर ज्ञान का केंद्र बनें; वे निम्नलिखित हैं- नालंदा विश्वविद्यालय, वल्लभी विश्वविद्यालय, तक्षशिला विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय, जागद्दल विश्वविद्यालय, ओदंतपुरी विश्वविद्यालय तथा सोमपुरा महाविहार, घटिका अग्रहार तथा ब्रह्मपुरी शिक्षा केंद्र इसके अतिरिक्त कई बौद्ध मठों या विहारों में शिक्षा की व्यवस्था थी।
शिक्षक (Teacher) – भारतीय ज्ञान परंपरा के बौद्ध शिक्षा दर्शन में शिक्षक का एक महत्वपूर्ण स्थान है। बौद्ध दर्शन व प्रणाली के अनुसार शिक्षक हो सकता है ‘चार आर्य सत्यों’(Four Noble Truths) को ग्रहण कर लिया हो और अष्टांगिक मार्ग के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करता हो। बौद्ध दर्शन में दो प्रकार के शिक्षक का उल्लेख है- 1.उपाध्याय और 2.आचार्य। ‘उपाध्याय’ महाज्ञानी और अपने विषय का विशेषज्ञ होता था, जो भिक्षुओं को शास्त्र-सिद्धांत की शिक्षा देते थे। वहीं ‘आचार्य’ आचरण की शिक्षा देते थे साथ ही भिक्षुओं के आचरण की देख-रेख भी करते थे। ना उसका उत्तरदायित्व था। दोनों शिक्षकों को बौद्ध संघ के नियमों का कठोरता से पालन करना पड़ता था। शिक्षक का कर्त्तव्य अपने छात्रों के साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार के साथ-साथ मानवीय एवं आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शन करना। इस प्रकार हम देखते हैं कि उपाध्याय का कार्य अध्ययन-अध्यापन करना था वहीं आचार्य का कार्य छात्रों के अनुशासन को बनाए रखना था, साथ ही शिक्षकों के अनुशासन को भी देखना था।
शिक्षार्थी (Student) – बौद्धकालीन शिक्षा प्रणाली में छात्रों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण और कठोर अनुशासनयुक्त थी, जिन्हें ‘श्रमण’ या ‘सामनेर’ भी कहा जाता था। बौद्ध दर्शन के प्रतित्य समुत्पाद सिद्धांत के अनुसार छात्रों का अतीत एक समान नहीं होता है, उनमें विभिन्नताएं पाई जाती है। यही वजह है कि उनके अध्ययन क्षमताओं में भी समानता नहीं होती है, प्रत्येक छात्र के स्तर के अनुरूप ही पाठ्यक्रम और अध्ययन क्रियाओं का संयोजन करना चाहिए। बौद्ध काल में प्रव्रज्जा संस्कार द्वारा शिक्षा का आरंभ होता था। इसमें बालक सिर मुड़ाकर पवित्रता धारण करता था और गुरु उससे तीन प्रतिज्ञाएं कराता था-
तत्पश्चात् उसका संघ में प्रवेश होता था। इस अवसर पर छात्र को दस आदेश दिए जाते थे; वे निम्नलिखित हैं- 1.जीव हिंसा न करना, 2.किसी की वस्तु न लेना, 3.अशुद्ध आचरण से दूर रहना, 4.असत्य भाषण न करना, 5.मादक पदार्थों का सेवन न करना, 6.कुसमय भोजन न करना, 7.किसी की निंदा न करना, 8.नृत्य-गायन से दूर रहना, 9.सुगंधित व शृंगारिक वस्तुओं का उपयोग न करना, 10.चांदी बहुमूल्य वस्तुओं का दान न लेना। ये आदेश ‘दस सिक्खा पदानि’ कहलाते थे। वे गुरु की देख-रेख में शिक्षा प्राप्त करते थे। अतः संक्षेप में हम कह सकते हैं कि छात्र केवल ज्ञान प्राप्त ही नहीं करते थे, बल्कि वे एक अनुशासित, विनम्र और नैतिक जीवन जीने वाले साधक भी थे। उनका जीवन गुरु-शिष्य की परंपरा से जुड़ा था और संघ के नियमों से बँधा हुआ था, जिसका एक मात्र उद्देश्य सर्वांगीण विकास करना था।
शिक्षण विधि – वैदिक काल की भांति बौद्ध काल में शिक्षण विधि मौखिक ही थी, जिसमें स्वाध्याय, अभ्यास, प्रवचन, भाषण, श्रवण, कंठस्थिकरण, मनन और चिंतन आदि विधियों का उल्लेख मिलता है। साथ ही प्रश्नोत्तर विधि, उपदेश विधि, व्याख्यान विधि, संवाद विधि, वाद-विवाद विधि, चर्चा विधि व्याख्या विधि एवं सम्यक समाधि भी प्रचलित थी। अग्रशिष्य प्रणाली (Monitorial System), भ्रमण या देशाटन एवं प्रकृति निरीक्षण (Excursion and Observation), पुस्तक अध्ययन विधि एवं प्रवचन-सम्मेलन विधि का प्रयोग किया जाता था। संजीव कुमार शुक्ला और शिल्पी काटियार अपने किताब ‘भारत में शिक्षा व्यवस्था का विकास एवं इसकी चुनौतियाँ’ में लिखते हैं- “बौद्ध युग में प्राय: शिक्षण विधियां मौखिक थीं। यद्यपि लेखन प्रक्रिया का प्रारंभ हो चुका था। प्रश्नोत्तर, व्याख्यान, तर्क तथा वाद-विवाद शिक्षक के मुख्य साधन थे। विद्यार्थी विषय-वस्तु को कंठस्थ किया करते थे। इस शिक्षण-व्यवस्था में चिंतन-मनन तथा स्वाध्याय को भी समुचित स्थान प्राप्त था। धार्मिक चर्चा, गोष्ठी, परिषद् एवं विद्वत आदि का भी समय-समय पर आयोजन किया जाता था।”8 इस प्रकार बौद्धकालीन शिक्षा दर्शन का शिक्षणशास्त्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
बौद्ध काल में शिक्षा-व्यवस्था अपनी पराकाष्ठा पर थी। कपूरचंद जैन ने ‘भारतीय शिक्षा का इतिहास’ पुस्तक में बहुत ही महत्वपूर्ण बात बताते हैं कि – “बौद्ध युगीन शिक्षा संस्थाओं के संचालन का आधार प्रमुखतया जनतंत्रीय था। बिना किसी भेद-भाव के यहां स्त्री-पुरुषों को शिक्षा प्रदान की जाती थी, वे चाहे किसी भी वर्ण के क्यों न हों। इन विश्वविद्यालयों में सुदूर विदेशों के छात्र अध्ययन करने आते थे।”9 बौद्ध काल ने भारतीय ज्ञान परंपरा की बुनियाद रखने में विशेष भूमिका निभाई है। तत्कालीन शिक्षा-व्यवस्था व विश्वविद्यालय ने ऐसी ज्ञान की एक ऐसी व्यवस्था क़ायम की थी, जो आज़ भी बहुत प्रासंगिक है। तत्कालीन शिक्षा-व्यवस्था ने ही व्याकरण पाणिनी, राजनीतिज्ञ चाणक्य, अर्थशास्त्रीय कौटिल्य, महात्मा बुद्ध के व्यक्तिगत चिकित्सक जीवक एवं सम्राट चंद्रगुप्त और पुष्यमित्र जैसे महान व्यक्तित्व दिया है। इसी काल में स्त्रियों की शिक्षा के भी मार्ग खुले शिक्षित स्त्रियों में निम्नांकित के नाम उल्लेखनीय हैं- बौद्ध धर्म की प्रसिद्ध प्रचारिकायें सुभा, अनुपमा एवं सुमेधा, कवयित्री के रूप में कालिदास के बाद मानी जाने वाली विजयंका तथा सम्राट अशोक की बहन संघमित्रा। तक्षशिला विश्वविद्यालय में ही आखेट, चिकित्सा, धनुर विद्या, इंद्रजाल, हस्तिज्ञान, भविष्य कथन, शारीरिक लक्षणों का अर्थ, पशुओं की बोलियां समझने का ज्ञान और इंद्रिय संबंधी कार्यों पर नियंत्रण करने की कला जैसी शिक्षा दी जाती थी। वैज्ञानिक शिक्षा का उल्लेख मिलिंद पान्हा में देखने को मिलता है। इसी युग में कई प्रकार की शिक्षा दी जाती थी जिनमें भवन निर्माण कला, मूर्तिकला व चित्रकला की शिक्षा थी जो आज़ बौद्ध विहार, स्तूप, नालंदा और विक्रमशिला की विशालकाय इमारतें भवन निर्माण कला की सजीव प्रमाण हैं। अजंता और एलोरा के भित्ति-चित्र, मूर्तिकला और चित्रकला इस प्रगति के आज भी उदाहरण मिलते हैं। इसी जमाने में व्यावसायिक शिक्षा भी प्रदान की जाती थी जिसमें हस्तशिल्पों की कला, सूत काटने, कपड़ा बुनने वस्त्र सीने, लेखन कला, और पशुपालन इसके अतिरिक्त कृषि, वाणिज्य तथा अन्य कई प्रकार की लाभप्रद व्यवसायों की शिक्षा की सुंदर व्यवस्था थी; ताकि वे अपनी जीविका का सरलता से उपार्जन कर सकें।
निष्कर्ष – बौद्धकालीन शिक्षा का योगदान देश की परवर्ती शिक्षा प्रणाली में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। शैक्षिक संस्थाओं का जितना मजबूत सुगठन बौद्धयुगीन शिक्षा में हुआ, उतना पूर्व में कभी नहीं हुआ था। बौद्ध दर्शन और उनकी शिक्षा-व्यवस्था ने अंतर्राष्ट्रीयता एवं विश्वबंधुता की जिस भावना का सूत्रपात किया वह आज भी ज़िंदा है। बौद्धकालीन शिक्षा प्रणाली केवल अकादमिक या सैद्धांतिक ज्ञान नहीं देते, बल्कि व्यक्ति के शारीरिक, बौद्धिक, मानसिक, आध्यात्मिक तथा सर्वांगीण विकास करने में विशेष सहयोग करते थे। यह शिक्षा नैतिक मूल्यों, अनुशासन और व्यावहारिक कौशल पर जोर देती थी, जिसने इसे एक आदर्शवादी प्रणाली के रूप में ला खड़ा कर दिया। इस प्रकार बौद्धकालीन शिक्षा का पाठ्यक्रम व्यापक, व्यावहारिक एवं जीवन उपयोगी था। इसके अतिरिक्त पर्यटन, सम्मेलन तथा विद्वानों से शास्त्रार्थ का भी उल्लेख प्राप्त होता है। अतः हम यह कह सकते हैं कि भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्धशाली बनाने में बौद्धकालीन शिक्षा-व्यवस्था का महत्वपूर्ण योगदान रहा है जो निःशुल्क, विस्तृत उद्देश्यपूर्ण और संस्कार प्रधान आधारित थी।
संदर्भ सूची:
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वही, पृष्ठ संख्या – 18.
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जब हम भाषा के क्रमिक विकास पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि कोईभीभाषाप्रारंभमेंकेवलबोलचालकीभाषाहोतीहै।धीरेधीरेलोकपरम्पराकीअभिव्यक्तिकामाध्यमजातीहै।यहलोकगीतों, लोकनाटकों, नुक्कडनाटकोंमेंमनुष्यवसमाजकीहार्दिकइच्छाओंकाउनकीआप बीतीकेदर्दकोअभिव्यक्तिकाउनके लोक विश्वास का, समाजकेउत्साहवउमंगका, उनकीखुशीउनकेउत्साहका ‘लोकभाषा’केरुपमेअभिव्यक्तिवसंप्रेषणमाध्यमबनजातीहै।जैसेहीभाषालिपिबद्धहोनेलगतीहै तोधीरे–धीरेव्यक्तिगतपत्रव्यवहारमेंप्रयुक्तहोनेलगतीहै।वहपत्रपत्रिकाओंकेमाध्यम से सामाजिकचेतनाकीअभिवाहिकाकाकामकरतीहै।जैसे–जैसेयहभाषाव्यापकहोनेलगतीहै औरअधिकपरिष्कृतवपरिमार्जितहोनेलगतीहै।तोउत्तमसाहित्यिकरचनाकीसंस्थात्मकपीठिका बन जाती है।फलस्वरूप उसके लिए साहित्यिकभाषाकाआयामभीखुलजाताहै।अभीतककेअपनेविमर्शमेंहमनेपायाकिहिन्दींमेंलोकसाहित्यवपरिनिष्ठितसाहित्यकीविकसितपरम्पराआजादीकेपहलेहीप्रबलहोचुकीथी।साथहीविदेशोंमेंपत्र-व्यवहारकेरुपमेंप्रयुक्तहोनेकेकुछदृष्टांतहमें प्राप्त होते हैं।
बीज शब्द:भाषा, विकास, लिपि, परंपरा, अभिव्यक्ति
शोध आलेख
जब हम भाषा के क्रमिक विकास पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि कोई भी भाषा प्रारंभ में केवल बोलचाल की भाषा होती है। धीरे धीरे लोक परम्परा की अभिव्यक्ति का माध्यम जाती है। यह लोकगीतों, लोकनाटकों, नुक्कड नाटकों में मनुष्य व समाज की हार्दिक इच्छाओं का उनकी आप बीती के दर्द को अभिव्यक्ति का उनके लोक विश्वास का, समाज के उत्साह व उमंग का, उनकी खुशी उनके उत्साह का ‘लोकभाषा’ के रुप मे अभिव्यक्ति व संप्रेषण माध्यम बन जाती है।जैसे ही भाषा लिपिबद्ध होने लगती है तो धीरे-धीरे व्यक्तिगत पत्र व्यवहार में प्रयुक्त होने लगती है।वह पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से सामाजिक चेतना की अभिवाहिका का काम करती है।
जैसे-जैसे यह भाषा व्यापक होने लगती है और अधिक परिष्कृत व परिमार्जित होने लगती है। तो उत्तम साहित्यिक रचना की संस्थात्मक पीठिका बन जाती है।फलस्वरूप उसके लिए साहित्यिक भाषा का आयाम भी खुल जाता है।
अभी तक के अपने विमर्श में हमने पाया कि हिन्दीं में लोक साहित्य व परिनिष्ठित साहित्य की विकसित परम्परा आजादी के पहले ही प्रबल हो चुकी थी। साथ ही विदेशों में पत्र- व्यवहार के रुप में प्रयुक्त होने के कुछ दृष्टांत हमें प्राप्त होते हैं।
वैसे तो भारत 15 अगस्त को अनगिनत संघर्षों के बाद 1947 को स्वतन्त्र हो गया था परन्तु स्वाधीन भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। उस समय से हिंदी के का प्रयास संस्थागत रूप में होने लगा जिसका अनवरत विस्तार होता रहा है। हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिलने के बाद भी अनेक प्रकार के संशोधनों और परिमार्जन से होकर यह भाषा अत्यंत परिमार्जित और अभिव्यक्तात्मक हो गई है। राजभाषा बनने के बाद हिंदी जीवन और जगत के अनेक क्षेत्रों में प्रयुक्त होने लगी। इसी बीच केंद्र सरकार ने हिंदी सलाहकार समिति, राजभाषा कायार्न्वयन समिति, राष्ट्रपति के आदेश, संसदीय भाषा समिति जैसे वैधानिक माध्यमों द्वारा राजभाषा हिंदी को आगे बढाया और आज स्थिति यह है कि हिंदी लगातार विकसित और विस्तारित हो रही है। आधुनिकीकरण और वैश्वीकरण के जमाने में विदेशों में हिंदी का महत्व बढ़ रहा है। भारत की प्रगतिशील अर्थव्यवस्था ने विश्व में हिंदी का आकर्षण बढ़ाया है| विदेशों में हिंदी शिक्षण पर अधिक बल दिया जा रहा है तथा प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक हिंदी का अध्ययन -अध्यापन हो रहा है।यह प्रशासनिक, वैज्ञानिक तथा तकनीकी सभी प्रकार की उच्च कोटि में अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन गया है। वर्तमान समय में भारतीय प्रैद्योगिकीय संस्थान के शोध छात्र अपना शोध प्रबंध भी हिंदी में प्रस्तुत कर रहें हैं।
हिंदी भाषा के विकास में हिंदी सिनेमा का भी विशेष योगदान है| हिंदी अध्यापन के लिए भी, सिनेमा को शिक्षा का माध्यम बनाया जाता है तथा कई विदेशी ऐसे हैं जिन्होंने हिंदी सिनेमा देखकर हिंदी सीखी है। कुछ लोग भारतीय संस्कृति को करीब से जानने के लिए हिंदी सीखते हैं| कुछ व्यापारिक आवश्यकताओं के कारण और कुछ ऐसे भी है जिनका भाषाओं के प्रति लगाव उन्हें हिंदी सीखने के लिए प्रेरित करता है।
मध्यकाल से ही हिन्दीं फुटकर रुप में ही सही प्रशासनिक जीवन का हिस्सा थी।फिर हिन्दी की उपयोगिता के सामाजिक सरोकारों के तहत यह स्वतन्त्रता आंदोलन में मुख्य संपर्क भाषा बनी।धीरे-धीरे सांस्कृतिक, आर्थिक, भौतिक, साहित्यिक व प्रशासनिक दुनिया में इसने अपना स्थान बना लिया।
स्वतन्त्रता के पूर्व ही छायावाद में विभिन्न उपन्यासों में,कथासाहित्य में उसके परिमार्जित, अत्यंत व्यंजक, सक्षम और समर्थ भाषा के रूप में दर्शन होने लगते हैं। इसलिए लाख विरोध के बाद भी आजादी के बाद राष्ट्रभाषा के साथ-साथ राजभाषा के दर्जे की भी हिन्दीं ही अधिकारिणी बनी।
आजादी के बाद देश के कार्यव्यहारों में विविधता व संख्यात्मक इजाफा होने के कारण भाषा के कई रुप सामने आए –
प्रशासनिक हिन्दी
खेलकूद की हिन्दी
पत्रकारिता का हिन्दी
वाणिज्य व्यापार की हिन्दीं इत्यादि।
संपर्कभाषाहिन्दी – आज हिंदी सम्पूर्ण देश में तथा देश के बाहर विदेशों में भी संपर्क भाषा का केंद्र है।हिंदी स्वाधीन भारत में अधिकांश भारतीयों द्वारा प्रयुक्त होने वाली भाषा है। इसने बोलचाल के क्षेत्र में अनेकों कीर्तिमान स्थापित किए हैं। हिंदी किस तरह संपर्क भाषा के रूप में विकसित होकर जन – मन की अभिव्यक्ति का माध्यम बन रही है इस सन्दर्भ में प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय ने लिखा है कि, “अब हिंदी राजभाषा अथवा राष्ट्रभाषा की गंगा से विश्वभाषा का गंगासागर बनने की प्रकिया में है।आज विश्वस्तर पर उसकी स्वीकार्यता और व्याप्ति अनुभव की जा सकती है।आने वाला समय हिन्द और हिंदी का है।इस समय राजनीतिक, समाज –व्यवस्था, धर्म, दर्शन, संस्कृति, पर्यटन, मोरंजन, खेल और रोजगार के क्षेत्र में सबसे प्रभावी भाषा बनकर उभरी है।हमें एकजुट होकर अंग्रेजी के खिलाफ खड़े होना चाहिए। हिंदी और भारतीय भाषाओं को हम शिक्षा का माध्यम बनवाकर अपनी भाषाओं के भविष्य को सदा-सर्वदा के लिए सुरक्षित कर सकतें है।हमें अपनी सरकारों को इस बात के लिए तैयार करना होगा कि वें शिक्षा का माध्यम हिंदी और भारतीय भाषाओं को रखें और अंग्रेजी दूसरी विदेशी भाषाओं की तरह एक भाषा के रूप में सिखाई जाए।ऐसा करके ही हम आगामी चुनौतिओं के लिए अपने युवाओं को सक्षम, समझदार तथा नवाचार के योग्य बना सकते हैं।तभी वे विश्वस्तरीय मौलिक शोधकार्य कर सकेंगे।यह दौर खुली एवं विश्वस्तरीय प्रतिस्पर्धा का है। इस युग का मन्त्र है – ‘स्पर्धा में जो उत्तम ठहरे रह जावें।’ हम अपने नौनिहालों को हिंदी तथा भारतीय भाषाओं में ही विश्वस्तरीय प्रतियोगिता के योग्य बना सकते हैं।यदि भारत को विश्व गुरु की अपनी स्वाभाविक छवि पुनः प्राप्त करनी है तो यह हिंदी और भारतीय भाषाओं द्वारा ही संभव है।” 1
हमें इस बात पर भी विचार करने की आवश्यकता है कि हिंदी साहित्य में साहित्य सृजन केवल हिंदी भाषा भाषियों ने नहीं किया है बल्कि भारत के लगभग सभी प्रान्तों के साहित्यकारों ने हिंदी में रचनाएं की हैं।सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक सुनीतकुमार चटर्जी ने भारतीय भाषाओं के सन्दर्भ में अपना मत प्रस्तुत करते हुए कहा है कि,” भारत की सभी भाषाओं में हिंदी का स्थान सबसे अधिक है।”
राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त ने हिंदी की व्यापकता को कविता के माध्यम से अभिव्यक्त करते हुए कहा है कि, “ हिंदी का उद्देश्य यही है, भारत एक रहे अविभाज्य ,
यों तो रूस और अमरीका जितना है उसका जन राज्य ।
बिना राष्ट्रभाषा स्वराष्ट्र की, गिरा आप गूंगी असमर्थ ,
एक भारती बिना हमारी, भारतीयता का क्या है अर्थ ?”
आज हिंदी की व्यापकता का अनुमान इस संक्षिप्त आंकड़े द्वारा हम लगा सकते हैं कि भारत में हिंदी भाषियों की कुल संख्या 100 करोड़ है इनमें से करीब 50 करोड़ वे लोग हैं जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं है।इसके बावजूद वें हिंदी बोल सकते हैं। आज विश्व के 136 देशों के महाविद्यालयों में हिंदी का अध्ययन – अध्यापन हो रहा है जिससे यह सिद्ध होता है कि वर्तमान समय में विश्व का हर पांचवा या छठा व्यक्ति हिंदी का ज्ञान रखता है।
आज विश्व में 571 मिलीयन लोंगो की मातृभाषा हिन्दी है।
फिजी में 4 लाख लोग
संयुक्त अरब अमिराती – 2 लाख 83 हजार लोग
न्यूझिलंड – 82 हजार
सिंगापूर – 68 मिलीयन
जमैका – 50 मिलीयन
त्रिनिदाद व में 52 मिलीयन
मॅारिशस में -15000 हजार
फ्रैंज गाइना में 6000 लोग हिन्दी को अपनी मातृभाषा मानते है।
इसके अतिरिक्त हिन्दी जानने व समझने वाले लोगों की संख्या 602 मिलियन है।
जो कि विश्व जनसंख्या का 8.3% प्रतिशत है। अंग्रेजी / चीनी के बाद यह तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा बन चुकी है। स्पेनिश 534 मिलियन के साथ बंगाली चौथे स्थान पर जा चुकी है। बोली जाने वाली अर्थात संपर्क भाषा के रुप में प्रयोक्त की जाती है।इस क्रम में 17 वे नंबर पर आने वाली मराठी भाषा भी क्षेंत्र में यह भाषा लिपि व शब्दकोश को साम्यता के कारण आसान से समझी व बोली जाती है।
बीसवें नंबर पर उर्दू व 23 नंबर को गुजराती की लिपि अलग है,नहीं तो ये तीनों भाषा भाषी सहजता से एक दूसरे की बात को समझ संप्रेषित कर सकते है। 32 नंबर की उड़िया व 33 नंबर की पंजाबी भाषा – भाषियों की भी यही स्थिति है।
वैश्विक भाषाओं में भोजपुरी को अलग भाषा मानकर विश्व में भोजपुरी बोलने वालों की संख्या के आधार पर उसे 37 वां स्थान दिया गया है। जबकि सचाई यह है कि भोजपुरी हिंन्दी की ही उपभाषा है। बाहरी itenty नहीं। 40वें नं की मैथली व 46 नंबर की अवधी की भी यही स्थिति है।
इसके अतिरिक्त भारतीय उपमहाद्वीप से लेकर समस्त मिडिल ईष्ट तक हिंन्दी में आसानी संपर्क माध्यम बन जाती है।वह भाषा के रुप में लोगों के बीच बहुराष्ट्रीय संप्रेषण है।
आज अंग्रेजी – 1.452 बिलियन
67 देश की भाषा ही UN, NATO की अधिकृत भाषा है।EU
मंदारिन चीनी – 1.118 बिलियन
हिंन्दी – 343.9 लोगो की मातृभाषा
स्पेनिश – 460 मिलियन लोगो की मातृ भाषा 21 देश की अधिकृत भाषा है।
आर्टिक – 372 मिलियन 25 देश की अधिकृत भाषा है।
फ्रेंच- 300 मिलियन 29 देश की अधिकृत भाषा है।
उर्दू – 170 मिलियन लोगों की मातृभाषा है।
पंजाबी – 125 मिलियन लोगों की मातृभाषा है।
मराठी – 85 मिलियन लोगों की मातृभाषा है।
गुजराती – 61 मिलियन लोगों की मातृभाषा है।
भोजपुरी – 52 मिलियन लोगों की मातृभाषा है।
उड़िया – 35 मिलियन लोगों की मातृभाषा है।
नेपाली – 30 मिलियन लोगों की मातृभाषा है।
इस प्रकार यह मेरे अनुसार विश्व की तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। और विश्व के बड़े हिस्से में लोग इसे समझ सकते है।वह लगातार वैश्विक विस्तार पा रही है।
प्रशासनिकक्षेत्रमेंहिंदी–
आज हिंदी राजभाषा का अधिकार पाने के कारण प्रशासनिक क्षेत्र में अपना अधिकार बनाने में प्रयासरत है।वह केंद्र सरकार के सभी विभागों कार्यलयों से लेकर हिंदी भाषी राज्यों के प्रशासनिक कामकाज की प्रमुख भाषा बनती जा रही है।यह भी देखा गया है कि सरकारी कार्यालयों,बैकों, निगमों,निकायों आदि में हिंदी के बोल-चाल के स्वरूप का बहुतायत मात्रा में प्रयोग होता है।हिंदी के माध्यम से सरल सम्प्रेषण सहज ही संभाव्य है क्योंकि यह सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली और समझी जाने वाली सम्पर्क भाषा है एवं राष्ट्रीय एकता की सम्पूर्ण कड़ी है।प्राय: देखा गया है कि कार्यालयीन परिप्रेक्ष्य में दैनिक कार्यों में चर्चा के दौरान हिंदी का ही प्रयोग होता है एवं मौखिक निर्देश भी दिए जाते हैं। उच्च स्तरीय बैठकें, बोर्ड मीटिंग, नीति निर्धारण संबधी चर्चाएँ आजकल अधिकांशतया हिंदी में ही देखने को मिलती है। किसी भी सभा, सम्मलेन या संबोधन में अधिकांश उच्चतम अधिकारियों द्वारा भी हिंदी बोली जाती है और योजनाओं को हिंदी में ही समझाया जाता है।हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री के सभी संबोधन हिंदी में होते हैं ।यहाँ तक कि केंद्र सरकार की सभी गतिविधियों का माध्यम भौतिक रूप से हिंदी ही होता है।तकनीकी क्षेत्रों में भी परियोजनाओं आदि पर चर्चा करते समय कांट्रेक्टर या कामगारों को हिंदी में समझाया जाता है जिससे वे परियोजना को भलीभांति समझ कर उसे ठीक तरह से निष्पादित कर सकें।
समग्रत: शासन – प्रशासन में, बोलचाल में हिंदी का प्रयोग प्रचुर मात्रा में हो रहा है। यह सर्वविदित सत्य है कि शासन – प्रशासन के अधिकांश मौखिक आदेश –निर्देश हिंदी में ही दिए जाते हैं।परन्तु लिखित रूप में शासन – प्रशासन में हिंदी की वर्तमान स्थिति में प्रयोग की प्रचुर संभावनाएं हैं।
आज हिंदी राजभाषा का अधिकार पाने के कारण प्रशासनिक क्षेत्र में अपना ठौर बनाने में प्रयासरत है। वह केंद्र सरकार के सभी विभागों, कार्यालयों से लेकर हिंदी भाषी राज्यों के प्रशासनिक कामकाज की प्रमुख भाषा बनती जा रही है।यह भी देखा गया है कि सरकारी कार्यालयों, बैकों, निगमों निकायों आदि में हिंदी के बोल-चाल के स्वरुप का बहुतायत मात्रा में प्रयोग होता है।
हमारे वर्तमान प्रशासनिक क्षेत्र के सभी संबोधन हिंदी में होते हैं। यहाँ तक की केंन्द्र सरकार को सभी गतिविधीयों के माध्यम भौतिक रुप सें हिंन्दी ही होता है।
जब किसी भाषा को राजकीय संरक्षण प्राप्त होता है तो वह प्रशासन में प्रयुक्त होने लगती है। किन्तु हिन्दी की प्रशासनिक भाषा बनने की कहानी अत्यंत अनूठी है।
भारत में संप्रति 28 राज्य और 8 केंन्द्र शासित प्रदेश है।इनके गठन का मुख्य आधार भाषाई था।हिन्दी चूंकि देश में सर्वव्यापक है और सभी इसको बालते – समझते हैं।इसलिए यह एक लंबे संघर्ष के बाद यह राजभाषा के उच्चपद पर आसीन हो गई किन्तु आजतक भी प्रशासकीय, कार्यालयीन कामकाज पूर्णतः हिन्दी में नही होता है।कार्यालयीन, प्रशासकीय, भाषा की मुख्य विशेषता यह होती है उसका स्वरुप पूर्णतः अभिधात्मक होता है प्रशासकीय, जिससें कोई अन्य अर्थ निकलने की संभावना न हो।हिन्दी का कार्यालयीन स्वरूप विकसित करने में आचार्य रघुवीर सहाय का बहुत बड़ा योगदान है। उन्होंने संस्कृत को नवीन पारिभाषिक शब्दावली को आधार के रुप में इस्तेमाल किया। उन्होंने संस्कृत की पाँच सौ धातुऔं,बीस उपसर्गों एवं अस्सी प्रत्ययों से कार्यालयीन अंग्रेजी में प्रयुक्त शब्दों को स्थानापन्न करने के लिए हिंदी शब्द बनाए।
दूसरी ओर वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग ने अनुवाद का सहारा लिया।इसके कारण यह भाषा अत्यंत क्लिष्ट हो गई।इसका अंदाज तो डाॅ.रघुवीर को भी होने लगा था इसलिए उन्होंने कहा,’अंग्रेज़ी की प्रत्येक अर्थ-छाया के लिए हिंदी भाषा में भी नया शब्द होना चाहिए। ।।।। अंग्रेजी के तीन शब्द हैं: पहला प्रेरोगेटिव, दूसरा राइट और तीसरा प्रिविलेज।साधारण दृष्टि से ये तीनों एक जैसे शब्द हैं, किंतु प्रयोग की दृष्टि से तीनों अलग- अलग।जब अंग्रेजी में ये तीन शब्द हैं तो हिंदी में भी कम से कम तीन शब्द होने चाहिए (विशेषाधिकार, अधिकार, परमाधिकार)।जो सामान्य लोग हैं उनका तो एक ही शब्द से काम चल जाएगा, लेकिन जो विशेषज्ञ हैं उनको तीन शब्द ही चाहिए।उनका एक शब्द से काम नहीं चलेगा। यह बात चलेगी नहीं।पारिभाषिक शब्दावली तो कभी सरल हो ही नहीं सकती।यह हो सकता है कि बच्चों को सिखाने के लिए आप भाषा सरल कर दें, किंतु पारिभाषिक शब्द सरल नहीं हो सकते।सरल उन शब्दों को कहते हैं जो बिना पढ़े-लिखे लोग, कुली, बच्चे, गाँव के किसान, मजदूर लोग बोलते हैं। जब भी आपके सामने यह बात आये, आप अपने से विचार करें।
*अशोक वाजपेयी अपने व्याख्यानों में अक्सर यह संस्मरण बताते हैं। उन्होंने अपनी रचना ‘हिंदी की बोलियाँ : एक बातचीत’ में सरकारी हिंदी पर संस्कृत के प्रभाव की आलोचना भी की है। देखें, अग्निहोत्री और कुमार, वही: 116-120।
अधिकारियों को समझाइए कि भाषा सरल करने का अर्थ होगा पारिभाषिक भाषा का पारिभाषिकपन समाप्त करना।
डॉ.रघुवीर के विचारों की विस्तार से जानकारी के लिए केंद्रीय हिंदी निदेशालय के सहयोग से प्रकाशित उनकी अंग्रेजी में लिखी गयी पुस्तक देखें: रघुवीर, हिंदी की ऊर्जा, अनु। रामचंद्र शर्मा, भगवती प्रकाशन, दिल्ली, 1998; यह उद्धरण उनके एक लेख ‘पारिभाषिक शब्द’ से लिया गया जिसे धर्मवीर ने उद्धृत किया है। देखें, डॉ. धर्मवीर,। बाद में कोशिस की गई कि सरकारी हिन्दी को सरल व सुबोध बनाया जाए पर उसमें अनुदित होने के कारण कृत्रिमता आ गई थी। जो आज भी बरकरार है।
भारत सरकार के राज-भाषा विभाग द्वारा प्रकाशित हिंदी के प्रयोग संबंधी आदेशों के संकलन पर निगाह डालने से यह स्पष्ट हो जाता है। सत्तर और अस्सी के दशक में केंद्र सरकार का एक हिस्सा रघुवीरी कारिस्तानी के खिलाफ जद्दोजहद करते हुए दिखा।गृह मंत्रालय का 1976 में जारी किया गया एक कार्यालय ज्ञापन और फिर 1988 का एक कार्यालय ज्ञापन यह बताता है कि देर से ही सही पर सरकार को अपनी गलती समझ में आ गयी थी।ये ज्ञापन साफ़ तौर से कहते हैं कि सरकारी हिंदी लिखते समय न तो संस्कृत लिखने की कोशिश की जाए और न ही देवनागरी लिपि में अंग्रेजी। अंग्रेजी में मसविदा लिख कर अनुवाद करने के बजाय उसे मूल हिंदी में ही तैयार किया जाए ताकि अनुवाद के अटपटेपन से बचा जा सके। सरकारी हिंदी अलग तरह की नहीं। होती, वह भी सरल और सुबोध होनी चाहिए, उसमें आमफ़हम शब्दों का प्रयोग किया जाए, दूसरी भाषाओं के शब्दों के इस्तेमाल से परहेज़ न किया जाए, समझाने के लिए अंग्रेजी के शब्दों को कोष्ठक में लिख दिया जाए, वाक्य छोटे और सरल बनाये जाएँ। कुछ इसी तरह की हिदायतें केंद्र-राज्य संबंधों पर बने सरकारिया आयोग ने भी दीं। 59 संविधान पारित होने के साठ साल बाद 2011 में भारत सरकार का राज-भाषा विभाग 2011 सभी मंत्रालयों और विभागों के लिए यह आदेश निकाल पाया है कि सरकारी हिंदी में उर्दू, फारसी और अंग्रेजी स्रोतों के आमफ़हम शब्दों का इस्तेमाल करने से परहेज नहीं की जानी चाहिए ताकि सरकारी काम-काज की भाषा सरल और सुबोध बन सके दो उदाहरण
यह कृत्रिमता शब्दावली गठन में नहीं अपिल वाक्य संस्था में भी है। इसलिए इसे अपनाने में प्रैक्टिकल समस्याएं सामने आ जाती है।
सरकारी नौकरी में इतने वर्ष रहने के बाद मेरा अनुभव यह है। कि डीलींग हॅण्ड नवीन ड्राफ्ट बनने में कतराते है। एक वो विषय की जटिलताओं के कारण दुसरा भाषा का अभिधात्मक स्वरुप देने के चक्कर में भाषा का Interpretation कुछ और व हो जाए, इसी कारण ज्यादातर Copy – Paste के माध्यम से मूल ड्राप्ट तैयार करने की प्रवृत्ती रहती है।जिसके कारण समान विषय पर हर प्रकार को संस्थत्मक टिप्पणी पत्र के ड्राफ्ट शब्द समान रहते है। चुंकि अंग्रेजी में पहले से ही देश का सब कामकाज चल रहा था। तो उसी को सुविधाजनक मानते हुए 75 वर्ष बाद तक स्थिती में कोई बदलाव नहीं आ पा रहा है। किंतु यदि हम शब्दावली की और वाक्य विन्याप्त को इस कृत्रिमता और क्लीष्टता को थोड़ा प्राकृतिक व सरल बना पाए तो आज राजनैतिक वातावरण में हिन्दी की स्वीकार्यता कार्यालयीन कामकाज में बढ़ जाएगी।
आजकल केन्द्र सरकार में सभी फाइल्स ई –ऑफिस प्रणाली पर ही होती है। अब वहाँ physical life की संकल्पना शेष नहीं रह गई। अस परिस्थिती में अंग्रेजी में ही टिप्पणी लिखने की बाध्य है। एक तो हिन्दी टाईपिंग आती नहीं। मेरा मानना है कि यदि ई- ऑफिस प्रणाली को हिन्दी में Wookable बनाना है। तो सभी अधिकारिर्यों, कर्मचारियों को हिन्दी में भी की – बोर्ड उपलब्ध करके देना चाहिए और हिन्दी ट्यूटर व टाईप कक्षा पर हिन्दी वर्तनी के विकल्प अंग्रेजी की तरह उपलब्ध होंगे और Word में हिन्दी के लिए भी incorr अशुध्द वर्तनी पर लाल लाइन आएगी तथा उस पर क्लिक करने पर उसके शुध्द विकल्प आएगे तो इससे कार्यालय में दैनंदिन कामों में हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा मिलेगा।
राजभाषा हिन्दी की एक अन्य समस्या को डॉं भोलानाथ तिवारी में अपनी पुस्तक “राजभाषा हिन्दी” में रेखांकित किया है।“पूरा हिन्दी प्रदेश अपने आप में काफी बड़ा है। बन गया है।
इस संदर्भ में अपने महाराष्ट्र राज्य में काम करने के अनुभव को मैं दर किनार नहीं कर सकती।महाराष्ट्र की राजभाषा मराठी है। और वह वास्तविक राजभाषा है। चाहे e –office प्रणाली हो या भौतिक संचिकाएं यहाँ फाईलवर्क,बैठकें,अनुदेश ,अधिसूचनाएँ,दिशानिर्देश,नियम,अधिनियम सभी मराठी भाषा में ही हैं। और सभी उनका उपयोग गर्व के साथ करते हैं।
एक तो मराठी भाषियों ने मोड़ी लिपि को त्यागकर नागरी को अपना लिया है।इससे मराठी हिन्दी व संस्कृत की शब्दावलियों का आदान-प्रदान भी आसान हो गया दूसरा फायदा यह हुआ कि मराठी भाषी व्यक्ति के लिए पूरे भारत में काम करनें में कोई खास कठिनाई या बाधा नहीं आती। अगर हम अन्य भारतीय भाषाओं जैसे की गुजराती, मराठी, तमिल, तेलगु, कन्नड, मलयालम, बंगाली, पंजाबी से कुछ शब्दावलियों का आदान – प्रदान करेंगे तो इससे हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा। आजकल ग्र मंत्रालय से इस संदर्भ में ने उत्तर – पूर्व के राज्यों की भाषाओं के देवनागरीकरण का बीड़ा उठाया है। यदि यह प्रयास सफल हो गया तो ना केवल भारत की एकता व अखंडता में अधिक मजबूती आएगी बल्कि हिन्दी के व्यापक विस्तार और उसके राजभाषा के रुप में स्थापित करने के सार्थक प्रयासों को और अधिक मजबूती और सफलता प्राप्त होगी।
भोलानाथ तिवारी ने परिवर्धित देवनागरी वर्णमाला का नमूना अपनी पुस्तक राजभाषा हिन्दी में प्रस्तुत किया है। जिसके प्रयोग लगभग सभी भारतीय भाषाओं के देवनागरी में अभिव्यक्त किया जा सकेगा।
परिवर्धित देवनागरी वर्णमाला
देवनागरी वर्णमाला
स्वरः अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ मात्राएँ: । ि ी ु ू ृ ऋ े ै स्वरः ओ औ अं अः मात्राएँ: े ै ा ा: व्यंजन : क ख ग घ ड च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण ड़ ढ़ त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व श ष स ह संयुक्त व्यंजन क्ष त्र ज्ञ श्र हल चिन्ह – \
जब हिन्दी व देवनागरी में सभी भाषाओं को अभिव्यक्त करने की नैसर्गिक क्षमता उत्पन्न हो जाएगी तो कार्यालयीन कामकाज में हिन्दी के प्रयोग को भी बल प्राप्त होगा।इस काम के लिए कई विभागों ने अपनी परिभाषिक शब्दावलियाँ बना ली है।जैसे विधि न्याय विभाग की विधि शब्दावली और रेल्वे मंत्रालय ने 1978, 79, 81 में अपनी पारिभाषिक शब्दावली की चार पुस्तके प्रकाशित की है।
रिजर्व बॅंक ने 1980 में बॅंकिग शब्दावली प्रकाशित की है। 1973 में आयकर विभाग ने आयकर शब्दावली प्रकाशित की। 1980 में भारतीय साधारण बीमा निगम ने अपनी शब्दावली प्रकाशित की। राजभाषा के रुप में हिन्दी के प्रचार, प्रसार, एकरुपता, लाने के लिए राजभाषा कोश का निर्माण होना चाहिए।
आजकल डिजिटल डिक्शनरी के विकास का काम भी तेजी से चल रहा है। हम मिलकर प्रयत्न करेंगे तो निश्चित ही हिन्दी विश्व की संपन्न व प्रौढ राजभाषा व कार्यालयीन भाषा बन जाएगी।
विधिकेक्षेत्रमेंहिंदी – विधि के क्षेत्र में हिंदी की समस्याएं पारिभाषिक शब्दावली एवं वैधिक सरंचनात्मक भाषा के गठन से जुडी हुई है।इस समय भाषा में भाषा की अभिधात्मकता कार्यलयीन भाषा से भी अधिक होनी चाहिए।
विधि के क्षेत्र में हिंदी के प्रयोग को लेकर ब्रिटिशकाल में ही हिंदी की मांग उठने लगी थी।१९वीं शताब्दी में अदालती एवं कार्यालयीन भाषा के रूप में हिंदी को उर्दू के समकक्ष स्थान देने की मांग जोर – शोर से उठाई गई थी।उस समय के नागरिकों और हिंदी भाषी विद्वानों का यह मानना था कि हिंदी को हिंदी को विधि के क्षेत्र की भाषा बना कर ही रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए जा सकते है। अतः जब भारतीय संविधान लागू हुआ और उसमें हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया तब यह सुनिश्चित हो गया कि हिंदी लगातार विधि के क्षेत्र में भी प्रयुक्त होती रहेगी और विकास के नए आयामों को प्राप्त करेगी।
भारतीय संविधान समितियों में संविधान का प्रारूप तैयार करते समय हिंदी के लिए आफिशियल लैंग्वेज अर्थात् राजभाषा का आधिकारिक भाषा के रूप में प्रयोग किया है,तब से अब तक विधि के क्षेत्र में हिंदी का विकास होता जा रहा है वह लगातार विकसित हो रही है।अहिन्दी भाषी क्षेत्र के न्यायालयों एवं उच्च न्यायालयों में भी उसका प्रयोग हो रहा है।हिंदी ने उच्चतम न्यायालय के दरवाजे पर भी दस्तक देकर याचिका स्वीकृत करवा ली है। यह लगातार विधि के क्षेत्र में भी अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा ली है। वैसे तो विधि के क्षेत्र में प्रयुक्त होनेवाली हिंदी लगातार विकसित और फल – फूल रही है। इस समय अनेक संस्थाओं और विद्वानों द्वारा यह मांग भी की जा रही है कि विधि के क्षेत्र में हिंदी का अधिक से अधिक प्रयोग हो। इस कारण उच्च न्यायालयों से लेकर सर्वोच्च न्यायलय सब हिंदी को विधि के क्षेत्र में प्रयुक्त होनेवाली एक प्रमुख भाषा के रूप में देखने लगे हैं।अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने भूमि के रजिस्ट्रेशन में प्रयुक्त होने वाली उर्दू, फारसी शब्दावलियों के स्थान पर हिंदी शब्दावली के प्रयोग पर जोर देने वाले अधिनियम को पारित किया है।विधि के क्षेत्र में हिंदी की उपयोगिता के महत्त्व को ध्यान में रखते हुए महात्मा गाँधी ने लिखा है कि, “हमारी कानूनी कार्यवाहियों में हिंदी का प्रयोग होना चाहिए क्योंकि जब तक ऐसा नहीं होता तब तक प्रजा को राजनैतिक कार्यों की जानकारी नहीं मिलेगी।” कहीं न कहीं गाँधी जी द्वारा कही गई बात पर अब अमल किया जा रहा है और वर्तमान में विधि के क्षेत्र में भी हिंदी अपनी उपस्थति दर्ज करा रही है। क्योकि विधि की भाषा भले ही क्लिष्ट हो जाए पर इसमें अर्थ छटाएं नही हो सकतीं।इसमें भाषा के Interpretations भी नहीं हो सकते।हर लिखी बात का एक ही अर्थ निकलना चाहिए।आजादी के समय हिन्दी को राजभाषा का सन्मान मिला,किंन्तु न्यायालयीन भाषा के रुप में देश के उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालय की भाषा आज भी अंग्रेजी ही बनी हुई है। यदापि जिले स्तर तक न्यायिक व्यवस्थाओं में स्थानीय भाषाओं के प्रयोग को मान्यता दी गई है।
यद्यपि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 348(2) में प्रावधान है, कि राष्ट्रपति से पूर्व सहमति लेकर किसी राज्य के राज्यपाल उस हिन्दी या राज्य की राजभाषा को उच्च न्यायालय की कार्यवाही को करने में प्राधिकृत कर सकेगें किन्तु उच्चतम न्यायालय की भाषा हर हाल में अंग्रेजी ही होगी।भारत के विधिआयोग ।इनमे 18 वी रिपोर्ट-(2008)
अभी तक उत्तर प्रदेश, बिहार व मध्य प्रदेश राज्यों कें राज्यपालों ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 348/2 के तहत अपने उच्च न्यायालयों में कार्यवाहियों के लिए हिन्दी क प्रयोग को प्राधिकृत कर दिया है। इतना ही नहीं इन राज्यों में उच्च न्यायालय के निर्णयों व आदेशों में हिन्दी का प्रयोग संभव होगा।
अन्य राज्यों ने भी अपने अपने भाषा को उच्च न्यायालय की भाषा के रुप में प्राधिकृत करने का प्रस्ताव भेजा है। एैसे करने वाले राज्यों में है, गुजरात, छत्तीसगढ़, व तमिलनाडु किंतु इनकी मांग को स्वीकार नहीं किया गया है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 210 के प्रावधान के अनुसार राज्यों के विधान मंडलों में क्रमशः उस राज्य की राजभाषा हिन्दी या अंग्रेजी का प्रयोग किया जा सकेगा।इसके प्रावधान ने हिन्दी भाषी राज्यों में विधी बनाने की भाषा व विधानमंडल की भाषा के रुप में हिन्दी के व्दार खोल दिए है।
विज्ञानकेक्षेत्रमेंहिंदी–
स्वाधीन भारत में विज्ञान के क्षेत्र में हिंदी के प्रयोग को पर्याप्त बढ़ावा मिल रहा है। आज अनेक वैज्ञानिक पत्रिकाएँ हिंदी में निकल रही है।यदि भारत सरकार के विविध वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा वैज्ञानिक पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही है तो दूसरी ओर अमेरिका जैसे देशों में ‘विज्ञान प्रकाश’ जैसी उच्चस्तरीय वैज्ञानिक पत्रिका का प्रकाशन हो रहा है। वर्तमान वैश्वीकरण के दौर में हिंदी विज्ञान एवं प्रद्योगिकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित की है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल में ‘विश्व प्रपंच की भूमिका’ शीर्षक से जर्मन दार्शनिक हेगल की पुस्तक ‘रिडल ऑर यूनिवर्स’ का हिंदी अनुवाद किया जिसमें भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, भूगर्भ विज्ञान, प्राणी विज्ञान और शरीर विज्ञान जैसे विषयों पर गंभीर सामग्री उपलब्ध होती है। धीरे- धीरे विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में हिंदी भाषा का प्रयोग बढता गया है आज हिंदी में 4000 से अधिक वैज्ञानिक लेखकों का एक विशाल समुदाय है जिन्होंने 10,000 से अधिक वैज्ञानिक पुस्तकें लिखी है। इस सन्दर्भ में पूर्व प्रधानमंत्री पी। वी। नरसिंहराव ने लिखा है की, “विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में विदेशी भाषा से कोई राष्ट्र न तो मौलिक ढंग से विकास कर सकता है और न ही अपनी विशिष्ट वैज्ञानिक एवं प्रोद्योगिकीय पहचान बना सकता है।
वर्तमान डिजिटल युग में हिंदी किस तरह विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपनी उपस्थति दर्ज करा रही है। इस पर विचार करते हुए प्रो.करुणाशंकर उपाध्याय ने लिखा है कि, “आज कोरोना संकट ने प्रोद्योगिकी एवं डिजिटल आधारित शिक्षा पद्धति अपनाने के लिए विवश कर दिया है।हम भलीभांति जानते हैं कि कोरोना कहर से शिक्षा क्षेत्र सर्वाधिक प्रभावित हुआ है जिसके चलते करोड़ों छात्रों की शिक्षा व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा रहा है।हमें अधिकांश सत्रों की परीक्षाएं रद्द करनी पड़ी और शेष के विकल्प ढूँढने पड़ रहे हैं।बावजूद इसके एक प्राध्यापक होने के नाते हम उत्तरदायित्वों का पूरी निष्ठा से पालन करते हुए तकनीक की सहायता से छात्रों को शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। वीडियो कांफ्रेंसिंग, सिस्को, वेब एक्स, गूगल मीट, गूगल क्लासरूम, ज़ूम, ई – पाठशाला, यू – ट्यूब रिकॉर्डिंग, टी. सी. एस. आयन क्लासरूम एवं स्मार्ट फोन आदि माध्यमों से हम विद्यार्थियों को पढ़ा रहें हैं, उनकी कक्षाएं ले रहे हैं।हम आंतरिक मूल्यांकन के कार्य भी ऑनलाइन ही कर रहें हैं। हम ई – कंटेंट अथवा अध्ययन सामग्री भी उन तक पहुंचा रहे हैं इसके अलावा पीएच. डी. के विद्यार्थियों को ऑनलाइन मार्गदर्शन प्रदान कर रहें हैं।आगामी समय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिलेंगे।ऑनलाइन शिक्षण सामग्री कैसे उपलब्ध हो, ऑनलाइन परीक्षाएं कैसे हो,ऑनलाइन पाठ्यक्रम कैसे पढ़ाए जाएं, इस दृष्टि से बड़े परिवर्तन होने की उम्मीद है। वर्तमान विश्व में ज्ञान – विज्ञान के जो नवीनतम साधन और उपल्धियाँ है, उस सन्दर्भ में छात्रों को द्यतन रखना बेहद आवश्यक है इसलिए हम सब तकनीकी साधनों के माध्यम से कार्य कर रहें हैं।आगामी समय तकनीक आधारित शिक्षा व्यवस्था और तकनीक केन्द्रित विश्व- व्यवस्था का साक्षी बनने जा रहा है”।2“वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली नामक जर्नल में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर तथा विज्ञान साहित्य के प्रकाशन में तेरहवें स्थान पर है। शीर्षस्थ विज्ञान संस्थाओं से ८० की सदी शोधकार्य विदेशी पत्रिकाओं में छपते हैं या विदेशी संगोष्ठियों में में प्रस्तुत किए जाते हैं। भारतीय प्रयोगशालाओं में भारत की गरीब जनता की गाढ़ी कमाई से भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा सिद्ध – शोध कार्य को इस तरह विदेशों में प्रकाशित करने से भारत की जनता का कोई लाभ नहीं है, बल्कि इससे अप्रत्यक्षता प्रतिभा पलायन को जोर मिलता है, यह सब टाला जा सकता है, यदि हम सचेत हो जाएं और स्वभाषा का माध्यम अपनाएं। इसके लिए एक पंच सूत्रीय कार्यक्रम निम्लिखित है-
बदली हुई वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप विज्ञान–प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में हिंदी के प्रयोग हेतु एक उपयुक्त नीति निर्धारित हो एवं कार्यक्रम बने, प्रथमतः यह कार्य संगोष्ठियों के स्तर पर हो।
तकनीकी हिंदी के प्रयोग–प्रसार व हिंदी में शोध–पत्रादि एवं तकनीकी प्रतिवेदन लेखन पर व्यापक प्रशिक्षण की परियोजना चलाई जाए और समयबद्ध लक्ष्य निर्धारित किए जाएं।
देश की अंग्रेजी विज्ञान पत्रिकाओं में अनिवार्यता हिंदी खंड हो तथा सभी अंग्रेजी शोध – पत्रों का सारांश हिंदी खंड में हों तथा सभी अंग्रेजी शोध- पत्रों का सारांश हिंदी में अनिवार्यत: दिया जाए। तकनीकी संगोष्ठियों में हिंदी सत्र की व्यवस्था हो।
राजभाषा कार्यान्वयन के अंतर्गत वार्षिक कार्यक्रमों में हिंदी में विज्ञान संबंधी प्रशिक्षण, प्रकाशन संगोष्ठी आदि का ब्यौरा शामिल करें एवं तिमाही प्रतिवेदन में ऐसी उपलब्धियों का जिक्र हो।
विज्ञान–प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में हिंदी के विविध प्रयोग हेतु उचित प्रोत्साहन की व्यवस्था हो एवं ऐसे कार्यों को उचित मान्यता एवं महत्व दिया जाए”।7
जनसंचारकेक्षेत्रमेंहिंदी–
चूँकि हिंदी भारत वर्ष के सबसे बड़े समुदाय द्वारा प्रयुक्त होने वाली भाषा है। अतः जनसंचार के क्षेत्र में भी इसकी विशेष भूमिका रही है। विगत दो शताब्दियों में जनसंचार के क्षेत्र में और वहां प्रयुक्त होनेवाली हिंदी में भी लगातार परिवर्तित हो रही है। जनसंचार के परम्परागत माध्यमों से लेकर आधुनिक माध्यमों तक हिंदी का धडल्ले से प्रयोग हो रहा था। “आज प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया, सिनेमा, टीवी, साहित्य – संस्कृति प्रशासन, राज-काज और पाठ्य पुस्तकों द्वारा हिंदी प्रसारित हो रही है। हर माध्यम की अपनी अलग –अलग भाषा शैली है। जन- जन की हिंदी, विज्ञान – तकनीकी, न्याय – पालिका और विदेशियों द्वारा प्रयुक्त हिंदी का भी अध्ययन किया जा सकता है। हमारे अपने देश में तमाम राज्यों और प्रदेशों की अपनी – अपनी बोली भाषा है। इस बोली भाषा के लहजे में प्रयुक्त हों वाली हिंदी भी गजब की है। इन सभी को मिलाकर मुंबई की खिचडीनुमा हिंदी बनती है और अंडरवर्ल्ड की जो टपोरी हिंदी बोली जाती है उसका तो अंदाज ही कुछ निराला है। समाज व्यवस्था में जैसे परिवर्तन होता है वैसे ही समय काल के अनुसार भाषा के स्वरुप में भी परिवर्तन होता रहेगा। कल संस्कृतमय भाषा थी आज यांत्रिकी और तकनीकी से प्रेरित अंग्रेजी मिश्रित हिंदी प्रयुक्त हो रही है। जब बात टेकनोलॉजी की होती है तो अनायास अंग्रेजी का वर्चस्व दिखाई देने लगता है। क्लिष्ट शब्दों के बजाय अंग्रेजी के शब्दों को जस का तस देवनागरी में लिखकर हिंदी के शब्दकोश को बढाया जाना समय की जरुरत है । जैसे- रेल, टेलीविजन, फैक्स, टेलीग्राम , ट्रेन, पोस्ट, बैंक, मोबाइल, कंप्यूटर, रेडियो, टेलिविजन, इंटरनेट,ई-मेल, डाउनलोड, डॉक्टर, ट्रक्टर, मीडिया, यूनिकोड, इंजीनियर, पेपर, प्रिंटर, बटन, इत्यादि, सैकड़ों ऐसे शब्द हैं जो जस के तस रोमन अंगेजी से देवनागरी हिंदी में प्रयुक्त हो रहे है। पहले तो नहीं पर अब धड़ल्ले से इस तरह के शब्दों का प्रयोग रोजमर्रा के जीवन में हो रहा है”3।
सोशल मीडिया की प्रकृति फास्ट फूड की तरह है। इसके कारण हिंदी आलोचना और हिंदी साहित्य जगत पर बुरा प्रभाव भी पड़ा है। इसी तरह कई गलत और अनावश्यक ख़बरें या आर्टिकल्स भी प्रसारित होते है। यह साहित्यिक दुनिया के कन्फेशन जैसा ज्यादा दिखाई देता है। सोशल मीडिया ने नवीन विधाओं वाली नई हिंदी को भी जन्म दिया है जो डिजिटल पव्लिकेशन्स तथा लिट फेस्ट के आयोजन से आच्छादित है। “धीरे – धीरे अब सोशल मीडिया पर साहित्यिक सामग्री आडियो और वीडियो के रूप में भी आने लगी है। यूट्यूब जैसा सोशल मीडिया इसका सशक्त माध्यम है।अक्सर यह भी देखने में आता है कि सोशल मीडिया के माध्यम से कई गलत जानकारियां भी प्रसारित होती रहती है जिस पर लगाम लगना जरूरी है। यह किसी के निजी विवेक पर आधारित है। कई बार कुछ ऐसी सामग्री या कविताओं को किसी बड़े लेखक या कवी के नाम पर प्रसारित किया जाता है जिसकी रचना उस लेखक या कवि ने कभी नहीं की जाती है। अपने एक लेख में बालेन्दु शर्मा लिखते हैं कि, ‘सोशल मीडिया साहित्य को नई विधाएं दे सकता है मगर अब तक ऐसा नहीं हो पाया है। एक ज़माने में ब्लॉगिंग की बड़ी धूम थी। ब्लॉगिंग एक सशक्त विधा बन सकती थी किन्तु वह माध्यम भर बन कर रह गई । अपनी रचना धर्मिता को दूसरों तक पहुंचाने का माध्यम वैसे ही है जैसे कोई भीअन्य माध्यम है या हो सकता है। जैसे टेलिविजन, सिनेमा या नुक्कड़ नाटक साहित्यिक विधाएं अभी भी नहीं है क्योंकि उनके लेखन की कोई स्पष्ट दिशा नहीं है। दूसरी ओर रेडियो नाटक और रिपोतार्ज आदि को देखिए जिनका विधाओं के रूप में पर्याप्त विकास हुआ है। सोशल मीडिया की ही तरह ये भी पारंपरिक माध्यम ही थे किन्तु वे साहित्य के साथ तारतम्य बनाने में सफल रहे।” 4
इस दौर में अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में सोशल मीडिया की अपनी अहम् भूमिका है। माना कि यह मान्यता प्राप्त माध्यम नहीं है पर पूरे विश्व में फैला इसका जाल, व्यापकता का एहसास दिलाता है। आज जन-जन के हाथों तक फैला यह एक सशक्त माध्यम है। इसमें एस। एम। एस।, यूट्यूब, वाट्सअप, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, औरकुट, फेसबुक, मैसेंजर, मेल इत्यादि का समावेश किया जा सकता है जो पलक झपकते ही विश्व के एक कोने की खबर दुसरे कोने तक पहुंचा देते हैं। इंटरनेट सोशल मीडिया का प्रमुख माध्यम है। जिसके सहारे यह परिचालित होता है। महज एक क्लिक की सहायता से मिनटों में कोई बात, घटना, साहित्य, संस्कृति, संवाद, तस्वीरें, मनोरंजन, थीम्स, शॉर्ट फिल्म्स, नौकरी के अवसर, विज्ञापन इत्यादि हजारों – हजार लोंगों तक पहुँच जा रहें हैं। इसकी दखल अब चैनल, पत्रकारिता एवं मनोरंजन के अन्य माध्यम भी लेने लगे है। इन माध्यमों में कई भाषाओँ का प्रयोग हो रहा है। अतः हिंदी के पक्ष में बात की जाए तो हिंदी के प्रचार – प्रसार में सोशल मीडिया अहम भूमिका निभा रही है।
“कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ‘मेन्युअल कैसलट’ इसे मास कम्युनिकेशन के बजाय ‘मास सेल्फ कम्युनिकेशन’ का दर्जा देते हैं मतलब हम जनसंचार तो करते है लेकिन जन – स्व – संचार करते है और हमें पता नहीं होता कि हमारा यह संचार विश्व के कितने लोगों तक पहुंचेगा। इस दौर में शार्टकट लिखने के चक्कर में भाषाओं के स्वरूप को बिगाड़ने और एक नई भाषा संस्कृति को जन्म देने में भी सोशल मीडिया मुख्य भूमिका निभा रही है”5 ।
सोशल मीडिया पर हिंदी कई विधाओं में प्रयुक्त हो रही है, जैसे कि यहाँ पर कला, साहित्य, संस्कृति, संवाद, रिपोतार्ज, घटना – प्रसंग इत्यादि का जिक्र किया गया है। हिंदी के स्तर और मानक रूपों की कोई बंदिश नहीं है। भारत में सोशल मीडिया के प्रति बढ़ता क्रेज अब पारंपरिक सामाजिक रिश्तों की नई तस्वीर पेश कर रहा है। इसका प्रयोग छोटे – बड़े, अमीर – गरीब, महिला – पुरुष, सभी वर्ग के लोग कर रहें हैं। एक सर्वे के मुताबिक भारत में फेसबुक इस्तेमाल करने वालों की संख्या अमेरिका से अधिक है। यह जितना लाभदायी है, उतना ही नुकसानदेह भी।
जनसंचार के विविध माध्यमों को हम निम्न रूप में देख सकते हैं-
लिखितमाध्यम – समाचारपत्र – भाषाके विकास, प्रचार – प्रसार में समाचार पत्रों का अप्रतिम योगदान रहता है। हिंदी भाषा के प्रचार – प्रसार और विकास में हिंदी समाचार पत्रों की विशेष भूमिका रही है। हिंदी में प्रकशित पहला साप्ताहिक समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तंड’ है जिसे पण्डित जुगलकिशोर मिश्र ने 30 मई 1826 को कलकत्ता से प्रकाशित किया था। हिंदी का पहला दैनिक पत्र समाचार सुधा वर्षण (1854) भी कलकत्ता में ही प्रकशित हुआ था। उन्नीसवीं सदी में बुद्धि प्रकाश, सत्य दीप, धर्मप्रकाश, तत्वबोधनी, जन प्रकाश, कविवचन सुधा, हिंदी प्रदीप, नवभारत, पंजाब केसरी, आज, राजस्थान पत्रिका ने न केवल बीसवीं सदी में प्रकाशवान बनाए रखा बल्कि इक्कीसवीं शताब्दी में भी इनमें से कुछ पत्र अपना परचम लहरा रहें है। प्रसार संख्या की दृष्टि से हिंदी समाचार पत्र अंग्रेजी सहित अन्य सभी भारतीय भाषाओं से काफी आगे है। वर्ष 2016 – 17 में समाचार – पत्रों की कुल संख्या 48,80,89,490 थी जिसमें सबसे अधिक प्रसार संख्या हिंदी समाचार – पत्रों की थी – 28,89,75,773। इस अवधि में अंग्रेजी में प्रसार संख्या 5,24,27,005 थी। किसी एक समाचार पर की प्रसार संख्या की दृष्टि से भी हिंदी आगे है इसमें दैनिक भास्कर की प्रसार संख्या सर्वाधिक है। जबकि दूसरे स्थान पर समाचार पत्र टाइम्स ऑफ इण्डिया है जिसकी प्रसार संख्या 42,68,703 है।
पत्रिकाएँ – समाचार पत्रों की भांति पत्रिकाएँ भी समाज के विचारों और साहित्य की संवाहिका होती है। पत्रिकाओं में उत्कृष्ट साहित्य मिलता है। हिंदी पत्रकारिता स्वतंत्रता से पूर्व अत्यंत ओजपूर्ण, तेजस्विनी, निर्भय तथा राष्ट्रीय चेतना की संचारिणी रही है। भारतेंदु हरिश्चंद, अम्बिका प्रसाद व्यास, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ जैसे महान साहित्यकारों ने पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से राष्ट्रीय नवजागरण की साधना की। हिंदी पत्रिकाओं से हिंदी की कई साहित्यिक विधाओं की सुरुआत हुई है। राष्ट्रभाषा हिंदी के आन्दोलन में सरस्वती, माधुरी, विशाल भारत, सुधा, हंस, धर्मयुग, और कादम्बिनी आदि पत्रिकाओं का विशेष योगदान रहा है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती पत्रिका के माध्यम से हिंदी के अलंकारिक और परिष्कृत और व्यवस्थित रूप को साहित्य सृजन में विशेष स्थान दिया जिससे हिंदी भाषा का विकास सत्साहित्य में हुआ।
पत्रिकाओं की संख्या और प्रसार संख्या की दृष्टि से हिंदी में प्रकाशित पत्रिकाओं की संख्या अधिक है। वर्ष 2016 – 17 में 11600 पत्रिकाएँ हिंदी में प्रकशित हुई थी जिनकी कुल प्रसार संख्या 23,89,75,773 थी। जबकि अंग्रेजी में 1487 पत्रिकाएँ प्रकाशित हुई थी जिनकी प्रचार संख्या 5,65,77,000 थी। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हिंदी में प्रकाशित पत्रिकाओं ने हिदी के प्रचार – प्रसार में अपनी महतवपूर्ण भूमिका निभाई है और अभी भी केवल भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के कई देशों में भी इन पत्रिकाओं के माध्यम से हिंदी भाषा फलफूल रही है।
श्रव्यमाध्यम –
जनसंचार के माध्यमों में भारत में रेडियो का अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट स्थान रहा है। लेनिन ने कहा था कि “रेडियो बिना कागज़ और बिना दूरी का समाचार पत्र है। डॉ। अर्जुन तिवारी ने लिखा है कि “भारतीय आर्षग्रंथों में नाद ब्रम्हां और शब्द ब्रहम का उल्लेख मिलता है। वेदों में वर्णित है कि ध्वनि से सृष्टि की रचना हुई। ध्वनि में ही ब्रम्हांड का विस्तार होता है तथा ध्वनि में ही वह विलीन हो जाता है।
ध्वनि और शब्द के सामंजस्य का सर्वोत्तम माध्यम रेडियो है। रेडियो मौखिक परंपरा का एक आधुनिक रूप है। भारत में रेडियो का आगमन 23 जुलाई 1927 को ‘हुआ जिसका उद्घाटन इन्डियन ब्राडकास्टिंग कंपनी’ के नाम से तत्कालीन वायसराय ‘लार्ड इरविन’ ने किया है। इसके कुछ बर्ष के उपरांत जब ‘सरदार वल्लभभाई पटेल’ भारत के सूचना और प्रसारण मंत्री बने तो उन्होंने ने केवल रेडियो पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों की अवधि बधाई बल्कि सभी क्षेत्रीय बोलियों कोभी कार्यक्रम रेडियो पर प्रसारित करवाए जिसके कारण ने केवल हिंदी भाषा अपितु क्षेत्रीय बोलियों का भी विकास हुआ और रोजगार के नए मार्ग भी प्रशस्त हुए।
विविध भारती पर प्रसारित कार्यक्रमों की लोकप्रियता निर्विवाद है। भारत सरकार गाँवों का का देश है और यहाँ की अधिकांश जनता ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है जहाँ पर आज भी रेडियो संचार का प्रमुख माध्यम है। रेडियो के माध्यम से हिंदी तथा क्षेत्रीय बोलियों में कार्यक्रम प्रसारित होते है। रेडियो पर प्रसारित कार्यक्रमों के माध्यम से हिंदी का मानक और अखिल भारतीय स्वरुप भी विकसित होता है। इस प्रकार हम कह सकते है कि रेडियो ही लोकतंत्र का संबल और विश्व में विचारों के सम्प्रेषण का एक श्रेष्ठ माध्यम है।
दृश्यश्रव्यमाध्यम –
भारत में टेलिविजन का आगमन 1964 में विक्रम साराभाई के प्रयास से हुआ। आधुनिक संचार क्रान्ति में टेलिविजन की भूमिका अत्यंत महतवपूर्ण है। टेलिविजन किसी राष्ट्र की प्रगति का प्रमाणिक व्याख्याता होता है और राष्ट्र के स्वरुप का दर्पण भी होता है। विगत 10 वर्षों में टेलिविजन ने हमारे जीवन की दिशा बदल दी है। टेलिविजन में प्रसारित कार्यक्रमों के यों तो हर भाषा के दर्शक है परन्तु हिंदी का स्थान उनमें अग्रणी हैं। हिंदी के कार्यक्रम न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी देखें जाते है। आज सामान्यत: 872 से अधिक चैनल है जिनमें से 264 के भी ज्यादा केवल हिंदी के है और कई अहिन्दी चैनलों पर भी हिंदी के कार्यक्रम दिखाए जाते हैं।
मनोरंजक चैनलों के अलावा समाचार आधारित चैनलों की भी बाढ़ सी आ गई है। देश में 24 से अधिक चैनल 24 घंटों में हिंदी भाषा में ही समाचार प्रस्तुत करते है। इससे हिंदी के विकास और प्रचार प्रसार में टेलिविजन का महत्वपूर्ण योगदान सिद्ध होता है। टेलिविजन चैनलों पर प्रसारित कार्यक्रमों में प्रयुक्त भाषा के स्वरूप पर विचार करने पता चलता है कि जहाँ भाषा की स्वरूपगत विशेषताएं सभी में सामान हैं वहीँ कुछ कार्यक्रम और चैनल विशेष पर भिन्नता भी दृष्टिगोचर होती है। चाहे धारावाहिकों के संवाद की भाषा हो या फिर समाचारों की भाषा हो उनमें हिंदी का नया स्वरूप देखने को मिलता है। टेलिविजन पर प्रसारित इन कार्यक्रमों में हिंदी का जो रूप देखने को मिलता है वह वस्तुतः आधुनिक शिक्षित वर्ग के शहरी परिवेश की हिंदी के रूप को प्रस्तुत करता है। संवादों के माध्यम से अखिल भारतीय स्तर पर विकासमान होती आधुनिक हिंदी की झलक मिलती है।
कम्प्यूटर –
बीसवीं शताब्दी की सबसे क्रांतिकारी और महत्वपूर्ण उपलब्धि है – कम्प्यूटर। कप्यूटर का सबसे पहले विकास और प्रयोग 1944 में हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध में एटमबम की संबंधित गणनाओं के लिए कंप्यूटर का प्रयोग किया गया और शब्द संसाधनों के लिए अनुसंधान कार्य जोर-शोर से शुरू किए जाने लगे। बीसवीं सदी के नवें दशक में व्यक्तिगत कंप्यूटर के निर्माण से कंप्यूटर के क्षेत्र में एक ऊंची छलांग लगी और इसके साथ विभिन्न भाषाओं के सॉफ्टवेयरों का विकास शुरू हुआ। हिंदी भाषा के भी डास परिवेश में – सुलेख, शब्दरत्न, अक्षर, शब्दमाला जैसे सॉफ्टवेयर विकसित किए गए। किन्तु डास परिवेश में काम करने वालों की अपनी अलग सीमाएं थी। जैसे ही विंडोज का आगमन हुआ कंप्यूटर पर कार्य करने के अनंत द्वार खुल गए। हिंदी के अनेक प्रकार के फॉन्ट आ गए, जो अंग्रेजी के लोकप्रिय सॉफ्टवेयरों में यथा एम।एस वर्ड, एक्सल, पी। पी। टी आदि के साथ अंग्रेजी के साथ सम्मिलित हो गए, अब इनमें हिंदी भाषा में कार्य करना अत्यंत सरल हो गया है।
कंप्यूटर के माध्यम से हिंदी का प्रयोग बढाने में उनके सॉफ्टवेयरों की विशेष भूमिका रही है जो कंप्यूटर की सहायता से टेलीविजन पर दूसरी भाषाओं के प्रसारित कार्यक्रमों में उपशीर्षक हिंदी में देने के लिए उपयोग में लाए जाते हैं। इंटेरनेट के आ जाने से तो सम्पूर्ण विश्व एक छोटे से गाँव में तब्दील हो गया है। दुनिया भर में हिंदी भाषा जानने वालों के लिए इंटरनेट पर हिंदी में बनी बेबसाइटों की उपलब्धता उनके लिए विश्वज्ञान के द्वार बन कर सामने आई है अनेक बेबसाईट हिंदी में उपलब्ध है जिससे हिंदी के प्रचार – प्रसार और विकास को बल मिला है।हिंदी में इमेल भेजने की सुविधा को हम भाषाई कंप्यूटर विकास के क्षेत्र में एक अनुपम उपलब्धि के रूप में देख सकते हैं।
इस प्रकार हम यह स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि जनसंचार के क्षेत्र में हिंदी स्वंत्रता प्राप्ति के पहले पूर्व अपना वर्चस्व स्थापित कर चुकी थी। जनसंचार के विविध माध्यमों के द्वारा आज भी हिंदी सूचे विश्व में बोली और समझी जा रही है।
तकनीकऔरहिंदी–
आधुनिक तकनीकी के क्षेत्र में हिंदी ने अपनी उपस्थिति दृढ़तापूर्वक जब्त कराई है। कम्पूटर के आगमन के साथ ही उस पर हिंदी के प्रयोग को लेकर भी चुनौती उपस्थित हुई । जिसका हिंदी जगत में अच्छी तरह से सामना किया। “हिंदी में सर्वप्रथम कम्पूटर के सन्दर्भ में ही शब्द संसाधन का कार्य प्रारंभ हुआ। यह भाषा संसाधन का आरंभिक सोपान है। किन्तु आरंभिक चरण में रोमन लिपि के माध्यम से ही हिंदी पाठों का कुंजीयन किया जाता था।अब भारत और विदेशों में शब्द संसाधन के अनेक पॅकेज विकसित किए गए है, जिनमें हिंदी में द्विभाषिक रूप से या फिर बहुभाषिक रूप में विभिन्न भारतीय भाषाओं के माध्यम से शब्द संसाधन के कार्य किए जा सकते हैं। इनमें प्रमुख हैं – अक्षर, मल्टीवर्ड, शब्दमाला, शब्दरतन, बाइस्क्रिप्ट, आलेख, भारती ए। एल। पी। आदि पैकेजों में से कुछ में वे तमाम सुविधाएं भी उपलब्ध है जो ‘वर्डस्टार’, वर्ड परफेक्ट माइक्रोसॉफ्ट, जैसे अधुनातन वर्ड प्रोसेसिंग पैकेजों में सुलभ है। किन्तु मात्र शब्द संसाधन से किसी भी भाषा में कंप्यूटर संबंधी महत्वपूर्ण अनुप्रयोगों को संपन्न नहीं किया जा सकता इसलिए भारत सरकार के राजभाषा विभाग ने केन्द्रीय सरकारी कार्यालयों के सन्दर्भ में कंप्यूटर संबंधी भाषा नीति की घोषणा करते हुए स्पष्ट कर दिया था कि किसी भी कंप्यूटर को तभी द्विभाषी मन जाएगा, जब उसमे शब्द संसाधन के साथ – साथ डाटा संसाधन की सुविधा भी हिंदी – अंग्रेजी में, अर्थात द्विभाषिक रूप में उपलब्ध होगी।” 6
डाटा – संबंधी कार्य हिंदी में संपन्न करने के लिए दो विकल्प उपलब्ध है। हार्डवेयर विकल्प और सॉफ्टवेयर विकल्प। जहाँ तक हार्डवेयर विकल्प का सम्बन्ध है, इस दिशा में आई। आई। टी। कानपुर का प्रयास विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनके द्वारा विकसित यह प्रणाली जिस्ट (गेआफिक एंड इंटेलीजेंस बेस्ड स्क्रिप्ट टेकनोलॉजी) प्रोद्योगिकी के रूप में प्रसिद्ध है। इस पर आधारित विभिन्न अनुप्रयोगों के विकास का दायित्व भारत सरकार के सी- डैक नामक संस्थान को सौप गया है।जिसमें परम सुपर कंप्यूटर का विकास भी किया। सी। डैक ( सेंटर पर डेवलपमेंट आफ एडवांस कम्प्यूटिंग) पुणे, महाराष्ट्र में स्थित है। जिस्ट प्रौद्यिगिकी के अंतर्गत पर्सनल कंप्यूटर के मदर बोर्ड पर एक ‘प्लग इन कार्ड’ लगा दिया जाता है। इसी कार्ड को जिस्ट कार्ड कहा जाता है। इस कार्ड की सहायता से आई। बी। एम। पी। सी। कंप्यूटरों पर शब्द संसाधन तथा डाटा – संसाधन के लिए प्रचलित रोमन के सभी पैकेजों का प्रयोग द्विभाषिक या बहुभाषिक रूप में किया जा सकता है। यूनिक्सजेनिक्स परिचालन प्रणालियों के लिए ‘जिस्ट कार्ड’ के बजाय ‘जिस्ट टर्मिनल की आवश्यकता होती है। जिस्ट प्रोद्योगिकी के अनार्गत यह सुविधा सभी भारतीय भाषाओं में सुलभ है और अब यह फारसी, अर्बे, सिंहली, तिब्बती और रूसी लिपि में भी उपलब्ध हो गई है।
इसके विपरीत सॉफ्टवेयर विकल्प के अंतर्गत कंप्यूटर में किसी भी प्रकार के परिवर्तन की आवश्यकता नही होती, ये पॅकेज फ्लापी डिस्क के रूप में उपलब्ध होते हैं। उए पॅकेज दो प्रकार के होते हैं। पहला समर्पित सौफ्टवेयर प्रोग्राम दूसरा सामान्य उद्देश्यीय सौफ्टवेयर परिवेश, समर्पित सौफ्टवेयर प्रोग्राम के अंतर्गत हिंदी में डाटा – संसाधन का एक सॉफ्टवेयर है – ‘देवबेस’( द्विभाषी डाटा बेस प्रबंध प्रणाली) यह सॉफ्टवेयर ही बेस-3 प्लस के अंतर्गत हिंदी में काम करने के लिए यह एक अच्छा पैकेज है। लेकिन जी बेस के संशोधित पॅकेज ( डी – बेस4 ) में हिंदी में काम करने के लिए इसमें संशोधन की आवश्यकता होगी।
सामान्य उद्देश्यीय सॉफ्टवेयर परिवेश के अंतर्गत रोमन लिपि के सभी सॉफ्टवेयर पैकेजों ( जैसे डी। बेस, लोटस, साफ्ट बेस, क्लिपर, फाक्सप्रो, औरेकल आदि।) में हिंदी हिंदी में कार्य किया जा सकता है, उसके अलावा यह परिवेश बेसिक, कोबाल, सी पास्कल आदि प्रोग्रामिंग भाषाओं में तैयार किए प्रोग्रामों में भी हिंदी को आंतरिक क्षमता प्रदान करता है। वस्तुतः यह परिवेश जिस्ट के ही समकक्ष है। जो कार्य जिस्ट के माध्यम से हिंदी में किए जाते है, वें सभी कार्य विकल्प के रूप में इस परिवेश के अंतर्गत भी किए जा सकते हैं। आर। के रिसर्च फाउंडेशन द्वारा विकसित ‘सुलिपि’ नामक यह साफ्टवेयर जिस्ट के सामान ही सामान्य उद्देशीय साफ्टवेयर है, जिसके माध्यम से एम। एस। डास पर आधारित पर्सनल कंप्यूटर पर कार्यालय स्वचालन (आफिस आटोमेशन ) अंग्रेजी में साथ – साथ किए जा सकते हैं। जिस्ट व सुलिपि, दोनों के अंतर्गत भारतीय भाषाओं में परस्पर लिप्यांतरण की सुविधा मौजूद है, किन्तु सुलिपि में यह सुविधा हिंदी, पंजाबी, बँगला और गुजराती तक ही सीमित है, जबकि जिस्ट में यह सुविधा सभी भारतीय भाषाओं में सुलभ है।
इसी प्रकार यदि हम हिंदी भाषा की वैज्ञानिकता पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि हिन्दी एक वैज्ञानिक भाषा है|भाषा विज्ञान की दृष्टि से हिन्दी को संगणकीय प्रौगरैमिंग की भाषा बनना अत्यन्त सरल है किन्तु इस दिशा में पर्याप्त काम नही हुआ है| भारत सरकार के राजभाषा विभाग ने हन्दी प्रवाह नाम का सॉप्टवेयर तैयार किया है|
हिदी प्रवाह का भाव पक्ष जितना सबल है, तकनीकी पक्ष भी उतना ही मजबूत है|इस पाठ्यक्रम को भी “लीला पैकेज” प्रबोध, प्रवीण एवं प्राज्ञ की भाँति अंग्रेजी के अलावा 14 भारतीय भाषाओं क्रमश: असमिया, बोडो, बांग्ला, गुजराती, कन्नड, कश्मीरी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, तमिल एवं तेलुगू के माध्यम से जनसाधारण तक ऑनलाइन वेबवर्जन एवं मोबाइल ऐप के रुप में उपलब्ध कराया गया है|
“लीला हिंदी प्रवाह” के वेबवर्जन एवं मोबाइल एवं मोबाइल ऐप में पाठों सें संबंधित शब्दों को समझने एवं समझाने के लिए बृहत शब्दावली का व्यवस्था भी की गई है| इस बृहत शब्दावली में पाठों में सम्मिलित शब्दों के अर्थ यूज़र द्वारा चयनित भाषा, में वर्णक्ररमानुसार दिए गए हैं| इस भाग की विशेषता यह है कि इसमें शब्दों के उच्चारण के साथ-साथ रिकॉर्ड की सुविधा भी उपलब्ध करवाई गई है| यूज़र पाठ में आए शब्दों का अर्थ अपनी भाषा में देखने एवं जानने के अलावा हिंदी में उनका उच्चारण सुनने के बाद स्वयं उस शब्द को बोलकर रिकॉर्ड कर सकते है और फिर मूल शब्द एवं स्वंय व्दारा रिकॉर्ड किए हुए शब्द को एक के बाद एक सुनकर उच्चारण संबंधी अपनी कमियों को दूर कर सकते है| यूज़र, अपनी सुविधा के अनुसार जब चाहे, जितना चाहें और जितनी बार चाहें, इस पाठ्यक्रम को पढ़ सकते हैं|
इसी क्षेत्र में माइक्रोसॉफ्ट और गूगल ने कुछ सुविधाएं प्रदान की हैं-
(a)माइक्रोसॉफ्ट और गूगल के इंडिक कीबोर्ड (आईएमई) ऐसे ही दो टूल हैं जिनकी मदद से आप बिना किसी खर्च और प्रशिक्षण के कम्प्युटर पर आसानी से टाईपिंग कर सकते हैं और ये आपके सिस्टम पर केवल कुछ सेकंड में इंस्टॉल हो जाते हैं| माइक्रोसॉफ्ट का इंडिक लैंग्वेज इनपुट टूल इसकी तीन सुविधाओं की वजह से बेजोड़ है|
(b) गूगल पर उपलब्ध “ट्रांसलेट” एक अच्छा विकल्प है| यह विविध भाषाओं में अनुवाद हेतु ऑनलाइन सुविधा है और इसके लिए हमें www।translate।google।co।inपर विज़िट करना होता है| वर्तमान में हम गूगल अनुवाद पर उपलब्ध “गूगल टूलकिट” नामक सुविधा पर चर्चा करते हैं| गूगल अनुवादक टूलकिट 8 जून, 2009 में गूगल इंक व्दारा जारी किया गया था|
शब्दकोश
(a) ऑनलाइन शब्दकोश के तहत www।shabdkosh।comएक उपयोगी वेबसाइट है जो हिंदी के अतिरिक्त बांग्ला, गूजराती, कन्नड, मलयालम, तमिल, तेलगू, पंजाबी, मराठी जैसी नौ भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी शब्दों के अर्थ उपलब्ध कराती है|
(b)ई-महाशब्दकोश राजभाषा विभाग व्दारा प्रस्तुत एक ऑनलाइन शब्दकोश है जिसका विकास प्रगत संगणक विकास केंद्र (C-DAC)के व्दारा किया गया है जो कि एक व्दिभाषी- व्दिआयामी उच्चारण शब्दकोश है|
वैज्ञानिकएवंतकनीकीशब्दावलीआयोगकाई–शब्दकोश
(a)वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग की स्थापना सन् 1961 को की गई थी| यह आयोग हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के लिएवैज्ञानिकी एवं तकनीकी शब्दावली का निर्माण एवं समन्वय कार्य के अलावा तकनिकी शब्दावली, पारिभाषिक शब्दावली तथा एन्साइक्लोपीडिया का निर्माण करता है|
(b) हाल ही आयोग अपनी वेबसाइट पर ऑनलाइल परिभाषिक शब्दावली की सुविधा भी प्रारंभ की है|
हिंदी विश्व की एक विशाल जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करती है | अत: ऐसे में हमारे यह उत्तरदायित्व अत्यधिक बढ़ जाता है कि हम इसे तकनीक विकास का लाभ देते हुए विश्व की अग्रनी भाषाओं की श्रेणी में स्थापित करने का प्रयास करें|
सूचना प्रौद्योगिकी कम्प्यूटर पर आधारित सूचना प्रणाली का आधार है| सूचना प्रौद्योगिकी, वर्तमान समय में वाणिज्य और व्यापार का अभिन्न अंग बन गयी है| संचार क्रन्ति के फलस्वरुप अब इलेक्ट्रॉनिक संचार को भी सूचना प्रौद्योगिकी का एक प्रमुख घटक माना जाने लगा है| एक उद्योग के तौर पर यह एक उभरता हुआ क्षेत्र है| इसने विश्व की विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं को जोड़कर अक वैश्विक अर्थव्यवस्था को जन्म दिया है| यह नवीन अर्थव्यवस्था अधिकाधिक रुप से सूचना के रचनात्मक व्यवस्था एवं वितरण पर निर्भर है| इसके कारण व्यापार और वाणिज्य में सूचना का महत्व अत्यधिक बढ़ गया है| इसीलिए इस अर्थव्यवस्था को तूचना अर्थव्यवस्था (Information Economy) या ज्ञान अर्थव्यवस्था (knowledge Economy) भी कहा जाने लगा है|
हिन्दीसिनेमा –
हिन्दी सिनेमा की समाज में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है|भारतीय फिल्म निर्माता-निर्देशकों ने अपनी बेहतर प्रस्तुतीकरण से हिंदी सिनेमा को शिखर पर पहुँचा दिया है| विश्व में सबसे ज्यादा आज हिंदी भाषा में फिल्मों का निर्माण होता है| हिंदी सिनेमा उद्योग ने भारत में ही नहीं विदेशों में भी अपना एक नजदीकी रिश्ता कायम किया है। देश-दुनिया में हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में हिंदी सिनेमा का अहम योगदान है| स्पीलबर्ग की फिल्म जुरासिक पार्क ने भारत मे जितना धन अपने हिंदी संस्करण से अर्जित किया वह इसके अंग्रेजी के मूल फिल्म से दो गुना अधिक था| हिंदी भाषा बाजार और मुनाफे की कुंजी बन रही है| आज हॉलीवूड की फिल्म निर्माता भी भारत में अपनी विपणन नीति बदल चुके है| उन्हें पता है की उनकी फिल्में हिंदी में रुपांतरित होने के बाद मूल अंग्रेजी में प्रदर्शित फिल्म से कही अधिक मुनाफा कमा सकती है| पश्चिमी फिल्मों की ब्लॉकस्टर फिल्मों के हिंदी संस्करण की हमारे देश में जितनी खपत होती है वह अंग्रेजी संस्करण की संख्या से अधिक है| भारतीय हिंदी सिनेमा का हिंदी भाषा की व़्यापक लोकप्रियता और इसे संप्रेषण के माध्यम के रुप में आम स्वीकृती दिलाने में अहम योगदान है|हिंदी में बनी फिल्में हिंदी भाषी नागरिकों से ज्यादा अहिन्दी भाषी नागरिकों द्वारा देखी जाती है। हिंदी भाषा के प्रचार – प्रसार में हिंदी सिनेमा के योगदान के विषय में विचार करते हुए दयानंद अवस्थी ने लिखा है कि, “भारतीय हिन्दी सिनेमा को लगभग 106 वर्ष हो गए हैं इस पूरे शतकीय दौर में न जाने कितने विषय आए और कितने विषय गए किन्तु माध्यम का भाषायी ताना बाना हिन्दी भाषा के इर्द गिर्द बुना रहा है। आज हिन्दी भाषा विश्व की चौथी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है, इथेनोलोग मार्च 2019 के 22वें संस्करण के अनुसार विश्व की दस प्रमुख भाषाओं में (अधिक जनसंख्या के द्वारा बोली जाने वाली भाषा के अनुसार) चीन की मंदारिन प्रथम, स्पेन की स्पेनिश द्वितीय, ब्रिटेन की अंग्रेजी तृतीय तथा भारत की हिन्दी चतुर्थ स्थान पर है हालांकि क्रमश: पांचवें एवं दसवें स्थान पर भी भारतीय भाषा बंगाली एवं मराठी ही है जिन्होने हिन्दी भाषा के प्रसार पर खूब मदद की है । आज संचार माध्यमों सोशल मीडिया,टेलीविज़न के धारावाहिकों मोबाइल के वेब धारावाहिकों आदि के तीव्र विकास नें इस प्रसार को और अत्यधिक गति दे दी है । ”हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं कि भूमंडलीकरण ने भारतीय जीवन को गहरे में जाकर प्रभावित किया है लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हिंदी खत्म हो जाएगी और अंग्रेजी उसका स्थान ग्रहण कर लेगी । वो कहते हैं“भारत की 54 फीसदी आबादी 25 साल से कम उम्र के नौजवानों की है और भूमंडलीकरण ने उसकी आकांक्षाएं और चिंताएं बदली हैं। सूचना और आभासी दुनिया की नागरिकता के धरातल पर किसी कस्बे या महानगर के युवा में ज्यादा फर्क नहीं है। दोनों एक वर्चुअल वर्ल्ड में जी रहे हैं और रियल टाइम में चैट कर रहे हैं।” इसका जीता जागता उदाहरण है टी वी में दिखाये जाने वाले विभिन्न प्रतिस्पर्धात्मक धारावाहिकों, रियालिटी शो जैसे नृत्य अथवा गायन में समान रूप पूरे भारत के कोने कोने से प्रतिभागियों का अपनी काला कौशल का प्रदर्शन ।
यह संभवत: हिन्दी भाषा के प्रसार का स्वर्णकाल कहा जाएगा जब मनोरंजन के माध्यम से भाषा नें अपनी जड़ें वैश्विक रूप में जमाई है इसमें हिन्दी फिल्मों का योगदान सर्वोपरि माना जाएगा। शायर और गीतकार गुलज़ार ने 8 वें विश्व हिंदी सम्मेलन के तहत ‘हिन्दी के प्रचार प्रसार में हिन्दी फिल्मों की भूमिका’ सत्र की अध्यक्षता करते हुए यह टिप्पणी की थी कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार में फिल्मों ने साहित्य अकादमियों और नेशनल बुक ट्रस्ट से ज्यादा योगदान दिया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि सिनेमा, मीडिया और हिन्दी का नाता बहुत पुराना है। जैसे हिन्दी हिन्दुस्तान की जान है, वैसे ही हिन्दुस्तान में हिन्दी के बगैर सिनेमा और मीडिया की कल्पना ही नहीं की जा सकती। हिन्दी के प्रचार-प्रसार में सिनेमा और मीडिया का योगदान बहुत ही अतुल्य रहा है।हिन्दीतर भाषी क्षेत्रों में सिनेमा और मीडिया ने हिन्दी को जीवनदान दिया है।आज आप भारत के किसी भी कोनें में पहुँच जाएँ वे हिन्दी इसलिए समझ पाते हैं कि उन्होने उसे फिल्मों अथवा अन्य मनोरंजन के माध्यम से देखा व सुना है आज विदेशियों को यदि अपना प्रचार करना होता है, चाहे वह सिनेमा का हो चाहे उनके उद्योग का हो, उन्हें हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी का सहारा लेना ही पड़ता है,भारत में सिनेमा का श्रीगणेश दादा साहब फाल्के द्वारा 1912 में निर्मित और 1913 में प्रदर्शित रजा हरिश्चंद फ़िल्म से माना जाता है। इसके उपरांत प्रथम वाक फ़िल्म आलामारा का निर्माण 1931 में हुआ था तब से लेकर आज तक भारत में असंख्य फिल्मों का निर्माण हो चुका है। जन सामान्य में हिंदी को लोकप्रिय बनाने का महत्वपूर्ण योगदान हिंदी सिनेमा को दिया जा सकता है। भारत में अपनी शैशवावस्था से ही हिंदी के विकास और प्रसार में फिल्मों ने अहम् भूमिका अदा की हैं। सन 1931 में 27 फिल्में बनी थी जिनमें से 22 फिल्में हिंदी में बनी थी। भारत में प्रतिवर्ष 1000 फिल्में बनती हैं जिनमें से सबसे अधिक संख्या हिंदी फिल्मों की होती है। हिंदी फिल्मों भाषा में उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक प्रचलित विभिन्न भाषाओं – बोलियों के शब्द सहज रूप से मिलते हैं अधिकांश हिंदी फिल्मों का निर्माण अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में होता है जो हिंदी के व्यापक प्रचार और उसकी लोकप्रियता को सिद्ध करता है। यदि हम हिंदी सिनेमा के साथ – साथ टेलिविजन की बात करें तो हिंदी के प्रचार – प्रसार में टी। वी पर प्रसारित किए जाने वाले धारावाहिक अपने महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहें है। शहरों से लेकर छोटे गांवों तक के लोग जो कि वहां बोली जाने वाली क्षेत्रीय बोली से ही परिचित थे अब उन्हें हिंदी का ज्ञान भी हो गया है। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि हिंदी सिनेमा का हिंदी भाषा के प्रचार – प्रसार में अत्याधिक योगदान है।
निष्कर्ष
सारांश यह है कि स्वाधीन भारत में लगातार हिंदी भाषा का विकास हो रहा है। वह सभी क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है।हिंदी अब भारतीय उपमहाद्वीप में संपर्क भाषा बन गई है।वह राजभाषा होने के कारण शासन, विधि, विज्ञान और तकनीक सभी क्षेत्रों में प्रयुक्त हो रही है । वह जनसंचार माध्यमों की प्रमुख भाषा बन कर उभरी है।आज हिंदी सिनेमा हजारों करोड़ का व्यापार कर रहा है। अतः हम कह सकते हैं की हिंदी सिनेमा और मीडिया के क्षेत्र में सबसे लोकप्रिय और उपयोगी भाषा बन गई है। संक्षेप में हिंदी उन तमाम क्षेत्रों में प्रयुक्त होने के कारण लगातार विकसित और समृद्ध हो रही है। आज उसका वैश्विक विस्तार बेहद आश्वस्तिकारक है।
संदर्भ सूची
भाषा पत्रिका (द्वैमासिक ), मार्च – अप्रैल 2021, वर्ष -60, अंक -2, पृष्ठ संख्या – 14 -15
वही पृष्ठ संख्या – 10
प्रौद्योगिकी बैंकिंग और हिंदी, पृष्ठ संख्या- 101 , रमेश यादव
वही.
वही.
भाषा : राष्ट्रभाषा और राजभाषा हिंदी, डॉ. डी. सत्यलता, पृष्ठ संख्या 236
वही.
साहित्य सिनेमा सेतु पत्रिका ( रील से रियल तक ) ISSN : 2584-0819, लेख – ‘ हिंदी सिनेमा में हिंदी का बदलता स्वरुप’
सहायक प्राध्यापक, रामजस महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय
ई-मेल- satendrashukla@ramjas.du.ac.in
सारांश
प्रस्तुत शोध आलेख “भारतीय लोकनाट्य में बिदेसिया का प्रदेय” में बिदेसिया नाटक से सम्बंधित विभिन्न आयामों जैसे बिदेसिया की उत्पत्ति, पलायन, रोजगार, और रंगमंच पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है। जब हम बिदेसिया नाटक पर गौर करते हैं तो हम यह देखते हैं कि लोक जनमानस में प्रेम का इजहार एवं विरह की शिकायत कहीं मिलती है तो वह बिदेसिया में ही मिलती है। बिदेसिया सिर्फ एक नाटक न होकर एक लोकगीत है जो आम जनमानस को स्वयं में पिरोए हुए है और जिसे आम जनमानस स्वयं में पिरोए हुए हैं। बिदेसिया और आम जनमानस को लेकर हम निश्चित रूप में यह कह सकते हैं कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।
बीज शब्द:बिदेसिया, लोकनाट्य, लोकजीवन, सामाजिक, सांस्कृतिक, गाँव
शोध प्रविधि:प्रस्तुत आलेख में विभिन्न द्वितीयक स्रोतों का प्रयोग किया गया है। जिनमें विभिन्न पुस्तकें , अखबार, व पत्रिकाएँ शामिल हैं।
शोध आलेख
जब भी बात बिदेसिया की होती है तो हमारे मन मस्तिष्क में एक छायाचित्र कौंध उठता है और वह छायाचित्र होता है बिदेस (प्रदेश ,अपने मूल निवास से कहीं सुदूर जाकर अस्थायी रूप से बसने वाला स्थान) का। भारतीय लोकनाट्य में भिखारी ठाकुर ने अपनी रचना बिदेसिया के माध्यम से जो कौतुहल पैदा किया है वह अद्वितीय है। इसमें सबसे मूल बात यह है कि यह नाटक भोजपुरी भाषा में लिखा गया। जिससे एक भाषा को सम्मान पूर्वक आगे बढ़ने और प्रतिष्ठित होने का अवसर मिला। बिदेसिया नाटक हमें यह बताता है कि कैसे पति के बिदेस (प्रदेश) चले जाने पर उसकी पत्नी विरह में व्याकुल रहती है और उसे यह आशंका होती है कि उसके पति किसी रण्डी (अन्य स्त्री) के रूप माया जाल में फँस गए हैं तथा अपने गाँव वापस नहीं आ रहे हैं। अपनी इस व्यथा को वह अपनी सखी से विभिन्न लोकगीतों के माध्यम से कहती है। भिखारी ठाकुर का बिदेसिया इसी कथा के इर्द गिर्द घूमता रहता है।
लोकजीवन से संबंधित सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं तथा प्रवृत्ति का निरूपण लोकनाट्यों में होता है। विशेष बात यह रहती है कि लोकनाट्य में संवाद तत्त्व की प्रधानता रहती है और चरित्र चित्रण को अपेक्षाकृत गौण स्थान प्रदान किया जाता है। लोकनाट्य में नृत्य और संगीत के साथ-साथ शारीरिक हाव-भाव एवं भंगिमाओं पर ध्यान दिया जाता है। यह भी देखा जाता है कि संवाद अधिकांशतः काव्यात्मक हो। लोक संगीत तथा विविध वाद्ययंत्रों जैसे हारमोनियम, ढोलक, नगाड़ा, सारंगी, बासुरी आदि की सहायता से संवादों को अधिक प्रभावशाली बनाने का प्रयत्न किया जाता है।
लोकनाट्यों को प्रभावशाली और मनोरंजक बनाने के लिए विदूषक की व्यवस्था की जाती है, जो प्राय: पेटू व्यक्ति होता है अथवा जिसकी शारीरिक बनावट कुछ विचित्र की होती है। उसकी वेशभूषा चाल-ढाल आदि इस प्रकार की रखी जाती है कि दर्शक को हँसने के लिए विवश होना पड़ता है। विदूषक से कई के मानक में घुली-मिली प्रमुख समस्या को प्रस्तुत करने में सहायक का काम भी लिया जाता है। यह मुख्य पात्र अथवा नायक के आस-पास रह कर उसके घर को समझने में सहायता तो करता ही है, लोकनाट्य द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले के विविध स्तरों को सामने लाता है। उसके अपने चरित्र में हास्य और व्यंग्य का विलक्षण समावेश होता है।
‘बिदेसिया’ बिहार का सर्वाधिक लोकप्रिय लोकनाट्य है। इसके रचयिता भोजपुरी लोकनाट्य परम्परा के महानायक “भिखारी ठाकुर” हैं। “बिदेसिया’ लोकनाट्य की रचना सन् 1914 में हुई। लोक- चितेरे भिखारी ठाकुर की बिदेसिया भोजपुरी समाज व संस्कृति का जीवन प्रतीक है। इसकी भाषा शुद्ध भोजपुरी है और शैली की दृष्टि से यह गीति काव्य है। भिखारी ठाकुर कृत बिदेसिया पर गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। ‘बिदेसिया’ लोकनाटक में तत्कालीन समाज की विशेषताओं को रेखांकित करने के साथ ही वहाँ के ज्वलंत समस्याओं को नाट्य रूप में अद्भुत किया गया है। नवविवाहिता पत्नी को छोड़ कर पति के ‘पलायन’ एवं उससे आने वाली एकाकीपन का दंश बिदेसिया की केन्द्रीय समस्या है। इसके साथ ही भिखारी ठाकुर ने इस लोकनाटक में लोक पक्ष को प्रतीकात्मक शैली में ‘जीव,ब्रह्म,गुरु और माया’ के स्वरूप में प्रस्तुत करते हैं।
बिदेसिया में मुख्य चार पात्र है- विदेशी, प्यारी सुंदरी, बटोही और रखेलिन(रंडी)। यहाँ विदेशी जीव का प्रतीक है, प्यारी सुन्दरी ब्रह्म का ,बटोही गुरु का एवं रखेलिन माया का प्रतीक है। विदेशी एक पुरुष पात्र है, जो अपनी नवविवाहितता प्यारी सुन्दरी के न चाहते हुए भी उसे बहला कर छुप-छुपाकर धनोपार्जन के निर्मित कलकत्ता चला जाता है। बिदेसिया जिस समय की रचना है उस समय कृषि कार्य के अभाव में गाँव के बेरोजगार युवक घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए रोटी रोजगार के लिए कलकत्ता, असम आदि राज्यों में पलायन करते थे। आज भी पलायन की यह समस्या क्षेत्रीय एवं वैश्विक स्तर पर व्यापक है। इस संदर्भ में बिदेशिया लोकनाटक अत्यंत प्रासंगिक है। कहा जाता है कि बिदेसिया की उत्पत्ति उत्तर प्रदेश के कुतुबपुर गाँव से हुई थी। जो लोग गाँव छोड़कर शहर जाते थे, उन्हें बिदेसिया के नाम से जाना जाता था। ऐसे ही एक व्यक्ति थे, भिखारी ठाकुर। वह एक प्रसिद्ध लोक कलाकार और नाटककार थे। ठाकुर अनपढ़ थे फिर भी उन्होंने खुद से तुलसीदास द्वारा लिखित रामचरितमानस को पढ़ना और याद करना सीखा, इसलिए वह उन्हें अपना साहित्यिक गुरु मानते थे। उन्हें भोजपुरी का शेक्सपियर कहा जाता था। ठाकुर ने बिदेसिया सहित बारह नाटक और बहुत सारे गीत लिखे हैं। ठाकुर ने अपने नाटकों और गीतों में महिलाओं, निम्न जाति के लोगों और गाँवों में रहने वाले गरीब लोगों से संबंधित सामाजिक मुद्दों को उठाया। उन्होंने अपने नाटकों में भी अभिनय किया और अपने समय की विभिन्न प्रस्तुतियों का निर्देशन किया था। बिदेसिया की यह कला शैली हिंदू जाति प्रथा की तथाकथित निचली जाति से संबंधित था। इस कला शैली का सार समाज की बुराइयों पर प्रकाश डालना है और इसलिए इसमें पोशाक को कम महत्व दिया जाता है। प्रदर्शन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिकाएँ सूत्रधार (कथावाचक) और समाजी (संगीतकारों) की होती है। बिदेसिया एक प्रसिद्ध नाटक है जो देशपरिवर्तन की समस्या और पीछे रह गई महिलाओं पर इसके प्रभाव की ओर ध्यान आकर्षित करता है।
भोजपुरी भाषा के शेक्सपियर के रूप में पहचान रखने वाले, लोक नाट्यकार भिखारी ठाकुर एक विशिष्ट रंगकर्मी होने के साथ-साथ स्त्री-विमर्श एवं दलित-विमर्श के रचनाकर और एक संवेदनशील कलाकार के रूप में भी प्रतिष्ठित नाम हैं। भिखारी ठाकुर का जन्म 18 दिसंबर को बिहार के गंगा तथा सोन नदी के संगम पर बसे कुतुबपुर दियारा गांव में हुआ। इस क्षेत्र के लोग न केवल देश के विभिन्न राज्यों बल्कि गिरमिटिया मजदूर के रूप में मॉरिशस, सूरीनाम, फीजी, गुयाना, हॉलैंड आदि देशों में ले जाये गए। यद्यपि भिखारी ठाकुर का पालन-पोषण एक निम्नवर्गीय परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम दल सिंगार ठाकुर और माता का नाम शिवकली देवी था। बचपन में कुछ समय तक स्कूल जाने के बाद उन्होंने स्कूल जाना छोड़ दिया। गाँव के दूसरे चरवाहों के साथ गाय घराने जाने लगे। जहाँ अपने घरवाह मित्रों के साथ लोकगीत गाते, नकल उतारते और शाम तक घर वापस आ जाते भिखारी ठाकुर जैसे-जैसे बड़े हुए, उन्होंने पढ़ना लिखना सीखा और अक्षर जोड़कर, शब्दों को बैठाकर कविता आदि करने लगे। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, गांव में रहकर धन कमाने का ऐसा कुछ साधन भी नहीं था, इसलिए वे घर को छोड़कर खड़कपुर चले गए। जहाँ उन्होंने धन कमाना शुरू किया, वहीं पर उन्होंने रामलीला, रासलीला, जात्रा जैसे लोक नटरंग देखने शुरू किए। एक बार घूमने के इरादे से भिखारी ठाकुर जगन्नाथ पुरी की यात्रा को निकले, यहाँ स्नान कर भगवान जगन्नाथ के दर्शन प्राप्त किए। इस घटना ने उनके जीवन को बदल दिया। उसके बाद खड़कपुर छोड़कर वापस अपने गांव कुतुबपुर आ गए और साधु संतों की संगत में बैठकर रामचरितमानस का पाठ, भजन कीर्तन सीखने लगे। धीरे-धीरे उन्हें इस कार्य में महारत हासिल हो गई, उन्हें लगभग पूरी रामचरितमानस कंठस्थ हो गई। इसके साथ ही कुछ गीत और काव्य आदि की रचना भी करने लगे। उन्होंने गाँव के युवाओं को जोड़कर रामलीला का मंचन प्रारंभ किया, उनके गीत और कविताएँ ऐसी सरल भाषा और लोकरंग लिए होती थी कि दूर-दूर से लोग उनकी ओर से खिंचे चले आते थे। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। अब वे रामलीला के प्रदर्शन के लिए गांव के बाहर भी जाने लगे। तैयब हुसैन ने इस बारे में लिखा है। आम के आम और गुठलियों के दाम’ की तरह उन्हें नाम और दाम दोनों मिलें नाम इस रूप में कि उनके गीत, नृत्य और नाटक लोक परम्पराओं से जुड़े थे जो जल्दी ही लोकप्रिय हो गए क्योंकि उनमें लोगों को अपनी छवि दिखाई देती थी, अपना सुख-दुःख अपनी कहानी इससे उनकी आत्मीयता स्वाभाविक थी। भिखारी के भीतर के कलाकार को संतोष मिला और प्रोत्साहन भी। फलतः उनका विकास होने लगा। फिर ऐसा दिन भी आया जब भिखारी का नाच ‘बिदेसिया’ नाम से शादी-ब्याह, पर्व-त्योहार और दूसरे उत्सव में मनोरंजन के साथ सामाजिक प्रतिष्ठा से भी जुड़ गया। वास्तव में उनके रचनाकार व्यक्तित्व ने अपने क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदि परिस्थितियों को बहुत ही करीब से देखा था। वे अपने समाज की परंपराओं और स्त्रियों की दशा से भी भलीभाँति परिचित थे।
बिदेसिया लोकनाट्य में तत्कालीन समाज की प्रमुख समस्याओं को स्थान मिला है। भिखारी ठाकुर के अपने लोक से गहराई से जुड़े थे। अत: समाज में व्याप्त बुराइयों एवं समस्याओं को सामुहिक रूप से विचार-विमर्श का मुद्दा बनाने के लिए एवं उसके समाधान के लिए लोगों को प्रेरित करने के लिए, सामाजिक मनोरंजन के सर्वाधिक उत्तम साधन-‘लोकनाट्य’ के माध्यम से समस्या आदि के रूप में चयनित करते हैं। हैरत की बात तो यह है कि तत्कालीन समाज की समस्या आज भी समाज में देशी एवं वैश्विक स्तर पर मुंह खोले खड़ी है। स्वाधीनता के आन्दोलन से गति पाई ‘पलायन की समस्या’ सात दशकों से निरन्तर बनी हुई है।
‘बिदेसिया नाटक में पलायन की समस्या ‘पलायन से उपजी स्त्रियों की विरह-पीड़ा एवं एकाकीपन, वेश्यावृत्ति की समस्या एवं पूँजीबाद या औद्योगिकीकरण की समस्या पर सूक्ष्म दृष्टिपात किया गया है। कहीं-न-कहीं इन सभी के मूल में पलायन की समस्या व्याप्त है। यह समस्या आज देशी और वैश्विक दोनों स्तर पर फैली हुई है।
पलायन के कारणों की पड़ताल से पहले पलायन क्या है यह जान लेना आवश्यक है। पलायन एक स्थान से दूसरे स्थान तक लोगों की आवाजाही है। यह एक छोटी या लंबी दूरी के लिए अल्पकालिक या स्थायी स्वैच्छिक या विवशता के कारण, अन्तर्देशीय या अन्तर्राष्ट्रीय हो सकता है। बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में पलायन किए हुए व्यक्ति को उसके मूल स्थान पर बिदेसी संबोधित करते है। वह व्यक्ति जो अपना मूल स्थान छोड़कर अन्यत्र गमन कर चुका है ‘बिदेसी’ कहलाता है। बेरोजगारी , शैक्षिक सुविधा का अभाव, बदतर जीवन शैली, राजनीतिक, धार्मिक एवं भाषिक सहभागिता का अभाव, प्राकृतिक आपदा, आदि पलायन का मजबूत कारण बने।
भिखारी ठाकुर ने जितनी भी मौलिक रचनाएँ की वे सभी अपने क्षेत्र की समस्याओं का प्रतिनिधित्व करती है। बिदेसिया नाटक के माध्यम से उन्होंने स्त्री की विरह वेदना को प्रस्तुत किया है, जो उस समय की सबसे विकट समस्या थी। गाँव के पुरुष जीविकोपार्जन के लिए अन्य प्रदेशों में जाते थे और उनके पीछे उसकी पत्नी और परिवार वाले संतप्त रहते थे। ‘भाई विरोध’ नाटक में संयुक्त परिवार के विघटन की कथा है। ‘विधवा विलाप’ में विधवा स्त्री के प्रति होने वाला सामाजिक अत्याचार प्रस्तुत हुआ है। ‘गंगा असमान’ नाटक में धार्मिक आडम्बर किस तरह समाज को खोखला कर रहे हैं, जबकि ‘पुत्र वध’ नाटक में नारी चरित्र का विचलन प्रस्तुत हुआ है। ‘गंबर थियोर’ नाटक में जीते जागते इंसान को वस्तु समझने की मानसिकता दर्शाई गई है। ‘ननद भउजाई’ नाटक में बाल विवाह की समस्या तथा कलयुग प्रेम’ में समाज में बढ़ रही नशाखोरी की समस्या का चित्रण हुआ है। जबकि ‘बेटी वियोग’ नाटक के माध्यम से उन्होंने बेटी बेचने की प्रथा पर कुठाराघात किया है। इस प्रकार इन नाटकों के माध्यम से उन्होंने ऐसे कथानकों को पुना, जो समाज में ही चारों और व्याप्त थे, जिनके सुधार पर कोई ध्यान नहीं दे रहा था उन्होंने इन समस्याओं को उठाकर जहाँ धर्म के ठेकेदारों को, धार्मिक आडंबरों के लिए खबरदार किया, वहीं समाज को भी अपनी रूढिगत परंपराओं को छोड़ने के लिए प्रेरित किया।
भिखारी ठाकुर का समय भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का युग था। उस समय समाज सुधार एवं स्वतंत्रता आंदोलनों का प्रचार-प्रसार पूरे देश भर में चल रहा था। भिखारी ठाकुर नामक सोनोग्राफ में तैयब हुसैन पीड़ित लिखते हैं “भिखारी का काल अंग्रेजी राज के कारण गाँव में उथल-पुथल का काल था। पहली बार भारत की सामंती संस्कृति में पूंजीवादी संस्कृति हस्तक्षेप कर रही थी। वर्ण-व्यवस्था रखने की कोशिश जारी थी। गृह उद्योग नष्ट हो रहे थे। लकदक करती विदेशी चीजें शहर से मुंबई हाट में प्रवेश करने लगी थीं। टैक्स के लिए अंग्रेजों का जमीदारों पर और जमींदारों का रैयतों पर दबाव बढ़ रहा था। नवजवान ग्रामीणों का शहर की ओर रुख स्वाभाविक हो गया था। ऐसे में उनका शहर चालू औरतों के शिकंजों में फँसना अथवा उनकी ब्याहता घरवाली पर गैर मर्द का घेरा पड़ना उनकी नियति बन रही थी। भिखारी ठाकुर जी की सबसे बड़ी युगीन समस्या थी पलायन वृत्ति। गांव का युवा रोजगार की तलाश एवं धन कमाने की चाह में अपने घर-गाँव को छोड़कर सुदूर प्रदेश में जाकर बस रहा था। पलायन की यह समस्या उन्होंने स्वयं भोगी थी। उन्होंने अपने नाटकों में सामाजिक सरोकारों से जुड़े पक्षों को ऐसा बाँधा कि अभिव्यक्ति की एक शैली भिखारी शैली के नाम से जानी जाती है। आज भी सामाजिक कुरीतियों की यह गूंज क्षेत्र विशेष में सुनाई पड़ती है। भिखारी ठाकुर ने समाज सुधार हेतु लोकधमी शैली का चयन किया। बिहार के प्रसिद्ध लोक-पारंपरिक नाथ लोरिक नाच के माध्यम से अपने समाज की तत्कालीन समस्याओं को स्वर दिया, साथ ही लोगों में चेतना जागृत करने का प्रयास किया। ये लोक धर्मी रचनाकार ही नहीं थे, बल्कि सामाजिक कुरीतियों से लगातार लड़ने और जुड़ने वाले कटिबद्ध कलाकार थे। उन्होंने बिहार क्षेत्र की लोक शैली लोरिक नाथ प्रतिष्ठित किया था। भिखारी ठाकुर का सबसे ज्यादा ध्यान पलायन वृत्ति को रोकना था, इसके लिए उन्होंने बिदेशिया नामक शैली को पुनर्जीवित किया। यह लौरिक नाच का ही एक रूप था, जिसमें एक स्त्री अपने पति के विदेश चले जाने पर परदेस जाने वाले बटोही को रोककर अपनी व्यथा सुनाती है। परदेश गये अपने पति को शीघ्र घर वापस आने का संदेश भिजवाती है। बटोही भी परदेस में रहने वाले उस परदेसी को ढूंढकर उसे घर वापस भेजने का भरसक प्रयास करता है। यह लोक शैली बिदेसिया के नाम से ही जग प्रसिद्ध हो गई।
बिदेसिया नाटक में स्त्री की प्रभावमयी भूमिका को हम संक्षेप में इस प्रकार देख सकते हैं – बिदेसी (पति) गौना के बाद विदा कराके अपनी पत्नी प्यारी सुन्दरी को घर लाता है। पति-पत्नी अभी दोनों ही गौना के शुभ और रंगीन वस्त्र में हैं। उनके पैर का महावर अभी छूटा भी नहीं है। तभी अचानक बिदेसी को कलकत्ता जाने की धुन सवार हो गई। नई ब्याहता पत्नी के लाख मनुहार करने पर भी बिदेसी पत्नी को तरह-तरह के प्रलोभन देकर गाँव-घर और बिसूरती ब्याहता को छोड़ कर कमाने के लिए शहर चला गया। कलकत्ता में जाकर कुछ रूपया कमाने के बाद बिदेसी शहर के चमक-दमक में अपना घर, अपनी पत्नी सबकुछ भूलकर वहीं का होकर रह गया। बिदेसी वहाँ एक अन्य स्त्री के साथ गृहस्थी बसा लेता है। दूसरी औरत से उसके दो बच्चे भी हैं।
गाँव में प्यारी सुन्दरी पति की प्रतीक्षा में रो-रोकर बेहाल है। एक दिन एक बुजुर्ग बटोही को देख कर प्यारी सुन्दरी उनके गन्तव्य स्थान के विषय में पूछती है। बटोही के द्वारा यह बताने पर कि वह कलकत्ता जा रहे हैं, प्यारी सुन्दरी उनसे अपना सारा दुःख सुनाती है और अपने स्वामी का रूप-रंग बताते हुए बटोही से उनको ढू्ँढ़ लाने की प्रार्थना करती है। बटोही कलकत्ता जा कर बिदेसी को ढू्ँढ़ लेते हैं। वे बिदेसी को समझा-बुझाकर घर लौटने के लिए राजी कर देते हैं। बिदेसी दूसरी स्त्री को छोड़ कर अपने घर-गाँव लौट आता है। बिदेसी के गाँव लौटने के पश्चात दूसरी स्त्री भी अपने दोनों बच्चों के साथ बिदेसी के घर का पता पूछते-पूछते पहुँच जाती है। प्यारी सुन्दरी पति को पाकर धन्य हो गई और उपहार-स्वरूप सौत तथा दो बच्चे भी उसकी झोली में डाल दिए गए। इस प्रकार अन्त में पूरा परिवार मिल जाता है। प्रकट में ऐसा प्रतीत होता है कि नाटक सुखान्त है। किन्तु, नाटक पढ़ने के बाद उसके अलिखित और अघोषित प्रश्न मस्तिष्क को मथने लगते हैं। इस पुरूष-प्रधन समाज में क्यों, क्या और कब तक सारी मर्यादा के निर्वाह की जिम्मेदारी स्त्री पर थोपी जाती रहेगी? स्त्री को ही कब तक हर बार त्याग की मूर्ति बनना पड़ेगा? स्त्री-पुरूष सम्बन्ध में स्त्री चाहे पत्नी के रूप में हो अथवा प्रेयसी के रूप में , कब तक छली जाती रहेगी? इस विषय में सबसे पीड़ादायक पहलू है – पुरूष द्वारा छली गई स्त्री को अन्त में समाज द्वारा अपशब्दों से नवाज़ा जाता है ( रचनाकार ने दूसरी स्त्री के लिए जो शब्द प्रयुक्त किया है, सभ्य और शिष्ट समाज में वह एक भद्दी गाली है )।
बिदेसी के परदेस चले जाने पर प्यारी सुन्दरी कहती है –
तूरि दिहलन पति-पत्नी नतवा ए सजनी।
हमरा घोटात नइखे कनवाँ भर अनवाँ ए सजनी।
चाभत होइहे मगही पानवाँ ए सजनी।
पत्नी प्यारी सुन्दरी जो कुछ ही दिन पूर्व ब्याह कर ससुराल आई है, अभी गाँव-घर के कोनों से भी परिचित नहीे हो पाई, पति-पत्नी के रिश्ते की गरिमा और मर्यादा को समझ रही है। बिदेसी के परदेस-गमन के पश्चात वह अकेली ही ससुराल के चौखट के भीतर रहकर अपना दायित्व निभा रही है। बिदेसी पति-पत्नी के पवित्रा बन्धन को तोड़कर अपने तन-मन के सुख में डूबा हुआ है। विरहणी पत्नी दुःख में अन्न का एक कण भी कंठ से नीचे नहीं उतार पा रही है।
पियऊ का बियोग में प्रान छुटि जाई,
हमरे सिरवे बीतत बा, ना दोसरा का बुझाई।
पति के वियोग में पत्नी प्यारी सुन्दरी के प्राण निकलना चाहते हैं। प्यारी सुन्दरी कहती है कि पति-वियोग का यह दुःख जो मेरे ऊपर बीत रहा है उसे कोई दूसरा महसूस नहीं कर सकता। विरह की जिस ज्वाला में प्यारी सुन्दरी जल रही है, उसकी आँच बिदेसी को क्यों नहीं लगती? इतना ही नहीं गाँव के मनचलों से वह अपने सतीत्व को भी बचाती है। गाँव का कथित देवर भाँति-भाँति के प्रलोभनों के द्वारा प्यारी सुन्दरी को रिझाने का प्रयास करता है –
भउजी काहे रोवत बाड़ू चुप रह भइया परदेस गइलन,
तू हमरा से रूपया, गहना, कपड़ा जे कुछ खोज हम देब।
यहाँ गाँव के मनचले देवर के रूप में पुरूष की यौवन-लोलुप-दृष्टि दिखाई देती है। इस बहाने से रचनाकार ने सती के सतीत्व को भी परखा है। प्यारी सुन्दरी अपने चारित्रिक दृढ़ता का परिचय देती हुई देवर को दो टूक जवाब देती है –
प्यारी के मन लागल बाटे जहंवा बाड़न राम।
माड़ो में सत बंध्न भइल बा कहत भिखारी हजाम।।
हिन्दू विवाह की रस्म में विवाह-मण्डप में दुल्हा-दुल्हन अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लेते हैं। ये सात फेरे सात जन्मों के बंधन हैं। लेकिन इस सातबंधन में क्या दुल्हन ही बांधी जाती है? दुल्हा सभी बंधनों से मुक्त रखा जाता है? प्यारी सुन्दरी को इस सातबंधन की सुदृढ़ता और पवित्रता का अहसास है। पति की लंबी अनुपस्थिति में भी वह विवाह-मण्डप में लिए गए सात फेरे की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करती है। जो बंधन प्यारी सुन्दरी को बांधे रखता है, वही बंधन बिदेसी के लिए अर्थहीन क्यों हो गया?
बटोही के समझाने पर बिदेसी अपने गाँव प्यारी सुन्दरी के पास लौटने के लिए आतुर हो जाता है। दूसरी स्त्राी बिदेसी को जाने नहीं देना चाहती क्योंकि अब बिदेसी से ही उसका भी घर-संसार है, दो बच्चे भी हैं। वह बिदेसी से कहती है –
पिया पिरतिया लगाई के, दूर देस मत जाहू।
कहे भिखारी भीख मांगि के लाइब, तुम खाहू।
किन्तु, बिदेसी को इस स्त्री का प्रेम और उससे पैदा हुए दो बच्चे भी रोक नहीं पाए। बिदेसी स्वार्थी पति, धूर्त प्रेमी तथा गैर-जिम्मेदार पिता साबित होता है। विवाहित बिदेसी परदेस जाकर, कुछ रूपया-पैसा कमाने के पश्चात अपने इन्द्रिय सुख के लिए दूसरी स्त्री के साथ घर बसा लेता है। रचनाकार जो कि समाज के विचार का प्रतिनिधित्व करता है, पुरूष के उच्छृंखलता को नजरअंदाज करता है और दूसरी स्त्री को बड़ी सहजता से पूरे नाटक में जिस शब्द द्वारा सम्बोधित करता है, वह किसी भी स्त्री के लिए अपमानजनक है। मनचले देवर के माध्यम से प्यारी सुन्दरी के सतीत्व की भी परीक्षा ली गई है अर्थात्, पति की अनुपस्थिति में पत्नी को भी शक के दायरे में रखा गया है। अकेली स्त्री के चरित्र की ठेकेदारी समाज अपने ऊपर ले लेता है। पति (बिदेसी) के घर लौटने पर पत्नी (प्यारी सुंदरी) पति के साथ ही उसकी प्रेयसी और उसके दो बच्चों को सहने के लिए बाध्य है।
भिखारी ठाकुर ने ‘बिदेसिया’ में ऐसी स्त्रियों के पुनर्संयोजन के लिए मार्ग प्रशस्त किया है, जिन्हें समाज घृणित दृष्टि से देखता है। किन्तु यहाँ प्रश्न दूसरे तरह का है। एक ही घर में दो स्त्रियां, एक पुरूष के साथ साँझा करने के लिए लाचार हैं। ऐसी स्थिति में दोनों ही स्त्रियां क्या संतुष्ट और खुश रही होंगी? दोनों स्त्रियों की बेचैनी का अंदाज रचनाकार अथवा समाज को क्यों नहीं है? दो स्त्रियों के बीच पुरूष बेदाग और सभी आरोपों से मुक्त है। उसके जीवन में पत्नी के अतिरिक्त अन्य स्त्री का होना सहज तथा परिस्थितिजन्य है। ‘बिदेसिया’ में रचनाकार ने समाज के पुरूष-प्रधान विकृत मानसिकता को स्थापित किया है।
‘बिदेसिया मूलतः गीतात्मक नाट्य शैली है, जिसमें गीत और संगीत का विशेष महत्व है। गायन ऊँचे स्वर में किया जाता था। गीत में साथ देने के लिए कोरस भी होता था, जिन्हें समाजी’ नाम की संज्ञा दी जाती थी। ये समाजी मंच पर ही उपस्थित रहते हैं। कभी-कभी ‘ए’ या ‘हो’ आदि बोलकर ताल देने का कार्य करते हैं। बीच में छोटा-मोटा अभिनय भी कर लेते हैं। गायन करने, वाद्य यंत्रों के वादन और भीड़ आदि के संवाद बोलने की भूमिका अदा करते हैं। बिदेसिया में गीतों के साथ नृत्य का भी संयोजन होता है, पर नृत्य, गीत आरोपित ना होकर पटना की माँग होते हैं। बिदेसिया शैली के नृत्य में स्वाभाविकता अधिक होती है, नृत्य में कमर की गति और उछल-कूद पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है बिदेसिया को किसी विशिष्ट रंगमंच की आवश्यकता नहीं थी। चार-पांच लगती को जोड़कर भी संघ बना लिया जाता था। जिसके एक तरफ समाजी, अभिनेता और बाकी तीन तरफ दर्शक बूँद बैठा करते थे ना कोई पर्दा होता, ना दृश्यबन्ध की आवश्यकता होती थी। बिदेसिया शैली में पारसी संघ का ज्यादा महत्व नहीं होता, कलाकार रूप सज्जा के लिए पाउडर, काजल, बिंदी, बाली आदि केवल यही प्रयोग करते हैं। वेशभूषा में साधारण धोती, मिरजई और स्त्री पात्र साड़ी और ब्लाउज पहनते थे अभिनय की दृष्टि से पारसी रंगमंच की तरह वि
बिदेसिया नाट्य किसी तरह का भ्रम नहीं पैदा करते थे। इसमें पात्र और चरित्र का अस्तित्व मंच पर बराबर रखा जाता था। इसमे अतिरंजना का प्रयोग ना करके सहजता एवं स्वाभाविकता बनाए रखने का प्रयास रहता था। स्त्री पात्रों की भूमिका में पुरुष कलाकार ही निभाते थे। इन विशेषताओं के फलस्वरूप आज बिदेसिया को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान मिल चुकी है। इस कृति के माध्यम से भिखारी ठाकुर का सांस्कृतिक योद्धा और समाज चितक का रूप मुख्यतः उभरा है। वास्तव में वे अपने जीवन काल में ही लीजेंड बन चुके थे।
निष्कर्षत: हम यह कह सकते हैं कि लोकनाट्य एवं रंगमंचीय शैली में अनेक नवीन प्रयोग होत रहते हैं और हम निश्चित रूप से यह कह सकते हैं कि भारतीय लोकनाट्य में बिदेसिया का प्रदेय अद्वितीय एवं अतुलनीय हैं।
सन्दर्भ सूची –
फिजी में हिन्दी : विविध प्रसंग , सं. डॉ. राजेश कुमार “माँझी” सर्व भाषा ट्रस्ट , जे – 49 गली नं. 38 राजापुरी मेन रोड नई दिल्ली 110059
बिदेसिया- भिखारी ठाकुर , हिन्दी समय डॉट काम
बिदेसिया की स्त्री, अर्चना उपाध्याय, सहचर त्रैमासिक ई पत्रिका ,7 मई 2017
लोकनाट्य परम्परा और प्रवृत्तियाँ – महेन्द्र भाणावत, बाफना प्रकाशन , जयपुर