स्वामी विवेकानंद के विचार और समकालीन भारतीय शिक्षा प्रणाली
डॉ. आशीष कुमार ‘दीपांकर’
सहायक आचार्य, हिन्दी (भाषा विभाग), स्वामी विवेकानन्द सुभारती विश्वविद्यालय, मेरठ, उत्तर प्रदेश
मोबाइल- 9795508915
ईमेल: ashishdipankar27@gmail.com
सारांश
प्रकृति का न्याय सदैव समान रूप से निर्मम और कठोर होता है। सर्वाधिक कुशल व्याक्ति जीवन को न तो भला कहेगा और न ही बुरा। प्रत्येक सफल मनुष्य के स्वभाव में कहीं विशाल सच्चरिता तो कहीं सत्यनिष्ठा छिपी रहती है। इसी कारण उसके जीवन में लगातार सफलता ही सफलता होती है। अर्थात यह भी कह सकते है कि जो व्यक्ति प्रेम और स्वतंत्रता से अभिभूत होकर अपने कार्य के प्रति ईमानदार होता है, सफलता उसके कदम चूमती है। आपने हमारे देश के लिए एक सपना ऐसा देखा था जहां सभी लोगों के विकास के लिए समान अवसर हो, समाज के सभी व्यक्तियों को समान ज्ञान और धन हो। जिससे सभी के लिए शिक्षा के समान अवसर प्राप्त हो सकें। इस समानता-अपमानता के बीच स्वामी विवेकानन्द का जन्म हुआ। विवेकानन्द ज्ञान और विचारों से ओत-प्रोत करने वाले युवाओं के प्रेरणास्रोत है। युवा पीढ़ी आज जो उच्च शिक्षा के पायदान पर क़दम रख रही है उन्हें भावी भारत का सही निर्माण करना है। इसके लिए उन्हें जरूरी है स्वामी विवेकानन्द के विचारों एवं साहित्यिक कृतियों से रु-ब-रू होना।
कर्तव्यों का बोध कराती, अधिकारों का ज्ञान
शिक्षा से ही मिल सकता है, सर्वोपरि सम्मान।।
बीज शब्द: भारतीय, साहित्य, आध्यात्मिक, चिंतन, देशभक्ति, नवजागरण
शोध आलेख
स्वामी विवेकानन्द का जन्म कलकत्ता महानगर में 12 जनवरी 1863 ई. दिन सोमवार को एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। इनका परिवार दान, शिक्षा एवं व्यक्ति स्वातंत्र्य के मूल्यों से ओत-प्रोत था। इनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त और माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। पितामह दुर्गाचरण दत्त फ़ारसी, संस्कृत और विधि शास्त्र के विद्वान थे। पुत्र विश्वनाथ के जन्मोपरान्त केवल 25 वर्ष की आयु में ही गृहत्याग कर वे एक विरक्त सन्यासी हो गए। स्वामी विवेकानन्द के बचपन का नाम नरेन्द्र नाथ दत्त या नरेन था। बाल्यावस्या में नरेंद्रनाथ एक चंचल प्रकृति के विनोद प्रिय बालक थे। इनका अध्यात्मिक क्षेत्र में अद्भुत आकर्षण रहा। 1884 ई० में विवेकानन्द ने स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। साहस और समाज सेवा इनके स्वभाव में शुरू से था। विवेकानन्द ने जातिवाद, शिक्षा, निरपेक्षतावाद एवं मानवतावाद पर विचार प्रस्तुत किए हैं। इनकी शिक्षाओं पर उपनिषद्, गीता के दर्शन, ईसा मसीह एवं बुद्ध के उपदेशों का प्रभाव है।
‘राष्ट्र झोपड़ियों में बसता है।’ स्वामी विवेकानन्द ऐसा स्मरण कराते हैं। उनका मानना है कि कोई भी मतवाद हमारा तब तक उद्धार नहीं कर सकता जब तक हम स्वंय मनुष्योचित चरित-बल प्राप्त न कर लें। विवेकानन्द ने मनुष्य को तरह-तरह के बंधनों से मुक्त रहकर सही मनुष्य बनने की सलाह दी तथा समन्वय विचारधारा की बात की है। स्वामी विवेकानंद का मानना है कि- “मनुष्य निर्माण करना ही मेरे जीवन का उद्देश्य है (Man-Making is my mission)।”1
स्वामी विवेकानन्द का व्यक्तित्व समृद्ध, गहन एवं बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे अपने त्याग से असंयमित, प्रेम में असीम, कर्म में अथक, विद्या-बुद्धि में गहन एवं भावुकता में अतिरेकी तथा संघर्ष में निर्मम थे। हमारे इम जगत में उनके जैसा लोगों का व्यक्तित्व मिलना दुर्लभ है। विवेकानन्द शिक्षा पर जोर देते हुए अक्सर कहा करते थे कि हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जिससे हम मनुष्य बन सकें। हमें ऐसे सिद्धांतों की जरूरत है कि जिससे हम मनुष्य हो सकें। हमे ऐसी शिक्षा चाहिए जो सर्वांगीण विकास के साथ-साथ हमें मनुष्य भी बनाये रखें। भगिनी निवेदिता ने अपनी पुस्तक मेरे गुरुदेव : जैसा मैंने देखा (The Master as I saw him) में लिखा है कि- “उनके आराधना की देवी उनकी मातृभूमि थी।”2
स्वामी विवेकानन्द युवाओं के प्रेरणास्रोत रहे हैं। वह अपने जीवन-दर्शन, ज्ञान एवं विचारों से भारत विश्व को भी आत्मसात कराया है। इसका सबसे प्रभावशाली असर शिक्षा ही रहा। क्योंकि शिक्षा अंतः करण के ज्ञान को प्रकाशवान करती है। शिक्षा मानव के बेहतर चरित्र का निर्माण करती है। हमें ऐसी बेहतर शिक्षा की जरूरत है कि जिससे हम आपस में एक-दूसरे के प्रति स्नेह एवं प्रेम बनाए रहे। स्वामी विवेकानन्द का मानना है कि- “प्रत्येक व्यक्ति स्वंय में पूर्णता निहित है, जिसकी अभिव्यक्ति शिक्षा द्वारा संभव है। स्पष्ट है कि पूर्णता का प्रगटीकरण शिक्षा है। जिसमें जिस अंश तक पूर्णता प्रगट होती है, वह व्यक्ति उसी अंश तक शिक्षित है। वे कहते है कि- शिक्षा आत्म का संगीत है जिनकी सुमधुर ध्वनि में समग्र जीवन मधुमय हो जाता है। उन्हीं के शब्दों में- यदि शिक्षा का अर्थ जानकारी होता, पुस्तकालय संसार के बड़े संत हो जाते और विश्व कोश महान् ऋषि बन जाते। सत्यता यह है कि बालक में अनन्त अन्तनिर्हित शाक्तियों का भंडार है। उसको प्रकाश में लाना और बालक को क्रियाशील बनाना ही शिक्षा है।”3
शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे हम मनुष्य बन सके तथा समाज का सर्वांगीण विकास हो सकें। हमें ऐसी शिक्षा की कतई जरूरत नहीं है जो कि साधारण व्यक्ति को जीवन संग्राम के लिए समर्थ नहीं बना सकती एवं परहित भावना के समान साहस नहीं ला सकती, वह भी कोई शिक्षा है? हमें तो ऐसी शिक्षा चाहिए जो मनुष्य-मनुष्य के बीच चरित्र निर्माण हो सके तथा विकसित भारत में अपना महत्वपूर्ण योगदान कर सकें। जिससे हमारे देश की युवा पीढ़ी अपने पैरों पर खड़ा होकर सामाजिक न्याय के पहलू को उठा सकें। स्वामी विवेकानन्द का मानना है कि संस्कृत द्वारा ही हम अपने संस्कृति के वास्तविक पहलुओं से परिचित हो सकते है। इसलिए संस्कृत का जीवन में ज्ञान होना अति आवश्यक है। स्वामी विवेकानन्द संस्कृत साहित्य पर जोर देते हुए कहते है कि- “मनुष्यों को बोलचाल की उनकी भाषा में ही शिक्षा देनी होगी। किन्तु साथ ही संस्कृत की शिक्षा भी अवश्य चलती रहनी चाहिए। क्योंकि शब्दों की ध्वनि मात्र ही राष्ट्र को एक प्रकार की प्रतिष्ठा शक्ति एवं तेज प्रदान करती है।”4
शिक्षा एक ऐसी संपत्ति है जिसे न तो कोई खरीद सकता है और न ही कोई बेच सकता है। इसके लिए निरन्तर अभ्यासरत रहने की जरूरत है। विवेकानन्द का मानना था कि राष्ट्रीय पद्धति पर आधारित शिक्षा को हमें घर-घर पहुँचाना है। जो लोग हमारे पास किसी कारणवश आ नहीं सकते, उनके पास हमें जाकर शिक्षा की ज्योति जलाना होगा। शिक्षा वह है जो हमारे अंदर श्रद्धा को जन्म देती है। शिक्षा आवश्यकता अनुरुप ही होनी चाहिए अर्थात जो शिक्षा राष्ट्रीय पद्धति अपनाते हुए सामाजिक, शैक्षिक, वैचारिक, आर्थिक, राजनीतिक इत्यादि बिन्दुओं को जानने एवं समझने का अवसर प्रदान करें, वही असली शिक्षा के मायने है। व्यक्ति जिस भाषा को समझने में सहजता प्रदान करें उसे उसी माध्यम से समझाने का प्रयास किया जाना चाहिए।
किसी ने स्वामी जी से कहा कि- ‘संस्कृत’ तो मृत भाषा है।’ तब स्वामी विवेकानन्द ने जबाब देते हुए कहा कि- “हर किसी को संस्कृत पढ़ाइये। हमें संस्कृत अध्ययन के प्रसार के लिए सतत प्रयास करना चाहिए। क्योंकि हमारी मौलिक विद्वता के रत्न इसी भंडार में छिपे है। मानव के उच्चतम दर्शन बिंदु इसी भाषा में निहित है। अपने अज्ञान के कारण हम इस संपत्ति से वंचित हैं। संस्कृत शिक्षा हमें अन्य धर्मों के संबंध में भी सम्यक जानकारी करा सकती है।”5
जो शिक्षक यह कहता है कि मैं शिक्षा देता हूँ, उससे बढ़कर कोई दूसरा मुर्ख नहीं। जैसे- कोई भी व्यक्ति पौधे को उगा नहीं सकता, वैसे ही बच्चे को कोई जबरदस्ती पढ़ा भी नहीं सकता। जैसे पौधे के विकास के लिए समय-समय पर मिट्टी, खाद, पानी, दवा आदि की व्यवस्था करते हैं उसी भाँति बच्चे के शिक्षा के लिए उचित वातावरण बनाना पड़ता है। जिसमें बच्चों को वातावरण के अनुरूप शिक्षक उसे ढालने का प्रयास करता है। हमें ऐसी शिक्षा पद्धति को भी बदलना पड़ेगा जो मारपीट कर गधों को घोड़ा बनाती है। हर बच्चों में असंख्य अलग-अलग वृत्तियाँ है। हमें उनकी रुचियों एवं भावनाओं को समझकर उनके लिए उसी क्षेत्र में अवसर और सुविधाएं प्रदान करनी होंगी। जिसमें बच्चों का समुचित विकास सम्भव हो सकें। स्वामी विवेकानन्द का मानना था कि- “एक अकेले मनुष्य में सारा ब्रह्माण्ड छिपा है। यदि मैं जीवन में एक व्यक्ति को भी आत्म-स्वातंत्र्य की साधना में सहारा दे सका तो जानूँगा कि मेरा पारिश्रम सफल हुआ।”6
“शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो जितना पीयेगा वह उतना दहाड़ेगा।” डॉ. आंबेडकर का ऐसा मानना था। अर्थात जिस शिक्षा से हम अपना जीवन-निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें चरित्र गठन कर सकें तथा विचारों का सामंजस्य कर सकें, वही वास्तव में शिक्षा है। शिक्षा का ध्येय ही है मनुष्य का सर्वांगीण विकास करना। विवेकानन्द कहते है कि- “हम मनुष्य ही अपनी वर्तमान अवस्था के लिए जिम्मेदार हैं और भविष्य में हम जो कुछ कहना चाहें, उसकी शक्ति ही हमीं में है।”7 शिक्षा हम सभी के उज्ज्वल भविष्य के लिए आवश्यक है। शिक्षा का उच्च स्तर लोगों को सामाजिक एवं व्यवहारिक पहचान दिलाने में मदद करता है। यह लोगों के सोच को साकारात्मक बनाती है। अंग्रेजी के कैम्ब्रिज अन्तर्राष्ट्रीय शब्दकोश के अनुसार- “आप जिस प्रकार के व्यक्ति हैं, वही आपका व्यक्तित्व होता है और वह आपके आवरण, संवेदनशीलता तथा विचारों से व्यक्त होता है।”8
प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में दिव्य है तथा उसमें महानता प्राप्त करने की क्षमता है। शिक्षा ही ऐसी कुंजी है जो सभी दरवाजों को खोल सकती है। अक्सर वह कहा करते थे कि जीवन को सफल बनाने के लिए साकारात्मक दृष्टिकोण रखना आवश्यक है। विवेकानन्द का कहना था कि व्यक्तिगत विकास और सामाजिक प्रगति दोनों के लिए शिक्षा अति आवश्यक है। विवेकानन्द ने अपनी शिक्षाओं में सशक्तिकरण और सामाजिक परिवर्तन के माध्यम से सर्व समाज को जागृत करने का कार्य किया है। उनका मानना था कि– “जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के लिए आत्म-त्याग करने में सफल हो चुका है, तभी उसे समाज के लिए आत्म-त्याग की बात करनी चाहिए, उसके पहले नहीं।”9
भाषा अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। यह एक ऐसी भाषा शक्ति है जो मनुष्य के विचारों और सन्दर्भों को अभिव्यक्त करती है। अर्थात मनुष्य-मनुष्य के मध्य अपनी इच्छा का आदान-प्रदान करने के लिए जिन ध्वनि संकेतों का प्रयोग किया जाता है भाषा कहलाती है। विवेकानन्द सच्चे देशभक्त थे। भाषा के संदर्भ में उनका कहना है कि- “भाषा का रहस्य है सरलता।”10 आज सम्पूर्ण विश्व अनेक प्रकार के द्वंदों से गुजर रहा है। कहीं देश, कहीं परिवार, कहीं सम्प्रदाय, कहीं शिक्षा तो कहीं भाषा।
स्वामी जी का मानना था कि समान व्यक्ति एवं समाज के विकास के लिए शिक्षा मेरुदण्ड है। हमारे संविधान में स्त्री और पुरुष दोनों को समान शिक्षा का अधिकार है। देश आजाद हुआ और संविधान द्वारा देश की तमाम महिलाओं को हक देने का अवसर आया तो एक बार पुनः मर्दवादी सोच का दो मुंहापन सामने आया। पढ़े-लिखे बहुतायत लोगों द्वारा भी अपने ही देश में परम्परा के नाम पर महिलाओं के ख़िलाफ़ लामबन्द होते देखा गया। पहले की तुलना में अब समय के साथ परिस्थितियों में बदलाव आया है। प्रतिभावान स्त्रियाँ घर के कामों से मुक्ति पाकर धीरे-धीरे शिक्षा की राह को अपना रही है। शिक्षा का वास्तविक तात्पर्य है मानसिक शक्तियों का विकास करना। इसी संदर्भ में स्वामी विवेकानन्द का भी मानना है कि भारत की स्त्रियों को ऐसी शिक्षा दी जाए, जिसमें वे निर्भय होकर भारत के प्रति अपने कर्तव्य को भली-भाँति निभा सकें और संघमित्रा, लीला, अहिल्याबाई तथा मीराबाई आदि भारत की महान् देवियों द्वारा चलाई गई परम्परा को आगे बड़ा सकें एवं वीरप्रसूता बन सकें।”11
शिक्षा का उद्देश्य तथ्यों को सीखना नहीं बल्कि शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मस्तिष्क को प्रशिक्षित करना है। जिससे मनुष्य आत्म-निर्भर बन सकें। शिक्षा सभी के लिए सुलभ होनी चाहिए। स्वामी जी शैक्षिक पाठ्यचर्या में मनुष्य के शारीरिक विकास हेतु भाषा, कला, इतिहास, भूगोल, राजनीति शास्त्र, संगीत, अर्थशास्त्र, गणित, विज्ञान इत्यादि विषयों पर बल दिया है। वे शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति को इहलौकिक और पारलौकिक दोनों जीवन के लिए तैयार करना चाहते थे। स्वामी विवेकानन्द की मान्यता थी कि- “शिक्षा का अभिप्राय व्यक्ति को आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर और सशक्त बनाना है।”12
स्वामी विवेकानन्द एक उच्चकोटि के विद्वान, समाजसेवी, आदर्शवादी विचारक तथा प्रख्यात लेखक थे। उनका मानना था कि पाश्चात्यों की सफलता का रहस्य ‘शिक्षा’ ही है। वे कहते थे कि भारत और अमेरिका का उच्च वर्ग तो एक ही समान है किन्तु हमारे यहाँ का निम्न वर्ग शिक्षा से वंचित है। अतः हमें समाज के सभी वर्गों तक शिक्षा को पहुँचाना है जिससे उस वंचित वर्ग का भी विकाम हो सकें। सामाजिक समरसता तब जाकर बराबर हो सकती है। हमें शिक्षा के माध्यम से व्यक्तियों का विकास करके उनमें महानात्माओं को समावेशित करना है। विवेकानन्द आगे कहते है कि- “अशिक्षा हमारे राष्ट्र की भारी कमी है और इसे दूर करना होगा। जनसाधारण को शिक्षित करो और ऊपर उठाओं। केवल तभी यह देश यथार्थ में राष्ट्र-रूप में खड़ा हो सकेगा। तुमने पढ़ा होगा मातृ देवो भव, पितृ देवो भव। अर्थात माता को देवता समझो, पिता को देवता समझो। किन्तु मैं कहता हूँ कि दरिद्र देवो भव, मुर्ख देवो भव्- इन गरीबों, अपढ़ों, अज्ञानियों और दुखियों को ही अपना भगवान मानो। स्मरण रखो केवल इनकी सेवा ही तुम्हारा परम धर्म है। यानि शिक्षा का मूल उद्देश्य मनुष्य में सेवा भाव पैदा करना है। “13
स्वामी विवेकानन्द का मानना है कि सत्य जितना महान होता है, उतना ही सहज बोध-गम्य भी होता है। स्वंय अपने अस्तित्व के समान सहज। स्वामी विवेकानन्द बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। यदि मैं कुछ घंटों में या कुछ दिन में इस शोध आलेख को लिखकर यह कहूं कि मैं उन्हें भली-भांति पढ़ और समझ लिया तो यह इस महापुरुष की महिमा के प्रति तनिक भी न्याय नहीं कर सकूँगा। वे स्वदेश एवं मानवता के नैतिक उत्थान के लिए सम्पूर्ण जीवन अर्पित कर दिए। मनुष्य निर्माण करना ही उनका प्रथम और आखिरी लक्ष्य रहा। शिक्षा का लक्ष्य तो जीवन का निर्माण है, चरित्र का निर्माण है। स्वामी विवेकानन्द निर्माण के शब्दों में- “हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जिसके द्वारा चरित्र का निर्माण होता है, मस्तिष्क की शक्ति बढ़ती है, बुद्धि का विकास होता है और मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है।”14 विवेकानन्द सैद्धांतिक शिक्षा के साथ-साथ व्यवहारिक शिक्षा पर विशेष जोर देते थे। उनका मानना था कि उच्च शिक्षा की अच्छी व्यवस्था करने तथा उसके माध्यम से देश में डाक्टरों, वकीलों, इंजीनियरों एवं प्रशासकों आदि की शिक्षा व्यवस्था पर जोर दिया है। जब तक हम प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भर नहीं हो जाते तब तक हम उन्नति नहीं कर सकते । उनका यह भी कहना था कि देश-विदेश में जो अच्छा एवं लाभकारी है उसे उचित स्थान दिया जाना चाहिए। वे विश्व बंधुत्व में विश्वास रखते थे क्योंकि देश की स्वाधीनता, एकता और अखंडता बनाएं रखने के लिए युवा पीढ़ी को जागरूक रखना है जिससे राष्ट्रप्रेम बना रहे। इसी कारण स्वामी जी के उपर्युक्त विचार आज भी प्रासंगिक हैं।
भारत की एक बड़ी आबादी अभी भी गरीबी में जीवन जीने के लिए विवश है तथा वंचित समुदाय की समस्याएँ अभी भी वैसी ही बनी हुई हैं । स्वामी जी ने कहा था कि- “गरीबों की उपेक्षा और उनका शोषण भारत के पतन और पिछड़ेपन का मुख्य कारण है। वह उन पहले आध्यात्मिक नेताओं में से थे, जिन्होंने जन-सामान्य के समर्थन में आवाज उठाई। उन्होंने देश में गरीबों की दुर्दशा के बारे में राष्ट्रीय जागरूकता पैदा करने की कोशिश की। उनके इस उद्घोष ने सैकड़ों युवाओं को समाज सेवा को जीवन पद्धति के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित किया था कि, ‘जब तक लाखों लोग भूख और अज्ञानता में रह रहे हैं, तब तक मैं हर उस व्यक्ति को देशद्रोही मानता हूं जिसने उनके पैसे से शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद उन पर थोड़ा भी ध्यान नहीं दिया।”15
निष्कर्ष
स्वामी जी के कर्म-आधारित जीवन की एक बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्हें अपने आस-पास के समाज में कितनी भी निराशा नजर आई पर उन्होंने इस निराशा को बहुत आशा के संदेश में बदल दिया। अंधविश्वासों व कर्मकांडों के प्रति उनके मन में विद्रोह था। जिस अशिक्षा और भेदभाव से वे उद्वेलित थे, उसे जगह-जगह देखकर वे निराश नहीं हुए अपितु इसे दूर कर एक नया देश बनाने, समाज व धर्म में सुधार करने का बहुत ओजस्वी संदेश उन्होंने बहुत असरदार ढंग से दिया। इससे भारतीय पुनर्जागरण में बहुत मदद मिली। लोगों का स्वाभिमान जगाने में बहुत सहयोग मिला।
स्वामी विवेकानंद के विचार और उनके आदर्श समाज के निमित्त सदा ही मार्गदर्शक की भांति पथ-प्रशस्त करते रहेंगे। आवश्यकता सिर्फ उनके विचारों को आचरण में उतारने की है। यदि विवेकानन्द के संकल्पना को साकार करना है तो असमानता, गैर-बराबरी अर्थात गरीबी को मिटाकर बराबरी का समाज बनाकर एक आदर्श समाज की संकल्पना को साकार किया जा सकता है।
संदर्भ सूची
- नेताजी सुभाष के प्रेरणा पुरुष स्वामी विवेकानन्द, स्वामी विदेहात्मानन्द, अद्वैत आश्रम प्रकाशन विभाग, कोलकाता, संस्करण 2015, पृ० 44
- वही, पृ० 56
- राष्ट्रदेव स्वामी विवेकानन्द सार्धशती अंक, संपादक अजय मित्तल, उर्वशी ऑफसेट प्रिन्टर्स मेरठ तथा विश्व संवाद केन्द्र, मेरठ,21 दिसम्बर 2012, पृ० 8
- विश्व में हिन्दू चेतना के प्रवर्तक स्वामी विवेकानन्द, संकलकर्ता राम लाल, शरद प्रकाशन आगरा, संस्करण 1993, पृ०23
- वहीं, पृ0 5
- विवेकानन्द, रोमां रोलां, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, संस्करण 2013, पृ० 76
- व्यक्तित्व का विकास स्वामी विवेकानन्द, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी ब्रह्मास्थानन्द रामकृष्ण मठ, नागपुर, संम्करण 2017, पृ० 13
- वही, पृ० 5
- हे भारत! उठो! जागो!, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी ब्रह्मस्थानन्द रामकृष्ण मठ, नागपुर, संस्करण 2017, पृ० 45
- योद्धा संन्यासी विवेकानन्द, हंसराज रहबर, राजपाल एण्ड सन्ज़, दिल्ली, संस्करण 2010, पृ० 225
- उत्तिष्ठत जाग्रत (स्वामी विवेकानन्द), संकलनकर्ता एकनाथ रानाडे अनुवादक देवेन्द्र स्वरूप अग्रवाल, लोकहित प्रकाशन संस्कृति भवन, राजेंद्र नगर, लखनऊ, संस्करण 2009, पृ० 109
- विश्व के प्रमुख चितकों का शिक्षा-दर्शन, प्रो. मिश्री लाल मांडोत एवं डॉ. संध्या शर्मा, साहित्यागार जयपुर, संस्करण 2023, पृ० 108
- विश्व में हिन्दू चेतना के प्रवर्तक स्वामी विवेकानन्द, संकलनकर्ता राम लाल, शरद प्रकाशन आगरा, संस्करण 1993, पृ० 23
- विश्व के प्रमुख चितकों का शिक्षा-दर्शन, प्रो. मिश्री लाल मांडोत एवं डॉ. संध्या शर्मा, साहित्यागार जयपुर, संस्करण 2023, पृ० 108
- हस्तक्षेप (राष्ट्रीय सहारा), 12 जनवरी 2013, विवेकानंद देश अपर संदेश, प्रणव मुखर्जी (राष्ट्रपति), पृ०1







