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आलोचक के मुख से” नामवर सिंह के व्याख्यानों का समीक्षात्मक अवलोकन-डॉ. रज्जन प्रसाद शुक्ला

आलोचक के मुख से” नामवर सिंह के व्याख्यानों का समीक्षात्मक अवलोकन

डॉ. रज्जन प्रसाद शुक्ला

केन्द्रीय विद्यालय उत्तर लखीमपुर (असम)

ईमेल: rpshukla000@gmail.com

मोबाइल: 9936444618

सारांश

नामवर सिंह की आलोचना कर्म के विविध आयाम हैं। यह कर्म उनके द्वारा विभिन्न विषयों पर दिए गए व्याख्यान, परिसंवाद, साक्षात्कार एवं कक्षा व्याख्यान हैं। नामवर सिंह ने एक अध्यापक, आलोचक, निबंधकार, संपादक, राजनेता वक्ता आदि भूमिकाओं का कुशलता पूर्वक निर्वहन किया है। उन्हें वाचिक परंपरा का मूर्धन्य आलोचक भी माना जाता है। साहित्य, समाज, कला, संस्कृति, राजनीति, विज्ञान, धर्म-दर्शन, सिद्धांत एवं व्यावहारिक चिंतन आदि ऐसा कोई कोना नहीं बचा है जहां नामवर सिंह की दृष्टि नहीं गई।

‘आलोचक के मुख से’ – यह पुस्तक डॉ॰ नामवर सिंह के द्वारा पटना में ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के मंच से विभिन्न अवसरों पर दिए गए ‘पाँच व्याख्यानों’ का संकलन हैं। इन व्याख्यानों का सम्पादन खगेन्द्र ठाकुर के द्वारा किया गया, खगेन्द्र जी ने ‘व्याख्यानों’ को उनके वास्तविक रूप में ही रहने दिया है, ताकि पाठक नामवर जी की वक्तृत्व कला का आनन्द भी ले सकें। यह व्याख्यान नामवर सिंह द्वारा अगस्त, 1983 ई॰ में बिहार प्रगतिशील लेखक संघ और सिटीजेन्स फोरम के तत्वावधान (पटना) में आयोजित कार्ल मार्क्स-निधन-शत-वार्षिकी-समारोह में दिया गया था।

नामवर जी हिन्दी के सर्वोत्तम वक्ता रहे और माने भी जाते रहेंगे। उनके व्याख्यान में भाषा के प्रवाह के साथ विचारों की लय है। इस लय का निर्माण विचारों के तारतम्य और क्रमबद्धता से होता है। अनावश्यक तथ्यों और प्रसंगों से वे बचते हैं और रोचकता का भी ध्यान हमेशा रखते हैं। आज के साहित्य, विचारधारा, सौन्दर्य, राजनीति और आलोचना से जुड़े तथा उनके अन्तरसम्बन्धों के बारे में महत्त्वपूर्ण बातें इन व्याख्यानों में कही गई हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि ‘आलोचक के मुख से’ हिन्दी आलोचना की एक बेहद महत्त्वपूर्ण किताब है।

बीज शब्द : आलोचना, रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, व्यक्तिवाद, वाचिक, वैचारिक

शोध आलेख

नामवर सिंह को हिंदी आलोचना में वाचिक परंपरा का आचार्य माना जाता है। वे लिखित आलोचना के अतिरिक्त मंच और व्याख्यानों के माध्यम से आम जनता तक विचारों को पहुँचाते थे—एक जीवंत “जंगम विद्यापीठ” जैसा, जिसका कोई ठोस ठिकाना नहीं था। इसकी विशिष्टता यही थी कि वे विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रहे, बल्कि जन–सभाएं, गोष्ठियाँ, रंगमंच जैसे विविध माध्यमों से संवाद रचते रहे।

नामवर सिंह आलोचना में रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, व्यक्तिवाद जैसे विकारों के विरोधी रहे, और एक वैचारिक आंदोलन के रूप में आलोचना को आगे बढ़ाया। उनका व्याख्यान जन–शिक्षण का माध्यम बन गया, जिसमें उन्होंने साम्राज्यवाद और पूँजीवादी चिंतन के ताज़ा स्वरूपों के प्रति सजगता बढ़ाई। उनकी आलोचना की विशिष्टता सोच की गहराई और सहृदयता में है। मार्क्सवादी आलोचना से जुड़े रहते हुए, वे कठोरता में नहीं बंधे रहे। अपभ्रंश से लेकर समकालीन साहित्य तक सभी विधाओं पर उन्होंने सूक्ष्म दृष्टि और मानवीय संवेदना से विचार प्रस्तुत किए।

नामवर सिंह की आलोचना पद्धति का एक आधार था—दृष्टि (परिचय) → विश्लेषण (व्याख्या) → निष्कर्ष (संक्षेप)। इसमें वे उदाहरण देकर बात को पुष्ट करते, अवधारणाओं की पड़ताल करते और अंत में एक विश्लेषणात्मक निष्कर्ष प्रस्तुत करते। कविता में परंपरा और सामाजिकता दोनों को साथ ले जाना नामवर सिंह के सबसे बड़े गुणों में से एक था। उन्होंने छायावादी कविता में सामाजिक तत्वों को पहचानने का नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। कहानी आलोचना में, उन्होंने “कहानीपन” यानी कहानी-रूप पर जोर देकर इसे काव्य-समीक्षा से भी अलग एक दिशा दी। उनकी एक प्रमुख टिप्पणी थी—व्यापकता में गहराई हो सकती है, लेकिन संकीर्णता में भी गहराई हो सकती है। इसका मतलब यह था कि सोच का विस्तार महत्वपूर्ण है, पर उस विस्तार में गहराई का अभाव कहीं बड़ी कमी नहीं है। इस संतुलन ने उनकी आलोचना को उल्लेखनीय औपचारिक-वैचारिक शक्ति दी।

नामवर सिंह विवादवादी संवाद में विश्वास रखते थे। वे कहते थे कि विचारों के क्षेत्र में विवाद की भूमिका आवश्यक है, और इस दृष्टि से वाचिक परंपरा ही आलोחי प्रक्रिया का जीवंत माध्यम बनती है। उनका हर व्याख्यान सोचे गए उत्तर के लिए चौकस होने का निमंत्रण था

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के योग्य एवं महत्वपूर्ण शिष्य के रूप में हुए। हजारी प्रसाद द्विवेदी के व्यक्तित्व की तेजस्विता, नकार का साहस, निष्पक्ष दृष्टि, साहित्य एवं संस्कृति की गहरी परख एवं उनके शुद्धिकरण के प्रति जागरूकता आदि गुणों का प्रभाव नामवर सिंह पर स्पष्ट देखा जा सकता है। नामवर सिंह के साहित्यिक जीवन का प्रारंभ काव्य लेखन के साथ हुआ था। केदारनाथ सिंह लिखते हैं – “नामवर सिंह की आरंभिक पहचान एक कवि के रूप में बनी थी। वह गोष्ठियों सम्मेलनों में जाते थे और रस लेकर अपनी कविताएं सुनाते थे। उनकी कविताएं उस समय के प्रचलित फैशन से अलग होती थीं। उनमें एक ताजगी होती थी और एक खास तरह की एंद्रिकता भी।”[1]

            नामवर सिंह सर्वप्रथम अध्यापन के दौरान उन्होंने साहित्यिक, असाहित्यिक विद्यार्थियों को सामान्य हिंदी पढ़ाने का कार्य किया। शिक्षक के रूप में उनके पढ़ाने का ढंग ऐसा था कि कक्षाओं में विद्यार्थियों की संख्या उस जमाने में देखने लायक थी। अपने अध्यापन के खास अंदाज, वाद-विवाद वार्तालाप आदि उनकी अलग ढंग की शैली के कारण उनके अध्यापन को अत्यधिक प्रसिद्धि मिलती गई। परिणामस्वरूप एक आलोचक व्यक्तित्व का बीज प्रस्फुटित हो रहा था। उनकी वाचिक आलोचना का प्रारंभ यहीं से माना जा सकता है। उन्होंने 1940 ई. में ‘नवयुवक साहित्यिक संघ’ नामक साहित्यिक संस्था स्थापित की थी। इस संस्था में प्रत्येक सप्ताह एक साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन किया जाता था। बाद में व्याख्यान, संभाषण व उनके वैचारिक संवाद के साधन बनते गए। अकादमिक स्तर पर उनके अध्ययन व अध्यापन ने ही आगे चलकर आलोचना का रूप ग्रहण कर लिया और उनका आलोचना कर्म लिखित होने के साथ-साथ वाचिक भी होने लगा, क्योंकि एक शिक्षक होने के नाते कक्षा में छात्रों को पढ़ाने के दौरान बहुत सारी बातें व्याख्यान या वाचिक रूप में ही होती रहती थी।

            नामवर सिंह ने प्रचुर संख्या में आलोचनात्मक पुस्तकें लिखीं और उससे भी अधिक वक्तव्य दिए। उनके व्याख्यानों, परिसंवादों, साक्षात्कारों आदि को संग्रहित कर पुस्तक रूप में प्रकाशित भी किया गया है। खगेंद्र ठाकुर द्वारा संपादित पुस्तक ‘आलोचक के मुख से’ पटना में दिए गए व्याख्यानों का संकलन है जो वर्ष 2005 ई० में प्रकाशित हुआ।

            यह पुस्तक पटना में प्रगतिशील लेखक संघ के विभिन्न मंचों से दिए गए पांच व्याख्यानों का संग्रह है। इसका प्रकाशन खगेंद्र ठाकुर ने वर्ष 2005 में किया था। यह व्याख्यान कार्ल मार्क्स और उनके साहित्य चिंतन, राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन और प्रेमचंद की भूमिका, रामचंद्र शुक्ल की नवजागरण कालीन चेतना और उनके साहित्येतिहास दर्शन साथ ही समकालीन आलोचना की समस्या पर केंद्रित है। पुस्तक का शीर्षक ‘आलोचक के मुख से’ नामवर सिंह की वाचिक आलोचना को चरितार्थ करता है। नामवर सिंह के व्याख्यानों की पुस्तकों में यह पहली संपादित पुस्तक है। यह पुस्तक नामवर सिंह के आलोचना में प्रतिपादित दृष्टिकोण और विचारों को भी दर्शाती है, साथ ही नामवर सिंह के व्याख्यानों की प्रकृति तथा हिंदी आलोचना की वाचिक परंपरा के महत्व को भी रेखांकित करती है।

सभा-गोष्ठियों में दिये गए उनके व्याख्यानों को ही पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवा दिया गया। 1959 के एक व्याख्यान में आधुनिक साहित्य के संदर्भ में उनकी कही यह बात आज भी प्रासंगिक है – “आधुनिक साहित्य जितना जटिल नहीं है, उससे कहीं अधिक उसकी जटिलता का प्रचार है। जिनके ऊपर इस भ्रम को दूर करने की जिम्मेदारी थी, उन्होंने भी इसे बढ़ाने में योग दिया।” यहां वे ‘साधारणीकरण’ की चर्चा करते हुए कहते हैं, “नए आचार्यों ने इस शब्द को लेकर जाने कितनी शास्त्रीय बातों की उद्धरणी की, और नतीजा? विद्यार्थियों पर उनके आचार्यत्व की प्रतिष्ठा भले हो गई हो, नई कविता की एक भी जटिलता नहीं सुलझी।” डॉ. नामवर सिंह की आलोचनात्मक पुस्तक “आलोचक के मुख से” में कुल पाँच व्याख्यान (अध्याय) संकलित हैं, जो पटना में प्रगतिशील लेखक संघ के मंच पर विभिन्न अवसरों पर प्रस्तुत किए गए थे।

राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन और प्रेमचंद –

            यह व्याख्यान नामवर सिंह द्वारा 23 फरवरी, 1980 ई॰ को बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान (पटना) में आयोजित प्रेमचंद जन्मशताब्दी समारोह में दिया गया था।

प्रेमचन्द के सम्पूर्ण कृतित्व को भारतीय मुक्ति-आन्दोलन की महागाथा कहा जाए तो शायद यह अत्युक्ति नहीं होगी। 1907 से लेकर 1936 तक के भारतीय जीवन-सन्दर्भों का उनके द्वारा प्रस्तुत सर्वांगीण चित्रण का केन्द्र-बिन्दु भारतीय जनता को मुक्ति की प्रबल आकांक्षा है। वे मानते थे कि — “साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि राजनीति के आगे मशाल दिखाते हुए चलने वाली सच्चाई है।”[2] भारतीय मुक्ति-आन्दोलन के सन्दर्भ में उनके इस कथन का विशेष अर्थ इसलिए है कि साहित्य में राजनीतिज्ञों के विचारों का अनुगमन करने की आशा की जाती है। लेकिन प्रेमचन्द इस भ्रम को वैचारिक और रचनात्मक दोनों स्तरों पर तोड़ते हैं। सन् 1930 ई. में बनारसीदास चतुर्वेदी को लिखे पत्र में प्रेमचन्द की अभिलाषा इसका प्रमाण है—“मेरी अभिलाषाएँ बहुत सीमित हैं। इस समय सबसे बड़ी अभिलाषा यही है कि हम अपने स्वतंत्रता-संग्राम में सफल हों। मैं दौलत और शोहरत का इच्छुक नहीं हूँ। खाने को मिल जाता है। मोटर और बँगले की मुझे हवस नहीं है। हाँ, यह ज़रूर चाहता हूँ कि दो-चार उच्चकोटि की रचनाएँ छोड़ जाऊँ लेकिन उनका उद्देश्य स्वतंत्रता-प्राप्ति ही हो।”[3] प्रेमचन्द के भारतीय मुक्ति की इसी अप्रतिम सरोकारों को अभिव्यक्त करना ही मेरा लक्ष्य रहा है । प्रेमचंद राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति के लिए उस तरीक़े का इस्तेमाल करने लगते हैं, जिसे अँग्रेज़ी में “विकेरियान नेशनलिस्म” कहा जाता है। दमन और आतंक के सहारे चलने वाले औपनिवेशिक शासन में लेखकों के लिए अपनी राष्ट्रीय भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए यही रास्ता बचा रहता है।

इतिहास के जिस दौर में प्रेमचंद ने कथा-लेखन की शुरुआत की, उस समय उनके समक्ष सबसे बड़ी प्रमुख चुनौती थीं: राष्ट्र की मुक्ति। देश अंग्रेजी सत्ता की गुलामी में जकड़ा था। इस गुलामी से मुक्ति के लिए कई तरह के आंदोलन हो रहे थे। तरह-तरह के लोग इनमें शामिल थे। इन लोगों के अपने अंतर्विरोध भी थे। कुछ लोगों का मानना था कि इन अंतर्विरोधों को भूल कर, सबको इस आंदोलन में शरीक होना चाहिए । जबकि कुछ लोग ऐसे थे जो भारतीय सामाजिक संरचना में निहित शोषणामूलक आयाम देख-समझ लेते थे परन्तु अंग्रेजी दासता और औपनिवेशिक सत्ता-संरचना में निहित यातना, अत्याचार और क्रूरता उनकी दृष्टि से ओझल रहता था या इसे नजरंदाज करते थे। नतीजतन ऐसे लोगों की सारी कवायद ब्रिटिश सत्ता का हित-समर्थन करती थी। लेकिन इसके साथ ही प्रेमचंद इसके अंतर्विरोधों को भी उजागर करते थे, इसे ना भूलने पर जोर देते थे। डॉ नामवर सिंह का वक्तव्य यहाँ अनुकरणीय है – “1905-1906 के बंग-भंग से लेकर 1936 तक, जब प्रेमचन्द की मृत्यु हुई, इन 30 वर्षों के भारतीय जीवन की धड़कन, उसका संघर्ष, उसकी पराजय, उसका दुःख, उसका दर्द अपनी समस्त गहराई के साथ और अपनी समस्त व्यापकता के साथ अगर किसी एक भारतीय लेखक में आप ढूँढना चाहें, तो रवीन्द्रनाथ ठाकुर के रहते हुए, शरतचन्द्र के रहते हुए. सुब्रह्मण्य भारती के रहते हुए, वि.स. खाण्डेलकर के रहते हुए, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के रहते हुए, डॉ. मुहम्मद इकबाल के रहते हुए भी मैं प्रेमचन्द का नाम लेना चाहूँगा, क्योंकि यही वह एकमात्र साहित्यकार है जिनके साहित्य में स्वाधीनता संग्राम की अमर गाथा अपने पूरे ब्योरे के साथ कही गई है।”[4] सामंतवाद, जमीदारी प्रथा और जाति प्रथा के भीतर मौजूद छुआछूत ऐसे ही अंतर्विरोध थे। प्रेमचंद अंतर्विरोध की जटिलता और शोषणमूलक पहलू को समझते हुए इसका विरोध करते थे; साथ ही आजादी की लड़ाई का पूर्णतः समर्थन भी करते थे।

            भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में जिन थोड़े लेखकों ने भागीदारी की, (फणीश्वर नाथ रेणु के शब्दों में कहें तो न सिर्फ कलम से बल्कि काया से भी) प्रेमचंद उनमें से एक थे । उन्होंने स्वाधीनता-आंदोलन के लिए न सिर्फ पत्र-पत्रिकाओं में लेख और कहानियाँ लिखी, अपितु काया से शिरकत भी की । डॉ नामवर सिंह के अनुसार, – “प्रेमचंद ने देश प्रेम की भावना से अपना साहित्य जीवन प्रारम्भ किया।”[5] उनके कहानी-लेखन का आरंभ देश-भक्ति की कहानियों से हुआ, जिसका सभी दृष्टियों से अनवरत विकास होता गया। प्रेमचंद का प्रथम कहानी संग्रह ‘सोजे-वतन’ जिसमें  सर्वप्रथम देशभक्ति का भाव परिलक्षित होता है। देशप्रेम की ऐसी कहानियां उस समय हिंदी-उर्दू किसी भाषा में नहीं लिखी गई थीं। देशप्रेम की कहानी की शुरुआत यहीं से होती है। इसकी एक कहानी ‘दुनिया का सबसे अनमोल रत्न’ का अंतिम वाक्य कुछ इस प्रकार है, “खून का वह आखिरी कतरा जो वतन की हिफाजत में गिरे, दुनिया की सबसे अनमोल चीज है।”[6] इसी कारण अंग्रेजी सत्ता ने ‘सोजे-वतन’ की प्रतियां जलवायी और कहानी-संग्रह को बैन कर दिया गया। प्रेमचंद की स्वाधीनता-आंदोलन से सम्बंधित ‘उपदेश’ शीर्षक से उनकी पहली कहानी छपी। उस समय स्वाधीनता आंदोलन को जातीय आंदोलन भी कहा जाता था। सन् 1917 ई॰ में प्रकाशित इस कहानी से 1935 ई॰ में प्रकाशित ‘कातिल की मां’ तक की कहानियों के कई स्वर हैं। उनकी कुछ कहानियों में स्वाधीनता आंदोलन या उसके विभिन्न कार्यक्रमों को सीधे-सीधे विषय बनाया गया है। कुछ कहानियों का कोई पात्र स्वाधीनता-आंदोलन से जुड़ा है तो कुछ कहानियों में स्वाधीनता-आंदोलन के दौरान घटी सच्ची घटनाओं को विषय बनाया गया है। कुछ कहानियों का विषय दूसरा है, लेकिन संदर्भ स्वाधीनता- आंदोलन है।

            इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रेमचंद ने अपने अधिकांश उपन्यासों, कहानियों एवं लेखों में राष्ट्रीय एकता और धार्मिक सद्भावना का चित्रण किया है। 1907 से लेकर 1936 तक इस आजादी की लड़ाई में कितने रंग, कितने दौर आए. और हर मौके पर प्रेमचन्द राजनीति के पीछे नहीं बल्कि आगे ही थे। प्रेमचन्द ने राष्ट्रीयता का सबक इसी रूप में दिया था।

आचार्य शुक्ल और हिन्दी नवजागरण –

            यह व्याख्यान डॉ॰ नामवर सिंह द्वारा 11 अक्तूबर, 1984 ई॰ को बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान (पटना) में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जन्मशती समारोह में दिया गया था।

            उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ से भारत के नवशिक्षित बौद्धिकों में एक नई चेतना का उदय हुआ जिसके अग्रदूत राजा राममोहन राय माने जाते हैं। इस चेतना को यूरोप के ‘रेनेसां’ (Renaissance) के आधार पर अपने देश में कहीं ‘पुनर्जागरण’ और कहीं ‘नवजागरण’ कहा जाता है। चेतना की यह लहर देर-सबेर कमोवेश भारत के सभी प्रदेशों में फैली। किंतु अधिक चर्चा बंगाल नवजागरण और महाराष्ट्र प्रबोधन की ही होती है। अन्य प्रदेशों की तरह हिंदी प्रदेश में भी नवजागरण की यह लहर उठी किंतु जरा देर से उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, सन् 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पराजय के लगभग एक दशक बाद और इसका प्रसार भी बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दो दशकों तक बना रहा। हिंदी नवजागरण की चर्चा अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीय बौद्धिकों के हल्के में कम ही सुनाई पड़ती है; यहां तक कि कुछ लोग उसके अस्तित्व को भी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। कारण शायद यह हो कि हिंदी नवजागरण संबंधी अधिकांश रचनाएं हिंदी में ही हुई; अंग्रेजी में उन्हें सुलभ कराने के प्रयास भी बहुत कम ही हुए। विडंबना तो यह है कि स्वयं हिंदी जानने वाले आधुनिक बौद्धिक भी, अपनी इस समृद्ध विरासत से भलीभांति परिचित नहीं हैं।

            1857 के गदर का केंद्र हिंदी प्रदेश ही था, इसलिए हिंदी नवजागरण की प्रकृति पर गदर की स्मृति की छाया पड़ना स्वाभाविक ही था। नवजागरण का अलख जगाने वाले अधिकांश छोटे-बड़े तत्कालीन लेखकों की रचनाओं में दूर तक सुनाई पड़ती है। हिंदी नवजागरण का बीज मंत्र फूंकने वाले प्रथम अग्रदूत भारतेन्दु हरिश्चन्द्र थे, जिनकी मुख्य प्रतिज्ञा यह थी कि ‘स्वत्व निज भारत है।’ भारतेन्दु का ‘स्वत्व’ वही था जिसे आज ‘जातीय अस्मिता’, ‘जातीय पहचान’ और अंग्रेजी में ‘आइडेंटिटी’ कहते हैं।

                        इस आख्यायन में मूलतः जिस नवजागरण पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है, वह है – ‘हिन्दी नवजागरण’। इस विषय पर सर्वप्रथम डॉ॰ रामविलास शर्मा अपने चिंतन और लेखन के माध्यम से स्थापित करने की कोशिश किया है। डॉ॰ रामविलास शर्मा अखिल भारतीय नवजागरण एवं हिन्दी नवजागरण में अंतर पर ध्यान आकर्षित करते है – “अखिल भारतीय नवजागरण के अन्तर्गत हिन्दी नवजागरण की कुछ अपनी जातीय विशेषताएँ हैं। यह केवल धार्मिक और सामाजिक सुधारकों की देन नहीं है, बल्कि हिन्दी नवजागरण की जो मुख्य विशेषता है, वह यह कि इस नवजागरण में यहाँ के बौद्धिकों और मुख्य रूप से साहित्यकारों और लेखकों ने भूमिका अदा की है।”[7] आचार्य रामचंद्र शुक्ल जिस समय साहित्य लेखन कर रहे थे, उस समय पश्चिम में विज्ञान के क्षेत्र में नए-नए अविष्कार और साहित्य के क्षेत्र में नए-नए सिद्धांतों का प्रतिपादन हो रहा था। पश्चिम से लेकर बंगला तक की परंपरा पर विचार करते हुए छायावाद पर अपने विचार प्रस्तुत करते हैं। समाज के उपयोग के लिए शुक्ल जी पश्चिम के ज्ञान-विज्ञान से भी भारतीय समाज को परिचित कराना आवश्यक मानते थे। विश्वप्रपंच की भूमिका के शुरुआत में ही आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है कि “गत शताब्दी में योरोप में ज्यों-ज्यों भौतिक विज्ञान, रसायन, भूगर्भविद्या, प्राणिविज्ञान, शरीरविज्ञान इत्यादि के अंतर्गत नई-नई बातों का पता लगने लगा और नए-नए सिद्धांत स्थिर होने लगे त्यों-त्यों जगत के संबंध में लोगों की जो भावनाएं थीं वे बदलने लगीं। जहाँ पहले लोग छोटी से छोटी बात के कारण को न पाकर उसे ईश्वर की कृति मान संतोष कर लेते थे वहाँ चारों ओर नाना विज्ञानों के द्वारा कार्य-कारण की ऐसी विस्तृत श्रृंखला उपस्थित कर दी गई कि किसी को बीच ही में ठिठकने की आवश्यकता न रह गई।”[8] विश्वप्रपंच की लम्बी भूमिका में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने विज्ञान से संबंधित उस समय के तात्कालिक विचारों पर महत्त्वपूर्ण रूप से चर्चा की है। परमाणु की संरचना तक पर उसमें उन्होंने विचार किया। एक साहित्य का लेखक विज्ञान के सिद्धांतों पर विचार कर रहा है यह एक बड़ी बात है। इससे यह स्पष्ट होता है कि शुक्ल जी एक बड़ी दृष्टि के साथ अनुवाद कार्य कर रहे थे।

            आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी आलोचना के द्वारा उस अभियान को एक व्यवस्थित शस्त्र प्रदान किया। उन्होंने परंपरागत भारतीय काव्यशास्त्र की सामंती रूढ़ियों और पश्चिम के पतनशील पूंजीवादी साहित्य-सिद्धांतों का विरोध करते हुए उनसे स्वतंत्र एक सम्यक् आधुनिक साहित्य-शास्त्र का निर्माण किया जो वस्तुनिष्ठ दार्शनिक आधार पर प्रतिष्ठित है। उन्होंने साहित्य के लोकोत्तर ब्रह्मानन्द स्वरूप का निषेध किया और उसे घनिष्ठ रूप से लोक से सम्बद्ध किया और बताया कि लोकहृदय में लीन होने की दशा का नाम रस दशा है। इस स्थापना का क्रांतिकारी महत्व यह है कि “लोक हृदय में लीन होने की कसौटी रख कर उन्होंने हर तरह की संकुचित व्यक्तिवादी और भाववादी धारणाओं से साहित्य को मुक्त करके उसे सामाजिक जीवन का एक अंग बना दिया है।”[9]

            आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने साहित्यशास्त्र की तमाम भाववादी और रहस्यवादी धारणाओं की जड़े दी। अब साहित्य का प्रयोजन शुद्ध आनंद या मनोरंजन के स्थान पर लोकमंगल या सामाजिक कल्याण हो गया। नामवर सिंह के शब्दों में “उन्होंने अपने सौंदर्यबोध तथा रसानुभूति को शुद्ध आनंद की स्थिति से ऊपर उठाकर लोकमंगल की उदात्त सामाजिक पृष्ठभूमि पर प्रतिष्ठित किया। शुक्ल जी ने समीक्षा को निष्क्रिय व्याख्या से आगे बढ़कर सक्रिय परिवर्तनकारी सामाजिक शास्त्र के रूप में प्रतिष्ठित किया।”[10] शुक्लजी ने लोकमंगल के इसी मानदंड के अनुसार तुलसीदास को सूरदास से श्रेष्ठ बतलाया। कहना न होगा कि शुक्ल जी ने तॉलस्ताय और गांधी जी के हृदय परिवर्तन और अप्रतिरोध के आदर्श का खंडन करके सक्रिय प्रतिरोध के आदर्श की प्रतिष्ठा की। आचार्य शुक्ल अद्वितीय इतिहास विवेक का परिचय देते हुए वीरगाथा काल और रीतिकाल की तुलना में भक्तिकाल को ऊँचा आसन दिया और आधुनिक काल में गद्य के प्रचार और नए युगांतरकारी साहित्य के महत्व को रेखांकित किया।

            कहना न होगा कि यहां आचार्य रामचंद्र शुक्ल एक जनधर्मी बुद्धिजीवी की तरह नज़र आते हैं। आचार्य शुक्ल की चिंता में आमजन और वह किसान है जिसे वह शिक्षित और समझदार करना चाहते हैं। वे यह चाहते थे कि राजनीतिक दृष्टि से शिक्षित होना जरूरी है। आचार्य शुक्ल हिंदी नवजागरण के दौर में भारतीय राजनीति को एक सजग जनधर्मी बौद्धिक की तरह देख रहे थे। इसी दृष्टि से वह अपनी आलोचना का निकष तैयार करते हैं जिसमें तुलसी का लोकमंगल जायसी की लोक संस्कृति और सूर का जीवन उत्सव का रंग है। आधुनिक स्वाधीनता आंदोलन में भारतीय राष्ट्रवाद में साम्राज्यवाद के विरोध में जो स्वरूप उभर रहा था उसमें छोटे और सीमांत किसान उपेक्षित थे। साधारण जनमानस भी वहां कमतर ही था। आचार्य शुक्ल उसकी भूमिका के बारे में बार-बार लिखते हैं और उसे इस आंदोलन का आधार मानते हैं। आचार्य शुक्ल असहयोग-आंदोलन के पक्षधर थे लेकिन वो इस बात पर ज़ोर देकर कहते है कि यह ग्रामीण किसानों से अधिक पूँजीपतियों के लिए ज्यादा लाभप्रद है, शुक्ल जी स्पष्ट शब्दों में कहते है – “पश्चिम के राष्ट्र अपने को जिससे मुक्त करने की चेष्टा कर रहे हैं उसी पूँजीवाद की ओर यह (असहयोग) एक बढ़ता कदम है। यह पूंजी बटोरने और समाज में व्यक्तिवादी जीवन-मूल्यों के क्षुद्र अमेरिकी मानदंड स्थापित करने का प्रयास भर है।” वह भारतीय जीवन के पारंपरिक मूल्यों, सामूहिकता, अनुशासन् और उदत्त तत्वों की कसौटी को इसलिए ज्यादा तवज्जो देते हैं क्योंकि वह प्राच्यवाद की इतिहास दृष्टि के उस चिंतन का प्रतिरोध करते हैं जिसमें भारतीय संस्कृति, इतिहास को अध्यात्म, रहस्यवादी और चमत्कारवाद के आलोक में विवेचित किया गया।

            उनका संपूर्ण लेखन इस औपनिवेशिक दृष्टि के समानांतर भारतीय इतिहास दृष्टि की महत्ता को प्रतिपादित करता है। आचार्य शुक्ल उस आलोचक राष्ट्र की कल्पना करते हैं जो अभिजात्य और उपनिवेशवाद के वरअक्स सामान्य जन संस्कृति. प्रकृति, सौंदर्य और लोक की उदात्त भावना से निर्मित है। अपने आलोचना संघर्ष में स्वाधीनता आंदोलन और हिंदी नवजागरण के चिंतक की तरह वह जिस सजगता से भूमिका अदा करते हैं वह सचमुच उन्हें सिर्फ एक आलोचक और विचारवान बौद्धिक की तरह ही नहीं प्रस्तुत करता बल्कि वह अपने संपूर्ण लेखन और विचार से एक प्रतिबद्ध समाज सुधारक स्वाधीनता संग्राम सेनानी और जनधर्मी बुद्धिजीवी की तरह नजर आते हैं।

आचार्य शुक्ल का साहित्येतिहास-दर्शन –

यह व्याख्यान डॉ॰ नामवर सिंह द्वारा 11 अक्तूबर, 1984 ई॰ को बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान (पटना) में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जन्मशती समारोह में दिया गया था। यह उस समारोह के अंतिम सत्र में अध्यक्ष-पद से दिया गया व्याख्यान है।

वास्तव में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य के प्रथम इतिहासकार हैं। यद्यपि उनके पूर्व गार्सा-द-तासी, शिव सिंह सेंगर, मिश्रबन्धु और जार्ज ग्रियर्सन ने हिन्दी साहित्येतिहास की सामग्री जुटाने तथा जार्ज ग्रियर्सन ने उस समय यूरोप में प्रतिष्ठित दार्शनिक सिद्धान्त विधेयवाद (पोजिटिविज़्म) की प्रणाली का इतिहास लेखन में प्रयोग करने का भी किंचित प्रयास था, पर पहली बार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ही विधेयवादी प्रणाली पर हिन्दी साहित्य के इतिहास का निर्माण किया। उसके लिए जिस सामग्री की जरूरत थी वहाँ ‘मिश्र बन्धु विनोद’ तथा ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ की खोज रिपोर्टों द्वारा सामने आ चुकी थी । जार्ज ग्रियर्सन, गौरीशंकर हीराचन्द्र ओझा,  चन्द्रधर शर्मा गुलेरी, कर्नल वुड, डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल, राहुल सांकृत्यायन, विनयतोष भट्टाचार्य, हरप्रसाद शास्त्री आदि ने भी हिन्दी साहित्येतिहास की महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध करायी थी। जार्ज सेन्ट्सबरी, एडमंड गूज, लुई कजामिया आदि के अंगरेजी साहित्येतिहासों से प्रेरणा ग्रहण कर आचार्य शुक्ल ने हिन्दी साहित्य का व्यवस्थित ‘विचार श्रृंखलाबद्ध इतिहास’ जिसकी आवश्यकता का अनुभव, विश्वविद्यालयों में हिन्दी शिक्षा का विधान होने पर, छात्र और अध्यापक दोनों कर रहे थे, प्रस्तुत करने का प्रयास किया। उन्होंने अनुभव किया कि “सात आठ सौ वर्षों की संचित ग्रंथराशि सामने लगी हुई थी, पर ऐसी निर्दिष्ट सरणियों की उद्‌भावना नहीं हुई थी, जिसके अनुसार सुगमता से प्रभूत सामग्री का वर्गीकरण होता।”[11] वे (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल), मिश्रबन्धुओं के कविवृत संग्रह और काल विभाजन से संतुष्ट नहीं थे। उनका उद्देश्य हिन्दी साहित्य का विचार ‘श्रृंखलाबद्ध इतिहास’ प्रस्तुत करना था, जिसमें वैज्ञानिक इतिहास बोध के साथ राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक- सांस्कृतिक परिपेक्ष्य में, हिन्दी साहित्य का विकास तथा विभिन्न काल खण्डों में विभिन्न साहित्यिक प्रवृत्तियों और विशेषताओं का विश्लेषण निर्धारण प्रमुख उद्देश्य हो।

            अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए शुक्ल जी ने सर्वप्रथम ‘साहित्य’ के सम्बन्ध में अपनी धारणा स्थिर की। सही माने में यह कहना न्याय-संगत होगा कि हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने के काफी पूर्व उनकी ‘साहित्य-सम्बन्धी’ धारणा स्थिर हो चुकी थी। यह ‘धारणा’ यह थी कि “साहित्य शिक्षित जनता की चित्रवृति का प्रतिनिधित्व करता है। उसकी प्रवृत्तियों के बदलाव के अनुसार साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता है तथा उनके प्रभावों की प्रेरणा से भिन्न-भिन्न शाखाएं फूटती हैं।”[12] अपने इतिहास के संशोधित-परिवर्तित संस्करण में ‘काल विभाग’ शीर्षक प्रकरण के प्रथम वाक्य में शुक्ल जी ने ‘शिक्षित जनता’ पढ़ के ‘शिक्षित’ विशेष विशेषण को छोड़ दिया है। यह छोड़ना अकारण या असावधानीजन्य नहीं है। वस्तुत: साहित्य को केवल ‘शिक्षित’ जनता की “चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब” मानने पर कई अव्याख्येय उलझनें पैदा हो जाती हैं. जिनका बोध शुक्ल जी को भी था, पर शुक्ल जी का ”जनता’ और ‘शिक्षित जनता’ का यह द्वन्द्व उनके पूरे साहित्येतिहास में विद्यमान है, जिसके फलस्वरूप नाथों और निर्गुण सन्तों के साहित्य के मूल्यांकन और इतिहास की धारा में उनके सही स्थान-निर्धारण में वे चूक गये हैं। पर “इतिहास दृष्टि” नामक महत्वपूर्ण पुस्तक के लेखक डॉ. मैनेजर पांडेय ने इसकी जो व्याख्या की है, वह पूर्णतः सन्तुष्ट करने वाली नहीं है। वे बताते हैं कि “यह द्वन्द्व बार-बार सामाजिकता और साहित्यिकता के द्वन्द्व के रूप में उभर कर सामने आता है।…………साहित्यिकता के मूल में अनुभूतिवाद और अभिव्यक्तिवाद का योग है और सामाजिकता के मूल में लोकसंग्रह का भाव। साहित्यिकता की कसौटी ‘शिक्षित जनता’ की चित्तवृत्ति है और सामाजिकता की कसौटी सामान्य जनता।“[13] इस व्याख्या के संबंध में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है कि “सिद्धों ने निम्न श्रेणी की प्राय: अशिक्षित जनता को प्रभावित किया, लेकिन इनकी कविताएँ शुद्ध साहित्य की कोटि में नहीं आ सकतीं।”[14]

            शुक्ल जी की इतिहास-दृष्टि के सम्बन्ध में दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि वे विधेयवादी हैं या नहीं। नलिन विलोचन शर्मा ने उन्हें विधेयवादी या ‘पाजिटिविट्स’ कहा था। मैनेजर पांडेय ने इसका खंडन करते हुए लिखा है- “आचार्य शुक्ल की इतिहास दृष्टि विधेयवादी निर्धारणवाद, तथ्यवाद, झूठी वैज्ञानिकता, विचारधारात्मक संघर्ष में तटस्थता और पुरातात्विकता का शिकार नहीं है। उनका दृष्टिकोण ऐतिहासिक और वस्तुवादी है। उनकी इतिहास दृष्टि मूल्यपरक और पक्षधर है, वे सामंती और पूंजीवादी जीवन-मूल्यों आदि का विरोध करते हैं और जनवादी संस्कृति, परम्परा तथा कला मूल्यों का पक्ष लेते हैं।”[15] डॉ मैनेजर पांडेय ने इस प्रसंग में जो बातें कही हैं, वे बड़ी अच्छी और शुक्ल जी के महत्व को बढ़ाने वाली है। पर उनमें श्रद्धा या विचार विशेष के प्रति अतिरिक्त मोह की झलक भी दिखाई देती है। पारंपरिक और प्रगतिशील चिन्तन के विकास में खतरे दोनों तरफ से आते है। पहला खतरा सामन्तवादी और पूँजीवादी व्यवस्था के पक्षधरों की ओर से होता है जो कलावाद, अपवाद आदि के नाम पर परम्परा, इतिहास समाज और साहित्य के सम्बन्ध आदि को नकारने पर बल देते है। पर दूसरा खतरा, जो कम हानिकारक नहीं होता, प्रगतिशील चिन्तन के अतिरेकी दृष्टिकोण से पैदा होता है। यह खतरा चिन्तन के विकास को रोक देता है। डॉ. मैनेजर पाण्डेय ने शुक्ल जी की प्रशंसा में इसी अतिरेकी दृष्टिकोण का परिचय दिया है। उनके कथनों से ऐसा प्रतीत होता है मानों शुक्ल जी एकदम मार्क्सवादी हो और उन्होंने जो इतिहास लिख दिया है यह ‘इदं मिथ्यम’ है। वे लिखते है मार्क्सवाद साहित्य और समाज के बीच विधेयवादी की तरह कार्यकारण सम्बन्ध भी नहीं मानता। मार्क्सवाद साहित्य और समाज के बीच रचनात्मक सम्बन्ध मानता है, वह समाज से साहित्य की सापेक्ष स्वायत्तता स्वीकार करता है। समाज के परिवर्तन और विकास में साहित्य का क्रान्तिकारी पक्षधर भूमिका पर बल देता है और साहित्य के कलात्मक सौन्दर्य तथा सौन्दर्यबोधीय महत्व की सार्थकता को भी मानता है। मुख्य बात यह है कि मार्क्सवाद साहित्य के वर्गीय स्वरूप, प्रयोजन और विचारधारात्मक रूप को पहचानते हुये साहित्य के इतिहास को समाज के वर्ग संघर्ष के इतिहास से जोड़कर देखता है। आचार्य शुक्ल अपने इतिहास और अपनी आलोचना, दोनों में सामन्ती संस्कृति, दरबारी साहित्य और पूंजीवादी कला मूल्यों एवं सिद्धान्तों का विरोध करते हैं।

            साहित्य और समाज एक दूसरे के पूरक हैं। समाज का विकास साहित्य के विकास को प्रभावित करता है और साहित्य विकसित होकर सामाजिक संस्कृति के विकास में अपना योग देता है। प्रायः समाज के विकास में रूढ़िवाद, अंधविश्वास, कुरीतियां, अशिक्षा जैसे बाधक तत्वों की भरमार होती है। समाज की तरह साहित्य की भी कुछ रूढ़ियाँ होती हैं. धारणाएँ और मान्यताएं होती हैं, जो कि उसकी प्रगति को अवरुद्ध करती हैं। डॉ. नामवर सिंह कहते है, “साहित्य और समाज के सम्बन्धों को देखने के लिए उस समाज को जानना बहुत जरूरी है, जिसमें साहित्य रचा गया।”[16]  ऐसे में विचारकों और लेखकों की चिन्ता का विषय था साहित्य को रूढ़िवाद से मुक्त करना। उसे अपने समय के राष्ट्रीय सामाजिक सवालों को ग्रहण करने योग्य बनाना तथा मानवीय मूल्यों और भावों विचारों को प्रस्तुत करना आदि। हिन्दी में यह कार्य व्यवस्थित रूप से जिन विद्वानों ने किया, उसमें आचार्य शुक्ल का नाम सबसे प्रमुख है। शुक्ल जी के आलोचना कर्म की इसी विशेषता की ओर रेखांकित करते हुए डॉ. मैनेजर पांडेय का कहना है- “आचार्य शुक्ल के लिए आलोचना केवल शब्दार्थ मीमांसा न थी। वे रचनाओं और रचना प्रवृत्तियों की व्याख्या करते हुए अपने समय के सामाजिक सवालों की चिंता करते दिखाई देते हैं। उन्होंने साहित्य चिंता को व्यापक सामाजिक चिंता के अंग के रूप में स्वीकार किया, साहित्य के विकास को हिन्दी भाषी जनता के जीवन के विकास से जोड़कर देखा और साहित्य की आलोचना को व्यापक सामाजिक ऐतिहासिक संदर्भ में समकालीन बनाने का प्रयास किया।”

            आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के प्रति अपार श्रद्धा रखते हुए भी मैं यह कहने का साहस करूँगा कि यह हिन्दी साहित्य के इतिहास की ही नहीं, भारतीय इतिहास की भी असन्तोषजनक व्याख्या है। यह आश्चर्य की बात है कि शुक्ल जी के इतिहास के प्रथम संस्करण के लगभग एक वर्ष पूर्व “की” (key) नामक अंग्रेज लेखक ने हिन्दी साहित्य का एक छोटा सा इतिहास लिखा था, जिसमें भक्तिकाल के आविर्भाव के वही कारण बताये गये थे जिन्हें शुक्ल जी ने प्रस्तुत किया हो। यह साम्राज्यवादी अंग्रेजी लेखकों का दृष्टिकोण था, जिसके झांसे में शुक्ल जी भी आ गये, ऐसा जान पड़ता है। वैसे महाप्रभु वल्लभाचार्य ने यह तो कहा ही था कि “म्लेच्छाक्रांत देश में भगवान की शरण में जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या है?” हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि शुक्ल जी ने विधेयवादी दृष्टि से हिन्दी साहित्य के इतिहास को समझने की कोशिश की थी, जो कदाचित आचार्य हजारी-प्रसाद द्विवेदी के पुनर्मूल्यांकन के बाद भी पुनर्मूल्यांकन की अपेक्षा रखती है ।

            आधुनिक युग में जिस परम्परा से आज के युवक कट चुके थे, जिस परम्परा से उनका सम्बन्ध टूट चुका था, आचार्य शुक्ल ने बहुत बड़ा काम किया कि इतिहास लिखकर उस पूरी परम्परा के साथ आज के युवा बुद्धिजीवियों को, लेखकों को जोड़ा, उससे परिचित कराया।

समकालीन आलोचना की समस्याएँ –

            यह व्याख्यान डॉ॰ नामवर सिंह द्वारा 11 फरवरी, 1982 ई॰ को बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान (पटना) के एक आयोजन में दिया गया था।

            हिन्दी नवजागरण की अवधारणा ज्ञान के प्रति विशेष प्रतिमान के अन्तर्गत, जिसे सुविधा के लिए औपनिवेशिक आधुनिकता का प्रतिमान कह सकते हैं। आधुनिकता की ज्ञानमीमांसा के निकष पर ही समस्याएँ चिन्हित की गयीं और उसी के अनुरूप समाधान सुझाए गए। इक्कीसवीं सदी तक आते-आते ज्ञान का यह प्रतिमान बदल गया। प्रतिमान बदलते ही समस्याओं की पहचान और उनके समाधान के स्वरूप में भी बदलाव आ गया। उन्नीसवीं शताब्दी की नवीन विचारधाराओं को यथावत न तो आज की समस्याओं की सम्यक् पहचान संभव है और न ही उनका समाधान। इसलिए हिन्दी नवजागरण की परिकल्पना और उसके द्वारा उठाए गए विमर्शों को नये सिरे से विचार करने की आवश्कता है। क्योंकि पुराने प्रतिमानों के अंतर्गत दिये गये जो सुझाव पहले तो सही प्रतीत होते थे, लेकिन वे अब अनुपयुक्त हो गए है।

            समकालीन हिंदी आलोचना अनेकों असुविधाजनक प्रश्नों और आपत्तियों के बीच चल रही है, जिसमें नैतिक पतन की बात प्रायः सुनाई पड़ती रहती है। एक ओर लेखकों का मानना है कि हिंदी में अच्छे आलोचकों का अभाव है, जो कृति की विशिष्टता को उभार दे और उसके ऐतिहासिक- साहित्यिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक आर्थिक मूल्यों की संश्लिष्टता और संवेदना का सही-सही मूल्यांकन करे। दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि तटस्थ होकर रचना का मूल्यांकन करते ही या असुविधाजनक सवाल या आपत्तियां उठाते ही रचनाकार निजी विद्वेष मान लेते हैं, और व्यक्तिगत संबंध खराब हो जाते है। नतीजन अच्छी आलोचना परिदृश्य से गायब है। इस संदर्भ में प्रसिद्ध आलोचक डॉ॰ नामवर सिंह का कथन दृष्टव्य है – “जिस तरह एक अच्छे रचनाकार के लिए बराबर अपनी रचना-प्रक्रिया की जांच-पड़ताल जरूरी है, उसी तरह एक आलोचक के लिए भी अपनी आलोचना की जाँच-पड़ताल जरूरी है।”[17]

            समकालीन लेखक और आलोचक के बीच संवाद है, लेकिन वाद-विवाद नहीं। वजह, रचना और आलोचना के बीच संवाद कम है लोकवृत में अनुगूंजे उठती है कि लेखक और आलोचक के बीच संबंध है। समकालीन आलोचकों को आपत्ति है कि लेखक सिर्फ प्रशंसा चाहते हैं। आलोचना करने पर या तो लेखक बुरा मान जाता है या संपादक उसे नहीं छापता यह एक अजीब स्थिति भी है कि प्रकाशक अपनी पत्रिकाओं में अपनी ही प्रकाशित पुस्तकों की समीक्षा चाहते है और उसे बाजारवादी माँग और पूर्ति के आर्थिक सिद्धांत पर प्रस्तुत करते हैं, ताकि उसे उत्कृष्ट रचना का प्रमाणपत्र मिल जाए और उसको पाठक वर्ग खरीदे। समकालीन युग में यह भी देखने को मिलता कि विमर्शो ने आलोचना को अपदस्थ कर दिया है, यह काफी हद तक सत्य है। विमर्शों कि तीव्र प्रतिकार्य के सम्मुख शांत सारगर्भित आलोचना को किनारे कर दिया गया। ‘विमर्शों’ के उत्थान ने आलोचना की उपस्थिति को कमज़ोर किया है। फ्रॉक क्लार्क ने लिखा है कि “आलोचना उस बारिश की तरह है, जो जड़ोच्छेदन नहीं करती, बल्कि लेखक को पौधे की तरह सींचती है।” आलोचना के सम्मुख मात्र यही चुनौतियां नहीं है? आधुनिक पठन-पाठन लेखन में तकनीकी क्रांति ने जो बदलाव किया है, उसने सम्पूर्ण साहित्यिक आलोचना को परिवर्तित कर दिया है।

            समकालीन कृति/आलोचना सोशल मीडिया/ विज्ञापनों माध्यम से सैकड़ों पाठकों तक आसानी से पहुंच जाती है, यहीं बाजरवाद का कमाल है। पाठकों द्वारा प्राप्त प्रतिक्रिया, समीक्षा या टिप्पणी या आलोचना का अनुशीलन करके कृति की समग्रता को समझा जा सकता है। जिस तरह की आलोचना शुक्लजी, द्विवेदीजी, से लेकर नामवर सिंह, रामविलास शर्मा, मैनेजर पाण्डेय या विजयदेव नारायण साही ने लिखी है, आज के समकालीन दौर में उसका मिलना मुश्किल है। आजकल अधिकतर पत्रिकाएं व्यक्तिगत संस्थाओं  या सरकारी विज्ञापन के अनुदान द्वारा प्रकाशित हो रही है। साहित्यिक पत्रिकाओं में बाजारवाद के अनुरूप लेखन का प्रचलन है। संपादक अपनी इच्छानुसार लेखन कराता है। लेखक प्रकाशक के रॉयल्टी निर्भर रहता है। आलोचक की आर्थिक स्थिति उससे भी बदतर है। ऐसे में आलोचना खानापूर्ति में बदल जाए तो कोई अधर्म नहीं। अच्छे आलोचनात्मक लेखन की कीमत संपादक दे सकने में असमर्थ, क्योंकि उनका कार्य बाजारवाद के अनुरूप कम लागत में आसानी से हो जा रहा है।

            समकालीन हिंदी आलोचना की इस दयनीय स्थिति के लिए रचनाकार भी जिम्मेदार है। रचनाकार ने आलोचक को कभी समकक्ष नहीं माना। आलोचना कर्म को दूसरे दर्जे का काम समझा, आलोचक को रचनाकार से निकृष्ट दर्जा दिया। डॉ॰ श्यामसुंदर दास के अनुसार – “यदि हम साहित्य को जीवन की व्याख्या मानें, तो आलोचना को उस व्याख्या की व्याख्या मानना पड़ेगा। ऐसा क्यों माना जाए ? आलोचना को जीवन की व्याख्या क्यों न माना जाए?” प्रायः आलोचना को रचनाकार व्यक्तिगत आलोचना मान लेता है, निराश या नाराज हो जाता है। कुछ आलोचक अपनी आलोचना के माध्यम से किसी रचनाकार को स्थापित और किसी को गिराने के लिए प्रयत्न करते हैं। इस संबंध में डॉ॰ नामवर सिंह का मानना है कि – “आलोचक कि सम्मति या उसका निष्कर्ष महत्वपूर्ण नहीं होता। उस निष्कर्ष तक पहुँचने की जो प्रक्रिया है, जो मूल्य प्रणाली है और उस निष्कर्ष तक पहुँचने के क्रम में आलोचक जिस मेधा का प्रदर्शन करता है, वह कभी-कभी ज्यादा महत्त्वपूर्ण हुआ करती है।”[18] स्वस्थ आलोचना सदैव व्यक्तिगत राग-द्वेष से रहित होती है। स्वस्थ आलोचना सदा रचना से संबंध रखती है न कि रचनाकर से। रचनाकार और आलोचक के व्यक्तिगत संबंधों से वह प्रभावित नहीं होनी चाहिए। “आलोचना स्वस्थ मन से साहित्य या कला का अध्ययन करना और उसके सौंदर्य को परखना सिखाती है। यही उसका परम कर्तव्य है।”[19] 

            आलोचना, साहित्य के समांतर चलने वाली रचना प्रक्रिया है। साहित्यकार जिन तत्त्वों, घटनाओं, अनुभवों का संश्लेषण कर रचना में पिरोता है, समान्यतः उन्हीं की व्याख्या एक आलोचक करता है, आलोचक अपने समय के ऐतिहासिक दबाव के अंतर्गत रचना के नवीन आर्थिक-सामाजिक- सांस्कृतिक-राजनीतिक आशय का उद्घाटन करता है और नया पाठ उपलब्ध कराता है। आलोचक इस मायने में दोहरी भूमिका निभाता है। एक तरफ वह रचना के संसार को समझता है तो दूसरी तरफ वैश्विक दुनिया में रचना की उपस्थिति का मूल्यांकन करता है तथा उसकी उपस्थिति के लिए प्रयत्नरत रहता है। समकालीन लेखकों के लिए आलोचक ‘तीसरी आंख’ की तरह होता है। आलोचना के संबंध में आलोचक के निष्कर्ष से अधिक उस प्रक्रिया में प्रयुक्त चिंतन प्रणाली अधिक महत्वपूर्ण होती है। इस संबंध में डॉ॰ नामवर सिंह के विचार दृष्टव्य है – “तर्क-युक्ति और मूल्य-प्रणाली के साथ ही किसी आलोचक की पहचान उसकी संवेदनशीलता से जानी जाती है, आँकी जाती है।” [20]

            समकालीन आलोचना अपने कठिन दौर से गुजर रही है। किसी भी भाषा का साहित्य तब तक अपने उत्कृष्ट स्तर पर नहीं पहुँचता, जब तक की उस भाषा के साहित्य की आलोचना/समालोचना/समीक्षा उच्च कोटि की नहीं होगी, पक्षरहित आलोचना, आलोचकों के द्वारा की जानी चाहिए। साथ ही समकालीन आलोचकों को उचित सम्मान तथा आर्थिक सुरक्षा की स्थिति का भी निर्माण किया जाना चाहिए।

            “नामवर सिंह आलोचना में एक और परंपरा के लिए भी याद किए जाते हैं और वह है वाचिक परंपरा। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी बहुत कुछ लिखने के अलावा उस वाचिक धारा के भी समर्थक थे, जिसकी लीक कबीर, नानक, दादू आदि की यायावरी और प्रवचनों से बनी थी। कहानी उनकी निगाह में ‘गल्प’ थी. ‘गप्प’ का तत्सम रूप, नामवर सिंह ने भी जीवन के उत्तरार्ध में वाचिक शैली में ही काम किया जिसका कुछ उपहास भी हुआ। ‘दूसरी परंपरा की खोज’ के बाद उनकी करीब एक दर्जन किताबें आईं जिनमें आलोचक के मुख से, कहना न होगा, कविता की जमीन और जमीन की कविता,  बात बात में बात आदि प्रमुख हैं। लेकिन वे ज्यादातर लिखी हुई नहीं, बोली हुई हैं। पाँच दशक से भी ज्यादा समय तक नामवर सिंह हिन्दी साहित्य की प्रस्थापनाओं, बहसों और विवादो के केन्द्र में रहे।”

            अंत में सिर्फ इतना कि हम मार्क्स के समाज को बदलने के नारे से असहमत हो सकते हैं, उसके क्रांतिकारी विचारों से अपनी असहमति दर्शा सकते हैं, उन्हें हिंसक बताकर उनसे नफरत कर सकते हैं। यही नहीं उसके पूंजीवाद विरोध को हम एकतरफा, वैचारिक दुराग्रह का प्रतीक भी मान सकते हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि पचास साल में पूंजीवाद के खात्मे की मार्क्स की भविष्यवाणी झूठ सिद्ध हो चुकी है, इसलिए उसके पूंजीवाद–विरोध में कोई दम नहीं है। लेकिन उसके दृष्टिकोण से, सर्वहारा वर्ग के कल्याण की उसकी सदेच्छा तथा उसके प्रति समर्पण हेतु किए गए सतत संघर्ष के लिए, उन कष्टों के लिए जो अपने विचारों पर दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ते हुए मार्क्स और उसके परिवार को उठाने पड़े थे, हमें उसका सम्मान करना ही पड़ेगा। इसलिए यदि दुनिया–भर में करोड़ों मजदूर, उसके नाम का एक साथ नारा लगाते हैं, जी–जान से उसको चाहते हैं, उसको अपना सच्चा हितैषी, गुरु और पथ प्रदर्शक मानते हैं, तो हमें यह मानना ही पड़ेगा कि वह व्यक्ति मनुष्यता का सच्चा हितैषी, महान विचारक, अर्थशास्त्री, समाजविज्ञानी और अपने समय का महान चिंतक था। मानवीय सभ्यता के उन महानतम चिंतकों में से एक जो शताब्दियों के अंतराल में कभी–कभी ही जन्मते हैं। इसलिए मार्क्स की मेधा, उसके संघर्ष, सोच, दूरदृष्टि, मानवप्रेम, उसकी जीवनसंगिनी जेनी और मित्र एंगल्स को हमारा नमन! शत–सहस्र नमन!

संदर्भ सूची

  1. पहल (पत्रिका) – 34, मई 1988, पृष्ठ 47
  2. खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 33
  3. बनारसीदास चतुर्वेदी द्वारा 1930 ई. में प्रेमचन्द को लिखें पत्र में ।
  4. खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 32
  5. खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 37
  6. प्रेमचंद, सोजे वतन (कहानी – संग्रह), हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, 1998, पृ. 16 
  7. खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 58
  8. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, विश्वप्रपंच (अनुवाद), (भूमिका से)
  9. डॉ॰ रामविलास शर्मा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना, पृ. 34
  10. डॉ॰ नामवर सिंह, आधुनिक साहित्य कि प्रवृत्तियां, पृ. 86
  11. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, संशोधित और परिवर्तित संस्करण, 1945 (2002 वि.), प्रथम संस्करण का वक्तव्य, पृ.-3  
  12. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, संशोधित और परिवर्तित संस्करण, 1945 (2002 वि.), प्रथम संस्करण का वक्तव्य, पृ. 3
  13. मैनेजर पांडेय, साहित्य और इतिहास दृष्टि, पिपुल्स लिटरेसी, मटिया महल, दिल्ली – 6, 1981, पृ. 104-5
  14. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, संशोधित और परिवर्तित संस्करण, 1945, पृ.-3  
  15. मैनेजर पांडेय, साहित्य और इतिहास दृष्टि, पृ. 110.
  16. खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 82
  17. खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 92-93
  18. खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 95
  19. डॉ॰ धीरेन्द्र वर्मा, हिन्दी साहित्य कोश, खंड-1 पृ. 122
  20. खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 96

[1] पहल (पत्रिका) – 34, मई 1988, पृष्ठ 47

[2] खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 33

[3] बनारसीदास चतुर्वेदी द्वारा 1930 ई. में प्रेमचन्द को लिखें पत्र में ।

[4] खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 32

[5] खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 37

[6] प्रेमचंद, सोजे वतन (कहानी – संग्रह), हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, 1998, पृ. 16 

[7] खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 58

[8] आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, विश्वप्रपंच (अनुवाद), (भूमिका से)

[9] डॉ॰ रामविलास शर्मा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना, पृ. 34

[10] डॉ॰ नामवर सिंह, आधुनिक साहित्य कि प्रवृत्तियां, पृ. 86

[11] आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, संशोधित और परिवर्तित संस्करण, 1945 (2002 वि.), प्रथम संस्करण का वक्तव्य, पृ.-3  

[12] आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, संशोधित और परिवर्तित संस्करण, 1945 (2002 वि.), प्रथम संस्करण का वक्तव्य, पृ. 3

[13] मैनेजर पांडेय, साहित्य और इतिहास दृष्टि, पिपुल्स लिटरेसी, मटिया महल, दिल्ली – 6, 1981, पृ. 104-5

[14] आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, संशोधित और परिवर्तित संस्करण, 1945, पृ.-3  

[15] मैनेजर पांडेय, साहित्य और इतिहास दृष्टि, पृ. 110.

[16] खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 82

[17] खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 92-93

[18] खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 95

[19] डॉ॰ धीरेन्द्र वर्मा, हिन्दी साहित्य कोश, खंड-1 पृ. 122

[20] खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 96

आचार्य नलिन विलोचन शर्मा और ‘साहित्य का इतिहास-दर्शन’ – नवनीत कुमार

आचार्य नलिन विलोचन शर्मा और ‘साहित्य का इतिहास-दर्शन’

नवनीत कुमार

सीनियर रिसर्च फेलो,

हिंदी साहित्य विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)

संपर्क- 9661778099

ईमेल- navjamui@gmail.com

सारांश

आचार्य नलिन विलोचन शर्मा को हिंदी में सौंदर्यशास्त्रीय आलोचना दृष्टि के आचार्य के रूप में जाना जाता है। हिंदी कविता में प्रयोगवाद के समानांतर चलने वाले काव्य आंदोलन नकेनवाद के ये प्रस्तोता थे। हिंदी समालोचना में इनका महत्वपूर्ण स्थान है। फणीश्वरनाथ रेणु के ‘मैला आँचल’ को प्रकाश में लाने का श्रेय इन्हें ही जाता है। आचार्य शर्मा की साहित्य संबंधी मान्यताएँ ‘दृष्टिकोण’, ‘नकेन के पपद्य’ आदि में उल्लिखित हैं। इनकी इतिहास दृष्टि भारतीय साहित्य में एक अलग ही प्रकार की विशिष्टता लिए हुए है। इनकी सबसे बड़ी विशेषता रही है कि इन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास-दर्शन को केवल हिंदी तक सीमित न रखकर उसे फ्रेंच, जर्मन, रूसी, पोलिश आदि के साहित्य से जोड़कर देखा। साहित्य के इतिहास को ये सामाजिक इतिहास, कृतियों अथवा उसमें व्यक्त विचारों के इतिहास के रूप में स्वीकार करते हैं। भारतीय साहित्य में इतिहास-दर्शन पर सबसे पहले समुचित दृष्टि नलिन विलोचन शर्मा की ही गई। भारतीय साहित्य को ये इनकी मौलिक देन है। ‘साहित्य का इतिहास-दर्शन’ नामक पुस्तक में इन्होंने साहित्य की इतिहास दृष्टि पर विशद विवेचन किया है।

बीज शब्द : साहित्य, इतिहास, दर्शन, परंपरा, लेखक, समूह, सामाजिक

शोध आलेख

इतिहास-दर्शन का सबसे पहला प्रयोग 18वीं सदी में वाल्टेयर ने किया था, किंतु इसका जनक हीगेल को माना जाता है। हीगेल के अनुसार- “इतिहास-दर्शन का अर्थ इतिहास सम्बम्धी चिंतनयुक्त मान्यताओं से है।”[1] इतिहास-दर्शन के संबंध में वे टॉमस कार्लाइल के हवाले से कहते हैं- “इतिहास वैसा दर्शन है, जो दृष्टांतों के माध्यम से शिक्षा देता है।”[2] उनके अनुसार इतिहास केवल सामान्य मूल्यों का विशेषीकरण नहीं करता, बल्कि ऐतिहासिक प्रक्रिया मूल्य के निरंतर नये रूपों को उत्पन्न करती हैं, जो पहले से ज्ञात नहीं हो। इस अर्थ में उन्होंने इसे वैज्ञानिकता से जोड़ते हुए इतिहास को अन्वेषण की एक प्रणाली के रूप में देखते हुए कहा कि “यह अतीत के ऐसे अवशेषों और आलेखनों का अन्वेषण करता है, जिनसे वर्तमान के समाधान और व्याख्या में सहायता मिल सके।”[3] उनकी दृष्टि में “इतिहासकार अतीत के विद्यमान अवशेषों का इस उद्देश्य से अध्ययन करता है कि वर्तमान का जो रूप है, उसकी व्याख्या की जा सके, उनमें छिपे कर्म के उत्स का आध्यात्मिक और शाश्वत वास्तविकता का उद्घाटन हो सके।”[4] इतिहास और इतिहासकार पर चर्चा के दौरान नलिन विलोचन शर्मा ने इतिहास निर्मात्ता के संबंध में बात की तथा उसे इतिहासकार से अलग करके देखा। इन दोनों के तात्विक विभेद को बताते हुए उन्होंने कहा कि “इतिहास निर्मात्ता हम उसे नहीं कहेंगे, जिसने इतिहास की रचना की, बल्कि उसे कहेंगे जिसने संसार के घटना प्रवाह को मोड़ा है।”[5] इसे उन्होंने अशोक तथा नेपोलियन से जोड़ते हुए उन्हें वास्तविक इतिहास निर्माता के रूप में देखा। आचार्य शर्मा इतिहास को रूढ़िवादिता से निकालकर वर्तमान से देखने की बात करते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि हम अपने अतीत को वर्तमान के प्रकाश में देखें, न कि वर्तमान को अतीत के नजर से देखें।

               आचार्य शर्मा ने भारतीय साहित्य को पाश्चात्य दृष्टि से देखने की बजाय अपनी दृष्टि से, भारतीय प्रतिमान से देखने की वकालत की। यहाँ वे दर्शनशास्त्री के. सी. भट्टाचार्य से प्रभावित दिखाई देते हैं, जहाँ भट्टाचार्य कहते हैं कि “पाश्चात्य प्रतिमानों के साथ अपने स्वदेशी प्रतिमानों का संश्लेषण करना हर जगह जरूरी नहीं है। जहाँ वह जरूरी लगे, वहाँ भी प्रक्रिया यह होनी चाहिए कि पाश्चात्य प्रतिमानों का अनुकूलन, समायोजन हमारे अपने प्रतिमानों द्वारा, हमारे प्रतिमानों के आधार पर हो, न कि इसके उलट।”[6]            

नलिन विलोचन शर्मा ने युग विशेष को लेखक समूह के रूप में देखने का प्रयत्न किया। वे कहते हैं “साहित्येतिहास कुछ अन्य प्रकार के इतिहासों की तरह कुछ विशिष्ट-लेखकों और कृतियों का इतिहास न होकर, युग-विशेष के लेखक समूह की कृति-समष्टि का इतिहास ही हो सकता है।”[7] उनका यह लेखक समूह किसी वाद में बंधा न होकर अपने समय को विविधता में रेखांकित करता है। प्रकारांतर से उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि लेखक समूह को ध्यान में रखकर यदि हम काल-विशेष का मूल्यांकन करेंगे तो उस काल की केवल मुख्य प्रवृत्तियों से ही नहीं, बल्कि उस दौर की कुछ अन्यान्य प्रवृत्तियों से भी हम मुखातिब हो सकेंगे। इस रूप में साहित्येतिहास को हम न केवल समग्रता में देख सकते हैं, बल्कि उसकी ठीक-ठीक व्याख्या भी कर सकते हैं।

              जिस तरह विजयदेवनारायण साही ने ‘लघुमानव के बहाने नई कविता पर एक बहस’ निबंध लिखा, प्रकारांतर से उसी तरह नलिन विलोचन शर्मा ने हिंदी साहित्येतिहास-दर्शन के बहाने जर्मन, फ्रेंच, रूसी, पोलिश, अंग्रेजी आदि विश्व साहित्य की इतिहास दृष्टि को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास किया। वे कहते हैं कि साहित्यिक इतिहास सही अर्थ में इतिहास है ही नहीं, क्योंकि यह वर्तमान का, सार्वभौम का, शाश्वत का ज्ञान है। इसकी पुष्टि वे जर्मन दर्शनशास्त्री शोपेनहार के हवाले से करते हैं कि “कला सदैव अपने लक्ष्य तक पहुँचती है, इसकी कभी उन्नति नहीं होती, यह पीछे नहीं छोड़ी जा सकती और न ही इसकी पुनरावृत्ति संभव है।”[8]

           आचार्य शर्मा का मानना है कि हिंदी को उसकी सुदीर्घ परंपरा से अलग कर नहीं देखा जा सकता है। उन्होंने हिंदी के साहित्येतिहासों का आलोचनात्मक विवरण प्रस्तुत करते हुए हिंदी के पहले साहित्येतिहासकार गार्सा द तासी से लेकर आचार्य रामचंद्र शुक्ल तथा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी तक की इतिहास दृष्टि पर विचार किया है। उन्होंने साहित्येतिहास के निर्माण में गौण रचनाकारों के कृतित्व की भूमिका को रेखांकित किया। इसके संबंध वे कहते हैं कि “महान लेखकों से अधिक महत्व उन गौणों का है, जिनसे विस्तार निर्मित होता है। हिंदी साहित्य के इतिहासों में इन महान गौणों की उपेक्षा हुई है और इसका कारण है कि शोध ने अपने वास्तविक कर्त्तव्य का पालन नहीं किया है।”[9] उनके अनुसार गौणों पर चर्चा न होने के कारण साहित्येतिहास का दायरा सीमित रहा है। प्रकारांतर से यहाँ आचार्य शर्मा रामचंद्र शुक्ल के फुटकल कवियों को एक अलग खाँचे में रखने से असहमत होते दीखते हैं। साहित्य के गौण तत्व पर विस्तृत चर्चा न करने के कारण ही राम काव्य में कैकेयी, मंथरा जैसे पात्र अबतक उपेक्षित रहे हैं। राम काव्य की सुदीर्घ परंपरा में इन पात्रों को या तो हेय दृष्टि से देखा गया या फिर सहानुभूति की दृष्टि से। छायावादी काल से पहले देखें तो मैथिलीशरण गुप्त के साकेत की उर्मिला के अतिरिक्त राम काव्य के किसी गौण चरित्र की उदात्तता का कोई ठोस चित्रण नहीं हुआ।  हालांकि स्वातंत्र्योत्तर युग में गौण कर दिए गए चरित्रों पर अच्छी संख्या में काव्य रचे गए, जिनमें केदारनाथ मिश्र प्रभात कृत ‘कैकेयी’, नरेश मेहता द्वारा रचित ‘शबरी’ आदि हैं। वहीं पचास के दशक में यदि राम काव्य के इतर देखें तो केदारनाथ मिश्र प्रभात कृत ‘कर्ण’, रामधारी सिंह दिनकर कृत ‘रश्मिरथी’ आदि रचनाएँ प्रमुख हैं, जहाँ साहित्य में लगभग उपेक्षित कर दिए गए पात्रों पर चर्चा हुई। ‘कर्ण’ नामक चरित्र का उद्धार तो हिंदी काव्य की ही देन है, जिसपर बाद में मराठी साहित्य के लेखक शिवाजी सावंत जैसे रचनाकारों ने कलम चलायी। एक अर्थ में देखें तो आचार्य शर्मा के लिए गौण ही वे असल कारक तत्त्व हैं, जो युगीन धारा को प्रवाहमान रखते हैं।

इतिहास लेखन की समस्या पर नलिन विलोचन कहते हैं कि “किसी युग के इतिहास-लेखन की समस्या सबसे पहले वर्णन की समस्या है, एक रूढ़ि के हास और दूसरी उसमें नई रूढ़ि के आविर्भाव को समझना आवश्यक है।”[10] इसी क्रम में उनका ध्यान परंपरा पर जाता है। परंपरा के वास्तविक अर्थ को बताते हुए वे कहते हैं कि “वे सारी संस्कारगत रूढ़ियाँ, साहित्यिक मान्यताएँ और अभिव्यंजना की प्रणालियाँ, जो एक लेखक को अतीत से प्राप्त होती हैं।”[11] हिंदी साहित्य के इस परंपरा को उन्होंने पाँच भागों में विभाजित किया है। जहाँ हिंदी साहित्य की पहली परंपरा को वे वीरगाथा-काल, भक्तिकाल और रीतिकाल में सम्मिलित भौतिकता में देखते हैं। भौतिकता की चर्चा इन्होंने दो रूपों में की है, जिनमें पहला मर्यादित और दूसरा अतिवादी है। इसके मर्यादित रूप को उन्होंने वीरगाथा काल और भक्तिकाल में तथा इसके अतिवादी रूप को रीतिकाल में देखा है। साहित्य की दूसरी परंपरा को यथार्थता से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि ‘पाश्चात्य साहित्य में यथार्थता का जो तत्त्व 19वीं शताब्दी के अंत में और 20वीं सदी के प्रारंभ में, संघटित आंदोलन के बाद ग्राह्य हुआ, वह सैकड़ों वर्ष पूर्व हमारे साहित्य के लिए साधारण बात थी। इसपर सिद्धांत और व्यवहार रूप में ध्यान न देने के कारण साहित्यिक इतिहास ढीले सूत्र में बंधी आलोचनाओं का रूप ग्रहण करता रहा है।’ इसके अतिरिक्त वे तीसरी परंपरा को मानवतावाद से, चौथी को मानववाद तथा पाँचवीं को धार्मिकता से जोड़कर देखते हैं। साहित्य की दूसरी परंपरा यथार्थता के संबंध में उनका मानना है कि “भिन्न-भिन्न युगों में आदर्श का ऊपरी आवरण तो बदलता है, किंतु यथार्थता का भीतरी ढाँचा बना रहता है।”[12] प्रकारांतर से देखें तो यथार्थता के संबंध में जो बात नलिन जी कर रहे हैं, वही बात सभ्यता और संस्कृति के संबंध में हजारी प्रसाद द्विवेदी करते हैं। द्विवेदी जी सभ्यता और संस्कृति के संबंध में कहते हैं कि मनुष्य के शरीर का ऊपरी आवरण सभ्यता है और उसका आंतरिक रूप संस्कृति है। नलिन जी जहाँ आदर्श में रूप देखते हैं, वहीं द्विवेदी जी सभ्यता में तथा जिसे वे यथार्थता में देखते हैं, उसे द्विवेदी जी संस्कृति के रूप में व्याख्यायित करते हैं।

साहित्य की तीसरी परंपरा मानववाद को वे जीवमात्र के कष्ट को दूर कर उसे सुखी बनाने में देखते हैं, उसमें एक प्रकार से पीड़ित के प्रति समव्यथा की भावना समाहित होती है, जहाँ सुखी को और सुखी बनाने की अपेक्षा दुखी को सुखी बनाना ही महत्वपूर्ण है। चौथी परंपरा को उन्होंने मानवतावाद से जोड़ा है। उनके अनुसार “मनुष्य अपने अतीत के ज्ञान और संस्कार की सहायता से अपने वर्तमान को मर्यादित कर सकता है।”[13] इसमें नलिन विलोचन शर्मा ने साहित्य की अनिवार्यता पर बल देते हुए उसे दर्शन की तुलना में अधिक सुग्राह्य बताया है। उनके अनुसार “दर्शन की जो कटुता थी साहित्य ने उसे कम किया।”[14] यानी दर्शन में जो बातें सीधे ढंग से कही गई हैं, साहित्य ने उसी बात को उपालंभ का रूप दिया। इसके संदर्भ में उन्होंने कबीर का स्मरण करते हुए कहा कि “कबीर यदि केवल दार्शनिक या संत ही रहते, तो उनकी कटुता कितनी चोट पहुँचाने वाली होती। किंतु अभिव्यंजना-विधि में उनकी कटुता बहुत कुछ मृदु हो जाती है और उनकी मानवता ही सतह पर आ पाती है; हिंदू-मुसलमान एक हैं, परमात्मा ही तो राम हैं! सगुण भक्ति का कबीर के द्वारा खंडन कुछ तीखा अवश्य है, किंतु तुलसी और सूर जब निर्गुण का खंडन करते हैं, तब उनकी सहिष्णुता देखने लायक होती है। मानवता की यह परंपरा हिंदू जीवन और भारतीय साहित्य की, विशेषत: हिंदी साहित्य की, एक प्रत्यभिज्ञेय परंपरा रही है।”[15]     

पाँचवीं और अंतिम परंपरा के रूप में उन्होंने धार्मिकता को देखा है। हिंदी साहित्य में इसकी महत्ता को वे आवश्यक रूप में देखते हैं। धार्मिकता की महत्ता का अनुमान हम इससे सहज ही लगा सकते हैं कि हिंदी साहित्य का भक्तिकाल और रीतिकाल तथा बहुत हद तक आधुनिक काल के आरंभिक दौर का आधार यही रहा है। साहित्य के भक्तिकाल को जॉर्ज ग्रियर्सन जैसे विद्वानों ने हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग कहा, यदि इसे कालविभाजन से अलग कर दिया जाए तो हिंदी साहित्य समाप्त तो नहीं होगा, किंतु श्रीहीन अवश्य हो जाएगा। इस कारण नलिन जी का धार्मिक प्रवृत्ति को अधिक प्रश्रय देना जायज ठहरता है। इस तरह हम देखते हैं कि नलिन विलोचन शर्मा ने हिंदी साहित्य की परंपरा की ओर जो इशारा किया वह युक्तिसंगत है। इस परंपरा को उन्होंने अतीत के गह्वर से प्राप्त संस्कारगत रूढ़ियों, साहित्यिक मान्यताओं तथा अभिव्यंजना की प्रणालियों से जोड़कर देखा है। भौतिकता को वे पाश्चात्य विचारकों की दृष्टि से देखने के बजाय अपने प्राचीन ग्रंथों जैसे वेद, शास्त्र आदि की दृष्टि से देखने की वकालत करते हैं। नलिन विलोचन शर्मा का मानना है कि हर कृति अपने-आप में श्रेष्ठ होती है। हम किसी रचना को किसी दूसरी रचना के साथ तुलना करके उसकी श्रेष्ठता और अश्रेष्ठता को सिद्ध नहीं कर सकते हैं। उसका काम लक्ष्य तक पहुँचना होता है, वह अपने लक्ष्य तक पहुँचकर सफल हो जाती है। उदाहरण के रूप में हम अज्ञेय की कविता ‘असाध्य वीणा’ को लेते हैं। इसका काव्यनायक केशकंबली ने जब असाध्य मानी जा रही वीणा को बजाया तब उसके बजते ही राजा, रानी सहित उस राजसभा में उपस्थित जन समूह अपने-अपने कार्य-व्यापार के अनुसार उसके संगीत को अनुभूत करते हैं। राजसभा को कर्म-संदेश सुनाकर वीणा पुनः मौन हो जाती है- “डूब गए सब एक साथ/ सब अलग-अलग एकाकी पार तिरे।”[16]…“इयता सबकी अलग-अलग जागी/ संघीत हुई/ पा गयी विलय/ वीणा फिर मूक हो गई।”[17] यानी वज्रकीर्ति ने उस वीणा का निर्माण जिस ध्येय से किया था, उसमें वह सफल रहा। यह केवल वज्रकीर्ति की ही सफलता नहीं थी, बल्कि यह उस रचना यानी वीणा की भी सफलता थी। प्रकारांतर से नलिन विलोचन शर्मा भी कहीं-न-कहीं रचना की इसी सफलता की बात करते हुए दीखते हैं। नलिन विलोचन शर्मा का यह मानना कि ‘हर कृति अपने-आप में श्रेष्ठ होती है। हम उसकी तुलना किसी से नहीं कर सकते हैं।’ साहित्य के दृष्टिकोण से ठीक प्रतीत होता है। साहित्य कभी मात्रात्मक नहीं होता, बल्कि वह गुणात्मक होता है। उसे मात्राबद्ध करके हम उसकी सैद्धांतिकी को ही खंडित कर देते हैं। एक साहित्य से दूसरे साहित्य की तुलना करके हम इसके बीच की परिस्थिति के साथ युगीन समय की उपस्थिति को जानने-समझने के लिए तो कर सकते हैं, लेकिन उनके बीच तुलना के क्रम में श्रेष्ठता का आँकलन करना, उन रचनाओं के साथ अन्याय है।

निष्कर्ष : आचार्यनलिन विलोचन शर्मा ने भारतीय साहित्य को पाश्चात्य दृष्टि से देखने की बजाय अपनी दृष्टि; अपने नियांमक से देखने की वकालत की। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि भारतीय प्रणाली पश्चिम से सर्वथा भिन्न है इसलिए हमें पश्चिम के स्वीकृत प्रतिमानों से हटकर अपनी दृष्टि विकसित करने की आवश्यकता है। उन्होंने साहित्य के इतिहास-दर्शन को केवल हिंदी साहित्य के संदर्भ में न देखकर व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की चेष्टा की। उनका मानना है कि हिंदी साहित्य को उसकी सुदीर्घ परंपरा से अलग कर नहीं देखा जा सकता है। आचार्य शर्मा ने साहित्य के इतिहास को भारतीयता की कसौटी पर कसने का सफलतम यत्न किया है।

संदर्भ सूची

  1. डॉ. शिवकुमार. (2016). हिंदी साहित्य का इतिहास दर्शन. नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन, पृ. 33
  2. नलिन विलोचन शर्मा. (1959). साहित्य का इतिहास-दर्शन. पटना : बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पृ. 3
  3. वही, पृ. 7
  4. वही
  5. वही, पृ. 6
  6. शाह, रमेशचंद्र. (2009). अकेला मेला. नई दिल्ली : किताबघर प्रकाशन, पृ. 157-158
  7. नलिन विलोचन शर्मा. (1959). साहित्य का इतिहास-दर्शन. पटना : बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, भूमिका से
  8. वही, पृ. 36
  9. वही, पृ. 119
  10. वही, पृ. 46
  11. वही, पृ. 275
  12. वही, पृ. 278
  13. वही
  14. वही
  15. वही
  1. अज्ञेय. (1961). आँगन के पार द्वार. काशी : भारतीय ज्ञानपीठ, पृ. 84
  2. वही, पृ. 86

[1] डॉ. शिवकुमार. (2016). हिंदी साहित्य का इतिहास दर्शन. नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन, पृ. 33

[2] नलिन विलोचन शर्मा. (1959). साहित्य का इतिहास-दर्शन. पटना : बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पृ. 3

[3] वही, पृ. 7

[4] वही

[5] वही, पृ. 6

[6] शाह, रमेशचंद्र. (2009). अकेला मेला. नई दिल्ली : किताबघर प्रकाशन, पृ. 157-158

[7] नलिन विलोचन शर्मा. (1959). साहित्य का इतिहास-दर्शन. पटना : बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, भूमिका से

[8] वही, पृ. 36

[9] वही, पृ. 119

[10] वही, पृ. 46

[11] वही, पृ. 275

[12] वही, पृ. 278

[13] वही

[14] वही

[15] वही

[16] अज्ञेय. (1961). आँगन के पार द्वार. काशी : भारतीय ज्ञानपीठ, पृ. 84

[17] वही, पृ. 86

समकालीन हिन्दी कविता और पर्यावरण विमर्श- प्रियंका

समकालीन हिन्दी कविता और पर्यावरण विमर्श

प्रियंका

शोधार्थी, हिन्दी विभाग,

डॉ.बी.आर.अंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली

ईमेल- priyankabhakuni456@gmail.com

फोन न.- 8470850657 

सारांश

मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जिसने अपनी बौद्धिक क्षमता का विकास कर पृथ्वी पर मौजूद अन्य प्राणियों से अपनी एक अलग पहचान बनाई है, किन्तु इस सत्य को भी नकारा नहीं जा सकता कि उसकी इसी बौद्धिक क्षमता ने उसके साथ-साथ अन्य प्राणियों को भी खतरे में डाल दिया है, आइन्स्टीन ने तो कहा है कि जिस प्रकार ब्रह्माण्ड असीमित है ठीक उसी प्रकार मानव की मूर्खता भी असीमित है, जैसे-जैसे मानव ने विकास किया है वैसे-वैसे उसने अनेक समस्याओं को भी जन्म दिया। आदिकाल में मानव जीवन की आवश्यकताएँ सीमित थीं, वह प्रकृति से भोजन प्राप्त करता था किन्तु आज के भूमंडलीकरण के दौर ने उसकी आवश्यकता और आकांक्षा को इतना बढ़ा दिया है कि वह अब प्रकृति का दोहन करने पर उतर आया है। प्रकृति की विशेषता है कि वह संतुलन बनाकर चलती है। यदि सभी जैविक तत्व अपनी आवश्यकता के अनुसार उसका इस्तेमाल करें तो पर्यावरण में संतुलन बना रहेगा, किन्तु आज मानव का प्रकृति में जरुरत से ज्यादा हस्तक्षेप असंतुलन की स्थिति पैदा कर रहा है, नदियों का सूखना, बाढ का प्रकोप, भूकंप आना, इन  सभी घटनाओं के पीछे मानव की अतिमहत्त्वकांक्षा और आवश्यकता ही है। एक प्रकार से वह अब प्रकृति का शोषण कर रहा है, इसलिए आज उस पर विमर्श की जरुरत है, पर्यावरण विमर्श जरुरी भी है और मज़बूरी भी।

बीज-शब्द: पर्यावरण, संकट, प्रकृति, विमर्श, भूमंडलीकरण, विकास, संवेदना

शोध आलेख

आज हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं जहाँ प्रकृति पर संकट गहराता जा रहा है, प्रकृति और मानव एक दूसरे के पूरक हैं, प्रकृति नहीं तो मानव नहीं, भूमंडलीकरण के इस दौर में विकास के नाम पर जंगलों को काटा जा रहा है, जंगलों में रहने वाले जीव-जंतु विलुप्त हो रहे हैं, नदियाँ सूख रही हैं, जल और वायु दोनों प्रदूषित हैं, मानव जीवन मृत्यु की ओर बढ़ रहा है, ऐसे में यह चिंता का विषय है और इस समस्या पर वैश्विक चिंतन हो रहा है, ऐसी अनेक संस्थाएं हैं जो पर्यावरण के संरक्षण के लिए कार्य कर रही हैं, ऐसे में भला साहित्य कहाँ अछूता रह सकता है ?, विमर्श के रूप में पर्यावरण संकट साहित्य में चित्रित भी हुआ है, साहित्य ने इस विमर्श से सम्बंधित प्रश्नों को प्रमुखता से उठाया है, देखा जाए तो विमर्शों ने साहित्य के खालीपन को भरा है। साहित्य की सबसे प्राचीनतम विधा कविता रही है और कविता ने सदैव मानवीय सरोकारों और उसके मूल्यों का संरक्षण किया है। इस दृष्टि से यदि समकालीन हिन्दी कविता को देखा जाए तो वह समसामयिक सन्दर्भों से जुडी हुई है, इस दृष्टि से पर्यावरण विमर्श उसकी चिंता और संवेदना का विषय है, हम इस शोध आलेख में हिन्दी कविता में पर्यावरण विमर्श किस रूप में आया है ? उसकी चिंताएं क्या हैं ? वह इस संकट हेतु कोई समाधान प्रस्तुत करती है या नहीं ? पर्यावरण विमर्श को कवियों  ने कितनी गंभीरता से चित्रित किया है? अन्य विमर्शों की भांति उसकी स्थिति क्या है? आदि प्रश्नों पर विचार करेंगे।

पर्यावरण शब्द अंग्रेजी के enviroment का हिन्दी पर्याय है।  पर्यावरण शब्द ‘परि’ और ‘आवरण’ से मिलकर बना है जिसमें परि का अर्थ ‘हमारे चारो ओर’ और ‘आवरण’ का अर्थ  ‘ढकना’ या ‘घेरा’ हुआ होता है, डॉ. राजेश्वरी प्रसाद चन्दोला के अनुसार- “प्रकृति वसुंधरा का मूर्तरूप है जिसमें वनस्पति, जीवजंतु, जलस्त्रोत और वायुमंडल का एक संतुलित चक्र निश्चित नियमों के अधीन परस्पर संबंधित रहकर स्वस्थ पर्यावरण का निर्माण करते हैं।”1 बृहद हिन्दी शब्दकोश में पर्यावरण को इस प्रकार परिभाषित किया गया है- “पर्यावरण चारों ओर के संपूर्ण जड़ और चेतन पदार्थों का सम्मिलित नाम है।”2 इस प्रकार व्यापक अर्थ में पर्यावरण’ शब्द में पूरा ब्रह्मांड समाहित है। इस दृष्टि से जल, वायु, मृदा, वनस्पति, जीव-जंतु, पेड़-पौधे आदि सब मिलकर पर्यावरण बनाते हैं। “पर्यावरण से तात्पर्य किसी वस्तु के आसपास में अवस्थित तत्वों के सम्मिश्रण से है।”3

हम कह सकते हैं कि मानव के आसपास जो भी उपस्थित है वही उसका पर्यावरण है, पर्यावरण आसपास की ऐसी परिस्थिति है जो उसके विकास में सहायक होती है, वह अपने भोजन, कपडे या फिर अन्य आवश्यकताओं के लिए पेड़-पौधे, हवा-पानी और जीव जंतुओं पर आधारित है, इस दृष्टि से जिस पर्यावरण में मानव रहता है वह बहुत महत्व पूर्ण है, यदि वह दूषित है तो मानव जीवन का अस्तित्व भी खतरे में है। हम देखते हैं कि आज पर्यवारण,  विमर्श के रूप में उपस्थित है, इस समस्या पर गंभीरता से चिन्तन-मनन किया जा रहा है। हिन्दी साहित्य में यदि हम विमर्श की बात करें तो वह उत्तर आधुनिकता की देन है, विमर्श से तात्पर्य किसी समस्या विशेष को केंद्र में रखकर उसके सभी पक्षों पर बात करना है। ज्ञान शब्द कोष में विमर्श को “विचार, विवेचन, परीक्षण, समीक्षा, तर्क, ज्ञान”4 आदि से अभिहित किया गया है। इस दृष्टि से पर्यावरण विमर्श पर्यावरण को केंद्र में रखकर चलता है, उस पर छाए संकट पर गहन चिंतन-मनन कर उसे संरक्षित करने का प्रयास करता है।

समकालीन हिन्दी कविता में पर्यावरण संकट को उभारा गया है, मनुष्य द्वारा किए जा रहे निरंतर आघात से पर्यावरण अभिशप्त है, किन्तु पर्यावरण संकट वास्तव में सम्पूर्ण सृष्टि के जीव-जंतुओं का संकट है। भारतीय चिंतन धारा में प्रकृति का महत्त्व सबसे अधिक रहा है, एक प्रकार से भारतीय मानस प्रकृति पूजक है उसने सदैव प्रकृति का मानवीकरण कर उसे पूजा है। जब हम हिन्दी साहित्य के इतिहास को देखते हैं तो उसमें आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक प्रकृति का बड़ा ही मनोहारी चित्रण हुआ है। कवियों ने प्रकृति का अपनी कविताओं के माध्यम से सौदर्यमयी रूप उद्घाटित किया है, आदिकाल के रासो काव्य में प्रकृति-वर्णन प्रचुरता से मिलता है इस दृष्टि से विद्यापति महत्त्वपूर्ण कवि हैं, वहीं भक्तिकाल में तुलसी, कबीर, रहीम, मीराबाई, मालिक मुहम्मद जायसी, आदि सभी कवियों ने प्रकृति के संरक्षण की पैरवी की है, रीतिकाल के कवियों ने प्रकृति को आलंबन रूप में प्रस्तुत किया है और उसे प्रेम से जोड़ा है इस दृष्टि से बिहारी, बोधा, आलम आदि कवियों को देखा जा सकता है। आदिकाल से लेकर रीतिकाल तक प्रकृति का चित्रण हुआ है, इसके उपरांत आधुकिन काल में भारतेंदु, मुकुट धर पाण्डेय, महादेवी वर्मा, प्रसाद, पन्त, हरिवंश राय बच्चन, आदि ऐसे कवि हैं जिन्होंने प्रकृति का बड़ा ही सुंदर चित्रण किया है और उसे प्रौढ़ता से अभिव्यक्ति दी है।

वर्तमान समय में मनुष्य जिस विकास की अवधारणा पर सवार होकर प्रकृति के असंतुलन का जिम्मेदार बना बैठा है, आज उसी जिम्मेदारी ने उसे भविष्य की चिंता को लेकर भयभीत भी कर रखा है, वह औद्योगिक विकास की अंधी दौड़ में ऐसा शामिल हुआ कि उसने स्वयं पैर पर कुल्हाड़ी मार ली है, मनुष्य अपने स्वार्थ को साधने के लिए पहाड़ों को तोड़ रहा है, पेडों को काट रहा है, उसकी इस भोगवादी मनोवृत्ति ने हवा को भी दूषित कर दिया है। निरंतर हो रहे प्रकृति के ह्रास को देखकर कवयित्री ग्रेस कुजूर चिंतित हैं, कवयित्री ग्रेस कुजूर ने अपनी कविता ‘हे समय के पहरेदारों!’ में प्रकृति के दोहन पर चिंता व्यक्त की है-

“आज तुम

अपने स्वार्थ के लिए

पर्वतों के पत्थर

तोड़ रहे हो

बारूदी गंध से

जीवन को मरोड़ रहे हो

क्या कभी नदियाँ

लौटकर पूछेंगी

अपने खण्डर होते

पर्वतों से

कि कहां गया

उनका उद्गम?

कहां गया उनका वैभव?

तब पर्वत रोएगा

सूख जाएंगी उसकी धाराएं।”5

आज मानव अपनी क्षुद्रता को दर्शाते हुए महानगरों में प्रकृति से प्राप्त हरे-भरे जंगलों को काट कर कंक्रीट के घर बना रहा है, इससे आने वाली पीढ़ी का क्या हाल होगा, यह सोच पाने में वह असमर्थ सा लग रहा है‌, जल को जीवन कहा जाता है, वह पर्यावरण का मुख्य कारक है, मनुष्य ने अपनी बस्तियां वहीं बसाईं जहाँ नदियाँ बहती थीं, इसका उपयोग वह पीने, नहाने, खेतों की सिंचाई आदि के लिए करता था, किन्तु पिछले कुछ वर्षों ने नदियों का पानी भी सूखता जा रहा है, आज हमारे देश में पानी की कमी होती जा रही है, ऐसे में  हमें यह सोचना चाहिए कि उपलब्ध पानी का सदुपयोग कैसे किया जाए ? भू-जल का स्तर नीचे जा रहा है, इसके पीछे का कारण जंगलों की अँधा-धुंध कटाई है, पेड़-पौधों के कटने से धरती में जल रोकने की क्षमता बहुत कम हो जाती है, हम देख रहे हैं आज कल भू-जल का इस्तेमाल बहुत अधिक बढ़ गया है, यदि यही स्थिति रही तो जल्द ही जल संकट हमारे सामने खड़ा हो जायेगा, पीने का पानी भी नहीं बचेगा, इसलिए हमें इस दिशा में सोचने की जरुरत है, इसके साथ ही जो जलाश्य, बांध या झीलें हैं वे भी प्रदूषित हो गए हैं, कवयित्री ने इस पर चिंता व्यक्त करते हुए हमें सोचने पर मजबूर किया है- 

“एक बूंद पानी के लिए

तड़प तड़प जाएंगी

हमारी पीढ़यां

इसलिए सच कहती हूँ

… एक वृक्ष की जगह

लगाओ दूसरा वृक्ष

क्या कभी सुना है

एक पर्वत के बदले

उगाओ दूसरा पर्वत

करोड़ों साल में बने

इन पर्वतों को

तुम्हारे बारूदी मन के

फिर फिर तोड़ा है

और कुवांरी हवाओं को

हर बार छेड़ा है।”6

यह सब असंतुलित विकास के कारण हुआ है क्योंकि संतुलित विकास ही वरेण्य होता है, यदि हम ऐसा करते रहे तो भला आने वाली पीढ़ियों को हम क्या देंगे ? इस सन्दर्भ में हरिमोहन प्रश्न करते हुए लिखते हैं कि, “कभी यह भी सोचकर देखना चाहिए कि हम लोग आगे की पीढ़ियों के लिए किस पृथ्वी को छोड़ कर् जायेंगे ?, क्या पेड़-पौधे, फूल-फल, नदियाँ, पानी, स्वच्छ वायु, धूम्र रहित आकाश, जंगल और उसमें रहने वाले प्राणी, पहाड़ और हमारे प्राचीन कला-संस्कृति के स्मारक, शुचिता के कल्याणकारी विचार…हम उन पीढ़ियों के लिए सौपेंगे ? यदि नहीं, तो निश्चय ही हमारी आगे आने वाली पीढियां हमें अपराधी घोषित करेंगी।”7

देखा जाए तो आज जो शहरीकरण की आंधी चली है उसने भी प्रदूषण को बढाया है, शहर एक प्रकार से गाँवों का दोहन करते हैं, वे पारंपरिक उद्योगों को समाप्त कर यंत्र की सभ्यता को पालते हैं, शहर की नींव ही मशीनी और औद्योगिक युग पर टिकी है, गाँधी जी ने शहरों के लिए कहा था कि, “मैं शहरों की वृद्धि को एक गलत चीज समझता हूँ।”8

शहर की सभ्यता ने प्रकृति को दूषित किया है, शहर की सभ्यता ने ही जंगलों को काट कर बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां लगाईं हैं, जो जंगल मानव को जीवन देते थे वे अब नष्ट हो गए हैं, सरिता सिंह बड़ाईक अपनी कविता में कटते हुए जंगलों की ओर ध्यान आकर्षित करती हुई कहती हैं कि-

“आँवला, बहेड़ा, हरड़ के पेड़ पौधे

देते थे जीवन मानव को

नहीं है अब वैसा जंगल

वीरान होते, उजड़ते जंगल, कटते पेड़

प्रदूषण का जाल फैला

बादल उड़ा, उड़ गई बारिश भी

भाग गए हैं जानवर, एक जंगल से दूसरे जंगल”9

कवियों ने कटते हुए जंगलों को बचाए रखने के लिए भी संवेदना से भरी कवितायें रची हैं, भूमंडलीकरण के दौर ने मनुष्य और प्रकृति के बीच एक अलगाव की भावना ला दी है, क्योंकि प्राचीन काल में मनुष्य और प्रकृति का साहचर्य भाव हुआ करता था, दोनों एक साथ रहा करते थे किन्तु जब से उसने अपने लिए अट्टालियां खड़ी कर ली हैं तब से उसका प्रकृति के साथ साहचर्य भाव ख़त्म होता जा रहा है, इस साहचर्य भाव को बनाये रखने का सन्देश अनुज लुगुन ने अपनी कविता में कुछ इस प्रकार दिया है-

“हमने चाहा कि

पंडुकों की नींद गिलहरियों की धमाचौकड़ी से भी टूट जाए

तो उनके सपने न टूटें

हमने चाहा कि

फसलों की नस्ल बची रहे

खेतों के आसमान के साथ

हमने चाहा कि जंगल बचा रहे

अपने कुल-गोत्र के साथ

पृथ्वी को हम पृथ्वी की तरह ही देखें

पेड़ की जगह पेड़ ही देखें

नदी की जगह नदी

समुद्र की जगह समुद्र और

पहाड़ की जगह पहाड़”10

यह कविता बताती है कि मनुष्य जितना महत्वपूर्ण है उतने ही जीव-जंतु और नदी, पहाड़ आदि भी महत्त्वपूर्ण हैं और जो जहाँ है उसे वहीं होना चाहिए, उसकी स्थिरता ही उसकी पहचान  है। इन कविताओं में पर्यावरण और प्रकृति के नैसर्गिक रूप को बचाए रखने की पैरवी है।

आज ग्लोबल वार्मिंग एक विकराल समस्या का रूप धीरे-धीरे धारण करती जा रही है, यह सब कार्बनिक गैसों का नतीजा है, जो कि ओजोन परत को कमजोर करती जा रही है और इसी कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है। हरमोहन ने डॉ. बो डूस को उद्धृत करते हुए लिखा है- “1990 से 2020 के बीच हर रोज 50 जीव और पादप प्रजातियाँ समाप्त होती जाएंगी। अगर वनों के कटान और औद्योगिक गैसों से उत्पन्न तापक्रम-वृद्धि पर नियंत्रण न हो पाया तो भयंकर परिणाम होंगे।”11 कवि अरुण कमल ने इस समस्या को इस प्रकार चित्रित किया है-

“आ रहा है ग्रीष्म

देह का एक-एक रोम अब

खुल रहा है साफ और फैलता हुआ

सूरज के डूबने के बाद भी… “12

नरेश सक्सेना पेड़ बचाने की इच्छा लिए लिखते हैं-

“लिखता हूँ अंतिम इच्छाओं में

कि बिजली के दाहघर में हो मेरा संस्कार

ताकि मेरे बाद

एक बेटे और एक बेटी के साथ

एक वृक्ष भी बचा रहे संसार में।”13

मानव की उत्पत्ति, विकास और क्रियाशीलता के पीछे पर्यावरण एक महत्वपूर्ण कारण रहा है किंतु आज मानव ने अपनी बौद्धिक क्षमता और उपभोगवादी प्रवृत्ति के चलते प्राकृतिक भंडारों को भी समाप्ति के कगार पर ला दिया है, आज प्रदूषित पर्यावरण विश्व की चिंता का विषय बन गया है, भूमिगत संपदा में निरंतर कमी आ रही है, पानी का स्तर गिरता जा रहा है, ग्रीन गैस हाउस के प्रभाव से ओजोन परत क्षीण पड़ रही है, पेट्रोलियम वाहनों से वायुमंडल का तापमान बढ़ रहा है, प्राकृतिक वनों की कटाई से ऑक्सीजन की कमी हो रही है। एक प्रकार से मानव का भविष्य अब संकट में पड़ गया है। वृक्षों के निरंतर कटाव को चंद्रकांत देवताले ने अपने काव्य संग्रह ‘भूखंड तप रहा है’ की कविता ‘मई की विशाल छाती पर अग्नि वृक्ष उड़ते हैं’ में इस प्रकार रेखांकित किया है-

“एक मां घर के पेड़ का एक सपना

असंख्य माँएं और धरती पर गाते हुए

पेड़ों के उतने ही सपने पर उतने ही

कुल्हाड़ियों के हमले सपनों की गरदनों

पर पेड़ों के खिलाफ।”14

भौतिकवाद, बाजारवाद और पूंजीवाद  ने उपभोक्तावादी मानसिकता को जन्म दिया है। इस मानसिकता ने प्रकृति को बहुत नुकसान पहुंचाया है। अश्वघोष लिखते हैं-

“इस वक्त कुल्हाड़ी और आग के शिकंजे में है जंगल

हरियाली भोग रही है तड़ीपार की सजा

किसी कोढ़ी की भांति एकांत में सिसक रहे हैं पहाड़

अजगर की तरह इठलाती सड़कें धीरे धीरे

निगल रही हैं पहाड़ों का जिस्म।”15

आज हम देखते हैं कि कई नदियों का पानी सूख चुका है और बिना नदियों के जीवन तो कृत्रिम मात्र-सा है जिसमें संवेदना नहीं है, नदियों से जीव-जंतु पानी पीते हैं, ऐसे में नदियों का विलुप्त होना किसी संकट से कम नहीं, समकालीन कवियों में नदियों के सूखने का दर्द जितना ‘राकेश कबीर’ की कविताओं में सुनाई देता है उतना अन्य में नहीं, राकेश कबीर को नदियों का कवि भी कहा जाता है, वे अपनी कविता ‘सूखती नदियाँ’ में लिखते हैं-  

“पहली बार सुख गई है सई नदी

दूर तक उड़ता है रेट का बवंडर

फागुन की गर्म तेज बयार से

सरपट दौड़ता है बच्चों का झुण्ड

नदी के आर-पार बेरोक टोक”16

इस प्रकार हम देख सकते हैं कि समकालीन कविता ने पर्यावरण की समस्या को गंभीरता से चित्रित किया है, वर्तमान समय में पर्यावरण की समस्या का प्रश्न वैश्वित बन चुका है, डॉ. एच. एम. सक्सेना के अनुसार- “पर्यावरण हमारी पृथ्वी पर जीवन का आधार है, जो न केवल मानव अपितु विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तुओं एवं वनस्पति के उद्भव, विकास एवं अस्तित्व का आधार है, सभ्यता के विकास से वर्तमान युग तक मानव ने जो प्रगति की है, उसमें पर्यावरण की महती भूमिका है और यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि मानव सभ्यता एवं संस्कृति का विकास मानव-पर्यावरण के समयानुकूल एवं सामंजस्य का परिणाम है।  यही कारण है कि अनेक प्राचीन सभ्यताएं प्रतिकूल पर्यावरण के कारण काल के गर्त में समा गईं तथा अनेक जीवों एवं पादप समूहों की प्रजाततियां विलुप्त हो गईं और अनेक पर यह संकट गहराता जा रहा है।”17 इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि विकास का प्रक्रिया सामाजिक और आर्थिक प्रगति के लिए जरुरी है किंतु विकास की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिससे प्रकृति के अवयव सुरक्षित रहें और वह प्रदूषित होने से बचें, ऐसे बहुत से उद्योग हैं जिनसे निकलने वाला धुआं पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुंचाता है, हमारे देश में उद्योग से निकलने वाले धुएं, त्याज्य पदार्थ, रासायनिक गैस आदि से बचाव के तरीके बहुत कम हैं हालांकि वर्तमान में अनेक अंतर्राष्ट्रीय और स्वयं सेवी संस्थाएं पर्यावरण के संरक्षण हेतु कार्यरत हैं जिनमें मुख्य रूप से विश्व स्वास्थ्य संगठन, संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व वन्यजीव आदि का नाम लिया जा सकता है। कवियों ने भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए इस समस्या को चित्रित कर जन को जगाने का प्रयास किया है, हमें अपनी जिम्मेदारियों को समझना होगा और हमें संतुलित विकास की अवधारणा का विकास करना होगा जिससे पर्यावरण दूषित न हो और हम आने वाली पीढ़ियों को एक बेहतर पर्यावरण दे पायें।

संदर्भ सूची

  1. आज धरती रोती है, डॉ. राजेश्वरी प्रसाद चन्दोला, आत्मारी एंब सन्स, संस्करण, 1994, पृष्ठ.2
  2. वृहद हिन्दी शब्दकोश (खण्ड-2), धर्मेन्द्र वर्मा (सं.), प्रभात प्रकाशन, संस्करण, 2016, पृष्ठ-1517
  3. असंतुलित पर्यावरण और विश्व, हरिश्चंद्र व्यास, आदर्श प्रकाशन मंदिर, प्रथम संस्करण, 1991, पृष्ठ-10
  4. ज्ञान शब्द कोष, मुकन्दीलाल श्रीवास्तव(संपादक), ज्ञान मंडल लिमिटेड, वाराणसी, संस्करण, 1995, पृष्ठ.741
  5. समकालीन आदिवासी कविता, संपादक-हरिराम मीणा, अलख प्रकाशन, जयपुर, संस्करण, 2013, पृ.24
  6. वही, 25
  7. पर्यावरण और लोक अनुभव, हरिमोहन, तक्षशिला प्रकाशन, संस्करण, 1991, प्राक्कथन से उद्धृत
  8. आज धरती रोती है, डॉ. राजेश्वरीप्रसाद चंदोला, आत्माराम एंड संस, संस्करण, 1994, पृष्ठ.44
  9. बड़ाईक सिंह, सरिता, आज का जंगल, समकालीन आदिवासी कविता, (सं.) हरिराम मीणा, अलख प्रकाशन, 2013 संस्करण, पृष्ठ- 82
  10. लुगुन, अनुज, हमारी अर्थी शाही नहीं हो सकती, समकालीन आदिवासी कविता, (सं.) हरिराम मीणा, अलख प्रकाशन, 2013 संस्करण, पृष्ठ- 15, 16
  11. पर्यावरण और लोक अनुभव, हरिमोहन, तक्षशिला प्रकाशन, संस्करण, 1991, पृष्ठ.13
  12. पुतली में संसार, अरूण कमल, वाणी प्रकाशन, पृ.92
  13. रेवांत(जनवरी-दिसंबर अंक), नरेश सक्सेना, लखनऊ, वर्ष, 2014, पृष्ठ, 10
  14. भूखंड तप रहा है, चंद्रकांत देवताले, वेब पेज से उद्धृत
  15. सीढ़ियों पर बैठा पहाड़(काव्य संग्रहसंग्रह) , मेधा बुक्स, संस्करण, 2010, पृष्ठ, 55
  16. नदियाँ बहती रहेंगी, राकेश कबीर, अगोरा प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 2021, पृष्ठ, 40
  17. पर्यावरण एवं प्रदूषण, डॉ. एच.एम सक्सेना, राजस्थान, हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर, तृतीय संस्करण, 1995, पृष्ठ.2

भक्ति आंदोलन का अखिल भारतीय स्वरूप- सीमा सिंह

भक्ति आंदोलन का अखिल भारतीय स्वरूप

सीमा सिंह

शोधार्थी. हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय

मोबाइल नंबर – 6307479287

ईमेल:  seemajnv1234@gmail.com

सारांश

भक्ति आंदोलन मध्यकालीन भारत का एक प्रमुख सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन था जिसने पूरे भारत पर अपना व्यापक प्रभाव छोड़ा था। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पहली बार भक्ति का मार्ग समाज के सभी वर्णों और स्त्रियों के लिए खुला था, साथ ही इस आंदोलन ने सभी प्रकार की सामाजिक-धार्मिक विसंगतियों पर जोरदार प्रहार किया था। यह आंदोलन दक्षिण भारत से आरंभ होकर धीरे-धीरे संपूर्ण भारत में फैल गया था जहाँ दक्षिण में आलवार, नायनार और रामानुजाचार्य ने इस आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई थी, वहीँ महाराष्ट्र में संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम, एकनाथ तथा गुजरात में नरसी मेहता एवं बंगाल में चैतन्य महाप्रभु  उड़ीसा में पंचसखा तथा असम में शंकरदेव ने भक्ति आंदोलन का प्रसार किया था। यही भक्ति आंदोलन जब उत्तर भारत में पहुँचा, तब रामानंद, कबीर, रैदास और तुलसीदास ने इस आंदोलन को इसके उच्चतम शिखर तक पहुँचा दिया जिससे इसकी पहुँच समाज के हर वर्ग तक हो गई। इस आंदोलन की बड़ी विशेषता है यह थी कि पहली बार लोक भाषाओं में भक्ति का साहित्य रचा जा रहा था जिससे सामान्य जनता भी इसे समझकर भक्ति का रस ले पा रही थी। पहली बार किसी आंदोलन में महिलाएँ भी शामिल हो रहीं थीं। दक्षिण में आंडाल, अक्कमहादेवी से लेकर कश्मीर में ललद्येद से लेकर उत्तर भारत में मीराबाई की भक्ति में इसका विस्तृत स्वरूप दिखाई देता है। यह इस आंदोलन के प्रमुख उपलब्धि रही है।

बीजशब्द – मध्यकालीन, लोकभाषा, जनसंस्कृति, लोकजीवन, समाज-सुधार

शोध आलेख

भारतीय संस्कृति में वैदिक युग से ही   भक्ति विभिन्न रूपों में चली आ रही है। भक्ति शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘भज सेवायाम्’ धातु में क्तिन् प्रत्यय लगने से होती है जिसका अर्थ है – भगवान के भक्ति में लीन होना, सेवा करना या समर्पित होना अर्थात किसी की सत्ता को स्वयं से उच्च मानकर उसके सामने श्रद्धापूर्वक झुकना और अनुकूल व्यवहार करना भक्ति कहलाती है। भक्ति का सर्वप्रथम उल्लेख श्वेताश्वेतर उपनिषद् में मिलता है। श्रीमद्भागवतपुराण में भक्ति को उसके अलग-अलग स्वरूप के आधार पर नौ कोटियों में विभाजित किया गया है। यही भक्ति बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग रूपों में पूरे भारतवर्ष में प्रचलित रही है। देश में बौद्ध और जैन धर्मों की उत्पत्ति के बाद भारतीय जनमानस का एक बहुत बड़ा हिस्सा उनकी ओर आकर्षित हो गया था किंतु परवर्ती बौद्ध और जैन धर्म में भी विकृतियाँ आने लगी थीं। आदिकाल में नाथ-सिद्धों की कठोर साधना से सामान्य जनता का मोहभंग होने लगा था। वही पाँचवी-छठी सदी से ही दक्षिण भारत में आलवारों और नायनारों द्वारा समाज के सभी वर्गों के लिए भक्ति का मार्ग खोला जाने लगा था। यही भक्ति धीरे-धीरे दक्षिण से चलकर गुजरात, महाराष्ट्र से होते हुए उत्तर भारत में आ रही थी। इस समय उत्तर भारत में इस्लाम का प्रवेश भी हो चुका था जिसके कारण अनेक सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक परिवर्तन हो रहे थे। इन उलटफेरों में फँसी एवं नाथ-सिद्धों के कठोर विधि-विधानों से ऊब चुकी जनता ने दक्षिण से आ रही भक्ति को खुले मन से अपनाया जिसके परिणामस्वरूप संपूर्ण भारत में भक्ति में एक आंदोलन का रूप ले लिया।

                             भक्ति आंदोलन के विस्तार के संबंध में डॉ प्रेमशंकर अपनी पुस्तक ‘भक्तिकाव्य का समाजदर्शन’ में कहते हैं कि  “द्रविड़ में जन्म, कर्नाटक में विकास, महाराष्ट्र में आदर, गुजरात में वार्धक्य और अंत में वृंदावन में नवयौवन की प्राप्ति, भक्ति स्वयं बताती है और ज्ञान-वैराग्य नामक दो पुत्रों का उल्लेख करती है।”¹ भक्ति आंदोलन एक प्रकार से सामाजिक विसंगतियों, कुरीतियों एवं भेदभाव के फलस्वरुप उपजा आंदोलन है। यह लोक और जनसाधारण का आंदोलन है जिसने समाज के सभी वर्गों, स्त्रियों और शूद्रों को मुख्यधारा में सम्मिलित होने का अवसर दिया। इससे पहले भक्ति साहित्य कभी-भी लोक-भाषाओं में नहीं रचा गया था किंतु भक्ति आंदोलन ने लोक-भाषाओं को साहित्य में प्रमुखता से स्थान दिया। इस संदर्भ में मैनेजर पांडेय ‘भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य’ पुस्तक में कहते हैं कि “वास्तव में यह सामंती संस्कृति के विरुद्ध जनसंस्कृति के उत्थान का अखिल भारतीय आंदोलन है।”²  इस प्रकार भक्ति आंदोलन देश के विभिन्न हिस्सों में फैला और इसने एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन का रूप ले लिया।

दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन का स्वरूप –  5वीं-6वीं शताब्दी से दक्षिण भारत में भक्ति के विकास का आरंभ हो गया था। यहाँ भक्ति सर्वप्रथम वैष्णव-भक्ति के रूप में प्रकट होती है जिसे आलवार भक्तों ने आगे बढ़ाया था। इनकी संख्या लगभग 12 बताई जाती है और इनमें से अनेक समाज के निम्न-वर्ग से आते थे। इन्हीं की शिष्य-परंपरा में श्रीसंप्रदाय के प्रवर्तक रामानुजाचार्य आते हैं। इनके साथ ही शैव मत को मानने वाले नायनारों ने भी भक्ति के पुनरुत्थान में अपना योगदान दिया। आलवारों और नायनारों के भक्ति संबंधी योगदान के विषय में डॉ लक्ष्मीकांत पांडेय और डॉ प्रमिला अवस्थी ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय साहित्य’ में कहा है कि “अनेक शैव ‘नायनारों’ तथा वैष्णव ‘आलवारों’ ने हिंदू धर्म के व्यापक पुनरुत्थान  के लिए साथ मिलकर जो प्रयास किया, उसके फलस्वरुप लोकप्रिय भक्ति-साहित्य के विकास को अत्यंत प्रोत्साहन मिला। प्रचुरता तथा जनजीवन पर प्रभाव दोनों ही दृष्टियों से यह अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।”³

आलवार भक्तों की परंपरा में एक महिला भक्त आंडाल रहीं हैं जिन्होंने तमिल भक्ति आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तमिल भाषा में सबसे प्रमुख कार्य रंगनाथ मुनि ने किया। इन्होंने आलवार भक्तों की वाणी को ‘दिव्यप्रबंधनम्’ नामक ग्रंथ में संग्रहित किया जिसमें लगभग 4000 पद हैं। केरल के आदि शंकराचार्य जी ने अद्वैतवाद की स्थापना की किंतु अद्वैतवाद की शुष्क , रसहीन भक्ति की प्रतिक्रियास्वरूप 12वीं शताब्दी के आसपास रामानुजाचार्य जी ने श्रीसंप्रदाय, माध्वाचार्य ने ब्रह्म संप्रदाय, विष्णु स्वामी ने रुद्र संप्रदाय और निंबार्काचार्य ने सनकादि संप्रदाय की स्थापना की। कर्नाटक में लिंगायत और शैव संप्रदाय की भक्ति इस आंदोलन के विकास में अपना योगदान देती है। इनकी शिव भक्ति इन्हें बाकियों से अलग करती है। अतः दक्षिण भारत में भी भक्ति आंदोलन कठोर जाति-व्यवस्था के विरोध में उत्पन्न हुआ था जिसमें आलवार शिष्य-परंपरा के रामानुजाचार्य ने अग्रणी भूमिका निभाई थी और उन्हीं के शिष्य रामानंद को उत्तर भारत में भक्ति को प्रसारित करने का श्रेय दिया जाता है।

पश्चिमोत्तर भारत में भक्ति आंदोलन का स्वरूप- महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन को स्थापित करने का श्रेय चक्रधर से लेकर संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम, एकनाथ और रामदास जी को जाता है। यहाँ भक्ति आंदोलन का आरंभ मानुभाव एवं वारकरी संप्रदाय के अंतर्गत हुआ।  मानुभाव संप्रदाय के प्रवर्तक चक्रधर और वारकरी संप्रदाय के प्रवर्तक संत ज्ञानेश्वर थे। इनकी भक्ति का प्रमुख क्षेत्र पंढरपुर था। यहाँ विट्ठल जी के परमब्रह्म रूप की भक्ति की जाती थी। महाराष्ट्र के भक्ति आंदोलन में जाति-प्रथा के विरुद्ध बहुत ही तीखा स्वर विद्यमान था, इसलिए यहाँ कृष्ण की भक्ति में श्रृंगार और भ्रमरगीतों के स्थान पर उनका तारणहार रूप अधिक प्रचलित था। महिला भक्तों में मुक्ताबाई और महादम्बा का नाम भी मिलता है। महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन का उच्चतम शिखर पर ले जाने का श्रेय संत नामदेव जी को जाता है। इन्होंने मराठी अभंगों के साथ-साथ हिंदी में भी प्रचुर रचनाएँ की हैं।  ये हिंदू-मुसलमान के भेदभाव को दूर करना चाहते थे। इस संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में उल्लेख किया है कि “इनका लक्ष्य एक ऐसी सामान्य भक्ति पद्धति का प्रचार करना था जिसमें हिंदू का मुसलमान दोनों योग दे सकें और भेदभाव का कुछ परिहार हो।  बहुदेवोपासना, अवतार और मूर्तिपूजा का खंडन ये मुसलमानी जोश के साथ करते थे और मुसलमानों की कुर्बानी (हिंसा), नमाज, रोजा आदि की असारता दिखाते हुए ब्रह्म, माया, जीव, अनहदनाद, सृष्टि, प्रलय आदि की चर्चा पूरे हिंदू ब्रह्मज्ञानी बनकर करते थे।”⁴

इसी समय गुजरात में भागवत धर्म की प्रतिष्ठा हो रही थी। नरसी मेहता, भालण और अखो गुजराती में भक्ति साहित्य को प्रतिष्ठित करने वाले प्रमुख कवि हैं। नरसी मेहता गुजराती भक्ति काव्य के श्रेष्ठ कवि रहे हैं। इनकी कोमल, सरस और मधुर कविता जन-जन में लोकप्रिय हुई। इसी समय राजस्थान में भी दादूदयाल और मीराबाई ने भक्ति आंदोलन में अपना योगदान दिया था। कश्मीर की प्रसिद्ध संत कवयित्री ललद्येद ने अपनी ‘वाख’ कविताओं द्वारा भक्ति आंदोलन के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वहीं पंजाब में पहुँचकर भक्ति आंदोलन में सूफ़ी-दर्शन जुड़ता है। इस संदर्भ में सुमन राजे ने अपनी पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’ में कहा है- “नाथ-साहित्य पंजाबी, हिंदी, राजस्थानी की साझी विरासत है। यहाँ आकर पहली बार भक्ति आंदोलन में एक नया परिपेक्ष्य जुड़ा, सूफ़ी दर्शन का।”⁵ यहाँ के संतों का योद्धा रूप में उन्हें विशिष्ट पहचान दिलाता है। यहीं से सिख धर्म का उदय होता है और गुरु अर्जुनदेव द्वारा ‘गुरुग्रंथ साहिब’ का संकलन किया जाता है। इस प्रकार दक्षिण भारत से चलकर महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और पंजाब में पहुँचकर भक्ति आंदोलन नए-नए रूपों में विकसित होता है।

पूर्वी भारत में भक्ति आंदोलन का स्वरूप –

बंगाल में भक्ति आंदोलन का आरंभ जयदेव, विद्यापति और चंडीदास के द्वारा होता है। इनके पद जन-जन में प्रचलित थे। उस समय की तत्कालीन साहित्यिक भाषा को ‘ब्रजबुलि’ कहा जाता था जो बांग्ला और ब्रजभाषा का मिश्रित रूप थी। बंगाल में प्रचलित देवी पूजन उन्हें भक्ति आंदोलन में विशेष पहचान दिलाता है। इनके अतिरिक्त बंगाल में भक्ति को ऊँचाई पर ले जाने का श्रेय चैतन्य महाप्रभु को जाता है जिन्होंने गौड़ीय संप्रदाय की स्थापना की थी। कृतिवास ओझा जी ने संस्कृत रामायण ग्रंथों के आधार पर बांग्ला में रामायण प्रस्तुत की, जिसे कृतिवास रामायण के नाम से जाना जाता है तथा जिसकी गणना बंगाल की लोकप्रिय कृतियों में की जाती है।

                           उड़ीसा में भक्ति आंदोलन का विकास 13वीं-14वीं शती में होता है।  यहाँ भक्ति को प्रसारित करने का श्रेय ‘पंचसखा’ को जाता है जिसमें बलरामदास, यशोवंतदास, अनंतदास, जगन्नाथदास तथा अच्युतानंददास शामिल थे। जगन्नाथदास जी ने उड़िया में भागवत की रचना की थी। इस समय अधिकांश उड़िया संतकवि वैष्णव भक्तिगीतों की रचना कर रहे थे। इनकी भक्ति के सम्बन्ध में डॉ लक्ष्मीकांत पांडेय और  डॉ प्रमिला अवस्थी ने ‘भारतीय साहित्य’ पुस्तक में कहा है कि “चूंकि उड़ीसा में जगन्नाथ जी शैव, शाक्त, वैष्णव, बौद्ध, जैन सबके आराध्याय रहे, अतः वैष्णव भक्ति के केंद्र में जगन्नाथ जी ही विद्यमान हैं।”⁶

असम में भक्ति आंदोलन का प्रारंभ 15वीं शती में वैष्णव भक्ति परंपरा के साथ आरंभ होता है जिसके प्रवर्तक शंकरदेव जी हैं। शंकरदेव और उनके शिष्यों ने भक्ति साहित्य के अंतर्गत वैष्णव भक्ति के साथ असम के क्षेत्रीय लोकजीवन का भी वर्णन किया है।

उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन का स्वरूप –

उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन के उदय के संबंध में मुख्यतः दो मत हैं। पहला मत आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी का है जो इस्लाम की प्रतिक्रिया के फलस्वरुप उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन का विकास मानते हैं। आचार्य शुक्ल का मानना है कि भारत में इस्लाम का आक्रमण होने के कारण सामान्य जनता की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक परिस्थितियों पर अत्यंत विपरीत प्रभाव पड़ा था। जनता की बात सुनने वाला कोई नहीं था।  विभिन्न प्रकार के अत्याचारों के कारण वे हताश हो चुके थे। ऐसे में जब भक्ति आंदोलन दक्षिण से उत्तर भारत में पहुँचता है तो जनता उसे खुले मन से स्वीकार करती है। आचार्य शुक्ल ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ पुस्तक में कहते हैं कि “भक्ति का जो सोता दक्षिण की ओर से धीरे-धीरे उत्तर भारत की ओर पहले से ही आ रहा था, उसे राजनीतिक परिवर्तन के कारण शून्य पड़ते हुए जनता के हृदय क्षेत्र में फैलने के लिए पूरा स्थान मिला।”⁷  दूसरा मत पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी जी का है जो आचार्य शुक्ल के इस मत का विरोध करते हुए दिखाई देते हैं कि उत्तर भारत में भक्ति का प्रादुर्भाव इस्लाम के प्रतिक्रिया के फलस्वरुप हुआ है। उनका मानना है कि भक्ति भारतीय चिंतन परंपरा का स्वाभाविक विकास है। वे कहते हैं कि यदि भक्ति का उदय इस्लाम की प्रतिक्रिया के कारण होता तो भक्ति पहले उत्तर भारत में आती, न कि दक्षिण भारत में। इस संदर्भ में वे अपनी पुस्तक ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ में कहते हैं कि “जोर देकर कहना चाहता हूंँ कि अगर इस्लाम नहीं आया होता तो भी इस साहित्य का बारह आना वैसा ही होता जैसा आज है।”⁸

भक्ति आंदोलन लोक का आंदोलन था। इसमें सामान्य जनता ने बढ़- चढ़कर भाग लिया था। उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन को लाने का श्रेय यदि रामानंद जी को है तो उसे स्थापित करने का श्रेय कबीरदास, जायसी, तुलसीदास और सूरदास को है जो हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की विभिन्न धाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस आंदोलन में निम्न वर्ग ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिसमें कबीर, रैदास, दादू आदि प्रमुख संत आते हैं जिन्होंने समाज में व्याप्त वर्ण-व्यवस्था, बाह्य-आडंबर, पाखंड, छुआछूत और झूठ-फरेब पर जोरदार प्रहार किया था तथा सामाजिक समानता, समाज-सुधार, शास्त्रीय भाषा के स्थान पर लोकभाषा को स्थापित करने पर बल दिया था। निम्न वर्ग का भक्ति आंदोलन में आगे बढ़कर आने का आर्थिक कारण भी है। इस समय अनेक कस्बों का विकास हो रहा था जिससे निम्न वर्ग के कामगार जैसे जुलाहे, दर्जी, मोची, बढ़ई आदि अपने उत्पादों को बिचौलियों के बगैर सीधे बाजारों में ले जा रहे थे जिससे उनकी आर्थिक दशा कुछ ठीक होने लगी थी। इसी समय भक्ति आंदोलन के कारण जाति-व्यवस्था का वर्चस्व भी कम होने लगा था। इन सभी के कारण निम्न वर्ग में भी स्वाभिमान और स्वतंत्रता का भाव जगाने लगा था और वे भक्ति के सहज और सरल रूप को अपनाने लगे थे।    

उत्तर भारत के हिंदी साहित्य में भक्ति चार प्रमुख धाराओं के रूप में विकसित हो रही थी जिसे हिंदी साहित्य के इतिहासकारों ने संत काव्यधारा, सूफ़ी काव्यधारा, राम काव्यधारा और कृष्ण काव्य धारा में विभाजित किया था। इन चारों धाराओं ने भक्ति को अलग-अलग रूपों में ग्रहण करके भक्ति आंदोलन को उसके उच्चतम शिखर तक पहुँचाने में अपना योगदान दिया था। जहाँ संत काव्यधारा के अंतर्गत कबीर, दादूदयाल, गुरुनानक, रैदास, रज्जब, सुंदरदास आदि प्रमुख हिंदी कवि हुए, वहीं सूफ़ी काव्यधारा में जायसी, कुतुबन, मंझन, उस्मान और नूर मोहम्मद आदि कवियों ने हिंदू घरों की कहानियाँ लेकर अपने काव्य ग्रंथ लिखे तथा हिंदू-मुसलमान में सामंजस्य दिखाने का प्रयास किया। राम काव्यधारा के अग्रणी पुरुष तुलसीदास जी ने ‘रामचरितमानस’ के सृजन द्वारा पूरे देश को एक अमूल्य ग्रंथ दिया था। कृष्ण काव्यधारा के विकास में सर्वाधिक योगदान अष्टछाप के कवियों का रहा है जिसमें कुंभनदास, सूरदास, परमानंददास, कृष्णदास, गोविंदस्वामी, छीतस्वामी, चतुर्भुजदास और नंददास आते हैं जिन्होंने कृष्ण के मधुर और आत्मीय स्वरूप को अपनी रचनाओं द्वारा जनमानस के हृदय तक पहुँचाया था। इनमें सबसे अधिक प्रसिद्धि सूरदास जी  को मिली है जिन्होंने कृष्ण के बाल रूप के द्वारा जनता के हृदय में वात्सल्य रस का संचार करा दिया था, साथ ही मीराबाई अपने कृष्णप्रेम द्वारा समाज की बंदिशों पर प्रहार करती हुई  दिखाई देती हैं। इन सारी विशेषताओं के कारण ही भक्तिकाल को हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है। इसके संबंध में विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने ‘हिंदी साहित्य का सरल इतिहास’ पुस्तक में कहा है कि “भक्तिकाव्यधारा के अंतर्गत हिंदी में कबीर, जायसी, सूर, तुलसी, रैदास और मीरा जैसे महान प्रतिभाओं ने रचनाएँ कीं। इन्हीं की रचनाओं के कारण भक्ति-युग को हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है।”⁹ इनके अतिरिक्त वल्लभाचार्य जी ने अपने पुष्टिमार्ग द्वारा कृष्ण के माधुर्य को पूरे समाज में लोकप्रिय बना दिया था।

                             इस प्रकार उत्तर भारत का भक्ति आंदोलन देश के अन्य भागों के आंदोलन से काफी अलग था जिसके संबंध में डॉ बच्चन सिंह ‘हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास’ पुस्तक में कहते हैं कि “देश के अन्य अंचलों की अपेक्षा हिंदी भाषा-भाषी प्रदेश का भक्ति-आंदोलन अपने वैविध्य और अंतर्विरोधों में काफी जटिल और नानारुपात्मक है।”¹

निष्कर्ष – भक्ति आंदोलन भारतीय संस्कृति का विशिष्ट आंदोलन रहा है जिसने संपूर्ण भारत को एकसूत्र में जोड़ने का कार्य किया था। इस आंदोलन ने तमाम नकारात्मकता को दूर करके समाज में समानता, बंधुत्व और आध्यात्मिकता को बढ़ाने का कार्य किया था तथा  साहित्य में शास्त्रगत भाषा के स्थान पर लोकभाषा को आगे बढ़ाया था जिससे भक्ति साहित्य जन-जन तक पहुँच पाया था और इसने अखिल भारतीय आंदोलन का रूप ले लिया था।

संदर्भ सूची

  1. डॉ प्रेमशंकर, भक्तिकाव्य का समाजदर्शन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ 51
  2. पांडेय, मैनेजर, भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011,भूमिका
  3. पांडेय, लक्ष्मीकांत, अवस्थी, प्रमिला, भारतीय साहित्य, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2019, पृ 94
  4. शुक्ल, रामचंद्र, हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रयाग पुस्तक सदन, इलाहाबाद, 2019, पृ 36
  5. राजे, सुमन, हिंदी साहित्य का आधा इतिहास, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2022, पृ 129
  6. पांडेय, लक्ष्मीकांत, अवस्थी, प्रमिला, भारतीय साहित्य, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2019, पृ 161
  7. शुक्ल, रामचंद्र, हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रयाग पुस्तक सदन, इलाहाबाद, 2019, पृ 36
  8. द्विवेदी, हजारीप्रसाद, हिंदी साहित्य की भूमिका, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2024, पृ 16
  9. त्रिपाठी, विश्वनाथ, हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, ओरिएंट ब्लैकस्वॉन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली, 2016, पृ 11
  10. सिंह, बच्चन, हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2022, पृ 75

डिजिटल युग में हिन्दी साहित्य का स्वरूप : लेखन, पाठक और माध्यमों का बदलता संबंध- डॉ. अतुल कुमार गौतम

डिजिटल युग में हिन्दी साहित्य का स्वरूप : लेखन, पाठक और माध्यमों का बदलता संबंध

(सोशल मीडिया, ब्लॉग और ई-साहित्य के प्रभाव का अध्ययन)

डॉ. अतुल कुमार गौतम

शिक्षाविद्य

मोबाईल : +91 7903396395

ईमेल : atul2gautam@gmail.com

सारांश

डिजिटल युग ने हिन्दी साहित्य के स्वरूप, प्रसार और ग्रहण — तीनों स्तरों पर गहरा और व्यापक प्रभाव डाला है। साहित्य अब केवल मुद्रित पन्नों और पारंपरिक प्रकाशन संस्थानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इंटरनेट, मोबाइल एप्लिकेशन, ब्लॉग, सोशल मीडिया मंचों और ई-पुस्तकों के माध्यम से निरंतर विस्तृत होता जा रहा है। इस तकनीकी परिवर्तन ने हिन्दी साहित्य की भाषा, शैली, अभिव्यक्ति और विषय-वस्तु को एक नई दिशा दी है। साथ ही, लेखक और पाठक के बीच जो पहले दूरी और औपचारिकता थी, वह अब संवाद और सहभागिता के नए रूप में परिवर्तित हो गई है। डिजिटल माध्यमों ने हिन्दी लेखन को अधिक लोकतांत्रिक, लोकाभिमुख और तात्कालिक बनाया है। अब कोई भी व्यक्ति ब्लॉग, फेसबुक पोस्ट या ऑनलाइन पत्रिका के माध्यम से अपनी रचनाएँ साझा कर सकता है और तत्काल पाठकीय प्रतिक्रिया प्राप्त कर सकता है। इससे लेखन की प्रकृति, आलोचना की शैली और साहित्य के मूल्यांकन की प्रक्रिया में भी परिवर्तन आया है। ई-साहित्य, ब्लॉगिंग और सोशल मीडिया लेखन ने हिन्दी में नई विधाओं को जन्म दिया है, जो समकालीन समाज की गति, उसकी आकांक्षाओं और संघर्षों को अधिक प्रभावी ढंग से व्यक्त कर रही हैं। इस आलेख का प्रमुख उद्देश्य डिजिटल माध्यमों से हिन्दी साहित्य के बदलते स्वरूप का विश्लेषण करना है। इसमें यह समझने का प्रयास किया गया है कि सोशल मीडिया, ब्लॉग और ई-साहित्य जैसे मंचों ने हिन्दी लेखन को किस प्रकार रूपांतरित किया है, और इसके परिणामस्वरूप पाठक का दृष्टिकोण तथा आलोचना की प्रक्रिया किस तरह बदली है। साथ ही यह भी विवेचित किया गया है कि क्या इस परिवर्तन ने साहित्य की गंभीरता और स्थायित्व को प्रभावित किया है, या यह परिवर्तन हिन्दी साहित्य के जनतंत्रीकरण की दिशा में एक सकारात्मक कदम है।

बीज शब्द: डिजिटल, साहित्य, सोशल, मीडिया, ब्लॉग, ई-साहित्य, पाठक, माध्यम

शोध आलेख

इक्कीसवीं सदी के आरम्भ में जब इंटरनेट और मोबाइल तकनीक का प्रसार हुआ, तब समाज, संस्कृति और भाषा तीनों में व्यापक परिवर्तन प्रारंभ हुआ। साहित्य, जो सदैव समाज का दर्पण रहा है, इस परिवर्तन से अछूता नहीं रह सका। हिन्दी साहित्य अब केवल पुस्तकालयों और मुद्रित पुस्तकों की सीमाओं में बंधा नहीं है, बल्कि डिजिटल मंचों पर निरंतर रूपांतरित हो रहा है। जैसा कि प्रभात रंजन ने अपने ब्लॉग ‘सार्थक समय’  में लिखा है—“अब साहित्य का संसार कागज़ से स्क्रीन तक फैल चुका है। हर पाठक अब लेखक बनने की स्थिति में है।” वास्तव में, डिजिटल तकनीक ने साहित्य के उत्पादन और उपभोग दोनों की प्रक्रिया को लोकतांत्रिक बना दिया है। जहाँ पहले साहित्य के प्रकाशन के लिए प्रकाशक, संपादक और वितरण की जटिल प्रक्रिया आवश्यक थी, वहीं आज कोई भी व्यक्ति अपने मोबाइल या लैपटॉप से सीधे वैश्विक पाठक वर्ग तक पहुँच सकता है। इस नए परिवेश में लेखन का स्वरूप, भाषा की लय, और पाठक की भूमिका — तीनों ही परिवर्तित हो गए हैं।

सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य : डिजिटल साहित्य की अवधारणा

‘डिजिटल साहित्य’ (Digital Literature) शब्द का प्रयोग सामान्यतः उस साहित्य के लिए किया जाता है जो न केवल डिजिटल माध्यम पर प्रकाशित होता है, बल्कि उसी माध्यम के लिए सृजित होता है। जेम्स ओ’सुलिवन ने लिखा है कि “Electronic literature is not the digitization of print, but the born-digital art of words.” अर्थात् ई-साहित्य केवल छपी हुई सामग्री का इलेक्ट्रॉनिक रूप नहीं है, बल्कि यह स्वयं एक नई कला है, जो तकनीकी माध्यम में जन्म लेती है और उसी में पल्लवित होती है। हिन्दी में डिजिटल साहित्य की अवधारणा अपेक्षाकृत नवीन है, परंतु इसकी गति अत्यंत तीव्र है। ‘हिन्दी समय’, ‘अनुभूति’, ‘समकालीन जनमत’, ‘प्रतिलिपि’, ‘मातृभारती’ जैसे मंचों ने हिन्दी लेखन को डिजिटल रूप में प्रसारित कर एक नया साहित्यिक पारिस्थितिक तंत्र निर्मित किया है। डॉ. नीलिमा चौहान का मत है— “डिजिटल मंचों ने हिन्दी साहित्य को लोकतांत्रिक स्वर दिया है। अब रचना किसी प्रकाशक की कृपा पर नहीं, पाठक के क्लिक पर निर्भर है।” इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि तकनीक ने सृजन की स्वतंत्रता को व्यापक रूप दिया है। अब लेखक और पाठक के बीच का संवाद प्रत्यक्ष, तात्कालिक और पारदर्शी हो गया है।

डिजिटल युग में हिन्दी साहित्य का संक्रमण

हिन्दी साहित्य का विकास क्रम यदि देखें तो यह लोक-मौखिक परंपरा से मुद्रण युग तक और वहाँ से डिजिटल युग तक का एक सतत प्रवाह है। जहाँ मुद्रण युग ने साहित्य को स्थायित्व दिया, वहीं डिजिटल युग ने उसे तात्कालिकता और वैश्विकता प्रदान की। डॉ. रवीन्द्रकुमार शर्मा के अनुसार— “डिजिटल माध्यमों ने लेखक को मुद्रण व्यवस्था की बंदिशों से मुक्त किया है। अब वह न प्रकाशक से बंधा है, न संपादक से।” इस स्वतंत्रता ने लेखन की संभावनाओं को असीमित बना दिया है। आज हर व्यक्ति लेखक बन सकता है, और हर रचना तुरंत सैकड़ों-हज़ारों पाठकों तक पहुँच सकती है। यह तकनीकी स्वतंत्रता हिन्दी साहित्य को नई दिशाओं में विस्तारित कर रही है।

डिजिटल माध्यमों की विशेषताएँ और प्रभाव

डिजिटल साहित्य की प्रमुख विशेषता उसका संवादात्मक स्वरूप है। इसमें लेखन और पठन के बीच कोई ठोस दूरी नहीं रहती। फेसबुक, ब्लॉग और इंस्टाग्राम जैसे मंचों पर रचना प्रकाशित होते ही पाठक की प्रतिक्रियाएँ आनी शुरू हो जाती हैं। इस कारण लेखन एक जीवंत प्रक्रिया बन जाता है। इसके अतिरिक्त डिजिटल माध्यम बहु-माध्यमीय (Multimodal) हैं — जहाँ शब्द, ध्वनि, चित्र और वीडियो का सम्मिलन होता है। इससे साहित्य केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि दृश्य और भावनात्मक अनुभव में भी बदल जाता है। सुरेश पाण्डेय के अनुसार— “फेसबुक की भाषा ने हिन्दी को जीवंत बनाया, पर साहित्यिक गंभीरता का संकट भी उत्पन्न किया।” यह कथन इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि डिजिटल युग का साहित्य अधिक संवादात्मक तो हुआ है, परंतु उसके साथ गहराई और स्थायित्व की चुनौती भी आई है।

डिजिटल युग ने हिन्दी साहित्य को एक ऐसे बिंदु पर पहुँचा दिया है जहाँ लेखन, पठन और संप्रेषण — तीनों प्रक्रियाएँ पुनर्परिभाषित हो चुकी हैं। अब लेखक स्वतंत्र है, पाठक सक्रिय है, और माध्यम सर्वव्यापी है। यह त्रिकोणीय संबंध हिन्दी साहित्य को एक नए लोक-संवाद में बदल रहा है। हालाँकि, इस परिवर्तन के साथ कुछ नई चुनौतियाँ भी उभर रही हैं — जैसे साहित्यिक गुणवत्ता, मौलिकता और आलोचनात्मक दृष्टि की रक्षा। फिर भी यह निस्संदेह कहा जा सकता है कि डिजिटल युग हिन्दी साहित्य के इतिहास में एक नये अध्याय की शुरुआत का प्रतीक है।

लेखन, पाठक और माध्यमों का बदलता संबंध

लेखन का रूपांतरण : परंपरा से डिजिटल युग तक

हिन्दी साहित्य का लेखन सदा अपने समय और समाज के साथ बदलता रहा है, किन्तु डिजिटल युग ने इस परिवर्तन की गति और स्वरूप दोनों को अप्रत्याशित रूप से बदल दिया है। अब लेखन का केंद्र पुस्तकालयों और प्रकाशकों से हटकर इंटरनेट और स्मार्टफ़ोन पर आ गया है। यह युग लेखक को अभूतपूर्व स्वतंत्रता प्रदान करता है। जहाँ पहले एक रचना के प्रकाशन में महीनों या वर्षों का समय लगता था, अब वही रचना कुछ ही मिनटों में वैश्विक पाठक वर्ग तक पहुँच सकती है। डॉ. रवीन्द्रकुमार शर्मा अपने लेख “ई-साहित्य का उद्भव और प्रसार” में लिखते हैं— “डिजिटल मंचों ने लेखक को मुद्रण व्यवस्था की बंदिशों से मुक्त किया है। अब वह न प्रकाशक से बंधा है, न संपादक से।” (शर्मा, 2020) डिजिटल तकनीक ने साहित्यिक सृजन को अधिक लोकतांत्रिक बना दिया है। अब कोई भी व्यक्ति, चाहे वह छात्र हो, अध्यापक या गृहिणी, अपने विचार और भावनाएँ ब्लॉग, फेसबुक पोस्ट, या ऑनलाइन मंचों के माध्यम से सहजता से साझा कर सकता है।

ब्लॉग लेखन : आत्म-अभिव्यक्ति का डिजिटल माध्यम

हिन्दी ब्लॉगिंग का आरम्भ लगभग 2005 के आसपास हुआ और 2010 के दशक में यह एक साहित्यिक आंदोलन बन गया। इसने पारंपरिक लेखन की एकालापी शैली को तोड़कर संवादात्मक शैली का सृजन किया। ‘चिट्ठाजगत’, ‘रवि रतलामी का ब्लॉग’, ‘अनूप शुक्ल’, ‘नारी ब्लॉग’ और ‘सार्थक समय’ जैसे मंचों ने हिन्दी लेखकों की एक नई पीढ़ी को जन्म दिया। प्रभात रंजन ने अपने ब्लॉग “ब्लॉग बनाम पुस्तक संस्कृति” में लिखा— “अब साहित्य एकालाप नहीं रहा; वह संवाद का नया रूप बन चुका है।” ब्लॉगिंग ने लेखन को अधिक आत्मकथात्मक और अनुभवपरक बनाया है। यह लेखक को अपने जीवन, समाज और विचारों को सीधे पाठकों के सामने रखने की स्वतंत्रता देता है। इसके साथ ही, पाठक की तात्कालिक टिप्पणियाँ और प्रतिक्रियाएँ इस लेखन को एक जीवंत संवाद में बदल देती हैं। इस प्रकार, ब्लॉग साहित्य का एक ऐसा मंच बन गया जहाँ लेखक और पाठक दोनों रचनात्मक साझेदारी निभाते हैं।

सोशल मीडिया और लघु लेखन का उदय

सोशल मीडिया ने साहित्य की भाषा और अभिव्यक्ति दोनों को नया रूप दिया है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और ट्विटर (अब एक्स) जैसे मंचों ने लघु लेखन (Micro Writing) को जन्म दिया है। अब साहित्यिक पोस्ट, दो पंक्तियों की कविता, या भावनात्मक ट्वीट भी पाठकीयता और प्रतिक्रिया का माध्यम बन गए हैं। इस परिवर्तन का एक कारण यह है कि आज का पाठक त्वरित और दृश्य अनुभव चाहता है। इसलिए लेखक अब अपने शब्दों के साथ चित्र, ऑडियो और वीडियो का प्रयोग करने लगा है। इसने लेखन को दृश्यात्मकता और तत्क्षणता का गुण दिया है।

‘योरकोट’ (YourQuote), ‘प्रतिलिपि’, ‘मातृभारती’ और ‘कविता कोश’ जैसे मंचों ने इस प्रवृत्ति को व्यापक बनाया है। योरकोट के संस्थापक हरीश श्रीवास्तव कहते हैं— “हमने लेखन को लोकप्रिय बनाया और लोकप्रियता को साहित्य से जोड़ा।” यह कथन इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि डिजिटल माध्यमों ने साहित्य को अभिजात वर्ग की सीमाओं से निकालकर आम जनता तक पहुँचाया है।

ई-साहित्य और ऑनलाइन पत्रिकाओं की भूमिका

डिजिटल माध्यमों के प्रसार ने हिन्दी की ऑनलाइन पत्रिकाओं को एक नई पहचान दी है। ‘हिन्दी समय’, ‘अनुभूति’, ‘अभिव्यक्ति’, ‘इंद्रधनुष’, और ‘समकालीन जनमत’ जैसी पत्रिकाएँ हिन्दी साहित्य के डिजिटल विकास की आधारशिला हैं। इन पत्रिकाओं ने न केवल हिन्दी के शास्त्रीय साहित्य को संरक्षित किया, बल्कि नए लेखकों के लिए एक सशक्त मंच भी तैयार किया। डॉ. राजकिशोर तिवारी लिखते हैं— “ऑनलाइन पत्रिकाओं ने हिन्दी साहित्य को अभिजात वर्ग के दायरे से निकालकर मध्यवर्गीय संवेदना में पुनः स्थापित किया है।” इन मंचों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे साहित्य को क्षेत्रीय सीमाओं से मुक्त करते हैं। एक लेखक झारखण्ड में बैठकर अपनी रचना प्रकाशित कर सकता है और उसे अमेरिका, नेपाल या ऑस्ट्रेलिया के पाठक पढ़ सकते हैं। यह हिन्दी साहित्य के लिए नयी वैश्विकता का प्रतीक है।

पाठक का बदलता स्वरूप : निष्क्रियता से सक्रियता की ओर

मुद्रण युग में पाठक निष्क्रिय ग्रहणकर्ता था। पुस्तक पढ़ने की प्रक्रिया एकांगी और मौन थी। परंतु डिजिटल युग में पाठक की भूमिका क्रांतिकारी रूप से बदल गई है। अब पाठक लेखक के साथ प्रत्यक्ष संवाद में है। वह टिप्पणियों, समीक्षाओं और साझा करने की क्रियाओं के माध्यम से साहित्यिक सृजन में सक्रिय भागीदार बन गया है। डॉ. नीलिमा चौहान कहती हैं— “अब पाठक केवल ग्रहणकर्ता नहीं, सह-लेखक है।”  यह कथन डिजिटल पाठकीयता की सबसे बड़ी उपलब्धि को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, प्रतिलिपि ऐप पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ रचनाओं के अगले भाग को प्रभावित करती हैं। इस प्रकार पाठक अब न केवल उपभोक्ता बल्कि सह-निर्माता की भूमिका निभा रहा है। यह साहित्य को सहभागिता और सामूहिकता की दिशा में ले जा रहा है।

माध्यमों की नई भूमिका : प्रकाशक, संपादक और आलोचक का पुनर्परिभाषण

डिजिटल युग में प्रकाशक और संपादक की पारंपरिक भूमिका भी परिवर्तित हुई है। अब कोई भी लेखक अमेज़न किंडल या नोटियन प्रेस के माध्यम से स्व-प्रकाशन कर सकता है। यह साहित्यिक लोकतंत्र की दिशा में बड़ा कदम है, परंतु इसके साथ गुणवत्ता की चुनौती भी आई है। संपादक की भूमिका भी बदलकर ‘कलेक्टिव एडिटिंग’ में रूपांतरित हो गई है, जहाँ पाठक और लेखक मिलकर रचना को परिष्कृत करते हैं। आलोचना भी अब समीक्षकों तक सीमित नहीं रही; सोशल मीडिया पर पाठक समीक्षा लिखते हैं, रचनाओं को रेट करते हैं और साहित्यिक प्रवृत्तियों को प्रभावित करते हैं। डॉ. रमेश प्रजापति कहते हैं— “अब आलोचना आलोचक के पन्नों में नहीं, पाठक की टिप्पणियों में दर्ज होती है।” यह युग आलोचना को अधिक लोकतांत्रिक बनाता है, लेकिन कभी-कभी यह गहराई के स्थान पर सतही लोकप्रियता की प्रवृत्ति भी उत्पन्न करता है।

डिजिटल साहित्य की सामाजिक भूमिका

डिजिटल माध्यमों ने हिन्दी साहित्य को सामाजिक विविधता और हाशिये की आवाज़ों से जोड़ दिया है। आज दलित, स्त्री, आदिवासी, LGBTQ+ और प्रवासी लेखक स्वतंत्र रूप से लिख रहे हैं और सुने जा रहे हैं। नवोदिता शर्मा का ब्लॉग ‘#मेरीपहचान’ स्त्री-अस्मिता की एक सशक्त अभिव्यक्ति है, वहीं रवि कांत का ‘अनसुनी आवाज़ें’ ब्लॉग दलित अनुभवों को मुख्यधारा में लाता है। सोनाली मिश्रा का ब्लॉग ‘इंद्रधनुषी शब्द’ लैंगिक विविधता को सम्मानित करता है। इस प्रकार डिजिटल साहित्य सामाजिक न्याय, अस्मिता और विविधता के विमर्श को विस्तार देता है।

डिजिटल युग ने हिन्दी साहित्य को संवाद, सहभागिता और लोकतंत्र का नया आयाम प्रदान किया है। अब लेखक स्वायत्त है, पाठक सहभागी है और माध्यम सर्वशक्तिमान है। लेखन अब आत्म-प्रकाशन से आगे बढ़कर सामाजिक संप्रेषण बन गया है। डिजिटल साहित्य ने हिन्दी को वैश्विक, तात्कालिक और बहु-माध्यमीय रूप दिया है।

डिजिटल युग का साहित्य : एक नव-चेतना का उदय

डिजिटल युग ने हिन्दी साहित्य को एक ऐसी गति और स्वरूप दिया है जो इसके पूर्ववर्ती किसी भी युग से भिन्न है। अब साहित्य मुद्रण की सीमाओं से मुक्त होकर “प्रवाहशील” और “जीवंत” बन चुका है। यह प्रवाहशीलता न केवल तकनीक का परिणाम है, बल्कि एक नई सामाजिक और बौद्धिक चेतना का परिचायक भी है। डिजिटल माध्यमों ने लेखन और पठन को समान रूप से सक्रिय बना दिया है। अब लेखक अपने पाठकों के साथ तात्कालिक संवाद करता है, पाठक अपने विचार प्रस्तुत करता है, और माध्यम उस संवाद का सेतु बन जाता है। यही कारण है कि डिजिटल युग का हिन्दी साहित्य एक “सहभागी साहित्य” (Participatory Literature) बन गया है — जहाँ लेखक, पाठक और माध्यम तीनों मिलकर रचना की प्रक्रिया को गतिशील बनाते हैं।

सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भ में डिजिटल साहित्य

डिजिटल माध्यमों ने हिन्दी साहित्य को समाज की बहुलता और विविधता से गहराई से जोड़ दिया है। पहले साहित्य अभिजात वर्ग की बौद्धिक गतिविधि माना जाता था, लेकिन अब यह आम जन की भागीदारी का मंच बन चुका है। डॉ. नीलिमा चौहान ने उचित ही कहा है — “डिजिटल मंचों ने हिन्दी साहित्य को लोकतांत्रिक स्वर दिया है। अब रचना किसी प्रकाशक की कृपा पर नहीं, पाठक के क्लिक पर निर्भर है।” इस लोकतंत्रीकरण का सबसे बड़ा प्रभाव यह है कि हाशिए पर रहने वाले समूह — जैसे स्त्री, दलित, आदिवासी, प्रवासी और लैंगिक अल्पसंख्यक — अब न केवल लिख रहे हैं, बल्कि पढ़े और साझा भी किए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, ‘नारी ब्लॉग’, ‘बहुजन संवाद’, ‘आदिवासी दृष्टि’ और ‘इंद्रधनुषी शब्द’ जैसे मंचों ने समाज के विविध वर्गों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है। इसने हिन्दी साहित्य को केवल भाषा का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का उपकरण बना दिया है।

तकनीक और भाषा : संवाद का नया समीकरण

डिजिटल माध्यमों ने हिन्दी भाषा को अधिक लचीला और संवादपरक बनाया है। अब लेखन में ‘हिंग्लिश’, रोमन लिपि, इमोजी और संक्षिप्त वाक्य आम हैं। इससे भाषा जनसामान्य के निकट आई है, परन्तु शुद्धता और औपचारिकता का प्रश्न भी उठा है। यह युग हिन्दी को प्रयोगशील और लोकाभिमुख बनाता है, पर साहित्य को गहराई की चुनौती भी देता है।

डिजिटल माध्यमों ने हिन्दी की भाषिक अभिव्यक्ति को अधिक सहज और समावेशी बनाया है। अब हिन्दी में अंग्रेज़ी, उर्दू और स्थानीय बोलियों का मिश्रण सामान्य हो गया है। यह मिश्रण यद्यपि शुद्धतावादी दृष्टिकोण से आलोच्य है, परन्तु यह हिन्दी की जीवंतता और लचीलेपन का परिचायक है। सुरेश पाण्डेय का मत है— “फेसबुक की भाषा ने हिन्दी को जीवंत बनाया, पर साहित्यिक गंभीरता का संकट भी उत्पन्न किया।” डिजिटल युग में भाषा का यह खुलापन साहित्य को जनता से जोड़ता है, पर साथ ही यह गहराई की माँग को भी सामने लाता है।

अवसर और सीमाएँ

डिजिटल माध्यमों ने हिन्दी साहित्य को अभूतपूर्व विस्तार दिया है, पर इसके साथ चुनौतियाँ भी आई हैं।

सकारात्मक पक्ष: डिजिटल युग ने लेखक को स्वायत्तता दी है। अब वह बिना प्रकाशक के सीधे पाठक से संवाद करता है। इसने साहित्य को लोकतांत्रिक और जनसुलभ बनाया है। इंटरनेट के प्रसार से हिन्दी लेखन अब वैश्विक स्तर पर पहुँच गया है। अब अमेरिका, कनाडा, जापान या अफ्रीका में रहने वाले हिन्दी लेखक और पाठक एक साझा मंच पर आ सकते हैं।

चुनौतियाँ: परंतु इस स्वतंत्रता के साथ गुणवत्ता और गहराई का संकट भी उभरा है। सोशल मीडिया पर लोकप्रियता अक्सर साहित्यिकता पर भारी पड़ती है। “लाइक-शेयर संस्कृति” ने साहित्य को कभी-कभी सतही बना दिया है। इसके अलावा, कॉपीराइट का उल्लंघन और मौलिकता का प्रश्न भी गंभीर है। डॉ. अशोक बर्मन उचित ही लिखते हैं— “डिजिटल युग ने लेखन को खुला मंच दिया है, पर इस खुलापन में अनुशासन की कमी है। साहित्य तभी टिकेगा जब उसके पीछे दृष्टि और संवेदना का संतुलन होगा। तकनीक का प्रसार यदि साहित्यिक दृष्टि से संतुलित नहीं किया गया, तो यह गहराई की जगह केवल तात्कालिक लोकप्रियता का माध्यम बन सकता है।

डिजिटल साहित्य की भावी संभावनाएँ

भविष्य का हिन्दी साहित्य तकनीक, दृश्यता और संवाद पर आधारित होगा। अब साहित्य केवल शब्दों में नहीं, बल्कि ध्वनि, चित्र और गति के साथ अस्तित्व ग्रहण करेगा। इंटरैक्टिव उपन्यास, डिजिटल कविता, ऑडियो-बुक, पॉडकास्ट और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित लेखन आने वाले वर्षों में हिन्दी साहित्य का हिस्सा बनेंगे। डॉ. दीपक का कथन उल्लेखनीय है— “डिजिटल ह्यूमैनिटीज़ हिन्दी साहित्य को नयी पद्धति में पुनः परिभाषित कर रही हैं, जहाँ तकनीक और संवेदना एक साथ कार्य करती हैं।” डिजिटल युग का हिन्दी साहित्य भावनात्मक अभिव्यक्ति और तकनीकी दक्षता — दोनों का संगम बनता जा रहा है।

शिक्षा और शोध में डिजिटल साहित्य का प्रयोग

डिजिटल साहित्य अब केवल रचनात्मक माध्यम नहीं रहा; यह शिक्षा और अनुसंधान का भी एक महत्वपूर्ण उपकरण बन गया है। दिल्ली विश्वविद्यालय, जे.एन.यू., इग्नू और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में अब डिजिटल ह्यूमैनिटीज़ और ई-साहित्य के विषयों पर शोध प्रबंध प्रस्तुत किए जा रहे हैं। यह प्रवृत्ति बताती है कि हिन्दी साहित्य का अध्ययन अब केवल पठन तक सीमित नहीं है, बल्कि तकनीकी उपकरणों के प्रयोग और विश्लेषण के माध्यम से एक नई अकादमिक दिशा में अग्रसर है।

तकनीक और संवेदना का संतुलन

डिजिटल युग ने हिन्दी साहित्य को नई उड़ान दी है, पर साथ ही उसे एक बड़ी जिम्मेदारी भी सौंपी है — संवेदना और तकनीक के बीच संतुलन बनाए रखने की। यदि यह संतुलन कायम रहा, तो हिन्दी साहित्य न केवल भारत में, बल्कि विश्व स्तर पर भी अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करेगा। नीलिमा चौहान के शब्दों में— “डिजिटल साहित्य किताब का विकल्प नहीं, बल्कि उसकी आत्मा का विस्तार है, जो समय की धड़कन के साथ चल रहा है।” यह कथन इस युग की सबसे बड़ी सच्चाई को अभिव्यक्त करता है। डिजिटल साहित्य न तो परंपरा का विरोध करता है, न उसे मिटाता है; वह केवल उसे नए रूप में जीवित रखता है। यही इस युग की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

निष्कर्ष

डिजिटल युग का हिन्दी साहित्य एक नए दौर की पहचान है — ऐसा दौर जहाँ हर पाठक संभावित लेखक है, हर शब्द एक संवाद है, और हर स्क्रीन एक पुस्तक बन चुकी है। यह युग हिन्दी साहित्य को अधिक खुला, संवादात्मक, जनसुलभ और संवेदनशील बना रहा है। भविष्य में, यदि हिन्दी साहित्य इस तकनीकी क्रांति को अपनी मानवीय गहराई के साथ जोड़ सके, तो वह न केवल डिजिटल मंचों पर जीवित रहेगा, बल्कि मानवता की आत्मा का भी सशक्त प्रवक्ता बनेगा।

डिजिटल युग का हिन्दी साहित्य एक नए युग की चेतना का प्रतीक है — ऐसा युग, जहाँ लेखन केवल सृजन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि संवाद, सहभागिता और अनुभव का जीवंत रूप बन गया है। यह समय लेखक और पाठक के बीच की सीमाओं को मिटा रहा है, और हर व्यक्ति को संभावित रचनाकार बना रहा है। अब प्रत्येक पाठक किसी रचना का निष्क्रिय दर्शक नहीं, बल्कि उसके अर्थ-निर्माण में सक्रिय भागीदार है। इस प्रकार साहित्य अब पुस्तक के पन्नों में नहीं, बल्कि स्क्रीन की रोशनी में, विचारों की तात्कालिकता में, और प्रतिक्रियाओं की बहुलता में जीवंत हो उठा है। डिजिटल युग ने हिन्दी साहित्य को अधिक खुला, जनसुलभ और लोकतांत्रिक बनाया है। इस युग में ब्लॉग, सोशल मीडिया, ऑनलाइन पत्रिकाएँ और ई-साहित्य ने परंपरागत लेखन की एकांगीता को तोड़कर उसे संवाद का रूप दे दिया है। हिन्दी साहित्य अब किसी वर्ग या संस्था का एकाधिकार नहीं रहा, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति का सृजनात्मक मंच बन गया है। यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का संकेत भी है। भविष्य में यदि हिन्दी साहित्य इस तकनीकी क्रांति को अपनी मानवीय गहराई और संवेदनात्मक ईमानदारी के साथ जोड़ सके, तो वह न केवल डिजिटल मंचों पर जीवित रहेगा, बल्कि मानवता की आत्मा का भी सशक्त प्रवक्ता बन जाएगा। तकनीक के माध्यम से यदि संवेदना का विस्तार किया जा सके, तो हिन्दी साहित्य नयी पीढ़ी की चेतना, अभिव्यक्ति और पहचान — तीनों का आधार बनेगा। यही इस युग की सबसे बड़ी उपलब्धि और हिन्दी साहित्य का स्थायी गौरव है।

संदर्भ सूची

  1. चौहान, नीलिमा. ई-साहित्य का भविष्य. नई दिल्ली: साहित्य अकादेमी, 2019.
  2. रंजन, प्रभात. “ब्लॉग बनाम पुस्तक संस्कृति.” सार्थक समय ब्लॉग, 2018.
  3. शर्मा, रवीन्द्रकुमार. ई-साहित्य का उद्भव और प्रसार. दिल्ली: प्रभात प्रकाशन, 2020.
  4. वर्मा, नरेश. “डिजिटल युग में लेखन की चुनौतियाँ.” समकालीन जनमत, अंक 118, 2022.
  5. पाण्डेय, सुरेश. “फेसबुक की भाषा और हिन्दी साहित्य.” हिन्दी समय (ऑनलाइन), 2021.
  6. तिवारी, राजकिशोर. हिन्दी की ऑनलाइन पत्रिकाएँ और नयी संवेदना. प्रयागराज: हिंदी अकादमी, 2020.
  7. बर्मन, अशोक. साहित्य, तकनीक और संस्कृति. दिल्ली: वाणी प्रकाशन, 2023.
  8. Joshi, Neelima. Digital Narratives in Indian Languages. Routledge, 2021.
  9. O’Sullivan, James. Electronic Literature as Digital Art. Bloomsbury, 2019.
  10. Dwivedi, D. P. Digital Humanities and Indian Languages. Oxford University Press, 2020.

संत साहित्य में लोक संस्कृति के दर्शन- डॉ बसुन्धरा उपाध्याय

sant sahitya mein lok

संत साहित्य में लोक संस्कृति के दर्शन

डॉ बसुन्धरा उपाध्याय

असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग,

एल.एस.एम. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय पिथौरागढ़, उत्तराखंड

ईमेल: basu1577@gmail.com

सारांश

 लोक में सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक संस्थाओं का बहुत महत्त्व है। संत साहित्य में चौदहवीं सदी के लोकजीवन और उसकी संस्कृति अंकित हुई है। तत्कालीन सल्तनतकालीन राजनैतिक व्यवस्था का जीता-जागता रूप संतों की रचनाओं में द्रष्टव्य है। नवाबों, सामंतों तथा राजाओं की विलासिता स्वेच्छाचारिता एवं कलाप्रियता का जीवंत रूपांकन इन कवियों ने बड़ी  सजगता के साथ किया है। संतकालीन सामाजिक व्यवस्था में वर्ण व्यवस्था, वर्ग व्यवस्था, जाति व्यवस्था, धार्मिक कट्टरता एवं छुआछूत, भेदभाव, सती प्रथा, बाल विवाह आदि का चित्रण संतों की रचनाओं में किया गया है। भोजन के विविध प्रकारों का वर्णन संत-साहित्य में पाया जाता है। हमारी जीवन शैली का वर्णन बहुत सरलता से किया है।

बीज शब्द: लोक, सामाजिक, संस्कृति, संस्था, व्यवस्था, संतकालीन

शोध आलेख

जनजीवन से जुड़ाव ही किसी भी मनुष्य को महान बनाता है।  सर्वविदित है कि लोक संस्कृति जन-साधारण की संस्कृति है। जिसमें साधारण भारतीय समाज के समस्त क्रिया-कलापों का समावेश है। मानव जीवन की संपूर्ण गतिविधियाँ लोक संस्कृति के अंतर्गत आती है। लोक जीवन में विश्वासों की अधिकता होना स्वाभाविक है। हमारे समाज में वृक्ष, लता, पशु-पक्षी, पुरूष आदि के संबंध में अनेक लोक-विश्वास प्रचलित हैं। यह संतों की लोकग्राहिणी सूक्ष्म-दृष्टि में तत्कालीन लोकजीवन के सभी लोकविश्वास सिमटकर एक साथ आ गये हैं। उनकी रचनात्मक दृष्टि में इन्हें प्रसंगानुकूल स्थान दिया गया है जैसे-मुहूर्त पूछना, दिशाशूल, दिन-संबंधी विचार, शकुन-अपशकुन, ज्योतिष विचार, दक्षिणा देना, स्वप्न विचार, आदि। आज के वैज्ञानिक युग में कई अंधविश्वास आज भी जीवित है।कुछ इसे अंधविश्वास मानते हैं पर नहीँ यह अंधविश्वास नहीं है।

   लोक में सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक संस्थाओं का बहुत महत्त्व है। संत साहित्य में चौदहवीं सदी के लोकजीवन और उसकी संस्कृति अंकित हुई है। तत्कालीन सल्तनतकालीन राजनैतिक व्यवस्था का जीता-जागता रूप संतों की रचनाओं में द्रष्टव्य है। नवाबों, सामंतों तथा राजाओं की विलासिता स्वेच्छाचारिता एवं कलाप्रियता का जीवंत रूपांकन इन कवियों ने बड़ी  सजगता के साथ किया है। संतकालीन सामाजिक व्यवस्था में वर्ण व्यवस्था, वर्ग व्यवस्था, जाति व्यवस्था, धार्मिक कट्टरता एवं छुआछूत, भेदभाव, सती प्रथा, बाल विवाह आदि का चित्रण संतों की रचनाओं में किया गया है। भोजन के विविध प्रकारों का वर्णन संत-साहित्य में पाया जाता है। हमारी जीवन शैली का वर्णन बहुत सरलता से किया है।कृषि, पशुपालन, सिलाई, बुनाई सुनारी आदि सामाजिक कर्म संतों की दृष्टि से ओझल नहीं हुए हैं। विभिन्न जातियों-ब्राह्मण, क्षत्रिय, तेली, धोबी, बढ़ई, लोहार, कुम्हार, माली आदि का वर्णन इनकी रचनाओं में प्रसंगानुसार किया गया है। लोक में विविधि अवसरों पर गाई जानेवाली गारियाँ, बधाईयाँ, मंगलाचरण, फाग, झूला, बारहमासा, चर्चरी आदि जनमानस की लोक-सांस्कृतिक चेतना का परिचय मिलता है।

  लोक संस्कृति में धार्मिक आस्था एवं विश्वासों के प्रति लोगों में पूरी कट्टरता देखी जाती है। संत साहित्य में जन-जीवन में प्रचलित पूजा, व्रत, कर्मवाद, भाग्यवाद, पुनर्जन्म, अवतार और ईश्वर के प्रति पूर्ण आस्था का सहज उल्लेख किया गया है। इसमें ईश्वर संबंधी अंध-विश्वास, रूढ़ियाँ, परंपराएँ, दान, जप, माला, तिलक, राम, कृष्ण, विष्णु, स्वर्ग-नरक, दोजख, जन्नत, भोग तथा प्रसाद आदि का प्रसंग के अनुसार वर्णन पाया जाता है।

  लोक साहित्य के अंतर्गत लोकगीत, लोकगाथा, लोकनाट्य, सुभाषित वचन, मुहावरे, लोकोक्तियाँ एवं कहावतें आती हैं। लोक संस्कृति में इन सबकी सहज उपस्थिति पाई जाती हैं। संत साहित्य में लोक जीवन के साहित्यिक पक्ष का अध्ययन लोकभाषा के आधार पर किया जाता है। संतों की रचनाओं में लोक की सरल, सुबोध तथा संप्रेषण में पूर्ण सक्षम ‘लोक भाषा’ के माध्यम से ही लोक के विभिन्न साहित्यिक रूपों का चित्रण मिलता है। लोक जीवन में विचारों की अभिव्यक्ति के लिए मुहावरों, लोकोक्तियों एवं कहावतों का प्रयोग सदैव होता आया है। जन-जीवन की यह विशेषता संत साहित्य की भाषा में सर्वत्र पाया जाता है। लोक में वाक्चातुर्य एवं वाक्पटुता को लोगों के परिपक्व अनुभव तथा भाषिक पैनापन के रूप में देखा जाता है। लोक की विविध कलाओं, नृत्य, संगीत, कथा, खेल, आखेट आदि मनोरंजन के विभिन्न रूपों का चित्रण संत साहित्य में सर्वत्र पाया जाता है।

      तत्कालीन समाज के मुट्ठीभर लोग पूरी जनसंख्या के सम्मान, आचरण,जीवन-शैली, बल, बुद्धि और विवेक के नियंता बने हुए थे। वे धर्म, ईश्वर, भाग्य, पुनर्जन्म,शाप, जाति-पाँति और शक्ति-प्रदर्शन को हथियार बनाकर जनता का शोषण और मनमाना दिशा-निर्देशन करते थे। ऐसे समय में जनता के मध्य इन महान आत्माओं ने जन्म लिया जिन्होंने अपने आचरण, शिक्षा, तर्कसम्मत सलाह और उपदेशों के माध्यम से जनता में आत्मसम्मान का भाव जगाया और शोषण के तमाम तंत्रों को छिन्न-भिन्न करते हुए साधारण जनता को मनुष्य होने का एहसास कराया। जिस अधिकार, समानता, स्वतंत्रता और शांति की बात आज हम 21वीं सदी में सर्वत्र कर रहे हैं उसके सर्वप्रथम दर्शन को हमे संत-साहित्य में मिलते हैं। संतों की इसी भूमिका को उद्घाटित करते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा हैं-“इसके साथ ही मनुष्य की सामान्य भावना को आगे करके निम्न श्रेणी की जनता में उन्होंने आत्मगौरव का भाव जगाया और भक्ति के ऊँचे-ऊँचे सोपान की ओर बढ़ने के लिए बढ़ावा दिया।”’1

जब देश मे शांति, प्रेम, और सौहार्द्र होगा तभी समाज तथा देश का विकास होगा। यह तभी संभव हो सकता है जब समाज में सभी मनुष्यों को सम्मान, अधिकार और अवसर समान रूप से मिलेगा, किन्तु भारतवर्ष में ऐसी स्थितियाँ हमेशा विपरीत रही हैं और धर्म को सदैव हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। धर्म समाज की रीढ़ होता है जब तक धार्मिक स्तर पर एकता स्थापित नही होगी समाज में भेदभाव, शोषण, दुराचार, वर्ग-संघर्ष और पिछड़ापन हमेशा बना रहेगा। इसलिए धार्मिक रूप से समानता सर्वप्रमुख जरूरत है। भारत के पिछड़ेपन, दंगों, भ्रष्टाचार, और पिछलग्गूपन का यह एक प्रमुख कारण है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने संतों की धार्मिक एकता के लिए किए गये प्रयास की सराहना कुछ इस तरह किया है-“इसकी ओर ले जाने वाली सबसे पहली प्रवृत्ति जो लक्षित हुई वह ऊँच-नीच और जाति-पाँति के भाव का त्याग और ईश्वर की भक्ति के लिए मनुष्य मात्र के समान अधिकार स्वीकार था।”‘2 होकर यथार्थपूर्ण, वैविध्यमय तथा भयाक्रांत है। भक्तिकाल में विशेष रूप से संतों का जीवन उनकी रचनाएँ पूरी तरह से आडम्बर-विहीन, अनुभवजन्य, तर्काधारित और लोकजीवन से पूर्णतः जुड़ी हुई हैं। हिन्दी साहित्य के वृहद् इतिहास में संत-साहित्य की विशेषताओं को इस प्रकार से बताया गया है-“संत मत ने किसी उच्च और शिष्ट श्रेणी या वर्ग तक सीमित न रहकर अपना संबंध जनसाधारण से रखा और वह विशेष रूप से दीन-दःखी, दलित, पतित जनों के उद्धार में अपने ढंग से प्रवृत्त हुआ।”‘3

  लोक संस्कृति से तात्पर्य जन संस्कृति से है जो पूरी तरह से सहजता, सरलता, त्याग, स्वाभाविकता और मानव-प्रेम पर आधारित होती है। लोक संस्कृति जन साधारण का वैचारिक ढाँचा है जहाँ से जीवन की समस्याएँ देखी और सुनी जाती हैं। लोक संस्कृति की आत्मा समाज की वह साधारण जनता है जिसका निवास नगरों से दूर गाँवों, वनों एवं पर्वतो में होता है। लोक संस्कृति में लोक-कथाओं, व्रत, उत्सव, लोकनृत्य, लोकनाट्य आदि आते हैं। यह बहुधा रूढिबद्ध, परंपरानुगामी और पुरातनपंथी होती है जिसका विरोध, परिष्कार और सुधार संत करना चाहते थे। यह प्रकृति के आश्रय में पलती और पनपती है। इसकी शिक्षा-प्रणाली में श्रद्धा-भक्ति की सदैव प्रधानता होती है। यहाँ श्रद्धा भावना की परंपरा शाश्वत् है। संत-साहित्य लोक के लिए लिखा गया लोकाश्रित साहित्य है। इसका लक्ष्य अनपढ, गरीब, शोषित और पिछड़ा मानव-समाज है। अधिकांश संत इसी गरीबी भरे वातावरण में पैदा हुए थे। समाज की विभिन्न परम्पराओं, रूढ़ियों, विश्वासों और कर्मकाण्डों के प्रभाव को उन्होने बेहद करीब से देखा और उसका अनुभव किया था। इस कारण संतों ने समाज को उपदेश देने और समझाने में अपने लोक की विभिन्न मान्यताओं, विचारों, विश्वासों और परंपराओं की रूढ़ियों और आडम्बरों तथा बुराईयों को दूर करने के लिएविश्वासों और परंपराओं की रूढ़ियों और आडम्बरों तथा बुराईयों को दूर करने के लिए लोकभाषा का सहारा लिया है जिससे उनकी वाणी सर्वसाधारण को समझ में आ जाय।

जहाँ-जहाँ सामाजिक एकता की विध्वंसक शक्तियों और उनके समाज विनाशक विश्वासों को संतों ने देखा उन्होनें उसका वहाँ तीव्र विरोध किया। हिन्दू और मुस्लिम दोनों समाजों में फैले अशिक्षा, व्यभिचार, कर्मकांड, पाखंड, व्रत, त्योहार और शोषण के विभिन्न उपकरणों पर संतों ने तीखा प्रहार किया है। सामाजिक, धार्मिक और साहित्यिक विशेषताओं एवं गुण-दोषों को संतों ने अपने उपदेशों के माध्यम से अभिव्यक्ति दिया। लोकसंस्कृति के

विविध रूपों यथा-व्रत, तीर्थ, धार्मिक आचार-विचार, वैवाहिक मान्यताओं, जन्म-मरण-संबंधी आस्था, सामाजिक रूढ़ियों, गीतों आदि का वर्णन संतों की रचनाओं में इन्ही के प्रतिकार- स्वरूप प्रसंगवश मिलते हैं। लोक-संस्कृति का लक्ष्य सदा ही एकता, समानता, समरसता, सम्मान और बधुत्व की भावना का प्रसार करना रहा किंतु रूढ़िग्रस्तता, आपसीविद्धेष-भावना तथा राजनीतिक हस्तक्षेप से इसमें अनेक बुराईयाँ समाहित हो गयी थी। अपनी रचनाओं के माध्यम से संतों ने सामाजिक एकता, त्याग, समर्पण और सहयोग की भावना बनाने पर जनता का ध्यान आकर्षित कराया तथा विभिन्न बुराईयों, अमानवीय कृत्यों, सामाजिक विकारों को दूर करने का प्रयास किया। विवाह के अवसर पर किये जाने वाले विभिन्न रीतियाँ का वर्णन कबीर इन शब्दों में करते है-

“दुलहिन गावहु मंगलचार।

हम घरि आए राजा राम भरतार।

तर रति करि मै मन रति करिहाँ पंचतत्त्वबाराती । रामदेव मोहे पाहुने आए मै जोबन मैमाती, सरीर सरोवर बेदी करिहाँ ब्रह्मावेद उचारा।।4

उपर्युक्त पदों में वैवाहिक अवसर पर गाये जाने वाले मंगलगीत, पूजा की बेदी, वेदोच्चारण आदि लोक-संस्कृति के ही अंग हैं। शव दाह का चित्रण कबीर इस प्रकार करते हैं-

हाड जरै ज्यों लकड़ी, केस जरै ज्यों घास।

 सब तन जलता देखि करि,

भया कबीर उदास ।।5

संतो का क्षेत्र विस्तृत था।वह जगह जगह घूमते थे।उनके उपदेशों में अनेक स्थानों की संस्कृतियों के रंग देखने को मिलते थे।कबीर, रैदास, नानक, रज्जब, दादू,मलूकदास, पीपा,सेन के क्षेत्र अलग अलग हैं।क्षेत्र अलग-अलग है। इस कारण इनकी रचनाओं में विभिन्न स्थानों के सांस्कृतिक रूप मिलते हैं। संतों की रचनाओं में लोकसंस्कृति के विभिन्न रूप जैसे गीत, धार्मिक विश्वास, त्योहार, प्रथाएँ तथा विभिन्न प्रकार के लोक-चित्रण सर्वत्र व्याप्त हैं। समाज के मिथ्या-आचरण पर कबीर का निम्न पद दृष्टव्य है-

“साधो देखो जग बौराना।

साँची कहाँ तौ मारन धावै झूठे जग पतियाना। हिन्दू कहत है राम हमारा मुसलमान रहमाना। आपस में दोऊ लड़े मरतु हैं मरम कोई नहिं जाना।।6

    संतो ने अपने समय मेंजिस प्रकार का समाज देखा था वह पूरी तरह से अहंकार, आत्म प्रदर्शन, अंध-श्रद्धा, पाखण्ड, धूर्तता आदि में आकंठ डूबा हुआ था। तत्कालीन सामाजिक वातावरण दमघोंटू और मानवीय चेतना शून्य थी। इसीलिए कबीर ने उस समय की जर्जर सामाजिक-व्यवस्था पर निर्मम प्रहार करते हुए मानवीय कसौटी पर उतरने वाली सार्वभौमिक, सार्वकालिक, सरल तथा सर्वसुलभ शिक्षा समाज को दी। संतों की रचनाओं में लोक-संस्कृति के विभिन्न रूप सामाजिक अव्यवस्थाओं और कुरीतियों के प्रतिकार स्वरूप प्रसंगतः चित्रित हैं। खतना’ जैसी प्रथा पर कबीर की चुटीली व्यंग्यात्मक उक्ति है-“जो तू तुरूक तुरूकनी जाया भीतर खतना क्यूँ न कराया। “7

जीव-वध, अमावस्या, ग्रहण, शांतिपाठ का चित्रण निम्नवत् है-

जीव-वध, अमावस्या, ग्रहण, शांतिपाठ का चित्रण निम्नवत् है-

जाके पाई जगत सब लागै सो पंडित जिउघात करै।

ग्रहन आवावस, रूचि-रूचि मांगहि कर दीपक लै कूप परहि।

मोक्ष, तीर्थयात्रा और जातिगत मिथ्याभिमान जैसे विश्वास सामाजिक संरचना को तोड़ते हैं इस पर संतों का विचार है-

“मूड़ मुड़ाए जो सिधि होई सरगहि भेड़ न पहुँची कोई।

बिंदु राखि जो धरिये भाई तो घुसरों क्यों न परम गति पाई।”8

   सामाजिक उत्सवों एवं पर्वो जैसे-होली, चाँचर, हिंडोला का चित्रण निम्नवत् हैं-

“खेलै फाग सवैं सब नारी हाथ लकुट मुह में गारी। घर से निकसी बनी सुन्दरी भाँति -भाँति पहिरे सारी। अबीर गुलाल लिए भर झोरी मिलन चली पिय को प्यारी । अपने-अपने झुदुन मिलि करि गावत बिरिया तरून बारी।।”9

   झाँझ, मजीरा, ढोलक और तुरही आदि वाद्ययंत्रों को लोक-जीवन के उल्लास को व्यक्त करने में सहायक साधन के रूप में प्रयोग किया जाता है-

“बाजत मृदंग झाँझ डफ तुरही तान नफीरी ।

सूरत निरत जँह नाच निकसे बाढ़त रंग अपानी।”’10

खेती की रक्षा के लिए प्रयुक्त पुतला, तथा सिंचाई के लिए प्रयुक्त ढेकुली आदि का चित्रण आध्यात्मिक रूपक के रूप में संतो ने किया है-

“जतनि बिनु मिरगनि गेत उजारै।

टारे टरत नहीं निसु बासुरि बिडरत नहिं विडारे।।”11

“सुरति ढीकुली लेज लौ मन नित ढोलन हार।

कंवल कुँआ में प्रेम रस पीवै बारंबार।।”12

संत साहित्य की पृष्ठभूमि पूर्णरूपेण लौकिक है।संत सहित्य में विविध प्रकार के संस्कारों का उल्लेख है।हमारे समाज में जन्म से लेकर मृत्यु तक कई संस्कार होते हैं।अधिकांश संतों की वाणी में इसके दर्शन हंमे मिल जाते हैं। सांसारिक मोह माया को सन्तो ने निरर्थक बताया है-

“हरि सा हीरा छाडि कै करै आन की आस ।

ते नर जमपुर जाहिगे सत भासै रैदास ।”’12

जीवन माटी हूँ रहे साई सन्मुख होई।

दादू पहली मरि रहे पीछे तौ सब कोई ।।”13

“जौ जारै तौ होई भसम तन रहत कृप हवै जाई।

काँच कुंभ उधक भरि राख्यौं तिनकी कौन बड़ाई ।।’14

है। कबीर ने हिंडोले के खम्भों, मेरू, मरूआ, भँवरा, डांडी तथा पटरी का उल्लेख अपने एक पद में किया है, अर्थात्-

हिंडोलना तहाँ झूलै आतम राम ।

प्रेम भगति हिंडोलना सब संतन को विश्राम ।।

चंद सूर दोई खंभवा बंक नालि की डोरि।

झूली पंच पियरियाँ तहाँ झूलै जीय मोर।।

हिन्दुओं के त्योहारों के अलावा मुस्लिमों के ईद, रोजा, मुहर्रम, बारावफात आदि त्योहारों का वर्णन संत-साहित्य में किया गया है। संतो ने नट नटसरी का भी खूब वर्णन किया है।इसका मतलब तो यही है कि संत भी नटों को जानते थे । इसके साथ ही विभिन्न प्रकार के खेलों का वर्णन उन्होंने किया है। संत साहित्य  छंद लोक-संस्कृति के विभिन्न रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। संतो की कविता हमारे लिए लोक जीवन की वस्तु है उसमें लोकजीवन के कार्य-व्यापारों और अनुभूतियों का स्पष्ट अंकन हुआ है। ‘प्रेम’ लोक-संस्कृति का आधार है जहाँ सज्जनता, समर्पण, त्याग, निश्छल-प्रेम और समत्वभाव लोक-संस्कृति का केन्द्रीय तत्त्व है वही नगरीय-संस्कृति में ईर्ष्या, कटुता, चतुरता और कपट का भाव निहित रहता है। इन्ही अर्थो में संत कवियों को ज्ञानमार्गी कहा जाता है। यह ज्ञान उन्होंने पोथियों, शास्त्रीय परंपराओं और वेद-पुराण से ग्रहण नहीं किया अपितु वह अनुभव और तर्क पर आधारित है जहाँ धोखा, छद्म-विश्वास, भ्रम नही है अपितु मनुष्य में आत्म विश्वास, कर्मठता और प्रेम को बढ़ावा मिलता है।

शिवकुमार मिश्र कबीर के संदर्भ में संतों की इन्ही मूल विशेषताओं को निरूपित करते हैं-“कबीर वास्तविक अर्थो में ज्ञानी थे तो इसलिए कि वे परंपरागत वेद और शास्त्रजन्य मिथ्या आचारों-विचारों एवं भेद बुद्धि की भर्त्सना तो करते ही हैं उन लोकाचारों की धज्जियाँ भी उड़ाते है, मसलन तमाम प्रकार के सामाजिक, धार्मिक अंधविश्वास, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, टोटका आदि जो जन या लोक के बीच प्रचलित थे।’

लोक-जीवन का एक विशिष्ट पहचान उसकी अपनी संस्कृति होती है जिसमें लोक का व्यवहार मूर्त होता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक के विविध संस्कार और उनसे जुड़ा हुआ लोक का मन, उसका हर्ष, उल्लास, दुख-सुख उसके अंग हैं। इन विशिष्टताओं से युक्त लोक-संस्कृति सनातन काल से चली आ रही है। विभिन्न काल-संदर्भ में साहित्यिक अभिरूचियाँ इनसे ओत-प्रोत रही हैं तथा इनसे पल्लवित और प्रभावित होती रही। संतों के साहित्य में लोक-संस्कृति के विभिन्न रूप भावाभिव्यक्ति को प्रखर बनाने और संतों की समाज पर गहरी पकड को लक्षित करती हैं।

   अंततः हम कह सकते हैं कि संत-साहित्य में लोक-संस्कृति का चित्रण और उसकी उपस्थिति संतों की सामाजिक समझ और आत्मीयता की चरम अभिव्यक्ति करती है। संत-साहित्य में मौजूद लोक-संस्कृति के तत्त्व यश, प्रदर्शन या चमत्कार के लिए न होकर समाज हित के लिए है, आपसी प्रेम और विकास को बढ़ाने के लिए हैं जो लोक-संस्कृति की आत्मा को हमेशा पुष्ट करते रहेंगे। लोक-संस्कृति और संत-साहित्य एक दूसरे पर अन्योन्याश्रित हैं, एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती। संत-साहित्य की आत्मा लोक-संस्कृति है यही उसका साध्य और साधन है। संत-साहित्य का पूरा ढांचा, वातावरण और लक्ष्य लोक-संस्कृति है। इसे सँवारने, परिष्कृत करने में संतों ने अपना जीवन लगा दिया। लोक-संस्कृति ही वह जमीन है जिस पर संत-साहित्य बना और विकसित हुआ है। यह लोक-संस्कृति के बूते ही संत-साहित्य आधुनिक संदर्भ में आज भी सबसे ज्यादा प्रासंगिक और सार्वभौमिक रूप से आदरणीय है। इनका साहित्य सामान्य जनता के   भावों का निरूपण करता है वर्णन पाया जाता है। यह साहित्य सांस्कृतिक दृष्टि से अधिकांशतः उत्तर भारत की लोक संस्कृति से आबद्ध है। उत्तर भारत के समस्त संस्कार, धार्मिक विश्वास, लोक-आस्था, विचार, प्रथाएँ, रहन-सहन, व्यवसाय, जातियाँ, वर्ण एवं वर्ग व्यवस्था, रूढ़ियाँ, उत्सव, त्योहार, क्रीड़ा, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, भाग्य, दिशाशूल, शकुन, अपशकुन आदि सब इसमें समाविष्ट हो गये हैं। इस क्षेत्र की श्रृंगारिकता, पौरूष वृत्ति, नीतिपरायणता, उदारता, स्वार्थ, वाक्पटुता आदि संत साहित्य में देखी जा सकती हैं। इसमें संदेह नहीं कि संत साहित्य लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है अपितु संत साहित्य लोक के सांस्कृतिक चेतना की सच्ची प्रतिध्वनि है जिसमें समस्त प्रकार के रूढ़िगत संस्कारो, अंधविश्वास-ग्रस्त मान्यताओं का तिरस्कार है, भेदभावजनित रीतियों का खण्डन और कथनी करनी की एकता का प्रतिपादन किया गया है।

संदर्भ सूची

  1. हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल,प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली स02007 पृष्ठ-64
  2. वही
  3. हिंदी साहित्य का व्रहत इतिहास, स0 श्री डॉ सम्पूर्णानन्द, नागरी प्रचारिणी सभा,वाराणसी,स0 द्वितीय, संवत2058पृष्ठ-86
  4. कबीर ग्रन्थावली रामकिशोर शर्मा,लोकभारती प्रकाशन,इलाहाबाद, स02014,पृष्ठ-307
  5. कबीर ग्रन्थावली ,रामकिशोर शर्मा,लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद स02010पृष्ठ-183
  6. कबीर हजारीप्रसाद द्विवेदी, राजकमल प्रकाशन,नई दिल्ली,स0-2010पृष्ठ-248
  7. वही पृष्ठ-336
  8. वही पृष्ठ -386
  9. कबीर ग्रन्थावली, वासुदेव सिंह,विश्वविद्यालय प्रकाशन,वाराणसी,स02010-पृष्ठ 229
  10. वही,पृष्ठ-545
  11. वही,पृष्ठ 173
  12. संत वाणी संग्रह ,भाग-1वेल्डेडियर प्रेस,प्रयाग,स0-1993,पृष्ठ64
  13. वही,पृष्ठ-93
  14. वही,पृष्ठ-54

स्वाधीन भारत में हिंदी का विस्तार- श्रीमती श्वेता सिंघल

स्वाधीन भारत में हिंदी का विस्तार

श्रीमती श्वेता सिंघल,

आई.एस.एस. सचिव राज्यपाल, महाराष्ट्र राज्य

शोधार्थी,हिंदी विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय

सारांश

जब हम भाषा के क्रमिक विकास पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि कोई भी भाषा प्रारंभ में केवल बोलचाल की भाषा होती है। धीरे धीरे लोक परम्परा की अभिव्यक्ति का माध्यम जाती है। यह लोकगीतों, लोकनाटकों, नुक्कड नाटकों में मनुष्य व समाज की हार्दिक इच्छाओं का उनकी आप बीती के दर्द को अभिव्यक्ति का उनके लोक विश्वास का, समाज के उत्साह व उमंग का, उनकी खुशी उनके उत्साह का ‘लोकभाषा’ के रुप मे अभिव्यक्ति व संप्रेषण माध्यम बन जाती है।जैसे ही भाषा लिपिबद्ध होने लगती है तो धीरे–धीरे व्यक्तिगत पत्र व्यवहार में प्रयुक्त होने लगती है।वह पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से सामाजिक चेतना की अभिवाहिका का काम करती है। जैसे–जैसे यह भाषा व्यापक होने लगती है और अधिक परिष्कृत व परिमार्जित होने लगती है। तो उत्तम साहित्यिक रचना की संस्थात्मक पीठिका बन जाती है।फलस्वरूप उसके लिए साहित्यिक भाषा का आयाम भी खुल जाता है। अभी तक के अपने विमर्श में हमने पाया कि हिन्दीं में लोक साहित्य व परिनिष्ठित साहित्य की विकसित परम्परा आजादी के पहले ही प्रबल हो चुकी थी। साथ ही विदेशों में पत्र- व्यवहार के रुप में प्रयुक्त होने के कुछ दृष्टांत हमें प्राप्त होते हैं।

बीज शब्द: भाषा, विकास, लिपि, परंपरा, अभिव्यक्ति

शोध आलेख

जब हम भाषा के क्रमिक विकास पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि कोई भी भाषा प्रारंभ में केवल बोलचाल की भाषा होती है। धीरे धीरे लोक परम्परा की अभिव्यक्ति का माध्यम जाती है। यह लोकगीतों, लोकनाटकों, नुक्कड नाटकों में मनुष्य व समाज की हार्दिक इच्छाओं का उनकी आप बीती के दर्द को अभिव्यक्ति का उनके लोक विश्वास का, समाज के उत्साह व उमंग का, उनकी खुशी उनके उत्साह का ‘लोकभाषा’ के रुप मे अभिव्यक्ति व संप्रेषण माध्यम बन जाती है।जैसे ही भाषा लिपिबद्ध होने लगती है तो धीरे-धीरे व्यक्तिगत पत्र व्यवहार में प्रयुक्त होने लगती है।वह पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से सामाजिक चेतना की अभिवाहिका का काम करती है।

जैसे-जैसे यह भाषा व्यापक होने लगती है और अधिक परिष्कृत व परिमार्जित होने लगती है। तो उत्तम साहित्यिक रचना की संस्थात्मक पीठिका बन जाती है।फलस्वरूप उसके लिए साहित्यिक भाषा का आयाम भी खुल जाता है।

अभी तक के अपने विमर्श में हमने पाया कि हिन्दीं में लोक साहित्य व परिनिष्ठित साहित्य की विकसित परम्परा आजादी के पहले ही प्रबल हो चुकी थी। साथ ही विदेशों में पत्र- व्यवहार के रुप में प्रयुक्त होने के कुछ दृष्टांत हमें प्राप्त होते हैं।

 वैसे तो भारत 15 अगस्त को अनगिनत संघर्षों के बाद 1947 को स्वतन्त्र हो गया था परन्तु स्वाधीन भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। उस समय से हिंदी के का प्रयास संस्थागत रूप में होने लगा जिसका अनवरत  विस्तार होता रहा है। हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिलने के बाद भी अनेक प्रकार के संशोधनों और परिमार्जन से होकर  यह भाषा अत्यंत परिमार्जित और अभिव्यक्तात्मक हो गई है। राजभाषा बनने के बाद हिंदी जीवन और जगत के अनेक क्षेत्रों में प्रयुक्त होने लगी। इसी बीच केंद्र सरकार ने हिंदी सलाहकार समिति, राजभाषा कायार्न्वयन समिति, राष्ट्रपति के आदेश, संसदीय भाषा समिति जैसे वैधानिक माध्यमों द्वारा राजभाषा हिंदी को आगे बढाया और आज स्थिति यह है कि हिंदी लगातार विकसित और विस्तारित हो रही है। आधुनिकीकरण और वैश्वीकरण के जमाने में विदेशों में हिंदी का महत्व बढ़ रहा है। भारत की प्रगतिशील अर्थव्यवस्था ने विश्व में हिंदी का आकर्षण बढ़ाया है| विदेशों में हिंदी शिक्षण पर अधिक बल दिया जा रहा है तथा प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक हिंदी का अध्ययन -अध्यापन हो रहा है।यह प्रशासनिक, वैज्ञानिक तथा तकनीकी  सभी प्रकार की उच्च कोटि में अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन गया है। वर्तमान समय में भारतीय प्रैद्योगिकीय संस्थान के शोध छात्र अपना शोध प्रबंध भी हिंदी में प्रस्तुत कर रहें हैं।

हिंदी भाषा के विकास में हिंदी सिनेमा का भी विशेष योगदान है| हिंदी अध्यापन के लिए भी, सिनेमा को शिक्षा का माध्यम बनाया जाता है तथा कई विदेशी ऐसे हैं जिन्होंने हिंदी सिनेमा देखकर हिंदी सीखी है। कुछ लोग भारतीय संस्कृति को करीब से जानने के लिए हिंदी सीखते हैं| कुछ व्यापारिक आवश्यकताओं के कारण और कुछ ऐसे भी है जिनका भाषाओं के प्रति लगाव उन्हें हिंदी सीखने के लिए प्रेरित करता है।

मध्यकाल से ही हिन्दीं फुटकर रुप में ही सही  प्रशासनिक जीवन का हिस्सा थी।फिर हिन्दी की उपयोगिता के सामाजिक सरोकारों के तहत यह स्वतन्त्रता आंदोलन में मुख्य संपर्क भाषा बनी।धीरे-धीरे सांस्कृतिक, आर्थिक, भौतिक, साहित्यिक व प्रशासनिक दुनिया में इसने अपना स्थान बना लिया।

स्वतन्त्रता के पूर्व ही छायावाद में विभिन्न उपन्यासों में,कथासाहित्य में उसके परिमार्जित, अत्यंत व्यंजक, सक्षम और समर्थ भाषा के रूप में दर्शन होने लगते हैं। इसलिए लाख विरोध के बाद भी आजादी के बाद राष्ट्रभाषा के साथ-साथ राजभाषा के दर्जे की भी हिन्दीं ही अधिकारिणी बनी।

आजादी के बाद देश के कार्यव्यहारों में विविधता व संख्यात्मक इजाफा होने के कारण भाषा के कई रुप सामने आए –

  1. प्रशासनिक हिन्दी
  2. खेलकूद की हिन्दी
  3. पत्रकारिता का हिन्दी
  4. वाणिज्य व्यापार की हिन्दीं इत्यादि।

संपर्क भाषा हिन्दी –  आज हिंदी सम्पूर्ण देश में तथा देश के बाहर विदेशों में भी संपर्क भाषा का केंद्र है।हिंदी स्वाधीन भारत में अधिकांश भारतीयों द्वारा प्रयुक्त होने वाली भाषा है। इसने बोलचाल के क्षेत्र में अनेकों कीर्तिमान स्थापित किए हैं। हिंदी किस तरह संपर्क भाषा के रूप में विकसित होकर जन – मन की अभिव्यक्ति का माध्यम बन रही है इस सन्दर्भ में प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय ने लिखा है कि, “अब हिंदी राजभाषा अथवा राष्ट्रभाषा की गंगा से विश्वभाषा का गंगासागर बनने की प्रकिया में है।आज विश्वस्तर पर उसकी स्वीकार्यता और व्याप्ति अनुभव की जा सकती है।आने वाला समय हिन्द और हिंदी का है।इस समय राजनीतिक, समाज –व्यवस्था, धर्म, दर्शन, संस्कृति, पर्यटन, मोरंजन, खेल और रोजगार के क्षेत्र में सबसे प्रभावी भाषा बनकर उभरी है।हमें एकजुट होकर अंग्रेजी के खिलाफ खड़े होना चाहिए। हिंदी और भारतीय भाषाओं को हम शिक्षा का माध्यम बनवाकर अपनी भाषाओं के भविष्य को सदा-सर्वदा के लिए सुरक्षित कर सकतें है।हमें अपनी सरकारों को इस बात के लिए तैयार करना होगा कि वें शिक्षा का माध्यम हिंदी और भारतीय भाषाओं को रखें  और अंग्रेजी दूसरी विदेशी भाषाओं की तरह एक भाषा के रूप में सिखाई जाए।ऐसा करके ही हम आगामी चुनौतिओं के लिए अपने युवाओं को सक्षम, समझदार तथा नवाचार के योग्य बना सकते हैं।तभी वे विश्वस्तरीय मौलिक शोधकार्य कर सकेंगे।यह दौर खुली एवं विश्वस्तरीय प्रतिस्पर्धा का है। इस युग का मन्त्र है – ‘स्पर्धा में जो उत्तम ठहरे रह जावें।’ हम अपने नौनिहालों को हिंदी तथा भारतीय भाषाओं में ही विश्वस्तरीय प्रतियोगिता के योग्य बना सकते हैं।यदि भारत को विश्व गुरु की अपनी स्वाभाविक छवि पुनः प्राप्त करनी है तो यह हिंदी और भारतीय भाषाओं द्वारा ही संभव है।” 1

हमें इस बात पर भी विचार करने की आवश्यकता है कि हिंदी साहित्य में साहित्य सृजन केवल हिंदी भाषा भाषियों ने नहीं किया है बल्कि भारत के लगभग सभी प्रान्तों के साहित्यकारों ने हिंदी में रचनाएं की हैं।सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक सुनीतकुमार चटर्जी ने भारतीय भाषाओं के सन्दर्भ में अपना मत प्रस्तुत करते हुए कहा है कि,” भारत की सभी भाषाओं में हिंदी का स्थान सबसे अधिक है।”

राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त ने हिंदी की व्यापकता को कविता के माध्यम से अभिव्यक्त करते हुए कहा है कि, “ हिंदी का उद्देश्य यही है, भारत एक रहे अविभाज्य ,

यों तो रूस और अमरीका जितना है उसका जन राज्य ।

बिना राष्ट्रभाषा स्वराष्ट्र की, गिरा आप गूंगी असमर्थ ,

एक भारती बिना हमारी, भारतीयता का क्या  है अर्थ ?”

आज हिंदी की व्यापकता का अनुमान इस संक्षिप्त आंकड़े द्वारा हम लगा सकते हैं कि भारत में हिंदी भाषियों की कुल संख्या 100 करोड़ है इनमें से करीब 50 करोड़ वे लोग हैं जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं है।इसके बावजूद वें हिंदी बोल सकते हैं। आज विश्व के 136 देशों के महाविद्यालयों  में हिंदी का अध्ययन – अध्यापन हो रहा है जिससे यह सिद्ध होता है कि वर्तमान समय में विश्व का हर पांचवा या छठा व्यक्ति हिंदी का ज्ञान रखता है।

आज विश्व में 571 मिलीयन लोंगो की मातृभाषा हिन्दी है।

फिजी में 4 लाख लोग

संयुक्त अरब अमिराती – 2 लाख 83 हजार लोग

न्यूझिलंड  – 82 हजार

सिंगापूर – 68 मिलीयन

जमैका – 50 मिलीयन

त्रिनिदाद व में 52 मिलीयन

मॅारिशस में -15000 हजार

फ्रैंज गाइना में 6000 लोग हिन्दी को अपनी मातृभाषा मानते है।

            इसके अतिरिक्त हिन्दी जानने व समझने वाले लोगों की संख्या 602 मिलियन है।

जो कि विश्व जनसंख्या का 8.3%  प्रतिशत है। अंग्रेजी / चीनी के बाद यह तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा बन चुकी है। स्पेनिश 534 मिलियन के साथ बंगाली चौथे स्थान पर जा चुकी है। बोली जाने वाली अर्थात संपर्क भाषा के रुप में प्रयोक्त की जाती है।इस क्रम में 17 वे नंबर पर आने वाली मराठी भाषा भी क्षेंत्र में यह भाषा लिपि व शब्दकोश को साम्यता के कारण आसान से समझी व बोली जाती है।

बीसवें नंबर पर उर्दू व 23 नंबर को गुजराती की लिपि  अलग है,नहीं तो ये तीनों भाषा भाषी सहजता से एक दूसरे की बात को समझ संप्रेषित कर सकते है। 32 नंबर की उड़िया व 33 नंबर की पंजाबी भाषा – भाषियों की भी यही स्थिति है।

            वैश्विक भाषाओं में भोजपुरी को अलग भाषा मानकर विश्व में भोजपुरी बोलने वालों की संख्या के आधार पर उसे 37 वां स्थान दिया गया है। जबकि सचाई यह है कि भोजपुरी हिंन्दी की ही उपभाषा है। बाहरी itenty नहीं। 40वें नं की मैथली व 46 नंबर की अवधी की भी यही स्थिति है।

इसके अतिरिक्त भारतीय उपमहाद्वीप से लेकर समस्त मिडिल ईष्ट तक हिंन्दी में आसानी संपर्क माध्यम बन जाती है।वह भाषा के रुप में लोगों के बीच बहुराष्ट्रीय संप्रेषण है।

आज अंग्रेजी – 1.452 बिलियन

 67 देश की भाषा ही UN, NATO की अधिकृत भाषा है।EU

मंदारिन चीनी – 1.118 बिलियन

हिंन्दी – 343.9 लोगो की मातृभाषा

स्पेनिश – 460 मिलियन लोगो की मातृ भाषा 21 देश की अधिकृत भाषा है।

आर्टिक – 372 मिलियन 25 देश की अधिकृत भाषा है।

फ्रेंच- 300 मिलियन 29 देश की अधिकृत भाषा है।

उर्दू – 170 मिलियन लोगों की मातृभाषा है।

पंजाबी – 125 मिलियन लोगों की मातृभाषा है।

मराठी – 85 मिलियन लोगों की मातृभाषा है।

गुजराती – 61 मिलियन लोगों की मातृभाषा है।

भोजपुरी – 52 मिलियन लोगों की मातृभाषा है।

उड़िया – 35 मिलियन लोगों की मातृभाषा है।

नेपाली – 30 मिलियन लोगों की मातृभाषा है।

इस प्रकार यह मेरे अनुसार विश्व की तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। और विश्व के बड़े हिस्से में लोग इसे समझ सकते है।वह लगातार वैश्विक विस्तार पा रही है।

प्रशासनिक क्षेत्र में हिंदी–

आज हिंदी राजभाषा का अधिकार पाने के कारण प्रशासनिक क्षेत्र में अपना अधिकार बनाने में प्रयासरत है।वह केंद्र सरकार के सभी विभागों कार्यलयों से लेकर हिंदी भाषी राज्यों के प्रशासनिक कामकाज की प्रमुख भाषा बनती जा रही है।यह भी देखा गया है कि सरकारी कार्यालयों,बैकों, निगमों,निकायों आदि में हिंदी के बोल-चाल के स्वरूप का बहुतायत मात्रा में प्रयोग होता है।हिंदी के माध्यम से सरल सम्प्रेषण सहज ही संभाव्य है क्योंकि यह सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली और समझी जाने वाली सम्पर्क भाषा है एवं राष्ट्रीय एकता की सम्पूर्ण कड़ी है।प्राय: देखा गया है कि कार्यालयीन परिप्रेक्ष्य में दैनिक कार्यों में चर्चा के दौरान हिंदी का ही प्रयोग होता है एवं मौखिक निर्देश भी दिए जाते हैं। उच्च स्तरीय बैठकें, बोर्ड मीटिंग, नीति निर्धारण संबधी चर्चाएँ आजकल अधिकांशतया हिंदी में ही देखने को मिलती है। किसी भी सभा, सम्मलेन या संबोधन में अधिकांश उच्चतम अधिकारियों द्वारा भी हिंदी बोली जाती है और योजनाओं को हिंदी में ही समझाया जाता है।हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री के सभी संबोधन हिंदी में होते हैं ।यहाँ तक कि केंद्र सरकार की सभी गतिविधियों  का माध्यम  भौतिक रूप से हिंदी ही होता है।तकनीकी क्षेत्रों में भी परियोजनाओं आदि पर चर्चा करते समय कांट्रेक्टर या कामगारों को हिंदी में समझाया जाता है जिससे वे परियोजना को भलीभांति समझ कर उसे ठीक तरह से निष्पादित कर सकें।

समग्रत: शासन – प्रशासन में,  बोलचाल में हिंदी का प्रयोग प्रचुर मात्रा में हो रहा है। यह सर्वविदित सत्य है कि शासन – प्रशासन के अधिकांश मौखिक आदेश –निर्देश हिंदी में ही दिए जाते हैं।परन्तु लिखित रूप में शासन – प्रशासन में हिंदी की वर्तमान स्थिति में प्रयोग की प्रचुर संभावनाएं हैं।

     आज हिंदी राजभाषा का अधिकार पाने के कारण प्रशासनिक क्षेत्र में अपना ठौर बनाने में प्रयासरत है। वह केंद्र सरकार के सभी विभागों,  कार्यालयों से लेकर हिंदी भाषी राज्यों के प्रशासनिक कामकाज की प्रमुख भाषा बनती जा रही है।यह भी देखा गया है कि सरकारी कार्यालयों, बैकों, निगमों निकायों आदि में हिंदी के बोल-चाल के स्वरुप का बहुतायत मात्रा में प्रयोग होता है।

            हमारे वर्तमान प्रशासनिक क्षेत्र के सभी संबोधन हिंदी में होते हैं। यहाँ तक की केंन्द्र सरकार को सभी गतिविधीयों के माध्यम भौतिक रुप सें हिंन्दी ही होता है।

जब किसी भाषा को राजकीय संरक्षण प्राप्त होता है तो वह प्रशासन में प्रयुक्त होने लगती है। किन्तु हिन्दी की प्रशासनिक भाषा बनने की कहानी अत्यंत अनूठी है।

            भारत में संप्रति 28 राज्य और 8 केंन्द्र शासित प्रदेश है।इनके गठन का मुख्य आधार भाषाई था।हिन्दी चूंकि देश में सर्वव्यापक है और सभी इसको बालते – समझते हैं।इसलिए यह एक लंबे संघर्ष के बाद यह राजभाषा के उच्चपद पर आसीन हो गई किन्तु आजतक भी प्रशासकीय, कार्यालयीन कामकाज पूर्णतः हिन्दी में नही होता है।कार्यालयीन, प्रशासकीय, भाषा की मुख्य विशेषता यह होती है  उसका स्वरुप पूर्णतः अभिधात्मक होता है प्रशासकीय, जिससें कोई अन्य अर्थ निकलने की संभावना न हो।हिन्दी का कार्यालयीन स्वरूप विकसित करने में आचार्य रघुवीर सहाय का बहुत बड़ा योगदान है। उन्होंने संस्कृत को नवीन पारिभाषिक शब्दावली को आधार  के रुप में इस्तेमाल किया। उन्होंने संस्कृत की पाँच सौ धातुऔं,बीस उपसर्गों एवं अस्सी प्रत्ययों से कार्यालयीन अंग्रेजी में प्रयुक्त शब्दों को स्थानापन्न करने के लिए हिंदी शब्द बनाए।

दूसरी ओर वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग ने अनुवाद का सहारा लिया।इसके कारण यह भाषा अत्यंत क्लिष्ट हो गई।इसका अंदाज तो डाॅ.रघुवीर  को भी होने लगा था इसलिए उन्होंने कहा,’अंग्रेज़ी की प्रत्येक अर्थ-छाया के लिए हिंदी भाषा में भी नया शब्द होना चाहिए। ।।।। अंग्रेजी के तीन शब्द हैं: पहला प्रेरोगेटिव, दूसरा राइट और तीसरा प्रिविलेज।साधारण दृष्टि से ये तीनों एक जैसे शब्द हैं, किंतु प्रयोग की दृष्टि से तीनों अलग- अलग।जब अंग्रेजी में ये तीन शब्द हैं तो हिंदी में भी कम से कम तीन शब्द होने चाहिए (विशेषाधिकार, अधिकार, परमाधिकार)।जो सामान्य लोग हैं उनका तो एक ही शब्द से काम चल जाएगा, लेकिन जो विशेषज्ञ हैं उनको तीन शब्द ही चाहिए।उनका एक शब्द से काम नहीं चलेगा। यह बात चलेगी नहीं।पारिभाषिक शब्दावली तो कभी सरल हो ही नहीं सकती।यह हो सकता है कि बच्चों को सिखाने के लिए आप भाषा सरल कर दें, किंतु पारिभाषिक शब्द सरल नहीं हो सकते।सरल उन शब्दों को कहते हैं जो बिना पढ़े-लिखे लोग, कुली, बच्चे, गाँव के किसान, मजदूर लोग  बोलते हैं। जब भी आपके सामने यह बात आये, आप अपने से विचार करें।

*अशोक वाजपेयी अपने व्याख्यानों में अक्सर यह संस्मरण बताते हैं। उन्होंने अपनी रचना ‘हिंदी की बोलियाँ : एक बातचीत’ में सरकारी हिंदी पर संस्कृत के प्रभाव की आलोचना भी की है। देखें, अग्निहोत्री और कुमार, वही: 116-120।

अधिकारियों को समझाइए कि भाषा सरल करने का अर्थ होगा पारिभाषिक भाषा का पारिभाषिकपन समाप्त करना।

डॉ.रघुवीर के विचारों की विस्तार से जानकारी के लिए केंद्रीय हिंदी निदेशालय के सहयोग से प्रकाशित उनकी अंग्रेजी में लिखी गयी पुस्तक देखें: रघुवीर, हिंदी की ऊर्जा, अनु। रामचंद्र शर्मा, भगवती प्रकाशन, दिल्ली, 1998; यह उद्धरण उनके एक लेख ‘पारिभाषिक शब्द’ से लिया गया जिसे धर्मवीर ने उद्‌धृत किया है। देखें, डॉ. धर्मवीर,। बाद में कोशिस की गई कि सरकारी हिन्दी को सरल व सुबोध बनाया जाए पर उसमें अनुदित होने के कारण कृत्रिमता आ गई थी। जो आज भी बरकरार है।

भारत सरकार के राज-भाषा विभाग द्वारा प्रकाशित हिंदी के प्रयोग संबंधी आदेशों के संकलन पर निगाह डालने से यह स्पष्ट हो जाता है। सत्तर और अस्सी के दशक में केंद्र सरकार का एक हिस्सा रघुवीरी कारिस्तानी के खिलाफ जद्दोजहद करते हुए दिखा।गृह मंत्रालय का 1976 में जारी किया गया एक कार्यालय ज्ञापन और फिर 1988 का एक कार्यालय ज्ञापन यह बताता है कि देर से ही सही पर सरकार को अपनी गलती समझ में आ गयी थी।ये ज्ञापन साफ़ तौर से कहते हैं कि सरकारी हिंदी लिखते समय न तो संस्कृत लिखने की कोशिश की जाए और न ही देवनागरी लिपि में अंग्रेजी। अंग्रेजी में मसविदा लिख कर अनुवाद करने के बजाय उसे मूल हिंदी में ही तैयार किया जाए ताकि अनुवाद के अटपटेपन से बचा जा सके। सरकारी हिंदी अलग तरह की नहीं। होती, वह भी सरल और सुबोध होनी चाहिए, उसमें आमफ़हम शब्दों का प्रयोग किया जाए, दूसरी भाषाओं के शब्दों के इस्तेमाल से परहेज़ न किया जाए, समझाने के लिए अंग्रेजी के शब्दों को कोष्ठक में लिख दिया जाए, वाक्य छोटे और सरल बनाये जाएँ। कुछ इसी तरह की हिदायतें केंद्र-राज्य संबंधों पर बने सरकारिया आयोग ने भी दीं। 59 संविधान पारित होने के साठ साल बाद 2011 में भारत सरकार का राज-भाषा विभाग 2011 सभी मंत्रालयों और विभागों के लिए यह आदेश निकाल पाया है कि सरकारी हिंदी में उर्दू, फारसी और अंग्रेजी स्रोतों के आमफ़हम शब्दों का इस्तेमाल करने से परहेज नहीं की जानी चाहिए ताकि सरकारी काम-काज की भाषा सरल और सुबोध बन सके दो उदाहरण

            यह कृत्रिमता शब्दावली गठन में नहीं अपिल वाक्य संस्था में भी है। इसलिए इसे अपनाने में प्रैक्टिकल समस्याएं सामने आ जाती है।

            सरकारी नौकरी में इतने वर्ष रहने के बाद मेरा अनुभव यह है। कि डीलींग हॅण्ड नवीन ड्राफ्ट बनने में कतराते है। एक वो विषय की जटिलताओं के कारण दुसरा भाषा का अभिधात्मक स्वरुप देने के चक्कर में भाषा का Interpretation कुछ और व हो जाए, इसी कारण ज्यादातर Copy – Paste के माध्यम से मूल ड्राप्ट तैयार करने की प्रवृत्ती रहती है।जिसके कारण समान विषय पर हर प्रकार को संस्थत्मक टिप्पणी पत्र के ड्राफ्ट शब्द समान रहते है। चुंकि अंग्रेजी में पहले से ही देश का सब कामकाज चल रहा था। तो उसी को सुविधाजनक मानते हुए 75 वर्ष बाद तक स्थिती में कोई बदलाव नहीं आ पा रहा है। किंतु यदि हम शब्दावली की और वाक्य विन्याप्त को इस कृत्रिमता और क्लीष्टता को थोड़ा प्राकृतिक व सरल बना पाए तो आज राजनैतिक वातावरण में हिन्दी की स्वीकार्यता कार्यालयीन कामकाज में बढ़ जाएगी।

            आजकल केन्द्र सरकार में सभी फाइल्स ई –ऑफिस प्रणाली पर ही होती है। अब वहाँ physical life की संकल्पना शेष नहीं रह गई। अस परिस्थिती में अंग्रेजी में ही टिप्पणी लिखने की बाध्य है। एक तो हिन्दी टाईपिंग आती नहीं। मेरा मानना है कि यदि ई- ऑफिस प्रणाली को हिन्दी में Wookable बनाना है। तो सभी अधिकारिर्यों, कर्मचारियों को हिन्दी में भी की – बोर्ड उपलब्ध करके देना चाहिए और हिन्दी ट्यूटर व टाईप कक्षा पर हिन्दी वर्तनी के विकल्प अंग्रेजी की तरह उपलब्ध होंगे और Word में हिन्दी के लिए भी incorr अशुध्द वर्तनी पर लाल लाइन आएगी तथा उस पर क्लिक करने पर उसके शुध्द विकल्प आएगे तो इससे कार्यालय में दैनंदिन कामों में हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा मिलेगा।

            राजभाषा हिन्दी की एक अन्य समस्या को डॉं भोलानाथ तिवारी में अपनी पुस्तक “राजभाषा हिन्दी” में रेखांकित किया है।“पूरा हिन्दी प्रदेश अपने आप में काफी बड़ा है। बन गया है।

इस संदर्भ में अपने महाराष्ट्र राज्य में काम करने के अनुभव को मैं दर किनार नहीं कर सकती।महाराष्ट्र की राजभाषा मराठी है। और वह वास्तविक राजभाषा है। चाहे  e –office प्रणाली हो या भौतिक संचिकाएं यहाँ फाईलवर्क,बैठकें,अनुदेश ,अधिसूचनाएँ,दिशानिर्देश,नियम,अधिनियम सभी मराठी भाषा में ही हैं। और सभी उनका उपयोग गर्व के साथ करते हैं।

            एक तो मराठी भाषियों ने मोड़ी  लिपि को त्यागकर नागरी को अपना लिया है।इससे मराठी हिन्दी व संस्कृत की शब्दावलियों का आदान-प्रदान भी आसान हो गया दूसरा फायदा यह हुआ कि मराठी भाषी व्यक्ति के लिए पूरे भारत में काम करनें में कोई खास कठिनाई या बाधा नहीं आती। अगर हम अन्य भारतीय भाषाओं जैसे की गुजराती, मराठी, तमिल, तेलगु, कन्नड, मलयालम, बंगाली, पंजाबी से कुछ शब्दावलियों का आदान – प्रदान करेंगे तो इससे हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा। आजकल ग्र मंत्रालय से इस संदर्भ में ने उत्तर – पूर्व के राज्यों की भाषाओं के देवनागरीकरण का बीड़ा उठाया है। यदि यह प्रयास सफल हो गया तो ना केवल भारत की एकता व अखंडता में अधिक मजबूती आएगी बल्कि हिन्दी के व्यापक विस्तार और उसके राजभाषा के रुप में स्थापित करने के सार्थक प्रयासों को और अधिक मजबूती और सफलता प्राप्त होगी।

भोलानाथ तिवारी ने परिवर्धित देवनागरी वर्णमाला का नमूना अपनी पुस्तक राजभाषा हिन्दी में प्रस्तुत किया है। जिसके प्रयोग लगभग सभी भारतीय भाषाओं के देवनागरी में अभिव्यक्त किया जा सकेगा।

परिवर्धित देवनागरी वर्णमाला  
देवनागरी वर्णमाला
स्वरः अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ मात्राएँ: । ि ी ु ू ृ ऋ े ै स्वरः ओ औ अं अः मात्राएँ: े ै ा ा: व्यंजन : क ख ग घ ड         च छ ज झ ञ         ट ठ ड ढ ण ड़ ढ़         त थ द ध न         प फ ब भ म         य र ल व         श ष स ह संयुक्त व्यंजन क्ष त्र ज्ञ श्र हल चिन्ह –          \

            जब हिन्दी व देवनागरी में सभी भाषाओं को अभिव्यक्त करने की नैसर्गिक क्षमता उत्पन्न हो जाएगी तो कार्यालयीन कामकाज में हिन्दी के प्रयोग को भी बल प्राप्त होगा।इस काम के लिए कई विभागों ने अपनी परिभाषिक शब्दावलियाँ बना ली है।जैसे विधि न्याय विभाग की विधि शब्दावली और रेल्वे मंत्रालय ने 1978, 79, 81 में अपनी पारिभाषिक शब्दावली की चार पुस्तके प्रकाशित की है। 

            रिजर्व बॅंक ने 1980 में बॅंकिग शब्दावली प्रकाशित की है। 1973 में आयकर विभाग ने आयकर शब्दावली प्रकाशित की। 1980 में भारतीय साधारण बीमा निगम ने अपनी शब्दावली प्रकाशित की।  राजभाषा के रुप में हिन्दी के प्रचार, प्रसार, एकरुपता, लाने के लिए राजभाषा कोश का निर्माण होना चाहिए।

            आजकल डिजिटल डिक्शनरी के विकास का काम भी तेजी से चल रहा है। हम मिलकर प्रयत्न करेंगे तो निश्चित ही हिन्दी विश्व की संपन्न व प्रौढ राजभाषा व कार्यालयीन भाषा बन जाएगी।

 विधि के क्षेत्र में हिंदी – विधि के क्षेत्र में हिंदी की समस्याएं पारिभाषिक शब्दावली एवं वैधिक  सरंचनात्मक भाषा के गठन से जुडी हुई है।इस समय भाषा में भाषा की अभिधात्मकता कार्यलयीन भाषा से भी अधिक होनी चाहिए।

      विधि के क्षेत्र में हिंदी के प्रयोग को लेकर ब्रिटिशकाल में ही हिंदी की मांग उठने लगी थी।१९वीं  शताब्दी में अदालती एवं कार्यालयीन भाषा के रूप में हिंदी को उर्दू के समकक्ष स्थान देने की मांग जोर – शोर से उठाई गई थी।उस समय के नागरिकों और हिंदी भाषी विद्वानों का यह मानना था कि हिंदी को हिंदी को विधि के क्षेत्र की भाषा बना कर ही रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए जा सकते है। अतः जब भारतीय संविधान लागू हुआ और उसमें हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया तब यह सुनिश्चित हो गया कि हिंदी लगातार विधि के क्षेत्र में भी प्रयुक्त होती रहेगी और विकास के नए आयामों को प्राप्त करेगी।

  भारतीय संविधान समितियों में संविधान का प्रारूप तैयार करते  समय हिंदी के लिए आफिशियल लैंग्वेज अर्थात् राजभाषा  का आधिकारिक भाषा के रूप में प्रयोग किया  है,तब से अब तक विधि के क्षेत्र में हिंदी का विकास होता जा रहा है वह लगातार विकसित हो रही है।अहिन्दी भाषी क्षेत्र के न्यायालयों एवं उच्च न्यायालयों में भी उसका प्रयोग हो रहा है।हिंदी ने उच्चतम न्यायालय के दरवाजे पर भी दस्तक देकर याचिका स्वीकृत करवा ली है। यह लगातार विधि के क्षेत्र में भी अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा ली है। वैसे तो विधि के क्षेत्र में प्रयुक्त होनेवाली हिंदी लगातार विकसित और फल – फूल रही है। इस समय अनेक संस्थाओं और विद्वानों द्वारा यह मांग भी की जा रही है कि विधि के क्षेत्र में हिंदी का अधिक से अधिक प्रयोग हो। इस कारण उच्च न्यायालयों से लेकर  सर्वोच्च न्यायलय सब हिंदी को विधि के क्षेत्र में प्रयुक्त होनेवाली एक प्रमुख भाषा के रूप में देखने लगे हैं।अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने भूमि के रजिस्ट्रेशन में प्रयुक्त होने वाली उर्दू, फारसी शब्दावलियों के स्थान पर हिंदी शब्दावली के प्रयोग पर जोर देने वाले अधिनियम को पारित किया है।विधि के क्षेत्र में हिंदी की उपयोगिता के महत्त्व को ध्यान में रखते हुए महात्मा गाँधी ने लिखा है कि, “हमारी कानूनी कार्यवाहियों में हिंदी का प्रयोग होना चाहिए क्योंकि जब तक ऐसा नहीं होता तब तक प्रजा को राजनैतिक कार्यों की जानकारी नहीं मिलेगी।” कहीं न कहीं गाँधी जी द्वारा कही गई बात पर अब अमल किया जा रहा है और वर्तमान में विधि के क्षेत्र में भी हिंदी अपनी उपस्थति दर्ज करा रही है। क्योकि विधि की भाषा भले ही क्लिष्ट हो जाए पर इसमें अर्थ छटाएं नही हो सकतीं।इसमें भाषा के Interpretations भी नहीं हो सकते।हर लिखी बात का एक ही अर्थ निकलना चाहिए।आजादी के समय हिन्दी को राजभाषा का सन्मान मिला,किंन्तु न्यायालयीन भाषा के रुप में देश के उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालय की भाषा आज भी अंग्रेजी ही बनी हुई है। यदापि जिले स्तर तक न्यायिक व्यवस्थाओं में स्थानीय भाषाओं के प्रयोग को मान्यता दी गई है।

यद्यपि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 348(2) में प्रावधान है, कि राष्ट्रपति से पूर्व सहमति लेकर किसी राज्य के राज्यपाल उस हिन्दी या राज्य की राजभाषा को उच्च न्यायालय की कार्यवाही को करने में प्राधिकृत कर सकेगें किन्तु उच्चतम न्यायालय की भाषा हर हाल में अंग्रेजी ही होगी।भारत के विधिआयोग ।इनमे 18 वी रिपोर्ट-(2008)

अभी तक उत्तर प्रदेश, बिहार व मध्य प्रदेश राज्यों कें राज्यपालों ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 348/2 के तहत अपने उच्च न्यायालयों में कार्यवाहियों के लिए हिन्दी क प्रयोग को प्राधिकृत कर दिया है। इतना ही नहीं इन राज्यों में उच्च न्यायालय के निर्णयों व आदेशों में हिन्दी का प्रयोग संभव होगा।

            अन्य राज्यों ने भी अपने अपने भाषा को उच्च न्यायालय की भाषा के रुप में प्राधिकृत करने का प्रस्ताव भेजा है। एैसे करने वाले राज्यों में है, गुजरात, छत्तीसगढ़, व तमिलनाडु किंतु इनकी मांग को स्वीकार नहीं किया गया है।

            भारतीय संविधान के अनुच्छेद 210 के प्रावधान के अनुसार राज्यों के विधान मंडलों में क्रमशः उस राज्य की राजभाषा हिन्दी या अंग्रेजी का प्रयोग किया जा सकेगा।इसके प्रावधान ने हिन्दी भाषी राज्यों में विधी बनाने की भाषा व विधानमंडल की भाषा के रुप में हिन्दी के व्दार खोल दिए है।

विज्ञान के क्षेत्र में हिंदी–

स्वाधीन भारत में विज्ञान के क्षेत्र में हिंदी के प्रयोग को पर्याप्त बढ़ावा मिल रहा है। आज अनेक वैज्ञानिक पत्रिकाएँ हिंदी में निकल रही है।यदि भारत सरकार के विविध वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा वैज्ञानिक पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही है तो दूसरी ओर अमेरिका जैसे देशों में ‘विज्ञान प्रकाश’ जैसी उच्चस्तरीय वैज्ञानिक पत्रिका का प्रकाशन हो रहा है। वर्तमान वैश्वीकरण के दौर में हिंदी विज्ञान एवं प्रद्योगिकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित की है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल में ‘विश्व प्रपंच की भूमिका’ शीर्षक से जर्मन दार्शनिक हेगल की पुस्तक ‘रिडल ऑर यूनिवर्स’ का हिंदी अनुवाद किया जिसमें भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, भूगर्भ विज्ञान, प्राणी विज्ञान और शरीर विज्ञान जैसे विषयों पर गंभीर सामग्री उपलब्ध होती है। धीरे- धीरे विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में हिंदी भाषा का प्रयोग बढता गया है आज हिंदी में 4000 से अधिक वैज्ञानिक लेखकों का एक विशाल समुदाय है जिन्होंने 10,000 से अधिक वैज्ञानिक पुस्तकें लिखी है। इस सन्दर्भ में पूर्व प्रधानमंत्री पी। वी। नरसिंहराव ने लिखा है की, “विज्ञान  एवं प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में विदेशी भाषा से कोई राष्ट्र न तो मौलिक ढंग से विकास कर सकता है और न ही अपनी विशिष्ट वैज्ञानिक एवं प्रोद्योगिकीय पहचान बना सकता है।

वर्तमान डिजिटल युग में हिंदी किस तरह विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपनी उपस्थति दर्ज करा रही है। इस पर विचार करते हुए प्रो.करुणाशंकर उपाध्याय ने लिखा है  कि, “आज कोरोना संकट ने प्रोद्योगिकी एवं डिजिटल आधारित शिक्षा पद्धति अपनाने के लिए विवश कर दिया है।हम भलीभांति जानते हैं कि कोरोना कहर से शिक्षा क्षेत्र सर्वाधिक प्रभावित हुआ है जिसके चलते करोड़ों छात्रों की शिक्षा व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा रहा है।हमें अधिकांश सत्रों की परीक्षाएं रद्द करनी पड़ी और शेष के विकल्प ढूँढने पड़ रहे हैं।बावजूद इसके एक प्राध्यापक होने के नाते हम उत्तरदायित्वों का पूरी निष्ठा से पालन करते हुए तकनीक की सहायता से छात्रों को शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। वीडियो कांफ्रेंसिंग, सिस्को, वेब एक्स, गूगल मीट, गूगल क्लासरूम, ज़ूम, ई – पाठशाला, यू – ट्यूब रिकॉर्डिंग, टी. सी. एस. आयन क्लासरूम एवं स्मार्ट फोन आदि माध्यमों से हम विद्यार्थियों को पढ़ा रहें हैं, उनकी कक्षाएं ले रहे हैं।हम आंतरिक मूल्यांकन के कार्य भी ऑनलाइन ही कर रहें हैं। हम ई – कंटेंट अथवा अध्ययन सामग्री भी उन तक पहुंचा रहे हैं इसके अलावा पीएच. डी. के विद्यार्थियों को ऑनलाइन मार्गदर्शन प्रदान कर रहें हैं।आगामी समय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिलेंगे।ऑनलाइन शिक्षण सामग्री कैसे उपलब्ध हो, ऑनलाइन परीक्षाएं कैसे हो,ऑनलाइन पाठ्यक्रम कैसे पढ़ाए जाएं, इस दृष्टि से बड़े परिवर्तन होने की उम्मीद है। वर्तमान विश्व में ज्ञान – विज्ञान के जो नवीनतम साधन और उपल्धियाँ है, उस सन्दर्भ में छात्रों को द्यतन रखना बेहद आवश्यक है इसलिए हम सब तकनीकी साधनों के माध्यम से कार्य कर रहें हैं।आगामी समय तकनीक आधारित शिक्षा व्यवस्था और तकनीक केन्द्रित विश्व- व्यवस्था का साक्षी बनने जा रहा है”।2“वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली नामक जर्नल में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर तथा विज्ञान साहित्य के प्रकाशन में तेरहवें स्थान पर है। शीर्षस्थ विज्ञान संस्थाओं से ८० की सदी  शोधकार्य विदेशी पत्रिकाओं में छपते हैं या विदेशी संगोष्ठियों में में प्रस्तुत किए जाते हैं। भारतीय प्रयोगशालाओं में भारत की गरीब जनता की गाढ़ी कमाई से भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा सिद्ध – शोध कार्य को इस तरह विदेशों में प्रकाशित करने से भारत की जनता का कोई लाभ नहीं है, बल्कि इससे अप्रत्यक्षता प्रतिभा पलायन को जोर मिलता है, यह सब टाला जा सकता है, यदि हम सचेत हो जाएं और स्वभाषा का माध्यम अपनाएं। इसके लिए एक पंच सूत्रीय कार्यक्रम निम्लिखित है-

  • बदली हुई वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप विज्ञान–प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में हिंदी के प्रयोग हेतु एक उपयुक्त नीति निर्धारित हो एवं कार्यक्रम बने, प्रथमतः यह कार्य संगोष्ठियों के स्तर पर हो।
  • तकनीकी हिंदी के प्रयोग–प्रसार व हिंदी में शोध–पत्रादि एवं तकनीकी प्रतिवेदन लेखन पर व्यापक प्रशिक्षण की परियोजना चलाई जाए और समयबद्ध लक्ष्य निर्धारित किए जाएं।
  • देश की अंग्रेजी विज्ञान पत्रिकाओं में अनिवार्यता हिंदी खंड हो तथा सभी अंग्रेजी शोध – पत्रों का सारांश हिंदी खंड में हों तथा सभी अंग्रेजी शोध- पत्रों का सारांश हिंदी में अनिवार्यत: दिया जाए। तकनीकी संगोष्ठियों में हिंदी सत्र की व्यवस्था हो।
  • राजभाषा कार्यान्वयन के अंतर्गत वार्षिक कार्यक्रमों में हिंदी में विज्ञान संबंधी प्रशिक्षण, प्रकाशन संगोष्ठी आदि का ब्यौरा शामिल करें एवं तिमाही प्रतिवेदन में ऐसी उपलब्धियों का जिक्र हो।
  • विज्ञान–प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में हिंदी के विविध प्रयोग हेतु उचित प्रोत्साहन की व्यवस्था हो एवं ऐसे कार्यों को उचित मान्यता एवं महत्व दिया जाए”।7

 जनसंचार के क्षेत्र में हिंदी–

 चूँकि हिंदी भारत वर्ष के सबसे बड़े समुदाय द्वारा प्रयुक्त होने वाली भाषा है। अतः जनसंचार के क्षेत्र में भी इसकी विशेष भूमिका रही है। विगत दो शताब्दियों में जनसंचार के क्षेत्र में और वहां प्रयुक्त होनेवाली हिंदी में भी लगातार परिवर्तित हो रही है। जनसंचार के परम्परागत माध्यमों से लेकर आधुनिक माध्यमों तक हिंदी का धडल्ले से प्रयोग हो रहा था। “आज प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया, सिनेमा, टीवी, साहित्य – संस्कृति प्रशासन, राज-काज और पाठ्य पुस्तकों द्वारा हिंदी प्रसारित हो रही है। हर माध्यम की अपनी अलग –अलग भाषा शैली है।  जन- जन की हिंदी, विज्ञान – तकनीकी, न्याय – पालिका और विदेशियों द्वारा प्रयुक्त हिंदी का भी अध्ययन किया जा सकता है। हमारे अपने देश में तमाम राज्यों और प्रदेशों की अपनी – अपनी बोली भाषा है। इस बोली भाषा के लहजे में प्रयुक्त हों वाली हिंदी भी गजब की है। इन सभी को मिलाकर मुंबई की खिचडीनुमा हिंदी बनती है और अंडरवर्ल्ड की जो टपोरी हिंदी बोली जाती है उसका तो अंदाज ही कुछ निराला है। समाज व्यवस्था में जैसे परिवर्तन होता है वैसे ही समय काल के अनुसार भाषा के स्वरुप में भी परिवर्तन होता रहेगा। कल संस्कृतमय भाषा थी आज यांत्रिकी और तकनीकी से प्रेरित अंग्रेजी मिश्रित हिंदी प्रयुक्त हो रही है। जब बात टेकनोलॉजी की होती है तो अनायास अंग्रेजी का वर्चस्व दिखाई देने लगता है। क्लिष्ट शब्दों के बजाय अंग्रेजी के शब्दों को जस का तस देवनागरी में लिखकर हिंदी के शब्दकोश को बढाया जाना समय की जरुरत है । जैसे- रेल, टेलीविजन, फैक्स, टेलीग्राम , ट्रेन, पोस्ट, बैंक, मोबाइल, कंप्यूटर, रेडियो, टेलिविजन, इंटरनेट,ई-मेल, डाउनलोड, डॉक्टर, ट्रक्टर, मीडिया, यूनिकोड, इंजीनियर, पेपर, प्रिंटर, बटन, इत्यादि, सैकड़ों ऐसे शब्द हैं जो जस के तस रोमन अंगेजी से देवनागरी हिंदी में प्रयुक्त हो रहे है। पहले तो नहीं पर अब धड़ल्ले से इस तरह के शब्दों का प्रयोग रोजमर्रा के जीवन में हो रहा है”3।

सोशल मीडिया की प्रकृति फास्ट फूड की तरह है। इसके कारण हिंदी आलोचना और हिंदी साहित्य जगत पर बुरा प्रभाव भी पड़ा  है। इसी तरह कई गलत और अनावश्यक ख़बरें या आर्टिकल्स भी प्रसारित होते है। यह साहित्यिक दुनिया के कन्फेशन जैसा ज्यादा दिखाई देता है। सोशल मीडिया ने नवीन विधाओं वाली नई हिंदी को भी जन्म दिया है जो डिजिटल पव्लिकेशन्स तथा लिट फेस्ट के आयोजन से आच्छादित  है। “धीरे – धीरे अब सोशल मीडिया पर साहित्यिक सामग्री आडियो और वीडियो के रूप में भी आने लगी है। यूट्यूब जैसा सोशल मीडिया इसका सशक्त माध्यम है।अक्सर यह भी देखने में आता है कि सोशल मीडिया के माध्यम से कई गलत जानकारियां भी प्रसारित होती रहती है जिस पर लगाम लगना जरूरी है। यह किसी के निजी विवेक पर आधारित है। कई बार कुछ ऐसी सामग्री या कविताओं को किसी बड़े लेखक या कवी के नाम पर प्रसारित किया जाता है जिसकी रचना उस लेखक या कवि ने कभी नहीं की जाती है। अपने एक लेख में बालेन्दु शर्मा लिखते हैं कि, ‘सोशल मीडिया साहित्य को नई विधाएं दे सकता है मगर अब तक ऐसा नहीं हो पाया है। एक ज़माने में ब्लॉगिंग की बड़ी धूम थी। ब्लॉगिंग एक सशक्त विधा बन सकती थी किन्तु वह माध्यम भर बन कर रह गई । अपनी रचना धर्मिता को दूसरों तक पहुंचाने का माध्यम वैसे ही है जैसे कोई भीअन्य माध्यम है या  हो सकता है। जैसे टेलिविजन, सिनेमा या नुक्कड़ नाटक साहित्यिक विधाएं अभी भी नहीं है क्योंकि उनके लेखन की कोई स्पष्ट दिशा नहीं है। दूसरी ओर रेडियो नाटक और रिपोतार्ज आदि को देखिए जिनका विधाओं के रूप में पर्याप्त विकास हुआ है। सोशल मीडिया की ही तरह ये भी पारंपरिक माध्यम ही थे किन्तु वे साहित्य के साथ तारतम्य बनाने में सफल रहे।” 4

इस दौर में अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में सोशल मीडिया की अपनी अहम् भूमिका है। माना कि यह मान्यता प्राप्त माध्यम नहीं है पर पूरे विश्व में फैला इसका जाल, व्यापकता का एहसास दिलाता है। आज जन-जन के हाथों तक फैला यह एक सशक्त माध्यम है। इसमें एस। एम। एस।, यूट्यूब, वाट्सअप, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, औरकुट, फेसबुक, मैसेंजर, मेल इत्यादि का समावेश किया जा सकता है जो पलक झपकते ही विश्व के एक कोने की खबर दुसरे कोने तक पहुंचा देते हैं। इंटरनेट सोशल मीडिया का प्रमुख माध्यम है। जिसके सहारे यह परिचालित होता है। महज एक क्लिक की  सहायता से मिनटों में कोई बात, घटना, साहित्य, संस्कृति, संवाद, तस्वीरें, मनोरंजन, थीम्स, शॉर्ट फिल्म्स, नौकरी के अवसर, विज्ञापन इत्यादि हजारों – हजार लोंगों तक पहुँच जा रहें हैं। इसकी दखल अब चैनल, पत्रकारिता एवं मनोरंजन के अन्य माध्यम भी लेने लगे है। इन माध्यमों में कई भाषाओँ का प्रयोग हो रहा है। अतः हिंदी के पक्ष में   बात की जाए तो हिंदी के प्रचार – प्रसार में सोशल मीडिया अहम भूमिका निभा रही है।

“कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ‘मेन्युअल कैसलट’ इसे मास कम्युनिकेशन के बजाय ‘मास सेल्फ कम्युनिकेशन’ का दर्जा देते हैं मतलब हम जनसंचार तो करते है लेकिन जन – स्व – संचार करते है और हमें पता नहीं होता कि हमारा यह संचार विश्व के कितने लोगों तक पहुंचेगा। इस दौर में शार्टकट लिखने के चक्कर में भाषाओं के स्वरूप को बिगाड़ने और एक नई भाषा संस्कृति को जन्म देने में भी सोशल मीडिया मुख्य भूमिका निभा रही है”5 ।

सोशल मीडिया पर हिंदी कई विधाओं में प्रयुक्त हो रही है, जैसे कि यहाँ पर कला, साहित्य, संस्कृति, संवाद, रिपोतार्ज, घटना – प्रसंग इत्यादि का जिक्र किया गया है। हिंदी के स्तर और मानक रूपों की कोई बंदिश नहीं है। भारत में सोशल मीडिया के प्रति बढ़ता क्रेज अब पारंपरिक सामाजिक रिश्तों की नई तस्वीर पेश कर रहा है। इसका प्रयोग छोटे – बड़े, अमीर – गरीब, महिला – पुरुष, सभी वर्ग के लोग कर रहें हैं। एक सर्वे के मुताबिक भारत में फेसबुक इस्तेमाल करने वालों की संख्या अमेरिका से अधिक है। यह जितना लाभदायी है, उतना ही नुकसानदेह भी।

जनसंचार के विविध माध्यमों को हम निम्न रूप में देख सकते हैं-

  1. लिखित माध्यम –  समाचार पत्र – भाषा के विकास, प्रचार – प्रसार में समाचार पत्रों का अप्रतिम योगदान रहता है। हिंदी भाषा के प्रचार – प्रसार और विकास में हिंदी समाचार पत्रों की विशेष भूमिका रही है। हिंदी में प्रकशित पहला साप्ताहिक समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तंड’ है जिसे पण्डित जुगलकिशोर मिश्र ने 30 मई 1826 को कलकत्ता से प्रकाशित किया था। हिंदी का पहला दैनिक पत्र समाचार सुधा वर्षण (1854) भी कलकत्ता में ही प्रकशित हुआ था।  उन्नीसवीं सदी में बुद्धि प्रकाश, सत्य दीप, धर्मप्रकाश, तत्वबोधनी, जन प्रकाश, कविवचन सुधा, हिंदी प्रदीप, नवभारत, पंजाब केसरी, आज, राजस्थान पत्रिका ने न केवल बीसवीं सदी में प्रकाशवान बनाए रखा बल्कि इक्कीसवीं शताब्दी में भी इनमें से कुछ पत्र अपना परचम लहरा रहें है। प्रसार संख्या की दृष्टि से हिंदी समाचार पत्र अंग्रेजी सहित अन्य सभी भारतीय भाषाओं से काफी आगे है। वर्ष 2016 – 17 में समाचार – पत्रों की कुल संख्या 48,80,89,490 थी  जिसमें सबसे अधिक प्रसार संख्या हिंदी समाचार – पत्रों की थी – 28,89,75,773। इस अवधि में अंग्रेजी में प्रसार संख्या 5,24,27,005 थी। किसी एक समाचार पर की प्रसार संख्या की दृष्टि से भी हिंदी आगे है इसमें दैनिक भास्कर की प्रसार संख्या सर्वाधिक है। जबकि दूसरे  स्थान पर समाचार पत्र टाइम्स  ऑफ इण्डिया है जिसकी प्रसार संख्या  42,68,703 है।

पत्रिकाएँ – समाचार पत्रों की भांति पत्रिकाएँ भी समाज के विचारों और साहित्य की संवाहिका होती है। पत्रिकाओं में उत्कृष्ट साहित्य मिलता है। हिंदी पत्रकारिता स्वतंत्रता से पूर्व अत्यंत ओजपूर्ण, तेजस्विनी, निर्भय तथा राष्ट्रीय चेतना की संचारिणी रही है। भारतेंदु हरिश्चंद, अम्बिका  प्रसाद व्यास, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ जैसे महान साहित्यकारों ने पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से राष्ट्रीय नवजागरण की साधना की। हिंदी पत्रिकाओं से हिंदी की कई साहित्यिक विधाओं की सुरुआत हुई है। राष्ट्रभाषा हिंदी के आन्दोलन में सरस्वती, माधुरी, विशाल भारत, सुधा, हंस, धर्मयुग, और कादम्बिनी आदि पत्रिकाओं का विशेष योगदान रहा है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती पत्रिका के माध्यम से हिंदी के अलंकारिक और परिष्कृत और व्यवस्थित रूप को साहित्य सृजन में विशेष स्थान दिया जिससे हिंदी भाषा का विकास सत्साहित्य में हुआ।

पत्रिकाओं की संख्या और प्रसार संख्या की दृष्टि से हिंदी में प्रकाशित पत्रिकाओं की संख्या अधिक है। वर्ष 2016 – 17 में 11600 पत्रिकाएँ हिंदी में प्रकशित हुई थी जिनकी कुल प्रसार संख्या 23,89,75,773 थी। जबकि अंग्रेजी में 1487 पत्रिकाएँ प्रकाशित हुई थी जिनकी प्रचार संख्या 5,65,77,000 थी। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हिंदी में प्रकाशित पत्रिकाओं ने हिदी के प्रचार – प्रसार में अपनी महतवपूर्ण भूमिका निभाई है और अभी भी केवल भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के कई देशों में भी इन पत्रिकाओं के माध्यम से हिंदी भाषा फलफूल रही है।

  • श्रव्य माध्यम –

जनसंचार के माध्यमों में भारत में रेडियो का अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट स्थान रहा है। लेनिन ने कहा था कि “रेडियो बिना कागज़ और बिना दूरी का समाचार पत्र है। डॉ। अर्जुन तिवारी ने लिखा है कि “भारतीय आर्षग्रंथों में नाद ब्रम्हां और शब्द ब्रहम का उल्लेख मिलता है। वेदों में वर्णित है कि ध्वनि से सृष्टि की रचना हुई। ध्वनि में ही ब्रम्हांड का विस्तार होता है तथा ध्वनि में ही वह विलीन हो जाता है।

ध्वनि और शब्द के सामंजस्य का सर्वोत्तम माध्यम रेडियो है। रेडियो मौखिक परंपरा का एक आधुनिक रूप है। भारत में रेडियो का आगमन 23 जुलाई 1927 को ‘हुआ जिसका उद्घाटन इन्डियन ब्राडकास्टिंग कंपनी’ के नाम से तत्कालीन वायसराय ‘लार्ड इरविन’ ने किया है। इसके कुछ बर्ष के उपरांत जब ‘सरदार वल्लभभाई पटेल’ भारत के सूचना और प्रसारण मंत्री बने तो उन्होंने ने केवल रेडियो पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों की अवधि बधाई बल्कि सभी क्षेत्रीय बोलियों कोभी कार्यक्रम रेडियो पर प्रसारित करवाए जिसके कारण ने केवल हिंदी भाषा अपितु क्षेत्रीय बोलियों का भी विकास हुआ और रोजगार के नए मार्ग भी प्रशस्त हुए।

विविध भारती पर प्रसारित कार्यक्रमों की लोकप्रियता निर्विवाद है। भारत सरकार गाँवों का का देश है और यहाँ की अधिकांश जनता ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है जहाँ पर आज  भी रेडियो संचार का प्रमुख माध्यम है। रेडियो के माध्यम से हिंदी तथा क्षेत्रीय बोलियों में कार्यक्रम प्रसारित होते है। रेडियो पर प्रसारित कार्यक्रमों के माध्यम से हिंदी का मानक और अखिल भारतीय स्वरुप भी विकसित होता है। इस प्रकार हम कह सकते है कि रेडियो ही लोकतंत्र का संबल और विश्व में विचारों के सम्प्रेषण का एक श्रेष्ठ माध्यम है।

  • दृश्य श्रव्य माध्यम –

भारत में टेलिविजन का आगमन 1964 में विक्रम साराभाई के प्रयास से हुआ। आधुनिक संचार क्रान्ति में टेलिविजन की भूमिका अत्यंत महतवपूर्ण है। टेलिविजन किसी राष्ट्र की प्रगति का प्रमाणिक व्याख्याता होता है और राष्ट्र के स्वरुप का दर्पण भी होता है। विगत 10 वर्षों में टेलिविजन ने हमारे जीवन की दिशा बदल दी है।  टेलिविजन में प्रसारित कार्यक्रमों के यों तो हर भाषा के दर्शक है परन्तु हिंदी का स्थान उनमें अग्रणी हैं। हिंदी के कार्यक्रम न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी देखें जाते है। आज सामान्यत: 872 से अधिक चैनल है जिनमें से 264 के भी ज्यादा केवल हिंदी के है और कई अहिन्दी चैनलों पर भी हिंदी के कार्यक्रम दिखाए जाते हैं।

मनोरंजक चैनलों के अलावा समाचार आधारित चैनलों की भी बाढ़ सी आ गई है। देश में 24 से अधिक चैनल 24 घंटों में हिंदी भाषा में ही समाचार प्रस्तुत करते है। इससे हिंदी के विकास और प्रचार प्रसार में टेलिविजन का महत्वपूर्ण योगदान सिद्ध होता है। टेलिविजन चैनलों पर प्रसारित कार्यक्रमों में प्रयुक्त भाषा के स्वरूप पर विचार करने पता चलता है कि जहाँ भाषा की स्वरूपगत विशेषताएं सभी में सामान हैं वहीँ कुछ कार्यक्रम और चैनल विशेष पर भिन्नता भी दृष्टिगोचर होती है। चाहे धारावाहिकों के संवाद की भाषा हो या फिर समाचारों की भाषा हो उनमें हिंदी का नया स्वरूप देखने को मिलता है। टेलिविजन पर प्रसारित इन कार्यक्रमों में हिंदी का जो रूप देखने को मिलता है वह वस्तुतः आधुनिक शिक्षित वर्ग के शहरी परिवेश की हिंदी के रूप को प्रस्तुत करता है। संवादों के माध्यम से अखिल भारतीय स्तर पर विकासमान होती आधुनिक हिंदी की झलक मिलती है।

  • कम्प्यूटर –

बीसवीं शताब्दी की सबसे क्रांतिकारी और महत्वपूर्ण उपलब्धि है –  कम्प्यूटर। कप्यूटर का सबसे पहले विकास और प्रयोग 1944 में हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध में एटमबम की संबंधित गणनाओं के लिए कंप्यूटर का प्रयोग किया गया और शब्द संसाधनों के लिए अनुसंधान कार्य जोर-शोर से शुरू किए जाने लगे। बीसवीं सदी के नवें दशक में व्यक्तिगत कंप्यूटर के निर्माण से कंप्यूटर के क्षेत्र में एक ऊंची  छलांग लगी और इसके साथ विभिन्न भाषाओं के सॉफ्टवेयरों का विकास शुरू हुआ। हिंदी भाषा के भी डास परिवेश में – सुलेख, शब्दरत्न, अक्षर, शब्दमाला जैसे सॉफ्टवेयर विकसित किए गए। किन्तु डास परिवेश में काम करने वालों की अपनी अलग सीमाएं थी। जैसे ही विंडोज का आगमन हुआ कंप्यूटर पर कार्य करने के अनंत द्वार खुल गए। हिंदी के अनेक प्रकार के फॉन्ट आ गए, जो अंग्रेजी के लोकप्रिय सॉफ्टवेयरों में यथा एम।एस वर्ड, एक्सल, पी। पी। टी आदि के साथ अंग्रेजी के साथ सम्मिलित हो गए, अब इनमें हिंदी भाषा में कार्य करना अत्यंत सरल हो गया है।

कंप्यूटर के माध्यम से हिंदी का प्रयोग बढाने में उनके सॉफ्टवेयरों की विशेष भूमिका रही है जो कंप्यूटर की सहायता से टेलीविजन पर दूसरी भाषाओं के प्रसारित कार्यक्रमों में उपशीर्षक हिंदी में देने के लिए उपयोग में लाए जाते हैं। इंटेरनेट के आ जाने से तो सम्पूर्ण विश्व एक छोटे से गाँव में तब्दील हो गया है। दुनिया भर में हिंदी भाषा जानने वालों के लिए इंटरनेट पर हिंदी में बनी बेबसाइटों की उपलब्धता उनके लिए विश्वज्ञान के द्वार बन कर सामने आई है अनेक बेबसाईट हिंदी में उपलब्ध है जिससे हिंदी के प्रचार – प्रसार और विकास को बल मिला है।हिंदी में इमेल भेजने की सुविधा को हम भाषाई कंप्यूटर विकास के क्षेत्र में एक अनुपम उपलब्धि के रूप में देख सकते हैं।

इस प्रकार हम यह स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि जनसंचार के क्षेत्र में हिंदी स्वंत्रता प्राप्ति के पहले पूर्व अपना वर्चस्व स्थापित कर चुकी थी। जनसंचार के विविध माध्यमों के द्वारा आज भी हिंदी सूचे विश्व में बोली और समझी जा रही है।

तकनीक और हिंदी–

आधुनिक तकनीकी के क्षेत्र में हिंदी  ने अपनी उपस्थिति दृढ़तापूर्वक जब्त कराई है। कम्पूटर के आगमन के साथ ही उस पर हिंदी के प्रयोग को लेकर भी चुनौती उपस्थित हुई । जिसका हिंदी जगत में अच्छी तरह से सामना किया। “हिंदी में सर्वप्रथम कम्पूटर के सन्दर्भ में ही शब्द संसाधन का कार्य प्रारंभ हुआ। यह भाषा संसाधन का आरंभिक सोपान है। किन्तु आरंभिक चरण में रोमन लिपि के माध्यम से ही हिंदी पाठों का कुंजीयन किया जाता था।अब भारत और विदेशों में शब्द संसाधन के अनेक पॅकेज विकसित किए गए है, जिनमें हिंदी में द्विभाषिक रूप से या फिर बहुभाषिक रूप में विभिन्न भारतीय भाषाओं के माध्यम से शब्द संसाधन के कार्य किए जा सकते हैं। इनमें प्रमुख हैं – अक्षर, मल्टीवर्ड, शब्दमाला, शब्दरतन, बाइस्क्रिप्ट, आलेख, भारती ए। एल। पी। आदि पैकेजों में से कुछ में वे तमाम सुविधाएं  भी  उपलब्ध है जो ‘वर्डस्टार’, वर्ड परफेक्ट माइक्रोसॉफ्ट, जैसे अधुनातन वर्ड प्रोसेसिंग पैकेजों में सुलभ है। किन्तु मात्र शब्द संसाधन से किसी भी भाषा में कंप्यूटर संबंधी महत्वपूर्ण अनुप्रयोगों को संपन्न नहीं किया जा सकता इसलिए भारत सरकार के राजभाषा विभाग ने केन्द्रीय सरकारी कार्यालयों के सन्दर्भ में कंप्यूटर संबंधी भाषा नीति की घोषणा करते हुए स्पष्ट कर दिया था कि किसी भी कंप्यूटर को तभी द्विभाषी मन जाएगा, जब उसमे  शब्द संसाधन के साथ – साथ डाटा संसाधन की सुविधा भी हिंदी – अंग्रेजी में, अर्थात द्विभाषिक रूप में उपलब्ध होगी।” 6 

डाटा – संबंधी कार्य  हिंदी में संपन्न करने के लिए दो विकल्प उपलब्ध है। हार्डवेयर विकल्प और सॉफ्टवेयर विकल्प। जहाँ तक हार्डवेयर विकल्प का सम्बन्ध है, इस दिशा में आई। आई। टी। कानपुर का प्रयास विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनके द्वारा विकसित यह प्रणाली जिस्ट (गेआफिक एंड इंटेलीजेंस बेस्ड स्क्रिप्ट टेकनोलॉजी) प्रोद्योगिकी के रूप में प्रसिद्ध है। इस पर आधारित विभिन्न अनुप्रयोगों के विकास का दायित्व भारत सरकार के सी- डैक नामक संस्थान को सौप गया है।जिसमें परम सुपर कंप्यूटर का विकास भी किया। सी। डैक ( सेंटर पर डेवलपमेंट आफ  एडवांस कम्प्यूटिंग) पुणे, महाराष्ट्र में स्थित  है। जिस्ट प्रौद्यिगिकी के अंतर्गत पर्सनल कंप्यूटर के मदर बोर्ड पर एक ‘प्लग इन कार्ड’ लगा दिया जाता है। इसी कार्ड को जिस्ट कार्ड कहा जाता है। इस कार्ड की सहायता से आई। बी। एम। पी। सी। कंप्यूटरों पर शब्द संसाधन तथा डाटा – संसाधन के लिए प्रचलित रोमन के सभी पैकेजों का प्रयोग द्विभाषिक या बहुभाषिक रूप में किया जा सकता है। यूनिक्सजेनिक्स परिचालन प्रणालियों के लिए ‘जिस्ट कार्ड’ के बजाय ‘जिस्ट टर्मिनल की आवश्यकता होती है। जिस्ट प्रोद्योगिकी के अनार्गत यह सुविधा सभी भारतीय  भाषाओं में सुलभ है और अब यह फारसी, अर्बे, सिंहली, तिब्बती और रूसी लिपि में भी उपलब्ध हो गई है।

इसके विपरीत सॉफ्टवेयर विकल्प के अंतर्गत कंप्यूटर में किसी भी प्रकार के परिवर्तन की आवश्यकता नही होती, ये पॅकेज फ्लापी डिस्क के रूप में उपलब्ध होते हैं। उए पॅकेज दो प्रकार के होते हैं। पहला समर्पित सौफ्टवेयर प्रोग्राम दूसरा सामान्य उद्देश्यीय सौफ्टवेयर परिवेश, समर्पित सौफ्टवेयर प्रोग्राम के अंतर्गत हिंदी में डाटा – संसाधन का एक सॉफ्टवेयर है – ‘देवबेस’( द्विभाषी डाटा बेस प्रबंध प्रणाली) यह सॉफ्टवेयर ही बेस-3 प्लस के अंतर्गत हिंदी में काम करने के लिए यह एक अच्छा पैकेज है। लेकिन जी बेस के संशोधित पॅकेज ( डी – बेस4 ) में हिंदी में काम करने के लिए इसमें संशोधन की आवश्यकता होगी।

सामान्य उद्देश्यीय सॉफ्टवेयर परिवेश के अंतर्गत रोमन लिपि के सभी सॉफ्टवेयर पैकेजों (  जैसे डी। बेस, लोटस, साफ्ट बेस, क्लिपर, फाक्सप्रो, औरेकल आदि।) में हिंदी हिंदी में कार्य किया जा सकता है, उसके अलावा यह परिवेश बेसिक, कोबाल, सी पास्कल आदि प्रोग्रामिंग भाषाओं में तैयार किए प्रोग्रामों में भी हिंदी को आंतरिक क्षमता प्रदान करता है। वस्तुतः यह परिवेश जिस्ट के ही समकक्ष है। जो कार्य जिस्ट के माध्यम से हिंदी में किए जाते है, वें सभी कार्य विकल्प के रूप में इस परिवेश के अंतर्गत भी किए जा सकते हैं। आर। के रिसर्च फाउंडेशन द्वारा विकसित ‘सुलिपि’ नामक यह साफ्टवेयर जिस्ट के सामान ही सामान्य उद्देशीय साफ्टवेयर है, जिसके माध्यम से एम। एस। डास पर आधारित पर्सनल कंप्यूटर पर कार्यालय स्वचालन (आफिस आटोमेशन ) अंग्रेजी में साथ – साथ किए जा सकते हैं। जिस्ट व सुलिपि, दोनों के अंतर्गत भारतीय भाषाओं में परस्पर लिप्यांतरण की सुविधा मौजूद है, किन्तु सुलिपि में यह सुविधा हिंदी, पंजाबी, बँगला और गुजराती तक ही सीमित है, जबकि जिस्ट में यह सुविधा सभी भारतीय भाषाओं में सुलभ है।

इसी प्रकार यदि हम हिंदी भाषा की वैज्ञानिकता पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि हिन्दी एक वैज्ञानिक भाषा है|भाषा विज्ञान की दृष्टि से हिन्दी को संगणकीय प्रौगरैमिंग की भाषा बनना अत्यन्त सरल है किन्तु इस दिशा में पर्याप्त काम नही हुआ है| भारत सरकार के राजभाषा विभाग ने हन्दी प्रवाह नाम का सॉप्टवेयर तैयार किया है|

हिदी प्रवाह का भाव पक्ष जितना सबल है, तकनीकी पक्ष भी उतना ही मजबूत है|इस पाठ्यक्रम को भी “लीला पैकेज” प्रबोध, प्रवीण एवं प्राज्ञ की भाँति अंग्रेजी के अलावा 14 भारतीय भाषाओं क्रमश: असमिया, बोडो, बांग्ला, गुजराती, कन्नड, कश्मीरी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, तमिल एवं तेलुगू के माध्यम से जनसाधारण तक ऑनलाइन वेबवर्जन एवं मोबाइल ऐप के रुप में उपलब्ध कराया गया है|

            “लीला हिंदी प्रवाह” के वेबवर्जन एवं मोबाइल एवं मोबाइल ऐप में पाठों सें संबंधित शब्दों को समझने एवं समझाने के लिए बृहत शब्दावली का व्यवस्था भी की गई है| इस बृहत शब्दावली में पाठों में सम्मिलित शब्दों के अर्थ यूज़र द्वारा चयनित भाषा, में वर्णक्ररमानुसार दिए गए हैं| इस भाग की विशेषता यह है कि इसमें शब्दों के उच्चारण के साथ-साथ रिकॉर्ड की  सुविधा भी उपलब्ध करवाई गई है| यूज़र पाठ में आए शब्दों का अर्थ अपनी भाषा में देखने एवं जानने के अलावा हिंदी में उनका उच्चारण सुनने के बाद स्वयं उस शब्द को बोलकर रिकॉर्ड कर सकते है और फिर मूल शब्द एवं स्वंय व्दारा रिकॉर्ड किए हुए शब्द को एक के बाद एक सुनकर उच्चारण संबंधी अपनी कमियों को दूर कर सकते है| यूज़र, अपनी सुविधा के अनुसार जब चाहे, जितना चाहें और जितनी बार चाहें, इस पाठ्यक्रम को पढ़ सकते हैं|

इसी क्षेत्र में माइक्रोसॉफ्ट और गूगल ने कुछ सुविधाएं प्रदान की हैं-

(a)माइक्रोसॉफ्ट और गूगल के इंडिक कीबोर्ड (आईएमई) ऐसे ही दो टूल हैं जिनकी मदद से आप बिना किसी खर्च और प्रशिक्षण के कम्प्युटर पर आसानी से टाईपिंग कर सकते हैं और ये आपके सिस्टम पर केवल कुछ सेकंड में इंस्टॉल हो जाते हैं| माइक्रोसॉफ्ट का इंडिक लैंग्वेज इनपुट टूल इसकी तीन सुविधाओं की वजह से बेजोड़ है|

(b) गूगल पर उपलब्ध “ट्रांसलेट” एक अच्छा विकल्प है| यह विविध भाषाओं में अनुवाद हेतु ऑनलाइन सुविधा है और इसके लिए हमें www।translate।google।co।inपर विज़िट करना होता है| वर्तमान में हम गूगल अनुवाद पर उपलब्ध “गूगल टूलकिट” नामक सुविधा पर चर्चा करते हैं| गूगल अनुवादक टूलकिट 8 जून, 2009 में गूगल इंक व्दारा जारी किया गया था|

शब्दकोश

(a) ऑनलाइन शब्दकोश के तहत www।shabdkosh।comएक उपयोगी वेबसाइट है जो हिंदी के अतिरिक्त बांग्ला, गूजराती, कन्नड, मलयालम, तमिल, तेलगू, पंजाबी, मराठी जैसी नौ भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी शब्दों के अर्थ उपलब्ध कराती है|

(b)ई-महाशब्दकोश राजभाषा विभाग व्दारा प्रस्तुत एक ऑनलाइन शब्दकोश है जिसका विकास प्रगत संगणक विकास केंद्र (C-DAC)के व्दारा किया गया है जो कि एक व्दिभाषी- व्दिआयामी उच्चारण शब्दकोश है|

वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग का ई–शब्दकोश

(a)वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग की स्थापना सन् 1961 को की गई थी| यह आयोग हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के लिएवैज्ञानिकी एवं तकनीकी शब्दावली का निर्माण एवं समन्वय कार्य के अलावा तकनिकी शब्दावली, पारिभाषिक शब्दावली तथा एन्साइक्लोपीडिया का निर्माण करता है|

(b) हाल ही आयोग अपनी वेबसाइट पर ऑनलाइल परिभाषिक शब्दावली की सुविधा भी प्रारंभ की है|

हिंदी विश्व की एक विशाल जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करती है | अत: ऐसे में हमारे यह उत्तरदायित्व अत्यधिक बढ़ जाता है कि हम इसे तकनीक विकास का लाभ देते हुए विश्व की अग्रनी भाषाओं की श्रेणी में स्थापित करने का प्रयास करें|

            सूचना प्रौद्योगिकी कम्प्यूटर पर आधारित सूचना प्रणाली का आधार है| सूचना प्रौद्योगिकी, वर्तमान समय में वाणिज्य और व्यापार का अभिन्न अंग बन गयी है| संचार क्रन्ति के फलस्वरुप अब इलेक्ट्रॉनिक संचार को भी सूचना प्रौद्योगिकी का एक प्रमुख घटक माना जाने लगा है| एक उद्योग के तौर पर यह एक उभरता हुआ क्षेत्र है| इसने विश्व की  विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं को जोड़कर अक वैश्विक अर्थव्यवस्था को जन्म दिया है| यह नवीन अर्थव्यवस्था अधिकाधिक रुप से सूचना के रचनात्मक व्यवस्था एवं वितरण पर निर्भर है| इसके कारण व्यापार और वाणिज्य में सूचना का महत्व अत्यधिक बढ़ गया है| इसीलिए इस अर्थव्यवस्था को तूचना अर्थव्यवस्था (Information Economy) या ज्ञान अर्थव्यवस्था (knowledge Economy) भी कहा जाने लगा है|

हिन्दी सिनेमा –

हिन्दी सिनेमा की समाज में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है|भारतीय फिल्म निर्माता-निर्देशकों ने अपनी बेहतर प्रस्तुतीकरण से हिंदी सिनेमा को शिखर पर पहुँचा दिया है| विश्व में सबसे ज्यादा आज हिंदी भाषा में फिल्मों का निर्माण होता है| हिंदी सिनेमा उद्योग ने भारत में ही नहीं विदेशों में भी अपना एक नजदीकी रिश्ता कायम किया है। देश-दुनिया में हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में हिंदी सिनेमा का अहम योगदान है| स्पीलबर्ग की फिल्म जुरासिक पार्क ने भारत मे जितना धन अपने हिंदी संस्करण से अर्जित किया वह इसके अंग्रेजी के मूल फिल्म से दो गुना अधिक था| हिंदी भाषा बाजार और मुनाफे की  कुंजी बन रही है| आज हॉलीवूड की फिल्म निर्माता भी भारत में अपनी विपणन नीति बदल चुके है| उन्हें पता है की उनकी फिल्में हिंदी में रुपांतरित होने के बाद मूल अंग्रेजी में प्रदर्शित फिल्म से कही अधिक मुनाफा कमा सकती है| पश्चिमी फिल्मों की ब्लॉकस्टर फिल्मों के हिंदी संस्करण की हमारे देश में जितनी खपत होती है वह अंग्रेजी संस्करण की संख्या से अधिक है| भारतीय हिंदी सिनेमा का हिंदी भाषा की व़्यापक लोकप्रियता और इसे संप्रेषण के माध्यम के रुप में आम स्वीकृती दिलाने में अहम योगदान है|हिंदी में बनी फिल्में हिंदी भाषी नागरिकों से ज्यादा अहिन्दी भाषी नागरिकों द्वारा देखी जाती है।  हिंदी  भाषा के प्रचार – प्रसार में हिंदी सिनेमा के योगदान के विषय में विचार करते हुए दयानंद अवस्थी ने लिखा है कि, “भारतीय हिन्दी सिनेमा को लगभग 106 वर्ष हो गए हैं इस पूरे शतकीय दौर में न जाने कितने विषय आए और कितने विषय गए किन्तु माध्यम का भाषायी ताना बाना हिन्दी भाषा के इर्द गिर्द बुना रहा है। आज हिन्दी भाषा विश्व की चौथी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है, इथेनोलोग मार्च 2019 के 22वें संस्करण के अनुसार विश्व की दस प्रमुख भाषाओं में (अधिक जनसंख्या के द्वारा बोली जाने वाली भाषा के अनुसार) चीन की मंदारिन प्रथम, स्पेन की स्पेनिश द्वितीय, ब्रिटेन की अंग्रेजी तृतीय तथा भारत की हिन्दी चतुर्थ स्थान पर है हालांकि क्रमश: पांचवें एवं दसवें स्थान पर भी भारतीय भाषा बंगाली एवं मराठी ही है जिन्होने हिन्दी भाषा के प्रसार पर खूब मदद की है । आज संचार माध्यमों सोशल मीडिया,टेलीविज़न के धारावाहिकों मोबाइल के वेब धारावाहिकों आदि के तीव्र विकास नें इस प्रसार को और अत्यधिक गति दे दी है । ”हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं कि भूमंडलीकरण ने भारतीय जीवन को गहरे में जाकर प्रभावित किया है लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हिंदी खत्म हो जाएगी और अंग्रेजी उसका स्थान ग्रहण कर लेगी । वो कहते हैं“भारत की 54 फीसदी आबादी 25 साल से कम उम्र के नौजवानों की है और भूमंडलीकरण ने उसकी आकांक्षाएं और चिंताएं बदली हैं। सूचना और आभासी दुनिया की नागरिकता के धरातल पर किसी कस्बे या महानगर के युवा में ज्यादा फर्क नहीं है। दोनों एक वर्चुअल वर्ल्ड में जी रहे हैं और रियल टाइम में चैट कर रहे हैं।” इसका जीता जागता उदाहरण है टी वी में दिखाये जाने वाले विभिन्न प्रतिस्पर्धात्मक धारावाहिकों, रियालिटी शो जैसे नृत्य अथवा गायन में समान रूप पूरे भारत के कोने कोने से प्रतिभागियों का अपनी काला कौशल का प्रदर्शन ।

यह संभवत: हिन्दी भाषा के प्रसार का स्वर्णकाल कहा जाएगा जब मनोरंजन के माध्यम से भाषा नें अपनी जड़ें वैश्विक रूप में जमाई है इसमें हिन्दी फिल्मों का योगदान सर्वोपरि माना जाएगा। शायर और गीतकार गुलज़ार ने 8 वें विश्व हिंदी सम्मेलन के तहत ‘हिन्दी के प्रचार प्रसार में हिन्दी फिल्मों की भूमिका’ सत्र की अध्यक्षता करते हुए यह टिप्पणी की थी कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार में फिल्मों ने साहित्य अकादमियों और नेशनल बुक ट्रस्ट से ज्यादा योगदान दिया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि सिनेमा, मीडिया और हिन्दी का नाता बहुत पुराना है। जैसे हिन्दी हिन्दुस्तान की जान है, वैसे ही हिन्दुस्तान में हिन्दी के बगैर सिनेमा और मीडिया की कल्पना ही नहीं की जा सकती। हिन्दी के प्रचार-प्रसार में सिनेमा और मीडिया का योगदान बहुत ही अतुल्य रहा है।हिन्दीतर भाषी क्षेत्रों में सिनेमा और मीडिया ने हिन्दी को जीवनदान दिया है।आज आप भारत के किसी भी कोनें में पहुँच जाएँ वे हिन्दी इसलिए समझ पाते हैं कि उन्होने उसे फिल्मों अथवा अन्य मनोरंजन के माध्यम से देखा व सुना है  आज विदेशियों को यदि अपना प्रचार करना होता है, चाहे वह सिनेमा का हो चाहे उनके उद्योग का हो, उन्हें हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी का सहारा लेना ही पड़ता है,भारत में सिनेमा का श्रीगणेश दादा साहब फाल्के द्वारा 1912 में  निर्मित और 1913 में प्रदर्शित रजा हरिश्चंद फ़िल्म से माना जाता है। इसके उपरांत प्रथम वाक फ़िल्म आलामारा का निर्माण 1931 में हुआ था तब से लेकर आज तक भारत में असंख्य फिल्मों का निर्माण हो चुका है। जन सामान्य में हिंदी को लोकप्रिय बनाने का महत्वपूर्ण योगदान हिंदी सिनेमा को दिया जा सकता है।  भारत में अपनी शैशवावस्था से ही हिंदी के विकास और प्रसार में फिल्मों ने अहम् भूमिका अदा की हैं। सन 1931 में 27 फिल्में बनी थी जिनमें से 22 फिल्में हिंदी में बनी थी।  भारत में प्रतिवर्ष 1000  फिल्में बनती हैं जिनमें से सबसे अधिक संख्या हिंदी फिल्मों की होती है। हिंदी फिल्मों भाषा में उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम  तक प्रचलित विभिन्न भाषाओं – बोलियों के शब्द सहज रूप से मिलते हैं अधिकांश हिंदी फिल्मों का निर्माण अहिन्दी भाषी  क्षेत्रों में होता है जो हिंदी के व्यापक प्रचार और उसकी लोकप्रियता को सिद्ध करता है। यदि हम हिंदी सिनेमा के साथ – साथ टेलिविजन की बात करें तो हिंदी  के प्रचार – प्रसार में टी। वी पर प्रसारित किए जाने वाले धारावाहिक अपने महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहें है। शहरों से लेकर छोटे गांवों तक के लोग जो कि वहां बोली जाने वाली क्षेत्रीय बोली से ही परिचित थे अब उन्हें हिंदी का ज्ञान भी हो गया है।  इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि हिंदी सिनेमा का हिंदी भाषा के प्रचार – प्रसार में अत्याधिक योगदान है।

निष्कर्ष

           सारांश यह है कि स्वाधीन भारत में लगातार हिंदी भाषा का विकास हो रहा है। वह सभी क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है।हिंदी अब भारतीय उपमहाद्वीप में संपर्क भाषा बन गई है।वह राजभाषा होने के कारण शासन, विधि, विज्ञान और तकनीक सभी क्षेत्रों में प्रयुक्त हो रही है । वह जनसंचार माध्यमों की प्रमुख भाषा बन कर उभरी है।आज हिंदी सिनेमा हजारों करोड़ का व्यापार कर रहा है। अतः हम कह सकते हैं की हिंदी सिनेमा और मीडिया के क्षेत्र में सबसे लोकप्रिय और उपयोगी भाषा बन गई है। संक्षेप में हिंदी उन तमाम क्षेत्रों में प्रयुक्त होने के कारण लगातार विकसित और समृद्ध हो रही है। आज उसका वैश्विक विस्तार बेहद आश्वस्तिकारक है।

संदर्भ सूची

  1. भाषा पत्रिका (द्वैमासिक ), मार्च – अप्रैल 2021, वर्ष -60, अंक -2, पृष्ठ संख्या – 14 -15
  2. वही  पृष्ठ संख्या – 10
  3. प्रौद्योगिकी बैंकिंग और हिंदी,   पृष्ठ संख्या- 101 ,   रमेश यादव
  4. वही.
  5. वही.
  6. भाषा : राष्ट्रभाषा और राजभाषा हिंदी,  डॉ. डी. सत्यलता, पृष्ठ संख्या 236
  7. वही.
  8. साहित्य सिनेमा सेतु पत्रिका ( रील से रियल तक ) ISSN : 2584-0819, लेख – ‘ हिंदी सिनेमा में हिंदी का बदलता स्वरुप’

भारतीय लोकनाट्य में बिदेसिया का प्रदेय- डॉ. सतेन्द्र शुक्ल

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भारतीय लोकनाट्य में बिदेसिया का प्रदेय- डॉ. सतेन्द्र शुक्ल

डॉ. सतेन्द्र शुक्ल

सहायक प्राध्यापक

रामजस महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

ई-मेल- satendrashukla@ramjas.du.ac.in

सारांश

प्रस्तुत शोध आलेख “भारतीय लोकनाट्य में बिदेसिया का प्रदेय” में बिदेसिया नाटक से सम्बंधित विभिन्न आयामों जैसे बिदेसिया की उत्पत्ति, पलायन, रोजगार, और रंगमंच पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है। जब हम बिदेसिया नाटक पर गौर करते हैं तो हम यह देखते हैं कि लोक जनमानस में प्रेम का इजहार एवं विरह की शिकायत कहीं मिलती है तो वह बिदेसिया में ही मिलती है। बिदेसिया सिर्फ एक नाटक न होकर एक लोकगीत है जो आम जनमानस को स्वयं में पिरोए हुए है और जिसे आम जनमानस स्वयं में पिरोए हुए हैं। बिदेसिया और आम जनमानस को लेकर हम निश्चित रूप में यह कह सकते हैं कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

बीज शब्द: बिदेसिया, लोकनाट्य, लोकजीवन, सामाजिक, सांस्कृतिक, गाँव

शोध प्रविधि: प्रस्तुत आलेख में विभिन्न द्वितीयक स्रोतों का प्रयोग किया गया है। जिनमें विभिन्न पुस्तकें , अखबार, व पत्रिकाएँ शामिल हैं।

शोध आलेख

जब भी बात बिदेसिया की होती है तो हमारे मन मस्तिष्क में एक छायाचित्र कौंध उठता है और वह छायाचित्र होता है बिदेस (प्रदेश ,अपने मूल निवास से कहीं सुदूर जाकर अस्थायी रूप से बसने वाला स्थान) का। भारतीय लोकनाट्य में भिखारी ठाकुर ने अपनी रचना बिदेसिया के माध्यम से जो कौतुहल पैदा किया है वह अद्वितीय है। इसमें सबसे मूल बात यह है कि यह नाटक भोजपुरी भाषा में लिखा गया। जिससे एक भाषा को सम्मान पूर्वक आगे बढ़ने और प्रतिष्ठित होने का अवसर मिला। बिदेसिया नाटक हमें यह बताता है कि कैसे पति के बिदेस (प्रदेश) चले जाने पर उसकी पत्नी विरह में व्याकुल रहती है और उसे यह आशंका होती है कि उसके पति किसी रण्डी (अन्य स्त्री) के रूप माया जाल में फँस गए हैं तथा अपने गाँव वापस नहीं आ रहे हैं। अपनी इस व्यथा को वह अपनी सखी से विभिन्न लोकगीतों के माध्यम से कहती है। भिखारी ठाकुर का बिदेसिया इसी कथा के इर्द गिर्द घूमता रहता है।

            लोकजीवन से संबंधित सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं तथा प्रवृत्ति का निरूपण लोकनाट्यों में होता है। विशेष बात यह रहती है कि लोकनाट्य में संवाद तत्त्व की प्रधानता रहती है और चरित्र चित्रण को अपेक्षाकृत गौण स्थान प्रदान किया जाता है। लोकनाट्य में नृत्य और संगीत के साथ-साथ शारीरिक हाव-भाव एवं भंगिमाओं पर ध्यान दिया जाता है। यह भी देखा जाता है कि संवाद अधिकांशतः काव्यात्मक हो। लोक संगीत तथा विविध वाद्ययंत्रों जैसे हारमोनियम, ढोलक, नगाड़ा, सारंगी, बासुरी आदि की सहायता से संवादों को अधिक प्रभावशाली बनाने का प्रयत्न किया जाता है।

            लोकनाट्यों को प्रभावशाली और मनोरंजक बनाने के लिए विदूषक की व्यवस्था की जाती है, जो प्राय: पेटू व्यक्ति होता है अथवा जिसकी शारीरिक बनावट कुछ विचित्र की होती है। उसकी वेशभूषा चाल-ढाल आदि इस प्रकार की रखी जाती है कि दर्शक को हँसने के लिए विवश होना पड़ता है। विदूषक से कई के मानक में घुली-मिली प्रमुख समस्या को प्रस्तुत करने में सहायक का काम भी लिया जाता है। यह मुख्य पात्र अथवा नायक के आस-पास रह कर उसके घर को समझने में सहायता तो करता ही है, लोकनाट्य द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले के विविध स्तरों को सामने लाता है। उसके अपने चरित्र में हास्य और व्यंग्य का विलक्षण समावेश होता है।

            ‘बिदेसिया’ बिहार का सर्वाधिक लोकप्रिय लोकनाट्य है। इसके रचयिता भोजपुरी लोकनाट्य परम्परा के महानायक “भिखारी ठाकुर” हैं। “बिदेसिया’ लोकनाट्य की रचना सन् 1914 में हुई। लोक- चितेरे भिखारी ठाकुर की बिदेसिया भोजपुरी समाज व संस्कृति का जीवन प्रतीक है। इसकी भाषा शुद्ध भोजपुरी है और शैली की दृष्टि से यह गीति काव्य है। भिखारी ठाकुर कृत बिदेसिया पर गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। ‘बिदेसिया’ लोकनाटक में तत्कालीन समाज की विशेषताओं को रेखांकित करने के साथ ही वहाँ के ज्वलंत समस्याओं को नाट्य रूप में अद्भुत किया गया है। नवविवाहिता पत्नी को छोड़ कर पति के ‘पलायन’ एवं उससे आने वाली एकाकीपन का दंश बिदेसिया की केन्द्रीय समस्या है। इसके साथ ही भिखारी ठाकुर ने इस लोकनाटक में लोक पक्ष को प्रतीकात्मक शैली में ‘जीव,ब्रह्म,गुरु और माया’ के स्वरूप में प्रस्तुत करते हैं।

            बिदेसिया में मुख्य चार पात्र है- विदेशी, प्यारी सुंदरी, बटोही और रखेलिन(रंडी)। यहाँ विदेशी जीव का प्रतीक है, प्यारी सुन्दरी ब्रह्म का ,बटोही गुरु का एवं रखेलिन माया का प्रतीक है। विदेशी एक पुरुष पात्र है, जो अपनी नवविवाहितता प्यारी सुन्दरी के न चाहते हुए भी उसे बहला कर छुप-छुपाकर धनोपार्जन के निर्मित कलकत्ता चला जाता है। बिदेसिया जिस समय की रचना है उस समय कृषि कार्य के अभाव में गाँव के बेरोजगार युवक घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए रोटी रोजगार के लिए कलकत्ता, असम आदि राज्यों में पलायन करते थे। आज भी पलायन की यह समस्या क्षेत्रीय एवं वैश्विक स्तर पर व्यापक है। इस संदर्भ में बिदेशिया लोकनाटक अत्यंत प्रासंगिक है। कहा जाता है कि बिदेसिया की उत्पत्ति उत्तर प्रदेश के कुतुबपुर गाँव से हुई थी। जो लोग गाँव छोड़कर शहर जाते थे, उन्हें बिदेसिया के नाम से जाना जाता था। ऐसे ही एक व्यक्ति थे, भिखारी ठाकुर। वह एक प्रसिद्ध लोक कलाकार और नाटककार थे। ठाकुर अनपढ़ थे फिर भी उन्होंने खुद से तुलसीदास द्वारा लिखित रामचरितमानस को पढ़ना और याद करना सीखा, इसलिए वह उन्हें अपना साहित्यिक गुरु मानते थे। उन्हें भोजपुरी का शेक्सपियर कहा जाता था। ठाकुर ने बिदेसिया सहित बारह नाटक और बहुत सारे गीत लिखे हैं। ठाकुर ने अपने नाटकों और गीतों में महिलाओं, निम्न जाति के लोगों और गाँवों में रहने वाले गरीब लोगों से संबंधित सामाजिक मुद्दों को उठाया। उन्होंने अपने नाटकों में भी अभिनय किया और अपने समय की विभिन्न प्रस्तुतियों का निर्देशन किया था। बिदेसिया की यह कला शैली हिंदू जाति प्रथा की तथाकथित निचली जाति से संबंधित था। इस कला शैली का सार समाज की बुराइयों पर प्रकाश डालना है और इसलिए इसमें पोशाक को कम महत्व दिया जाता है। प्रदर्शन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिकाएँ सूत्रधार (कथावाचक) और समाजी (संगीतकारों) की होती है। बिदेसिया एक प्रसिद्ध नाटक है जो देशपरिवर्तन की समस्या और पीछे रह गई महिलाओं पर इसके प्रभाव की ओर ध्यान आकर्षित करता है।

            भोजपुरी भाषा के शेक्सपियर के रूप में पहचान रखने वाले, लोक नाट्यकार भिखारी ठाकुर एक विशिष्ट रंगकर्मी होने के साथ-साथ स्त्री-विमर्श एवं दलित-विमर्श के रचनाकर और एक संवेदनशील कलाकार के रूप में भी प्रतिष्ठित नाम हैं। भिखारी ठाकुर का जन्म 18 दिसंबर को बिहार के गंगा तथा सोन नदी के संगम पर बसे कुतुबपुर दियारा गांव में हुआ। इस क्षेत्र के लोग न केवल देश के विभिन्न राज्यों बल्कि गिरमिटिया मजदूर के रूप में मॉरिशस, सूरीनाम, फीजी, गुयाना, हॉलैंड आदि देशों में ले जाये गए। यद्यपि भिखारी ठाकुर का पालन-पोषण एक निम्नवर्गीय परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम दल सिंगार ठाकुर और माता का नाम शिवकली देवी था। बचपन में कुछ समय तक स्कूल जाने के बाद उन्होंने स्कूल जाना छोड़ दिया। गाँव के दूसरे चरवाहों के साथ गाय घराने जाने लगे। जहाँ अपने घरवाह मित्रों के साथ लोकगीत गाते, नकल उतारते और शाम तक घर वापस आ जाते भिखारी ठाकुर जैसे-जैसे बड़े हुए, उन्होंने पढ़ना लिखना सीखा और अक्षर जोड़कर, शब्दों को बैठाकर कविता आदि करने लगे। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, गांव में रहकर धन कमाने का ऐसा कुछ साधन भी नहीं था, इसलिए वे घर को छोड़कर खड़कपुर चले गए। जहाँ उन्होंने धन कमाना शुरू किया, वहीं पर उन्होंने रामलीला, रासलीला, जात्रा जैसे लोक नटरंग देखने शुरू किए। एक बार घूमने के इरादे से भिखारी ठाकुर जगन्नाथ पुरी की यात्रा को निकले, यहाँ स्नान कर भगवान जगन्नाथ के दर्शन प्राप्त किए। इस घटना ने उनके जीवन को बदल दिया। उसके बाद खड़कपुर छोड़कर वापस अपने गांव कुतुबपुर आ गए और साधु संतों की संगत में बैठकर रामचरितमानस का पाठ, भजन कीर्तन सीखने लगे। धीरे-धीरे उन्हें इस कार्य में महारत हासिल हो गई, उन्हें लगभग पूरी रामचरितमानस कंठस्थ हो गई। इसके साथ ही कुछ गीत और काव्य आदि की रचना भी करने लगे। उन्होंने गाँव के युवाओं को जोड़कर रामलीला का मंचन प्रारंभ किया, उनके गीत और कविताएँ ऐसी सरल भाषा और लोकरंग लिए होती थी कि दूर-दूर से लोग उनकी ओर से खिंचे चले आते थे। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। अब वे रामलीला के प्रदर्शन के लिए गांव के बाहर भी जाने लगे। तैयब हुसैन ने इस बारे में लिखा है। आम के आम और गुठलियों के दाम’ की तरह उन्हें नाम और दाम दोनों मिलें नाम इस रूप में कि उनके गीत, नृत्य और नाटक लोक परम्पराओं से जुड़े थे जो जल्दी ही लोकप्रिय हो गए क्योंकि उनमें लोगों को अपनी छवि दिखाई देती थी, अपना सुख-दुःख अपनी कहानी इससे उनकी आत्मीयता स्वाभाविक थी। भिखारी के भीतर के कलाकार को संतोष मिला और प्रोत्साहन भी। फलतः उनका विकास होने लगा। फिर ऐसा दिन भी आया जब भिखारी का नाच ‘बिदेसिया’ नाम से शादी-ब्याह, पर्व-त्योहार और दूसरे उत्सव में मनोरंजन के साथ सामाजिक प्रतिष्ठा से भी जुड़ गया। वास्तव में उनके रचनाकार व्यक्तित्व ने अपने क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदि परिस्थितियों को बहुत ही करीब से देखा था। वे अपने समाज की परंपराओं और स्त्रियों की दशा से भी भलीभाँति परिचित थे।

            बिदेसिया लोकनाट्य में तत्कालीन समाज की प्रमुख समस्याओं को स्थान मिला है। भिखारी ठाकुर के अपने लोक से गहराई से जुड़े थे। अत: समाज में व्याप्त बुराइयों एवं समस्याओं को सामुहिक रूप से विचार-विमर्श का मुद्दा बनाने के लिए एवं उसके समाधान के लिए लोगों को प्रेरित करने के लिए, सामाजिक मनोरंजन के सर्वाधिक उत्तम साधन-‘लोकनाट्य’ के माध्यम से समस्या आदि के रूप में चयनित करते हैं। हैरत की बात तो यह है कि तत्कालीन समाज की समस्या आज भी समाज में देशी एवं वैश्विक स्तर पर मुंह खोले खड़ी है। स्वाधीनता के आन्दोलन से गति पाई ‘पलायन की समस्या’ सात दशकों से निरन्तर बनी हुई है।

            ‘बिदेसिया नाटक में पलायन की समस्या ‘पलायन से उपजी स्त्रियों की विरह-पीड़ा एवं एकाकीपन, वेश्यावृत्ति की समस्या एवं पूँजीबाद या औद्योगिकीकरण की समस्या पर सूक्ष्म दृष्टिपात किया गया है। कहीं-न-कहीं इन सभी के मूल में पलायन की समस्या व्याप्त है। यह समस्या आज देशी और वैश्विक दोनों स्तर पर फैली हुई है।

            पलायन के कारणों की पड़ताल से पहले पलायन क्या है यह जान लेना आवश्यक है। पलायन एक स्थान से दूसरे स्थान तक लोगों की आवाजाही है। यह एक छोटी या लंबी दूरी के लिए अल्पकालिक या स्थायी स्वैच्छिक या विवशता के कारण, अन्तर्देशीय या अन्तर्राष्ट्रीय हो सकता है। बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में पलायन किए हुए व्यक्ति को उसके मूल स्थान पर बिदेसी संबोधित करते है। वह व्यक्ति जो अपना मूल स्थान छोड़कर अन्यत्र गमन कर चुका है ‘बिदेसी’ कहलाता है। बेरोजगारी , शैक्षिक सुविधा का अभाव, बदतर जीवन शैली, राजनीतिक, धार्मिक एवं भाषिक सहभागिता का अभाव, प्राकृतिक आपदा, आदि पलायन का मजबूत कारण बने।

            भिखारी ठाकुर ने जितनी भी मौलिक रचनाएँ की वे सभी अपने क्षेत्र की समस्याओं का प्रतिनिधित्व करती है। बिदेसिया नाटक के माध्यम से उन्होंने स्त्री की विरह वेदना को प्रस्तुत किया है, जो उस समय की सबसे विकट समस्या थी। गाँव के पुरुष जीविकोपार्जन के लिए अन्य प्रदेशों में जाते थे और उनके पीछे उसकी पत्नी और परिवार वाले संतप्त रहते थे। ‘भाई विरोध’ नाटक में संयुक्त परिवार के विघटन की कथा है। ‘विधवा विलाप’ में विधवा स्त्री के प्रति होने वाला सामाजिक अत्याचार प्रस्तुत हुआ है। ‘गंगा असमान’ नाटक में धार्मिक आडम्बर किस तरह समाज को खोखला कर रहे हैं, जबकि ‘पुत्र वध’ नाटक में नारी चरित्र का विचलन प्रस्तुत हुआ है। ‘गंबर थियोर’ नाटक में जीते जागते इंसान को वस्तु समझने की मानसिकता दर्शाई गई है। ‘ननद भउजाई’ नाटक में बाल विवाह की समस्या तथा कलयुग प्रेम’ में समाज में बढ़ रही नशाखोरी की समस्या का चित्रण हुआ है। जबकि ‘बेटी वियोग’ नाटक के माध्यम से उन्होंने बेटी बेचने की प्रथा पर कुठाराघात किया है। इस प्रकार इन नाटकों के माध्यम से उन्होंने ऐसे कथानकों को पुना, जो समाज में ही चारों और व्याप्त थे, जिनके सुधार पर कोई ध्यान नहीं दे रहा था उन्होंने इन समस्याओं को उठाकर जहाँ धर्म के ठेकेदारों को, धार्मिक आडंबरों के लिए खबरदार किया, वहीं समाज को भी अपनी रूढिगत परंपराओं को छोड़ने के लिए प्रेरित किया।

            भिखारी ठाकुर का समय भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का युग था। उस समय समाज सुधार एवं स्वतंत्रता आंदोलनों का प्रचार-प्रसार पूरे देश भर में चल रहा था। भिखारी ठाकुर नामक सोनोग्राफ में तैयब हुसैन पीड़ित लिखते हैं “भिखारी का काल अंग्रेजी राज के कारण गाँव में उथल-पुथल का काल था। पहली बार भारत की सामंती संस्कृति में पूंजीवादी संस्कृति हस्तक्षेप कर रही थी। वर्ण-व्यवस्था रखने की कोशिश जारी थी। गृह उद्योग नष्ट हो रहे थे। लकदक करती विदेशी चीजें शहर से मुंबई हाट में प्रवेश करने लगी थीं। टैक्स के लिए अंग्रेजों का जमीदारों पर और जमींदारों का रैयतों पर दबाव बढ़ रहा था। नवजवान ग्रामीणों का शहर की ओर रुख स्वाभाविक हो गया था। ऐसे में उनका शहर चालू औरतों के शिकंजों में फँसना अथवा उनकी ब्याहता घरवाली पर गैर मर्द का घेरा पड़ना उनकी नियति बन रही थी। भिखारी ठाकुर जी की सबसे बड़ी युगीन समस्या थी पलायन वृत्ति। गांव का युवा रोजगार की तलाश एवं धन कमाने की चाह में अपने घर-गाँव को छोड़कर सुदूर प्रदेश में जाकर बस रहा था। पलायन की यह समस्या उन्होंने स्वयं भोगी थी। उन्होंने अपने नाटकों में सामाजिक सरोकारों से जुड़े पक्षों को ऐसा बाँधा कि अभिव्यक्ति की एक शैली भिखारी शैली के नाम से जानी जाती है। आज भी सामाजिक कुरीतियों की यह गूंज क्षेत्र विशेष में सुनाई पड़ती है। भिखारी ठाकुर ने समाज सुधार हेतु लोकधमी शैली का चयन किया। बिहार के प्रसिद्ध लोक-पारंपरिक नाथ लोरिक नाच के माध्यम से अपने समाज की तत्कालीन समस्याओं को स्वर दिया, साथ ही लोगों में चेतना जागृत करने का प्रयास किया। ये लोक धर्मी रचनाकार ही नहीं थे, बल्कि सामाजिक कुरीतियों से लगातार लड़ने और जुड़ने वाले कटिबद्ध कलाकार थे। उन्होंने बिहार क्षेत्र की लोक शैली लोरिक नाथ प्रतिष्ठित किया था। भिखारी ठाकुर का सबसे ज्यादा ध्यान पलायन वृत्ति को रोकना था, इसके लिए उन्होंने बिदेशिया नामक शैली को पुनर्जीवित किया। यह लौरिक नाच का ही एक रूप था, जिसमें एक स्त्री अपने पति के विदेश चले जाने पर परदेस जाने वाले बटोही को रोककर अपनी व्यथा सुनाती है। परदेश गये अपने पति को शीघ्र घर वापस आने का संदेश भिजवाती है। बटोही भी परदेस में रहने वाले उस परदेसी को ढूंढकर उसे घर वापस भेजने का भरसक प्रयास करता है। यह लोक शैली बिदेसिया के नाम से ही जग प्रसिद्ध हो गई।

            बिदेसिया नाटक में स्त्री की प्रभावमयी भूमिका को हम संक्षेप में इस प्रकार देख सकते हैं – बिदेसी (पति) गौना के बाद विदा कराके अपनी पत्नी प्यारी सुन्दरी को घर लाता है। पति-पत्नी अभी दोनों ही गौना के शुभ और रंगीन वस्त्र में हैं। उनके पैर का महावर अभी छूटा भी नहीं है। तभी अचानक बिदेसी को कलकत्ता जाने की धुन सवार हो गई। नई ब्याहता पत्नी के लाख मनुहार करने पर भी बिदेसी पत्नी को तरह-तरह के प्रलोभन देकर गाँव-घर और बिसूरती ब्याहता को छोड़ कर कमाने के लिए शहर चला गया। कलकत्ता में जाकर कुछ रूपया कमाने के बाद बिदेसी शहर के चमक-दमक में अपना घर, अपनी पत्नी सबकुछ भूलकर वहीं का होकर रह गया। बिदेसी वहाँ एक अन्य स्त्री के साथ गृहस्थी बसा लेता है। दूसरी औरत से उसके दो बच्चे भी हैं।

            गाँव में प्यारी सुन्दरी पति की प्रतीक्षा में रो-रोकर बेहाल है। एक दिन एक बुजुर्ग बटोही को देख कर प्यारी सुन्दरी उनके गन्तव्य स्थान के विषय में पूछती है। बटोही के द्वारा यह बताने पर कि वह कलकत्ता जा रहे हैं, प्यारी सुन्दरी उनसे अपना सारा दुःख सुनाती है और अपने स्वामी का रूप-रंग बताते हुए बटोही से उनको ढू्ँढ़ लाने की प्रार्थना करती है। बटोही कलकत्ता जा कर बिदेसी को ढू्ँढ़ लेते हैं। वे बिदेसी को समझा-बुझाकर घर लौटने के लिए राजी कर देते हैं। बिदेसी दूसरी स्त्री को छोड़ कर अपने घर-गाँव लौट आता है। बिदेसी के गाँव लौटने के पश्चात दूसरी स्त्री भी अपने दोनों बच्चों के साथ बिदेसी के घर का पता पूछते-पूछते पहुँच जाती है। प्यारी सुन्दरी पति को पाकर धन्य हो गई और उपहार-स्वरूप सौत तथा दो बच्चे भी उसकी झोली में डाल दिए गए। इस प्रकार अन्त में पूरा परिवार मिल जाता है। प्रकट में ऐसा प्रतीत होता है कि नाटक सुखान्त है। किन्तु, नाटक पढ़ने के बाद उसके अलिखित और अघोषित प्रश्न मस्तिष्क को मथने लगते हैं। इस पुरूष-प्रधन समाज में  क्यों, क्या और कब तक सारी मर्यादा के निर्वाह की जिम्मेदारी स्त्री पर थोपी जाती रहेगी? स्त्री को ही कब तक हर बार त्याग की मूर्ति बनना पड़ेगा? स्त्री-पुरूष सम्बन्ध में स्त्री चाहे पत्नी के रूप में हो अथवा प्रेयसी के रूप में , कब तक छली जाती रहेगी? इस विषय में सबसे पीड़ादायक पहलू है – पुरूष द्वारा छली गई स्त्री को अन्त में समाज द्वारा अपशब्दों से नवाज़ा जाता है ( रचनाकार ने दूसरी स्त्री के लिए जो शब्द प्रयुक्त किया है, सभ्य और शिष्ट समाज में वह एक भद्दी गाली है )।

बिदेसी के परदेस चले जाने पर प्यारी सुन्दरी कहती है –

तूरि दिहलन पति-पत्नी नतवा ए सजनी।

हमरा घोटात नइखे कनवाँ भर अनवाँ ए सजनी।

चाभत होइहे मगही पानवाँ ए सजनी।

पत्नी प्यारी सुन्दरी जो कुछ ही दिन पूर्व ब्याह कर ससुराल आई है, अभी गाँव-घर के कोनों से भी परिचित नहीे हो पाई, पति-पत्नी के रिश्ते की गरिमा और मर्यादा को समझ रही है। बिदेसी के परदेस-गमन के पश्चात वह अकेली ही ससुराल के चौखट के भीतर रहकर अपना दायित्व निभा रही है। बिदेसी पति-पत्नी के पवित्रा बन्धन को तोड़कर अपने तन-मन के सुख में डूबा हुआ है। विरहणी पत्नी दुःख में अन्न का एक कण भी कंठ से नीचे नहीं उतार पा रही है।

पियऊ का बियोग में प्रान छुटि जाई,

हमरे सिरवे बीतत बा, ना दोसरा का बुझाई।

पति के वियोग में पत्नी प्यारी सुन्दरी के प्राण निकलना चाहते हैं। प्यारी सुन्दरी कहती है कि पति-वियोग का यह दुःख जो मेरे ऊपर बीत रहा है उसे कोई दूसरा महसूस नहीं कर सकता। विरह की जिस ज्वाला में प्यारी सुन्दरी जल रही है, उसकी आँच बिदेसी को क्यों नहीं लगती? इतना ही नहीं गाँव के मनचलों से वह अपने सतीत्व को भी बचाती है। गाँव का कथित देवर भाँति-भाँति के प्रलोभनों के द्वारा प्यारी सुन्दरी को रिझाने का प्रयास करता है –

भउजी काहे रोवत बाड़ू चुप रह भइया परदेस गइलन,

तू हमरा से रूपया, गहना, कपड़ा जे कुछ खोज हम देब।

यहाँ गाँव के मनचले देवर के रूप में पुरूष की यौवन-लोलुप-दृष्टि दिखाई देती है। इस बहाने से रचनाकार ने सती के सतीत्व को भी परखा है। प्यारी सुन्दरी अपने चारित्रिक दृढ़ता का परिचय देती हुई देवर को दो टूक जवाब देती है –

प्यारी के मन लागल बाटे जहंवा बाड़न राम।

माड़ो में सत बंध्न भइल बा कहत भिखारी हजाम।।

हिन्दू विवाह की रस्म में विवाह-मण्डप में दुल्हा-दुल्हन अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लेते हैं। ये सात फेरे सात जन्मों के बंधन हैं। लेकिन इस सातबंधन में क्या दुल्हन ही बांधी जाती है? दुल्हा सभी बंधनों से मुक्त रखा जाता है? प्यारी सुन्दरी को इस सातबंधन की सुदृढ़ता और पवित्रता का अहसास है। पति की लंबी अनुपस्थिति में भी वह विवाह-मण्डप में लिए गए सात फेरे की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करती है। जो बंधन प्यारी सुन्दरी को बांधे रखता है, वही बंधन बिदेसी के लिए अर्थहीन क्यों हो गया?

बटोही के समझाने पर बिदेसी अपने गाँव प्यारी सुन्दरी के पास लौटने के लिए आतुर हो जाता है। दूसरी स्त्राी बिदेसी को जाने नहीं देना चाहती क्योंकि अब बिदेसी से ही उसका भी घर-संसार है, दो बच्चे भी हैं। वह बिदेसी से कहती है –

पिया पिरतिया लगाई के, दूर देस मत जाहू।

कहे भिखारी भीख मांगि के लाइब, तुम खाहू।

किन्तु, बिदेसी को इस स्त्री का प्रेम और उससे पैदा हुए दो बच्चे भी रोक नहीं पाए। बिदेसी स्वार्थी पति, धूर्त प्रेमी तथा गैर-जिम्मेदार पिता साबित होता है। विवाहित बिदेसी परदेस जाकर, कुछ रूपया-पैसा कमाने के पश्चात अपने इन्द्रिय सुख के लिए दूसरी स्त्री के साथ घर बसा लेता है। रचनाकार जो कि समाज के विचार का प्रतिनिधित्व करता है, पुरूष के उच्छृंखलता को नजरअंदाज करता है और दूसरी स्त्री को बड़ी सहजता से पूरे नाटक में जिस शब्द द्वारा सम्बोधित करता है, वह किसी भी स्त्री के लिए अपमानजनक है। मनचले देवर के माध्यम से प्यारी सुन्दरी के सतीत्व की भी परीक्षा ली गई है अर्थात्, पति की अनुपस्थिति में पत्नी को भी शक के दायरे में रखा गया है। अकेली स्त्री के चरित्र की ठेकेदारी समाज अपने ऊपर ले लेता है। पति (बिदेसी) के घर लौटने पर पत्नी (प्यारी सुंदरी) पति के साथ ही उसकी प्रेयसी और उसके दो बच्चों को सहने के लिए बाध्य है।

            भिखारी ठाकुर ने ‘बिदेसिया’ में ऐसी स्त्रियों के पुनर्संयोजन के लिए मार्ग प्रशस्त किया है, जिन्हें समाज घृणित दृष्टि से देखता है। किन्तु यहाँ प्रश्न दूसरे तरह का है। एक ही घर में दो स्त्रियां, एक पुरूष के साथ साँझा करने के लिए लाचार हैं। ऐसी स्थिति में दोनों ही स्त्रियां क्या संतुष्ट और खुश रही होंगी? दोनों स्त्रियों की बेचैनी का अंदाज रचनाकार अथवा समाज को क्यों नहीं है? दो स्त्रियों के बीच पुरूष बेदाग और सभी आरोपों से मुक्त है। उसके जीवन में पत्नी के अतिरिक्त अन्य स्त्री का होना सहज तथा परिस्थितिजन्य है। ‘बिदेसिया’ में रचनाकार ने समाज के पुरूष-प्रधान विकृत मानसिकता को स्थापित किया है।

            ‘बिदेसिया मूलतः गीतात्मक नाट्य शैली है, जिसमें गीत और संगीत का विशेष महत्व है। गायन ऊँचे स्वर में किया जाता था। गीत में साथ देने के लिए कोरस भी होता था, जिन्हें समाजी’ नाम की संज्ञा दी जाती थी। ये समाजी मंच पर ही उपस्थित रहते हैं। कभी-कभी ‘ए’ या ‘हो’ आदि बोलकर ताल देने का कार्य करते हैं। बीच में छोटा-मोटा अभिनय भी कर लेते हैं। गायन करने, वाद्य यंत्रों के वादन और भीड़ आदि के संवाद बोलने की भूमिका अदा करते हैं। बिदेसिया में गीतों के साथ नृत्य का भी संयोजन होता है, पर नृत्य, गीत आरोपित ना होकर पटना की माँग होते हैं। बिदेसिया शैली के नृत्य में स्वाभाविकता अधिक होती है, नृत्य में कमर की गति और उछल-कूद पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है बिदेसिया को किसी विशिष्ट रंगमंच की आवश्यकता नहीं थी। चार-पांच लगती को जोड़कर भी संघ बना लिया जाता था। जिसके एक तरफ समाजी, अभिनेता और बाकी तीन तरफ दर्शक बूँद बैठा करते थे ना कोई पर्दा होता, ना दृश्यबन्ध की आवश्यकता होती थी। बिदेसिया शैली में पारसी संघ का ज्यादा महत्व नहीं होता, कलाकार रूप सज्जा के लिए पाउडर, काजल, बिंदी, बाली आदि केवल यही प्रयोग करते हैं। वेशभूषा में साधारण धोती, मिरजई और स्त्री पात्र साड़ी और ब्लाउज पहनते थे अभिनय की दृष्टि से पारसी रंगमंच की तरह वि

बिदेसिया नाट्य किसी तरह का भ्रम नहीं पैदा करते थे। इसमें पात्र और चरित्र का अस्तित्व मंच पर बराबर रखा जाता था। इसमे अतिरंजना का प्रयोग ना करके सहजता एवं स्वाभाविकता बनाए रखने का प्रयास रहता था। स्त्री पात्रों की भूमिका में पुरुष कलाकार ही निभाते थे। इन विशेषताओं के फलस्वरूप आज बिदेसिया को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान मिल चुकी है। इस कृति के माध्यम से भिखारी ठाकुर का सांस्कृतिक योद्धा और समाज चितक का रूप मुख्यतः उभरा है। वास्तव में वे अपने जीवन काल में ही लीजेंड बन चुके थे।

            निष्कर्षत: हम यह कह सकते हैं कि लोकनाट्य एवं रंगमंचीय शैली में अनेक नवीन प्रयोग होत रहते हैं और हम निश्चित रूप से यह कह सकते हैं कि भारतीय लोकनाट्य में बिदेसिया का प्रदेय अद्वितीय एवं अतुलनीय हैं।

सन्दर्भ सूची –

  1. फिजी में हिन्दी : विविध प्रसंग , सं. डॉ. राजेश कुमार “माँझी” सर्व भाषा ट्रस्ट , जे – 49 गली नं. 38 राजापुरी मेन रोड नई दिल्ली 110059
  2. बिदेसिया- भिखारी ठाकुर , हिन्दी समय डॉट काम
  3. बिदेसिया की स्त्री, अर्चना उपाध्याय, सहचर त्रैमासिक ई पत्रिका ,7 मई 2017
  4. लोकनाट्य परम्परा और प्रवृत्तियाँ – महेन्द्र भाणावत, बाफना प्रकाशन , जयपुर

Exploring Translation Approaches for “Ain i Akbari”-Nodirbek Salimbekov

close up photo of white and black journal
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Exploring Translation Approaches for “Ain i Akbari”

Nodirbek Salimbekov

Researcher, Tashkent State University of Oriental Studies

Tashkent, Uzbekistan

Email: salimbekovn@gmail.com

Mobile: +998974777122

Abstract

            The “Ain i Akbari” is a well-known historical source written by Abul Fazl, which gives us valuable information about the Mughal (Baburid’s) Empire during Emperor Akbar’s reign. It is an important piece of Persian literature from the Indian subcontinent, and many translators have worked hard to make this historical text available to readers worldwide.

            Considering the historical and cultural background of “Ain i Akbari” translators often use cultural adaptation to bridge the gap between the original and translated languages. They include explanations like footnotes, glossaries, or introductions to help readers understand the Baburid’s society, customs, and historical events. The cultural adaptation ensures that readers who are not familiar with the Baburid’s Empire can understand the text better.

            Studying the translation of “Ain i Akbari” provides valuable information about the depicted time period, helping readers understand the Baburid’s era. It offers insights into history, culture and connections with other regions, like Central Asia.

Key words: Abul Fazl, Persian literature, English translation, Blochmann

Research Article

The “Ain i Akbari” authored by Abul-Fazl ibn Mubarak, stands as a monumental work that provides a comprehensive account of Emperor Akbar the Great’s reign during the Baburid’s period. As a text of immense historical and cultural significance, “Ain i Akbari” has been translated into various languages over the years, each with its own unique approach and interpretation. In this article, we will explore the differences that arise in the translations of “Ain i Akbari” and their impact on our understanding of this remarkable literary work.

The Baburid’s period, which began with the arrival of Emperor Babur in the Indian subcontinent in 1526, marked a significant turning point in the region’s history. While the Baburid’s rule brought about political and cultural changes, it also had a profound impact on the literary landscape of the Indian subcontinent.

The Baburid’s rule ushered in an era of cultural exchange and fusion, as Persian and Central Asian influences permeated the Indian subcontinent. Persian, known for its rich literary heritage, became the court language of the Baburid’s (Mughal) Empire. This led to the assimilation of Persian literary forms, themes, and styles into the local vernacular languages, particularly in Urdu and Persian itself.

The Baburid’s era also witnessed a surge in historical chronicles and memoirs. Emperor Babur himself penned his memoir, the famous “Baburnama” which provides invaluable insights into the political and cultural milieu of the time. Other notable historical accounts, such as the “Akbarnama” by Abul Fazl, shed light on the reign of Babur’s grandson, Emperor Akbar. These chronicles not only served as historical records but also showcased the literary prowess of the Baburid’s, as they skillfully blended political narratives, and cultural observations.

Among of all literature data we can say that only one is provided fully information about those periods and without translating of the book, we cannot imagine of golden era of the Indian subcontinent.

Henry Blochmann, a scholar from Germany who studied Indian culture, worked hard to translate “Ain i Akbari” from Persian to English. His translation, completed in the late 1800s, was a turning point in making this significant historical work available to more people. Blochmann paid close attention to detail and had a deep understanding of the Baburid’s context. This allowed him to create a translation that captured the essence of the original text.

One of Blochmann’s great achievements in translating “Ain i Akbari” was his ability to preserve the historical and cultural context of the Baburid’s Empire. He understood the importance of showing readers an accurate picture of that period. His translation reflected the customs, institutions, and society of the era. Through his work, readers are transported into the vibrant world of Emperor Akbar’s court, gaining insight into the complexities of the Baburid’s Empire.

Blochmann’s translation not only captured the historical and cultural aspects but also showcased his linguistic and stylistic skills. He expertly navigated the complexities of the Persian language, conveying the subtleties and poetic expressions of the original text. His eloquent prose brought life to the stories, anecdotes, and descriptions found in “Ain i Akbari”. This made the translation an engaging and immersive reading experience.

Henry Blochmann’s translation played a crucial role in connecting Eastern and Western cultures. By translating “Ain i Akbari” into English, he made the Baburid’s Empire and its rich heritage accessible to a wider audience. This act of cultural exchange and understanding allowed readers from different backgrounds to explore the history, traditions, and achievements of the Baburid’s Empire. It fostered a deeper appreciation for the contributions of the Eastern world.

Since Blochmann was an expert in Persian language, the translation was not difficult for him, but it is noteworthy that Shiv Mridul, who translated from Blochmanns English version to Hindi, decided to translate the work at the age of 73. He emphasizes that the language used by Abul Fazl was not the language of ordinary people, which the author has a sharp pen because of the wonderful use of words and syntax in the work, and he expresses gratitude to Zulfiqar Muhammad, a Persian language specialist, for his help.

During our research, it was possible to be acquainted with the original copy of this rare work, which is kept in the National Archives of India. The current condition of the book and the respect of the archive staff for it commendable. During that trip, the meeting with the scholar Shiv Mridul, who translated the work into Hindi, should be highlighted. Because the author emphasized that, there are very few literatures that provide information about Emperor Akbar, who is the main and important figure in the history of India, and that his main goal is to convey it to readers in Hindi.

Cultural adaptation plays a crucial role in translations, especially when dealing with a work deeply rooted in a specific historical context. Translators must navigate the cultural nuances inherent in “Ain i Akbari” to ensure that readers from different backgrounds can grasp the intricacies of Mughal society. This adaptation involves clarifying cultural references, customs, and traditions, enabling readers to immerse themselves in the world of Emperor Akbar’s reign.

The structure of “Ain i Akbari” encompasses five books, each addressing specific aspects of Emperor Akbar’s reign. Translators may approach the task of structuring the translated version differently, potentially altering the arrangement of chapters, sections, or subheadings to enhance readability or align with the conventions of the target language. These structural modifications can influence the flow and organization of information within the translated work.

Both translators often face interpretive dilemmas when encountering ambiguous or complex passages within the text. These choices can significantly influence the readers’ understanding and perception of the original work. Some translators may opt for a literal translation, aiming to maintain the authenticity of the original language, while others may prioritize readability and choose a more liberal interpretation. These interpretive decisions shape the overall tone and style of the translated version.

Annotations and footnotes serve as valuable tools in translations, providing additional context, explanations, and insights. Translators may choose to include extensive footnotes, annotations, or commentary to elucidate historical events, cultural references, or complex concepts. The extent and nature of these annotations can vary among translations, influencing the reader’s access to supplementary information and enhancing their understanding of the text.

The translations of “Ain i Akbari” offer diverse perspectives and interpretations of this historical masterpiece. The linguistic variances, cultural adaptations, interpretive choices, structural modifications, and inclusion of footnotes and annotations contribute to the uniqueness of each translated version. These differences provide readers with various entry points into the world of Emperor Akbar’s reign, enriching their understanding and appreciation of the Baburid’s period.

While these variations exist, it is important to recognize that each translation of “Ain i Akbari” contributes to the preservation and dissemination of this invaluable historical document. Through their distinct approaches, translators enable readers from different linguistic backgrounds to access the wealth of knowledge contained within “Ain i Akbari” and engage with the multifaceted world of the Baburid’s Empire.

One notable difference in the translation of “Ain i Akbari” from Persian (Farsi) to English by Blochman is the linguistic style and approach adopted in the translation process. Blochman’s translation aimed to maintain the formal and traditional tone of the original Persian text, preserving the historical authenticity and cultural context of the Baburid period.

Blochman’s translation emphasizes a more archaic and formal English style, resembling the language used during the Baburid (Mughal) period. This choice reflects the historical setting of the original work and aims to transport readers to the time of Emperor Akbar. The use of older English vocabulary, sentence structures, and expressions creates a sense of timelessness and captures the essence of the original Persian text.

Author’s English translation pays particular attention to preserving the cultural context of the Baburid Empire. The translator includes detailed explanations and footnotes to provide readers with a deeper understanding of Mughal customs, social structures, and historical events. These annotations help bridge the cultural gap between the modern English-speaking audience and the world of Emperor Akbar, facilitating a more comprehensive reading experience.

English version of book tends to prioritize a faithful representation of the original text, focusing on accuracy and preserving the author’s intended meaning. The translator seeks to convey the ideas, concepts, and historical narratives of “Ain i Akbari” as faithfully as possible, often avoiding extensive reinterpretation or personal interpretation. This approach allows readers to engage directly with Abul-Fazl’s insights and observations.

While Blochman’s translation aims to preserve the cultural and linguistic nuances of the Persian language, it also makes necessary adaptations to cater to English-speaking readers. The translator strikes a balance between staying true to the original text and ensuring readability for the target audience. This involves simplifying complex sentence structures, clarifying obscure references, and adjusting idiomatic expressions to align with English conventions.

One significant difference in the translation of “Ain i Akbari” from English by Blochman to Hindi by Shiv Mridul lies in the language adaptation and cultural nuances introduced in the Hindi translation. Shiv Mridul’s translation aims to make the text accessible to Hindi-speaking readers while ensuring cultural resonance and linguistic authenticity.

Shiv Mridul’s translation involves adapting the English text into Hindi, catering to the linguistic preferences of Hindi-speaking readers. The language adaptation includes using Hindi vocabulary, sentence structures, and idiomatic expressions that align with the conventions of the Hindi language. This adaptation allows readers to engage with the text more naturally and comfortably, enhancing their reading experience.

Translating “Ain i Akbari” for Shiv Mridul from English to Hindi requires to bridge the cultural gap between the Mughal era and present-day Hindi-speaking readers. The translator incorporates cultural context and explanations specific to the Hindi-speaking audience. This can involve providing additional information about historical events, customs, and traditions that resonate with the cultural background of Hindi readers.

While Shiv Mridul aims to maintain the essence of the original text, some interpretive differences may arise in the translation process. The translator may choose to emphasize certain aspects of the text or reinterpret certain passages to ensure clarity and cultural relevance in the Hindi version. These interpretive choices may be influenced by the translator’s understanding of the Hindi-speaking audience and their expectations.

The language style employed in Shiv Mridul’s Hindi translation may differ from Blochman’s English translation. Hindi has its own literary traditions, and Shiv Mridul may utilize specific linguistic features, poetic devices, and stylistic elements to enhance the reading experience in Hindi. The translation may reflect the richness and diversity of Hindi literature, allowing readers to engage with the text in a way that aligns with their cultural and linguistic sensibilities.

Shiv Mridul’s translation takes into account the specific needs and preferences of Hindi-speaking readers. The translator may include explanatory footnotes, annotations, or introductory sections to provide additional context and historical background specific to the Hindi-speaking audience. These additions contribute to a deeper understanding of the text and facilitate a more immersive reading experience for Hindi readers.

In summary, Blochman’s translation of “Ain i Akbari” stands out for its commitment to maintaining the formal and historical style of the original Persian text. Through a combination of archaic language, cultural context, faithful interpretation, structural integrity, and language adaptation, Blochman’s translation provides readers with a glimpse into the world of Emperor Akbar and the rich tapestry of the Mughal Empire.

In conclusion, Shiv Mridul’s Hindi translation of “Ain i Akbari” displays adaptations in language, cultural context, interpretation, language style, and readership considerations. By tailoring the translation to the Hindi-speaking audience, Shiv Mridul strives to make the historical account of Emperor Akbar’s reign more accessible, relatable, and engaging for Hindi readers, while preserving the essence of the original work.

The Baburid’s period in the Indian subcontinent not only witnessed political and cultural transformations but also served as a literary renaissance. It brought together diverse cultural influences, resulting in a fusion of Persian and Indian literary traditions. The enduring legacy of the Baburid’s period in literature underscores its profound impact on the literary traditions of the Indian subcontinent, leaving behind a cultural heritage that remains cherished to this day.

Both translators acknowledge the limitations and inherent challenges of translation, particularly when dealing with a complex and rich literary work like “Ain i Akbari”. They highlight the importance of striking a balance between fidelity to the original text and the need for adaptation to suit the target language and audience.

Overall, this article sheds light on the intricacies of translating a significant literary work and provides valuable insights into the translation approaches employed by Henry Blochmann and Shiv Mridul. It serves as a valuable resource for translators, scholars, and readers interested in the field of translation studies and the cultural exchange of literary works.

Reference:

  1. National Encyclopedia of Uzbekistan, 2002, Volume 1, Tashkent
  2. Blochmann, H. (tr.) (1927, reprint 1993). Abul-Fazl Allami “Ain-i Akbari”, vol. I, Calcutta: Asiatic Society, Preface (First Edition)
  3. Alaev Leonid Borisovich, Medvedev E. M., Tsygankov Yu. Ya. “История Индии в средние века (History of India medieval period)” 1968, Moscow
  4. Shamatov A.N. 1990, “Essays on the historical lexicology of Hindi and Urdu from the 15th to early 17th centuries. “Muslim” vocabulary and southern Hindustani”, Tashkent
  5. Shiv Mridul, 2020, “Aini Akbari” Books 1-4, Delhi

अनुवाद की संकल्पना में संज्ञा की अनुवादनीयता का प्रश्न (हिंदी से अनुवाद करने के विशेष संदर्भ में)- शिवानी पंवार

stack of classic literature books in turkish
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अनुवाद की संकल्पना में संज्ञा की अनुवादनीयता का प्रश्न

(हिंदी से अनुवाद करने के विशेष संदर्भ में)

शिवानी पंवार

शोधार्थी पीएच्.डी. (हिंदी)

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़

shivani.panwar11@gmail.com

सारांश

अनुवाद करते समय साहित्य की समतुल्यता एवं अनुवादनीयता का विशेष महत्त्व है। प्रत्येक स्थान की भाषा एवं साहित्य स्वंय में विलक्षण होता है, जो अपने अंदर क्षेत्र एवं समाज के गूढ़ अर्थों को समेटे रहती है। संज्ञा का अनुवाद करना चुनौतीपूर्ण कार्य है। जिसका अनुवादक को विशेष ध्यान रखना चाहिए जिससे वह मूल रचना, रचनाकार एवं अनूदित पाठ के पाठकों के साथ पूर्ण न्याय कर सके। अनुवाद का मूलाधारित एवं बोधगम्य होना उसकी आवश्यक होता है। जिसके लिए अनुवादक को संज्ञा के अनुवाद में लिपियंतरण, रूपांतरण एवं स्थानांतरण  आदि की सहायता ले लेनी चाहिए।

बीज शब्द : अनुवादनीयता, समतुल्यता, बोधगम्य, लिपियन्तरण

शोध आलेख

अनुवाद शब्द का जो अर्थ हमें आज देखने को मिलता है, प्राचीन समय में अनुवाद शब्द का वह तात्पर्य नहीं था। एक लंबी यात्रा करने के बाद आज यह अपने वर्तमान रूप में पहुंचा है। “भारत में अनुवाद के प्रारंभ की बात करें तो हम देखते हैं कि अनुवाद संस्कृत भाषा का तत्सम शब्द है, ‘अनुवाद’ अनु (पीछे) वद् (बोलना) से उत्पन्न हुआ है। जिससे तात्पर्य पुनरुक्ति, अर्थात् किसी बात को फिर से कहना।

“अन्वेको वदति यद्दाति तद्रूपा मिनन्तदपा एक ईयते।

विश्वा एकस्य विनुदस्तितिक्षते यस्ताकृणो: प्रथमं सास्युकथ्य॥” 1 

इसमें ‘अनु- वदति’ का प्रयोग दुहराने या पीछे से कहने के अर्थ में हुआ है। किसी वक्तव्य का एक भाषा से दूसरी भाषा में प्रस्तुत करना जैसा अर्थ संस्कृत में प्रचलित नहीं रहा होगा। भारतीय संदर्भ की बात करें तो अनुवाद का प्रारंभिक स्वरूप हमें गुरुकुल आश्रमों में दिखायी पड़ता है। जब गुरु के मंत्र, कथ्य को शिष्य दोहराते थे। इस प्रकार अनुवाद शब्द से अर्थ लिया जाता है – किसी कही गयी बात को फिर से कहना। अनुवादक मूलरचना के संदेश को यथारूप में ‘लक्ष्यभाषा’ में अभिव्यक्त करता है। उसको मूल रचना की विषयवस्तु और रचना शैली की रक्षा करते हुए अनूदित पाठ को बोधगम्य एवं सहज बनाने के लिए अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, बशर्ते मूलरचना को कोई ह्रास न हो। अनुवाद शब्द के लिए अंग्रेज़ी भाषा में ‘Translation’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसकी उत्पत्ति लैटिन भाषा से हुई है। जिसका निर्माण दो शब्दों ‘Trans’ एवं ‘Lation’ के योग से हुआ है । Trans का अर्थ है ‘पार’ और Lation का अर्थ है ‘नयन’। इस प्रकार Translation का अर्थ है ‘एक पार से दूसरे पार ले जाने की क्रिया।’2

स्रोत भाषा की अभिव्यक्ति के विभिन्न आयाम अथवा स्तर हो सकते हैं। यह मूल रचना के ध्वनि, लय, लिपि के साथ-साथ भाषा की संस्कृति में गर्भित विभिन्न अर्थों को अभिव्यक्त करती है। इसका स्वरूप स्वंय में भिन्न होता है। इसे दूसरी भाषा में स्थानांतरित करना कठिन कार्य है। “भाषा की प्रकृति ऐसी स्थिर, निष्क्रिय और समरूपी नहीं है कि एक भाषा की इकाई का दूसरी भाषा की इकाई में प्रतिस्थापन या अंतरण किया जा सके। भाषा ऐसी निष्क्रिय, ग्रहीता नहीं है और न ही सामान्य माध्यम या उपकरण है जो किसी अन्य भाषा के कथ्य को बिना किसी टकराव या संघर्ष के अपने भीतर समेट ले।”3

         प्रत्येक भाषा का संबंध उसके स्थान एवं देशकाल से जुड़ा होता है, जो भाषा की सरंचना में घर किये रहता है। भाषा के प्रसंगों का संबंध भाषा के लाक्षणिक तथा व्यंजनात्मक रूप एवं उससे जुड़े स्थानिक, देशकाल से होता है तथा संदर्भ का संबंध भाषा में निहित गहरे सांस्कृतिक संदर्भों से होता है। इसलिए शब्द का संबंध मात्र कोशगत न होकर, वह प्रसंग एवं संदर्भगत भी होता है। इसी के साथ अनुवादक को शब्द की उत्पत्ति, सामाजिक स्थिति एवं युग की अच्छी पहचान होना आवश्यक है। “भाषिक प्रतीक में बाह्य-जगत की वस्तुओं के साथ-साथ प्रयोक्ता के जातीय इतिहास, उसकी सभ्यता, उसके समाज और संस्कृति का भी योगदान रहता है। इसी कारण संकेतार्थ में, अर्थ में असीम संभावनाएँ निहित रहती हैं, जो मुख्यतः बोधात्मक या कोशगत अर्थ, संरचनात्मक अर्थ, सामाजिक-सांस्कृतिक अर्थ और लाक्षणिक एवं व्यंजनापरक अर्थ को अपने भीतर समेटे रहती है।”4

अनुवाद में अनुवादनीयता एवं समतुल्यता का विशेष महत्त्व है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। अनुवादनीयता से तात्पर्य है – किसी भाषा या उसके वक्तव्य अथवा इकाई शब्द का अनुवाद किस स्तर तक किया जा सकता है। वही समतुल्यता वह साधन है जिसके आधार पर हम मूल एवं अनूदित पाठ के प्रभाव का आकलन करते हैं। यह आकलन शब्द, अर्थ, व्याकरण, लय, तरतम्यता, बोधगम्यता, प्रभाव आदि सभी को ध्यान रखते हुए करते हैं। प्रायः माना जाता है कि ‘अनूदित पाठ’ ‘मूल पाठ’ के पूर्ण समतुल्य नहीं हो सकता। इसमें आंशिक रूप से कुछ कमी रह ही जाती है। साहित्यिक अनुवाद में यह समस्या अधिक होती है, साथ ही सामाजिक, सांस्कृतिक, शैलीगत स्तर पर भी हो सकती है। साहित्य में कुछ प्रसंग, संदर्भ एवं शब्द प्राय: सार गर्भित होते हैं। अनुवादक के लिए उनका पूर्ण रूप से अनुवाद करना अत्यंत कठिन होता है। प्रख्यात भाषाविद् रवींद्रनाथ श्रीवास्तव समतुल्यता के सिद्धांत के आधार पर दूसरी भाषा के संगठनात्मक रूपांतरण को अनुवाद स्वीकार करते हैं। “एक भाषा (स्रोत भाषा) की पाठ सामग्री में अंतर्निहित तथ्य का समतुल्यता के सिद्धांत के आधार पर दूसरी भाषा (लक्ष्यभाषा) में संगठनात्मक रूपांतरण अथवा सर्जनात्मक पुनर्गठन को ही अनुवाद कहा जाता है।”5 अनुवादनीयता की समस्या के समाधान के लिए अनुवादक को चाहिए कि वह मूल पाठ के प्रत्येक पक्ष (भावगत, अर्थगत, संप्रेषणगत, व्याकरणगत एवं प्रयोजनगत) का अध्ययन करें जिससे प्रत्येक पक्ष का अधिक्तम अनुवाद हो सके एवं जिस पक्ष की अधिक्तम अनुवादनीयता हो, उसका उसी पक्ष पर अनुवाद करें।

 बीसवीं शती में पाश्चात्य अनूदित साहित्य का विकास अभूतपूर्व रूप से हुआ है। न केवल साहित्य बल्कि दर्शन, विज्ञान, समाजशास्त्र इत्यादि सभी विषयों में अनुवादकार्य हो रहे हैं। वर्तमान समय में अनूदित साहित्य अत्यंत व्यापक और बहुआयामी है। यूरोप, अमरीका, जापान, चीन आदि देशों के अनुवादक न केवल अपने प्राचीन ग्रंथों बल्कि विश्वभर के महान साहित्य का भी अनुवाद कर रहे हैं। इन सभी क्षेत्रों की सभ्यता एवं संस्कृति में अनेक भिन्नता देखने को मिलती है। इसलिए इन साहित्य एवं साहित्येत्तर रचनाओं का अनुवाद करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।

अनुवाद करते समय अनुवादक को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसमें कुछ समस्या व्याकरणगत होती हैं, तो कुछ संस्कृतिगत। व्याकरणगत समस्या में अनुवादक के समक्ष संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, विशेषण आदि का अनुवाद करते समय अनेक समस्याएँ आती है। संज्ञा के संदर्भ में बात करें तो भिन्न सभ्यता एवं संस्कृति वाले स्थानों के व्यक्तियों के अनुवाद करने में समस्या आती है।

संज्ञा – संज्ञा का तात्पर्य नाम से है। यह नाम किसी वस्तु, व्यक्ति, स्थान, समूह, गुण अथवा भाव आदि का नाम हो सकता है। उदाहरण – सेब, शिवाय, भारत, नदी, पर्वत, राष्ट्रवाद, थकान आदि।

प्रत्येक समाज की भाषा, सभ्यता एवं संस्कृति में अपने शब्द होते हैं जिसके नाम अलग-अलग होते हैं। जिसका दूसरी भाषा में मिलना कठिन होता है।

संज्ञा के मुख्य रूप से तीन भेद हैं –

  1. व्यक्तिवाचक संज्ञा – ऐसे शब्दजो किसी विशेष व्यक्ति, वस्तु, स्थान के नाम का बोध कराते हैं।

जैसे – सुमन, कलम, जलेबी, जयपुर आदि।  

  • जाति वाचक संज्ञा – ऐसे शब्द जो किसी समूह/ जाति विशेष का बोध कराते हैं।

जैसे – नदी, पर्वत, भारतीय सेना, स्त्री-पुरुष आदि।

  • भाव वाचक संज्ञा –  ऐसे शब्द जो किसी गुण, भाव एवं धर्म के नाम का बोध कराते हैं।

जैसे – थकान, भूख, ईमानदारी आदि।

अपवाद –  कुछ नाम ऐसे भी होते हैं जो जातिवाचक एवं व्यक्तिवाचक दोनों संदर्भ में प्रयोग किया जाता है।

       जैसे – गांधी, शास्त्री, नेताजी।  

अपवाद – कुछ नाम किसी गुण के आधार पर रूढ़ कर दिये जाते हैं। साहित्य में इनका विशेष स्थान है।

      जैसे – गधा (मूर्ख), बैल (परिश्रमी), उल्लू(मूर्ख), लोमड़ी(धूर्त) आदि।

साहित्य में पात्रों के संकेतार्थ नाम का महत्त्व – हिंदी साहित्य एवं भारतीय समाज में अनेक प्रकार के नाम देखने को मिलते हैं। साहित्यकार न केवल अपनी रचना के शीर्षक को संकेतार्थक रूप में प्रस्तुत करता है बल्कि अपने पात्रों के नाम भी संकेतार्थ रूप में रखता है। जिसमें समाज एवं साहित्य में अपने संकेतार्थ जिसमें लक्षणा अथवा व्यंजना को प्रस्तुत करते हैं। जिससे उस पत्र के नाम मात्र से उस पात्र के स्वभाव, उसके समाज की जानकारी, रचना की पृष्टभूमि आदि जानकारी देने का प्रयास करता है।

जैसे – मुंशी प्रेमचन्द द्वारा अपने उपन्यास ‘गोदान’ के पात्रों के नाम अपने वर्ग, समाज में स्थान को प्रदर्शित करता है। गोबर, होरी, धनिया, झुनिया, राय साहब, मिस्टर खन्ना आदि। ऐसे ही मोहन राकेश के आधे-अधूरे नाटक की पात्र का नाम सावित्री एक व्यंजनापरक नाम है।

अन्य रूप में देखे तो साहित्यकार समाज में प्रचलित अनेक लक्षणापरक एवं व्यंजनापरक नामों का प्रयोग करते हैं जो उनके गुणों के आधार पर रूढ़ हो गए हैं। जैसे – गधा – बिना दिमाग के काम करने वाला, बैल – परिश्रमी, श्रवण कुमार – आज्ञाकारी पुत्र, रामराज्य – आदर्श राज्य, सावित्री – आदर्श पत्नी, जल – पूजा में प्रयोग होने वाला पानी।

‘तेनाली राम’(विद्वान), ‘शेखचिल्ली’(मूर्ख व्यक्ति), ‘हातम ताई’ (उदार व्यक्ति)।

साहित्येत्तर विषयों में नाम का महत्त्व – साहित्येत्तर विषयों के अनुवाद की समस्या मुख्य रूप से विषय-क्षेत्र की समस्या होती है। ये अनुवाद विज्ञान, अनुसंधान आदि विषयों में हो सकते हैं। इनके अनुवाद में दूसरी भाषा के नाम से स्थानांतरण न कर मूल नाम का लिपयंतरण दूसरी भाषा में करना चाहिए। यदि किसी वस्तु अथवा नाम का अनुवाद करना हो तो उसके अर्थ को व्याख्यायित किया जा सकता है। जैसे – अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन(ILO) – International Labour Organisation. अंग्रेज़ी से अनुवाद करते समय यह समस्या अधिक देखने को मिलती है। जैसे – Iron Plant – लौह पौधा।

हिंदी समाज में मुख्य रूप से नाम के दो अंग देखने को मिलते हैं किन्तु कभी-कभी इसके तीन अंग भी देखने को मिलते हैं– प्रथम नाम, द्वितीय नाम, तृतीय नाम।

प्रथम नाम – यह नाम व्यक्ति का मुख्य वैयक्तिक नाम होता हैं।

जैसे – शिवाय, जॉन, अहमद, परमजीत आदि।

अनेक स्थान पर नाम से पूर्व अपने माता-पिता एवं स्थान के नाम के प्रथम वर्ण को लिखने का प्रचलन है। किन्तु हिंदी समाज में ऐसा प्रचलन देखने को नहीं मिलता।

मध्य नाम – यह नाम के मध्य का हिस्सा होता है जो मुख्य रूप से उनके गुण को प्रदर्शित करता है। तो कुछ स्थानों पर व्यक्ति के माता-पिता का नाम जुड़ा होता है। हिंदी समाज में इसकी प्रचलन अधिक पुराना नहीं है। यहाँ मुख्य रूप से प्रथम एवं अंतिम नाम का प्रचलन अधिक दिखायी पड़ता है।

जैसे – मोहनदास कर्मचन्द गांधी – यहाँ मध्य नाम कर्मचन्द इनके पिताजी का नाम है।

शानिध्य प्रताप गुर्जर – यहाँ प्रताप शौर्य के गुण को प्रदर्शित कर रहा है।

अंतिम नाम – ये नाम व्यक्ति की जाति, स्थान से जुड़े होते हैं।

जैसे – राहत इन्दौरी, साहिर लुधियानवी, प्रणव गुर्जर। यहाँ इन्दौरी एवं लुधियानवी क्रमश: इंदौर एवं लुधियाना शहर को दर्शाता है तो गुर्जर एक जाति का द्योतक है।

उपाधि नाम – ऐसे नाम जो किसी व्यक्ति को उसके गुण-धर्म एवं कार्य के आधार पर दिये जाते हैं। ये नाम इतने रूढ़ हो जाते हैं कि उसके असली नाम से भी अधिक प्रसिद्ध हो जाते हैं।

जैसे – लौहपुरुष एवं सरदार – वल्लभभाई पटेल , महात्मा – मोहनदास गांधी।  

सामान्यत: ऐसा प्रचलन भी देखने को मिलता है कि किसी व्यक्ति का उपाधि नाम उसके परिवार द्वारा (उपनाम के रूप में) परंपरागत रूप में प्रयोग किया जाता है। 

जैसे – राजेश पायलट (जो एक पायलट थे) उनके पुत्र एवं परिवार भी पायलट उपनाम का प्रयोग करता है।

उपनाम (Pen Name) –  ये ऐसे उपनाम होते हैं जिसे मूल रूप से लेखक अथवा साहित्यकार अपने साहित्य के लिए चुनते हैं।

जैसे – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रा नंदन ‘पंत’, अवतार सिंह संधू ‘पाश’,  सुदामा पांडे ‘धूमिल’।

उपनाम (Pet Name) – ये ऐसे उपनामहोते हैं जिसे प्रायः परिवार एवं मित्रों के द्वारा दिया जाता है।

जैसे – लड्डू, मिट्टू, कृष्णा।

पारिवारिक नाम – किसी क्षेत्र विशेष से जुड़े कार्यों में भी उनके अपने परिवार, कुटुंब आदि रूप में देखे जाते हैं।  जैसे – शास्त्रीय संगीत की घराना परंपरा, व्यापारिक परिवार आदि।

मातृक नाम – ये ऐसे नाम है जो व्यक्ति को अपनी मातृ पक्ष से मिलता है।उत्तर भारत अथवा हिंदी समाज में मुख्य रूप से पितृसत्तमक समाज है, यहाँ मातृ पक्ष का नाम जोड़ने का प्रचलन नहीं मिलता। किन्तु इतिहास में देखे तो रामायण एवं महाभारत में इसका उल्लेख मिलता है।

जैसे – मुग़ल अपने मातृ पक्ष से मंगोल थे, सुमित्रानंदन – लक्ष्मण, कुंतीपुत्र – अर्जुन।

पैतृक नाम – ये ऐसे नाम है जो व्यक्ति को अपने पितृ पक्ष से मिलता है।

जैसे –राहुल गांधी – राजीव गांधी,मुग़ल अपने पितृ पक्ष से तैमूर वंशी थे।

स्त्रीसूचक नामक – कुछ ऐसे नाम, उपनाम होते हैं जो केवल स्त्रियोचित्त होते हैं।

जैसे – जननी, सुलक्षणा, सीता, देवी, कौर।

परंपरागत नाम – ऐसे नाम जो व्यक्ति की परंपरा से जुड़े रहते हैं। हिंदी समाज में ऐसे नाम का प्रचलन कम मिलता है। यूरोप एवं मुगल राजशाही परिवारों में इसका प्रचलन देखने को मिलता है।

मुगल – अकबर, अकबर द्वितीय। 

यूरोप – किंग चार्ल्स, किंग चार्ल्स द्वितीय, किंग चार्ल्स तृतीय।

विद्वानों ने व्यक्तिवाचक संज्ञा के अनुवाद के संबंध में विभिन्न विचार प्रस्तुत किए हैं।

पीटर न्युमार्क – इनका मानना है कि व्यक्तियों के नाम उनके संकेतार्थ के साथ अनूदित कर देने चाहिए।

साथ ही कल्पनात्मक साहित्य के ऐसे नाम जिनका संकेतार्थ से जुड़े हों उनका लक्ष्य भाषा में उचित शब्द से स्थानांतरित करना उचित होता है।6

थियो हरमन – इन्होंने मूल नाम का अनुवाद करने के चार आधार हैं –

  1. उसे लक्ष्य भाषा के साथ मूल भाषा में हूबहू लिखा जाना चाहिए।
  2. उसका लक्ष्य भाषा में लिपियंतरण किया जा सकता है। यद्यपि हिंदी से अनुवाद करते समय इस प्रकार की समस्या नहीं आती। अंग्रेज़ी के ‘silent alphabet’ में इसकी समस्या आ सकती है। जैसे – Knife – नाईफ ।
  3. यदि मूल नाम को स्थानांतरित किया जा सकता है तो उसे लक्ष्य भाषा के किसी भी अन्य नाम से स्थानतारित कर दिया जाए।
  4. मूल नाम को लक्ष्य भाषा के किसी ऐसे नाम से स्थानतारित किया जाए जो उसके समान अर्थ रखता हो। साथ ही मूल नाम का अर्थ भी वर्णित कर देना चाहिए।7

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ‘Plain Living High Thinking’ का ‘आदर्श जीवन’ नामक अनूदित पुस्तक के रूप में अनुवाद करते हुए लिखते हैं – “जहाँ-जहाँ अंग्रेज़ी पुस्तक में दृष्टांत रूप में योरप के प्रसिद्ध पुरुषों के वृतांत आए हैं, वहाँ- वहाँ यथा संभव भारतीय पुरुषों के दृष्टांत दिए गए हैं।”8

संज्ञा का अनुवाद करने के लिए अनुवादक को मूल रचना एवं अनूदित रचना दोनों की भाषा, संस्कृति का उत्तम ज्ञान एवं समझ होनी आवश्यक है। जिससे वह संज्ञा में छिपे गूढ़ अर्थों जैसे लिंग, धर्म-संप्रदाय, जाति, क्षेत्र, गुण एवं भाव आदि को जान सके एवं मूल रचना एवं रचनाकार के साथ-साथ पाठक के साथ न्याय कर सके। जिससे वह ‘मूल भाषा’ के शब्द के लिए ‘लक्ष्य भाषा’ के सर्वोत्तम शब्द का चुनाव कर सके।

इस प्रकार हम देखते हैं कि व्यक्तिवाचक संज्ञा का अनुवाद करना अनुवादक के लिए एक गहरी चुनौती का कार्य है। जिसके लिए अनुवादकों ने विभिन्न सुझाव प्रस्तुत किये हैं। कुछ विद्वान संज्ञा के अनुवाद के लिए लिप्यंतरण, रूपांतरण करने की सलाह देते है तो कुछ लक्ष्य भाषा के शब्द से इसे स्थानांतरित करने की सलाह देते हैं। इनमें से किसी भी शैली को एक आदर्श तरीका नहीं माना जा सकता। ये शैली मूल रचना के विषय-क्षेत्र, अनुवादक के अनुवाद के उद्देश्य, अनूदित रचना के पाठक वर्ग आदि सभी तत्वों पर निर्भर करते हैं।

ऐसे कुछ सुझाव हैं जिसके आधार पर इस चुनौती को कुछ स्तर तक सरल किया जा सकता है –

  1. अनुवादक को चाहिए कि संप्रेषण की सुगमता के लिए कोष्टक में मूल नाम को भी साथ में लिख दे। यद्यपि इससे पढ़ने के तारतम्य में कुछ बाधा उत्पन्न हो किन्तु विषय की बोधगम्यता के लिए यह सहायक है।  
  2. अनुवादक को चाहिए कि मूल नाम एवं उससे संबंधित जानकारी को फुटनोट अथवा अंत में लिख दे। यदि ‘मूल भाषा’ के नाम का लगभग समान पर्याय वाला नाम ‘लक्ष्य भाषा’ में प्राप्त होता हो तो उसे अवश्य अपनाना चाहिए।
  3. अनुवाद करते समय अनुवादक को ‘मूल नाम’ के समान लिए ‘समान अथवा लगभग समान नाम’ (व्यक्ति का नाम) उपलब्ध न हो पाए तो अनुवादक को अनुवाद की सुगमता के लिए ‘मूल नाम’ का प्रयोग अनुवाद करना चाहिए। साथ ही पाठक वर्ग की सहुलियत के लिये ‘पाद टिप्पणी’ में शब्द के सांस्कृतिक संदर्भ, उसकी परंपरा तथा नाम विषयक विशेषता को स्पष्ट कर दे। ‘मूल नाम’ के सांस्कृतिक संदर्भ, विशिष्ट विधि विधान, परंपराएं, आचार विचार, खान-पान, वेशभूषा, पूजा-पाठ, व्रत उपवास, रिश्ते-नाते विवाह, संस्कार आदि से संबंधित समान शब्दावली न मिलने पर तद्विषयक यथोचित स्पष्टीकरण, जानकारी एवं आवश्यक सामग्री को सूची परिशिष्ट में दे।  
  4. अन्य स्थिति जिसमें ‘मूल भाषा’ के किसी शब्द, संकल्पना, वस्तु या कार्य के लिए ‘लक्ष्य भाषा’ में न केवल पर्याय शब्द देकर बल्कि स्पष्टीकरण द्वारा समझाने का प्रयास करना चाहिए। तब भी बात न बने, तो परिशिष्ट में तत्संबंधी शब्द, वस्तु अथवा नाम  का चित्र के माध्यम से संप्रेषण को सुगम बनाया जा सकता है। मुख्य रूप से वेशभूषा, गहने, खाद्य सामग्री, विधि-विधान, दैनदिनी जीवन के अवयव, विविध सांस्कृतिक संदर्भ, वस्तुएँ आदि का चित्र द्वारा लक्ष्य भाषा में दर्शाया जा सकता है।
  5. अनुवाद कार्य में सुगमता लाने के लिए ‘सांस्कृतिक कोश’ का उपयोग किया जाना चाहिए। जिससे ‘मूल भाषा’ के सांस्कृतिक शब्दों के समान ‘लक्ष्य भाषा’ में उसका प्रतीकात्मक नाम ढूँढा जा सके। बहुभाषी ‘सांस्कृति कोश’ का उपयोग अनुवाद की सांस्कृतिक समस्याओं को हल करने का एक बेहतर उपाय हो सकता है।

निष्कर्ष – इस प्रकार हम कह सकते हैं कि संज्ञा मुख्य रूप से व्यक्तिवाचक संज्ञा का अनुवाद करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। जिसके लिए अनुवादक को मूल एवं लक्ष्य दोनों भाषाओं के शब्द-भंडार, व्याकरण एवं    संस्कृति का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए। जिससे मूल रचना के विषय के आधार पर कभी मूल नाम तो कभी समान एवं लगभग समान नाम प्रयोग कर अनुवाद को प्रभावी बनाया जा सकता है। जिससे मूल रचना, रचनाकार एवं अनूदित पाठ के पाठकवर्ग के साथ न्याय हो सके। 

संदर्भ सूची

  1. अनुवाद चिंतन, प्रोफेसर अर्जुन चौहान, अमन प्रकाशन, द्वितीय संस्करण-2020 , पृष्ठ सं० 47
  2. अनुवाद विज्ञान सिद्धांत एवं प्रविधि, भोलानाथ तिवारी, किताबघर प्रकाशन, संस्करण-2016, पृष्ठ सं० 15
  3. अनुवाद की नई परंपरा और आयाम, कृष्ण कुमार गोस्वामी, प्रकाशन संस्थान, संस्करण-2016, पृष्ठ सं० 15
  4. वही, पृष्ठ स० 19
  5. अनुवाद विज्ञान सिद्धांत और प्रयोग, कैलाश चंद्र भाटिया, तक्षशिला प्रकाशन, संस्करण – 5, पृष्ठ स० 3
  6. Approach to Translation, Peter Newmark, phoenix elt publisher, page no 214

A Textbook of Translation, Peter Newmark, phoenix elt publisher, Page no 151

7.  Nord, C. (2003), Proper Names in Translation for children: Alice in Wonderland as a case of Point. Meta: Translators’ journal, 48, 182-196.

       8.  आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली, सं० नामवर सिंह, खंड-7,  पृष्ठ स 325,