समकालीन हिन्दी कविता और पर्यावरण विमर्श

प्रियंका

शोधार्थी, हिन्दी विभाग,

डॉ.बी.आर.अंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली

ईमेल- priyankabhakuni456@gmail.com

फोन न.- 8470850657 

सारांश

मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जिसने अपनी बौद्धिक क्षमता का विकास कर पृथ्वी पर मौजूद अन्य प्राणियों से अपनी एक अलग पहचान बनाई है, किन्तु इस सत्य को भी नकारा नहीं जा सकता कि उसकी इसी बौद्धिक क्षमता ने उसके साथ-साथ अन्य प्राणियों को भी खतरे में डाल दिया है, आइन्स्टीन ने तो कहा है कि जिस प्रकार ब्रह्माण्ड असीमित है ठीक उसी प्रकार मानव की मूर्खता भी असीमित है, जैसे-जैसे मानव ने विकास किया है वैसे-वैसे उसने अनेक समस्याओं को भी जन्म दिया। आदिकाल में मानव जीवन की आवश्यकताएँ सीमित थीं, वह प्रकृति से भोजन प्राप्त करता था किन्तु आज के भूमंडलीकरण के दौर ने उसकी आवश्यकता और आकांक्षा को इतना बढ़ा दिया है कि वह अब प्रकृति का दोहन करने पर उतर आया है। प्रकृति की विशेषता है कि वह संतुलन बनाकर चलती है। यदि सभी जैविक तत्व अपनी आवश्यकता के अनुसार उसका इस्तेमाल करें तो पर्यावरण में संतुलन बना रहेगा, किन्तु आज मानव का प्रकृति में जरुरत से ज्यादा हस्तक्षेप असंतुलन की स्थिति पैदा कर रहा है, नदियों का सूखना, बाढ का प्रकोप, भूकंप आना, इन  सभी घटनाओं के पीछे मानव की अतिमहत्त्वकांक्षा और आवश्यकता ही है। एक प्रकार से वह अब प्रकृति का शोषण कर रहा है, इसलिए आज उस पर विमर्श की जरुरत है, पर्यावरण विमर्श जरुरी भी है और मज़बूरी भी।

बीज-शब्द: पर्यावरण, संकट, प्रकृति, विमर्श, भूमंडलीकरण, विकास, संवेदना

शोध आलेख

आज हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं जहाँ प्रकृति पर संकट गहराता जा रहा है, प्रकृति और मानव एक दूसरे के पूरक हैं, प्रकृति नहीं तो मानव नहीं, भूमंडलीकरण के इस दौर में विकास के नाम पर जंगलों को काटा जा रहा है, जंगलों में रहने वाले जीव-जंतु विलुप्त हो रहे हैं, नदियाँ सूख रही हैं, जल और वायु दोनों प्रदूषित हैं, मानव जीवन मृत्यु की ओर बढ़ रहा है, ऐसे में यह चिंता का विषय है और इस समस्या पर वैश्विक चिंतन हो रहा है, ऐसी अनेक संस्थाएं हैं जो पर्यावरण के संरक्षण के लिए कार्य कर रही हैं, ऐसे में भला साहित्य कहाँ अछूता रह सकता है ?, विमर्श के रूप में पर्यावरण संकट साहित्य में चित्रित भी हुआ है, साहित्य ने इस विमर्श से सम्बंधित प्रश्नों को प्रमुखता से उठाया है, देखा जाए तो विमर्शों ने साहित्य के खालीपन को भरा है। साहित्य की सबसे प्राचीनतम विधा कविता रही है और कविता ने सदैव मानवीय सरोकारों और उसके मूल्यों का संरक्षण किया है। इस दृष्टि से यदि समकालीन हिन्दी कविता को देखा जाए तो वह समसामयिक सन्दर्भों से जुडी हुई है, इस दृष्टि से पर्यावरण विमर्श उसकी चिंता और संवेदना का विषय है, हम इस शोध आलेख में हिन्दी कविता में पर्यावरण विमर्श किस रूप में आया है ? उसकी चिंताएं क्या हैं ? वह इस संकट हेतु कोई समाधान प्रस्तुत करती है या नहीं ? पर्यावरण विमर्श को कवियों  ने कितनी गंभीरता से चित्रित किया है? अन्य विमर्शों की भांति उसकी स्थिति क्या है? आदि प्रश्नों पर विचार करेंगे।

पर्यावरण शब्द अंग्रेजी के enviroment का हिन्दी पर्याय है।  पर्यावरण शब्द ‘परि’ और ‘आवरण’ से मिलकर बना है जिसमें परि का अर्थ ‘हमारे चारो ओर’ और ‘आवरण’ का अर्थ  ‘ढकना’ या ‘घेरा’ हुआ होता है, डॉ. राजेश्वरी प्रसाद चन्दोला के अनुसार- “प्रकृति वसुंधरा का मूर्तरूप है जिसमें वनस्पति, जीवजंतु, जलस्त्रोत और वायुमंडल का एक संतुलित चक्र निश्चित नियमों के अधीन परस्पर संबंधित रहकर स्वस्थ पर्यावरण का निर्माण करते हैं।”1 बृहद हिन्दी शब्दकोश में पर्यावरण को इस प्रकार परिभाषित किया गया है- “पर्यावरण चारों ओर के संपूर्ण जड़ और चेतन पदार्थों का सम्मिलित नाम है।”2 इस प्रकार व्यापक अर्थ में पर्यावरण’ शब्द में पूरा ब्रह्मांड समाहित है। इस दृष्टि से जल, वायु, मृदा, वनस्पति, जीव-जंतु, पेड़-पौधे आदि सब मिलकर पर्यावरण बनाते हैं। “पर्यावरण से तात्पर्य किसी वस्तु के आसपास में अवस्थित तत्वों के सम्मिश्रण से है।”3

हम कह सकते हैं कि मानव के आसपास जो भी उपस्थित है वही उसका पर्यावरण है, पर्यावरण आसपास की ऐसी परिस्थिति है जो उसके विकास में सहायक होती है, वह अपने भोजन, कपडे या फिर अन्य आवश्यकताओं के लिए पेड़-पौधे, हवा-पानी और जीव जंतुओं पर आधारित है, इस दृष्टि से जिस पर्यावरण में मानव रहता है वह बहुत महत्व पूर्ण है, यदि वह दूषित है तो मानव जीवन का अस्तित्व भी खतरे में है। हम देखते हैं कि आज पर्यवारण,  विमर्श के रूप में उपस्थित है, इस समस्या पर गंभीरता से चिन्तन-मनन किया जा रहा है। हिन्दी साहित्य में यदि हम विमर्श की बात करें तो वह उत्तर आधुनिकता की देन है, विमर्श से तात्पर्य किसी समस्या विशेष को केंद्र में रखकर उसके सभी पक्षों पर बात करना है। ज्ञान शब्द कोष में विमर्श को “विचार, विवेचन, परीक्षण, समीक्षा, तर्क, ज्ञान”4 आदि से अभिहित किया गया है। इस दृष्टि से पर्यावरण विमर्श पर्यावरण को केंद्र में रखकर चलता है, उस पर छाए संकट पर गहन चिंतन-मनन कर उसे संरक्षित करने का प्रयास करता है।

समकालीन हिन्दी कविता में पर्यावरण संकट को उभारा गया है, मनुष्य द्वारा किए जा रहे निरंतर आघात से पर्यावरण अभिशप्त है, किन्तु पर्यावरण संकट वास्तव में सम्पूर्ण सृष्टि के जीव-जंतुओं का संकट है। भारतीय चिंतन धारा में प्रकृति का महत्त्व सबसे अधिक रहा है, एक प्रकार से भारतीय मानस प्रकृति पूजक है उसने सदैव प्रकृति का मानवीकरण कर उसे पूजा है। जब हम हिन्दी साहित्य के इतिहास को देखते हैं तो उसमें आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक प्रकृति का बड़ा ही मनोहारी चित्रण हुआ है। कवियों ने प्रकृति का अपनी कविताओं के माध्यम से सौदर्यमयी रूप उद्घाटित किया है, आदिकाल के रासो काव्य में प्रकृति-वर्णन प्रचुरता से मिलता है इस दृष्टि से विद्यापति महत्त्वपूर्ण कवि हैं, वहीं भक्तिकाल में तुलसी, कबीर, रहीम, मीराबाई, मालिक मुहम्मद जायसी, आदि सभी कवियों ने प्रकृति के संरक्षण की पैरवी की है, रीतिकाल के कवियों ने प्रकृति को आलंबन रूप में प्रस्तुत किया है और उसे प्रेम से जोड़ा है इस दृष्टि से बिहारी, बोधा, आलम आदि कवियों को देखा जा सकता है। आदिकाल से लेकर रीतिकाल तक प्रकृति का चित्रण हुआ है, इसके उपरांत आधुकिन काल में भारतेंदु, मुकुट धर पाण्डेय, महादेवी वर्मा, प्रसाद, पन्त, हरिवंश राय बच्चन, आदि ऐसे कवि हैं जिन्होंने प्रकृति का बड़ा ही सुंदर चित्रण किया है और उसे प्रौढ़ता से अभिव्यक्ति दी है।

वर्तमान समय में मनुष्य जिस विकास की अवधारणा पर सवार होकर प्रकृति के असंतुलन का जिम्मेदार बना बैठा है, आज उसी जिम्मेदारी ने उसे भविष्य की चिंता को लेकर भयभीत भी कर रखा है, वह औद्योगिक विकास की अंधी दौड़ में ऐसा शामिल हुआ कि उसने स्वयं पैर पर कुल्हाड़ी मार ली है, मनुष्य अपने स्वार्थ को साधने के लिए पहाड़ों को तोड़ रहा है, पेडों को काट रहा है, उसकी इस भोगवादी मनोवृत्ति ने हवा को भी दूषित कर दिया है। निरंतर हो रहे प्रकृति के ह्रास को देखकर कवयित्री ग्रेस कुजूर चिंतित हैं, कवयित्री ग्रेस कुजूर ने अपनी कविता ‘हे समय के पहरेदारों!’ में प्रकृति के दोहन पर चिंता व्यक्त की है-

“आज तुम

अपने स्वार्थ के लिए

पर्वतों के पत्थर

तोड़ रहे हो

बारूदी गंध से

जीवन को मरोड़ रहे हो

क्या कभी नदियाँ

लौटकर पूछेंगी

अपने खण्डर होते

पर्वतों से

कि कहां गया

उनका उद्गम?

कहां गया उनका वैभव?

तब पर्वत रोएगा

सूख जाएंगी उसकी धाराएं।”5

आज मानव अपनी क्षुद्रता को दर्शाते हुए महानगरों में प्रकृति से प्राप्त हरे-भरे जंगलों को काट कर कंक्रीट के घर बना रहा है, इससे आने वाली पीढ़ी का क्या हाल होगा, यह सोच पाने में वह असमर्थ सा लग रहा है‌, जल को जीवन कहा जाता है, वह पर्यावरण का मुख्य कारक है, मनुष्य ने अपनी बस्तियां वहीं बसाईं जहाँ नदियाँ बहती थीं, इसका उपयोग वह पीने, नहाने, खेतों की सिंचाई आदि के लिए करता था, किन्तु पिछले कुछ वर्षों ने नदियों का पानी भी सूखता जा रहा है, आज हमारे देश में पानी की कमी होती जा रही है, ऐसे में  हमें यह सोचना चाहिए कि उपलब्ध पानी का सदुपयोग कैसे किया जाए ? भू-जल का स्तर नीचे जा रहा है, इसके पीछे का कारण जंगलों की अँधा-धुंध कटाई है, पेड़-पौधों के कटने से धरती में जल रोकने की क्षमता बहुत कम हो जाती है, हम देख रहे हैं आज कल भू-जल का इस्तेमाल बहुत अधिक बढ़ गया है, यदि यही स्थिति रही तो जल्द ही जल संकट हमारे सामने खड़ा हो जायेगा, पीने का पानी भी नहीं बचेगा, इसलिए हमें इस दिशा में सोचने की जरुरत है, इसके साथ ही जो जलाश्य, बांध या झीलें हैं वे भी प्रदूषित हो गए हैं, कवयित्री ने इस पर चिंता व्यक्त करते हुए हमें सोचने पर मजबूर किया है- 

“एक बूंद पानी के लिए

तड़प तड़प जाएंगी

हमारी पीढ़यां

इसलिए सच कहती हूँ

… एक वृक्ष की जगह

लगाओ दूसरा वृक्ष

क्या कभी सुना है

एक पर्वत के बदले

उगाओ दूसरा पर्वत

करोड़ों साल में बने

इन पर्वतों को

तुम्हारे बारूदी मन के

फिर फिर तोड़ा है

और कुवांरी हवाओं को

हर बार छेड़ा है।”6

यह सब असंतुलित विकास के कारण हुआ है क्योंकि संतुलित विकास ही वरेण्य होता है, यदि हम ऐसा करते रहे तो भला आने वाली पीढ़ियों को हम क्या देंगे ? इस सन्दर्भ में हरिमोहन प्रश्न करते हुए लिखते हैं कि, “कभी यह भी सोचकर देखना चाहिए कि हम लोग आगे की पीढ़ियों के लिए किस पृथ्वी को छोड़ कर् जायेंगे ?, क्या पेड़-पौधे, फूल-फल, नदियाँ, पानी, स्वच्छ वायु, धूम्र रहित आकाश, जंगल और उसमें रहने वाले प्राणी, पहाड़ और हमारे प्राचीन कला-संस्कृति के स्मारक, शुचिता के कल्याणकारी विचार…हम उन पीढ़ियों के लिए सौपेंगे ? यदि नहीं, तो निश्चय ही हमारी आगे आने वाली पीढियां हमें अपराधी घोषित करेंगी।”7

देखा जाए तो आज जो शहरीकरण की आंधी चली है उसने भी प्रदूषण को बढाया है, शहर एक प्रकार से गाँवों का दोहन करते हैं, वे पारंपरिक उद्योगों को समाप्त कर यंत्र की सभ्यता को पालते हैं, शहर की नींव ही मशीनी और औद्योगिक युग पर टिकी है, गाँधी जी ने शहरों के लिए कहा था कि, “मैं शहरों की वृद्धि को एक गलत चीज समझता हूँ।”8

शहर की सभ्यता ने प्रकृति को दूषित किया है, शहर की सभ्यता ने ही जंगलों को काट कर बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां लगाईं हैं, जो जंगल मानव को जीवन देते थे वे अब नष्ट हो गए हैं, सरिता सिंह बड़ाईक अपनी कविता में कटते हुए जंगलों की ओर ध्यान आकर्षित करती हुई कहती हैं कि-

“आँवला, बहेड़ा, हरड़ के पेड़ पौधे

देते थे जीवन मानव को

नहीं है अब वैसा जंगल

वीरान होते, उजड़ते जंगल, कटते पेड़

प्रदूषण का जाल फैला

बादल उड़ा, उड़ गई बारिश भी

भाग गए हैं जानवर, एक जंगल से दूसरे जंगल”9

कवियों ने कटते हुए जंगलों को बचाए रखने के लिए भी संवेदना से भरी कवितायें रची हैं, भूमंडलीकरण के दौर ने मनुष्य और प्रकृति के बीच एक अलगाव की भावना ला दी है, क्योंकि प्राचीन काल में मनुष्य और प्रकृति का साहचर्य भाव हुआ करता था, दोनों एक साथ रहा करते थे किन्तु जब से उसने अपने लिए अट्टालियां खड़ी कर ली हैं तब से उसका प्रकृति के साथ साहचर्य भाव ख़त्म होता जा रहा है, इस साहचर्य भाव को बनाये रखने का सन्देश अनुज लुगुन ने अपनी कविता में कुछ इस प्रकार दिया है-

“हमने चाहा कि

पंडुकों की नींद गिलहरियों की धमाचौकड़ी से भी टूट जाए

तो उनके सपने न टूटें

हमने चाहा कि

फसलों की नस्ल बची रहे

खेतों के आसमान के साथ

हमने चाहा कि जंगल बचा रहे

अपने कुल-गोत्र के साथ

पृथ्वी को हम पृथ्वी की तरह ही देखें

पेड़ की जगह पेड़ ही देखें

नदी की जगह नदी

समुद्र की जगह समुद्र और

पहाड़ की जगह पहाड़”10

यह कविता बताती है कि मनुष्य जितना महत्वपूर्ण है उतने ही जीव-जंतु और नदी, पहाड़ आदि भी महत्त्वपूर्ण हैं और जो जहाँ है उसे वहीं होना चाहिए, उसकी स्थिरता ही उसकी पहचान  है। इन कविताओं में पर्यावरण और प्रकृति के नैसर्गिक रूप को बचाए रखने की पैरवी है।

आज ग्लोबल वार्मिंग एक विकराल समस्या का रूप धीरे-धीरे धारण करती जा रही है, यह सब कार्बनिक गैसों का नतीजा है, जो कि ओजोन परत को कमजोर करती जा रही है और इसी कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है। हरमोहन ने डॉ. बो डूस को उद्धृत करते हुए लिखा है- “1990 से 2020 के बीच हर रोज 50 जीव और पादप प्रजातियाँ समाप्त होती जाएंगी। अगर वनों के कटान और औद्योगिक गैसों से उत्पन्न तापक्रम-वृद्धि पर नियंत्रण न हो पाया तो भयंकर परिणाम होंगे।”11 कवि अरुण कमल ने इस समस्या को इस प्रकार चित्रित किया है-

“आ रहा है ग्रीष्म

देह का एक-एक रोम अब

खुल रहा है साफ और फैलता हुआ

सूरज के डूबने के बाद भी… “12

नरेश सक्सेना पेड़ बचाने की इच्छा लिए लिखते हैं-

“लिखता हूँ अंतिम इच्छाओं में

कि बिजली के दाहघर में हो मेरा संस्कार

ताकि मेरे बाद

एक बेटे और एक बेटी के साथ

एक वृक्ष भी बचा रहे संसार में।”13

मानव की उत्पत्ति, विकास और क्रियाशीलता के पीछे पर्यावरण एक महत्वपूर्ण कारण रहा है किंतु आज मानव ने अपनी बौद्धिक क्षमता और उपभोगवादी प्रवृत्ति के चलते प्राकृतिक भंडारों को भी समाप्ति के कगार पर ला दिया है, आज प्रदूषित पर्यावरण विश्व की चिंता का विषय बन गया है, भूमिगत संपदा में निरंतर कमी आ रही है, पानी का स्तर गिरता जा रहा है, ग्रीन गैस हाउस के प्रभाव से ओजोन परत क्षीण पड़ रही है, पेट्रोलियम वाहनों से वायुमंडल का तापमान बढ़ रहा है, प्राकृतिक वनों की कटाई से ऑक्सीजन की कमी हो रही है। एक प्रकार से मानव का भविष्य अब संकट में पड़ गया है। वृक्षों के निरंतर कटाव को चंद्रकांत देवताले ने अपने काव्य संग्रह ‘भूखंड तप रहा है’ की कविता ‘मई की विशाल छाती पर अग्नि वृक्ष उड़ते हैं’ में इस प्रकार रेखांकित किया है-

“एक मां घर के पेड़ का एक सपना

असंख्य माँएं और धरती पर गाते हुए

पेड़ों के उतने ही सपने पर उतने ही

कुल्हाड़ियों के हमले सपनों की गरदनों

पर पेड़ों के खिलाफ।”14

भौतिकवाद, बाजारवाद और पूंजीवाद  ने उपभोक्तावादी मानसिकता को जन्म दिया है। इस मानसिकता ने प्रकृति को बहुत नुकसान पहुंचाया है। अश्वघोष लिखते हैं-

“इस वक्त कुल्हाड़ी और आग के शिकंजे में है जंगल

हरियाली भोग रही है तड़ीपार की सजा

किसी कोढ़ी की भांति एकांत में सिसक रहे हैं पहाड़

अजगर की तरह इठलाती सड़कें धीरे धीरे

निगल रही हैं पहाड़ों का जिस्म।”15

आज हम देखते हैं कि कई नदियों का पानी सूख चुका है और बिना नदियों के जीवन तो कृत्रिम मात्र-सा है जिसमें संवेदना नहीं है, नदियों से जीव-जंतु पानी पीते हैं, ऐसे में नदियों का विलुप्त होना किसी संकट से कम नहीं, समकालीन कवियों में नदियों के सूखने का दर्द जितना ‘राकेश कबीर’ की कविताओं में सुनाई देता है उतना अन्य में नहीं, राकेश कबीर को नदियों का कवि भी कहा जाता है, वे अपनी कविता ‘सूखती नदियाँ’ में लिखते हैं-  

“पहली बार सुख गई है सई नदी

दूर तक उड़ता है रेट का बवंडर

फागुन की गर्म तेज बयार से

सरपट दौड़ता है बच्चों का झुण्ड

नदी के आर-पार बेरोक टोक”16

इस प्रकार हम देख सकते हैं कि समकालीन कविता ने पर्यावरण की समस्या को गंभीरता से चित्रित किया है, वर्तमान समय में पर्यावरण की समस्या का प्रश्न वैश्वित बन चुका है, डॉ. एच. एम. सक्सेना के अनुसार- “पर्यावरण हमारी पृथ्वी पर जीवन का आधार है, जो न केवल मानव अपितु विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तुओं एवं वनस्पति के उद्भव, विकास एवं अस्तित्व का आधार है, सभ्यता के विकास से वर्तमान युग तक मानव ने जो प्रगति की है, उसमें पर्यावरण की महती भूमिका है और यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि मानव सभ्यता एवं संस्कृति का विकास मानव-पर्यावरण के समयानुकूल एवं सामंजस्य का परिणाम है।  यही कारण है कि अनेक प्राचीन सभ्यताएं प्रतिकूल पर्यावरण के कारण काल के गर्त में समा गईं तथा अनेक जीवों एवं पादप समूहों की प्रजाततियां विलुप्त हो गईं और अनेक पर यह संकट गहराता जा रहा है।”17 इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि विकास का प्रक्रिया सामाजिक और आर्थिक प्रगति के लिए जरुरी है किंतु विकास की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिससे प्रकृति के अवयव सुरक्षित रहें और वह प्रदूषित होने से बचें, ऐसे बहुत से उद्योग हैं जिनसे निकलने वाला धुआं पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुंचाता है, हमारे देश में उद्योग से निकलने वाले धुएं, त्याज्य पदार्थ, रासायनिक गैस आदि से बचाव के तरीके बहुत कम हैं हालांकि वर्तमान में अनेक अंतर्राष्ट्रीय और स्वयं सेवी संस्थाएं पर्यावरण के संरक्षण हेतु कार्यरत हैं जिनमें मुख्य रूप से विश्व स्वास्थ्य संगठन, संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व वन्यजीव आदि का नाम लिया जा सकता है। कवियों ने भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए इस समस्या को चित्रित कर जन को जगाने का प्रयास किया है, हमें अपनी जिम्मेदारियों को समझना होगा और हमें संतुलित विकास की अवधारणा का विकास करना होगा जिससे पर्यावरण दूषित न हो और हम आने वाली पीढ़ियों को एक बेहतर पर्यावरण दे पायें।

संदर्भ सूची

  1. आज धरती रोती है, डॉ. राजेश्वरी प्रसाद चन्दोला, आत्मारी एंब सन्स, संस्करण, 1994, पृष्ठ.2
  2. वृहद हिन्दी शब्दकोश (खण्ड-2), धर्मेन्द्र वर्मा (सं.), प्रभात प्रकाशन, संस्करण, 2016, पृष्ठ-1517
  3. असंतुलित पर्यावरण और विश्व, हरिश्चंद्र व्यास, आदर्श प्रकाशन मंदिर, प्रथम संस्करण, 1991, पृष्ठ-10
  4. ज्ञान शब्द कोष, मुकन्दीलाल श्रीवास्तव(संपादक), ज्ञान मंडल लिमिटेड, वाराणसी, संस्करण, 1995, पृष्ठ.741
  5. समकालीन आदिवासी कविता, संपादक-हरिराम मीणा, अलख प्रकाशन, जयपुर, संस्करण, 2013, पृ.24
  6. वही, 25
  7. पर्यावरण और लोक अनुभव, हरिमोहन, तक्षशिला प्रकाशन, संस्करण, 1991, प्राक्कथन से उद्धृत
  8. आज धरती रोती है, डॉ. राजेश्वरीप्रसाद चंदोला, आत्माराम एंड संस, संस्करण, 1994, पृष्ठ.44
  9. बड़ाईक सिंह, सरिता, आज का जंगल, समकालीन आदिवासी कविता, (सं.) हरिराम मीणा, अलख प्रकाशन, 2013 संस्करण, पृष्ठ- 82
  10. लुगुन, अनुज, हमारी अर्थी शाही नहीं हो सकती, समकालीन आदिवासी कविता, (सं.) हरिराम मीणा, अलख प्रकाशन, 2013 संस्करण, पृष्ठ- 15, 16
  11. पर्यावरण और लोक अनुभव, हरिमोहन, तक्षशिला प्रकाशन, संस्करण, 1991, पृष्ठ.13
  12. पुतली में संसार, अरूण कमल, वाणी प्रकाशन, पृ.92
  13. रेवांत(जनवरी-दिसंबर अंक), नरेश सक्सेना, लखनऊ, वर्ष, 2014, पृष्ठ, 10
  14. भूखंड तप रहा है, चंद्रकांत देवताले, वेब पेज से उद्धृत
  15. सीढ़ियों पर बैठा पहाड़(काव्य संग्रहसंग्रह) , मेधा बुक्स, संस्करण, 2010, पृष्ठ, 55
  16. नदियाँ बहती रहेंगी, राकेश कबीर, अगोरा प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 2021, पृष्ठ, 40
  17. पर्यावरण एवं प्रदूषण, डॉ. एच.एम सक्सेना, राजस्थान, हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर, तृतीय संस्करण, 1995, पृष्ठ.2