भक्ति आंदोलन का अखिल भारतीय स्वरूप

सीमा सिंह

शोधार्थी. हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय

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सारांश

भक्ति आंदोलन मध्यकालीन भारत का एक प्रमुख सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन था जिसने पूरे भारत पर अपना व्यापक प्रभाव छोड़ा था। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पहली बार भक्ति का मार्ग समाज के सभी वर्णों और स्त्रियों के लिए खुला था, साथ ही इस आंदोलन ने सभी प्रकार की सामाजिक-धार्मिक विसंगतियों पर जोरदार प्रहार किया था। यह आंदोलन दक्षिण भारत से आरंभ होकर धीरे-धीरे संपूर्ण भारत में फैल गया था जहाँ दक्षिण में आलवार, नायनार और रामानुजाचार्य ने इस आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई थी, वहीँ महाराष्ट्र में संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम, एकनाथ तथा गुजरात में नरसी मेहता एवं बंगाल में चैतन्य महाप्रभु  उड़ीसा में पंचसखा तथा असम में शंकरदेव ने भक्ति आंदोलन का प्रसार किया था। यही भक्ति आंदोलन जब उत्तर भारत में पहुँचा, तब रामानंद, कबीर, रैदास और तुलसीदास ने इस आंदोलन को इसके उच्चतम शिखर तक पहुँचा दिया जिससे इसकी पहुँच समाज के हर वर्ग तक हो गई। इस आंदोलन की बड़ी विशेषता है यह थी कि पहली बार लोक भाषाओं में भक्ति का साहित्य रचा जा रहा था जिससे सामान्य जनता भी इसे समझकर भक्ति का रस ले पा रही थी। पहली बार किसी आंदोलन में महिलाएँ भी शामिल हो रहीं थीं। दक्षिण में आंडाल, अक्कमहादेवी से लेकर कश्मीर में ललद्येद से लेकर उत्तर भारत में मीराबाई की भक्ति में इसका विस्तृत स्वरूप दिखाई देता है। यह इस आंदोलन के प्रमुख उपलब्धि रही है।

बीजशब्द – मध्यकालीन, लोकभाषा, जनसंस्कृति, लोकजीवन, समाज-सुधार

शोध आलेख

भारतीय संस्कृति में वैदिक युग से ही   भक्ति विभिन्न रूपों में चली आ रही है। भक्ति शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘भज सेवायाम्’ धातु में क्तिन् प्रत्यय लगने से होती है जिसका अर्थ है – भगवान के भक्ति में लीन होना, सेवा करना या समर्पित होना अर्थात किसी की सत्ता को स्वयं से उच्च मानकर उसके सामने श्रद्धापूर्वक झुकना और अनुकूल व्यवहार करना भक्ति कहलाती है। भक्ति का सर्वप्रथम उल्लेख श्वेताश्वेतर उपनिषद् में मिलता है। श्रीमद्भागवतपुराण में भक्ति को उसके अलग-अलग स्वरूप के आधार पर नौ कोटियों में विभाजित किया गया है। यही भक्ति बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग रूपों में पूरे भारतवर्ष में प्रचलित रही है। देश में बौद्ध और जैन धर्मों की उत्पत्ति के बाद भारतीय जनमानस का एक बहुत बड़ा हिस्सा उनकी ओर आकर्षित हो गया था किंतु परवर्ती बौद्ध और जैन धर्म में भी विकृतियाँ आने लगी थीं। आदिकाल में नाथ-सिद्धों की कठोर साधना से सामान्य जनता का मोहभंग होने लगा था। वही पाँचवी-छठी सदी से ही दक्षिण भारत में आलवारों और नायनारों द्वारा समाज के सभी वर्गों के लिए भक्ति का मार्ग खोला जाने लगा था। यही भक्ति धीरे-धीरे दक्षिण से चलकर गुजरात, महाराष्ट्र से होते हुए उत्तर भारत में आ रही थी। इस समय उत्तर भारत में इस्लाम का प्रवेश भी हो चुका था जिसके कारण अनेक सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक परिवर्तन हो रहे थे। इन उलटफेरों में फँसी एवं नाथ-सिद्धों के कठोर विधि-विधानों से ऊब चुकी जनता ने दक्षिण से आ रही भक्ति को खुले मन से अपनाया जिसके परिणामस्वरूप संपूर्ण भारत में भक्ति में एक आंदोलन का रूप ले लिया।

                             भक्ति आंदोलन के विस्तार के संबंध में डॉ प्रेमशंकर अपनी पुस्तक ‘भक्तिकाव्य का समाजदर्शन’ में कहते हैं कि  “द्रविड़ में जन्म, कर्नाटक में विकास, महाराष्ट्र में आदर, गुजरात में वार्धक्य और अंत में वृंदावन में नवयौवन की प्राप्ति, भक्ति स्वयं बताती है और ज्ञान-वैराग्य नामक दो पुत्रों का उल्लेख करती है।”¹ भक्ति आंदोलन एक प्रकार से सामाजिक विसंगतियों, कुरीतियों एवं भेदभाव के फलस्वरुप उपजा आंदोलन है। यह लोक और जनसाधारण का आंदोलन है जिसने समाज के सभी वर्गों, स्त्रियों और शूद्रों को मुख्यधारा में सम्मिलित होने का अवसर दिया। इससे पहले भक्ति साहित्य कभी-भी लोक-भाषाओं में नहीं रचा गया था किंतु भक्ति आंदोलन ने लोक-भाषाओं को साहित्य में प्रमुखता से स्थान दिया। इस संदर्भ में मैनेजर पांडेय ‘भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य’ पुस्तक में कहते हैं कि “वास्तव में यह सामंती संस्कृति के विरुद्ध जनसंस्कृति के उत्थान का अखिल भारतीय आंदोलन है।”²  इस प्रकार भक्ति आंदोलन देश के विभिन्न हिस्सों में फैला और इसने एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन का रूप ले लिया।

दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन का स्वरूप –  5वीं-6वीं शताब्दी से दक्षिण भारत में भक्ति के विकास का आरंभ हो गया था। यहाँ भक्ति सर्वप्रथम वैष्णव-भक्ति के रूप में प्रकट होती है जिसे आलवार भक्तों ने आगे बढ़ाया था। इनकी संख्या लगभग 12 बताई जाती है और इनमें से अनेक समाज के निम्न-वर्ग से आते थे। इन्हीं की शिष्य-परंपरा में श्रीसंप्रदाय के प्रवर्तक रामानुजाचार्य आते हैं। इनके साथ ही शैव मत को मानने वाले नायनारों ने भी भक्ति के पुनरुत्थान में अपना योगदान दिया। आलवारों और नायनारों के भक्ति संबंधी योगदान के विषय में डॉ लक्ष्मीकांत पांडेय और डॉ प्रमिला अवस्थी ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय साहित्य’ में कहा है कि “अनेक शैव ‘नायनारों’ तथा वैष्णव ‘आलवारों’ ने हिंदू धर्म के व्यापक पुनरुत्थान  के लिए साथ मिलकर जो प्रयास किया, उसके फलस्वरुप लोकप्रिय भक्ति-साहित्य के विकास को अत्यंत प्रोत्साहन मिला। प्रचुरता तथा जनजीवन पर प्रभाव दोनों ही दृष्टियों से यह अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।”³

आलवार भक्तों की परंपरा में एक महिला भक्त आंडाल रहीं हैं जिन्होंने तमिल भक्ति आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तमिल भाषा में सबसे प्रमुख कार्य रंगनाथ मुनि ने किया। इन्होंने आलवार भक्तों की वाणी को ‘दिव्यप्रबंधनम्’ नामक ग्रंथ में संग्रहित किया जिसमें लगभग 4000 पद हैं। केरल के आदि शंकराचार्य जी ने अद्वैतवाद की स्थापना की किंतु अद्वैतवाद की शुष्क , रसहीन भक्ति की प्रतिक्रियास्वरूप 12वीं शताब्दी के आसपास रामानुजाचार्य जी ने श्रीसंप्रदाय, माध्वाचार्य ने ब्रह्म संप्रदाय, विष्णु स्वामी ने रुद्र संप्रदाय और निंबार्काचार्य ने सनकादि संप्रदाय की स्थापना की। कर्नाटक में लिंगायत और शैव संप्रदाय की भक्ति इस आंदोलन के विकास में अपना योगदान देती है। इनकी शिव भक्ति इन्हें बाकियों से अलग करती है। अतः दक्षिण भारत में भी भक्ति आंदोलन कठोर जाति-व्यवस्था के विरोध में उत्पन्न हुआ था जिसमें आलवार शिष्य-परंपरा के रामानुजाचार्य ने अग्रणी भूमिका निभाई थी और उन्हीं के शिष्य रामानंद को उत्तर भारत में भक्ति को प्रसारित करने का श्रेय दिया जाता है।

पश्चिमोत्तर भारत में भक्ति आंदोलन का स्वरूप- महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन को स्थापित करने का श्रेय चक्रधर से लेकर संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम, एकनाथ और रामदास जी को जाता है। यहाँ भक्ति आंदोलन का आरंभ मानुभाव एवं वारकरी संप्रदाय के अंतर्गत हुआ।  मानुभाव संप्रदाय के प्रवर्तक चक्रधर और वारकरी संप्रदाय के प्रवर्तक संत ज्ञानेश्वर थे। इनकी भक्ति का प्रमुख क्षेत्र पंढरपुर था। यहाँ विट्ठल जी के परमब्रह्म रूप की भक्ति की जाती थी। महाराष्ट्र के भक्ति आंदोलन में जाति-प्रथा के विरुद्ध बहुत ही तीखा स्वर विद्यमान था, इसलिए यहाँ कृष्ण की भक्ति में श्रृंगार और भ्रमरगीतों के स्थान पर उनका तारणहार रूप अधिक प्रचलित था। महिला भक्तों में मुक्ताबाई और महादम्बा का नाम भी मिलता है। महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन का उच्चतम शिखर पर ले जाने का श्रेय संत नामदेव जी को जाता है। इन्होंने मराठी अभंगों के साथ-साथ हिंदी में भी प्रचुर रचनाएँ की हैं।  ये हिंदू-मुसलमान के भेदभाव को दूर करना चाहते थे। इस संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में उल्लेख किया है कि “इनका लक्ष्य एक ऐसी सामान्य भक्ति पद्धति का प्रचार करना था जिसमें हिंदू का मुसलमान दोनों योग दे सकें और भेदभाव का कुछ परिहार हो।  बहुदेवोपासना, अवतार और मूर्तिपूजा का खंडन ये मुसलमानी जोश के साथ करते थे और मुसलमानों की कुर्बानी (हिंसा), नमाज, रोजा आदि की असारता दिखाते हुए ब्रह्म, माया, जीव, अनहदनाद, सृष्टि, प्रलय आदि की चर्चा पूरे हिंदू ब्रह्मज्ञानी बनकर करते थे।”⁴

इसी समय गुजरात में भागवत धर्म की प्रतिष्ठा हो रही थी। नरसी मेहता, भालण और अखो गुजराती में भक्ति साहित्य को प्रतिष्ठित करने वाले प्रमुख कवि हैं। नरसी मेहता गुजराती भक्ति काव्य के श्रेष्ठ कवि रहे हैं। इनकी कोमल, सरस और मधुर कविता जन-जन में लोकप्रिय हुई। इसी समय राजस्थान में भी दादूदयाल और मीराबाई ने भक्ति आंदोलन में अपना योगदान दिया था। कश्मीर की प्रसिद्ध संत कवयित्री ललद्येद ने अपनी ‘वाख’ कविताओं द्वारा भक्ति आंदोलन के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वहीं पंजाब में पहुँचकर भक्ति आंदोलन में सूफ़ी-दर्शन जुड़ता है। इस संदर्भ में सुमन राजे ने अपनी पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’ में कहा है- “नाथ-साहित्य पंजाबी, हिंदी, राजस्थानी की साझी विरासत है। यहाँ आकर पहली बार भक्ति आंदोलन में एक नया परिपेक्ष्य जुड़ा, सूफ़ी दर्शन का।”⁵ यहाँ के संतों का योद्धा रूप में उन्हें विशिष्ट पहचान दिलाता है। यहीं से सिख धर्म का उदय होता है और गुरु अर्जुनदेव द्वारा ‘गुरुग्रंथ साहिब’ का संकलन किया जाता है। इस प्रकार दक्षिण भारत से चलकर महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और पंजाब में पहुँचकर भक्ति आंदोलन नए-नए रूपों में विकसित होता है।

पूर्वी भारत में भक्ति आंदोलन का स्वरूप –

बंगाल में भक्ति आंदोलन का आरंभ जयदेव, विद्यापति और चंडीदास के द्वारा होता है। इनके पद जन-जन में प्रचलित थे। उस समय की तत्कालीन साहित्यिक भाषा को ‘ब्रजबुलि’ कहा जाता था जो बांग्ला और ब्रजभाषा का मिश्रित रूप थी। बंगाल में प्रचलित देवी पूजन उन्हें भक्ति आंदोलन में विशेष पहचान दिलाता है। इनके अतिरिक्त बंगाल में भक्ति को ऊँचाई पर ले जाने का श्रेय चैतन्य महाप्रभु को जाता है जिन्होंने गौड़ीय संप्रदाय की स्थापना की थी। कृतिवास ओझा जी ने संस्कृत रामायण ग्रंथों के आधार पर बांग्ला में रामायण प्रस्तुत की, जिसे कृतिवास रामायण के नाम से जाना जाता है तथा जिसकी गणना बंगाल की लोकप्रिय कृतियों में की जाती है।

                           उड़ीसा में भक्ति आंदोलन का विकास 13वीं-14वीं शती में होता है।  यहाँ भक्ति को प्रसारित करने का श्रेय ‘पंचसखा’ को जाता है जिसमें बलरामदास, यशोवंतदास, अनंतदास, जगन्नाथदास तथा अच्युतानंददास शामिल थे। जगन्नाथदास जी ने उड़िया में भागवत की रचना की थी। इस समय अधिकांश उड़िया संतकवि वैष्णव भक्तिगीतों की रचना कर रहे थे। इनकी भक्ति के सम्बन्ध में डॉ लक्ष्मीकांत पांडेय और  डॉ प्रमिला अवस्थी ने ‘भारतीय साहित्य’ पुस्तक में कहा है कि “चूंकि उड़ीसा में जगन्नाथ जी शैव, शाक्त, वैष्णव, बौद्ध, जैन सबके आराध्याय रहे, अतः वैष्णव भक्ति के केंद्र में जगन्नाथ जी ही विद्यमान हैं।”⁶

असम में भक्ति आंदोलन का प्रारंभ 15वीं शती में वैष्णव भक्ति परंपरा के साथ आरंभ होता है जिसके प्रवर्तक शंकरदेव जी हैं। शंकरदेव और उनके शिष्यों ने भक्ति साहित्य के अंतर्गत वैष्णव भक्ति के साथ असम के क्षेत्रीय लोकजीवन का भी वर्णन किया है।

उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन का स्वरूप –

उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन के उदय के संबंध में मुख्यतः दो मत हैं। पहला मत आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी का है जो इस्लाम की प्रतिक्रिया के फलस्वरुप उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन का विकास मानते हैं। आचार्य शुक्ल का मानना है कि भारत में इस्लाम का आक्रमण होने के कारण सामान्य जनता की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक परिस्थितियों पर अत्यंत विपरीत प्रभाव पड़ा था। जनता की बात सुनने वाला कोई नहीं था।  विभिन्न प्रकार के अत्याचारों के कारण वे हताश हो चुके थे। ऐसे में जब भक्ति आंदोलन दक्षिण से उत्तर भारत में पहुँचता है तो जनता उसे खुले मन से स्वीकार करती है। आचार्य शुक्ल ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ पुस्तक में कहते हैं कि “भक्ति का जो सोता दक्षिण की ओर से धीरे-धीरे उत्तर भारत की ओर पहले से ही आ रहा था, उसे राजनीतिक परिवर्तन के कारण शून्य पड़ते हुए जनता के हृदय क्षेत्र में फैलने के लिए पूरा स्थान मिला।”⁷  दूसरा मत पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी जी का है जो आचार्य शुक्ल के इस मत का विरोध करते हुए दिखाई देते हैं कि उत्तर भारत में भक्ति का प्रादुर्भाव इस्लाम के प्रतिक्रिया के फलस्वरुप हुआ है। उनका मानना है कि भक्ति भारतीय चिंतन परंपरा का स्वाभाविक विकास है। वे कहते हैं कि यदि भक्ति का उदय इस्लाम की प्रतिक्रिया के कारण होता तो भक्ति पहले उत्तर भारत में आती, न कि दक्षिण भारत में। इस संदर्भ में वे अपनी पुस्तक ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ में कहते हैं कि “जोर देकर कहना चाहता हूंँ कि अगर इस्लाम नहीं आया होता तो भी इस साहित्य का बारह आना वैसा ही होता जैसा आज है।”⁸

भक्ति आंदोलन लोक का आंदोलन था। इसमें सामान्य जनता ने बढ़- चढ़कर भाग लिया था। उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन को लाने का श्रेय यदि रामानंद जी को है तो उसे स्थापित करने का श्रेय कबीरदास, जायसी, तुलसीदास और सूरदास को है जो हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की विभिन्न धाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस आंदोलन में निम्न वर्ग ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिसमें कबीर, रैदास, दादू आदि प्रमुख संत आते हैं जिन्होंने समाज में व्याप्त वर्ण-व्यवस्था, बाह्य-आडंबर, पाखंड, छुआछूत और झूठ-फरेब पर जोरदार प्रहार किया था तथा सामाजिक समानता, समाज-सुधार, शास्त्रीय भाषा के स्थान पर लोकभाषा को स्थापित करने पर बल दिया था। निम्न वर्ग का भक्ति आंदोलन में आगे बढ़कर आने का आर्थिक कारण भी है। इस समय अनेक कस्बों का विकास हो रहा था जिससे निम्न वर्ग के कामगार जैसे जुलाहे, दर्जी, मोची, बढ़ई आदि अपने उत्पादों को बिचौलियों के बगैर सीधे बाजारों में ले जा रहे थे जिससे उनकी आर्थिक दशा कुछ ठीक होने लगी थी। इसी समय भक्ति आंदोलन के कारण जाति-व्यवस्था का वर्चस्व भी कम होने लगा था। इन सभी के कारण निम्न वर्ग में भी स्वाभिमान और स्वतंत्रता का भाव जगाने लगा था और वे भक्ति के सहज और सरल रूप को अपनाने लगे थे।    

उत्तर भारत के हिंदी साहित्य में भक्ति चार प्रमुख धाराओं के रूप में विकसित हो रही थी जिसे हिंदी साहित्य के इतिहासकारों ने संत काव्यधारा, सूफ़ी काव्यधारा, राम काव्यधारा और कृष्ण काव्य धारा में विभाजित किया था। इन चारों धाराओं ने भक्ति को अलग-अलग रूपों में ग्रहण करके भक्ति आंदोलन को उसके उच्चतम शिखर तक पहुँचाने में अपना योगदान दिया था। जहाँ संत काव्यधारा के अंतर्गत कबीर, दादूदयाल, गुरुनानक, रैदास, रज्जब, सुंदरदास आदि प्रमुख हिंदी कवि हुए, वहीं सूफ़ी काव्यधारा में जायसी, कुतुबन, मंझन, उस्मान और नूर मोहम्मद आदि कवियों ने हिंदू घरों की कहानियाँ लेकर अपने काव्य ग्रंथ लिखे तथा हिंदू-मुसलमान में सामंजस्य दिखाने का प्रयास किया। राम काव्यधारा के अग्रणी पुरुष तुलसीदास जी ने ‘रामचरितमानस’ के सृजन द्वारा पूरे देश को एक अमूल्य ग्रंथ दिया था। कृष्ण काव्यधारा के विकास में सर्वाधिक योगदान अष्टछाप के कवियों का रहा है जिसमें कुंभनदास, सूरदास, परमानंददास, कृष्णदास, गोविंदस्वामी, छीतस्वामी, चतुर्भुजदास और नंददास आते हैं जिन्होंने कृष्ण के मधुर और आत्मीय स्वरूप को अपनी रचनाओं द्वारा जनमानस के हृदय तक पहुँचाया था। इनमें सबसे अधिक प्रसिद्धि सूरदास जी  को मिली है जिन्होंने कृष्ण के बाल रूप के द्वारा जनता के हृदय में वात्सल्य रस का संचार करा दिया था, साथ ही मीराबाई अपने कृष्णप्रेम द्वारा समाज की बंदिशों पर प्रहार करती हुई  दिखाई देती हैं। इन सारी विशेषताओं के कारण ही भक्तिकाल को हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है। इसके संबंध में विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने ‘हिंदी साहित्य का सरल इतिहास’ पुस्तक में कहा है कि “भक्तिकाव्यधारा के अंतर्गत हिंदी में कबीर, जायसी, सूर, तुलसी, रैदास और मीरा जैसे महान प्रतिभाओं ने रचनाएँ कीं। इन्हीं की रचनाओं के कारण भक्ति-युग को हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है।”⁹ इनके अतिरिक्त वल्लभाचार्य जी ने अपने पुष्टिमार्ग द्वारा कृष्ण के माधुर्य को पूरे समाज में लोकप्रिय बना दिया था।

                             इस प्रकार उत्तर भारत का भक्ति आंदोलन देश के अन्य भागों के आंदोलन से काफी अलग था जिसके संबंध में डॉ बच्चन सिंह ‘हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास’ पुस्तक में कहते हैं कि “देश के अन्य अंचलों की अपेक्षा हिंदी भाषा-भाषी प्रदेश का भक्ति-आंदोलन अपने वैविध्य और अंतर्विरोधों में काफी जटिल और नानारुपात्मक है।”¹

निष्कर्ष – भक्ति आंदोलन भारतीय संस्कृति का विशिष्ट आंदोलन रहा है जिसने संपूर्ण भारत को एकसूत्र में जोड़ने का कार्य किया था। इस आंदोलन ने तमाम नकारात्मकता को दूर करके समाज में समानता, बंधुत्व और आध्यात्मिकता को बढ़ाने का कार्य किया था तथा  साहित्य में शास्त्रगत भाषा के स्थान पर लोकभाषा को आगे बढ़ाया था जिससे भक्ति साहित्य जन-जन तक पहुँच पाया था और इसने अखिल भारतीय आंदोलन का रूप ले लिया था।

संदर्भ सूची

  1. डॉ प्रेमशंकर, भक्तिकाव्य का समाजदर्शन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ 51
  2. पांडेय, मैनेजर, भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011,भूमिका
  3. पांडेय, लक्ष्मीकांत, अवस्थी, प्रमिला, भारतीय साहित्य, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2019, पृ 94
  4. शुक्ल, रामचंद्र, हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रयाग पुस्तक सदन, इलाहाबाद, 2019, पृ 36
  5. राजे, सुमन, हिंदी साहित्य का आधा इतिहास, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2022, पृ 129
  6. पांडेय, लक्ष्मीकांत, अवस्थी, प्रमिला, भारतीय साहित्य, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2019, पृ 161
  7. शुक्ल, रामचंद्र, हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रयाग पुस्तक सदन, इलाहाबाद, 2019, पृ 36
  8. द्विवेदी, हजारीप्रसाद, हिंदी साहित्य की भूमिका, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2024, पृ 16
  9. त्रिपाठी, विश्वनाथ, हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, ओरिएंट ब्लैकस्वॉन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली, 2016, पृ 11
  10. सिंह, बच्चन, हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2022, पृ 75