संत साहित्य में लोक संस्कृति के दर्शन
डॉ बसुन्धरा उपाध्याय
असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग,
एल.एस.एम. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय पिथौरागढ़, उत्तराखंड
ईमेल: basu1577@gmail.com
सारांश
लोक में सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक संस्थाओं का बहुत महत्त्व है। संत साहित्य में चौदहवीं सदी के लोकजीवन और उसकी संस्कृति अंकित हुई है। तत्कालीन सल्तनतकालीन राजनैतिक व्यवस्था का जीता-जागता रूप संतों की रचनाओं में द्रष्टव्य है। नवाबों, सामंतों तथा राजाओं की विलासिता स्वेच्छाचारिता एवं कलाप्रियता का जीवंत रूपांकन इन कवियों ने बड़ी सजगता के साथ किया है। संतकालीन सामाजिक व्यवस्था में वर्ण व्यवस्था, वर्ग व्यवस्था, जाति व्यवस्था, धार्मिक कट्टरता एवं छुआछूत, भेदभाव, सती प्रथा, बाल विवाह आदि का चित्रण संतों की रचनाओं में किया गया है। भोजन के विविध प्रकारों का वर्णन संत-साहित्य में पाया जाता है। हमारी जीवन शैली का वर्णन बहुत सरलता से किया है।
बीज शब्द: लोक, सामाजिक, संस्कृति, संस्था, व्यवस्था, संतकालीन
शोध आलेख
जनजीवन से जुड़ाव ही किसी भी मनुष्य को महान बनाता है। सर्वविदित है कि लोक संस्कृति जन-साधारण की संस्कृति है। जिसमें साधारण भारतीय समाज के समस्त क्रिया-कलापों का समावेश है। मानव जीवन की संपूर्ण गतिविधियाँ लोक संस्कृति के अंतर्गत आती है। लोक जीवन में विश्वासों की अधिकता होना स्वाभाविक है। हमारे समाज में वृक्ष, लता, पशु-पक्षी, पुरूष आदि के संबंध में अनेक लोक-विश्वास प्रचलित हैं। यह संतों की लोकग्राहिणी सूक्ष्म-दृष्टि में तत्कालीन लोकजीवन के सभी लोकविश्वास सिमटकर एक साथ आ गये हैं। उनकी रचनात्मक दृष्टि में इन्हें प्रसंगानुकूल स्थान दिया गया है जैसे-मुहूर्त पूछना, दिशाशूल, दिन-संबंधी विचार, शकुन-अपशकुन, ज्योतिष विचार, दक्षिणा देना, स्वप्न विचार, आदि। आज के वैज्ञानिक युग में कई अंधविश्वास आज भी जीवित है।कुछ इसे अंधविश्वास मानते हैं पर नहीँ यह अंधविश्वास नहीं है।
लोक में सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक संस्थाओं का बहुत महत्त्व है। संत साहित्य में चौदहवीं सदी के लोकजीवन और उसकी संस्कृति अंकित हुई है। तत्कालीन सल्तनतकालीन राजनैतिक व्यवस्था का जीता-जागता रूप संतों की रचनाओं में द्रष्टव्य है। नवाबों, सामंतों तथा राजाओं की विलासिता स्वेच्छाचारिता एवं कलाप्रियता का जीवंत रूपांकन इन कवियों ने बड़ी सजगता के साथ किया है। संतकालीन सामाजिक व्यवस्था में वर्ण व्यवस्था, वर्ग व्यवस्था, जाति व्यवस्था, धार्मिक कट्टरता एवं छुआछूत, भेदभाव, सती प्रथा, बाल विवाह आदि का चित्रण संतों की रचनाओं में किया गया है। भोजन के विविध प्रकारों का वर्णन संत-साहित्य में पाया जाता है। हमारी जीवन शैली का वर्णन बहुत सरलता से किया है।कृषि, पशुपालन, सिलाई, बुनाई सुनारी आदि सामाजिक कर्म संतों की दृष्टि से ओझल नहीं हुए हैं। विभिन्न जातियों-ब्राह्मण, क्षत्रिय, तेली, धोबी, बढ़ई, लोहार, कुम्हार, माली आदि का वर्णन इनकी रचनाओं में प्रसंगानुसार किया गया है। लोक में विविधि अवसरों पर गाई जानेवाली गारियाँ, बधाईयाँ, मंगलाचरण, फाग, झूला, बारहमासा, चर्चरी आदि जनमानस की लोक-सांस्कृतिक चेतना का परिचय मिलता है।
लोक संस्कृति में धार्मिक आस्था एवं विश्वासों के प्रति लोगों में पूरी कट्टरता देखी जाती है। संत साहित्य में जन-जीवन में प्रचलित पूजा, व्रत, कर्मवाद, भाग्यवाद, पुनर्जन्म, अवतार और ईश्वर के प्रति पूर्ण आस्था का सहज उल्लेख किया गया है। इसमें ईश्वर संबंधी अंध-विश्वास, रूढ़ियाँ, परंपराएँ, दान, जप, माला, तिलक, राम, कृष्ण, विष्णु, स्वर्ग-नरक, दोजख, जन्नत, भोग तथा प्रसाद आदि का प्रसंग के अनुसार वर्णन पाया जाता है।
लोक साहित्य के अंतर्गत लोकगीत, लोकगाथा, लोकनाट्य, सुभाषित वचन, मुहावरे, लोकोक्तियाँ एवं कहावतें आती हैं। लोक संस्कृति में इन सबकी सहज उपस्थिति पाई जाती हैं। संत साहित्य में लोक जीवन के साहित्यिक पक्ष का अध्ययन लोकभाषा के आधार पर किया जाता है। संतों की रचनाओं में लोक की सरल, सुबोध तथा संप्रेषण में पूर्ण सक्षम ‘लोक भाषा’ के माध्यम से ही लोक के विभिन्न साहित्यिक रूपों का चित्रण मिलता है। लोक जीवन में विचारों की अभिव्यक्ति के लिए मुहावरों, लोकोक्तियों एवं कहावतों का प्रयोग सदैव होता आया है। जन-जीवन की यह विशेषता संत साहित्य की भाषा में सर्वत्र पाया जाता है। लोक में वाक्चातुर्य एवं वाक्पटुता को लोगों के परिपक्व अनुभव तथा भाषिक पैनापन के रूप में देखा जाता है। लोक की विविध कलाओं, नृत्य, संगीत, कथा, खेल, आखेट आदि मनोरंजन के विभिन्न रूपों का चित्रण संत साहित्य में सर्वत्र पाया जाता है।
तत्कालीन समाज के मुट्ठीभर लोग पूरी जनसंख्या के सम्मान, आचरण,जीवन-शैली, बल, बुद्धि और विवेक के नियंता बने हुए थे। वे धर्म, ईश्वर, भाग्य, पुनर्जन्म,शाप, जाति-पाँति और शक्ति-प्रदर्शन को हथियार बनाकर जनता का शोषण और मनमाना दिशा-निर्देशन करते थे। ऐसे समय में जनता के मध्य इन महान आत्माओं ने जन्म लिया जिन्होंने अपने आचरण, शिक्षा, तर्कसम्मत सलाह और उपदेशों के माध्यम से जनता में आत्मसम्मान का भाव जगाया और शोषण के तमाम तंत्रों को छिन्न-भिन्न करते हुए साधारण जनता को मनुष्य होने का एहसास कराया। जिस अधिकार, समानता, स्वतंत्रता और शांति की बात आज हम 21वीं सदी में सर्वत्र कर रहे हैं उसके सर्वप्रथम दर्शन को हमे संत-साहित्य में मिलते हैं। संतों की इसी भूमिका को उद्घाटित करते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा हैं-“इसके साथ ही मनुष्य की सामान्य भावना को आगे करके निम्न श्रेणी की जनता में उन्होंने आत्मगौरव का भाव जगाया और भक्ति के ऊँचे-ऊँचे सोपान की ओर बढ़ने के लिए बढ़ावा दिया।”’1
जब देश मे शांति, प्रेम, और सौहार्द्र होगा तभी समाज तथा देश का विकास होगा। यह तभी संभव हो सकता है जब समाज में सभी मनुष्यों को सम्मान, अधिकार और अवसर समान रूप से मिलेगा, किन्तु भारतवर्ष में ऐसी स्थितियाँ हमेशा विपरीत रही हैं और धर्म को सदैव हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। धर्म समाज की रीढ़ होता है जब तक धार्मिक स्तर पर एकता स्थापित नही होगी समाज में भेदभाव, शोषण, दुराचार, वर्ग-संघर्ष और पिछड़ापन हमेशा बना रहेगा। इसलिए धार्मिक रूप से समानता सर्वप्रमुख जरूरत है। भारत के पिछड़ेपन, दंगों, भ्रष्टाचार, और पिछलग्गूपन का यह एक प्रमुख कारण है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने संतों की धार्मिक एकता के लिए किए गये प्रयास की सराहना कुछ इस तरह किया है-“इसकी ओर ले जाने वाली सबसे पहली प्रवृत्ति जो लक्षित हुई वह ऊँच-नीच और जाति-पाँति के भाव का त्याग और ईश्वर की भक्ति के लिए मनुष्य मात्र के समान अधिकार स्वीकार था।”‘2 होकर यथार्थपूर्ण, वैविध्यमय तथा भयाक्रांत है। भक्तिकाल में विशेष रूप से संतों का जीवन उनकी रचनाएँ पूरी तरह से आडम्बर-विहीन, अनुभवजन्य, तर्काधारित और लोकजीवन से पूर्णतः जुड़ी हुई हैं। हिन्दी साहित्य के वृहद् इतिहास में संत-साहित्य की विशेषताओं को इस प्रकार से बताया गया है-“संत मत ने किसी उच्च और शिष्ट श्रेणी या वर्ग तक सीमित न रहकर अपना संबंध जनसाधारण से रखा और वह विशेष रूप से दीन-दःखी, दलित, पतित जनों के उद्धार में अपने ढंग से प्रवृत्त हुआ।”‘3
लोक संस्कृति से तात्पर्य जन संस्कृति से है जो पूरी तरह से सहजता, सरलता, त्याग, स्वाभाविकता और मानव-प्रेम पर आधारित होती है। लोक संस्कृति जन साधारण का वैचारिक ढाँचा है जहाँ से जीवन की समस्याएँ देखी और सुनी जाती हैं। लोक संस्कृति की आत्मा समाज की वह साधारण जनता है जिसका निवास नगरों से दूर गाँवों, वनों एवं पर्वतो में होता है। लोक संस्कृति में लोक-कथाओं, व्रत, उत्सव, लोकनृत्य, लोकनाट्य आदि आते हैं। यह बहुधा रूढिबद्ध, परंपरानुगामी और पुरातनपंथी होती है जिसका विरोध, परिष्कार और सुधार संत करना चाहते थे। यह प्रकृति के आश्रय में पलती और पनपती है। इसकी शिक्षा-प्रणाली में श्रद्धा-भक्ति की सदैव प्रधानता होती है। यहाँ श्रद्धा भावना की परंपरा शाश्वत् है। संत-साहित्य लोक के लिए लिखा गया लोकाश्रित साहित्य है। इसका लक्ष्य अनपढ, गरीब, शोषित और पिछड़ा मानव-समाज है। अधिकांश संत इसी गरीबी भरे वातावरण में पैदा हुए थे। समाज की विभिन्न परम्पराओं, रूढ़ियों, विश्वासों और कर्मकाण्डों के प्रभाव को उन्होने बेहद करीब से देखा और उसका अनुभव किया था। इस कारण संतों ने समाज को उपदेश देने और समझाने में अपने लोक की विभिन्न मान्यताओं, विचारों, विश्वासों और परंपराओं की रूढ़ियों और आडम्बरों तथा बुराईयों को दूर करने के लिएविश्वासों और परंपराओं की रूढ़ियों और आडम्बरों तथा बुराईयों को दूर करने के लिए लोकभाषा का सहारा लिया है जिससे उनकी वाणी सर्वसाधारण को समझ में आ जाय।
जहाँ-जहाँ सामाजिक एकता की विध्वंसक शक्तियों और उनके समाज विनाशक विश्वासों को संतों ने देखा उन्होनें उसका वहाँ तीव्र विरोध किया। हिन्दू और मुस्लिम दोनों समाजों में फैले अशिक्षा, व्यभिचार, कर्मकांड, पाखंड, व्रत, त्योहार और शोषण के विभिन्न उपकरणों पर संतों ने तीखा प्रहार किया है। सामाजिक, धार्मिक और साहित्यिक विशेषताओं एवं गुण-दोषों को संतों ने अपने उपदेशों के माध्यम से अभिव्यक्ति दिया। लोकसंस्कृति के
विविध रूपों यथा-व्रत, तीर्थ, धार्मिक आचार-विचार, वैवाहिक मान्यताओं, जन्म-मरण-संबंधी आस्था, सामाजिक रूढ़ियों, गीतों आदि का वर्णन संतों की रचनाओं में इन्ही के प्रतिकार- स्वरूप प्रसंगवश मिलते हैं। लोक-संस्कृति का लक्ष्य सदा ही एकता, समानता, समरसता, सम्मान और बधुत्व की भावना का प्रसार करना रहा किंतु रूढ़िग्रस्तता, आपसीविद्धेष-भावना तथा राजनीतिक हस्तक्षेप से इसमें अनेक बुराईयाँ समाहित हो गयी थी। अपनी रचनाओं के माध्यम से संतों ने सामाजिक एकता, त्याग, समर्पण और सहयोग की भावना बनाने पर जनता का ध्यान आकर्षित कराया तथा विभिन्न बुराईयों, अमानवीय कृत्यों, सामाजिक विकारों को दूर करने का प्रयास किया। विवाह के अवसर पर किये जाने वाले विभिन्न रीतियाँ का वर्णन कबीर इन शब्दों में करते है-
“दुलहिन गावहु मंगलचार।
हम घरि आए राजा राम भरतार।
तर रति करि मै मन रति करिहाँ पंचतत्त्वबाराती । रामदेव मोहे पाहुने आए मै जोबन मैमाती, सरीर सरोवर बेदी करिहाँ ब्रह्मावेद उचारा।।4
उपर्युक्त पदों में वैवाहिक अवसर पर गाये जाने वाले मंगलगीत, पूजा की बेदी, वेदोच्चारण आदि लोक-संस्कृति के ही अंग हैं। शव दाह का चित्रण कबीर इस प्रकार करते हैं-
हाड जरै ज्यों लकड़ी, केस जरै ज्यों घास।
सब तन जलता देखि करि,
भया कबीर उदास ।।5
संतो का क्षेत्र विस्तृत था।वह जगह जगह घूमते थे।उनके उपदेशों में अनेक स्थानों की संस्कृतियों के रंग देखने को मिलते थे।कबीर, रैदास, नानक, रज्जब, दादू,मलूकदास, पीपा,सेन के क्षेत्र अलग अलग हैं।क्षेत्र अलग-अलग है। इस कारण इनकी रचनाओं में विभिन्न स्थानों के सांस्कृतिक रूप मिलते हैं। संतों की रचनाओं में लोकसंस्कृति के विभिन्न रूप जैसे गीत, धार्मिक विश्वास, त्योहार, प्रथाएँ तथा विभिन्न प्रकार के लोक-चित्रण सर्वत्र व्याप्त हैं। समाज के मिथ्या-आचरण पर कबीर का निम्न पद दृष्टव्य है-
“साधो देखो जग बौराना।
साँची कहाँ तौ मारन धावै झूठे जग पतियाना। हिन्दू कहत है राम हमारा मुसलमान रहमाना। आपस में दोऊ लड़े मरतु हैं मरम कोई नहिं जाना।।6
संतो ने अपने समय मेंजिस प्रकार का समाज देखा था वह पूरी तरह से अहंकार, आत्म प्रदर्शन, अंध-श्रद्धा, पाखण्ड, धूर्तता आदि में आकंठ डूबा हुआ था। तत्कालीन सामाजिक वातावरण दमघोंटू और मानवीय चेतना शून्य थी। इसीलिए कबीर ने उस समय की जर्जर सामाजिक-व्यवस्था पर निर्मम प्रहार करते हुए मानवीय कसौटी पर उतरने वाली सार्वभौमिक, सार्वकालिक, सरल तथा सर्वसुलभ शिक्षा समाज को दी। संतों की रचनाओं में लोक-संस्कृति के विभिन्न रूप सामाजिक अव्यवस्थाओं और कुरीतियों के प्रतिकार स्वरूप प्रसंगतः चित्रित हैं। खतना’ जैसी प्रथा पर कबीर की चुटीली व्यंग्यात्मक उक्ति है-“जो तू तुरूक तुरूकनी जाया भीतर खतना क्यूँ न कराया। “7
जीव-वध, अमावस्या, ग्रहण, शांतिपाठ का चित्रण निम्नवत् है-
जीव-वध, अमावस्या, ग्रहण, शांतिपाठ का चित्रण निम्नवत् है-
जाके पाई जगत सब लागै सो पंडित जिउघात करै।
ग्रहन आवावस, रूचि-रूचि मांगहि कर दीपक लै कूप परहि।
मोक्ष, तीर्थयात्रा और जातिगत मिथ्याभिमान जैसे विश्वास सामाजिक संरचना को तोड़ते हैं इस पर संतों का विचार है-
“मूड़ मुड़ाए जो सिधि होई सरगहि भेड़ न पहुँची कोई।
बिंदु राखि जो धरिये भाई तो घुसरों क्यों न परम गति पाई।”8
सामाजिक उत्सवों एवं पर्वो जैसे-होली, चाँचर, हिंडोला का चित्रण निम्नवत् हैं-
“खेलै फाग सवैं सब नारी हाथ लकुट मुह में गारी। घर से निकसी बनी सुन्दरी भाँति -भाँति पहिरे सारी। अबीर गुलाल लिए भर झोरी मिलन चली पिय को प्यारी । अपने-अपने झुदुन मिलि करि गावत बिरिया तरून बारी।।”9
झाँझ, मजीरा, ढोलक और तुरही आदि वाद्ययंत्रों को लोक-जीवन के उल्लास को व्यक्त करने में सहायक साधन के रूप में प्रयोग किया जाता है-
“बाजत मृदंग झाँझ डफ तुरही तान नफीरी ।
सूरत निरत जँह नाच निकसे बाढ़त रंग अपानी।”’10
खेती की रक्षा के लिए प्रयुक्त पुतला, तथा सिंचाई के लिए प्रयुक्त ढेकुली आदि का चित्रण आध्यात्मिक रूपक के रूप में संतो ने किया है-
“जतनि बिनु मिरगनि गेत उजारै।
टारे टरत नहीं निसु बासुरि बिडरत नहिं विडारे।।”11
“सुरति ढीकुली लेज लौ मन नित ढोलन हार।
कंवल कुँआ में प्रेम रस पीवै बारंबार।।”12
संत साहित्य की पृष्ठभूमि पूर्णरूपेण लौकिक है।संत सहित्य में विविध प्रकार के संस्कारों का उल्लेख है।हमारे समाज में जन्म से लेकर मृत्यु तक कई संस्कार होते हैं।अधिकांश संतों की वाणी में इसके दर्शन हंमे मिल जाते हैं। सांसारिक मोह माया को सन्तो ने निरर्थक बताया है-
“हरि सा हीरा छाडि कै करै आन की आस ।
ते नर जमपुर जाहिगे सत भासै रैदास ।”’12
जीवन माटी हूँ रहे साई सन्मुख होई।
दादू पहली मरि रहे पीछे तौ सब कोई ।।”13
“जौ जारै तौ होई भसम तन रहत कृप हवै जाई।
काँच कुंभ उधक भरि राख्यौं तिनकी कौन बड़ाई ।।’14
है। कबीर ने हिंडोले के खम्भों, मेरू, मरूआ, भँवरा, डांडी तथा पटरी का उल्लेख अपने एक पद में किया है, अर्थात्-
हिंडोलना तहाँ झूलै आतम राम ।
प्रेम भगति हिंडोलना सब संतन को विश्राम ।।
चंद सूर दोई खंभवा बंक नालि की डोरि।
झूली पंच पियरियाँ तहाँ झूलै जीय मोर।।
हिन्दुओं के त्योहारों के अलावा मुस्लिमों के ईद, रोजा, मुहर्रम, बारावफात आदि त्योहारों का वर्णन संत-साहित्य में किया गया है। संतो ने नट नटसरी का भी खूब वर्णन किया है।इसका मतलब तो यही है कि संत भी नटों को जानते थे । इसके साथ ही विभिन्न प्रकार के खेलों का वर्णन उन्होंने किया है। संत साहित्य छंद लोक-संस्कृति के विभिन्न रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। संतो की कविता हमारे लिए लोक जीवन की वस्तु है उसमें लोकजीवन के कार्य-व्यापारों और अनुभूतियों का स्पष्ट अंकन हुआ है। ‘प्रेम’ लोक-संस्कृति का आधार है जहाँ सज्जनता, समर्पण, त्याग, निश्छल-प्रेम और समत्वभाव लोक-संस्कृति का केन्द्रीय तत्त्व है वही नगरीय-संस्कृति में ईर्ष्या, कटुता, चतुरता और कपट का भाव निहित रहता है। इन्ही अर्थो में संत कवियों को ज्ञानमार्गी कहा जाता है। यह ज्ञान उन्होंने पोथियों, शास्त्रीय परंपराओं और वेद-पुराण से ग्रहण नहीं किया अपितु वह अनुभव और तर्क पर आधारित है जहाँ धोखा, छद्म-विश्वास, भ्रम नही है अपितु मनुष्य में आत्म विश्वास, कर्मठता और प्रेम को बढ़ावा मिलता है।
शिवकुमार मिश्र कबीर के संदर्भ में संतों की इन्ही मूल विशेषताओं को निरूपित करते हैं-“कबीर वास्तविक अर्थो में ज्ञानी थे तो इसलिए कि वे परंपरागत वेद और शास्त्रजन्य मिथ्या आचारों-विचारों एवं भेद बुद्धि की भर्त्सना तो करते ही हैं उन लोकाचारों की धज्जियाँ भी उड़ाते है, मसलन तमाम प्रकार के सामाजिक, धार्मिक अंधविश्वास, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, टोटका आदि जो जन या लोक के बीच प्रचलित थे।’
लोक-जीवन का एक विशिष्ट पहचान उसकी अपनी संस्कृति होती है जिसमें लोक का व्यवहार मूर्त होता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक के विविध संस्कार और उनसे जुड़ा हुआ लोक का मन, उसका हर्ष, उल्लास, दुख-सुख उसके अंग हैं। इन विशिष्टताओं से युक्त लोक-संस्कृति सनातन काल से चली आ रही है। विभिन्न काल-संदर्भ में साहित्यिक अभिरूचियाँ इनसे ओत-प्रोत रही हैं तथा इनसे पल्लवित और प्रभावित होती रही। संतों के साहित्य में लोक-संस्कृति के विभिन्न रूप भावाभिव्यक्ति को प्रखर बनाने और संतों की समाज पर गहरी पकड को लक्षित करती हैं।
अंततः हम कह सकते हैं कि संत-साहित्य में लोक-संस्कृति का चित्रण और उसकी उपस्थिति संतों की सामाजिक समझ और आत्मीयता की चरम अभिव्यक्ति करती है। संत-साहित्य में मौजूद लोक-संस्कृति के तत्त्व यश, प्रदर्शन या चमत्कार के लिए न होकर समाज हित के लिए है, आपसी प्रेम और विकास को बढ़ाने के लिए हैं जो लोक-संस्कृति की आत्मा को हमेशा पुष्ट करते रहेंगे। लोक-संस्कृति और संत-साहित्य एक दूसरे पर अन्योन्याश्रित हैं, एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती। संत-साहित्य की आत्मा लोक-संस्कृति है यही उसका साध्य और साधन है। संत-साहित्य का पूरा ढांचा, वातावरण और लक्ष्य लोक-संस्कृति है। इसे सँवारने, परिष्कृत करने में संतों ने अपना जीवन लगा दिया। लोक-संस्कृति ही वह जमीन है जिस पर संत-साहित्य बना और विकसित हुआ है। यह लोक-संस्कृति के बूते ही संत-साहित्य आधुनिक संदर्भ में आज भी सबसे ज्यादा प्रासंगिक और सार्वभौमिक रूप से आदरणीय है। इनका साहित्य सामान्य जनता के भावों का निरूपण करता है वर्णन पाया जाता है। यह साहित्य सांस्कृतिक दृष्टि से अधिकांशतः उत्तर भारत की लोक संस्कृति से आबद्ध है। उत्तर भारत के समस्त संस्कार, धार्मिक विश्वास, लोक-आस्था, विचार, प्रथाएँ, रहन-सहन, व्यवसाय, जातियाँ, वर्ण एवं वर्ग व्यवस्था, रूढ़ियाँ, उत्सव, त्योहार, क्रीड़ा, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, भाग्य, दिशाशूल, शकुन, अपशकुन आदि सब इसमें समाविष्ट हो गये हैं। इस क्षेत्र की श्रृंगारिकता, पौरूष वृत्ति, नीतिपरायणता, उदारता, स्वार्थ, वाक्पटुता आदि संत साहित्य में देखी जा सकती हैं। इसमें संदेह नहीं कि संत साहित्य लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है अपितु संत साहित्य लोक के सांस्कृतिक चेतना की सच्ची प्रतिध्वनि है जिसमें समस्त प्रकार के रूढ़िगत संस्कारो, अंधविश्वास-ग्रस्त मान्यताओं का तिरस्कार है, भेदभावजनित रीतियों का खण्डन और कथनी करनी की एकता का प्रतिपादन किया गया है।
संदर्भ सूची
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