आचार्य नलिन विलोचन शर्मा और ‘साहित्य का इतिहास-दर्शन’
नवनीत कुमार
सीनियर रिसर्च फेलो,
हिंदी साहित्य विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)
संपर्क- 9661778099
ईमेल- navjamui@gmail.com
सारांश
आचार्य नलिन विलोचन शर्मा को हिंदी में सौंदर्यशास्त्रीय आलोचना दृष्टि के आचार्य के रूप में जाना जाता है। हिंदी कविता में प्रयोगवाद के समानांतर चलने वाले काव्य आंदोलन नकेनवाद के ये प्रस्तोता थे। हिंदी समालोचना में इनका महत्वपूर्ण स्थान है। फणीश्वरनाथ रेणु के ‘मैला आँचल’ को प्रकाश में लाने का श्रेय इन्हें ही जाता है। आचार्य शर्मा की साहित्य संबंधी मान्यताएँ ‘दृष्टिकोण’, ‘नकेन के पपद्य’ आदि में उल्लिखित हैं। इनकी इतिहास दृष्टि भारतीय साहित्य में एक अलग ही प्रकार की विशिष्टता लिए हुए है। इनकी सबसे बड़ी विशेषता रही है कि इन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास-दर्शन को केवल हिंदी तक सीमित न रखकर उसे फ्रेंच, जर्मन, रूसी, पोलिश आदि के साहित्य से जोड़कर देखा। साहित्य के इतिहास को ये सामाजिक इतिहास, कृतियों अथवा उसमें व्यक्त विचारों के इतिहास के रूप में स्वीकार करते हैं। भारतीय साहित्य में इतिहास-दर्शन पर सबसे पहले समुचित दृष्टि नलिन विलोचन शर्मा की ही गई। भारतीय साहित्य को ये इनकी मौलिक देन है। ‘साहित्य का इतिहास-दर्शन’ नामक पुस्तक में इन्होंने साहित्य की इतिहास दृष्टि पर विशद विवेचन किया है।
बीज शब्द : साहित्य, इतिहास, दर्शन, परंपरा, लेखक, समूह, सामाजिक
शोध आलेख
इतिहास-दर्शन का सबसे पहला प्रयोग 18वीं सदी में वाल्टेयर ने किया था, किंतु इसका जनक हीगेल को माना जाता है। हीगेल के अनुसार- “इतिहास-दर्शन का अर्थ इतिहास सम्बम्धी चिंतनयुक्त मान्यताओं से है।”[1] इतिहास-दर्शन के संबंध में वे टॉमस कार्लाइल के हवाले से कहते हैं- “इतिहास वैसा दर्शन है, जो दृष्टांतों के माध्यम से शिक्षा देता है।”[2] उनके अनुसार इतिहास केवल सामान्य मूल्यों का विशेषीकरण नहीं करता, बल्कि ऐतिहासिक प्रक्रिया मूल्य के निरंतर नये रूपों को उत्पन्न करती हैं, जो पहले से ज्ञात नहीं हो। इस अर्थ में उन्होंने इसे वैज्ञानिकता से जोड़ते हुए इतिहास को अन्वेषण की एक प्रणाली के रूप में देखते हुए कहा कि “यह अतीत के ऐसे अवशेषों और आलेखनों का अन्वेषण करता है, जिनसे वर्तमान के समाधान और व्याख्या में सहायता मिल सके।”[3] उनकी दृष्टि में “इतिहासकार अतीत के विद्यमान अवशेषों का इस उद्देश्य से अध्ययन करता है कि वर्तमान का जो रूप है, उसकी व्याख्या की जा सके, उनमें छिपे कर्म के उत्स का आध्यात्मिक और शाश्वत वास्तविकता का उद्घाटन हो सके।”[4] इतिहास और इतिहासकार पर चर्चा के दौरान नलिन विलोचन शर्मा ने इतिहास निर्मात्ता के संबंध में बात की तथा उसे इतिहासकार से अलग करके देखा। इन दोनों के तात्विक विभेद को बताते हुए उन्होंने कहा कि “इतिहास निर्मात्ता हम उसे नहीं कहेंगे, जिसने इतिहास की रचना की, बल्कि उसे कहेंगे जिसने संसार के घटना प्रवाह को मोड़ा है।”[5] इसे उन्होंने अशोक तथा नेपोलियन से जोड़ते हुए उन्हें वास्तविक इतिहास निर्माता के रूप में देखा। आचार्य शर्मा इतिहास को रूढ़िवादिता से निकालकर वर्तमान से देखने की बात करते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि हम अपने अतीत को वर्तमान के प्रकाश में देखें, न कि वर्तमान को अतीत के नजर से देखें।
आचार्य शर्मा ने भारतीय साहित्य को पाश्चात्य दृष्टि से देखने की बजाय अपनी दृष्टि से, भारतीय प्रतिमान से देखने की वकालत की। यहाँ वे दर्शनशास्त्री के. सी. भट्टाचार्य से प्रभावित दिखाई देते हैं, जहाँ भट्टाचार्य कहते हैं कि “पाश्चात्य प्रतिमानों के साथ अपने स्वदेशी प्रतिमानों का संश्लेषण करना हर जगह जरूरी नहीं है। जहाँ वह जरूरी लगे, वहाँ भी प्रक्रिया यह होनी चाहिए कि पाश्चात्य प्रतिमानों का अनुकूलन, समायोजन हमारे अपने प्रतिमानों द्वारा, हमारे प्रतिमानों के आधार पर हो, न कि इसके उलट।”[6]
नलिन विलोचन शर्मा ने युग विशेष को लेखक समूह के रूप में देखने का प्रयत्न किया। वे कहते हैं “साहित्येतिहास कुछ अन्य प्रकार के इतिहासों की तरह कुछ विशिष्ट-लेखकों और कृतियों का इतिहास न होकर, युग-विशेष के लेखक समूह की कृति-समष्टि का इतिहास ही हो सकता है।”[7] उनका यह लेखक समूह किसी वाद में बंधा न होकर अपने समय को विविधता में रेखांकित करता है। प्रकारांतर से उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि लेखक समूह को ध्यान में रखकर यदि हम काल-विशेष का मूल्यांकन करेंगे तो उस काल की केवल मुख्य प्रवृत्तियों से ही नहीं, बल्कि उस दौर की कुछ अन्यान्य प्रवृत्तियों से भी हम मुखातिब हो सकेंगे। इस रूप में साहित्येतिहास को हम न केवल समग्रता में देख सकते हैं, बल्कि उसकी ठीक-ठीक व्याख्या भी कर सकते हैं।
जिस तरह विजयदेवनारायण साही ने ‘लघुमानव के बहाने नई कविता पर एक बहस’ निबंध लिखा, प्रकारांतर से उसी तरह नलिन विलोचन शर्मा ने हिंदी साहित्येतिहास-दर्शन के बहाने जर्मन, फ्रेंच, रूसी, पोलिश, अंग्रेजी आदि विश्व साहित्य की इतिहास दृष्टि को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास किया। वे कहते हैं कि साहित्यिक इतिहास सही अर्थ में इतिहास है ही नहीं, क्योंकि यह वर्तमान का, सार्वभौम का, शाश्वत का ज्ञान है। इसकी पुष्टि वे जर्मन दर्शनशास्त्री शोपेनहार के हवाले से करते हैं कि “कला सदैव अपने लक्ष्य तक पहुँचती है, इसकी कभी उन्नति नहीं होती, यह पीछे नहीं छोड़ी जा सकती और न ही इसकी पुनरावृत्ति संभव है।”[8]
आचार्य शर्मा का मानना है कि हिंदी को उसकी सुदीर्घ परंपरा से अलग कर नहीं देखा जा सकता है। उन्होंने हिंदी के साहित्येतिहासों का आलोचनात्मक विवरण प्रस्तुत करते हुए हिंदी के पहले साहित्येतिहासकार गार्सा द तासी से लेकर आचार्य रामचंद्र शुक्ल तथा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी तक की इतिहास दृष्टि पर विचार किया है। उन्होंने साहित्येतिहास के निर्माण में गौण रचनाकारों के कृतित्व की भूमिका को रेखांकित किया। इसके संबंध वे कहते हैं कि “महान लेखकों से अधिक महत्व उन गौणों का है, जिनसे विस्तार निर्मित होता है। हिंदी साहित्य के इतिहासों में इन महान गौणों की उपेक्षा हुई है और इसका कारण है कि शोध ने अपने वास्तविक कर्त्तव्य का पालन नहीं किया है।”[9] उनके अनुसार गौणों पर चर्चा न होने के कारण साहित्येतिहास का दायरा सीमित रहा है। प्रकारांतर से यहाँ आचार्य शर्मा रामचंद्र शुक्ल के फुटकल कवियों को एक अलग खाँचे में रखने से असहमत होते दीखते हैं। साहित्य के गौण तत्व पर विस्तृत चर्चा न करने के कारण ही राम काव्य में कैकेयी, मंथरा जैसे पात्र अबतक उपेक्षित रहे हैं। राम काव्य की सुदीर्घ परंपरा में इन पात्रों को या तो हेय दृष्टि से देखा गया या फिर सहानुभूति की दृष्टि से। छायावादी काल से पहले देखें तो मैथिलीशरण गुप्त के साकेत की उर्मिला के अतिरिक्त राम काव्य के किसी गौण चरित्र की उदात्तता का कोई ठोस चित्रण नहीं हुआ। हालांकि स्वातंत्र्योत्तर युग में गौण कर दिए गए चरित्रों पर अच्छी संख्या में काव्य रचे गए, जिनमें केदारनाथ मिश्र प्रभात कृत ‘कैकेयी’, नरेश मेहता द्वारा रचित ‘शबरी’ आदि हैं। वहीं पचास के दशक में यदि राम काव्य के इतर देखें तो केदारनाथ मिश्र प्रभात कृत ‘कर्ण’, रामधारी सिंह दिनकर कृत ‘रश्मिरथी’ आदि रचनाएँ प्रमुख हैं, जहाँ साहित्य में लगभग उपेक्षित कर दिए गए पात्रों पर चर्चा हुई। ‘कर्ण’ नामक चरित्र का उद्धार तो हिंदी काव्य की ही देन है, जिसपर बाद में मराठी साहित्य के लेखक शिवाजी सावंत जैसे रचनाकारों ने कलम चलायी। एक अर्थ में देखें तो आचार्य शर्मा के लिए गौण ही वे असल कारक तत्त्व हैं, जो युगीन धारा को प्रवाहमान रखते हैं।
इतिहास लेखन की समस्या पर नलिन विलोचन कहते हैं कि “किसी युग के इतिहास-लेखन की समस्या सबसे पहले वर्णन की समस्या है, एक रूढ़ि के हास और दूसरी उसमें नई रूढ़ि के आविर्भाव को समझना आवश्यक है।”[10] इसी क्रम में उनका ध्यान परंपरा पर जाता है। परंपरा के वास्तविक अर्थ को बताते हुए वे कहते हैं कि “वे सारी संस्कारगत रूढ़ियाँ, साहित्यिक मान्यताएँ और अभिव्यंजना की प्रणालियाँ, जो एक लेखक को अतीत से प्राप्त होती हैं।”[11] हिंदी साहित्य के इस परंपरा को उन्होंने पाँच भागों में विभाजित किया है। जहाँ हिंदी साहित्य की पहली परंपरा को वे वीरगाथा-काल, भक्तिकाल और रीतिकाल में सम्मिलित भौतिकता में देखते हैं। भौतिकता की चर्चा इन्होंने दो रूपों में की है, जिनमें पहला मर्यादित और दूसरा अतिवादी है। इसके मर्यादित रूप को उन्होंने वीरगाथा काल और भक्तिकाल में तथा इसके अतिवादी रूप को रीतिकाल में देखा है। साहित्य की दूसरी परंपरा को यथार्थता से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि ‘पाश्चात्य साहित्य में यथार्थता का जो तत्त्व 19वीं शताब्दी के अंत में और 20वीं सदी के प्रारंभ में, संघटित आंदोलन के बाद ग्राह्य हुआ, वह सैकड़ों वर्ष पूर्व हमारे साहित्य के लिए साधारण बात थी। इसपर सिद्धांत और व्यवहार रूप में ध्यान न देने के कारण साहित्यिक इतिहास ढीले सूत्र में बंधी आलोचनाओं का रूप ग्रहण करता रहा है।’ इसके अतिरिक्त वे तीसरी परंपरा को मानवतावाद से, चौथी को मानववाद तथा पाँचवीं को धार्मिकता से जोड़कर देखते हैं। साहित्य की दूसरी परंपरा यथार्थता के संबंध में उनका मानना है कि “भिन्न-भिन्न युगों में आदर्श का ऊपरी आवरण तो बदलता है, किंतु यथार्थता का भीतरी ढाँचा बना रहता है।”[12] प्रकारांतर से देखें तो यथार्थता के संबंध में जो बात नलिन जी कर रहे हैं, वही बात सभ्यता और संस्कृति के संबंध में हजारी प्रसाद द्विवेदी करते हैं। द्विवेदी जी सभ्यता और संस्कृति के संबंध में कहते हैं कि मनुष्य के शरीर का ऊपरी आवरण सभ्यता है और उसका आंतरिक रूप संस्कृति है। नलिन जी जहाँ आदर्श में रूप देखते हैं, वहीं द्विवेदी जी सभ्यता में तथा जिसे वे यथार्थता में देखते हैं, उसे द्विवेदी जी संस्कृति के रूप में व्याख्यायित करते हैं।
साहित्य की तीसरी परंपरा मानववाद को वे जीवमात्र के कष्ट को दूर कर उसे सुखी बनाने में देखते हैं, उसमें एक प्रकार से पीड़ित के प्रति समव्यथा की भावना समाहित होती है, जहाँ सुखी को और सुखी बनाने की अपेक्षा दुखी को सुखी बनाना ही महत्वपूर्ण है। चौथी परंपरा को उन्होंने मानवतावाद से जोड़ा है। उनके अनुसार “मनुष्य अपने अतीत के ज्ञान और संस्कार की सहायता से अपने वर्तमान को मर्यादित कर सकता है।”[13] इसमें नलिन विलोचन शर्मा ने साहित्य की अनिवार्यता पर बल देते हुए उसे दर्शन की तुलना में अधिक सुग्राह्य बताया है। उनके अनुसार “दर्शन की जो कटुता थी साहित्य ने उसे कम किया।”[14] यानी दर्शन में जो बातें सीधे ढंग से कही गई हैं, साहित्य ने उसी बात को उपालंभ का रूप दिया। इसके संदर्भ में उन्होंने कबीर का स्मरण करते हुए कहा कि “कबीर यदि केवल दार्शनिक या संत ही रहते, तो उनकी कटुता कितनी चोट पहुँचाने वाली होती। किंतु अभिव्यंजना-विधि में उनकी कटुता बहुत कुछ मृदु हो जाती है और उनकी मानवता ही सतह पर आ पाती है; हिंदू-मुसलमान एक हैं, परमात्मा ही तो राम हैं! सगुण भक्ति का कबीर के द्वारा खंडन कुछ तीखा अवश्य है, किंतु तुलसी और सूर जब निर्गुण का खंडन करते हैं, तब उनकी सहिष्णुता देखने लायक होती है। मानवता की यह परंपरा हिंदू जीवन और भारतीय साहित्य की, विशेषत: हिंदी साहित्य की, एक प्रत्यभिज्ञेय परंपरा रही है।”[15]
पाँचवीं और अंतिम परंपरा के रूप में उन्होंने धार्मिकता को देखा है। हिंदी साहित्य में इसकी महत्ता को वे आवश्यक रूप में देखते हैं। धार्मिकता की महत्ता का अनुमान हम इससे सहज ही लगा सकते हैं कि हिंदी साहित्य का भक्तिकाल और रीतिकाल तथा बहुत हद तक आधुनिक काल के आरंभिक दौर का आधार यही रहा है। साहित्य के भक्तिकाल को जॉर्ज ग्रियर्सन जैसे विद्वानों ने हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग कहा, यदि इसे कालविभाजन से अलग कर दिया जाए तो हिंदी साहित्य समाप्त तो नहीं होगा, किंतु श्रीहीन अवश्य हो जाएगा। इस कारण नलिन जी का धार्मिक प्रवृत्ति को अधिक प्रश्रय देना जायज ठहरता है। इस तरह हम देखते हैं कि नलिन विलोचन शर्मा ने हिंदी साहित्य की परंपरा की ओर जो इशारा किया वह युक्तिसंगत है। इस परंपरा को उन्होंने अतीत के गह्वर से प्राप्त संस्कारगत रूढ़ियों, साहित्यिक मान्यताओं तथा अभिव्यंजना की प्रणालियों से जोड़कर देखा है। भौतिकता को वे पाश्चात्य विचारकों की दृष्टि से देखने के बजाय अपने प्राचीन ग्रंथों जैसे वेद, शास्त्र आदि की दृष्टि से देखने की वकालत करते हैं। नलिन विलोचन शर्मा का मानना है कि हर कृति अपने-आप में श्रेष्ठ होती है। हम किसी रचना को किसी दूसरी रचना के साथ तुलना करके उसकी श्रेष्ठता और अश्रेष्ठता को सिद्ध नहीं कर सकते हैं। उसका काम लक्ष्य तक पहुँचना होता है, वह अपने लक्ष्य तक पहुँचकर सफल हो जाती है। उदाहरण के रूप में हम अज्ञेय की कविता ‘असाध्य वीणा’ को लेते हैं। इसका काव्यनायक केशकंबली ने जब असाध्य मानी जा रही वीणा को बजाया तब उसके बजते ही राजा, रानी सहित उस राजसभा में उपस्थित जन समूह अपने-अपने कार्य-व्यापार के अनुसार उसके संगीत को अनुभूत करते हैं। राजसभा को कर्म-संदेश सुनाकर वीणा पुनः मौन हो जाती है- “डूब गए सब एक साथ/ सब अलग-अलग एकाकी पार तिरे।”[16]…“इयता सबकी अलग-अलग जागी/ संघीत हुई/ पा गयी विलय/ वीणा फिर मूक हो गई।”[17] यानी वज्रकीर्ति ने उस वीणा का निर्माण जिस ध्येय से किया था, उसमें वह सफल रहा। यह केवल वज्रकीर्ति की ही सफलता नहीं थी, बल्कि यह उस रचना यानी वीणा की भी सफलता थी। प्रकारांतर से नलिन विलोचन शर्मा भी कहीं-न-कहीं रचना की इसी सफलता की बात करते हुए दीखते हैं। नलिन विलोचन शर्मा का यह मानना कि ‘हर कृति अपने-आप में श्रेष्ठ होती है। हम उसकी तुलना किसी से नहीं कर सकते हैं।’ साहित्य के दृष्टिकोण से ठीक प्रतीत होता है। साहित्य कभी मात्रात्मक नहीं होता, बल्कि वह गुणात्मक होता है। उसे मात्राबद्ध करके हम उसकी सैद्धांतिकी को ही खंडित कर देते हैं। एक साहित्य से दूसरे साहित्य की तुलना करके हम इसके बीच की परिस्थिति के साथ युगीन समय की उपस्थिति को जानने-समझने के लिए तो कर सकते हैं, लेकिन उनके बीच तुलना के क्रम में श्रेष्ठता का आँकलन करना, उन रचनाओं के साथ अन्याय है।
निष्कर्ष : आचार्यनलिन विलोचन शर्मा ने भारतीय साहित्य को पाश्चात्य दृष्टि से देखने की बजाय अपनी दृष्टि; अपने नियांमक से देखने की वकालत की। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि भारतीय प्रणाली पश्चिम से सर्वथा भिन्न है इसलिए हमें पश्चिम के स्वीकृत प्रतिमानों से हटकर अपनी दृष्टि विकसित करने की आवश्यकता है। उन्होंने साहित्य के इतिहास-दर्शन को केवल हिंदी साहित्य के संदर्भ में न देखकर व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की चेष्टा की। उनका मानना है कि हिंदी साहित्य को उसकी सुदीर्घ परंपरा से अलग कर नहीं देखा जा सकता है। आचार्य शर्मा ने साहित्य के इतिहास को भारतीयता की कसौटी पर कसने का सफलतम यत्न किया है।
संदर्भ सूची
- डॉ. शिवकुमार. (2016). हिंदी साहित्य का इतिहास दर्शन. नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन, पृ. 33
- नलिन विलोचन शर्मा. (1959). साहित्य का इतिहास-दर्शन. पटना : बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पृ. 3
- वही, पृ. 7
- वही
- वही, पृ. 6
- शाह, रमेशचंद्र. (2009). अकेला मेला. नई दिल्ली : किताबघर प्रकाशन, पृ. 157-158
- नलिन विलोचन शर्मा. (1959). साहित्य का इतिहास-दर्शन. पटना : बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, भूमिका से
- वही, पृ. 36
- वही, पृ. 119
- वही, पृ. 46
- वही, पृ. 275
- वही, पृ. 278
- वही
- वही
- वही
- अज्ञेय. (1961). आँगन के पार द्वार. काशी : भारतीय ज्ञानपीठ, पृ. 84
- वही, पृ. 86
[1] डॉ. शिवकुमार. (2016). हिंदी साहित्य का इतिहास दर्शन. नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन, पृ. 33
[2] नलिन विलोचन शर्मा. (1959). साहित्य का इतिहास-दर्शन. पटना : बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पृ. 3
[3] वही, पृ. 7
[4] वही
[5] वही, पृ. 6
[6] शाह, रमेशचंद्र. (2009). अकेला मेला. नई दिल्ली : किताबघर प्रकाशन, पृ. 157-158
[7] नलिन विलोचन शर्मा. (1959). साहित्य का इतिहास-दर्शन. पटना : बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, भूमिका से
[8] वही, पृ. 36
[9] वही, पृ. 119
[10] वही, पृ. 46
[11] वही, पृ. 275
[12] वही, पृ. 278
[13] वही
[14] वही
[15] वही
[16] अज्ञेय. (1961). आँगन के पार द्वार. काशी : भारतीय ज्ञानपीठ, पृ. 84
[17] वही, पृ. 86










