आलोचक के मुख से” नामवर सिंह के व्याख्यानों का समीक्षात्मक अवलोकन

डॉ. रज्जन प्रसाद शुक्ला

केन्द्रीय विद्यालय उत्तर लखीमपुर (असम)

ईमेल: rpshukla000@gmail.com

मोबाइल: 9936444618

सारांश

नामवर सिंह की आलोचना कर्म के विविध आयाम हैं। यह कर्म उनके द्वारा विभिन्न विषयों पर दिए गए व्याख्यान, परिसंवाद, साक्षात्कार एवं कक्षा व्याख्यान हैं। नामवर सिंह ने एक अध्यापक, आलोचक, निबंधकार, संपादक, राजनेता वक्ता आदि भूमिकाओं का कुशलता पूर्वक निर्वहन किया है। उन्हें वाचिक परंपरा का मूर्धन्य आलोचक भी माना जाता है। साहित्य, समाज, कला, संस्कृति, राजनीति, विज्ञान, धर्म-दर्शन, सिद्धांत एवं व्यावहारिक चिंतन आदि ऐसा कोई कोना नहीं बचा है जहां नामवर सिंह की दृष्टि नहीं गई।

आलोचक के मुख से’ – यह पुस्तक डॉ॰ नामवर सिंह के द्वारा पटना में ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के मंच से विभिन्न अवसरों पर दिए गए ‘पाँच व्याख्यानों’ का संकलन हैं। इन व्याख्यानों का सम्पादन खगेन्द्र ठाकुर के द्वारा किया गया, खगेन्द्र जी ने ‘व्याख्यानों’ को उनके वास्तविक रूप में ही रहने दिया है, ताकि पाठक नामवर जी की वक्तृत्व कला का आनन्द भी ले सकें। यह व्याख्यान नामवर सिंह द्वारा अगस्त, 1983 ई॰ में बिहार प्रगतिशील लेखक संघ और सिटीजेन्स फोरम के तत्वावधान (पटना) में आयोजित कार्ल मार्क्स-निधन-शत-वार्षिकी-समारोह में दिया गया था।

नामवर जी हिन्दी के सर्वोत्तम वक्ता रहे और माने भी जाते रहेंगे। उनके व्याख्यान में भाषा के प्रवाह के साथ विचारों की लय है। इस लय का निर्माण विचारों के तारतम्य और क्रमबद्धता से होता है। अनावश्यक तथ्यों और प्रसंगों से वे बचते हैं और रोचकता का भी ध्यान हमेशा रखते हैं। आज के साहित्य, विचारधारा, सौन्दर्य, राजनीति और आलोचना से जुड़े तथा उनके अन्तरसम्बन्धों के बारे में महत्त्वपूर्ण बातें इन व्याख्यानों में कही गई हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि ‘आलोचक के मुख से’ हिन्दी आलोचना की एक बेहद महत्त्वपूर्ण किताब है।

बीज शब्द : आलोचना, रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, व्यक्तिवाद, वाचिक, वैचारिक

शोध आलेख

नामवर सिंह को हिंदी आलोचना में वाचिक परंपरा का आचार्य माना जाता है। वे लिखित आलोचना के अतिरिक्त मंच और व्याख्यानों के माध्यम से आम जनता तक विचारों को पहुँचाते थे—एक जीवंत “जंगम विद्यापीठ” जैसा, जिसका कोई ठोस ठिकाना नहीं था। इसकी विशिष्टता यही थी कि वे विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रहे, बल्कि जन–सभाएं, गोष्ठियाँ, रंगमंच जैसे विविध माध्यमों से संवाद रचते रहे।

नामवर सिंह आलोचना में रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, व्यक्तिवाद जैसे विकारों के विरोधी रहे, और एक वैचारिक आंदोलन के रूप में आलोचना को आगे बढ़ाया। उनका व्याख्यान जन–शिक्षण का माध्यम बन गया, जिसमें उन्होंने साम्राज्यवाद और पूँजीवादी चिंतन के ताज़ा स्वरूपों के प्रति सजगता बढ़ाई। उनकी आलोचना की विशिष्टता सोच की गहराई और सहृदयता में है। मार्क्सवादी आलोचना से जुड़े रहते हुए, वे कठोरता में नहीं बंधे रहे। अपभ्रंश से लेकर समकालीन साहित्य तक सभी विधाओं पर उन्होंने सूक्ष्म दृष्टि और मानवीय संवेदना से विचार प्रस्तुत किए।

नामवर सिंह की आलोचना पद्धति का एक आधार था—दृष्टि (परिचय) → विश्लेषण (व्याख्या) → निष्कर्ष (संक्षेप)। इसमें वे उदाहरण देकर बात को पुष्ट करते, अवधारणाओं की पड़ताल करते और अंत में एक विश्लेषणात्मक निष्कर्ष प्रस्तुत करते। कविता में परंपरा और सामाजिकता दोनों को साथ ले जाना नामवर सिंह के सबसे बड़े गुणों में से एक था। उन्होंने छायावादी कविता में सामाजिक तत्वों को पहचानने का नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। कहानी आलोचना में, उन्होंने “कहानीपन” यानी कहानी-रूप पर जोर देकर इसे काव्य-समीक्षा से भी अलग एक दिशा दी। उनकी एक प्रमुख टिप्पणी थी—व्यापकता में गहराई हो सकती है, लेकिन संकीर्णता में भी गहराई हो सकती है। इसका मतलब यह था कि सोच का विस्तार महत्वपूर्ण है, पर उस विस्तार में गहराई का अभाव कहीं बड़ी कमी नहीं है। इस संतुलन ने उनकी आलोचना को उल्लेखनीय औपचारिक-वैचारिक शक्ति दी।

नामवर सिंह विवादवादी संवाद में विश्वास रखते थे। वे कहते थे कि विचारों के क्षेत्र में विवाद की भूमिका आवश्यक है, और इस दृष्टि से वाचिक परंपरा ही आलोחי प्रक्रिया का जीवंत माध्यम बनती है। उनका हर व्याख्यान सोचे गए उत्तर के लिए चौकस होने का निमंत्रण था

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के योग्य एवं महत्वपूर्ण शिष्य के रूप में हुए। हजारी प्रसाद द्विवेदी के व्यक्तित्व की तेजस्विता, नकार का साहस, निष्पक्ष दृष्टि, साहित्य एवं संस्कृति की गहरी परख एवं उनके शुद्धिकरण के प्रति जागरूकता आदि गुणों का प्रभाव नामवर सिंह पर स्पष्ट देखा जा सकता है। नामवर सिंह के साहित्यिक जीवन का प्रारंभ काव्य लेखन के साथ हुआ था। केदारनाथ सिंह लिखते हैं – “नामवर सिंह की आरंभिक पहचान एक कवि के रूप में बनी थी। वह गोष्ठियों सम्मेलनों में जाते थे और रस लेकर अपनी कविताएं सुनाते थे। उनकी कविताएं उस समय के प्रचलित फैशन से अलग होती थीं। उनमें एक ताजगी होती थी और एक खास तरह की एंद्रिकता भी।”[1]

            नामवर सिंह सर्वप्रथम अध्यापन के दौरान उन्होंने साहित्यिक, असाहित्यिक विद्यार्थियों को सामान्य हिंदी पढ़ाने का कार्य किया। शिक्षक के रूप में उनके पढ़ाने का ढंग ऐसा था कि कक्षाओं में विद्यार्थियों की संख्या उस जमाने में देखने लायक थी। अपने अध्यापन के खास अंदाज, वाद-विवाद वार्तालाप आदि उनकी अलग ढंग की शैली के कारण उनके अध्यापन को अत्यधिक प्रसिद्धि मिलती गई। परिणामस्वरूप एक आलोचक व्यक्तित्व का बीज प्रस्फुटित हो रहा था। उनकी वाचिक आलोचना का प्रारंभ यहीं से माना जा सकता है। उन्होंने 1940 ई. में ‘नवयुवक साहित्यिक संघ’ नामक साहित्यिक संस्था स्थापित की थी। इस संस्था में प्रत्येक सप्ताह एक साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन किया जाता था। बाद में व्याख्यान, संभाषण व उनके वैचारिक संवाद के साधन बनते गए। अकादमिक स्तर पर उनके अध्ययन व अध्यापन ने ही आगे चलकर आलोचना का रूप ग्रहण कर लिया और उनका आलोचना कर्म लिखित होने के साथ-साथ वाचिक भी होने लगा, क्योंकि एक शिक्षक होने के नाते कक्षा में छात्रों को पढ़ाने के दौरान बहुत सारी बातें व्याख्यान या वाचिक रूप में ही होती रहती थी।

            नामवर सिंह ने प्रचुर संख्या में आलोचनात्मक पुस्तकें लिखीं और उससे भी अधिक वक्तव्य दिए। उनके व्याख्यानों, परिसंवादों, साक्षात्कारों आदि को संग्रहित कर पुस्तक रूप में प्रकाशित भी किया गया है। खगेंद्र ठाकुर द्वारा संपादित पुस्तक ‘आलोचक के मुख से’ पटना में दिए गए व्याख्यानों का संकलन है जो वर्ष 2005 ई० में प्रकाशित हुआ।

            यह पुस्तक पटना में प्रगतिशील लेखक संघ के विभिन्न मंचों से दिए गए पांच व्याख्यानों का संग्रह है। इसका प्रकाशन खगेंद्र ठाकुर ने वर्ष 2005 में किया था। यह व्याख्यान कार्ल मार्क्स और उनके साहित्य चिंतन, राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन और प्रेमचंद की भूमिका, रामचंद्र शुक्ल की नवजागरण कालीन चेतना और उनके साहित्येतिहास दर्शन साथ ही समकालीन आलोचना की समस्या पर केंद्रित है। पुस्तक का शीर्षक ‘आलोचक के मुख से’ नामवर सिंह की वाचिक आलोचना को चरितार्थ करता है। नामवर सिंह के व्याख्यानों की पुस्तकों में यह पहली संपादित पुस्तक है। यह पुस्तक नामवर सिंह के आलोचना में प्रतिपादित दृष्टिकोण और विचारों को भी दर्शाती है, साथ ही नामवर सिंह के व्याख्यानों की प्रकृति तथा हिंदी आलोचना की वाचिक परंपरा के महत्व को भी रेखांकित करती है।

सभा-गोष्ठियों में दिये गए उनके व्याख्यानों को ही पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवा दिया गया। 1959 के एक व्याख्यान में आधुनिक साहित्य के संदर्भ में उनकी कही यह बात आज भी प्रासंगिक है – “आधुनिक साहित्य जितना जटिल नहीं है, उससे कहीं अधिक उसकी जटिलता का प्रचार है। जिनके ऊपर इस भ्रम को दूर करने की जिम्मेदारी थी, उन्होंने भी इसे बढ़ाने में योग दिया।” यहां वे ‘साधारणीकरण’ की चर्चा करते हुए कहते हैं, “नए आचार्यों ने इस शब्द को लेकर जाने कितनी शास्त्रीय बातों की उद्धरणी की, और नतीजा? विद्यार्थियों पर उनके आचार्यत्व की प्रतिष्ठा भले हो गई हो, नई कविता की एक भी जटिलता नहीं सुलझी।” डॉ. नामवर सिंह की आलोचनात्मक पुस्तक “आलोचक के मुख से” में कुल पाँच व्याख्यान (अध्याय) संकलित हैं, जो पटना में प्रगतिशील लेखक संघ के मंच पर विभिन्न अवसरों पर प्रस्तुत किए गए थे।

राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन और प्रेमचंद –

            यह व्याख्यान नामवर सिंह द्वारा 23 फरवरी, 1980 ई॰ को बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान (पटना) में आयोजित प्रेमचंद जन्मशताब्दी समारोह में दिया गया था।

प्रेमचन्द के सम्पूर्ण कृतित्व को भारतीय मुक्ति-आन्दोलन की महागाथा कहा जाए तो शायद यह अत्युक्ति नहीं होगी। 1907 से लेकर 1936 तक के भारतीय जीवन-सन्दर्भों का उनके द्वारा प्रस्तुत सर्वांगीण चित्रण का केन्द्र-बिन्दु भारतीय जनता को मुक्ति की प्रबल आकांक्षा है। वे मानते थे कि — “साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि राजनीति के आगे मशाल दिखाते हुए चलने वाली सच्चाई है।”[2] भारतीय मुक्ति-आन्दोलन के सन्दर्भ में उनके इस कथन का विशेष अर्थ इसलिए है कि साहित्य में राजनीतिज्ञों के विचारों का अनुगमन करने की आशा की जाती है। लेकिन प्रेमचन्द इस भ्रम को वैचारिक और रचनात्मक दोनों स्तरों पर तोड़ते हैं। सन् 1930 ई. में बनारसीदास चतुर्वेदी को लिखे पत्र में प्रेमचन्द की अभिलाषा इसका प्रमाण है—“मेरी अभिलाषाएँ बहुत सीमित हैं। इस समय सबसे बड़ी अभिलाषा यही है कि हम अपने स्वतंत्रता-संग्राम में सफल हों। मैं दौलत और शोहरत का इच्छुक नहीं हूँ। खाने को मिल जाता है। मोटर और बँगले की मुझे हवस नहीं है। हाँ, यह ज़रूर चाहता हूँ कि दो-चार उच्चकोटि की रचनाएँ छोड़ जाऊँ लेकिन उनका उद्देश्य स्वतंत्रता-प्राप्ति ही हो।”[3] प्रेमचन्द के भारतीय मुक्ति की इसी अप्रतिम सरोकारों को अभिव्यक्त करना ही मेरा लक्ष्य रहा है । प्रेमचंद राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति के लिए उस तरीक़े का इस्तेमाल करने लगते हैं, जिसे अँग्रेज़ी में “विकेरियान नेशनलिस्म” कहा जाता है। दमन और आतंक के सहारे चलने वाले औपनिवेशिक शासन में लेखकों के लिए अपनी राष्ट्रीय भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए यही रास्ता बचा रहता है।

इतिहास के जिस दौर में प्रेमचंद ने कथा-लेखन की शुरुआत की, उस समय उनके समक्ष सबसे बड़ी प्रमुख चुनौती थीं: राष्ट्र की मुक्ति। देश अंग्रेजी सत्ता की गुलामी में जकड़ा था। इस गुलामी से मुक्ति के लिए कई तरह के आंदोलन हो रहे थे। तरह-तरह के लोग इनमें शामिल थे। इन लोगों के अपने अंतर्विरोध भी थे। कुछ लोगों का मानना था कि इन अंतर्विरोधों को भूल कर, सबको इस आंदोलन में शरीक होना चाहिए । जबकि कुछ लोग ऐसे थे जो भारतीय सामाजिक संरचना में निहित शोषणामूलक आयाम देख-समझ लेते थे परन्तु अंग्रेजी दासता और औपनिवेशिक सत्ता-संरचना में निहित यातना, अत्याचार और क्रूरता उनकी दृष्टि से ओझल रहता था या इसे नजरंदाज करते थे। नतीजतन ऐसे लोगों की सारी कवायद ब्रिटिश सत्ता का हित-समर्थन करती थी। लेकिन इसके साथ ही प्रेमचंद इसके अंतर्विरोधों को भी उजागर करते थे, इसे ना भूलने पर जोर देते थे। डॉ नामवर सिंह का वक्तव्य यहाँ अनुकरणीय है – “1905-1906 के बंग-भंग से लेकर 1936 तक, जब प्रेमचन्द की मृत्यु हुई, इन 30 वर्षों के भारतीय जीवन की धड़कन, उसका संघर्ष, उसकी पराजय, उसका दुःख, उसका दर्द अपनी समस्त गहराई के साथ और अपनी समस्त व्यापकता के साथ अगर किसी एक भारतीय लेखक में आप ढूँढना चाहें, तो रवीन्द्रनाथ ठाकुर के रहते हुए, शरतचन्द्र के रहते हुए. सुब्रह्मण्य भारती के रहते हुए, वि.स. खाण्डेलकर के रहते हुए, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के रहते हुए, डॉ. मुहम्मद इकबाल के रहते हुए भी मैं प्रेमचन्द का नाम लेना चाहूँगा, क्योंकि यही वह एकमात्र साहित्यकार है जिनके साहित्य में स्वाधीनता संग्राम की अमर गाथा अपने पूरे ब्योरे के साथ कही गई है।”[4] सामंतवाद, जमीदारी प्रथा और जाति प्रथा के भीतर मौजूद छुआछूत ऐसे ही अंतर्विरोध थे। प्रेमचंद अंतर्विरोध की जटिलता और शोषणमूलक पहलू को समझते हुए इसका विरोध करते थे; साथ ही आजादी की लड़ाई का पूर्णतः समर्थन भी करते थे।

            भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में जिन थोड़े लेखकों ने भागीदारी की, (फणीश्वर नाथ रेणु के शब्दों में कहें तो न सिर्फ कलम से बल्कि काया से भी) प्रेमचंद उनमें से एक थे । उन्होंने स्वाधीनता-आंदोलन के लिए न सिर्फ पत्र-पत्रिकाओं में लेख और कहानियाँ लिखी, अपितु काया से शिरकत भी की । डॉ नामवर सिंह के अनुसार, – “प्रेमचंद ने देश प्रेम की भावना से अपना साहित्य जीवन प्रारम्भ किया।”[5] उनके कहानी-लेखन का आरंभ देश-भक्ति की कहानियों से हुआ, जिसका सभी दृष्टियों से अनवरत विकास होता गया। प्रेमचंद का प्रथम कहानी संग्रह ‘सोजे-वतन’ जिसमें  सर्वप्रथम देशभक्ति का भाव परिलक्षित होता है। देशप्रेम की ऐसी कहानियां उस समय हिंदी-उर्दू किसी भाषा में नहीं लिखी गई थीं। देशप्रेम की कहानी की शुरुआत यहीं से होती है। इसकी एक कहानी ‘दुनिया का सबसे अनमोल रत्न’ का अंतिम वाक्य कुछ इस प्रकार है, “खून का वह आखिरी कतरा जो वतन की हिफाजत में गिरे, दुनिया की सबसे अनमोल चीज है।”[6] इसी कारण अंग्रेजी सत्ता ने ‘सोजे-वतन’ की प्रतियां जलवायी और कहानी-संग्रह को बैन कर दिया गया। प्रेमचंद की स्वाधीनता-आंदोलन से सम्बंधित ‘उपदेश’ शीर्षक से उनकी पहली कहानी छपी। उस समय स्वाधीनता आंदोलन को जातीय आंदोलन भी कहा जाता था। सन् 1917 ई॰ में प्रकाशित इस कहानी से 1935 ई॰ में प्रकाशित ‘कातिल की मां’ तक की कहानियों के कई स्वर हैं। उनकी कुछ कहानियों में स्वाधीनता आंदोलन या उसके विभिन्न कार्यक्रमों को सीधे-सीधे विषय बनाया गया है। कुछ कहानियों का कोई पात्र स्वाधीनता-आंदोलन से जुड़ा है तो कुछ कहानियों में स्वाधीनता-आंदोलन के दौरान घटी सच्ची घटनाओं को विषय बनाया गया है। कुछ कहानियों का विषय दूसरा है, लेकिन संदर्भ स्वाधीनता- आंदोलन है।

            इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रेमचंद ने अपने अधिकांश उपन्यासों, कहानियों एवं लेखों में राष्ट्रीय एकता और धार्मिक सद्भावना का चित्रण किया है। 1907 से लेकर 1936 तक इस आजादी की लड़ाई में कितने रंग, कितने दौर आए. और हर मौके पर प्रेमचन्द राजनीति के पीछे नहीं बल्कि आगे ही थे। प्रेमचन्द ने राष्ट्रीयता का सबक इसी रूप में दिया था।

आचार्य शुक्ल और हिन्दी नवजागरण –

            यह व्याख्यान डॉ॰ नामवर सिंह द्वारा 11 अक्तूबर, 1984 ई॰ को बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान (पटना) में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जन्मशती समारोह में दिया गया था।

            उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ से भारत के नवशिक्षित बौद्धिकों में एक नई चेतना का उदय हुआ जिसके अग्रदूत राजा राममोहन राय माने जाते हैं। इस चेतना को यूरोप के ‘रेनेसां’ (Renaissance) के आधार पर अपने देश में कहीं ‘पुनर्जागरण’ और कहीं ‘नवजागरण’ कहा जाता है। चेतना की यह लहर देर-सबेर कमोवेश भारत के सभी प्रदेशों में फैली। किंतु अधिक चर्चा बंगाल नवजागरण और महाराष्ट्र प्रबोधन की ही होती है। अन्य प्रदेशों की तरह हिंदी प्रदेश में भी नवजागरण की यह लहर उठी किंतु जरा देर से उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, सन् 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पराजय के लगभग एक दशक बाद और इसका प्रसार भी बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दो दशकों तक बना रहा। हिंदी नवजागरण की चर्चा अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीय बौद्धिकों के हल्के में कम ही सुनाई पड़ती है; यहां तक कि कुछ लोग उसके अस्तित्व को भी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। कारण शायद यह हो कि हिंदी नवजागरण संबंधी अधिकांश रचनाएं हिंदी में ही हुई; अंग्रेजी में उन्हें सुलभ कराने के प्रयास भी बहुत कम ही हुए। विडंबना तो यह है कि स्वयं हिंदी जानने वाले आधुनिक बौद्धिक भी, अपनी इस समृद्ध विरासत से भलीभांति परिचित नहीं हैं।

            1857 के गदर का केंद्र हिंदी प्रदेश ही था, इसलिए हिंदी नवजागरण की प्रकृति पर गदर की स्मृति की छाया पड़ना स्वाभाविक ही था। नवजागरण का अलख जगाने वाले अधिकांश छोटे-बड़े तत्कालीन लेखकों की रचनाओं में दूर तक सुनाई पड़ती है। हिंदी नवजागरण का बीज मंत्र फूंकने वाले प्रथम अग्रदूत भारतेन्दु हरिश्चन्द्र थे, जिनकी मुख्य प्रतिज्ञा यह थी कि ‘स्वत्व निज भारत है।’ भारतेन्दु का ‘स्वत्व’ वही था जिसे आज ‘जातीय अस्मिता’, ‘जातीय पहचान’ और अंग्रेजी में ‘आइडेंटिटी’ कहते हैं।

                        इस आख्यायन में मूलतः जिस नवजागरण पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है, वह है – ‘हिन्दी नवजागरण’। इस विषय पर सर्वप्रथम डॉ॰ रामविलास शर्मा अपने चिंतन और लेखन के माध्यम से स्थापित करने की कोशिश किया है। डॉ॰ रामविलास शर्मा अखिल भारतीय नवजागरण एवं हिन्दी नवजागरण में अंतर पर ध्यान आकर्षित करते है – “अखिल भारतीय नवजागरण के अन्तर्गत हिन्दी नवजागरण की कुछ अपनी जातीय विशेषताएँ हैं। यह केवल धार्मिक और सामाजिक सुधारकों की देन नहीं है, बल्कि हिन्दी नवजागरण की जो मुख्य विशेषता है, वह यह कि इस नवजागरण में यहाँ के बौद्धिकों और मुख्य रूप से साहित्यकारों और लेखकों ने भूमिका अदा की है।”[7] आचार्य रामचंद्र शुक्ल जिस समय साहित्य लेखन कर रहे थे, उस समय पश्चिम में विज्ञान के क्षेत्र में नए-नए अविष्कार और साहित्य के क्षेत्र में नए-नए सिद्धांतों का प्रतिपादन हो रहा था। पश्चिम से लेकर बंगला तक की परंपरा पर विचार करते हुए छायावाद पर अपने विचार प्रस्तुत करते हैं। समाज के उपयोग के लिए शुक्ल जी पश्चिम के ज्ञान-विज्ञान से भी भारतीय समाज को परिचित कराना आवश्यक मानते थे। विश्वप्रपंच की भूमिका के शुरुआत में ही आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है कि “गत शताब्दी में योरोप में ज्यों-ज्यों भौतिक विज्ञान, रसायन, भूगर्भविद्या, प्राणिविज्ञान, शरीरविज्ञान इत्यादि के अंतर्गत नई-नई बातों का पता लगने लगा और नए-नए सिद्धांत स्थिर होने लगे त्यों-त्यों जगत के संबंध में लोगों की जो भावनाएं थीं वे बदलने लगीं। जहाँ पहले लोग छोटी से छोटी बात के कारण को न पाकर उसे ईश्वर की कृति मान संतोष कर लेते थे वहाँ चारों ओर नाना विज्ञानों के द्वारा कार्य-कारण की ऐसी विस्तृत श्रृंखला उपस्थित कर दी गई कि किसी को बीच ही में ठिठकने की आवश्यकता न रह गई।”[8] विश्वप्रपंच की लम्बी भूमिका में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने विज्ञान से संबंधित उस समय के तात्कालिक विचारों पर महत्त्वपूर्ण रूप से चर्चा की है। परमाणु की संरचना तक पर उसमें उन्होंने विचार किया। एक साहित्य का लेखक विज्ञान के सिद्धांतों पर विचार कर रहा है यह एक बड़ी बात है। इससे यह स्पष्ट होता है कि शुक्ल जी एक बड़ी दृष्टि के साथ अनुवाद कार्य कर रहे थे।

            आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी आलोचना के द्वारा उस अभियान को एक व्यवस्थित शस्त्र प्रदान किया। उन्होंने परंपरागत भारतीय काव्यशास्त्र की सामंती रूढ़ियों और पश्चिम के पतनशील पूंजीवादी साहित्य-सिद्धांतों का विरोध करते हुए उनसे स्वतंत्र एक सम्यक् आधुनिक साहित्य-शास्त्र का निर्माण किया जो वस्तुनिष्ठ दार्शनिक आधार पर प्रतिष्ठित है। उन्होंने साहित्य के लोकोत्तर ब्रह्मानन्द स्वरूप का निषेध किया और उसे घनिष्ठ रूप से लोक से सम्बद्ध किया और बताया कि लोकहृदय में लीन होने की दशा का नाम रस दशा है। इस स्थापना का क्रांतिकारी महत्व यह है कि “लोक हृदय में लीन होने की कसौटी रख कर उन्होंने हर तरह की संकुचित व्यक्तिवादी और भाववादी धारणाओं से साहित्य को मुक्त करके उसे सामाजिक जीवन का एक अंग बना दिया है।”[9]

            आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने साहित्यशास्त्र की तमाम भाववादी और रहस्यवादी धारणाओं की जड़े दी। अब साहित्य का प्रयोजन शुद्ध आनंद या मनोरंजन के स्थान पर लोकमंगल या सामाजिक कल्याण हो गया। नामवर सिंह के शब्दों में “उन्होंने अपने सौंदर्यबोध तथा रसानुभूति को शुद्ध आनंद की स्थिति से ऊपर उठाकर लोकमंगल की उदात्त सामाजिक पृष्ठभूमि पर प्रतिष्ठित किया। शुक्ल जी ने समीक्षा को निष्क्रिय व्याख्या से आगे बढ़कर सक्रिय परिवर्तनकारी सामाजिक शास्त्र के रूप में प्रतिष्ठित किया।”[10] शुक्लजी ने लोकमंगल के इसी मानदंड के अनुसार तुलसीदास को सूरदास से श्रेष्ठ बतलाया। कहना न होगा कि शुक्ल जी ने तॉलस्ताय और गांधी जी के हृदय परिवर्तन और अप्रतिरोध के आदर्श का खंडन करके सक्रिय प्रतिरोध के आदर्श की प्रतिष्ठा की। आचार्य शुक्ल अद्वितीय इतिहास विवेक का परिचय देते हुए वीरगाथा काल और रीतिकाल की तुलना में भक्तिकाल को ऊँचा आसन दिया और आधुनिक काल में गद्य के प्रचार और नए युगांतरकारी साहित्य के महत्व को रेखांकित किया।

            कहना न होगा कि यहां आचार्य रामचंद्र शुक्ल एक जनधर्मी बुद्धिजीवी की तरह नज़र आते हैं। आचार्य शुक्ल की चिंता में आमजन और वह किसान है जिसे वह शिक्षित और समझदार करना चाहते हैं। वे यह चाहते थे कि राजनीतिक दृष्टि से शिक्षित होना जरूरी है। आचार्य शुक्ल हिंदी नवजागरण के दौर में भारतीय राजनीति को एक सजग जनधर्मी बौद्धिक की तरह देख रहे थे। इसी दृष्टि से वह अपनी आलोचना का निकष तैयार करते हैं जिसमें तुलसी का लोकमंगल जायसी की लोक संस्कृति और सूर का जीवन उत्सव का रंग है। आधुनिक स्वाधीनता आंदोलन में भारतीय राष्ट्रवाद में साम्राज्यवाद के विरोध में जो स्वरूप उभर रहा था उसमें छोटे और सीमांत किसान उपेक्षित थे। साधारण जनमानस भी वहां कमतर ही था। आचार्य शुक्ल उसकी भूमिका के बारे में बार-बार लिखते हैं और उसे इस आंदोलन का आधार मानते हैं। आचार्य शुक्ल असहयोग-आंदोलन के पक्षधर थे लेकिन वो इस बात पर ज़ोर देकर कहते है कि यह ग्रामीण किसानों से अधिक पूँजीपतियों के लिए ज्यादा लाभप्रद है, शुक्ल जी स्पष्ट शब्दों में कहते है – “पश्चिम के राष्ट्र अपने को जिससे मुक्त करने की चेष्टा कर रहे हैं उसी पूँजीवाद की ओर यह (असहयोग) एक बढ़ता कदम है। यह पूंजी बटोरने और समाज में व्यक्तिवादी जीवन-मूल्यों के क्षुद्र अमेरिकी मानदंड स्थापित करने का प्रयास भर है।” वह भारतीय जीवन के पारंपरिक मूल्यों, सामूहिकता, अनुशासन् और उदत्त तत्वों की कसौटी को इसलिए ज्यादा तवज्जो देते हैं क्योंकि वह प्राच्यवाद की इतिहास दृष्टि के उस चिंतन का प्रतिरोध करते हैं जिसमें भारतीय संस्कृति, इतिहास को अध्यात्म, रहस्यवादी और चमत्कारवाद के आलोक में विवेचित किया गया।

            उनका संपूर्ण लेखन इस औपनिवेशिक दृष्टि के समानांतर भारतीय इतिहास दृष्टि की महत्ता को प्रतिपादित करता है। आचार्य शुक्ल उस आलोचक राष्ट्र की कल्पना करते हैं जो अभिजात्य और उपनिवेशवाद के वरअक्स सामान्य जन संस्कृति. प्रकृति, सौंदर्य और लोक की उदात्त भावना से निर्मित है। अपने आलोचना संघर्ष में स्वाधीनता आंदोलन और हिंदी नवजागरण के चिंतक की तरह वह जिस सजगता से भूमिका अदा करते हैं वह सचमुच उन्हें सिर्फ एक आलोचक और विचारवान बौद्धिक की तरह ही नहीं प्रस्तुत करता बल्कि वह अपने संपूर्ण लेखन और विचार से एक प्रतिबद्ध समाज सुधारक स्वाधीनता संग्राम सेनानी और जनधर्मी बुद्धिजीवी की तरह नजर आते हैं।

आचार्य शुक्ल का साहित्येतिहास-दर्शन –

यह व्याख्यान डॉ॰ नामवर सिंह द्वारा 11 अक्तूबर, 1984 ई॰ को बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान (पटना) में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जन्मशती समारोह में दिया गया था। यह उस समारोह के अंतिम सत्र में अध्यक्ष-पद से दिया गया व्याख्यान है।

वास्तव में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य के प्रथम इतिहासकार हैं। यद्यपि उनके पूर्व गार्सा-द-तासी, शिव सिंह सेंगर, मिश्रबन्धु और जार्ज ग्रियर्सन ने हिन्दी साहित्येतिहास की सामग्री जुटाने तथा जार्ज ग्रियर्सन ने उस समय यूरोप में प्रतिष्ठित दार्शनिक सिद्धान्त विधेयवाद (पोजिटिविज़्म) की प्रणाली का इतिहास लेखन में प्रयोग करने का भी किंचित प्रयास था, पर पहली बार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ही विधेयवादी प्रणाली पर हिन्दी साहित्य के इतिहास का निर्माण किया। उसके लिए जिस सामग्री की जरूरत थी वहाँ ‘मिश्र बन्धु विनोद’ तथा ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ की खोज रिपोर्टों द्वारा सामने आ चुकी थी । जार्ज ग्रियर्सन, गौरीशंकर हीराचन्द्र ओझा,  चन्द्रधर शर्मा गुलेरी, कर्नल वुड, डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल, राहुल सांकृत्यायन, विनयतोष भट्टाचार्य, हरप्रसाद शास्त्री आदि ने भी हिन्दी साहित्येतिहास की महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध करायी थी। जार्ज सेन्ट्सबरी, एडमंड गूज, लुई कजामिया आदि के अंगरेजी साहित्येतिहासों से प्रेरणा ग्रहण कर आचार्य शुक्ल ने हिन्दी साहित्य का व्यवस्थित ‘विचार श्रृंखलाबद्ध इतिहास’ जिसकी आवश्यकता का अनुभव, विश्वविद्यालयों में हिन्दी शिक्षा का विधान होने पर, छात्र और अध्यापक दोनों कर रहे थे, प्रस्तुत करने का प्रयास किया। उन्होंने अनुभव किया कि “सात आठ सौ वर्षों की संचित ग्रंथराशि सामने लगी हुई थी, पर ऐसी निर्दिष्ट सरणियों की उद्‌भावना नहीं हुई थी, जिसके अनुसार सुगमता से प्रभूत सामग्री का वर्गीकरण होता।”[11] वे (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल), मिश्रबन्धुओं के कविवृत संग्रह और काल विभाजन से संतुष्ट नहीं थे। उनका उद्देश्य हिन्दी साहित्य का विचार ‘श्रृंखलाबद्ध इतिहास’ प्रस्तुत करना था, जिसमें वैज्ञानिक इतिहास बोध के साथ राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक- सांस्कृतिक परिपेक्ष्य में, हिन्दी साहित्य का विकास तथा विभिन्न काल खण्डों में विभिन्न साहित्यिक प्रवृत्तियों और विशेषताओं का विश्लेषण निर्धारण प्रमुख उद्देश्य हो।

            अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए शुक्ल जी ने सर्वप्रथम ‘साहित्य’ के सम्बन्ध में अपनी धारणा स्थिर की। सही माने में यह कहना न्याय-संगत होगा कि हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने के काफी पूर्व उनकी ‘साहित्य-सम्बन्धी’ धारणा स्थिर हो चुकी थी। यह ‘धारणा’ यह थी कि “साहित्य शिक्षित जनता की चित्रवृति का प्रतिनिधित्व करता है। उसकी प्रवृत्तियों के बदलाव के अनुसार साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता है तथा उनके प्रभावों की प्रेरणा से भिन्न-भिन्न शाखाएं फूटती हैं।”[12] अपने इतिहास के संशोधित-परिवर्तित संस्करण में ‘काल विभाग’ शीर्षक प्रकरण के प्रथम वाक्य में शुक्ल जी ने ‘शिक्षित जनता’ पढ़ के ‘शिक्षित’ विशेष विशेषण को छोड़ दिया है। यह छोड़ना अकारण या असावधानीजन्य नहीं है। वस्तुत: साहित्य को केवल ‘शिक्षित’ जनता की “चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब” मानने पर कई अव्याख्येय उलझनें पैदा हो जाती हैं. जिनका बोध शुक्ल जी को भी था, पर शुक्ल जी का ”जनता’ और ‘शिक्षित जनता’ का यह द्वन्द्व उनके पूरे साहित्येतिहास में विद्यमान है, जिसके फलस्वरूप नाथों और निर्गुण सन्तों के साहित्य के मूल्यांकन और इतिहास की धारा में उनके सही स्थान-निर्धारण में वे चूक गये हैं। पर “इतिहास दृष्टि” नामक महत्वपूर्ण पुस्तक के लेखक डॉ. मैनेजर पांडेय ने इसकी जो व्याख्या की है, वह पूर्णतः सन्तुष्ट करने वाली नहीं है। वे बताते हैं कि “यह द्वन्द्व बार-बार सामाजिकता और साहित्यिकता के द्वन्द्व के रूप में उभर कर सामने आता है।…………साहित्यिकता के मूल में अनुभूतिवाद और अभिव्यक्तिवाद का योग है और सामाजिकता के मूल में लोकसंग्रह का भाव। साहित्यिकता की कसौटी ‘शिक्षित जनता’ की चित्तवृत्ति है और सामाजिकता की कसौटी सामान्य जनता।“[13] इस व्याख्या के संबंध में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है कि “सिद्धों ने निम्न श्रेणी की प्राय: अशिक्षित जनता को प्रभावित किया, लेकिन इनकी कविताएँ शुद्ध साहित्य की कोटि में नहीं आ सकतीं।”[14]

            शुक्ल जी की इतिहास-दृष्टि के सम्बन्ध में दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि वे विधेयवादी हैं या नहीं। नलिन विलोचन शर्मा ने उन्हें विधेयवादी या ‘पाजिटिविट्स’ कहा था। मैनेजर पांडेय ने इसका खंडन करते हुए लिखा है- “आचार्य शुक्ल की इतिहास दृष्टि विधेयवादी निर्धारणवाद, तथ्यवाद, झूठी वैज्ञानिकता, विचारधारात्मक संघर्ष में तटस्थता और पुरातात्विकता का शिकार नहीं है। उनका दृष्टिकोण ऐतिहासिक और वस्तुवादी है। उनकी इतिहास दृष्टि मूल्यपरक और पक्षधर है, वे सामंती और पूंजीवादी जीवन-मूल्यों आदि का विरोध करते हैं और जनवादी संस्कृति, परम्परा तथा कला मूल्यों का पक्ष लेते हैं।”[15] डॉ मैनेजर पांडेय ने इस प्रसंग में जो बातें कही हैं, वे बड़ी अच्छी और शुक्ल जी के महत्व को बढ़ाने वाली है। पर उनमें श्रद्धा या विचार विशेष के प्रति अतिरिक्त मोह की झलक भी दिखाई देती है। पारंपरिक और प्रगतिशील चिन्तन के विकास में खतरे दोनों तरफ से आते है। पहला खतरा सामन्तवादी और पूँजीवादी व्यवस्था के पक्षधरों की ओर से होता है जो कलावाद, अपवाद आदि के नाम पर परम्परा, इतिहास समाज और साहित्य के सम्बन्ध आदि को नकारने पर बल देते है। पर दूसरा खतरा, जो कम हानिकारक नहीं होता, प्रगतिशील चिन्तन के अतिरेकी दृष्टिकोण से पैदा होता है। यह खतरा चिन्तन के विकास को रोक देता है। डॉ. मैनेजर पाण्डेय ने शुक्ल जी की प्रशंसा में इसी अतिरेकी दृष्टिकोण का परिचय दिया है। उनके कथनों से ऐसा प्रतीत होता है मानों शुक्ल जी एकदम मार्क्सवादी हो और उन्होंने जो इतिहास लिख दिया है यह ‘इदं मिथ्यम’ है। वे लिखते है मार्क्सवाद साहित्य और समाज के बीच विधेयवादी की तरह कार्यकारण सम्बन्ध भी नहीं मानता। मार्क्सवाद साहित्य और समाज के बीच रचनात्मक सम्बन्ध मानता है, वह समाज से साहित्य की सापेक्ष स्वायत्तता स्वीकार करता है। समाज के परिवर्तन और विकास में साहित्य का क्रान्तिकारी पक्षधर भूमिका पर बल देता है और साहित्य के कलात्मक सौन्दर्य तथा सौन्दर्यबोधीय महत्व की सार्थकता को भी मानता है। मुख्य बात यह है कि मार्क्सवाद साहित्य के वर्गीय स्वरूप, प्रयोजन और विचारधारात्मक रूप को पहचानते हुये साहित्य के इतिहास को समाज के वर्ग संघर्ष के इतिहास से जोड़कर देखता है। आचार्य शुक्ल अपने इतिहास और अपनी आलोचना, दोनों में सामन्ती संस्कृति, दरबारी साहित्य और पूंजीवादी कला मूल्यों एवं सिद्धान्तों का विरोध करते हैं।

            साहित्य और समाज एक दूसरे के पूरक हैं। समाज का विकास साहित्य के विकास को प्रभावित करता है और साहित्य विकसित होकर सामाजिक संस्कृति के विकास में अपना योग देता है। प्रायः समाज के विकास में रूढ़िवाद, अंधविश्वास, कुरीतियां, अशिक्षा जैसे बाधक तत्वों की भरमार होती है। समाज की तरह साहित्य की भी कुछ रूढ़ियाँ होती हैं. धारणाएँ और मान्यताएं होती हैं, जो कि उसकी प्रगति को अवरुद्ध करती हैं। डॉ. नामवर सिंह कहते है, “साहित्य और समाज के सम्बन्धों को देखने के लिए उस समाज को जानना बहुत जरूरी है, जिसमें साहित्य रचा गया।”[16]  ऐसे में विचारकों और लेखकों की चिन्ता का विषय था साहित्य को रूढ़िवाद से मुक्त करना। उसे अपने समय के राष्ट्रीय सामाजिक सवालों को ग्रहण करने योग्य बनाना तथा मानवीय मूल्यों और भावों विचारों को प्रस्तुत करना आदि। हिन्दी में यह कार्य व्यवस्थित रूप से जिन विद्वानों ने किया, उसमें आचार्य शुक्ल का नाम सबसे प्रमुख है। शुक्ल जी के आलोचना कर्म की इसी विशेषता की ओर रेखांकित करते हुए डॉ. मैनेजर पांडेय का कहना है- “आचार्य शुक्ल के लिए आलोचना केवल शब्दार्थ मीमांसा न थी। वे रचनाओं और रचना प्रवृत्तियों की व्याख्या करते हुए अपने समय के सामाजिक सवालों की चिंता करते दिखाई देते हैं। उन्होंने साहित्य चिंता को व्यापक सामाजिक चिंता के अंग के रूप में स्वीकार किया, साहित्य के विकास को हिन्दी भाषी जनता के जीवन के विकास से जोड़कर देखा और साहित्य की आलोचना को व्यापक सामाजिक ऐतिहासिक संदर्भ में समकालीन बनाने का प्रयास किया।”

            आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के प्रति अपार श्रद्धा रखते हुए भी मैं यह कहने का साहस करूँगा कि यह हिन्दी साहित्य के इतिहास की ही नहीं, भारतीय इतिहास की भी असन्तोषजनक व्याख्या है। यह आश्चर्य की बात है कि शुक्ल जी के इतिहास के प्रथम संस्करण के लगभग एक वर्ष पूर्व “की” (key) नामक अंग्रेज लेखक ने हिन्दी साहित्य का एक छोटा सा इतिहास लिखा था, जिसमें भक्तिकाल के आविर्भाव के वही कारण बताये गये थे जिन्हें शुक्ल जी ने प्रस्तुत किया हो। यह साम्राज्यवादी अंग्रेजी लेखकों का दृष्टिकोण था, जिसके झांसे में शुक्ल जी भी आ गये, ऐसा जान पड़ता है। वैसे महाप्रभु वल्लभाचार्य ने यह तो कहा ही था कि “म्लेच्छाक्रांत देश में भगवान की शरण में जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या है?” हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि शुक्ल जी ने विधेयवादी दृष्टि से हिन्दी साहित्य के इतिहास को समझने की कोशिश की थी, जो कदाचित आचार्य हजारी-प्रसाद द्विवेदी के पुनर्मूल्यांकन के बाद भी पुनर्मूल्यांकन की अपेक्षा रखती है ।

            आधुनिक युग में जिस परम्परा से आज के युवक कट चुके थे, जिस परम्परा से उनका सम्बन्ध टूट चुका था, आचार्य शुक्ल ने बहुत बड़ा काम किया कि इतिहास लिखकर उस पूरी परम्परा के साथ आज के युवा बुद्धिजीवियों को, लेखकों को जोड़ा, उससे परिचित कराया।

समकालीन आलोचना की समस्याएँ –

            यह व्याख्यान डॉ॰ नामवर सिंह द्वारा 11 फरवरी, 1982 ई॰ को बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान (पटना) के एक आयोजन में दिया गया था।

            हिन्दी नवजागरण की अवधारणा ज्ञान के प्रति विशेष प्रतिमान के अन्तर्गत, जिसे सुविधा के लिए औपनिवेशिक आधुनिकता का प्रतिमान कह सकते हैं। आधुनिकता की ज्ञानमीमांसा के निकष पर ही समस्याएँ चिन्हित की गयीं और उसी के अनुरूप समाधान सुझाए गए। इक्कीसवीं सदी तक आते-आते ज्ञान का यह प्रतिमान बदल गया। प्रतिमान बदलते ही समस्याओं की पहचान और उनके समाधान के स्वरूप में भी बदलाव आ गया। उन्नीसवीं शताब्दी की नवीन विचारधाराओं को यथावत न तो आज की समस्याओं की सम्यक् पहचान संभव है और न ही उनका समाधान। इसलिए हिन्दी नवजागरण की परिकल्पना और उसके द्वारा उठाए गए विमर्शों को नये सिरे से विचार करने की आवश्कता है। क्योंकि पुराने प्रतिमानों के अंतर्गत दिये गये जो सुझाव पहले तो सही प्रतीत होते थे, लेकिन वे अब अनुपयुक्त हो गए है।

            समकालीन हिंदी आलोचना अनेकों असुविधाजनक प्रश्नों और आपत्तियों के बीच चल रही है, जिसमें नैतिक पतन की बात प्रायः सुनाई पड़ती रहती है। एक ओर लेखकों का मानना है कि हिंदी में अच्छे आलोचकों का अभाव है, जो कृति की विशिष्टता को उभार दे और उसके ऐतिहासिक- साहित्यिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक आर्थिक मूल्यों की संश्लिष्टता और संवेदना का सही-सही मूल्यांकन करे। दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि तटस्थ होकर रचना का मूल्यांकन करते ही या असुविधाजनक सवाल या आपत्तियां उठाते ही रचनाकार निजी विद्वेष मान लेते हैं, और व्यक्तिगत संबंध खराब हो जाते है। नतीजन अच्छी आलोचना परिदृश्य से गायब है। इस संदर्भ में प्रसिद्ध आलोचक डॉ॰ नामवर सिंह का कथन दृष्टव्य है – “जिस तरह एक अच्छे रचनाकार के लिए बराबर अपनी रचना-प्रक्रिया की जांच-पड़ताल जरूरी है, उसी तरह एक आलोचक के लिए भी अपनी आलोचना की जाँच-पड़ताल जरूरी है।”[17]

            समकालीन लेखक और आलोचक के बीच संवाद है, लेकिन वाद-विवाद नहीं। वजह, रचना और आलोचना के बीच संवाद कम है लोकवृत में अनुगूंजे उठती है कि लेखक और आलोचक के बीच संबंध है। समकालीन आलोचकों को आपत्ति है कि लेखक सिर्फ प्रशंसा चाहते हैं। आलोचना करने पर या तो लेखक बुरा मान जाता है या संपादक उसे नहीं छापता यह एक अजीब स्थिति भी है कि प्रकाशक अपनी पत्रिकाओं में अपनी ही प्रकाशित पुस्तकों की समीक्षा चाहते है और उसे बाजारवादी माँग और पूर्ति के आर्थिक सिद्धांत पर प्रस्तुत करते हैं, ताकि उसे उत्कृष्ट रचना का प्रमाणपत्र मिल जाए और उसको पाठक वर्ग खरीदे। समकालीन युग में यह भी देखने को मिलता कि विमर्शो ने आलोचना को अपदस्थ कर दिया है, यह काफी हद तक सत्य है। विमर्शों कि तीव्र प्रतिकार्य के सम्मुख शांत सारगर्भित आलोचना को किनारे कर दिया गया। ‘विमर्शों’ के उत्थान ने आलोचना की उपस्थिति को कमज़ोर किया है। फ्रॉक क्लार्क ने लिखा है कि “आलोचना उस बारिश की तरह है, जो जड़ोच्छेदन नहीं करती, बल्कि लेखक को पौधे की तरह सींचती है।” आलोचना के सम्मुख मात्र यही चुनौतियां नहीं है? आधुनिक पठन-पाठन लेखन में तकनीकी क्रांति ने जो बदलाव किया है, उसने सम्पूर्ण साहित्यिक आलोचना को परिवर्तित कर दिया है।

            समकालीन कृति/आलोचना सोशल मीडिया/ विज्ञापनों माध्यम से सैकड़ों पाठकों तक आसानी से पहुंच जाती है, यहीं बाजरवाद का कमाल है। पाठकों द्वारा प्राप्त प्रतिक्रिया, समीक्षा या टिप्पणी या आलोचना का अनुशीलन करके कृति की समग्रता को समझा जा सकता है। जिस तरह की आलोचना शुक्लजी, द्विवेदीजी, से लेकर नामवर सिंह, रामविलास शर्मा, मैनेजर पाण्डेय या विजयदेव नारायण साही ने लिखी है, आज के समकालीन दौर में उसका मिलना मुश्किल है। आजकल अधिकतर पत्रिकाएं व्यक्तिगत संस्थाओं  या सरकारी विज्ञापन के अनुदान द्वारा प्रकाशित हो रही है। साहित्यिक पत्रिकाओं में बाजारवाद के अनुरूप लेखन का प्रचलन है। संपादक अपनी इच्छानुसार लेखन कराता है। लेखक प्रकाशक के रॉयल्टी निर्भर रहता है। आलोचक की आर्थिक स्थिति उससे भी बदतर है। ऐसे में आलोचना खानापूर्ति में बदल जाए तो कोई अधर्म नहीं। अच्छे आलोचनात्मक लेखन की कीमत संपादक दे सकने में असमर्थ, क्योंकि उनका कार्य बाजारवाद के अनुरूप कम लागत में आसानी से हो जा रहा है।

            समकालीन हिंदी आलोचना की इस दयनीय स्थिति के लिए रचनाकार भी जिम्मेदार है। रचनाकार ने आलोचक को कभी समकक्ष नहीं माना। आलोचना कर्म को दूसरे दर्जे का काम समझा, आलोचक को रचनाकार से निकृष्ट दर्जा दिया। डॉ॰ श्यामसुंदर दास के अनुसार – “यदि हम साहित्य को जीवन की व्याख्या मानें, तो आलोचना को उस व्याख्या की व्याख्या मानना पड़ेगा। ऐसा क्यों माना जाए ? आलोचना को जीवन की व्याख्या क्यों न माना जाए?” प्रायः आलोचना को रचनाकार व्यक्तिगत आलोचना मान लेता है, निराश या नाराज हो जाता है। कुछ आलोचक अपनी आलोचना के माध्यम से किसी रचनाकार को स्थापित और किसी को गिराने के लिए प्रयत्न करते हैं। इस संबंध में डॉ॰ नामवर सिंह का मानना है कि – “आलोचक कि सम्मति या उसका निष्कर्ष महत्वपूर्ण नहीं होता। उस निष्कर्ष तक पहुँचने की जो प्रक्रिया है, जो मूल्य प्रणाली है और उस निष्कर्ष तक पहुँचने के क्रम में आलोचक जिस मेधा का प्रदर्शन करता है, वह कभी-कभी ज्यादा महत्त्वपूर्ण हुआ करती है।”[18] स्वस्थ आलोचना सदैव व्यक्तिगत राग-द्वेष से रहित होती है। स्वस्थ आलोचना सदा रचना से संबंध रखती है न कि रचनाकर से। रचनाकार और आलोचक के व्यक्तिगत संबंधों से वह प्रभावित नहीं होनी चाहिए। “आलोचना स्वस्थ मन से साहित्य या कला का अध्ययन करना और उसके सौंदर्य को परखना सिखाती है। यही उसका परम कर्तव्य है।”[19] 

            आलोचना, साहित्य के समांतर चलने वाली रचना प्रक्रिया है। साहित्यकार जिन तत्त्वों, घटनाओं, अनुभवों का संश्लेषण कर रचना में पिरोता है, समान्यतः उन्हीं की व्याख्या एक आलोचक करता है, आलोचक अपने समय के ऐतिहासिक दबाव के अंतर्गत रचना के नवीन आर्थिक-सामाजिक- सांस्कृतिक-राजनीतिक आशय का उद्घाटन करता है और नया पाठ उपलब्ध कराता है। आलोचक इस मायने में दोहरी भूमिका निभाता है। एक तरफ वह रचना के संसार को समझता है तो दूसरी तरफ वैश्विक दुनिया में रचना की उपस्थिति का मूल्यांकन करता है तथा उसकी उपस्थिति के लिए प्रयत्नरत रहता है। समकालीन लेखकों के लिए आलोचक ‘तीसरी आंख’ की तरह होता है। आलोचना के संबंध में आलोचक के निष्कर्ष से अधिक उस प्रक्रिया में प्रयुक्त चिंतन प्रणाली अधिक महत्वपूर्ण होती है। इस संबंध में डॉ॰ नामवर सिंह के विचार दृष्टव्य है – “तर्क-युक्ति और मूल्य-प्रणाली के साथ ही किसी आलोचक की पहचान उसकी संवेदनशीलता से जानी जाती है, आँकी जाती है।” [20]

            समकालीन आलोचना अपने कठिन दौर से गुजर रही है। किसी भी भाषा का साहित्य तब तक अपने उत्कृष्ट स्तर पर नहीं पहुँचता, जब तक की उस भाषा के साहित्य की आलोचना/समालोचना/समीक्षा उच्च कोटि की नहीं होगी, पक्षरहित आलोचना, आलोचकों के द्वारा की जानी चाहिए। साथ ही समकालीन आलोचकों को उचित सम्मान तथा आर्थिक सुरक्षा की स्थिति का भी निर्माण किया जाना चाहिए।

            “नामवर सिंह आलोचना में एक और परंपरा के लिए भी याद किए जाते हैं और वह है वाचिक परंपरा। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी बहुत कुछ लिखने के अलावा उस वाचिक धारा के भी समर्थक थे, जिसकी लीक कबीर, नानक, दादू आदि की यायावरी और प्रवचनों से बनी थी। कहानी उनकी निगाह में ‘गल्प’ थी. ‘गप्प’ का तत्सम रूप, नामवर सिंह ने भी जीवन के उत्तरार्ध में वाचिक शैली में ही काम किया जिसका कुछ उपहास भी हुआ। ‘दूसरी परंपरा की खोज’ के बाद उनकी करीब एक दर्जन किताबें आईं जिनमें आलोचक के मुख से, कहना न होगा, कविता की जमीन और जमीन की कविता,  बात बात में बात आदि प्रमुख हैं। लेकिन वे ज्यादातर लिखी हुई नहीं, बोली हुई हैं। पाँच दशक से भी ज्यादा समय तक नामवर सिंह हिन्दी साहित्य की प्रस्थापनाओं, बहसों और विवादो के केन्द्र में रहे।”

            अंत में सिर्फ इतना कि हम मार्क्स के समाज को बदलने के नारे से असहमत हो सकते हैं, उसके क्रांतिकारी विचारों से अपनी असहमति दर्शा सकते हैं, उन्हें हिंसक बताकर उनसे नफरत कर सकते हैं। यही नहीं उसके पूंजीवाद विरोध को हम एकतरफा, वैचारिक दुराग्रह का प्रतीक भी मान सकते हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि पचास साल में पूंजीवाद के खात्मे की मार्क्स की भविष्यवाणी झूठ सिद्ध हो चुकी है, इसलिए उसके पूंजीवाद–विरोध में कोई दम नहीं है। लेकिन उसके दृष्टिकोण से, सर्वहारा वर्ग के कल्याण की उसकी सदेच्छा तथा उसके प्रति समर्पण हेतु किए गए सतत संघर्ष के लिए, उन कष्टों के लिए जो अपने विचारों पर दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ते हुए मार्क्स और उसके परिवार को उठाने पड़े थे, हमें उसका सम्मान करना ही पड़ेगा। इसलिए यदि दुनिया–भर में करोड़ों मजदूर, उसके नाम का एक साथ नारा लगाते हैं, जी–जान से उसको चाहते हैं, उसको अपना सच्चा हितैषी, गुरु और पथ प्रदर्शक मानते हैं, तो हमें यह मानना ही पड़ेगा कि वह व्यक्ति मनुष्यता का सच्चा हितैषी, महान विचारक, अर्थशास्त्री, समाजविज्ञानी और अपने समय का महान चिंतक था। मानवीय सभ्यता के उन महानतम चिंतकों में से एक जो शताब्दियों के अंतराल में कभी–कभी ही जन्मते हैं। इसलिए मार्क्स की मेधा, उसके संघर्ष, सोच, दूरदृष्टि, मानवप्रेम, उसकी जीवनसंगिनी जेनी और मित्र एंगल्स को हमारा नमन! शत–सहस्र नमन!

संदर्भ सूची

  1. पहल (पत्रिका) – 34, मई 1988, पृष्ठ 47
  2. खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 33
  3. बनारसीदास चतुर्वेदी द्वारा 1930 ई. में प्रेमचन्द को लिखें पत्र में ।
  4. खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 32
  5. खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 37
  6. प्रेमचंद, सोजे वतन (कहानी – संग्रह), हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, 1998, पृ. 16 
  7. खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 58
  8. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, विश्वप्रपंच (अनुवाद), (भूमिका से)
  9. डॉ॰ रामविलास शर्मा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना, पृ. 34
  10. डॉ॰ नामवर सिंह, आधुनिक साहित्य कि प्रवृत्तियां, पृ. 86
  11. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, संशोधित और परिवर्तित संस्करण, 1945 (2002 वि.), प्रथम संस्करण का वक्तव्य, पृ.-3  
  12. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, संशोधित और परिवर्तित संस्करण, 1945 (2002 वि.), प्रथम संस्करण का वक्तव्य, पृ. 3
  13. मैनेजर पांडेय, साहित्य और इतिहास दृष्टि, पिपुल्स लिटरेसी, मटिया महल, दिल्ली – 6, 1981, पृ. 104-5
  14. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, संशोधित और परिवर्तित संस्करण, 1945, पृ.-3  
  15. मैनेजर पांडेय, साहित्य और इतिहास दृष्टि, पृ. 110.
  16. खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 82
  17. खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 92-93
  18. खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 95
  19. डॉ॰ धीरेन्द्र वर्मा, हिन्दी साहित्य कोश, खंड-1 पृ. 122
  20. खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 96

[1] पहल (पत्रिका) – 34, मई 1988, पृष्ठ 47

[2] खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 33

[3] बनारसीदास चतुर्वेदी द्वारा 1930 ई. में प्रेमचन्द को लिखें पत्र में ।

[4] खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 32

[5] खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 37

[6] प्रेमचंद, सोजे वतन (कहानी – संग्रह), हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, 1998, पृ. 16 

[7] खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 58

[8] आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, विश्वप्रपंच (अनुवाद), (भूमिका से)

[9] डॉ॰ रामविलास शर्मा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना, पृ. 34

[10] डॉ॰ नामवर सिंह, आधुनिक साहित्य कि प्रवृत्तियां, पृ. 86

[11] आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, संशोधित और परिवर्तित संस्करण, 1945 (2002 वि.), प्रथम संस्करण का वक्तव्य, पृ.-3  

[12] आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, संशोधित और परिवर्तित संस्करण, 1945 (2002 वि.), प्रथम संस्करण का वक्तव्य, पृ. 3

[13] मैनेजर पांडेय, साहित्य और इतिहास दृष्टि, पिपुल्स लिटरेसी, मटिया महल, दिल्ली – 6, 1981, पृ. 104-5

[14] आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, संशोधित और परिवर्तित संस्करण, 1945, पृ.-3  

[15] मैनेजर पांडेय, साहित्य और इतिहास दृष्टि, पृ. 110.

[16] खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 82

[17] खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 92-93

[18] खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 95

[19] डॉ॰ धीरेन्द्र वर्मा, हिन्दी साहित्य कोश, खंड-1 पृ. 122

[20] खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), आलोचक के मुख से : नामवर सिंह, पृ. 96