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भारतेंदु की आलोचना दृष्टि- विवेक विक्रम सिंह

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भारतेंदु की आलोचना दृष्टि

विवेक विक्रम सिंह

शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय

संपर्क: 9717238820

शोध सार

भारतेंदु मुख्य रूप से नाटककार और निबंधकार है। इसके अलावा मुख्य रूप से कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगजीन और बालाबोधिनी पत्रिका का संपादन करते हैं। ‘नाटक’ नामक निबंध और इन पत्रिकाओं में उनके द्वारा व्यक्त किये गए विचार ही प्रमुख रूप से उनकी आलोचना दृष्टि के परिचायक है। भारतेंदु मध्यममार्गी आलोचक है। भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा से जरुरत के अनुसार चीजों को ग्रहण करते हैं और पश्चिमी ज्ञान की नवीन दृष्टि से भी प्रभावित दिखाई पड़ते हैं। नाटक में वध, आलिंगन के प्रयोग तथा पारसी कंपनियों के सस्ते फूहड़पन का भी भरसक विरोध करते हैं। जरुरत पड़ने पर अंग्रेजों की प्रशंसा करते हैं और जहाँ उनकी नीतियों से असहमत है वहां उनकी आलोचना भी करते हैं। राजभक्ति और राष्ट्रभक्ति दोनों भारतेंदु में दिखाई पड़ता है। ‘निज-भाषा’ के विकास की वकालत भारतेंदु जोर-शोर से करते हैं।

बीज शब्द: नाटक, निबंध, पत्रिका, आलोचक, प्रयोग, भाषा

शोध आलेख

आधुनिक हिंदी साहित्य में आलोचना का आविर्भाव भारतेंदु युग से होता है, जिसमें भारतेंदु का ‘नाटक’ नामक निबंध प्रमुख है। वैसे रीतिकाल में भी लक्षण ग्रंथों की परंपरा मिलती है, जहां कवि या आचार्य लक्षण ग्रंथों की रचना करते हैं परंतु उनका आधार संस्कृत काव्यशास्त्र है। आधुनिक युग में भारतेंदु के उदय के साथ हिंदी साहित्य पर पाश्चात्य प्रभाव पड़ने लगा था जिसका प्रभाव भारतेंदु के साहित्य पर भी दिखाई पड़ता है। वैसे मूलतः भारतेन्दु नाटककार थे शायद इसी कारण से ‘नाटक’ निबंध में उनका दृष्टिकोण इतना व्यापक है। इसके अलावा पत्र-पत्रिकाओं में भी उनकी आलोचक दृष्टि दिखाई पड़ती है। ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ और ‘कविवचनसुधा” में विविध विषयों से संबंधित लेख प्रकाशित होते थे। कुंवरपाल सिंह के अनुसार- “सन 1873 ई. में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ नामक मासिक पत्र निकाला। इस पत्र का कागज तथा छपाई बहुत सुन्दर थी। इस पत्र ने ‘कविवचनसुधा’ की भांति एक बार फिर हिंदी पत्रकारिता जगत में धूम मचा दी। यह विविध विषयों को लेकर चलने वाली पत्रिका थी लेकिन इसमें मुख्यतः राजनीतिक और सामाजिक लेख अधिक संख्या में प्रकाशित होते थे।”1

भारतेंदु ने जीवन और साहित्य के प्रति सुधारवादी दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने परंपरागत संस्कृत शिक्षा शास्त्र में युग के अनुरूप परिवर्तन करने में कोई संकोच नहीं किया। नाटकों की रचना के संदर्भ में वे युग प्रवृत्ति के अनुकूल परिवर्तन के पक्ष में थे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा- “वर्तमान समय में इस काल के कवि तथा सामाजिक लोगों की रूचि उस काल की अपेक्षा अनेकांत में विलक्षण है। इससे संप्रति प्राचीन मत अवलंब करके नाटक आदि दृश्य काव्य लिखना युक्तिसंगत नहीं बोध होता।”2

भारतेंदु की प्रतिभा का पूर्ण विकास नाटकों में देखा जा सकता है। ये नाटक हिंदी गद्य साहित्य को भारतेंदु की बहुत बड़ी देन है। नाटकों की रचना में उन्होंने समन्वयात्मक दृष्टिकोण अपनाया। संस्कृत नाट्यशास्त्र, बांग्ला की नाटक पद्धति तथा अंग्रेजी नाटक विधान सभी के संयोग से उन्होंने अपना नाट्यादर्श उपस्थित किया। उन्होंने ‘गर्भांक’ को ‘दृश्य’ के अर्थ में स्वीकार किया और बंग्ला नाटकों की ओर संकेत करते हुए कहा कि- “प्राचीन की अपेक्षा नवीन की परम मुख्यता बारंबार दृश्यों को बदलने में हैं और इसी हेतु एक-एक अंक में अनेक-अनेक गर्भांकों की कल्पना की जाती है।”3

नंदी पाठ, प्रस्तावना, विष्कंभक, प्रवेशक, अंकावतार, अंकमुख आदि की योजना पर उन्होंने अधिक बल नहीं दिया है। वध, आलिंगन, स्नान, यात्रा, मृत्यु आदि भारतीय नाट्य शास्त्र के अनुसार वर्जित दृश्यों की योजना भी की है। भारतेंदु ने प्राचीन संस्कृत नाटकों की चरित्र चित्रण पद्धति का अनुगमन किया; फलस्वरूप पात्रों का स्वरूप आदर्शात्मक ही रहा। पात्रों में अंतर्द्वंद्व का अभाव लक्षित होता है। अपने नाटकों में उन्होंने निम्नवर्गीय पात्रों का चित्रण नहीं किया। जहां उनका चित्रण किया भी, वहां उनका उत्थान-पतन नहीं दिखाया।

वे पारसी कंपनियों के प्रभाव को भरसक प्रयत्न करके भी पूर्णतया नहीं हटा सकें। फलस्वरूप पद्यात्मक संवादों की परंपरा उनके नाटकों में मिल जाती है। उनके नाटकों में आवश्यकतानुसार प्रयुक्त कविताओं पर रीतियुग का प्रभाव भी दिखता है। प्राचीन संस्कारों का पूर्ण परित्याग वे नहीं कर सके। गंभीरतापूर्वक विचार किया जाए तो स्पष्ट देखा जा सकता है कि ‘भारतेन्दु’ के नाटकों की आत्मा संस्कृत नाट्यशास्त्र के अधिक निकट है। संस्कृत नाट्य-विधान को उन्होंने युग की आकांक्षा के अनुकूल थोड़ा शिथिल अवश्य कर दिया है। विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार- “भारतेंदु ने नाटक संबंधी विचार नाटककार की हैसियत से व्यक्त किए हैं, समीक्षक या आलोचक की हैसियत से नहीं। वे लेख में आद्यंत रचना पर बल देते हैं और नाटककार को किन बातों पर ध्यान देना उचित है, यह बताते रहते हैं। इस लेख में उनके सर्जक का चिंतक रूप प्रकट हुआ है। अन्य काव्यांगों में जो वर्णन हम पढ़ते या सुनते हैं उसे दृश्य काव्य हमें दिखा देते हैं इसी से इसमें अधिक आनंद होता है।”4

भारतेंदु की आलोचना दृष्टि पत्र-पत्रिकाओं में भी देखने को मिलती है। पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भारतेंदु युग में साहित्य के सभी रूपों को विकसित होने का एक नवीन माध्यम मिला। इन्हीं पत्रों के माध्यम से हिंदी आलोचना का एक नया रूप भारतेंदु युग में देखने को मिला। भारतेंदु द्वारा संपादित ‘कविवचनसुधा’ और ‘हरिश्चंद्र चन्द्रिका’ में समीक्षा के स्तंभ भी रहते थे। भारतेंदु युग के अन्य पत्र हिंदी प्रदीप, भारत मित्र, ब्राह्मण, आनंद कादंबिनी आदि में भी पुस्तकों की समीक्षाएं प्रकाशित की जाती थी। इन समीक्षाओं द्वारा नए ढंग की व्यावहारिक आलोचना का सूत्रपात हुआ, जो भारतीय आलोचना के विकास में सर्वथा नवीन थी। तात्पर्य है कि एक ओर तो भारतेंदु युग में परंपरागत संस्कृत समीक्षा सिद्धांतों को विकसित करने की स्थिति निर्मित हुई और दूसरी ओर नवीन ढंग की व्यावहारिक समीक्षा का सूत्रपात हुआ। भारतेंदु ने स्त्रियों के उपयोग की दृष्टि से ‘बालबोधिनी’ पत्रिका निकाली जो चार वर्षों तक चली।

भारतेंदु के विचार उनके नाटकों में परोक्ष रूप से और निबंधों में प्रत्यक्ष रूप से व्यक्त हुए हैं। सन 1884 ई. में उन्होंने बलिया में ददरी मेले के अवसर पर ‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है’ विषय पर ओजस्वी एवं सारगर्भित भाषण दिया था। इस भाषण में भारतेंदु के दृष्टिकोण का निचोड़ आ गया है। उनके इस भाषण तथा अन्य निबंधों एवं लेखों के आधार पर कहा जा सकता है कि वे एक सच्चे समाज सुधारक और मध्यममार्गीय दृष्टिकोण रखने वाले व्यक्ति थे। डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार- “भारतेंदु ने ‘नाटक’ नाम के निबंध में आलोचना के कुछ मूल सिद्धांत स्थिर किए हैं जो हमारे लिए बहुत ही मूल्यवान हैं। उनके अनुसार मनुष्य की वृत्तियां शाश्वत न होकर परिवर्तनशील है। परिवर्तित वृत्तियों का ध्यान रखकर नाटक लिखना चाहिए। आधुनिक काल में देश-प्रेम और समाज संस्कार के नाटक लिखे जाने चाहिए। साहित्य में अलौकिक विषयों की जगह लौकिक विषयों को जगह देनी चाहिए। पुराने नियमों को युग की आवश्यकताओं के अनुसार परखकर अपनाना चाहिए। नाटक लिखने के लिए समाज का व्यापक अनुभव होना बहुत जरूरी है।”5

भारतेंदु भाषा पर भी लोगों को हिदायत देते हैं और स्वभाषा अपनाने की सलाह देते हैं-

निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।

बिनु निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय को सूल।।

भारतेंदु कई भाषाओं के जानकार थे। उनके द्वारा लिखित नाटकों की विषय-वस्तु विविधरूपी है। भारतेंदु का जीवन कम वर्षों का रहा लेकिन उतने में ही भारतेंदु ने अपने युग को एक रास्ता दिखाया। रामविलास शर्मा अपनी पुस्तक ‘परम्परा का मूल्यांकन’ पुस्तक में भारतेंदु पर विचार करते हुए लिखते हैं- “वे अंग्रेजी के अलावा बांग्ला, उर्दू आदि अनेक भारतीय भाषाएँ अच्छी तरह जानते थे। उनमें ज्ञान की अदम्य पिपासा थी। उन्होंने नाटक से लेकर पुरातत्व तक अनेक विषयों पर कलम चलाई थी। उनके जो नाटक, पद्य और निबन्ध संकलित किये गए हैं, उनका परिणाम काफी है। किन्तु इनसे बहुत बड़े परिणाम में उनका वह गद्य है, जो ‘कविवचनसुधा’ आदि पत्रिकाओं में है किन्तु असंकलित है। उन्होंने हजारों पत्र लिखे थे जिनमें कुछ बच रहे हैं, शेष नष्ट हो गये हैं। यह सब उन्होंने 34 वर्ष की छोटी उम्र में ही कर डाला। उनका सा परिश्रम करने वाले हिन्दी में बिरले ही हुए हैं।“6

भारतेंदु ने किसी कवि विशेष को विषय बनाकर आलोचना नहीं लिखी हैं। किसी विषय का वर्णन करते हुए किसी कवि का जिक्र आ गया तो उनकी समीक्षा करने में संकोच भी नहीं करते थे। मध्यकालीन संतों को वे उदार मानते थे। रामविलास शर्मा के अनुसार- “भारतेंदु ने विस्तार से कवियों आदि की आलोचना नहीं लिखी, लेकिन जहाँ तहाँ उनकी टिप्पणियों से भी उनके मूल्यांकन की विशेषता दिखाई दे जाती है। कालिदास के काव्य में चरित्र चित्रण की स्वाभाविकता की उन्होंने प्रशंसा की है। कालिदास और शेक्सपियर दोनों को मानव समाज का गंभीर समलोचक दिखाया है। ‘स्वर्ग में विचार सभा का अधिवेशन’ नाम के निबंध में भारतेंदु ने ‘दादू, नानक, कबीर प्रभृति और ज्ञानी’ लोगों को देवताओं के लिबरल दल में रखा है, जिसका अर्थ है, वह संतों की विचारधारा को उदार मानते थे। वैष्णव कावियों की परम्परा के वह स्वयं अनुवर्ती थे, यह स्पष्ट ही है।“7

भारतेंदु ने विभिन्न विषयों जैसे धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और पुरातत्व आदि पर निबंध लिखे। ‘नाटक’ नाम से आलोचना लिखकर भारतेंदु ने आधुनिक हिन्दी आलोचना को जन्म दिया। हिन्दी में व्यंग्यपूर्ण आलोचना का सूत्रपात करने वाले भी भारतेंदु ही है। रामविलास शर्मा के अनुसार- “भारतेंदु ने आलोचना में ऐतिहासिक दृष्टिकोण और सोद्देश्य साहित्य रचना के सिद्धांत ही प्रतिपादित नहीं किये, उन्होंने निर्भीक और व्यंग्यपूर्ण आलोचना की परिपाटी भी चलाई।“8

भारतेन्दु ने वैसे तो अंग्रेजी राज्य की प्रशंसा की है लेकिन जरुरत पड़ने पर उनकी आलोचना करने से भी पीछे नहीं हटते। राष्ट्रभक्ति और स्वदेशी को बढ़ावा देने का प्रबल समर्थन भारतेंदु ने किया है। भारतीय धन-संपत्ति विदेश चली जा रही है इसकी वे खुली आलोचना करते हैं। ‘पै धन विदेश चलि जात इहै अति ख्वारी’ से यह बिल्कुल स्पष्ट होता है। इसीलिये वे स्वदेशी को बढ़ावा देने की वकालत करते है। रामविलास शर्मा के अनुसार- “भारतेंदु ने मान-अपमान और संपत्ति-विपत्ति की परवाह न करके निर्भीकता से अंग्रेजी राज्य की आलोचना की। उत्तर भारत में वह स्वदेशी आंदोलन के जन्मदाता हैं, भारत में विदेशी पूंजी के शोषण के सबसे पहले आलोचक हैं। उनके साहित्य का मूल श्रोत देशभक्ति है। उन्होंने अपने साहित्य से साम्राज्य प्रेमी और रूढ़िवादी विचारधारा का प्रभाव संकुचित किया और जनता के आत्मसम्मान और उसकी राजनीतिक चेतना को जागृत किया।“9

भारतेंदु की आलोचक दृष्टि उनके संपूर्ण साहित्य में दिखाई पड़ती है जिसमें ‘नाटक’ नामक निबंध मुख्य है। नाटक में दृश्य और श्रव्य के संयोजन से जो प्रभाव पड़ता है, उसको विशिष्ट मानते हैं। ‘नाटक’ निबंध में भारतेंदु कहते हैं- यदि श्रव्य काव्य द्वारा ऐसी चितवन का वर्णन किसी से सुनिए या ग्रंथ में पढ़िए तो काव्य जनित आनंद होगा, यदि कोई प्रत्यक्ष अनुभव करा दे तो उससे चतुर्गणित आनंद होता है।

समयानुसार लोगों की रुचि भी बदलती है। अतएव साहित्यकार को भी युगानुसार परिवर्तन करना चाहिए। भारतेंदु कहते हैं- जिस समय में जैसे सहृदय जन्म ग्रहण करे और देशीय रीति नीति का प्रवाह जिस रुप से चलता रहे, उस समय में सहृदयगण के अंतःकरण की वृत्ति और सामाजिक रीति पद्धति इन दोनों विषयों की समीचीन आलोचना करके नाटकादि दृश्य काव्य प्रणयन करना योग्य है।

रामस्वरूप चतुर्वेदी आलोचना को काव्य का जीवन मानते हैं और कहते हैं- “यह आलोचना काव्य का शास्त्र नहीं काव्य का जीवन है। जो बार-बार रचा जाता है। नाटक के विकास के प्रसंग में यह देखा गया था कि अपने युग की केंद्रीय रचना वृत्ति से जुड़कर आलोचना का उदय भारतेंदु के निबंध ‘नाटक'(1883) के माध्यम से होता है।“10

‘नाटक’ निबंध में भारतेंदु प्राचीन नाट्य विधान को युग की जरूरतों के अनुसार बदलने का समर्थन करते हैं। विश्वनाथ त्रिपाठी भारतेंदु को प्रथम आलोचक मानने के पक्ष में है। विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार- “भारतेंदु ने नाटक पर विचार करते समय उसकी प्रकृति, समसामयिक जन रुचि एवं प्राचीन नाट्य शास्त्र की उपयोगिता पर विचार किया है। उन्होंने बदली हुई जनरुचि के अनुसार नाट्य रचना में परिवर्तन करने पर विशेष बल दिया है। भारतेंदु के नाटक विषयक लेख में आलोचना के गुण मिल जाते हैं। ऐसी दशा में उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का प्रथम आलोचक कहना अनुचित न होगा।“11

इस प्रकार कह सकते हैं कि भारतेंदु आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रथम आलोचक है। वे समन्वयवादी आलोचक है। जहाँ उन्हें भारतीयों का हित दिखलाई पड़ता है वहाँ अंग्रेजी शासन की प्रशंसा करते हैं, इसके बरक्स जहाँ उन्हें लगता है कि अंग्रेज भारतीय लोगों का शोषण कर रहे हैं वहाँ उनकी भर्त्सना भी करते हैं। उनकी आलोचक दृष्टि पर संस्कृत, बांग्ला एवं पाश्चत्य का मिला-जुला असर है। उनकी आलोचना दृष्टि ‘नाटक’ निबंध में स्पष्ट तौर पर परिलक्षित होती है। इसके अलावा पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके लेख उनकी आलोचना दृष्टि के परिचायक है। भारतेंदु मुख्य रूप से नाटककार है। नाटकों में व्यक्त किये गए विचार भी भारतेंदु की आलोचना दृष्टि को समझने में सहायक है।

संदर्भ सूची

  1. भारतेंदु और भारतीय नवजागरण, सं. शंभुनाथ, भारतेन्दु की पत्रकारिता, कुँवरपाल सिंह, प्रकाशन संस्थान, 4715/21, दयानन्द मार्ग, दरियागंज, नयी दिल्ली-110002, प्रथम संस्करण : 2009, पृ. 83
  2. भारतेन्दु समग्र, पृ. 599
  3. वहीं, पृ. 558
  4. हिंदी आलोचना, विश्वनाथ त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली-110002, पृ. 18
  5. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और हिन्दी नवजागरण की समस्याएँ, रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली-110002, पहला छात्र संस्करण : 2012, पृ. 149-150
  6. परम्परा का मूल्यांकन, रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली-110002, छात्र संस्करण-आवृत्ति : 2016, पृ. 106-107
  7. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और हिन्दी नवजागरण की समस्याएँ, रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली-110002, पहला छात्र संस्करण : 2012, पृ. 150
  8. वहीं, पृ. 150
  9. वहीं, पृ. 151
  10. हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, पहली मंजिल, दरबारी बिल्डिंग, महात्मा गांधी मार्ग, इलाहाबाद-211001, पृ. 169
  11. हिंदी आलोचना, विश्वनाथ त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली-110002, पृ. 19

वर्ण व्यवस्था के बंधन तोड़ती दलित आत्मकथाएं-निर्मल सुवासिया

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वर्ण व्यवस्था के बंधन तोड़ती दलित आत्मकथाएं

निर्मल सुवासिया, शोधार्थी (हिंदी), मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर

प्राध्यापक

शिक्षा विभाग, राजस्थान

E-mail – suwasiyanirmal@gmail.com

शोध सार

दलित आत्मकथाएँ दलित समाज में व्याप्त धार्मिक बंधनों एवं जकड़नों पर प्रहार करती है। धार्मिक रुढियों को जिस प्रकार दलित आत्मकथाएँ प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करती है वह जातिगत साजिशों को अनावृत करने का कार्य भी करता है। जातिगत भेदभाव की यह मानसिकता कैसे शोषण को धर्म की आड़ में सहनीय बना देती है, इसका बेबाक चित्रण दलित आत्मकथाओं में किया गया है।

बीज शब्द: दलित, शोषण, समाज, व्यवस्था, प्रभाव, शिक्षा

शोध आलेख

अखिल वैश्विक समाज में धर्म और संस्कृति का जो ताना बाना बुना गया है उस से एक बात स्पष्ट है कि धर्म की जड़ताओं ने मनुष्य को धर्मांधता में जकड़े रखा है। भारतीय समाज में धार्मिक आस्था जीवन के हर पहलू में ऐसे गुंथी हुई है कि उसे पृथक कर पाना संभव ही नहीं है क्योंकि धर्म की मान्यताओं तथा कर्मकांडों का समाज पर व्यापक प्रभाव है। इनके प्रति आस्था, अंधविश्वास की हद तक है। समाज के शिक्षित-अशिक्षित, गरीब-अमीर प्रायः हर वर्ग में इसका प्रभाव देखा जा सकता है। यह भारतीय समाज में सदियों से चला आ रहा है। लोक-परलोक, आत्मा-परमात्मा, भाग्य, कर्मफल, पुनर्जन्म, मोक्ष आदि इनके ऐसे तत्त्व हैं जिनके बारे में तरह-तरह की कथाएँ प्रचलित हैं। यह बातें लोगों के दिलों-दिमाग में इतनी गहरी उतर चुकी हैं कि चाहे किसी भी परिस्थिति में हो, उक्त मान्यताओं के बंधन से बाहर ही नहीं निकल पाते। समय की गति के साथ-साथ शिक्षा और जागरूकता में हो रही वृद्धि के कारण लोगों में तार्किकता का विकास होने के कारण ऐसे लोगों की मानसिकता और जीवन शैली में बदलाव आते जा रहे हैं किंतु दूसरी सच्चाई यह भी है कि चाहे वैश्वीकरण, उदारीकरण, सूचना क्रांति आदि की लाख दुहाई दें, गांव की हालत में आज भी उचित सुधार की दरकार है। देश की ज्यादातर आबादी गाँव में रहती है इसलिए गाँव की परिस्थितियों में समुचित सुधार आए बिना देश की हालत में सुधार की बातें करना बेमानी है।

भारतीय समाज में वर्ण और जाति व्यवस्था गहरे तक विद्यमान है। इन सब की जड़ों में पौराणिक ग्रंथों द्वारा समर्थन करने वाला धर्म है। सवर्ण व्यवस्था के तहत मंदिर में वही जा सकते हैं जिन्हें उनके धर्म ने मान्यता दी है। ऐसे में दलितों का मंदिर जाना वर्जित था। अगर कोई दलित भगवान की पूजा करता है तो उसे भी दंड दिया जाता था। यहां ध्यान देने की बात है कि दलितों के अपने देवी देवता हुआ करते थे। उल्लेखनीय है कि दलितों के देवी देवता उन्हीं के समाज के वे पात्र होते थे जो दलितों में दुस्साहसिक कार्य करते थे, बाद में मिथिकीय शक्ति से देवता में परिणत हो जाते थे। इन सब के बावजूद धार्मिक आस्था एवं धार्मिक संरचना के कारण दलित मुख्यधारा के देवी देवता के प्रति ही अधिक आस्थावान था, वे अपने ही घर में पूजा कर लिया करते थे। दलितों की पूजा के विषय में डॉक्टर आंबेडकर लिखते हैं कि, “आगरा के एक चमार ने किसी ब्राह्मण को उसके घर में विष्णु की मूर्ति की पूजा करते हुए देख अपने घर में भी ऐसा ही किया। ब्राह्मण को इसका पता चला तो वह गुस्से में लाल पीला हो उठा। उसने बहुत से गाँव वालों की सहायता से अभागे हरिजन को पटक उसकी जमकर पिटाई की और कहा तुझे भगवान विष्णु की पूजा करने की हिम्मत कैसे हुई? इसके बाद उन्होंने उसके मुंह में कीचड़ भर कर छोड़ दिया। चमार ने हताश होकर हिंदू धर्म त्याग दिया और इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया।”[1] आज भी हम देख सकते हैं कि दलितों को धर्म के प्रति कितनी यातनाएँ भुगतनी पड़ती है। वह जहाँ भी जाए उसे उसकी जाति के कारण अपमानित किया जाता है।

अशिक्षा और गरीबी के मकड़जाल में घिरे लोगों में यह देखा जा सकता है कि वे धर्म के नाम पर अंधविश्वास जनित कर्मकांडों में जकड़े हुए हैं तथा स्वाभाविक समस्याओं का समाधान भी वे उन्हीं जड़ मान्यताओं और कर्मकांडों में ढूंढते हैं जो किसी भी तरह से व्यवहारिक एवं तार्किक नहीं होते हैं। धर्म का समाज में परंपरागत रूप से किस तरह प्रभाव है, दलित वर्ग उससे किस तरह प्रभावित होता आ रहा है। उसकी दयनीय स्थिति, पिछड़ेपन और शोषण के लिए यह तत्त्व किस तरह जिम्मेदार है, इनके कारण पैदा होने वाली जीवन का परिस्थितियों से आत्मकथाकारों के जीवनानुभव अपने वर्ग के लाखों-करोड़ों लोगों की तरह कितने दग्ध है इन सब का आत्मकथाओं में अत्यंत यथार्थ पूर्वक एवं मार्मिक चित्रण हुआ है। डॉक्टर आंबेडकर ने बौद्ध धर्म ग्रहण करते हुए अपनी 22 प्रतिज्ञा में सबसे पहली प्रतिज्ञा धर्म की नकारने की करते हैं। क्योंकि दलित साहित्य अम्बेडकरवादी चेतना से निर्मित है इसीलिए दलित साहित्यकार सीधे तौर पर धर्म को नकार देते हैं। धर्म को नकारने की वजह से धर्म से निर्मित आत्मा, परमात्मा, भाग्य, मोक्ष, कर्मकांड, वर्ण-व्यवस्था इत्यादि का स्वतः ही नकार हो जाता है। दलित आत्मकथाएँ दलित समाज में व्याप्त धार्मिक बंधनों एवं जकड़नों पर प्रहार करती है। धार्मिक रुढियों को जिस प्रकार दलित आत्मकथाएँ प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करती है वह जातिगत साजिशों को अनावृत करने का कार्य भी करता है। जातिगत भेदभाव की यह मानसिकता कैसे शोषण को धर्म की आड़ में सहनीय बना देती है, इसका बेबाक चित्रण दलित आत्मकथाओं में किया गया है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार भारतीय समाज अपने प्रारंभिक दौर में चार वर्णों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के रूप में विभाजित रहा है। इसके साथ ही प्रत्येक वर्ग का कार्य विभाजन भी हुआ है और उन्हें भिन्न भिन्न जिम्मेदारियाँ आवंटित की गई जो मूल रूप से भेदभाव पूर्ण है। इन वर्णों की उत्पत्ति के संबंध में स्पष्ट रूप से मनु स्मृति में लिखा गया है “संसार की वृद्धि के लिए मुख, बाहु, जया और चरण से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद को उत्पन्न किया।”[2] इसी क्रम में इनकी श्रेष्ठता और निकृष्टता का भी निर्धारण किया गया। वर्ण-व्यवस्था असमानता पर आधारित है तथा इसमें कुछ विशेष वर्ग को सामाजिक व्यवस्था में उच्चतम पायदान पर रखा गया है। तार्किक दृष्टि से देखा जाए तो यह मान्यता ही अस्वीकृत होनी चाहिए। मनुस्मृति एवं बाद की टीकापरक व्याख्याओं ने वर्ण-व्यवस्था को स्थापित किया। वर्ण-व्यवस्था को कालान्तर में अपने हितों के लिए स्थापित किया गया। यही वर्ण व्यवस्था आगे चलकर जाति व्यवस्था में तब्दील हो जाती है जहाँ से सामाजिक अन्याय एवं शोषण अपने चरम पर पहुंच जाता है। मानवशाखी डी.एन. मजूमदार का मानना है कि “परिस्थिति किसी व्यवसाय का परिणाम नहीं है बल्कि उस धार्मिक व्यवसाय के साथ जुड़ी रहती है। झाडू बुहारना, मृतक का दाहकर्म, मृत पशुओं के शरीर से चमड़ा उतारना आदि अपावन व्यवसाय धार्मिक दृष्टि से अपवित्र होते हैं, अतः ये नीची परिस्थिति के परिचायक है।”[3] मनुष्य द्वारा की जाने वाली नौकरी को भी सवर्ण मानसिकता के अनुसार पवित्र अपवित्र घोषित कर सामाजिक हैसियत का निर्धारण कर दिया गया। जाति व्यवस्था में यह सवर्णवादी मानसिकता ही दिखाई देती है।

कौशल्या बैसंत्री जी को दोहरा अभिशाप में ऐसा ही अनुभव हुआ है। जब नाम लिखवाने के बाद स्कूल जाती है तो रास्ते में मंदिर देखकर उसके अंदर मंदिर में जाने की इच्छा बलवती होती है। एक बार वह हिम्मत करके जाती है। कौशल्या जी लिखती हैं, “गणपति के मंदिर में सिर्फ ब्राह्मण या ऊंची जाति वाले ही जाते थे। अस्पृश्यों को मंदिर में प्रवेश नहीं था… वहां के पुजारी को हमारे ऊपर शक नहीं आया नहीं तो मार पड़ती।”[4] इस तरह दलित समाज का मंदिर में जाना या प्रसाद लेना मना था। हिंदू धर्म ने दलितों के मन-मस्तिष्क पर कब्जा कर रखा था क्योंकि दलित वर्ग भी सवर्ण हिंदुओं का अनुकरण कर घर में अलग देवताओं की पूजा किया करते थे। भारतीय धार्मिक व सामाजिक व्यवस्था संस्कृति के नाम पर उत्पीड़न, अत्याचार और अंधविश्वास को बढ़ावा ही देती रही।

सूरजपाल चौहान ने अपनी आत्मकथा तिरस्कृत इस तरह के अविवेकपूर्ण मानसिकता का जबरदस्त प्रतिरोध किया है। आत्मकथा के आरंभ में ही सूरजपाल चौहान ने भंगी भक्तों द्वारा अपनी मां की हत्या का अत्यंत मार्मिक चित्रण करते हुए लिखा है, “मां ठीक होने की बजाय और अधिक बीमार होती गई। पिता ने भक्तों के कहने पर सभी देवी देवताओं की मनौतियाँ मानी। कुल आपवन, बुलाखी मसान व नेता खईस को खुश करने के लिए मुर्गे, बकरे, घों घोंटिया और दारू की बेटे चढ़ाई। आगरा जाकर बुलाखी मसान और गुड़गाँव जाकर ललिता भवानी की जोत जलायी। पिता ढोंगी-भक्तों के चक्कर में पूरी तरह कर चुके थे।”[5] दलित समाज परंपरागत रूढ़ियों, अंधविश्वासों और कुरीतियों के बीच फंसा हुआ था। इन आत्मकथाओं में इस जकड़न की फांस और इनकी पहुँच देखी जा सकती है इसलिए दलित आत्मकथाकार इसके खिलाफ खड़ा होता है। सूरजपाल चौहान ने भी अपनी आत्मकथा में इन सभी का पुरजोर विरोध किया है।

मोहनदास नैमिशराय ने अपने-अपने पिंजरे’ आत्मकथा में बताया है कि उस समय दलितों को मंदिर के अंदर जाने की इजाजत नहीं होती थी। अगर कोई जाता तो दंड भी दिया जाता था। इसी तरह के एक प्रश्न के बारे में जिक्र करते हुए लिखते हैं- “उनकी बस्ती के किनारे भी एक मंदिर था और उस में दलितों को जाने का अधिकार नहीं था। मंदिर भी उनकी जड़ खरीद संपत्ति थी। जिसके जरे -जरे पर उनका अधिकार था। हमारी बस्ती के लोग मंदिर को आते-जाते ही दूर से देखकर संतोष कर लिया करते थे।”[6] इस तरह दलितों को मंदिर के अंदर जाकर दर्शन करने का अधिकार नहीं था किंतु दलितों के बच्चों में धर्म व वर्ण व्यवस्था की समझ विकसित ना होने के कारण दूसरे बच्चों के साथ मंदिर जाने का मन करता था, मंदिर से प्राप्त प्रसाद को चखने का मन करता था। जिस आस्था के नाम पर उन्हें शोषित किया जाता था उसी आस्था में उनका हिस्सा तक नहीं था, ऐसे में कई बार उन्हें जातिगत तानों से अपमानित भी किया जाता है। नैमिशराय जी लिखते हैं कि, “तू चमार का है न सब कुछ भरपेट कर दिया। कितनी बार कहा तुम ढोरों से, प्रसाद दूर से लिया करो।”[7] ऐसी हालत में दलित बालकों पर कैसा प्रभाव पड़ा होगा वही जानते हैं। दलित बच्चों को बचपन से ही धार्मिक और जातिगत शोषण और अपमान का अनुभव हो जाता है।

दलित समाज ने हजारों वर्ष की सामाजिक यात्रा में जो भोगा है, उनके जो अनुभव है उनसे सामाजिक व्यवस्था के प्रति नकार की भावना उत्पन्न हो गई है। भारतीय समाज व्यवस्था में दलित ही है जो सदियों से विषमतावादी जाति व्यवस्था के शिकार रहे हैं। यही कारण है कि उन्हें पशुवत जीवन जीने पर विवश किया गया। सुशीला टाकभौर ने अपने जीवन में प्रताड़ना व शोषण के कई स्तरों को सहा है। वह बचपन में शिक्षा के दौरान तथा अध्यापन के दौरान कई तरह की प्रताड़नाओं से गुजरी हैं। कार्यस्थल पर लोग इन्हें दलित समझकर महत्व नहीं देते थे। हमेशा शिकायत करने के फिराक में रहते थे। सोचते थे कि कुछ ऐसी बात कहूँ कि यह अपमानित हो जाएँ। सच्चाई तो यही है कि समाज किसी वी को प्रगति की तरफ जाते हुए नहीं देख सकता और यदि वी दलित हो तो उनका शिकंजा और भी कस जाता है। एक अध्यापक द्वारा ड्राय लैट्रिन सिस्टम के समर्थन करने पर वह लिखती हैं- “तब इस काम को कौन करेगा? यदि वर्ण व्यवस्था द्वारा निश्चित कार्यों को पलट दिया जाए- शूद्र शिक्षा देने का काम करें और ब्राह्मण सफाई का काम करें तो कैसा रहेगा? वर्ण व्यवस्था बनाए रखिए, काम बदल कर करके देखिए। इस पीड़ा को, जाति व्यवस्था के इस अभिशाप को स्वयं भी भोग कर देखिए।”[8] वर्ण व्यवस्था का ऐसा विरोध दलित चेतना से ही उत्पन्न होता है और वास्तविकता में यही दलित चेतना का प्रतिरोधी स्वर भी है। सुशीला जी को सामाजिक व्यवस्था की बहुत अच्छी समझ है वह अपने आसपास के समाज को बहुत पैनी निगाह से देखती हैं और एक अच्छी व्यवस्था को लाने की कोशिश करती हैं। असल में इस व्यवस्था को समझना और उसका विरोध करना ही आंबेडकरवादी चेतना है। इस चेतना की स्पष्ट एवं निर्मम अभिव्यक्ति दलित आत्मकथा में दृष्टिगोचर होती है। सुशीला जी दलितों की दयनीय अवस्था के बारे में चिंतन करते हुए लिखती हैं- “कब मिलेगी वर्ण-भेद जाति भेद से मुक्ति। बरसों पहले दलित आंदोलन शुरू हुआ है, मगर इसका लाभ हमें नहीं मिल सका| सच यह है कि इसका लाभ हमारे लोग नहीं ले सके। वेद धर्म, ईमान और कर्तव्य को महत्व देते हैं। उन्हें जो काम सौंपा गया वे पीढ़ी दर पीढ़ी उसे ही धर्म और कर्तव्य समझ कर रहे हैं। यह आस्था, विश्वास और चिंतन हिंदू धर्म प्रचारकों ने ही उनके मन में भरा है। इन्हीं बातों को मानते हुए चल रहे हैं इसलिए पिछड़े हैं।”[9] इस प्रकार सुशीला जी अपने लोगों के प्रति एक आलोचनात्मक दृष्टि भी रखती हैं। यह दलित समाज के लिए अत्यंत आवश्यक है कि वह अपने अंतर्विरोधों को बार-बार आत्मालोचित करे। दलित चिंतन इस बात को पहचाने की यह आंतरिक अंतर्विरोध किस तरह दलित समुदाय को पिछड़ा बनाए हुए है। 

ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी आत्मकथा में वर्ण-व्यवस्था द्वारा किए गए भेदभाव का बेहद सटीक वर्णन किया है। बाल्यावस्था से मृत्यु तक एक दलित को वर्ण व्यवस्था का शिकार होना ही पड़ता है। चाहे पाठशाला हो, गाँव हो, कार्यालय हो, दलित समाज को जातिगत अपमान का घूंट पीना ही पड़ता है। वाल्मीकि जी अपनी आत्मकथा में अपने स्कूली जीवन का अत्यंत मार्मिक चित्रण करते हैं। वह बताते हैं कि विद्यालय में उनसे झाइ लगवाया जाता था और साफ सफाई भी करवाई जाती थी। स्कूल के अध्यापक सवर्ण समाज से थे। जातिगत मानसिकता उनके अंदर कूट-कूट कर भरी थी। वह बलपूर्वक बालक वाल्मीकि से स्कूल के प्रांगण की तथा कमरों की साफ-सफाई करवाते थे। गौर करने की बात यह है कि एक अध्यापक जिसके लिए सभी बच्चे समान होने चाहिए, जिसका एकमात्र कर्तव्य छात्रों को समान शिक्षा का अवसर प्रदान करना होना चाहिए किंतु जातिवादी मानसिकता का इतना असर है कि एक अध्यापक भी अपने छात्रों से जातिगत भेदभाव करता है। अपनी आत्मकथा में एक प्रश्न का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि एक बार जब वह झाड़ू लगा रहे थे तभी उनके पिता आ गए। बालक ओमप्रकाश वाल्मीकि पिताजी को देखकर रोने लगे। पिता पूछते हैं कि मुंशी जी यह क्या कर रहा है?” पिताजी को देख कर रोना आ गया और उन्हें रोते हुए देख कर पिताजी फिर पूछने लगे कि मुंशी जी रोते क्यों हैं? ठीक से बोल क्या हुआ है। इन्होंने पूरी बात बताई। सुनते ही पिताजी को गुस्सा आया और चीखने लगे। “काँणसा मास्टर है, वह द्रोणाचार्य की औलाद जो मेरे लड़के से झाडू लगाते हैं- पिताजी की आवाज सुनकर सभी मास्टर बाहर आए और पिताजी को धमकाने लगे। लेकिन धमकी का कोई असर नहीं हुआ। हेडमास्टर ने तेज आवाज में कहा ‘ले जा इसे यहां से चूहड़ा होकर पढ़ाने चला है। जा चला जा नहीं तो हाड़गोड़ दूंगा। मास्टर हो इसलिए जा रहा हूं- पर इतना बाद रखिए ये चूहड़े का पड़ेगा इसी मदरसे में और यो ही नहीं इसके बाद और भी आयेंगे पढ़ने।”[10] उस दिन पिता हार कर निराश लौट आए कुछ भी खाए-पिए बिना रात भर बैठे रहे। बाद में प्रधान जी की सहायता से बेटे को स्कूल भेजने की व्यवस्था की गई। यह प्रसंग केवल एक व्यक्ति को ही परेशान होते हुए नहीं दिखाता बल्कि यह संपूर्ण दलित समाज की सच्चाई है जहाँ पर उन्हें प्रत्येक क्षण, प्रत्येक कदम पर शोषण और अपमान का सामना करना पड़ता है। वर्ण-व्यवस्था निश्चित तौर पर यथास्थिति को बनाए रखने की ऐसी धर्मगत साजिश है जो सवर्ण समुदाय को किसी भी तरीके से लाभ की स्थिति में रखना चाहती थी। वर्ण व्यवस्था को बनाए रखने के लिए धर्म का सहारा लिया गया और ऐसे प्रावधान किए गए कि दलित समुदाय उसी में उलझा रहे। दलित समुदाय सदियों से इन प्रपंचों में उलझा हुआ है और इस शोषण को अपनी नियति मान बैठा है। दलित आत्मकथाएँ इस के खिलाफ़ मुखरता से प्रतिरोध दर्ज करने का कार्य करती है।

संदर्भ सूची

बाबा साहेब अम्बेडकर, संपूर्ण वांग्मय, खंड 9, पृ. 9

गणेशदत्त पाठक, मनुस्मृति टीका, पृ. 37

डी.एन. मजुमदार, सामाजिक मानवशास्त्र, पृ. 194

कौशल्या वैसंत्री, दोहरा अभिशाप, पृ. 27

सूरजपाल चौहान, तिरस्कृत, अनुभव प्रकाशन, पृ. 10

मोहनदास नैमिशराय, अपने अपने पिंजरे, पृ. 30

वही, पृ. 6

सुशीला टांकभौरे, शिकंजे का दर्द, पृ. 246

वही, पृ. 264

ओमप्रकाश वाल्मीकि, जूठन, पृ. 15

कौशल्या वैसंत्री, दोहरा अभिशाप, पृ. 27 ↑ सूरजपाल चौहान, तिरस्कृत, अनुभव प्रकाशन, पृ. 10 ↑

मोहनदास नैमिशराय, अपने अपने पिंजरे, पृ. 30 ↑

वही, पृ. 6 ↑

सुशीला टांकभौरे, शिकंजे का दर्द, पृ. 246 ↑

सुप्रिया अंबर (सुप्रिया सिंह जादौन) की प्रयाग शुक्ल से बातचीत

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ए.रामाचंद्रन की कला के विभिन्न चरण

सुप्रिया अंबर (सुप्रिया सिंह जादौन) की प्रयाग शुक्ल से बातचीत

प्रश्न 1- उनके प्रारंभिक दौर और उनकी केरल की पृष्टभूमि ने उनके काम को किस तरह संचालित किया होगा?

प्रयाग शुक्ल – जितना मैं समझ पता हूँ, मैं रामचंद्रन की कला पर केरल की पृष्टभूमि के प्रभाव को अधिक महत्वपूर्ण मानता हूँ जिसमे केरल के मंदिर और प्राकृतिक वातावरण का बड़ा हाँथ है. मैंने उनके वो काम देखे जब वो दिल्ली आये और कुमार गैलरी में उनके चित्रों की प्रदर्शनी शुरू हुई. तब से मेरा परिचय उनकी चित्रकला से भी हुआ और उनसे भी हुआ. उसमे जो मुझे समझ आया कि उनकी पृष्ठभूमि से भी बढ़ कर उन्हें शांतिनिकेतन में नंदलाल बोस और रामकिंकर बैज से जो ट्रेनिंग मिली थी, उससे आगे जब वो पश्चिम की कला देखते हैं, मतलब जब उनके चित्रों में डिस्टॉरशन आता है, लाइन्स का, फिगर्स का, वही उनका प्रारंभिक दौर है. क्यूंकि उससे भी पहले के चित्रों को देख कर हम ये स्वाभाविक रूप से समझ सकते हैं कि वो कहीं न कहीं शांति निकेतन से प्रभावित होंगे. लेकिन उसके बाद के चरण बेहद महत्वपूर्ण हैं इसलिए तीन खण्डों में उनकी कला को देखना उचित होगा जहाँ तक मैं समझ सकता हूँ.

पहला उनके छात्र काल में जब उनको शांतिनिकेतन में शिक्षा मिली, उससे अगला चरण है जब उनका परिचय पश्चमी कला से हुआ और वो फ्रांसिस बेकन, मेक्सिकन कला और अन्य लोगों से भी प्रभावित दिख रहे थे. ये उनको डिस्टॉरशन और मोडर्निस्टिक स्टाइल की तरफ ले जाता है जिसको हम आधुनिक कला कहने लगे हैं. उसके पहले जो शांतिनिकेतन में किया वो मॉडर्निज़्म नहीं कहलायेगा पर अब वो मॉडर्निज़्म की और मुड़ते हैं और तीसरा चरण है जब उनका डेस्टॉरशन से मोह भांग होता है और हरियाणा के पास की बेड़नियां हैं राजस्थान के भील ट्राइब्स हैं. इसके बाद वो चौथी चीज़ है उनके केरल की पृष्टभूमि जहाँ वो फिर लौटते हैं जो उन्होंने बचपन से देखी है

मैं रामचंद्रन को इस तरह देखता हूँ – “शांतिनिकेतन, पश्चमी प्रभाव, पश्चमी प्रभाव से मुक्ति और अपनी जड़ों की और फिर लौटना”.

प्रश्न 2- अपनी जड़ो की ओर उनकी जो वापसी हुई उसने उनके काम में क्या प्रभाव डाला ?

प्रयाग शुक्ल– उसमे एक चीज़ और हुई है, उसमे मिश्रण है कई चीज़ें और आ गई हैं ऐसा मैं मानता हूँ, जैसे- उनमे मिनिएचर चित्रों के प्रभाव हैं, कुछ केरल के मंदिरों के म्यूरल के प्रभाव है, और जैसा वो वहां की प्राकृतिक खूबसूरती को देखते है उसका भी प्रभाव है. किसी भी एक चीज़ को पिन पॉइंट नहीं बना सकते. और फिर वो बड़ी घटना घटती है जब ययाति बनाते ही ये सरे तत्वों का मिश्रण इकठ्ठा हो जाता है. उसमे मॉडर्निज़्म का नया इंटरप्रिटेशन है, उसके बाद प्रकृति है, केरल भी है , बंगाल भी है . ययाति उनकी सारी शैलियों का culmination है यहाँ से एक नई यात्रा शुरू होती है Madhyana (Central section of Yayati) Oil on canvas, 96by240 1986 Sandhya (Last section of Yayati) Oil on canvas, 96by240 1986 Ushas (First section of Yayati) Oil on canvas, 96 by 240 1986

प्रश्न 3- रामचंद्रन की लाइन के बारे में आप अपने विचार बताएं?

प्रयाग शुक्ल -रामचंद्रन की लाइन के बारे में मै कह सकता हूँ कि उनका काम तो हर तरह से लाइन पर ही आधारित हैं. जो उनकी ड्रॉइंग्स और स्केचेस हैं वो बेहद सुन्दर हैं, उनमे एक तरह का assertion भी है सॉफ्टनेस भी है, लाइन्स बहुत स्ट्रांग हुई हैं. उनके पोर्ट्रेट मुझे बहुत अच्छे लगते हैं. स्केचेस ही देख लीजिये परिचितों के, अपरिचितों के, काल्पनिक ! जैसा की मेरा मानना है कि कभी कभी ऐसा होता है सुप्रिया कि – एक साथ बहुत सरे तत्व किसी भी कलाकार की दुनियां में रहते हैं, ये तो हम अपनी सुविधा के लिए अलग अलग कर लेते हैं. यंग ऐज के बाद के रामचंद्रन के जो भी दौर शुरू होते हैं वो लौट लौट कर आते हैं, वो चले जाते हैं फिर आते हैं कुछ चीज़ें और जुड़ती भी है. इस तरह देखना शायद ज़यादा अच्छा होगा. वो क्रमवार देखना फिर उसी क्रम को ही अंतिम मान लेना, वो ठीक नहीं है. हम उनको गिना लेते हैं वो सबसे अच्छी चीज़ है. जैसे मैंने पहले गिनाया कि उनके कला जीवन के चार पांच दौर हैं, फिर हम ये कहते हैं कि सारे दौर लौटते हैं . ऐसा ही तो होता है और रामचंद्रन के केस में तो वाकई ऐसा ही हुआ है मतलब वो सारे प्रभाव लौटते हैं, उनका रूप बदलता है, लेकिन वो लौटते तो हैं. चूँकि वो आपके भीतर हैं और कलाकार उनको आज़मा चूका है तो वो छूट कैसे जाएंगे वो तो रहेंगे ही .

प्रश्न 4- भारतीय कला में ड्राइंग और स्केचिंग की ताकत (रियाज़) और उसके रिजल्ट को कैसे समझा जा सकता है? खासतौर से रामचंद्रन सर के सन्दर्भ में हम यह कैसे देख सकते हैं कि स्केच और ड्रॉइंग्स ने उनके चित्रों को कितनी सहायता की?

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प्रयाग शुक्ल – ये सुन्दर सवाल है! क्यूंकि अक्सर हमलोग भारतीय कला परंपरा में स्केच को और ड्राइंग को अलग नहीं करते रहे. यहाँ तक की मिडिवल पीरियड में भी देखे क्यूंकि हमारी कला परम्परा के उसके पहले के तो कोई साक्ष्य नहीं है, तब भी जो मेरी जानकारी में है कि वो लोग खाका बनाते थे. खाका में सबकुछ आजाता था. अलग से स्केचिंग की परंपरा कितनी रही ये मैं सचमुच नहीं जनता. मिनिएचर का वो खाका जो चित्रों से पहले बनाया गया जिसमे मेरा मानना है कि ये(स्केचिंग/ड्राइंग) दोनों चीज़ें शामिल हैं. उसमे स्केच हैं ड्राइंग है, लाइन्स है पोर्ट्रेट है ऐसा मुझे लगता है. यूरोपीय अर्थ में जो स्केच और ड्राइंग का फर्क है वो शायद हमारे यहाँ नहीं रहा, जितना मैं जनता हूँ. वो फर्क हमारे यहाँ शुरू होता है मुग़ल शैली के आने से क्यूंकि वो लोग पोर्ट्रेट बनाते हैं, चित्रों में कई आकृतियों को अलग लेकर आते हैं. कुलमिला इस सबको एक बड़े परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए. जैसे हमारी दक्षिणी शैली जो बहुत बड़ी शैली है जिसे हम भूल जाते हैं जैसे गोलकुंडा, बीजापुर वगैरह के मिनिएचर हैं .जैसा मैं समझ सकता हूँ कि हमारी भारतीय कला में एक साथ इतनी सारी चीज़ें हो रही होती थी जो अपूर्व हैं. दुनिय के दुसरे देशों के इतिहास से बिलकुल अलग. आप देखिये कि खजुराहो, कोणार्क, एलिफेंटा अदि के जो स्केचेस या ड्रॉइंग्स थे वो हमको उपलब्ध नहीं है. हमको जो उपलब्ध है वो उन स्कल्पचर के रूप हैं, लेकिन इससे हम ये नतीजा तो निकाल सकते हैं कि इतना आसान तो शायद वो नहीं रहा होगा कि बिना खाका बनाये ही अचानक से वो लोग तराशना शुरू कर देते होंगे.

देखिये कैलाश टेम्पल को जिसमे पहाड़ को उन्होंने काट दिया. ये तो बात समझ आती है कि हम ऐसा करेंगे कि इसमें कोई जोड़ नहीं रखेंगे, इसी एक विशाल पत्थर में इसे काढ़ देंगे . ये कितना बड़ा प्रयत्न है लेकिन जब वो वहां मूर्तियां बना रहे थे जिसमे तरह तरह की चीज़ें हैं, लाइन्स हैं जिसके बिना वो आगे नहीं बढ़ सकते जैसे खजुराहो के कैलाश मंदिर में नदियां हैं, गंगा यमुना हैं, जटाएं हैं. बहुत कुछ है जो लाइन्स की तरह ही तो आएगा. ये बहुत वृहद् मामला है इसको संक्षिप्त में नहीं बताया जा सकता. पर संक्षिप्त में ही बताना पड़ता है इसलिए बता रहा हूँ. मैं बहुत सोचता रहा हूँ, बहुत लिखता भी रहा हूँ जैसे आज की कला नाम की मेरी किताब में एक लेख है – “पुरानी चीज़ों पर पड़ने वाली नई रोशनी”. मतलब जो पुराना है उससे नया कैसे देखा जायेगा. बहरहाल मेरा ये पक्का मानना है कि भारतीय कला में अचानक इतना कुछ नहीं बनाया जा सकता है बिना किसी खाके को सामने रखे . वही खाका जिसको आज हम ड्राइंग या स्केच कहेंगे . अब वो उपलब्ध नहीं हैं ये अलग बात हैं. कल्पना मेरी यही कहती है, मेरा अनुमान है कि ऐसा कुछ तो रहा होगा. और यदि नहीं रहा होगा तो कम से कम गुरु शिष्य परम्परा जैसा कुछ रहा होगा जिसमे गुरु बताता जाता होगा और आप उसको तराशते जाते हैं. इतनी बड़ी तराश की मैं चकित हूँ हमारी भारतीय कला से. मैं जब जब गया देखता रह गया. मैं ही नहीं ऑक्टोवियो पाज़ जैसे कला का चिंतक जब एलिफेंटा में जाते हैं और कविता लिखते हैं उस पर, तो वो भी दंग रह जाते हैं. इन असाधारण चीज़ों की बड़ी कला परंपरा का जो एक आधुनिक रूप हम जिनमे देखते हैं जिनके काम में वो परंपरा का प्रभाव है रामचंद्रन उनमे से एक हैं. क्यूंकि बाकि आधुनिक कलाकारों के पास ये नहीं है. आधुनिक काल के एक हुसैन और एक रामचंद्रन जिन्होंने परम्परगत तत्वों को अपने चित्रों में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया. उन पर काम किया, बोला-,कहा. और इनके पास लाइन्स बहुत स्ट्रांग हैं.आपको और कोई नाम नहीं सूझेगा जिन्होंने हमारी माइथोलॉजी पर चित्र बनाये हैं, आधुनिक भी है रूरल भी है ट्राइबल भी है यही दो नाम हैं. आप देख लीजिये कि अजंता एलोरा का जुड़ाव रामचंद्रन से कितना गहरा रहा ही है.

प्रश्न 5- आप रामचंद्रन और एम् ऍफ़ हुसैन को किस सन्दर्भ में एक तरह का मानते हैं ?

प्रयाग शुक्ल – देखिये एम् एफ हुसैन और रामचंद्रन में समानता तो हैं ही नहीं! मैं केवल सन्दर्भ की बात कह रहा हूँ न कि किसी तुलना की. मैं ये कह रहा हूँ कि ये दो कलाकार ऐसे दिखाई पड़ते हैं जिन्होंने परंपरा को लेकर ज़यादा संज्ञान लिया है. मतलब उसको लेकर चित्र बनाये हैं. लोक है!रामयण है! महाभारत है! उनके यहाँ भी ऐसे पात्र हैं जो हमारे साहित्य और हमारे माइथोलॉजी से हैं. इसमें किसी को भी छोटा या बड़ा करने की बात नहीं है. कला की दुनियाँ में यही सबसे सुन्दर बात है कि सबकी अपनी जगह है, तुलना हो ही नहीं सकती, उसमे कोई प्रतियोगिता हो ही नहीं सकती. सबका एक स्थान है.

जोगेन चौधरी ने एक बड़ी सुन्दर बात कही की “न यहाँ कोई तुलना है न कोई प्रतियोगिता है! हम सन्दर्भ की बात बेशक कर सकते हैं”. वो कितनी सिंपल बात कहते हैं. मैं भी जनता था और हम सभी जानते हैं पर इस पर थोड़ा काम ध्यान जाता है. मैं सन्दर्भ के हिसाब से कह रहा हूँ कि उन्होंने जिन चीज़ों को लेकर काम किया है उनके पास ज़यादा सन्दर्भ हैं. जैसे रामकुमार हैं, सूज़ा हैं, कृष्ण खन्ना हैं. ये अलग तरह से दिखते हैं. हुसैन और रामचंद्रन भी भिन्न हैं लेकिन इस मामले में इनमे एक समानता दिखती है कि आप एक सारी कला परंपरा का अपने काम के सिलसिले में संज्ञान लेते हैं, उससे इंटरैक्ट करते हैं.

प्रश्न 6- रामचंद्रन सर की निरन्त ड्राइंग और स्केचिंग की प्रक्रिया का कितना अनुसरण किया जाना चाहिए? उनकी इस आदत ने उनके चित्रों को कितना लाभ पहुँचाया है ?

प्रयाग शुक्ल – इसको उनका स्वभाव भी माना जा सकता है. लगातार इस प्रक्रिया और स्वभाव का जो लाभ हुआ है वो बहुत बड़ा और गहरा है उनके चित्रों में. क्यूंकि वो फिगरेटिव काम करते हैं, फूल पत्ते बनाते हैं और बड़े सुघड़ ढंग से बनाते हैं. सुघड़ ढंग से बनाने की जो क्षमता है उसमे रेखा को आकार से घेरना है. जैसे मान लीजिये उनके सरोवर वाले तो बहुत चित्र हैं, कमलताल के भी हैं, वो सब इस रियाज़ के बिना संभव ही नहीं थे. मान लीजिये कि अमूर्तन में भी कमल बना सकते हैं परन्तु वो उस रूप में संभव नहीं थे जिस तरह से भारतीय कला परंपरा में आकृतियों का, वनस्पतियों का, जीवों जंतुओं की आकृतियों का उन्होंने किया है. क्यूंकि देखिये ये भी कितनी सुन्दर बात है कि आपने देखा है रामचंद्रन जी स्वयं अपने को अपने चित्रों में किसी न किसी रूप में रखते हैं, कभी कभी तो किसी जीव जंतु के रूप में भी रखते हैं. ये जो लाघव है ,अपने ही पोर्ट्रेट को रूपांतरित करने का एक ढब है वो तो संभव ही नहीं जब तक आपकी अच्छी पकड़ न हो रेखाओं पर, और आप लगातार ड्राइंग करते हों, स्केचिंग करते हों!

तो इस एक घटना से ही आप देख लीजिये की उनको कितना लाभ हुआ होगा स्केचिंग और ड्राइंग का. जब भी मैं उनके चित्रों में देखता हूँ कि वो भी तितली बन गए हैं, पक्षी और कछुआ बन गए हैं तो आनंद बढ़ जाता है.

प्रश्न 7- रामचंद्रन सर के चित्रों में हम इम्प्रेशनिस्ट ट्रीटमेंट के बजाय बहुत साफ़ सुथरे तरीके से आकारों को उनके आउटलाइन को स्पष्ट देख सकते हैं जो की इसी दौर के अन्य लोगों में इतनी प्रमुखता से नहीं पाया.

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प्रयाग शुक्ल– मतलब वो ज़यादा रीयलिस्टिक हैं ये कह सकते हैं! लेकिन इसके साथ साथ मैं एक चीज़ और कहूंगा कि ये बात सही है कि वो गायतोंडे नहीं हैं, वो रामकुमार नहीं हैं, यहाँ तक की तैयब मेहता से भी बहुत भिन्नता है. हालांकि तैयब भी रीयलिस्टिक ढंग से ही बनाते थे जैसे की रिक्शा है तो रिक्शा दिखाई देगा. लेकिन वो पूरी तरह से रिक्शा नहीं होता था. हालांकि मैं ये तुलना के लिए नहीं बता रहा केवल उदाहरण के लिए ये नाम ले रहा हूँ. जैसे कृष्ण खन्ना में देखिये आभास बहुत से हैं, जैसे आपको आभास है कि कोई जा रहा है या की मजदूर बैठे हैं, या की बैंड वाले हैं. वो भी रीयलिस्टिक हैं लेकिन उस हद तक रीयलिस्टिक नहीं जिस हद तक रामचंद्रन हैं. आप सही कह रही हैं, मतलब की रामचंद्रन अपनी पीढ़ी के एकमात्र चित्रकारों में हैं जिनके यहाँ चीज़ें साफ़ सुथरे ढंग से साफ़ सुथरी दिखती हैं. उनके गहरे मित्र परमजीत सिंह और अर्पिता सिंह हैं, लेकिन ये बात तो सही है की इस सारे परिदृश्य में रामचंद्रन अपने समकालीनों में एकदम अलग ही दिखते हैं. और जिसका कारण यही है जिसकी आप चर्चा कर रही हैं उनका वैसा होना है.

लेकिन इसमें मैं एक बात ज़रूर जोड़ना चाहता हूँ वो ये कि रीयलिस्टिक ढंग से बनाई गई चीज़ें भी अगर गहरा इम्प्रैशन नहीं छोड़ती तो फिर वो अच्छी कला नहीं होती. रामचंद्रन ने कुछ ऐसी विधियां भी निकली हैं कि आप पर उनकी छाप भी पड़ती और जो सदा के लिए आपके भीतर ठहर जाती हैं. आप खाली उसको देखते नहीं हैं, उसके कई तरह के इम्प्रैशन आपके मन में उतारते हैं. यही तो उनकी सफलता है अगर ये नहीं होता तो चित्र बहुत सपाट होते. अभी जो उदाहरण मैंने दिया- “वो किस कारण से स्वयं को चित्रों में बनाते हैं” जैसे वो एक कल्पना कर रहे हों कि एक कलाकार अपने चित्रों में भी है और वो शायद अपने को समय में भी रख कर देख रहा है! कि ये चीज़ें हैं और मैं भी इसमें कहीं मंडरा रहा हूँ. वो एक दूसरी तरह का भाव है विचार है. वो किसी पुनर्जन्म वाला न भी हो, लेकिन ये लगता है कि मैं मौजूद हूँ सृष्टि में. ऐसी चीज़ें जो वो करते हैं उससे उनके चित्रों का रिअलिस्म कुछ और हो उठता है. नहीं तो मान लीजिये कि सीधे से आप कुछ बना दो तो फिर आपको लगेगा की चलो देख ली मैंने तितली ! देख लिया मैंने एक फूल ! पर जब मैंने देख ली तितली और देख लिया एक फूल से आगे आप इस स्तर पर उनके चित्रों को देखने लगते हो तो आनंद दूसरा हो उठता है इसका मतलब कि उनको भान है कि रीयलिस्टिक भी हो लेकिन उसमे कुछ ऐसी चीज़ें उभरे जो नॉट लाइक इम्प्रेशनिस्ट पर जिनके इम्प्रैशन आभास की तरह नहीं होते हुए भी गहरे इम्प्रैशन हों. यही उनकी पहचान है.

प्रश्न 8- रामचंद्रन के चित्रों के लिए क्या ये कहना चाहिए की उन्होंने एक परंपरा को स्थापित किया है?

प्रयाग शुक्ल – देखिये जहाँ तक परंपरा की बात है कोई आर्टिस्ट परंपरा तो नहीं बनाता, यहाँ तक की जो ग्रुप्स होते हैं उनकी भी परंपरा नहीं बन सकती, बनती भी नहीं है. परंपरा बनने के लिए दूसरी तरह की चीज़े चाहिए होती हैं, जैसे मान लीजिये की हमारे मिनिएचर चित्रों की परंपरा है तो एक अलग बात हो गई. रामचंद्रन ने एक काम तो किया इस दौर में जब अमूर्तन का भी दौर हो, आभासी का भी दौर हो तो, उस दौर में आप इतना रीयलिस्टिक काम कर रहे हों तो इसको लेकर मेरा मानना कहीं ये भी है कि एक ये चीज़ तो उनके कारण स्थापित हुई है. वो इस रूप में हुई है कि रेअलिस्म को खारिज नहीं माना गया कि अब ये हमारे काम का नहीं रहा. बहुत सारे लोगों ने उनसे प्रेरणा ली होगी ऐसा मैं मानता हूँ. जैसे एक नाम मेरे ख्याल में आ रहा है हालांकि कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है वो नाम है जय झरोटिया का और इसको ये नहीं कहना चाहिए कि हम इन दो नामों को जोड़ रहे हैं पर जाने अनजाने भी तो चीज़ें होती हैं. उनके यहाँ भी कुछ ऐसी चीज़ें मिलती हैं. मुझे इसलिए ये बात याद आई कि इस बहाने जो युवा लोग आते हैं और जो कोई स्पष्ट तरीके से काम करने वाला है तो उसको एक सहारा मिलता है कि उसके चित्रों को स्वीकार किया जाएगा. क्यूंकि मान लीजिये अगर ऐसे चित्रकार परिदृश्य में न रहें तो जो नया है वो थोड़ा सा घबराएगा कि मैं जो करने चला हूँ वो है भी सही या नहीं ? मैं आपकी बात से ही सोच रहा हूँ कि- क्यूंकि ये तो सच्चाई है कि हमारे यहाँ जिन लोगों ने फिगरटिवे में काम किया वो उतने स्पष्ट ढंग से तो नहीं किया. जैसे मान लीजिये गुलाम शैख़ हैं भूपेन खक्कर हैं और पूरा बड़ोदा स्कूल तो फिगरेटिव का माना ही जाता है कि वो कोई अमूर्त काम नहीं कर रहे हैं. उस सब के बीच में भी कुछ ऐसे लोग निकले- मैं फिर कहूंगा कि कोई सीधा सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहिए. जैसे शम्पा सर्कार दास हैं – हिरन बना दिया तो रीयलिस्टिक हैं,फूल पत्ते बना दिया तो रीयलिस्टिक हैं, थोड़ा थोड़ा आभासी भी हैं लेकिन नब्बे प्रतिशत रीयलिस्टिक पर ही केंद्रित हैं. अब मुझे ये नाम क्यूँ याद आ रहे हैं? हो सकता है कि कोई उनकी सीधी प्रेरणा न हो उनके मन में लेकिन दर्शक के लिए तो है. जैसे मेरे लिए बना दी, एक और आयाम खुला कि यदि मैं सोचने बैठूं कि वो कौन से लोग हैं जो इस तरह से काम कर रहे हैं तो ऐसे में किसी समय की कला को जांचने का एक दूसरा आनंद होता है . तो मैं इसको इस तरह से देखता हूँ कि जब हम किसी एक दौर की कला को जांचते हैं तो ये चीज़ें होती हैं. उसमे बहुत से नाम याद एकदम से अभी नहीं आरहे लेकिन हैं जिन्होंने रीयलिस्टिक में इस तरह के काम किये हैं. मैं तो ये भी कह सकता हूँ कि हमारे यहाँ फिगर का, ड्राइंग का अमूर्तन से अधिक इस्तेमाल हुआ है बाद की पीढ़ियों में. असल में किसी भी कलाकार की केंद्रीय उपस्थिति जो रामचंद्रन की है, वो केंद्रीय उपस्थिति आपको एक यात्रा कराती है कि देखें और कौन लोग हैं जो इस तरह से काम कर रहे हैं. ये सवाल मन में उठते हैं. और जितना हम जानने लग जाते हैं उतना ही हमारा आनंद दुगना हो जाता है. और फिर उनका एक पक्ष तो वो राजा रवि वर्मा वाला है ही चाहे उनके प्रशंसक होने का हो या उनके योगदान को स्वीकार करने का. रामचंद्रन का जिस प्रकार का रीयलिस्टिक होना है वो आपको कई तरह के विचारो की तरफ ले जाता है की इससे हमारे कला जगत में क्या बना ? रामकुमार की उपस्थिति आपको अमूर्तन की ओर ले जाती है, अम्बा दास की उपस्थिति अमूर्तन की ओर ले जाती है. हम उसी ओर सोचना शुरू करते हैं. स्वामीनाथन की उपस्थिति में एक और तरह की बात है कि एक हल्का सा आभासी भी है रीयलिस्टिक भी है उसमे बहुत कुछ मिला जुला है. वो एक अलग सन्दर्भ बनाते हैं. मेरा तो सुप्रिया रेंज में बहुत बड़ा विश्वास है. यानि अगर रेंज न हो और सब लोग एक जैसा काम करने लगें तो दृश्य कितना विचित्र होगा. इसके बावजूद की कलाकार भी एकदूसरे काम पसंद नहीं करते लेकिन हमे दर्शकों को रेंज चाहिए. जैसे रामचंद्रन ने मुझे स्वयं एक किस्सा सुनाया, कई बार इसे वो मंच से भी बोल चुके हैं कि एक बार त्रिवेणी में उनकी प्रदर्शनी चल रही थी और तैय्यब उनको अलग से कहीं मिले तो उन्होंने कहा कि एक बार देख तो लो. वो जानते थे कि तैय्यब उनके काम को पसंद नहीं करते लेकिन ये सब चीज़ें कला जगत के कलाकारों के बीच तक ही होती हैं दर्शक को तो अलग अलग रेंज चाहिए न! ये तो नहीं न की सब लोग तैय्यब बन जाएँ या रामचंद्रन बन जाएँ. मुझे तो दोनों चाहिए न !

अनजाने में रामचंद्रन ने जो कंट्रीब्यूशन कर दिया है वो ये तो है ही की वे कलाकार जो रीयलिस्टिक तरीके से भी काम करते हुए अपने काम के लिए स्वीकृति चाहते हैं उनके लिए एक बहुत बड़ा आधार है उनका काम ! और वो अनजाने में ही होता है !

प्रयाग शुक्ल

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परिचय- कवि, कथाकार, निबंधकार, कला व फिल्म समीक्षक

मई १९४० को कोलकाता में जन्मे प्रयाग शुक्ल ने कोलकाता विश्वविद्यालय से स्नातक किया. यह जो हरा है, इस पृष्ठ पर, सुनयना फिर यह न कहना”, यानी कई वर्ष समेत दस कविता संग्रह, तीन उपन्यास, छह कहानी संग्रह और यात्रा वृतांतों कि भी कई पुस्तकें प्रकाशित. कला सम्बन्धी पुस्तकों में “आज की कला”, हेलेन गैनली की नोटबुक और फिल्म समीक्षा की पुस्तक “जीवन को गढ़ती फ़िल्में” चर्चित-प्रशंसित हैं. सम्पादित पुस्तकें : कल्पना काशी अंक, कविता नदी, कला और कविता, रंग तेंदुलकर, अंकयात्रा. बाल साहित्य में आधा दर्जन से अधिक प्रकाशित हैं. वर्तमान में दिल्ली में निवास और कार्यरत हैं

मोबाइल – 9810973590

सुप्रिया अम्बर

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परिचय- रिसर्च स्कॉलर सुप्रिया अम्बर रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर से पद्मभूषण चित्रकार ऐ. रामचंद्रन के ड्रॉइंग्स और स्केचेस एवं स्टडीज पर अपना शोध कर रही हैं. सुप्रिया की कई कवितायें देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपी हैं और बांग्ला, गुजरती, पंजाबी, मराठी, अंग्रेजी में अनुवादित हुई हैं. कई वर्षों तक लीगल जर्नलिज्म करते हुए मध्यप्रदेश उच्च न्यायलय में कोरेस्पोंडेंट रही. चित्रों की कई एकल एवं समूह प्रदर्शनी. वर्तमान में जबलपुर में स्वतंत्र कलाकर्म में संलग्न साथ ही विभिन्न कला विषयों पर शोध पत्रों का लेखन जारी.

मोब -9425544328, 9039044328

Email- supriyaamber16@gmail.com

वरिष्ठ आलोचक, सर्जक विश्वनाथ त्रिपाठी जी से प्रियंका कुमारी की बातचीत

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मैं उबलता हुआ पानी जिसे भाप बन कर ख़त्म होते रहना है …

वरिष्ठ आलोचक, सर्जक विश्वनाथ त्रिपाठी जी से प्रियंका कुमारी की बातचीत

नाम-प्रियंका कुमारी

पी.एच.डी. शोधार्थी

जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली

फोन. 7678118393

समकालीन आलोचना जगत् में वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। एक आलोचक के साथ-साथ आप एक सफल सर्जक, इतिहासकार, गद्यकार एक कुशल अध्यापक और एक अच्छे शिष्य भी रहे हैं । आमतौर पर माना जाता है कि एक सफल आलोचक का सफल सर्जनात्मक लेखक होना या सफल सर्जनात्मक लेखक का सफल आलोचक होना प्रायः संभव नहीं होता लेकिन विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपने साहित्य के माध्यम से इस मान्यता को गलत साबित किया है ।

आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं- हिन्दी आलोचना – 1970 ,लोकवादी तुलसीदास – 1974, प्रारम्भिक अवधी – 1975, मीरा का काव्य – 1979, हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास – 1986 (2003 में हिन्दी साहित्य का इतिहास : सामान्य परिचय नाम से पुनः प्रकाशित),देश के इस दौर में (परसाई केन्द्रित) – 1989 , हरिशंकर परसाई – 2007, कुछ कहानियाँ : कुछ विचार – 1998, पेड़ का हाथ (केदारनाथ अग्रवाल केन्द्रित) – 2002, केदारनाथ अग्रवाल का रचना लोक, जैसा कह सका, नंगातलाई का गाँव (स्मृति-आख्यान) – 2004, गंगा स्नान करने चलोगे -2012 ,अपना देस-परदेस (विविध विषयक आलेख एवं टिप्पणियाँ) – 2010, व्योमकेश दरवेश (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की जीवनी एवं आलोचना) -2011, गुरु जी की खेती-बारी (संस्मरण) – 2015, उपन्यास का अन्त नहीं हुआ है – 2015 , कहानी के साथ-साथ – 2016, आलोचक का सामाजिक दायित्व – 2016 ।

प्रश्न- आपका जन्म कहां और किस परिवेश में हुआ था ?

उत्तर- मैं अपने ननिहाल में पैदा हुआ था। मुझसे पहले मेरा एक वड़ा भाई था लेकिन बड़े भाई की मृत्यु हो चुकी थी, उसके मृत्यु के लगभग 7-8 वर्ष बाद मेरा जन्म हुआ। सन् 1931 ई. में उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के बिस्कोहर गाँव के एक निम्नमध्यवर्गीय किसान बाह्रण परिवार में मेरा जन्म हुआ था। बिस्कोहर गाँव हिमालय की तलहटी में बसा हुआ है बिस्कोहर गाँव होने के साथ-साथ एक छोटा कस्बा भी था इसलिए उसे बाजार भी कहते थे। वहाँ आसपास के किसान अपने-अपने उपज को लेजाकर बेचते थे। वहाँ दवाई, सब्जी, मिठाई और कपड़ों की छोटी-छोटी दुकानें थी। उस समय मेरे गाँव में भी पूरे भारत के समान स्वाधीनता की लहर थी।

प्रश्न-आपकी शिक्षा-दीक्षा कहाँ हुई ?

उत्तर-मेरे गांव में प्राथमिक स्कूल था। लेकिन पहले मेरी शिक्षा वहाँ नहीं हुई क्योंकि कोई मुझे लेकर स्कूल में दाखिला कराने नहीं ले गया था । मेरे गाँव में एक शिवाला(मंदिर) था । उसमें पंडित जी पढ़ाते थे वह नियमित रूप से ना कोई वेतन पाते थे ना वहां पर पढ़ाते थे। वहाँ कक्षाएँ नहीं होती थी। जिसको जो मन करता था वह वहाँ जाकर वह पढ़ लेता था । मेरे पड़ोस के एक-दो लड़के वहाँ जाते थे तो मैं भी उनके साथ पढ़ने चला जाता था। कोई फीस वगैरह नहीं होती थी । होता यह था कि किसी पर्व-त्यौहार के दिन उनको कुछ दे दिया जाता था( अनाज दे दिया जाता था) क्योंकि उनका कोई नियमित तनख्वाह नहीं था। कुछ दिन बाद मैं प्राथमिक स्कूल जाने लगा दर्जा चार तक मैंने वहाँ पढ़ाई की। फिर गांव में एक माध्यमिक स्कूल भी खुल गया । यह भी सरकारी नहीं था चंदे से चलता था । बीच में माध्यमिक स्कूल बंद हो गया कक्षा सात का एग्जाम मैंने प्राइवेट तौर पर दिया। फिर आगे की पढाई बलरामपुर कस्बे में, उच्च शिक्षा कानपुर और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में तथा  पीएच०डी० मैंने पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ से की।

प्रश्न-साहित्य के प्रति आपके मन में रुचि कब जगी ?

उत्तर-बचपन से ही साहित्य के प्रति मेरी रुचि थी । जब मैं केवल छह साल का था तब मेरे गाँव में कांग्रेस सरकार बनी थी वहां पर पुस्तकालय खुले वहां पर तरह-तरह की किताबें पढ़ी । मेरे गांव में पंडितो का मोहल्ला था वहाँ के ओरी पंडित ने मुझे आठ वर्ष के उम्र में ही भारत भारती जो मैथिलीशरण गुप्त की है पड़ने को दिया था और मैं उसको पुरा पढ़ गया अभी तक मुझे उसके बहुत सारे पंक्तियाँ याद हैं-

लोक का गौरव प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ ?
फैला मनोहर गिरी हिमालय और गंगाजल जहाँ ।
सम्पूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है,
उसका कि जो ऋषिभूमि है, वह कौन ? भारत वर्ष है॥
हाँ, वृद्ध भारतवर्ष ही संसार का सिरमौर है,
ऐसा पुरातन देश कोई विश्व में क्या और है ?
भगवान की भव-भूतियों का यह प्रथम भण्डार है,
विधि ने किया नर-सृष्टि का पहले यहीं विस्तार है॥

एक और पंडित जगदंबा प्रसाद पांडेय जी थे जिनका उल्लेख मैंने नंगातलाई का गाँव में किया है पंडित जी कविता भी करते थे और आर्य समाजी भी थे। उनकी कविताएँ आर्य्यमित्र में भी छपी थी, कविताओं के बारे में बहुत बात करते थे। उनकी कविता की पंक्ति – मुल्क को तक़सीन करवाया है दोनों जीम ने (जीम फ़ारसी लिपि का जीम वर्णं, जिसका आशय जिन्ना और जवाहरलाल से है)

गाँव के एक और पंडित जी थे वो भी कविता लिखते थे । इश्तहार के रुप में पर्ची छपवा कर बाँटते थे । वे रसिक संप्रदाय के थे राम जी की उपासना करते थे वो शायर थे मैंने उर्दू इसलिए सिखा क्योंकि वह गाँव के वातावरण मैं था। सबसे पहले कविता का संस्कार मुझे गाँव से ही मिला।

प्रश्नः आपने अपने कर्म जीवन की शुरुआत कब की?

उत्तर-मेरा जन्म गाँव के एक बाह्रण परिवार में हुआ था। लेकिन मेरे यहाँ पुरोहिती का काम नहीं होता था । मेरे पिताजी पुरोहितों को अच्छा नहीं मानते थे। पिताजी धार्मिक थे लेकिन कर्मकांडी नहीं थे । वहाँ पैसे के लिए ना कोई अवकाश था ना कोई क्षमता। सबसे पहले जो पैसा है वह बलरामपुर जब पढ़ने के लिए जा रहा था तो पिताजी ने ₹5 दिया था। बलरामपुर में जीजा के पास आगे की पढाई करने के लिए गया जीवन का वास्तविक सामना वहीं हुआ । उससे पहले कभी- कभी श्राद्ध पर जाता था तो कोई कोई 2 पैसे दे देता था औऱ कभी नहीं भी देता था ।मैंने कई बार ट्यूशन पढ़ाने की कोशिश की लेकिन नियमित नहीं पढ़ा पाने के कारण कोई पैसा भी नहीं देता था । एक दुकानदार से ट्यूशन का पैसा लेने गया तो दुकानदार वालों ने कहा तुम भागो यहां से पैसा वैसा कुछ नहीं मिलेगा तुम पढ़ाते नहीं हो । क्लास आठवीं में सबसे ज्यादा नंबर आने पर मुझे 8 रुपये प्रतिमाह सरकार द्वारा वजीफा मिलता था। लेकिन जेल जाने पर वह भी बंद हो गई थी । 15 नवंबर, 1958 को देवी सिंह बिष्ट महाविद्यालय नैनीताल में अध्यापक नियुक्त हुआ। 8 अक्टूबर, 1959 को किरोड़ीमल कॉलेज दिल्ली में नियुक्ति हुई। बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर में अध्यापन। 15 फरवरी, 1996 को 65 वर्ष पूरे होने के बाद सेवानिवृत्त हो गया।

प्रश्नः आपने सर्जनात्मक रचना भी की है और आलोचनात्मक भी दोनों लिखते समय आपको क्या विशेष तैयारी करनी पड़ती हैं?

उत्तर- आप ये समझिये कि जब मैं विद्यार्थी था तो में वाद-विवाद, कविता प्रतियोगिता में बहुत भाग लेता था। लेकिन साहित्य में एक तरह से दीक्षित होकर मैंने कभी भी साहित्य की सर्जना नहीं की। मैंने कोई योजना बनाकर इस विधा में लिखना है इस तरह से कभी नहीं लिखा । जब मैं बनारस आया तब मुझे बनारस का वातावरण बिल्कुल अलग लगा। वहां का वातावरण साहित्यिक आभा से मंडीत था । मैं वहां अपने आप को खोया हुआ समझता था ।जैसे गांव का कोई आदमी नगर में आकर खो जाता है। बनारस में मुझे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का सानिध्य मिला और नामवर सिंह तथा केदारनाथ सिंह का साथ मिला। वहां पर अक्सर प्रगतिशील लेखक संघ की बैठकें होती थीं। मैं वहां जाता था। मैं कवि सम्मेलन में भी जाता था ।मेरा भी मन करता था कि मैं कविता लिखूँ । मैं जिस हॉस्टल में रहता था वहां शर्म के मारे खाना खाने नहीं जाता था, क्योंकि मेरे पास पैसे नहीं होते थे। वहां के महाराज ने कहा कि आप चिंता मत करो मैं आपको यहीं पर खाना लाकर दे दिया करूंगा उन्होंने कहा कि मेरा खाना खाकर बहुत सारे लोग बड़े बने हैं । इम्तिहान भी पास आ गया था। उस समय ऐसा लगता था कि जैसे कोई आदमी रेगिस्तान में खड़ा है। मैं बहुत चिंतित रहता था, एक दिन मैं सोच रहा था कि पढ़ाई लिखाई तो मैं कर रहा हूं लेकिन नौकरी कहां मिलेगी? मैं अपने परिवार के लोगों की क्या सहायता कर पाऊंगा? जो मुझसे इतना उम्मीद करते हैं । फिर डायरी में मैंने कुछ पंक्तियां लिखी मेरे परिवार के लोग बड़े लड़ाके थे गरीबी के बावजूद मैंने कविताएं नहीं लिखी, बल्कि डायरी पर ऐसे ही मेरे मन में जो बातें थी जो भाव उमड़ रहे थे , वो लिख दी मैंने , यह सन् 1955 की बात होगी-

मेरा बाप-विजित एवरेस्ट

मेरी मां- अभाव-शेषनाग से विषतप्त क्षीर- सागर

……………………………………………

मेरी बहन-मैले चिथड़ों से बनी पर कोई गुड़िया

और मैं-

उबलता हुआ केतली का पानी,

एक दिन सब बैठे थे कविता पढ़ रहे थे और नामवर जी ने मेरी ओर देखते हुए कहा कि कुछ आप भी लिखते हैं मैंने बहुत शर्माते हुए यह सुना दिया क्योंकि मैं कविता नहीं समझता था। नामवर जी ने केदारनाथ सिंह से कहा कि यह देखिए यह पहली कविता है विश्वनाथ त्रिपाठी की । मुझे कुछ बताए बिना वह इलाहाबाद में उसको छपने के लिए दे दिए थे । बाद में उस कविता का अमेरिका और जर्मनी में अनुवाद हुआ । कई वर्षों के बाद 1962 या 63 में बोल्यो जनरल ऑफ पोएट्री में जो अमेरिका से निकलती थी उसमें एक कविता का अनुवाद छपा अज्ञेय जी ने भी मुझे कहा कविता लिखते रहो।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध हटाने के लिए सन 1949 में आंदोलन हुआ था। सत्याग्रह किया था उसमें मैं जेल चला गया था उस समय मैंने जेल में भी कविताएं लिखी थी। मैं तब 16 साल का था तो जेल में मैंने कविताएं लिखी थी अटल बिहारी वाजपेई जी ने कहा था कि इसे तुम दे दो मैं छपने के लिए दे दुँगा लेकिन वह कविता है आज तक कहीं नहीं छपी है ।

बाद में नामवर जी दिल्ली आ गए उन्होंने आलोचना पत्रिका की शुरुआत की थी आलोचना में मैं लिखने लगा। आलोचना का जो काम मैंने किया जैसे लोकवादी तुलसीदास, मीराबाई पर लिखा परसाई पर लिखा है या कहानियों पर लिखा तो मेरे मन में सिर्फ यह रहा कि जो पढ़ाया या जो पढ़ता था और जो बहुत अच्छा लगता था। तो मेरे मन में यह जिज्ञासा रहती थी कि वह मुझे क्यों अच्छा लग रहा है तुलसीदास में पढ़ता था और मुझे बहुत प्रभावित करते थे मेरे पिताजी तुलसीदास का पाठ करते थे। लोकवादी तुलसीदास किताब लिखी क्योंकि मैंने मध्यकालीन जीवन देखा है उसमें मैं रहा हूं । तुलसी और कबीर जैसा हू-ब-हू तो नहीं लेकिन उनके जैसा मैंने देखा है ।

यहां जब मैं गांव से दिल्ली में आया तो गांव की बहुत याद आती थी । तब लगा कि मुझे लिखना चाहिए,मैंने सबसे पहले अपने गाँव के लक्खा बुआ के बारे में लिखा । राजकमल वाले ने कहा ये बहुत बढ़िया हैं इसे रखिएगा, उसके बाद मेंने और लिखा गाँव पर वो करीब 30 वर्ष बाद नंगातलाई का गाँव पुस्तक के रुप में छपी ।

कविता को छोड़ दीजिए जब मैं व्योमकेश दरवेश लिख रहा था तब भी मेंने रुप के बारे में नहीं में नहीं सोचा। जैसा मेरे मन में आता वैसा मैं लिख देता था, उसको गद्य में लिख देता था मेरे लिए यही समस्या नहीं थी कि क्या लिखा जाए मेरे लिए यह समस्या थी कि जो मैं लिख रहा हूँ उसमें शब्द इस्तेमाल कैसे किया जाए । भाव को प्रकट करने के लिए शब्द और वाक्य संगठन, वाक्य-संरचना, वाक्यों को गद्य में कैसे पिरोया जाए मेरे लिए यह समस्या है। मेरे मन में जो आया बस मैं उसी को लिखता लेकिन लिखते समय बहुत परेशानी होती है जैसे रचनात्मक प्रक्रिया । मैंने जीवन में इस पर ध्यान नहीं दिया कि किस फॉर्म में लिखना है। मेरे जीवन में जो साहित्य की समस्या थी वही जीवन की भी समस्या थी। साहित्य और जीवन की समस्या दोनों अलग-अलग नहीं है। जो मैंने अपने गांव में देखा जो अनुभव किया उसे कैसे उतारा जाए यह मेरे लिए सबसे बड़ी समस्या थी । “नंगातलाई का गाँव” में एक अजीब सा बिखराब है मैं कभी मां की बात करता हूं तो कभी बत्तखों के अंडे देने की, तो कभी अपने गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी जी पर आ जाता हूं। मैंने मन को कभी साहित्यिक बंधन में नहीं बांधा है जो मन में आया वह लिखना शुरू कर देता हूँ । बिसनाथ का बलरामपुर जो तद्भव में आ रहा है असल में वो अब केबल बलरामपुर का नाम रह गया है लेकिन उसकी कहानी बलरामपुर से आगे निकल गई है । अब बलरामपुर केवल प्रतीक बन कर रह गया अब कानपुर तक बात आ गई है आगे लिखा तो बात बनारस ,दिल्ली तक भी आएगी…।

मेंने फार्म को ध्यान में रखकर कभी नहीं लिखा चाहे वो आलोचना,कविता या संस्मरण ही क्यों न हो । मेरे मन में जो आया मैंने वही लिखा।

प्रश्नः- स्मृति पर आधारित संस्मरण आधुनिक विधाओं में एक प्रमुख विधा है। संस्मरण लेखन की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली ।

उत्तरः- गंगा स्नान करने चलोगे में कई व्यक्तियों के संस्मरण हैं (इसमें विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा लिखित दस व्यक्तियों पर संस्मरण संकलित है जिनका क्रम इस प्रकार है, हजारी प्रसाद द्विवेदी,नागार्जुन,केदारनाथ अग्रवाल,रामविलास शर्मा, त्रिलोचन,भीष्म साहनी, भैरवप्रसाद गुप्त, नामवर सिंह , फ़िराक़ गोरखपुरी,तथा डा.भरतसिंह उपाध्याय) ।इस पुस्तक का शीर्षक गंगा स्नान करने चलोगे मेरे गुरु आर्चाय हजारी प्रसाद द्विवेदी का ही वाक्य है । यह जो शीर्षक है वह वास्तव में प्रतीकात्मक है ,हमारे समय में ऐसे व्यक्ति थे जिनके प्रति हमारे मन में आदर,श्रद्धा का भाव होता था लेकिन सभी लोग ऐसे नहीं थे, मैंने जिनके बारे में लिखा इनमें ऐसे गुण थे जिसके कारण सभी के मन में इनके प्रति आदर और श्रद्धा का भाव था,आप जब कभी ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आते हो जिनसे मिलकर आपको लगता हो कि इनका जीवन ऐसा है जिससे बहुत कुछ सिखा जा सकता है ,उनके जीवन से आपको पैगाम मिलता है । अच्छे काम करने की प्रेरणा मिलती है । उनके साथ आप ऐसे समय बिताते हो जिससे आपको लगने लगता है कि आपका जीवन सार्थक हो गया हो ,उनका जीवन आपको बहुत कुछ सिखाते है । जब मैं ऐसे गुरु के संपर्क में रहा तो मुझे लगा कुछ लिखना चाहिए और मैंने लिखा। लिखने में ऐसा होता है कि ,आपको प्रत्येक स्मृति ,घटना महत्त्वर्पूंण लगता है। चाहे वह उन व्यक्ति की मूल्यवत्ता ,नैतिकता ,ही क्यों न हो सभी मन में रहता है , और उनकी यदि रचना है तो उसमें भी सौन्दर्य को देखते हैं ,जाहिर है कि रचनाकार अपनी रचना में ऐसे व्यक्ति को विषय बनाते हैं जिनमें ये सारे गुण हो। संस्मरण में लेखक का भी व्यक्तित्व आ जाता है ,गुरु जी का जो प्रभाव मेरे ऊपर पड़ा ,उन्हीं से संस्मरण लिखने की प्रेरणा मिली।

प्रश्नः- अपने संस्मरण गंगा स्नान करने चलोगे में दस प्रतिष्ठित साहित्यकारों को रखने का कोई खास वजह?

उत्तरः- सामान्य के बारे में मैंने नंगातलाई के गाँव में लिखा है ,उसमें बहुत सामान्य से सामान्य व्यक्तियों का वर्णंन हैं। गंगा स्नान करने चलोगे इस शीर्षक से ही स्पष्ट हो जाता है कि ये प्रतीकात्मक है , आप अपने जीवन में ऐसे व्यक्ति से मिलें जिनसे मिलने से गंगा स्नान जैसी पवित्रता आ जाती है ,इसलिए ऐसे व्यक्ति के बारे में लिखा जो सामान्य से ज्यादा अधिक महत्त्व रखते हैं। इनसे मिलने से आध्यात्मिक ,मानसिक, बौद्धिक ,सांस्कृतिक संपन्नता आ जाती हैं इसलिए ऐसे बड़े लेखक के बारे में लिखा जो अपने व्यक्तिगत रुप में भी बड़े थे। ये संस्मरण ऐसे दस व्यक्तिगत जीवन और साहित्यकारों के बारे में हैं जो अपने बिरादरी के भी बड़े लोग थे

प्रश्नः-आपके संस्मरण गंगा स्नान करने चलोगे में एक भी स्त्री पात्र न होने की कोई खास वजह।

उत्तरः- असल में उस समय काशी में कोई ,स्त्री थी ही नही, और जहाँ तक मुझे ध्यान आ रहा है ,इस रचना में कोई दलित भी नहीं है, ऐसा मैंने जानबूझ कर नहीं किया कि मुझे यह नहीं लिखना हैं । बल्कि मेरा संपर्क उन व्यक्तियों से उतना गहरा नहीं था ,जिससे की मैं लिख सकता था उस समय, महादेवी वर्मा मेरे संपर्क में थी लेकिन इतना संपर्क नहीं था कि संस्मरण लिख पाउ यह मेरी जीवन की कमी होगी लेकिन अगर आगे और लिखा तो जरुर इसको ध्यान रखुँगा। मेरे संस्मरण नंगातलाई के गाँव औऱ गुरुजी की खेती बाड़ी में स्त्री पात्र है।

प्रश्नः स्वतंत्रता पश्चात सांप्रदायिक सौहार्द को आप किस रूप में देखते हैं ?

उत्तर- सांप्रदायिक सौहार्द स्वतंत्रता पूर्व जितना था उतना आज नहीं है। हाल ही में मैंने देखा है कि जैसे-जैसे समृद्धि आई है गांव में पूंजीवादी संस्कृति जिस ढंग से फैल रहा है। जिस तरह पैसा आया है। गांव में जिस तरह से शिक्षा आई है , यह शायद अपनी अस्मिता का अस्मिता के प्रति आग्रह है। जिस प्रकार से वहां पर शिक्षा आई है उसी प्रकार से अलगाव की भावना भी आई है। यह केवल एकतरफा नहीं हैं। गांव में जो व्यक्ति रह रहें हैं वह सभी अपना कुछ-कुछ न कार्य कर रहे हैं ,लेकिन बेरोजगार युवा उनके लिए कोई काम नहीं है। मैंने देखा है कि किस प्रकार से गांव में बिजली आ जाने से टीवी आ गई है । अब गांव और दिल्ली में कोई अंतर नहीं है। परिवहन के विकास से गाँव औऱ नगरों के बीच अंतर करना मुश्किल हो गया है, नंगातलाई का गाँव भी अब वह गाँव नहीं रह गया है। पहले हमारे गाँव में रामचरितमानस का पाठ होता था जिसमें ढोलक एक मुस्लिम बजाते थे । गायत्री मंत्र होते थे यज्ञ होते थे। उसमें जो नौजवान लोग होते थे, बच्चे होते थे उन्हें कुछ करने की प्रेरणा मिलती थी। जीवन मूल्य मिलते थे।मेरे गांव में मुसलमानों की बहुत अच्छी आबादी थी वहां हिंदू मुसलमान लोग सब मिलकर ही रहते थे।

प्रश्न- आजकल की किसान आत्महत्या पर आप क्या कहना चाहेंगें?

उत्तर- देखिए यह जो किसान आत्महत्या करते हैं। वह बहुत कारणों से करते हैं। खेती मैं पैसा बहुत अधिक लगता और लोग सोचते हैं कि हमें मुनाफा भी बहुत अधिक हो। खेती जो है बरसात पर निर्भर करती है, कीड़े-मकोड़ो और बाढ़ के कारण खेती नष्ट हो जाती है तो बहुत नुकसान होता है। किसानों में थोड़ा सा लालच भी होता है कि व्यापारी को इतना मुनाफा होता है तो हमें क्यों नहीं । ज्यादा मुनाफा के लिए वह अच्छी खेती के लिए पैसा उधार लेते है, लेकिन न चुका पाने के कारण अपमान के कारण आत्महत्या कर लेते हैं। किसान का आत्मह्तया करना आर्थिक कारण है बाजाड़ का उतार-चड़ाव किसान नहीं सह पाता। व्यापारी अगर पैसा वापस नहीं कर पाते हैं तो कुछ नहीं होता लेकिन किसान का बड़ा अपमान होता है। आज कल सोशल मीडिया पर भी इतनी ज्यादा जानकारियां दे देते हैं। ऐसे घोर अश्लील विज्ञापन ,फिल्में दिखातें हैं । एक अजीव बात है कि एक अजीब तरह की सैक्स की नई नैतिकता पर एक उच्छश्रृंखलता परोसते हैं । जिससे मनुष्यों के संयम में कमी आई है। आजकल नौजवान भी आत्महत्या करने लगे हैं। अब व्यक्ति की कोई कीमत नहीं रह गई है । व्यक्ति की ही कोई कीमत नहीं हैं तो उसके जीवन मूल्य की क्या कीमत होगी? अब तो छोटी-छोटी बात पर एक –दूसरे को मार देते हैं। पहले धर्म का एक अँधविश्वासी रुप था जिसमें लोगों को कम-से कम परलोक का डर दिखाकर संयमित तो रखता था । अब संयुक्त परिवार टूट रहा है,पारिवारिक मुल्य समाप्त हो रहे हैं, नैतिकता,परोपकार की भावना खत्म हो रही है, जिसकी कीमत मुनष्य को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है।

प्रश्नः- क्या संस्मरण लिखते समय आपने डायरी पद्धति का प्रयोग किया था?

उत्तरः- यह संस्मरण (गंगा स्नान करने चलोगे) विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपे लेखों का संग्रह हैं, इस किताब के लिए मैंने कोई भी लेख अलग से नहीं लिखे । मैंने इसको लिखने के लिए किसी प्रकार के नोट्स नहीं लिखे थे । जो कुछ भी मेरे मन में स्मृति में बसी थी ,उसी का वर्णन किया है । मेरे मन में आया लिखना है और मैंने लिख दिया ।

जानबूझ कर संदेश नहीं दिए ,यदि मिलता है तो ठीक है ,हर पाठक की एक पाठकीय पक्रिया होती है ,जब पाठक किसी पाठ को पड़ता है तो ,पाठक अपना खुद का एक पाठ तैयार करता है और जो पाठ तैयार होता है वह एक सच्चा पाठ होता है । कहीं -कहीं पर लिखते समय यह जरुर मन मैं आया कि पण्डित जी इतने बड़े आदमी थे ,लोग जब इस संस्मरण को पड़े तो उनके मन में इनके प्रति श्रद्धा का भाव हो क्योंकि जब कोई किसी से श्रद्धा करते हैं तो वह चाहते हैं कि सभी के मन में उनके प्रति श्रद्धा हो ।

प्रश्नः शलाका सम्मान हिंदी अकादमी को ओर से दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है। इस वर्ष आपको मिली है, आपको कैसा महशूश होता है जब आपका नाम किसी पुरस्कार से जुड़ता है?

उत्तर- पहले तो बहुत अच्छा लगता था , उन लोगों का बहुत ध्यान आता है जो इन सम्मानों के अधिकारी हैं उनको मिलना चाहिए सम्मान, लेकिन ऐसे लोगों को नहीं मिलता है। उपेक्षाएं हो रही है । इसमें सम्मान मिलने के बाद आनंद के भाव के साथ-साथ दुख भी होता है। सभी लोग बधाई देते हैं तो अच्छा लगता है । याद आता है अपने गुरु की हजारी प्रसाद द्विवेदी की अपने माता-पिता की वह होते तो बहुत खुश होते । याद आता है अपने गांव की। सम्मान पहले मिलता था तो बहुत अच्छा लगता था लेकिन अब अपराध बोध सा लगता है, लेकिन अब मेरे लिए तो एक सामान्य प्रक्रिया है इससे पहले मुझे कई सारे सम्मान मिल चुके है उस सम्मान की कड़ी में यह भी एक है। (गोकुलचंद्र शुक्ल आलोचना पुरस्कार, डॉ॰ रामविलास शर्मा सम्मान, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य सम्मान – हिन्दी अकादमी द्वारा, शान्तिकुमारी वाजपेयी सम्मान, शमशेर सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, व्यास सम्मान – (‘व्योमकेश दरवेश’ के लिए), भाषा सम्मान – साहित्य अकादमी द्वारा, मूर्तिदेवी पुरस्कार, भारत भारती सम्मान)।

प्रश्नः- आपने अपने संस्मरण में अपने गुरू के प्रति जो आदर –भाव दर्शाया है, क्या आप उसके माध्यम से वर्तमान हिन्दी अकादमिया से जुड़े अध्यापक एवं विद्यार्थी को कोई संदेश देना चाहते थे।

उत्तरः- निसंदेह इससे पाठक को कुछ जानने को मिलेगा ,इससे व्यक्तिगत जीवन को समझने के साथ-साथ उनके साहित्य को भी समझने में मदद मिलेगी । मेरे मन में एक बात बसी है कि ,साहित्यकार के व्यक्तिगत जीवन का बहुत गहरा प्रभाव उनके साहित्य पर पड़ता है । उनके साहित्य पर प्रभाव यांत्रिक ढंग से नहीं लेकिन स्वछंद भाव से छिपा होता है रचनात्मकता के लिए यह नैपथ्य का काम करता है ,रचनाकार आत्माभिव्यक्ति करता है ,आत्म का निर्माण व्यक्ति अपनी जीवन में ही करता है ,आप जिसे आत्म कहते हैं, उसमें आपका जीवन किसी न किसी रुप में विद्यमान रहता है । यह जानी –पहचानी,अनजानी चीजों से बनी होती है अच्छे रचनाकार को पता नहीं होता कि वह कहाँ से उदाहरण उठा कर ला रहे हैं , लेकिन जुड़ा होता है उनके जीवन से उदाहरण के लिए अपने गुरु द्विवेदी जी के बताये हुए शब्दों को याद करके कहते हैं कि ,एक दिन उन्होंने एक कहानी सुनायी जिसमें दुष्यंत एक चित्र को देखते हैं जिसमें हिरणी अपनी आँख ,बारहसिंहा के सिंह से खुजला रही थी ,उनकी व्याख्या गुरुजी इस प्रकार करते हैं कि ,हिरणी की आँख सबसे सुंदर होती है, और बारहसिंहा की सिंह इतनी नुकीली कि जरा सी इधर-उधर हुआ तो आँख खत्म। लेकिन हिरणी कितने विश्वास के साथ आँख खुजला रही थी ,इस चित्र को देखकर दुष्यंत को आंतरिक पश्चाताप होता है कि उसके उपर शंकुतला ने भी ऐसा ही विश्वास किया था । इसमें रचनाकार ने कुछ कहा नहीं लेकिन चित्र के माध्यम से सब कुछ कह दिया।

अंत में मुझे त्रिपाठी जी के व्यक्तित्व के अनुकूल कवि घनानंद द्वारा लिखित दो पंक्तियाँ याद पड़ रही हैः-

वहै मुसक्यान वहै मृदु बतरानि ,वहै

लडकीली बानि आनि उर में आरति है ।

समकालीन हिंदी कथा – साहित्य की अग्रणी हस्ताक्षर श्रीमती चित्रा मुद्गल जी से नेहा झा की बातचीत

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समकालीन हिंदी कथा – साहित्य की अग्रणी हस्ताक्षर श्रीमती चित्रा मुद्गल जी से नेहा झा की बातचीत

साक्षात्कार्ता: नेहा झा

शोधार्थी हिंदी विभाग

हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय

समकालीन हिंदी कथा – साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली अग्रणी हस्ताक्षर श्रीमती चित्रा मुद्गल प्रतिष्ठित लेखिका हैं। चित्रा मुद्गल जी ने समाज के विविध वर्गों से आम पात्रों का चुनाव कर उन्हें अपनी लेखनी के माध्यम से केंद्र में लाकर उनकी समस्याओं की पुरजोर तरीके से समाज के समक्ष रखा है। चित्रा मुद्गल की कहानियों में सवेंदनाओं के विविध धरातल मूर्त रूप में उपस्थित हुए है ।

श्रीमती चित्रा मुद्गल जी से नेहा झा की बातचीत

चित्रा मुद्गल जी ने समाज में घट रही सभी समस्याओं के खिलाफ अपनी लेखनी के द्वारा आवाज उठाई है। चित्रा जी की रचनाओं में हमें विविधितायें स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है । ठीक इसी प्रकार इन्होने नारी के भी विभिन्न पक्षों पर अपनी कलम चलाई है । मैंने इनके कहानी साहित्य को पढ़ते हुए ‘जिनावर’ कहानी संग्रह पर लघु शोध (M.phill) किया है । इस शोध में मैंने ‘जिनावर’ कहानी संग्रह में विशेषतः नारी के विविध रूप तथा उनकी कहानियों में समाज के विभिन्न पक्षों को समझने का प्रयास किया है। ‘जिनावर’ कहानी संग्रह में भी इनके कथा साहित्य की तरह विविध रूप देखने को मिलते है। शोध के दौरान उनका लिया गया साक्षात्कार –

प्रश्न -1 आपकी उपन्यासिक कृति आंवा में श्रमिक जीवन की जो बारीकी विवेचना मिलती है वह भोगा हुआ यथार्थ प्रतीत होता है। उस यथार्थ को आपने कैसे गढ़ा ?

उत्तर – जिस तरह से मैंने उस यथार्थ को गढ़ा है, वह आवाँ उपन्यास में रूपायित हुआ है.यह उपन्यास पाठको को गहरी छुआ है, कथ्य के निर्वाह मे उस जींवत यथार्थ को उतारने में लेखक को सफलता मिली है, ऐसा मानना चाहीए। जहां तक यह प्रश्न है की आवां एक भोगा हुआ यथार्थ है, तो ये में स्वीकार करती हूँ कि मैंने उस यथर्थ को जिया है, मैं उसका हीस्सा रही हूँ । में बकायदा अपने कॉलेज के जीवन के शुरुआत से ही सक्रिय सदस्य रही हूँ , ‘दत्ता सावंत’ के ‘ट्रेड यूनियन कामगार आघारी’ और जो कुछ मैंने उस समय देखा, महसूस किया और उस लड़ाई में बराबर की भागीदारी रही। मजदूरों के संघर्ष को अपना संघर्ष समझा लेकिन आवाँ लिखने के जरूरत मुझे तब महसूस नहीं हुई थी जब मैं ट्रेड यूनियन सक्रिय सदस्य थी।

आवाँ लिखने के विषय मे मैंने तब सोचा जब “नियोगी हत्याकांड” हुआ। शायद 28 सितंबर 1991 के आसपास नियोगी हत्याकांड बिलासपुर के निकट पूर्वा के आसपास घटा और छत्तीसगढ़ में उनकी हत्या हुई। तो कहीं न कहीं मेरे मन मे यह बात आई कि ट्रेड यूनियन के भीतर अंतर्विरोधों को रेखाकिंत करते हुए उपन्यास लिखने की जरूरत है। नियोगी जी की हत्या का अर्थ है कि पूंजी ने तो उन्हें मारकर मजदूरों की समस्या का अंत जिस रूम में सोचा था लेकिन उस रूप में वो उसे क्रियान्वित नहीं कर सकते थे। यदि किसी न किसी घर के भेदी ने नियोगी जी के बारे जरूर ये खबर दी कि कब किस वक्त कहाँ होंगे, कितने बजे वह अपने घर पहुंचेंगे और कहाँ किस खिड़की के करीब घर मे सोते है, ताकि जहां से उनके खरीदे गए हत्यारे के माध्यम से वह हत्या करवा सकें। तो कहीं न कहीं बाहर के आदमी ने सूचना तो नहीं दी होगी पूंजी को। निश्चय ही किसी न किसी बहु[1]त निकटस्थ रहने वाले मजदूर को फोड़ा होगा और फोड़कर के उसका उपयोग अपने हीत मे किया होगा।

तो यह जो उनकी लड़ाई नियोगी जी लड़ रहे थे और जिनके बुनियादी हको के लिए पूँजीपतियों से लोहा ले रहे थे। वो उन्हीं में से किसी ने पूंजी के हाथों बिक कर उनकी हत्या करवा दी। तो यह जो अंर्तविरोध स्वयं जिनके लिए जो नेता संघर्षरत था उसकी हत्या संभव हुई। कोई न कोई मजदूर बिका पूंजी के हाथों। चाहे उसकी जो भी मजबूरी रही हो लेकिन ये उन अंतर्विरोधों को रेखांकित करता है कि कहीं न कहीं पूरे न पूरे मजदूर आंदोलन में कुछ चीजें ऐसी जरूर रह जाती है जिनके प्रति स्वयं मजदूरों में असंतोष अपने नेता के प्रति होता है। उन्हें लगता है कि उनका जो नेता है, वह उनके साथ उतना न्याय नहीं कर रहा है या उनकी समस्या के सहारे नेता अपनी नेतई की नींव को पुख्ता कर रहा है। यानी उनके जो हीत है उनकी परवाह उतनी नहीं करता या यह भी कहीं भ्रम रहा हो कि पूंजी के इशारे पर वो उनके जो अधिकार है, उनकी लड़ाई जिस तरीके से लड़ी जानी चाहीए ईमानदारी से नहीं लड़ रहा है, किन कारणों से वह बिकता है, किन कारणों से उसकी हत्या संभव होती है। नियोगी जी की इस चीज ने मुझे हीला कर रख दिया। फिर मैंने तय किया मैं अपने जीवन के भोगे हुए यथार्थ यानी ‘ट्रेड यूनियन’ में अपनी भागीदारी के समय जिस मनोयोग जिस निष्ठा के साथ मैं मजदूर आन्दोलनों से जुड़ी रही हूँ, अपने जीवन के 15-20 वर्षों तक तो कहीं न कहीं मुझे लगा कि कुछ न कुछ असंतोष या अंतर्विरोध है जिनको रेखांकित किया जाना चाहीए। क्योकि मजदूरों का जितना भला होना चाहिए उतना नहीं हो पाता है। बल्कि उनका नेता मजदूरों को वोट बैंक बनाकरके उनके भरोसे लोकसभा के चुनाव में खड़ा होता है, जीतकर के चला आता है। लोकसभा मे कितना मजदूरों का हित आगे कर पाता है या नहीं कर पाता लेकिन अपना हित तो पूरा होता है जरूर। तो यह आवाँ समय का आवाँ है जो भोगे हुए यथार्थ को मैंने लिखा। मैंने ‘नियोगी हत्या’ कांड की जो बात की उन दिनों मैं दिल्ली में थी, मुंबई छोड़ चुकी थी। ‘ट्रेड यूनियन’ से मेरा नाता काफी कुछ खत्म हो गया था क्योकि एक जो नियमित भागीदारी होती है उससे मैं वंचित थी। दूर रहकर के मैं कभी कभी किसी मीटिंग में जा पाती थी। कहीं न कहीं मुझे यह लगा यह क्या हो गया है, कैसे संभव हुआ, कैसे पूंजीपति यह मानकर चलता है कि उसे नेता को खत्म कर दिया जाए तो इनका आंदोलन स्थिल हो जाएगा, कोई नेतृत्व हीन आंदोलन चल नहीं सकता, जी नहीं सकता, ज्यादा दिन तक। छत्तीसगढ़ में नियोगी की जब हत्या हुई 28 सितम्बर 1991 तो मुझे लगा कि मुझे अब कहीं न कहीं लिखना चाहीए। उन अंतर्विरोधों को जो हमारी हार का कारण बनती है, आंदोलन की हार का कारण बनती है। आंदोलन भीतर से खोखला होता है। अंतर्विरोधों में फंसा हुआ आंदोलन भीतर से खोखला होता है तो आवाँ को मैंने लिखने का निश्चय किया। पता नहीं में कितना न्याय कर पाई।

प्रश्न -2 एक ज़मीन अपनी, प्रेतयोनी, सौदा, लकड़बग्घा,जब तक विमलाए है, केंचुली, लेन, मुआवजा इन सभी रचनाओं में जो स्त्री चरित्र है वो ज्यादती के खिलाफ प्रतिरोध करती है, क्या वह प्रतिरोध किताबी पन्नों से निकल कर समाज में भी घटित होता है ?

उतर- वह प्रतिरोध इन रचनाओं के पन्नों से निकल करके निश्चित रूप से कहीं ना कहीं समाज के उन पक्षों को प्रभावित जरूर करता है। उसके अंदर जो सत्य है वह प्रभावित करता है कि स्त्री पात्रों के साथ जो कुछ हुआ वह कहीं ना कहीं पितृसत्तात्मक समाज के अहंकार का नतीजा है, पितृसत्तात्मक समाज के उच्च अहंकारी बर्ताव उसकी परिणीति है कि वह कभी बर्दाश्त नहीं कर पाते की स्त्री अपने गले में प्रतिरोध की आवाज रखें। वह आवाज उनके क्रियाकलापों तथा उनके निर्णय के विरुद्ध जाकर खड़ा हो क्योंकि कहीं ना कहीं उसकी गूंज बाकी रहती है। वह चाहे लकड़बग्घा में पछाँहवाली की बिटिया के रूप में हो चाहे, ‘एक जमीन अपनी भी’ की ‘नीता’, ‘बावजूद इसके’ की ‘प्रीति’, ‘सौदा’ की ‘मंगला’ या ‘फिर जब तक बिमलायें हैं’ की ‘बिमला’ अगर ये लोग पढ़ लिख जाएगी, अपने निर्णय खुद लेगी, सही गलत का निर्णय भी लेने लगेगी, अपने अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई भी लड़ेगी, और इन्ही से डर कर इसी सबको खत्म करने का पितृसत्तात्मक समाज सोच रहा सोचता है और इसी का परिणाम है ‘लकड़बग्घा’ का अंत। ‘लकड़बग्घा’ कभी बड़ों को उठाकर नहीं ले जाता है सेठ गांव के लोगों को ना समझ सोचकर यह प्रचारित करवा देता है परंतु जो भी यह रचना पढ़ेगा वह निश्चय उस पितृसत्ता की चालाकी को जरूर समझेगा और इस तरह यह कहानी प्रतिरोध की कहानी बनती है और प्रतिरोध पात्र के मार दिए जाने के बाद भी जिंदा रहता है। प्रतिरोध कभी मरता नहीं है बल्कि प्रेरणा बन कर पढ़ने वालों के दिल और दिमाग में बैठ जाता है। तो कहीं ना कहीं यह कहानियां मेरे हीसाब से अपने प्रतिरोध को समाज में एक प्रेरणा की तरह निरूपित और प्रेरित करती है कि गलत के खिलाफ खड़े रहना जरूरी है चाहे वह औरत ही क्यों ना चाहे वह औरत को निरीह ही क्यों ना समझते हो। तो प्रतिरोध जिंदा रहता है भले ही वह किताब के पन्नों में हो या व्यवहारिक जीवन में।

प्रश्न -3 आपकी दो रचनाएं ‘गेंद’ और ‘गिल्ली गुड्डू’ हिंदी साहित्य में वृद्ध विमर्श को गति देती है। आपको इनकी प्रेरणा कहा से मिली ?

उतर- भारतीय समाज में कोटम्भी जीवन के क्षरण से वृद्ध समस्या आई क्योंकि भारतीय समाज में कभी हमने सुना नहीं था कि अनाथ आश्रम की जरूरत है और वृद्ध आश्रमों की जरूरत है। अनाथ रिश्तेदारों में कहीं ना कहीं किसी संबंधी के सहारे जी लेता था और अपना भविष्य पा लेता था चाहे वह विधवा बहन का बच्चा हो चाहे दूर किसी रिश्तेदार का। बूढ़े-बुजुर्ग घर के दरवाजे के बरगद थे, बिना उनके पैर लगे कोई घर के भीतर नहीं घुसता था। जिस समाज में बुजुर्गों के आशीर्वाद को भगवान के आशीर्वाद के समान माना गया उस समाज में वृद्धों को अब अपने घर में रहने की इजाजत नहीं है। उपभोक्तावादी संस्कृति का यह नतीजा है जो वस्तु हमारे उपयोग में नहीं आती है उसका अपने पास होना निरर्थक है। तो वृद्धावस्था किसी भी रूप में, परिवार के क्रियाकलापों में सहायक नहीं होती है, होती भी है तो लोग उनके अनुभवों का लाभ उठाना नहीं चाहते। लोगों को अपनी सजी सजाई बैठक में खस्ता हुआ वृद्ध अच्छा नहीं लगता है। एकल परिवारों का जो चलन रोजगार के चलते या पाश्चात्य जीवन शैली के चलते हमारे यहां बढ़ा है ‘हम दो हमारे दो’ वहां वृद्धों के लिए जगह नहीं है। ऐसा कोई पोस्टर दिखाई नहीं देता कि ‘हम दो हमारे दो’ के नारे में बुज़र्गों यानी सास-ससुर के लिए कोई जगह हो। तो यह सारा का सारा जो है इस तरह की विडंबना पूरे वातावरण भारतीय समाज में व्याप्त रहा है तो वह मेरे लिए तो दिल दहलाने वाला है। मैं बांद्रा 55 सेक्टर के ‘आनंद निकेतन’ से जुड़ी हुई हूँ। मानसिक रूप से भी और शारीरिक रूप से भी। अच्छे-अच्छे घरों की माताओं को इस रुप में देखती हूँ कि उनके खुद के बनाए घरों में ही कोई ठौर ठिकाना नहीं है। यह सब देखकर इतना दुख हुआ कि यह सब हो क्या रहा है समाज में ? ‘गिल्ली गुड्डू’ और ‘गेंद’ उसे दुख और चोट की प्रेरणा से लिखा गया है। और मैं यह मानती हूँ भारत अपने कोटम्भी जीवन की वजह से, सौहार्द्र की वजह से जाना जाता है। उसकी जो पहचान है वह खंडित होगी , जो हो रहा है या जो होता चला जा रहा है तो वह कहीं ना कहीं भारतीय संस्कृतिक , सभ्यता यह सारी पहचान खो देगी। यानी भारतीय संस्कृति अपनी पहचान खो देगी।


प्रश्न -4 थर्ड जेंडर जैसे लगभग अछूते विषय पर आपने नाला सोपारा को विषय वस्तु क्यों चुना ?

उत्तर – इस विषय ने मुझे बहुत गहरे रूप में उद्वेलित किया। मैं एक सोशल एक्टिविस्ट होने का दम ओढ़े हुए कभी इन लोगों को अपनी ओर आते हुए पाया तो मैं खेद से भर जाती थी। कहाँ से चले आते हैं यह मांगने के लिए, हमारे पास पैसे है या नहीं इनकी इसकी कोई परवाह नहीं और ढीठ की तरह हमारे पास खड़े रहते हैं ताली बजाते हैं। जिस दिन मेरी नरोत्तम से मुलाकात ट्रेन यात्रा के दौरान 1999 में हुई जब मैं दिल्ली से मुंबई जा रही थी। इससे मिलने के बाद मैंने अपने आप को कटघरे में खड़ा पाया क्यों हमने, हमारे समाज ,धर्म ,बिरदरी ने इनके साथ ज्यादती की है? क्यों मनुष्य ने अपने लिंग से विकलांग बच्चे को घर से निकाल देता है। जब नरोतम से भेट के बाद मैंने इन चीजों पे गौर किया तो लगा समाज सेवा का आडंबर ओढ़े हुए मैं इतनी क्रूर हूँ। समाज के उपेक्षित लोगो मे स्त्री को भी घर आंगन मिला हुआ था, दलितों को भी समाज में रहने की इजाजत मिली हुई थी लेकिन लिंग विकलांग के लिए समाज मे मुट्ठी भर जगह नहीं थी उस समाज के उपेक्षित हीस्से के रूप में। हाशिये के लोगो को भले ही मरैया नसीब हुआ हो लेकिन अपना घर तो था। इन किन्नरो का तो अपना घर है ही नहीं समाज ने इन्हे अपने घर से बाहर फेंकने के लिए विवश किया और खासकर धर्म ने ही समाज को प्रेरित किया कि ऐसे यौन विकलांग बच्चे तुम्हारे घर में होने का मतलब अमंगल , कलंक। इनकी घर में कोई उपयोगिता नहीं है न घर में न समाज में। धर्म , समाज , राजनीति और मनुष्य इन 4 चीजों ने मिलकर इन बच्चों के साथ जो सदियों से घोर अमानवीय व्यवहार किया वह अछम्य है। और हमारे तथाकथित जागरूक समाज ने कभी यह सोचने की कोशिश नहीं की अब भी हम उनसे ऐसे ही घृणा करते हैं जैसे सदियों पहले सब का मानसिक आंदोलन बना था कि इन्हें बाहर करो तो इस अक्षम्य अपराध के लिए दोषी कौन है? हम मनुष्य हैं।

मैंने सोचा इग्नू में मैं उसका दाखिला करवा दूँ जो बनना चाहता है वह बने, लेकिन जब एडमिशन के लिए फॉर्म भरने गया वहां जेंडर में सिर्फ मेल और फीमेल थे थर्ड जेंडर नहीं। यह कितना बड़ा अपमान है। इनके धड़ के ऊपर मस्तिष्क भी है और वह उतना ही उर्वरा है जितना कि किसी सामान्य व्यक्ति का। सिर्फ निचले हीस्से की विकलांगता ने इन्हें कहीं का नहीं छोड़ा। इन्हे सामाज से वंचित कर दिया गया। यही एक कारण रहा कि ‘नरोत्तम’ से जब मेरी मुलाकात हुई और उसने बताया कि वह बोरीवली उतरेगा और ‘नालासोपारा’ लोकल ट्रेन पकड़ कर जाएगा और रात भर से स्टेशन पर गुजारेगा। सुबह उसकी मां उससे मिलने स्टेशन पर आएगी। मैंने पूछा क्यों तुम्हारा घर नहीं है? उसने कहा मेरा घर तो है लेकिन मेरे घर में अब मैं नहीं हूँ। मुझे घर की सदस्यता से खारिज कर दिया गया। अब मेरा कोई हक नहीं है। ट्रेन दौड़ती रही और मैं उसके साथ उसकी जिंदगी के पृष्ठों को पढ़ती रही। मैं उसे अपनी बेटी की सीट पर सोने के लिए दे दी वह तो सो गया पर मैं बची कुची रात में भी पलकें नहीं झपका सकी। मैं अपने ऊपर धिक्कार करती रही कि मैंने इससे घृणा कैसे की? मैं आडंबर में जीती हूँ कि मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता हूँ मैं जागृत कैसे हो सकती हूँ जब हमारे ही बिरादरी का एक बच्चा ऐसी हजारों बच्चे कई सालों से इस पीड़ा के दंश को सड़को पर भीख मांगते झेल रहे है।

‌यह मेरी धिक्कार की संतान एक लेखक का पश्चाताप है समाज में माफी मांगने का उपक्रम है ‘पोस्ट बॉक्स नंबर 203 नालासोपारा’ उपन्यास।

प्रश्न- 5 आप की कथा कीर्ति विभिन्न तरह के चरित्र मिलते हैं,ये पात्र आपको कहाँ से मिले ?

उतर – मैं समाज के कई तरह के लोगों के साथ रहती हूँ। ए॰सी कार में बैठकर नहीं बल्कि उनके साथ चॉल में रहकर सामाजिक कार्य करती हूँ तो कई तरह के पात्र, कई तरीके की समस्याएं दिखती हैं। वंचित समाजो का मेरे कथानक में उनकी उपस्थिति स्वभाविक है क्योंकि मुझे लगता है हम उन वंचितों को उनके अधिकारों से वंचित करने के लिए हम जिम्मेदार हैं तो यह एक सोशल एक्टिविटीज के जरिए मेरे अनुभवों का दायरा विस्तार पाता है। ऐसा नहीं है कि मैंने संपन्न वर्ग के लिए नहीं लिखा मैं जिस खानदान से हूँ मैं उसकी रईसी से और दुर्गुणों से भी वाकिफ हूँ।

प्रश्न -6 स्त्री विमर्श को आप किस दृष्टि से देखते हैं?

उतर – स्त्री विमर्श बहुत जरूरी है क्योंकि हाशिये के भीतर दबी हुयी औरतों को बाहर निकालना उसकी बुनियादी मानवीय अधिकारों को उसे वापस सोपना जरूरी था लेकिन यह भी उसके साथ बहुत जरूरी है कि स्त्री विमर्श का एक संतुलित समाज विमर्श के रूप में भी देखा जाना चाहीए। कहीं ना कहीं वह संतुलन विवेकपूर्ण न होकर पटरी से उतरता है तो समाज का संतुलन बिगड़ता है।

प्रश्न – 7 आपका सबसे पसंदीदा पात्र?

उतर – अभी तो सिर्फ और सिर्फ ‘बिन्नी’ उर्फ ‘नरोत्तम’ है।

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लोक कला और साहित्य के मर्मज्ञ प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा ( विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन ) से ललित कुमार सिंह का साक्षात्कार।

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लोक कला और साहित्य के मर्मज्ञ प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा ( विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन ) से ललित कुमार सिंह का साक्षात्कार।

जरुरी है लोक कलाओं के स्पन्दन को महसूस करना

लोक एक व्यापक संज्ञा है और उसकी परिधि में सब कुछ समाया हुआ है। ऐसी कला जो लोगों द्वारा बिना किसी औपचारिकता के कंठानुकंठ या एक हाथ से दूसरे हाथ तक हस्तांतरित होती हुई आगे बढ़ती है, वह अपने आप में लोक कला है। लोककलाओं की भी अपनी बारीकियां हैं, उसका अपना शास्त्र है। कई बार यह जो विभाजन किया जाता है कि शास्त्र अलग है लोक अलग है लेकिन लोग परंपराओं में भी बहुत सारे हिस्से ऐसे हैं जिनमें सूक्ष्मताओं की ओर ध्यान दिया जाता है। कुछ नियम मर्यादायें हैं उनका भी पालन किया जाता है। बस अंतर यहां आ जाता है कि लोग कलाकार उसे स्थानांतरित करता है तो आने वाली पीढ़ी उसमें अपनी ओर से कुछ इज़ाफा करती है और बिना किसी औपचारिकता के ,बिना किसी विधि विधान के, बिना किसी शास्त्री परिभाषा के निरंतर आगे बढ़ती रहती है। हमारा देश जो है लोक कलाओं का खजाना है। इस देश में ऐसा कोई हिस्सा नहीं है जहां पर कोई विशेष प्रकार की लोक कला ने जन्म नहीं लिया हो, उसका विकास नहीं हुआ हो। संकट यह है कि आश्रय के आभाव में लोक कला के सामने संकट आ खड़ा हुआ है।

एक जमाने में जो मुखौटे और जो कठपुतलियां हैं इनका प्रयोग साभिप्राय होता था। मनोरंजन की वस्तु तो नहीं है यह मेरी दृष्टि में क्योंकि उनके माध्यम से लोग विशेष प्रकार की पुराख्यानों को प्रकट करते थे। मिथकों को प्रकट किया जाता था। मुखौटों के माध्यम से किया जाता था ,आज भी किया जाता है। केरला चले जायें तो जो मुखौटे होते हैं उनका अपना विधान है। मुझे लगता है कि संपूर्ण एशिया महाद्वीप की विशेषता है जहां पर मुखौटों की बड़ी समृद्ध परंपरा रही है।

कठपुतलियों को लेकर भी हम इसी तरह की स्थितियां मानते हैं और सुदूर अतीत से इस परम्परा का सिलसिला बना हुआ है। चार प्रकार की पुतलियां हैं जिनका प्रयोग किया जाता है। अलग – अलग अंचलों में जो क्षेत्रीय रूप उभरे हैं इनमें नवाचार भी होता चला आ रहा है कुछ नया आविष्कार भी हुआ है। हमारा यह जो क्षेत्र है मालवा, राजस्थान इसमें सूत्र पुतली होती है जो धागे से संचालित की जाती है, उसका बहुलता से प्रयोग होता रहा है। इसी प्रकार एक दस्ताना पुतली भी होती है जिसको हम हाथ में धारण करते हैं। मुझे गौरव मिला है कि विक्रम विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में स्थापित लोक एवं जनजातीय कलाओं से जुड़ा हुआ जो संग्रहालय है उसमें दस्ताना पुतली का एक महत्वपूर्ण संग्रह है। यह दस्ताना पुतलियां जो हैं इनके माध्यम से हम पंचतंत्र, हितोपदेश से लेकर महाराणा प्रताप हल्दीघाटी या वर्तमान सत्र में बालकों प्रयोगी नाटकों का मंचन भी हम लोग किए हैं। दस्ताना पुतलियों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि इनका मंचन बिल्कुल न्यूनतम माध्यम से किया जाता है। सूत्र पुतली में थोड़ी सी जटिलता है जिसमें एक पर्दा है, एक औपचारिक मंच है जिसके पीछे से सूत्र संचालन होता है। लेकिन जो दस्ताना पुतली है उसमें हमें कुछ नहीं करना है सिर्फ हाथ के अंगूठे और शेष दो उंगलियां हैं उसके निकट की उनके माध्यम से उन्हें संचालित किया जाता है। कठपुतली का एक और महत्वपूर्ण रूप है वह जो काष्ठ की पुतली होती है। उसके अलावा जो चमड़ा होता है उसके माध्यम से पुतलियों का निर्माण किया जाता है जिसे हम छाया पुतली ( शैडो पपेट ) के रूप में देखते हैं। और उसका बहुलता से दक्षिण भारत में कर्नाटक आदि में प्रयोग किया जाता है यह उधर जो दक्षिण पूर्व एशियाई देश है वहां तक यह गईं हुई है। सामान्य जनजीवन में इनकी लोकप्रियता इसलिए कम हो रही है क्योंकि आश्रय जो है वह कम हो रहा है। पुरातन काल से लेकर की मध्यकाल तक इन्हें राजाश्रय मिलता रहा और लोकाश्रय भी मिलता है। लेकिन वह जो लोक कलाकार है उसको थोडा बहुत राजाश्रय तो मिला लेकिन लोकाश्रय के अभाव में अपनी कलाओं से दूर हो जाते हैं। मैंने कई ऐसे कलाकारों को देखा है कि जिनके पूर्वज बहुत अच्छे ढंग से कठपुतलियों का संचालन करते थे, वह मुखौटों का निर्माण करते थे। हमने रामलीला में भी देखा है कि मुखौटों का बहुत अच्छा प्रयोग होता रहा है लेकिन धीरे-धीरे लोग इससे दूर होते चले जा रहे हैं। और कहीं ना कहीं इसके पीछे आत्महीनता की स्थिति को मानता हूँ मैं। हम जो हैं अपना आत्म स्वाभिमान खो रहे हैं हम विदेशी कलाओं, विदेशी परंपराओं उनकी ओर आकर्षित हो रहे हैं। वह लोग हमारी कलाओं को देख रहे हैं और हम अपनी कलाओं के संरक्षण के लिए ठीक प्रकार का वातावरण नहीं दे पा रहे हैं तो मुझे लगता है कि राजाश्रय मिले और लोकाश्रय मिले तभी हमारी लोककलाएँ जीवित रह सकती हैं। मुखौटा जो है वह तो आदिमकाल से चला आ रहा है और बिल्कुल शुरुआती तौर पर जो जनजाति समुदाय अपने आदिम अवस्था में था तो वह देखता था कि उसको दिख रहा है कोई वन्यजीव है वन्य प्राणी है तो उसके आकार को बनाकर अपने चेहरे पर लगाता था। सींघों का प्रयोग किया जाता था। कई स्थानों पर आज भी जनजातियां हैं जो मुखौटों का विविध रूपी इस्तेमाल करती हैं कहीं पर वह पूरे चेहरे को वह ढक देता है, कहीं वह सिर को ढक देता है। कहीं पर चेहरा जो है वह विशेष प्रकार से पोता जाता है कहने का तात्पर्य यह है कि मुखौटों को व्यापक परिप्रेक्ष्य मिला है हमारी भारत भूमि में और अभिव्यक्ति का जो मानदंड है वह कितना अनूठा है। आपको बता दूँ कि अपने यहाँ अभिनय के चार प्रकार माने गये हैं। हम मुखौटों को आहार्य अभिनय के रूप में विशेष महत्त्व देते हुए दिखाई देते हैं। हमारे यहाँ आंगिक अभिनय, वाचिक अभिनय ओर सात्त्विक अभिनय है। कल्पना करें कि मुखौटों के कलाकार के पास माध्यम बचा ही क्या है ? वह जो सूक्ष्म अभिनय है विभिन्न मुख – मुद्राओं के द्वारा किया जाने वाला वह तो कर ही नहीं पायेगा क्योंकि उसके चेहरे पर मुखौटा लगा हुआ है। अपने यहाँ के कलाकारों ने वीभत्स रूप, रौद्र रूप, और श्रंगार रूप तथा विभिन्न प्रकार के भावों को अभिव्यक्त करने वाले अलग – अलग मुखौटे बनाये जो सीधे – सीधे उनके चरित्र से जुड़ते हैं और बड़ी सहजता भावाभिव्यक्त करते हैं। हनुमान जी का मुखौटा होगा तो थोड़े से प्रतीकों के माध्यम से बना देंगे लेकिन अब केवल मुखौटों के आधार पर काम नहीं करते हैं उसके आंगिक अभिनय भी महत्वपूर्ण होता है। अब मुखौटा जो है वह किसी राक्षस का धारण कर लें या किसी विभक्त रस की अभिव्यक्ति करने वाले किसी खल पात्र का कर लें लेकिन अगर आपका आंगिक अभिनय जो है कोमल होगा तो निश्चित तौर पर उस मुखोटे को धारण करने का कोई तात्पर्य नहीं रह जाएगा। देवी का अभिनय करना है तो देवी के अनुरूप ही मुखौटा नहीं होगा आंगिक अभिनय आपको उसके अनुरूप करना होगा तो मुखौटा जो है वह मात्र केवल मुख पर चढ़ाया जाने वाला आवरण नहीं है उसे शेष जो 3 आयाम बचते हैं अभिनय के वाचिक अभिनय के साथ भी हमें जोड़ना पड़ेगा क्योंकि अगर उस प्रकार की ध्वनि नहीं होगी उस प्रकार की अभिव्यक्ति नहीं होगी तो मुखौटे का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। इसी प्रकार आंगिक अभिनय को भी हमें देखना पड़ेगा लेकिन सात्त्विक अभिनय के साथ समस्या यह होगी कि वह उतना संभव नहीं है मुखौटों के माध्यम से। लेकिन फिर भी कुछ छोटी-छोटी चीजें वह शेष हमारा जो अंगोपांग हमें दिखाई दे रहे हैं अगर अभिनेता उसका इस्तेमाल करेगा तो वह भी प्रकट हो सकता है। प्रयोगधर्मी निर्देशकों में मैंने कई ऐसे निर्देशक कई ऐसे नाट्य मंचन देखे हैं जिनमें मुखौटों का कठपुतलियों का आधुनिक परिवेश में प्रयोग हुआ है। कई ऐसे लेखक हैं जिन्होंने अपनी कृतियों में स्थान दिया है विशेष तौर पर जो पुराख्यानों पर आधारित जो मध्यकालीन नाट्य रूप हैं आप लोग देख सकते हैं कि रामलीला है उसमें मुखौटों का बहुत प्रचलन रहा है व्यापक तौर पर प्रयोग होता है। गणेश जी दिखाना है तो कैसे दिखाएंगे गणेश जी बिना मुखौटे के तो दिखा नहीं सकते हैं हनुमान जी को दिखाना है तो भी इस्तेमाल किए किया जाएगा मुखौटा। इसी प्रकार की स्थिति पुराख्यानों पर आधारित आधुनिक परिवेश में जो नाटक बने हैं उनमें भी दिखाई देती है। ‘हयवदन’ प्रसिद्ध कृति है गिरीश कर्नाड की वह भी एक मंचन कैसे होगा बिना मुखौटे के हो नहीं सकता यही स्थिति गुलवर्धन के थिएटर की है। गुलवर्धन ने तो इस विधा को बहुत चमत्कारिक रूप में और बेहद प्रयोगशीलता के रूप में आगे बढ़ाया है , और मुझे यह सौभाग्य मिला है कि गुरुवर्धन जी से साक्षात्कार भी लिया है और गुलवर्धन जी के थिएटर को भी देखा। उन्होंने पुरातन काल से चली आ रही कठपुतली और मुखौटों की परंपरा को बिल्कुल अभिनव विन्यास दिया और उसके कारण वे नए से नए विषयों को लेकर अपनी प्रस्तुतियां अपनी करती थीं। विशेष तौर पर रामलीला का एक विशेष मंच आवरण हम लोगों ने देखा है तात्पर्य है कि प्रयोगधर्मी निर्देशक चाहे तो हमारे दौर में भी मुखौटों और कठपुतली विधा के जो विभिन्न आयाम हैं उनका ठीक प्रकार से प्रयोग कर सकता है। कठपुतली की सबसे बड़ी विशेषता है कि अब इसमें अब अंग भी नहीं बचा है क्योंकि मुखौटों में तो चेहरा ढका है बाकी आंगिक स्थितियां बनी हुई हैं लेकिन कठपुतली के साथ यह संकट है कि उसमें कुछ भी नहीं है केवल आपके पास पुतलियां हैं या आप का हाथ है जिसमें आपने दस्ताना पहना हुआ है जिससे आप कठपुतलियाँ चला रहे हैं या छाया पुतलियां ( शैडो पपेट ) हैं। अब इसमें तो कितना कठिन माध्यम है कि चरित्र को रूपांतरित करने के लिए मंच पर आप नहीं जा रहे हैं केवल वह आकृति जा रही कठपुतली जा रही है। इससे आप पार्श्व से वाचिक अभिनय कर सकते हैं तो निश्चित तौर पर जिन मंचों पर चतुरायामी अभिनय के लिए गुंजाइश होती है वह कलाकार को छूट मिलती है लेकिन मुखौटे और कठपुतली दोनों थे ऐसी विधा है जिसमें चतुरायामी अभिनय के लिए संभावनाएं नहीं बचती हमारा माध्यम सीमित हो जाता है। लेकिन अगर कोई प्रयोगधर्मी व्यक्ति है तो इस पर बहुत अच्छे से काम कर सकता है। मुझे लगता है कि लोक जीवन और लोक कलाओं के मध्य यदि मुखौटा और कठपुतलियों का फिर से सम्यक प्रसार हो तो निश्चित तौर पर यह विधा बहुत सशक्त है और इनके माध्यम से हम नए विषयों को भी एकदम से समसामयिक विषयों को भी संप्रेषित कर सकते हैं। हम क्यों नहीं पर्यावरण से जुड़े हुए विषयों को लेकर या फिर जो तापीय परिवर्तन हो रहा है , जो जलवायु से संबंधित संकट आ रहा है या आधुनिक परिवेश से जुड़ी हुई कई समस्या आ रही है उनमें भी हम लोगों को मुखौटों और कठपुतलियों का प्रयोग कर सकते हैं हमारे देश के कई लोगों ने इस पर काम किया है। देवीलाल सामर का नाम सुविख्यात हैं जिन्होंने राजस्थान में बैठकर कठपुतली प्रथा को वैश्विक स्थिति तक पहुंचाया है। और वह एक महत्वपूर्ण प्रसंग देवीलाल सामर जी के साथ रहे महेंद्र भाणावत मुझे सुना रहे थे कि जब हमारे यहां के कठपुतली कलाकारों को लेकर उन्होंने योजना बनाई कि इनका प्रदर्शन विश्व स्तर पर होने जा रहे है कठपुतली प्रदर्शन में हम करवाना चाह रहे हैं तो भारत की तत्कालीन जो प्रमुख लोग थे संस्कृति से जुड़े हुए लोग थे उन लोगों ने कहा यह कैसे संभव है क्योंकि हमारे यहां तो कठपुतली चलाने वाला बेचारा वह एक भिक्षाटन करने वाले व्यक्ति की स्थिति में पहुँच चुका था और यह हम सोच नहीं पा रहे थे कि अमेरिका ,जापान या यूरोपीय देशों की जो कठपुतली के सामने हमारे देश की कठपुतली कैसे खड़ी हो सकती है लेकिन सामर जी ने , महेंद्र भानावत जी ने और अन्य लोगों ने यह कहा कि हम कठपुतली को उसी स्तर पर विकसित करेंगे। राजस्थान के उदयपुर के आस-पास के कई कलाकार इनको बनाना और इनको नचाना छोड़ चुके थे। उन्होंने वर्कशॉप की और स्क्रिप्ट तैयार की और उसके बाद में जिस तरह से कठपुतली कला सामने आई दिल्ली में उसका प्रदर्शन हुआ तो उसको फिर विश्व स्तर पर होने वाले कठपुतली महोत्सव में भारत का दल गया और उसके बाद उसकी पुनर्स्थापना हुई। तात्पर्य है कि हमें कहीं न कहीं अपनी जड़ों के साथ जुड़ना होगा और आधुनिक रंगमंच में आधुनिक परिवेश में उसकी शक्ति और संभावना पर विचार करना होगा। निश्चिततौर पर लोक कलाकारों ने संकट झेला है। शहरीकरण हो रहा है मैंने जैसा अभी बताया कि कई ऐसे कलाकार हैं जो बताते हैं कि उनके पूर्वज उस विधा को करतेथे लेकिन बाद के लोग दूर हट गए।

फड़ चित्रन की जो कला है उसके साथ भी यह संकट हुआ। भीलवाड़ा क्षेत्र में रहने वाले कलाकार इसको प्राय: छोड़ने की स्थिति में आ गए थे लेकिन यही लोग देवीलाल सामर, महेंद्र भाणावत जी आदि लोगों ने उनसे कहा कि नहीं आप इसको छोड़ क्यों रहे हैं ? उन्होंने कहा कि हमको इस कला से मिलता क्या है हम तो नए ढंग के साइन बोर्ड बनाएंगे उससे कमाई हो सकती है पुरानी चीजों को अब कौन खरीदता है, कौन उनको स्थापित करता है, कौन उन्हें प्रतीक रूप में पूछता है या उनका प्रदर्शन करवाता है। उन्होंने उस दौर में संस्कृति से जुड़े हुए जो लोग थे उनसे बात की, उनकी वर्कशॉप आयोजित करवाई। फिर कलाकारों प्रश्रय मिला उनको राष्ट्रपति सम्मान मिले, उन्होंने पुनः स्थापना करवाई उस फड़ चित्रण की। एक तरह से पुन: स्थापना हुई उस फड़ चित्रण कला की। कावड़ कला के साथ भी यही हुआ, कावड़ भी लगभग पीछे चली गई थी कावड़ कला को भी पुनर्जीवन मिला। मालवा का जो माच है वह भी विलुप्त के कगार पर जा रहा था लेकिन अब नए युग के जो रंगकर्मी है उन्होंने कोशिश की उनके साथ जुड़े उस मंच के कलाकारों के साथ जुड़े। उस वक्त हम लोगों ने भी यहां पर माच के महोत्सव करवाये हैं। पिछले डेढ़ दशक के अंदर 6-7 महोत्सव हो चुके हैं और हमने कुछ रंग दल जो लगभग निष्क्रियता की स्थिति में जा रहे थे या जिनके पूर्वज कलाकार थे धीरे-धीरे दूर हो रहे थे तो ऐसे लोगों के लिए युवाओं की रंग कार्यशाला करवाई। माच की कार्यशालाएं करवाई और प्रयास अगर करेंगे तो निश्चित तौर पर यह हो सकता है। लोक भाषाएं तो हमारे देश की प्राण हैं इस देश में यदि लोक भाषाएं नहीं होंगी तो यह देश नहीं रहेगा इस देश को परस्पर जोड़ने का काम एक दूसरे के हाथ में हाथ डाले हुए लोक भाषाएं ही कर रही हैं। इस देश की संस्कृति ही लोक संस्कृति है । हम लोग कितने भी शहरी हो जायें हम लोग कितने भी महानगरी जीवन की तरफ अग्रसर हो जायें लेकिन बिना लोक कलाओं, लोक भाषाओं, लोक संस्कृति के यह देश नहीं बचेगा और इनके मध्य से जो आपस में लड़वाने की कोशिश जो लोग कर रहे हैं इसके प्रति भी हमें कहीं न कहीं सजग होना पड़ेगा क्योंकि जब एक लोक भाषा मिटेगी तो इसका मतलब है यह नहीं है कि दूसरी भाषा बच जाएगी दूसरी भाषाएं भी उसी गति से समस्या में आएंगी। अत: सब को सामूहिक रूप से सभी क्षेत्र में बोली जाने वाली लोक भाषाओं के केवल रक्षण नहीं उनके प्रयोग के लिए प्रयास करना चाहिए| मेरा यह मानना है कि लोक संस्कृति, लोक परंपराएं , लोक भाषाएं आचार या मुरब्बे की तरह नहीं है जिनको संरक्षित पदार्थ आप डाल दें बरनी में रख दें और वह बच जाएँगी ऐसा नहीं होगा। अगर आप रहेंगे तो लोक भाषाएं बची रहेंगी आप उसको सोचे कि मैं इनको 11 मर्तबान में रख दूं उसको संजों लूं और बस हो गया काम तो ऐसा उचित नहीं होगा तो इस दृष्टि से संरक्षण ही नहीं वरन उनके प्रयोग की आवश्यकता है। नाट्य में मुखौटों और कठपुतलियों का व्यापक प्रयोग हो सकता है इसमें किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं है। यह बेहद धैर्यवान बेहद सजग और प्रयोग शील व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह किस तरह से इसकी रक्षा ही नहीं करें वरन इसे लोक व्यापी बनाने की चेष्टा करे। कठपुतलियों के माध्यम से अभिनव रंग प्रयोग होने चाहिए इसी तरह से जहाँ – जहाँ आवश्यकता हो जरूरी नहीं कि पूरे नाटक में मुखोटों का इस्तेमाल किया जाए जहां आवश्यक हो मुखौटों का इस्तेमाल करें। इसी तरह जहाँ आवश्यकता हो वहां कठपुतलियों का प्रयोग करें निश्चित तौर पर इससे जो नाट्य प्रस्तुति है उसमें नई संभावनाओं के द्वार खुलेंगे। हमारा जो मंच रहा है वह लोकमंच रहा है हमने पश्चिम के प्रभाव से एक बंद तरह का बॉक्सनुमा सेट बना लिया यथार्थवादी थिएटर में आ गए हैं हम लोग, और हमने कलाकार को और दर्शक को दोनों को बीच खाँचे में डाल दिया है। हमारा रंगमंच तो खुला रंगमंच है हमारे यहां रात-रात भर जो प्रस्तुतियाँ होती थीं। उसके अंदर बिल्कुल किसी औपचारिकता के अभाव में बिना उसके लोग मंचन करते थे और रात-रात में मंचन करते थे, तो अगर कोई श्रेष्ठ रंग निर्देशक प्रयोगशील हो तो मुखौटे और कठपुतली इन दोनों के माध्यम से उन्हें नई दिशा दे सकता है। इससे मुखौटे और कठपुतली की विधा ही लाभान्वित नहीं होगी मुझे लगता है कि आधुनिक थिएटर भी लाभान्वित होगा। कठपुतलियों और मुखौटों के माध्यम से हम बहुत सारे प्रतीकों को भी व्यक्त कर सकते हैं। ‘आधे अधूरे’ के बारे में आप सभी जानते हैं कि ‘आधे अधूरे’ क्या है ? ‘आधे अधूरे’ एक तरह से मुखौटे का परिवर्तन ही तो है उसमें भेष बदलता है जबकि व्यक्ति वही रहता है। हमारे यहाँ मुखौटे बदलते थे और अभिनेता बदल जाता था उसका कथन बदल जाता था तो निश्चित तौर पर मुखौटों और कठपुतली दोनों के प्रयोग से अभिव्यक्ति के नये अर्थों को तलाशा जा सकता है।

संरक्षण की जहाँ तक बात है मैं फिर वहीं आता हूँ मुखौटा को संग्रहालय में रख दें कठपुतली को संग्रहालय में रख दें। और प्रदर्शनी में दिखाएं इनको कि ऐसा था उनके चित्र दिखाएं उससे संरक्षण नहीं होगा, उसे हम दस्तावेजी करण के स्तर पर मान सकते हैं। इनका जब तक लोक व्यवहार नहीं होगा, लोक में प्रयोग नहीं होगा, नए रंगमंच के साथ इनका रिश्ता नहीं बनेगा तब तक इन दोनों विधाओं के संरक्षण, संवर्धन और नवाचार के लिए कोई रास्ते नहीं खुल सकते। अतः व्यापक तौर पर इन दोनों विधाओं से जुड़ी हुई कार्यशालायें केवल राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं वरन प्रादेशिक और जिला स्तर पर आयोजित की जानी चाहिए। स्थान-स्थान पर इन विधान से जुड़े हुए जो पुराने कलाकार हैं उनको खोजें हम लोग उनको बिठाए उनके रंग कार्यशाला आयोजित करवाएं। मैं नाथद्वार की गलियों में घूम रहा था लोग अपने अपने ढंग से चीजों को देखते हैं लेकिन मेरी निगाह एक दुकान पर गई जहां पर गणेश जी का एक मुखौटा टंगा हुआ था मैं गया उनके पास मैंने उनसे कहा कि मुझे और मुखौटे दिखाएं। उनको लगा कि मैं शायद कोई नाट्य मंडली वाला हूँ। जिसका विषय उस क्षेत्र की किसी लोक कला से सम्बंधित है। जब उसने अंदर से बहुत सारे मुखौटे निकाले तो मैं चकित रह गया कितना समृद्ध मुखौटों का संसार हमारे यहाँ पर है मैंने कुछ सैंपल के रूप में कुछ उस से खरीदें और उसने जो कहा उस उसको पैसा दिया। तात्पर्य यह है कि जब इस तरह से बिल्कुल अवहेलना का शिकार यह कलाएँ हो रही हैं तो उनको केवल हम लोग सजाकर संरक्षित नहीं कर सकते। उनके कलाकारों को बुलाएं, सीखें कि कैसे मुखौटों का निर्माण होता है। इस कला को हम लोग नई पीढ़ी से जोड़ें, स्कूल कालेज स्तर के विद्यार्थियों को जोड़ें। मंचन में उनका प्रयोग हो इसी प्रकार कठपुतली जटिल है मेरे पास सैंपल है जिसमें हम लोग देखते हैं कि किस तरह से एक अनगढ़ कास्ट फलक लिया जाता है उसको धीरे-धीरे तराशा जाता है और बाद में चेहरा बनता है और उसके बाद में कलाकार उसमें रंग डालता है रंग भरता है और फिर वस्तुओं से उसको सजाया जाता है और फिर कठपुतली आकर लेती है। हमारे यहाँ कुछ डॉक्यूमेंट उपलब्ध है विक्रम विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में। निश्चित तौर पर इन कलाओं को केवल संग्रहालय की वस्तु न बनाएं, उन पर निरंतर कार्यशालाएँ हो, उनके कलाकारों को बुलाएं और फिर उनका मंचन कराएं क्योंकि मंच पर जाकर ही उनका पालन-पोषण होगा और लोग नए-नए अर्थों की अभिव्यक्ति के माध्यम से कर पाएंगे। धन्यवाद …….

ललित कुमार सिंह

शोधार्थी : दिल्ली विश्वविद्यालय , हिंदी विभाग

शोध कार्य : रंगमंच, मुखौटा और कठपुतली कला

ई मेल – lalitkumarsingh251@gmail.com

मो.- 9335980492

हिंदी के प्रमुख ‘रेखाचित्रों’ में चित्रित ‘संवेदना’ के विविध आयामों का अध्‍ययन-डॉ. विश्‍वजीत कुमार

हिंदी के प्रमुख ‘रेखाचित्रों’ में चित्रित ‘संवेदना’ के विविध आयामों का अध्‍ययन

डॉ. विश्‍वजीत कुमार

संपर्क : 9716639869

ई-मेल : drvishwajeetkumar14@gmail.com

सारांश

रेखाचित्र सदृश कथेत्तर विधाओं का प्रत्‍येक शब्‍द मानवीय जिजीविषा, अनुभूति, चिंतन और कर्तव्‍य से संपृक्‍त रहता है। रेखाचित्र विधा अन्‍य कलाओं की भांति सौंदर्यानुभूति की अभिव्‍यक्ति है और रचनाकार की यह अनुभूति जितनी ही गहरी है, वह जीवन के रहस्‍य को, सत्‍य को उतने ही संयत रूप से व्‍यक्‍त करने में सफल हुआ है। इस विधा की स्निग्‍धता, अगोचरता और इन सबके ऊपर नव-नव संवेदनशीलता का हिंदी साहित्‍य में विशिष्‍ट स्‍थान है। रचनाकारों ने संवेदनापूर्ण यथार्थ का चित्रण कर इस विधा को समृद्ध एवं महत्‍वपूर्ण बना दिया है। प्रस्‍तुत आलेख प्रमुख रेखाचित्रों में संवेदना के विविध आयामों को, इन्‍हीं संदर्भों में परखता है।

बीज शब्‍द: रेखाचित्र, हिंदी साहित्‍य, विधा, संवेदना, पारिवारिक आयाम, सामाजिक आयाम, धार्मिक आयाम, राजनीतिक आयाम, मानवीय आयाम

शोध आलेख

मानव अन्य प्राणियों से इस रूप में अलग और श्रेष्ठ है कि मानव के पास ‘विचार शक्ति’ है। वह जिन चीजों को देखता है, उसे अनुभूत भी करता है; साथ ही उससे किसी न किसी रूप में प्रभावित भी होता है। किसी वस्तु या घटना के प्रभाव से उपजी भावनाएँ एवं अनुभूतियाँ ही ‘संवेदना’ के रूप में जानी जाती है। इस ‘भाव-प्रेरणा’ का मनुष्य जीवन में विशेष महत्व है। यह मानव जीवन में जीवंतता, सजगता और चेतन्यता का आधार और प्रमाण भी है। संवेदना एक प्रकार से किसी के प्रति विशेष सहानुभूति रखना भी है। ज्ञान या ज्ञानेन्द्रिय के अनुभव के अर्थ में भी इसका अर्थ लिया जाता है। ‘संवेदना’ शब्द के विग्रह से हमें ‘समान वेदना’ या ‘समान दुःख’ शब्द प्राप्त होते हैं जो ‘सहानुभूति’ के नजदीक है। अंग्रेजी में भी इसके लिए ‘सिम्पैथी’ या ‘सेंसेटिविटि’ शब्द व्यवहार में लाया जाता है। और यह संवेदना सामान्यतः किसी के शोक, दुःख, कष्ट या हानि के प्रति जागृत होता है।

समाज मानवों का कृत्रिम समुच्य है और संवेदना मानव समाज की व्यवहारिक प्रक्रिया। साहित्य इसी बीच की एक कड़ी है। साहित्यकार का संवदेनशील हृद्य ही उसे साहित्य सृजन की ओर प्रेरित करता है और साहित्य का भी उद्धेश्य है मानव में विशुद्ध संवेदनाओ को जगा कर एक सजग, संवेदनशील एवं सामाजिक प्राणी बनाना।

यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि साहित्यकारों में ऐसी कौन सी विशिष्ट संवेदनाएं है जो उसे सृजन की ओर प्रेरित करती है जबकि ‘संवेदना’ प्रत्येक मानव का सहज प्राप्य गुण है! वस्तुतः साधारण संवेदना सृष्टि नहीं रचती क्योंकि वह संवेग मात्र होती है, साहित्यकार का चिंतन दार्शनिक, हृद्य कोमल और दृष्टि पैनी होती है जिससे उसकी संवेदना में गहराई होती है जो कालानुभूति बन पाती है, वस्तु या घटना के वास्तविक कर्म और मर्म को उद्घाटित करती है, अतः उसका असर भी पुरजोर होता है। इस प्रकार साहित्य में, संवदेनाओं का स्वाभाविक प्रतिपादन हो जाता है। साहित्यकार मन के धरातल पर उभरी संवेदनाओं को चयनित विधा के पात्रों, संवादों व विभिन्न रसों और भाषाओं में व्यक्त करता है; जिससे वह अपनी अनुभूतियों को पाठक तक पहुँचा कर उसे प्रभावित करने की चेष्टा करता है। साथ ही; भाषा, भाव और प्रेरणा तीनों प्रत्येक काल में साहित्य की संवेदना को नई अर्थवत्ता भी प्रदान करते हैं।

हिंदी साहित्य में, रेखाचित्र विधा की रचनाओं में साहित्यकार की संवेदनाओं की गहरी पैठ है। कल्पनाओं के इतर जीवन-यथार्थ से अनुभूत संवेदनाएँ ही ‘रेखाचित्र’ का आधार है। समीप की घटनाएँ या कोई मनुष्य-मनुष्येत्तर प्राणी जब साहित्यकार की संवेदनाओं को निंरतर उद्वेलित करती है तो वह इस विधा की ओर प्रवृत्त होता है। वस्तुतः रेखाचित्र में संवेदनाओं का चित्रण बहुरंगी, बहुआयामी, और बहुस्तरीय होता है। निकट संपर्क में आए वस्तुओं व प्राणियों से गहरे लगाव व सप्रेम जीवन में आस्था का चित्रण रचनाओं में सर्वत्र व्याप्त है। अंध-उपभोक्त्तावादी संस्कृति के अपनाने से ऊपजी संवेदनहीनता, भाग-दौड़ की जिंदगी से उत्पन्न छटपटाहट का कहीं चित्रण हैं तो कहीं सरांध संस्थागत अव्यवस्था के बिंब हैं। कहीं मानवीय मूल्यों में ह्रास का असंतोष है तो कीं समाज में व्याप्त विसंगतियों का पर्दाफाश। यदि एक ओर विद्रोह, आक्रोश और सामाजिक अवांछनीय ढ़ाँचों को बहिष्कृत करने का आह्वान भी है तो दूसरी ओर मानव हृद्य के सुंदर भावों का चित्रण भी अवश्य मिलता है। रेखाचित्र विधा संवेदना के विविध आयामों को समग्रता एवं संपूर्णता से समेटे हुए हैं, जिसका विस्तृत अध्ययन आगे किया जा रहा है-

पारिवारिक आयाम

परिवार अपने सदस्यों के संरक्षण की संस्था भी है और परस्पर विकास, सहयोग, सामूहिक उन्नति की भावना लिए जीवन की धुरी भी। यह कई पीढ़ियों व विचारों का सम्मिश्रण हो सकता है। संस्कार निर्माण से लेकर जीवन जीने की कला तक, सामाजिक दायित्व की समझ से लेकर व्यावहारिक शिक्षा ग्रहण करने तक; सबमें यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक सामान्य परिवार के किसी भी सदस्य की संवेदना में समस्त परिवार सहभागी होता है जो इस संस्था की खूबसूरती है। परिवार के प्रत्येक सदस्य का न केवल अन्य दूसरे सदस्यों के प्रति जिम्मेदारियाँ जुड़ी होती है बल्कि संवेदनात्मक रूप से भी परस्पर जुड़ाव होता है। वैसे तो प्र्रत्येक सदस्य स्व्यं में महत्वपूर्ण होता है लेकिन परिवार-हित सर्वोपरि। दूसरे शब्दों में, वैचारिकी अंतर व मनोभावों का सुंदर सामंजस्य एक स्वस्थ व प्रगतिशील परिवार का निर्माण करता है, जो मानव के समग्र विकास में सहयोगी और उपयोगी है। लेकिन विडंबना यह भी है कि हमारे यहाँ परिवार का स्वरूप हमेशा एक सा नहीं रहा है। संयुक्त परिवार से लेकर एकल परिवार तक की अवधारणा हमारे समाज व संस्कृति में रही है। भारत में संयुक्त परिवार की प्रणाली प्राचीनतम समय से विद्यमान रही है लेकिन पश्चिमी प्रभाव, औद्योगिकी क्रांति के बाद की नई अर्थव्यवस्था, नवीन जीवन शैली व बदली हुई आवश्यकता और मानसिकता ने परंपरागत संयुक्त परिवार संस्था का विनाश प्रारंभ कर दिया। लोग एकल परिवार की ओर मुड़ते गए। हालांकि दोनों प्रणालियों के फायदें एवं नुकसान गिनाए जाते रहे हैं। अलग-अलग महत्ताएँ बताई जाती है। संयुक्त परिवार एक वट-वृक्ष की भाँति होता था, दादा-दादी, घर के बुजुर्ग मुखिया की तरह होते, जिसके छत्र-छाया में परिवार संस्कृत होकर पलता बढ़ता था। एक सुरक्षा की भावना सदैव बनी रहती थी। लेकिन वैयक्तिक स्वतंत्रता व पृथक स्वतंत्र विकास के अवरोध का आरोप इस प्रणाली पर लगाया जाता है। एकल परिवार इसका समाधान ढूँढ़ने की कोशिश जरूर है लेकिन असुरक्षा की भावना, मानसिक अवसाद, रिश्तों में टकराहट व संवेदनाहीनता, मूल्य ह्रास जैसे मामले भी इसकी देन है। दादा-दादी, चाचा-चाची, माँ-बाप, पति-पत्नी, भाई-बहन, बेटा-बेटी, पोता-पोती के साथ नौकर-चाकर, पशु-पक्षी भी जहाँ संयुक्त परिवार के हिस्सा होते थे, समय के साथ सिमटता गया और फलस्वरूप इस बिखराव व दूरी ने संवेदनाओं में भी कमी या ह्रास पैदा किया। रेखाचित्रकारों की कथा-वस्तु भी इन तत्वों को व्याख्यायित करती है।

अपने जीवनावधि में, समय के साथ मनुष्य वृद्ध जनों के प्रति अधिक संवेदनशील होता जाता है। जीवन की समझ व स्वानुभव इसमें सहायक होता है। दादा-दादी, नाना-नानी से लगाव तो बचपन में भी होता है लेकिन आगे चलकर उनके प्रति हमारा भाव गंभीर व प्रायोगिक होता जाता है। रेखाचित्रकार देवेन्द्र सत्यार्थी को अपने मित्र गुरूबख्शसिंह से उनकी दादी के रेखाचित्र को सुनकर दादा जी की याद आ जाती है। उनका लिखा ‘दादा-दादी के रेखाचित्र’ अत्यंत संवेदना से भरा व भावपूर्ण है। वे लिखते हैं-‘मेरे मित्र की दादी का रेखाचित्र सुंदर भी है और महत्वपूर्ण भी। इससे मुझे प्रेरणा मिली है। इसे देखकर भला कौन यह कहने का साहस करेगा-अगले वक्तों के हैं ये लोग, उन्हें कुछ न कहो!…….अपने मित्र की दादी का ध्यान करते ही मुझे अपने दादा का ध्यान आ जाता है। जैसे आज भी मेरे दादा मेरे कल्पना के कला भवन में बैठे मुस्कुरा रहे हो, जैसे वे आज भी मुझसे कह रहे हों-मेरे लिए एक भुट्टा भून लाओ न! हाँ मुझे याद है कि मृत्यु से दो दिन पहले ही उन्होंने मुझसे भुट्टा मांगा था।…….मैं बाहर यात्रा पर था, वे बिमार पड़ गए। मैं आया और वे जाने के लिए तैयार हो गए। ठीक दीवाली के दिन मेरी जाँघ पर उनका सिर था, जब उन्होंने स्व्यं मृत्यु का स्वागत किया; वे चले गए। पर अपने पीछे शत-शत स्मृतियाँ छोड़ गए।’1 पोता व दादा का ऐसा लगाव निश्चय ही पाठक को अपने परिवार की ओर सजल आँखों से खींच जाता है।

एक सजग माँ परिवार के उन्नति में किस प्रकार अतुलनीय सहयोग दे सकती है, विष्णुप्रभाकर ने चित्रित किया है। मातृत्व गुण के अतिरिक्त अगर माँ शिक्षा के प्रति भी सजग हो तो बच्चों के संस्कार पर महत्तम असर होता है। ‘मेरी माँ’ रेखाचित्र में वे लिखते हैं-दहेज में मेरी माँ पुस्तकों से भरा एक संदूक भी लाई थी। जब पढ़ने योग्य हुए तब बड़े गर्व से हमने उस संपत्ति पर डाका डाला और उसे पढ़ते-पढ़ते नष्ट कर दिया। क्या यह कहना अतिश्योक्ति होगी कि आज मैं जो कुछ हूँ एक मात्र उसी डाके के कारण हूँ।’2 माना भी जाता है कि परिवार बच्चों के लिए प्रथम पाठशाला है, जिसमें माँ की भूमिका सर्वोपरि है। ‘माँ’ अपनी प्रगतिशील सोच से उदाहरण प्रस्तुत कर, बच्चो को ऐसा संस्कार भी दे सकती है। लेखक की माँ भी वर्जनाओं को तोड़ती है। उनके रूढ़िग्रस्त परिवार में सबसे पहले परदे का परित्याग करने का गौरव भी उनकी माँ को ही प्राप्त हुआ। इस रेखाचित्र में, पाठक की संवेदना तब और द्रवित हो जाती है जब पर्दे के परित्याग की वजह भी पता चलता है। अपने सास के बैकुंठवास के बाद ससुर को किसी प्रकार की असुविधा न हो, यह बड़ा कारण था। आज के संवेदनहीन होते समाज में अपने वृद्ध जनों के लिए परित्याग बिड़ले जान पड़ता है। इससे भी बड़ा परित्याग माँ ने तब किया जब परिवार का व्यापार नष्ट हो जाने पर, कुटुंब की लाज बचाने के लिए अपने जेबर भी बेच दिए। स्त्री का जेवर-त्याग निश्चित ही, प्रशंसनीय है। परिवार के हित के समक्ष वह अपना जेवर-मोह भी त्याग देती है। रचना के अंत में, लेखक बड़े ही संवेदना भरे शब्दों में, माँ को याद करते हैं-‘जिसने जीवन भर संघर्ष किया, जो सदा विजयी हुई, वह मेरी माँ, क्या मृत्यु से हार गई! अत्यंत रूपवती, विशाल हृद्या, जिनके प्रेम के वट-वृक्ष के नीचे न जाने किस-किस-ने आश्रय लाभ लिया, वह मेरी माँ क्या मृत्यु से हार गई! नहीं, मृत्यु ने उन्हें पराजित नहीं किया है, अमर किया है। मेरी माँ अपने परिवार में सदा जीवित रहेंगी और उस परिवार का क्षेत्र बहुत-बहुत विशाल है।3

पिता न केवल अपने परिवार की रक्षा करता है बल्कि खुद उदाहरण प्रस्तुत कर बच्चों में संस्कार भी भरता है। कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ने ‘मेरे पिताजी’ में अपने उदार, परोपकारी व सहृद्य पिता को चित्रित किया है। ‘मानव के प्रति निष्काम ममता उनकी अपनी चीज थी। जो घासवाला उनकी गाय के लिए घास लाता, उसे चाय पिलाई जाती और यजमानों के यहाँ से आई-गई सुहाली मिठाई अवश्य दी जाती। अगर वह बूढ़ा होता, तो उसे जरा सी अफीम की गोली भी वे दे देते। यह सब उन्हें अपनी शीतलपाटी पर बैठाकर किया जाता और इसके लिए वे अपना ही गिलास काम में लाते।……..वे इतने मीठे थे कि संसार की कोई भी कड़वाहट, उन तक पहुँचते-न-पहुँचते स्व्यं मीठी हो जाती थी! ओह; वे कितने अच्छे थे।’4

अपने बच्चे का एक सुंदरसा चित्र उपेन्द्रनाथ अश्क ने रचा है। परिवार में बच्चा अपनी शरारतों, जिज्ञासाओं व अन्य बाल-सुलभ क्रिड़ाओं से वातावरण जीवंत एवं स्फूर्तिमय बनाए रखता है। परिवार असल मायनों में भरा-पुरा परिवार लगता है। वे लिखते हैं-‘कई बार बच्चा मम्मी को जगाते-जगाते थककर अपने ‘पापा’ को प्रातः के उस ठन्डे वातावरण में, चाय के एक-गर्म प्याले के आनंद की याद दिलाने आ पहुँचता है। वह धीरे-धीरे अपने बिस्तर से उतरता है और अपने ठंडे-ठंडे हाथों से मेरे दोनों गाल पकड़ चूम लेता है।’5 प्रस्तुत रेखाचित्र में बाल-मनोविज्ञान का बड़ा ही सटीक व सजीव चित्रण है। बच्चे व अभिभावक के बीच के पारिवारिक संबंध को संवेदनापूर्वक रखा गया है।

रेखाचित्र साहित्य में, परिवार के प्रत्येक अंग-प्रत्यंग व वातावरण में मौजूद संवेदनाओं का विस्तृत चित्रण मिलता है। यथार्थ चित्रण के बावजूद ये रेाचक हैं और निश्चय ही प्रेरणादायी और सारगर्भित भी हैं।

मानवीय आयाम

मानव सह-अस्तित्व की भावना में विश्वास करता है। ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’, ‘वसुधैव कुटुंबकम’ व ‘प्रकृति-प्रेम’ की भावना मानव-संवेदना जनित मानवता ही है। हिंदी साहित्य में, रेखाचित्रकारों ने संवेदना के मानवीय आयामों का गहराई से चित्रण किया है। ‘संवेदना’ साहित्यकार को सृजन के लिए प्रेरित करता है और साहित्य सबके हित की भावना लिए होता है; रेखाचित्र की कथा वस्तु में इसकी अनुगुंज सर्वत्र है। रचनाओं के केंद्र में मानव-समस्या से जुड़ी चिंताएँ हैं। कुछ मानवों के बहाने संपूर्ण मानवहित के लिए सर्जना है। साधारण मानवों, प्राणियों के बहाने उच्चतर आदर्श प्रस्तुति की आकांक्षा है। मानव में और मानवीयता भरने के लिए संवेदनाओं का शब्दीकरण है। कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर अपनी रचनाओं के संदर्भ में लिखते हैं-‘अगले पृष्ठों में ऐसे ही मानवों के संस्मरण हैं, जो साधन या शक्ति के कारण नहीं, साधना एवं भक्ति के कारण ही दिप्तिमान् हैं; यहीं मैनें उन्हें कहा है दीप, जो प्रकाश फैलाते हैं और शंख, जो जागरण का संदेश देते हैं।…….जीवन का भटकना है गलत चीजों-वैल्यूज़ में अपनी सार्थकता मानना, तो हम इस प्रकाश में देखे कि जीवन की सार्थकता उसके गुणवान होने में, नम्र सेवाशील होने में, दूसरों के लिए उपयोगी होने में हैं, संहारक या साधन-संपन्न होने में नहीं-यह साधान संपन्नता धन की हो, बल की हो, पद की हो, या बुद्धि की हो!……मनुष्य की उच्चता यह नहीं है कि वह अपने लिए जिए, दूसरों को अपने लिए समझे या दूसरों को अपने लिए जीने-मरने का कर सके। उसकी उच्चता यह है कि वह दूसरों के लिए जिए, दूसरों के लिए उपयोगी होकर जिए।’6

श्रीराम शर्मा ने ‘पीताम्बर’ का जो रेखाचित्र खींचा हैं, उसमें पात्र की मानवीय संवेदना बखूबी वर्णित है- ‘पीताम्बर कुम्हार उन तपस्वी, ईमानदार, परहितकार और परोपकारी महानुभावों में से था, जो निष्काम सेवा को मानव जीवन की भित्ति समझते हैं। वे सेवा करते हैं किसी को दिखाने और नाम करने के लिए नहीं, वरन् इसलिए कि सेवा करना उनका स्वभाव है- कोयल की भांति, जो दूसरे के लिए नहीं, वरन् अपने लिए ही कंटकित होकर मधुर आलाप करती है।’7

एक फेरीवाला से महादेवी की आत्मीयता पाठक के संवेदनाओं को गहराई से छू जाता है। एक साधारण मनुष्य के सुख-दुःख से खुद को जोड़ लेना एक विशाल हृदय की पहचान है। यही मनुष्यता का प्रमाण है। चीनी फेरेवाले को याद करते हुए लिखती हैं- और आज कई वर्ष हो चुके हैं- चीनी को फिर देखने की संभावना नहीं, उनकी बहिन से मेरा कोई परिचय नहीं, पर न जाने क्यों वे दोनों भाई-बहिन मेरे लिए स्मृति पटल से हटते ही नहीं…. वह जन्म का दुखिया मातृ-पितृहीन और बहिन से बिछुड़ा हुआ चीनी भाई अपने समस्त स्नेह का एक मात्र आधार चीन में पहुँचने का आत्मतोष पा गया है, इसका कोई प्रमाण नहीं, पर मेरा मन यही कहता है।’8 लेखिका का एक अंजान के प्रति मंगलकामना मानवीय संवेदना का परिचायक है।

मानव न केवल प्रकृति का हिस्सा है, बल्कि प्रकृति के प्रति आकर्षण भी उसका स्वाभाविक गुण है। मानव प्रकृति से ही अपना विकास पाता है। नदी, नाले, खेत, खलिहान, सूरज, चंद्रमा, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सब प्रकृति के हिस्से हैं। रेखाचित्रों में ये बड़ी सुंदरता से चित्रित हुए हैं। ग्रामीण परिवेशों के वातावरण रेखाचित्रों में अत्यंत सजीव है। रामवृक्ष बेनीपुरी ने तो अपने रेखाचित्रों में प्रकृति का सुंदर मानवीकरण भी किया है। ‘बालगोबिन भगत’ में प्रकृति का अन्यतम चित्र काव्यात्मकता लिए हुए है-

‘आषाढ़ की रिमझिम है। समूचा गाँव खेतों में उतर पड़ा है। कहीं हल चल रहे हैं, कहीं रोपनी हो रही है। धान के पानी-भरे खेतों में बच्चे उछल रहे हैं। औरतें कलेवा लेकर मेड़ पर बैठी हैं। आसमान बादल से घिरा है, धूप का नाम नहीं। ठंडी पुरवाई चल रही। ऐसे ही समय आपके कानों में एक स्वर तरंग-झंकार सी कर उठी। यह क्या है, कौन है। पूछना न पड़ेगा। बालगोबिन भगत समूचा शरीर कीचड़ में लिथड़े, अपने खेत में रोपनी कर रहे हैं।….. भादों की वह अंधेरी अधरतिया। अभी, थोड़ी ही देर पहले मूसलाधार वर्षा खत्म हुई है। बादलों की गरज, बिजली की तड़प में आपने कुछ न सुना हो, किंतु अब झिल्ली की झंकार या दादुरों की टर्र-टर्र बालगोबिन भगत के संगीत को अपने कोलाहल में डूबो नहीं सकती।’9

मानवेत्तर प्राणी के साथ भी मानव का गहरा लगाव रहा है। आदिम युग से ही मानव ने पशु-पक्षी को अपने दैनिक जीवन में, मित्र-सहयोगी के रूप में स्वीकारा है। फलस्वरूप उससे संवेदनात्मक संबंध भी रहा है। ‘महादेवी जी कुछ विशिष्ट मानवेत्तर प्राणियों के प्रति अपनी जिस सहज, सौहार्द्र और एकांत आत्मीयता की अभिव्यंजना का जो अपूर्व कला-कौशल अपने इन चित्रों (मेरा परिवार) में व्यक्त किया है, वह केवल उनकी अपनी ही कला की विशिष्टता की दृष्टि से नहीं वरन् संसार-साहित्य की इस कोटि की कला के समग्र क्षेत्र में भी बेमिसाल और बेजोड़ है। ये कृतियाँ मानवीय भावज्ञता, संवेदना और कलात्मक प्रतिभा के अपूर्व निदर्शन की दृष्टि से शाब्दिक अर्थ में अपूर्व और अद्भुत कलात्मक चमत्कार हैं… उनकी संवेदना अत्यंत मार्मिक और जन्म-जन्मांतर की मानवीय अनुभूति के शोधन, परिशोधन और परिशोधन के सुदीर्घ योगाभ्यास के फलस्वरूप वर्षाकालीन निचिड़ मेघ के स्वतः स्फूर्त वर्णन और गहन पर्वन-प्रसूत निर्झर के अनिरूद्ध प्रवाह की तरह सहज विमुक्त और निश्छल सृजनशील प्रकृति की आदिम गतिशीलता की तरह एकांत स्वाभाविक है। अपने एक-एक लघुत्तम और सर्वथा उपेक्षित मानवेत्तर पात्र की सूक्ष्म संवेदना को प्रकृति-माता के जिस अति-संवेदनशील राडार की तरह पकड़कर जो मर्म-मोहक अभिव्यक्ति दी है, वैसी स्पर्शातीत भाव-ग्रहिता कोमल से कोमल अनुभूति वाले कवियों में भी अधिक सुलभ नहीं है, पंचतंत्र के पशुपात्रों की तो बात ही क्या है।’10

‘गिल्लू’ गिलहरी के साथ महादेवी ने अपने मधुर संबंधों को सुंदरता से चित्रित किया है’ ‘कभी मैं गिल्लू को पकड़कर एक लंबे लिफाफे में इस प्रकार रख देती कि उसके अगले दो पंजों और सिर के अतिरिक्त सारा लघु गात लिफाफे के भीतर बंद रहता। इस अद्भुत स्थिति में कभी-कभी घंटों मेज पर दीवार के सहारे खड़ा रहकर वह अपनी चमकीली आँखों से मेरा कार्य-कलाप देखा करता।’11

सामाजिक आयाम

भारतीय समाज अत्यंत प्राचीन एवं जटिल है। विविधता में एकता उसकी अन्यतम विशेषता है। समय के साथ समाज में निरंतर परिवर्तन होते रहे। समाज वैज्ञानिकता की ओर बढ़ता तो गया लेकिन संवेदना के स्तर पर कमजोर भी होता गया। श्यामचरण दूबे लिखते हैं- ‘समकालीन भारतीय समाज परिवर्तन के एक संवेगात्मक उद्वेग से गुजर रहा है तथा दुविधाओं और विडंबनाओं की एक शृंखला से मुठभेड़ कर रहा है। ये आहत करते हैं किंतु ये अपरिहार्य हैं। समाज के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने लोगों की सभी श्रेणियों की समस्याओं को सहानुभूति के साथ देखें, आर्थिक असमानताओं तथा अन्याय की समस्याओं के समाधान ढूँढे जन चेतना को व्यापक आयाम देने के कार्यक्रम चलाए, मिथक की अधीनता के विरूद्ध इतिहास के सच्चे अर्थ का उन्नयन करें तथा निर्णय करने में सहभागिता की प्रक्रियाएँ प्रारंभ करें। परंपरा के कुछ पक्ष अपनी जीवंतता तथा उपयोगिता के कारण जीवित रहेंगे जबकि अतीत के अनेक पर्तों वाले पूर्वाग्रहों को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा तथा शोषण और आतंक की संरचनाओं को ढहाना होगा।’12 रेखाचित्रकारों ने समाज के इस स्वरूप को बखूबी पहचाना है। समाज के प्रत्येक वर्ग व क्रियाकलापों पर उनका स्वर मुखर है। हाशिये के लोगों का संवेदनात्मक चित्र खींचना तो रेखाचित्र की प्रमुख विशेषता है। अभावग्रस्त, दीन-हीन, वृद्ध-लाचार, अपाहिज, शोषित लोगों के इर्द-गिर्द रेखाचित्र की कथा-वस्तु निर्मित होती है। वस्तुतः केवल इन रेखाचित्रों में समाज को ज्यों का त्यों रख देने की कोशिश भर नहीं है, अपितु अपनी विचारधाराओं से समाज को दिशा देने की भी कहीं न कहीं कोशिश है।

‘अतीत के चलचित्र’ में विधवा मारवाड़िन वधू के जीवन का महादेवी ने बड़ा ही कारूणिक चित्रांकन किया है। सभी सुख-सुविधाओं से वंचित ‘समाधि जैसे घर में लोहे के प्राचीर से घिरे फूल के समान, वह किशोरी बालिका बिना किसी-संगी-साथी, बिना किसी प्रकार के आमोद-प्रमोद के निरंतर वृद्धा होने की साधना में लीन थी।… इसी साधना के बीच सौभाग्यवती ननद के पुरस्कार स्वरूप ‘भाभी के दुर्बल गोरे हाथों पर जलने के लम्बे, काले निशान और पैरों पर नीले दाग रह जाते थे।’13

वेश्यावृत्ति सामाजिक व्यवस्था के विफलता का ही परिणाम है और इससे उत्पन्न समस्याएँ बहुस्तरीय है। राहुल सांकृत्यायन ने इस समस्या पर ‘रूपी’ रेखाचित्र लिखा जो ‘मधुपुरी’ में रहने वाली माँ-बेटी के मजबूरीवश वेश्यावृत्ति को पेशा अपनाने की मार्मिक कहानी कहता है। असाध्य रोग से पीड़ित पात्रा पेट पालने के लिए अपना रोग लोगों से छुपाती है और परिणामस्वरूप यह बीमारी आगंतुकों में भी फैलता जाता है। सांकृत्यायन लिखते हैं- ‘वेश्यावृत्ति को सभी धर्मों ने पाप बतलाया है और इसके लिए नर्क में कठोर यातनाओं का चित्र खींचा है, लेकिन हजारों वर्षों से नर्क की धमकी दी जा रही है तो भी वेश्यावृत्ति कम होने की जगह बढ़ती ही गई। उधार के दंड का यहाँ कोई सवाल नहीं, क्योंकि धीरे-धीरे प्रकृति भी इसे बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं हुई और उसने इसी जन्म में आँखों के सामने घोर दंड देना शुरू किया और रजित रोग (सुजाक) ने दुनिया में अपना फैलाव शुरू किया।14

महादेवी वर्मा व बेनीपुरी के अधिकांश रेखाचित्र के पात्र सामाजिक- आर्थिक विषमता के शिकार है। गाँव का निर्धन बालक ‘घीसा’ हो या बेनीपुरी की पात्र ‘रजिया’, पाठक की समस्त संवेदनाओं को जागृत कर देता है। चंद पैसों की जरूरत के खातिर मेहनतकशों की पैंतरेबाजी हास्य से अधिक गंभीर संवेदना पैदा करती है। रेखाचित्रों ने समाज के एक और उपेक्षित विकलांग व अपाहिजों को केंद्र में रखकर भी कई रचनाएँ की हैं। विकलांगता अपने साथ कई और अवांछनीय समस्याओं को साथ लाती है। जन्मजात, कुपोषण या कोई दुर्घटनावश कोई व्यक्ति विकलांग हो सकता है लेकिन लोगों का उनके प्रति दृष्टिकोण संवेदनहीन व घृणास्पद भी रहा है। आज के समय तक कई हिस्सों में विकलांगों के दर्शन को अपशकुन तक माना जाता है। हालांकि आज इनके प्रति दृष्टिकोण में सकारात्मक बदलाव आ रहा है और अब इन्हें ‘दिव्यांग’ कहा जाता है। विकलांगता के साथ जीवन निश्चय ही कठिन और दुष्कर है। रचनाकारों की संवेदना इनकी समस्याओं को लेकर भी गंभीर है।

धार्मिक आयाम

धर्म आदिम काल से मनुष्य जीवन को प्रभावित करता रहा है। कला, साहित्य और संस्कृति भी इससे अछूती नहीं रही है, कला और साहित्य को इतिहास में भी धार्मिक केंद्रों द्वारा संरक्षण दिया जाता रहा है। धर्म अपने बाहरी रूप, रीतियाँ एवं कर्मकाण्डों के कारण पुरोहितों, पंडों, पुजारियों व मौलवी, पादरियों के अधीन रहा है और आम आदमी धार्मिक क्रियाओं में उनकी व्याख्याओं पर निर्भर रहा है। एक विशेष वर्ग ने धर्म के उच्च पदों पर जाति के आधार पर कब्जा करके रखा और उनकी विलासिता और भ्रष्ट आचरण भी लोगों को प्रभावित करता रहा। इससे धर्म का सही रूप तिरोहित हो गया और यह कर्मकांड बनकर रह गया। धर्म विभिन्न प्रकार के झगड़ों एवं सांप्रदायिक उपद्रवों का भी कारण बनता रहा है। साहित्यकार इन सब का चित्रण कर पाठक को सजग करते हैं। रेखाचित्रकारों ने धर्म के सकारात्मक व नकारात्मक उपक्रमों दोनों को तटस्थ्ता से देखा है। जातिवाद, संप्रदाय, अंधविश्वास, कर्मकांड पर चोट करते कई रेखाचित्र उदाहरण स्वरूप दिए जा सकते हैं। धर्म की अस्वस्थ परंपरा का भंजन इन रेखाचित्रों में मिलता है।

रेखाचित्र के सिद्धहस्त रचनाकार रामवृक्ष बेनीपुरी इन्हीं विडंबनाओं के शिकार हुए। उनके बचपन के समय में मृत माँ का प्रेत अपने बच्चे को अपने पास न ले जाए, इसलिए माँ के शव की टाँगों में कीलें ठोंक दी जाती थी। बेनीपुरी की प्यारी माँ की टांगों में ऐसी ही कीलें ठोक दी गई थी। बेनीपुरी इस क्रूर अंधविश्वास को याद कर बाद के वर्षों में सिहर उठते और आक्रोश उनका यों फूटता- ‘जहाँ माँ का, मातृत्व का, संतान प्रेम का ऐसा अपमान हो, निरादर हो, उस समाज को जहन्नुम में जाना चाहिए।’15

बेनीपुरी ‘बालगोबिन भगत’ में ‘जातिवाद’ को ठुकराते लिखते हैं- ‘तेली जिसका मुख देखने के बाद यात्रा-सफल नहीं होती- ऐसी व्यवस्था दे रखी थी हमारे समाज ने। तेलिया-मसान, यह घृणास्पद आस्पद जुड़ा था, जिस जाति के साथ! और, तब तक मुझमें वह ज्ञान भी न था कि समझूँ कि ये सारी बातें हमारे सड़े समाज की घृणिततम मनोवृत्ति का सूचक है!… न जाने वह कौन-सी प्रेरणा थी, जिसने मेरे ब्राह्मण का गर्वोन्नत सिर उस तेली के निकट झुका दिया था। जब-जब वह सामने आता, मैं झुककर उससे राम-राम किए बिना नहीं रहता।’16

पौराणिक कथाओं व मिथकों की रोचकता भी रेखाचित्र का विषय बना है। देश की जातीय-स्मृतियों को सुरक्षित रखने की इसमें अपार क्षमता होती है। ‘गिल्लू’ रेखाचित्र में महादेवी कौवों को देखकर सोचती है कि- ‘यह काकभुशुण्डि भी विचित्र पक्षी है- एक साथ समादरित, अनादरित, अति सम्मानित, अति अवमानित। हमारे बेचारे पुरखे पितरपक्ष में हमसे कुछ पाने के लिए काक बनकर ही अवतीर्ण होना पड़ता है।’17 हमेशा नापसंद किया जाने वाला कौवा पितरपक्ष में खूब आदर पाता है। महादेवी ने, माघ मेले में गंगा स्नान के बाद दान में भिखारियों के सामने एक रुपया और एक मुट्ठी अनाज फेंककर पुण्य लूटने वालों को ‘पुण्य-अहेरी’ का नाम दिया है। ‘रामा’ नामक रेखाचित्र में पौराणिक पात्र ‘धर्मराज’ अर्थात् यमराज मृत्यु के देवता के सुसंगत प्रयोग से निर्मल हास्य की सृष्टि भी की है।

राजनीतिक आयाम

साहित्यकार समाज का प्रहरी है। वह न केवल आम जनता पर नजर रखता है बल्कि समाज, राज्य और देश के विकास में भागीदारी व जिम्मेदारी लेने वाले राजनेताओं व उनकी राजनीति से भी मतलब रखता है। देश की मुख्यधारा की राजनीति स्वार्थ, परिवारवाद, धन बल, बाहुबल, अवसरवाद व छल कपट पर टिकी रही है। राजनैतिक दल व नेतागण सभी मूल्यों को तिलांजलि देकर, सत्ता में बने रहने के लिए जातिवाद, सांप्रदायिकता आदि को हवा देते हैं। अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए समाज के जनता की एकता को तोड़ते हैं। चुनाव पूर्व के जनता से किए वादे, जीतते ही ठंढे बस्ते में डाल दिए जाते हैं। आजादी के इतने सालों बाद भी हमारा देश इन्हीं वजहों से तरक्की के उस मुकाम पर नहीं पहुँच पाया, जितनी इस देश की क्षमता रही है। साहित्यकारों ने इन विषयों पर भी रेखाचित्र लिखे, क्योंकि सामाजिक, आर्थिक विकास में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इनके लिखे रेखाचित्रों में क्रांति के स्वर हैं। अपनी विचारधाराओं को भी रचनाकारों ने मुखरता से जगह दी है।

‘लालतारा’ की भूमिका में बेनीपुरी लिखते हैं कि ‘यह मेरे शब्दचित्रों का पहला संग्रह है। इसका पहला रूप उस जमाने में निकला था, जब मैं सिर से पैर तक लाल-लाल (मार्क्सवादी विचारधारा पूर्ण) था। ‘लालतारा’ एक नए प्रभात का प्रतीक था। वह प्रभात अब अधिक सन्निकट है। शायद इसलिए अंधकार भी अधिक सघन हो चला है। यह अंधकार छँटे, नए प्रभात का सर्वोदय हो, इसी कामना के साथ।’

‘हमारे राष्ट्रपति’ में बेनीपुरी का राजेन्द्र बाबू के प्रति लगाव व श्रद्धा का संवेदनात्मक चित्रण है- ‘राजेन्द्र बाबू को बिहार का कौन विद्यार्थी नहीं जानता था? उस समय के विशाल कलकत्ता विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों में सर्वप्रथम आकर उन्होंने बिहार के विद्यार्थियों की प्रतिभा की धाक जमाई थी। ‘बिहारी-छात्र-सम्मेलन’ की स्थापना कर बिहार के विद्यार्थियों का जैसा संगठन किया था, वैसा आज तक नहीं किया जा सका। इसके संरक्षण में गाँवों में निरक्षरता दूर करने के प्रयास से लेकर, छात्रों के बीच व्यायाम, व्याख्यान, संगीत, अभिनय आदि की प्रतियोगिताएं चलती रहती थी। फिर, चंपारण के किसान संघर्ष में, राजेन्द्र बाबू ने गांधी जी का पूरा साथ देकर बिहार की जनता का मन मोह लिया था। अब गांधी जी की पुकार पर सबसे पहले असहयोग कर उन्होंने बिहार का नेतृत्व अपने कंधों पर लेकर हमें कृतार्थ किया था। ऐसे और वही राजेन्द्र बाबू हमारे आचार्य होंगे, हम उनके चरणों के निकट बैठकर ज्ञान प्राप्त करेंगे, यह कल्पना ही हमें मुग्ध बनाने के लिए काफी थी।’18

निष्‍कर्ष:- यह कहा जा सकता है कि संवेदना के विविध आयाम रेखाचित्रों में समाहित है। किसी पात्र, वस्तु, घटना के कारण जो संवेदनाएं रचनाकार में जागृत होती हैं, उसका प्रसार उनकी कृतियों में बखूबी है। रचनाकार की सहानुभूति व्यक्ति, समाज और राष्ट्र से है, मानव व मानवेत्तर प्राणियों से भी है। रेखाचित्र विधा इस मूल्यह्रास के युग में, मशीनी व व्यस्त जीवन में फंसे मानव में और अधिक संवेदनशीलता जागृत करने में सक्षम है।

संदर्भ सूची

  1. देवेन्द्र सत्यार्थी, रेखाएँ बोल उठी, प्रगति प्रकाशन, दिल्ली, 1949 ई., पृ. 165
  2. विष्णु प्रभाकर, जाने-अनजाने, विश्वविद्यालय प्रकाशन, गोरखपुर, 1961 ई., पृ. 44
  3. वही, पृ. 48
  4. कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, दीप जले, शंख बजे; भारतीय ज्ञान पीठ, नई दिल्‍ली, 1959 ई., पृ. 13
  5. उपेन्द्र नाथ अश्क, ज्यादा अपनी: कम परायी, नीलाभ प्रकाशन, इलाहाबाद, 1959 ई., पृ. 135
  6. कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, दीप जले: शंख बजे, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्‍ली, 1959 ई. पृ. 7-8
  7. श्रीराम शर्मा, बोलती प्रतिमा, आर्य बुक डिपो, नई दिल्‍ली, 1996, पृ. 70
  8. महादेवी वर्मा, स्मृति की रेखाएँ, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2014, पृ. 27-28
  9. रामवृक्ष बेनीपुरी, रचना संचयन, साहित्य अकादमी, नई दिल्‍ली, 2000 ई., पृ. 178
  10. महादेवी वर्मा, मेरा परिवार, उच्छ्वास-इलाचंद्र जोशी से
  11. महादेवी वर्मा, मेरा परिवार, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2014, पृ. 34
  12. श्यामचरण दूबे, भारतीय समाज, राष्ट्रीय पुस्तक न्याय, नई दिल्ली, 2014, पृ. 126
  13. महादेवी वर्मा, अतीत के चलचित्र, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2015, पृ. 27-29
  14. ‘नई धारा’ पत्रिका, वर्ष 4, अंक 10, 1954 ई., राहुल सांकृत्यायन का रेखाचित्र ‘रूपी’।
  15. लक्ष्मीनारायण मिश्र, नई धारा (पत्रिका), बेनीपुरी स्मृति अंक, पृ. 225
  16. रामवृक्ष बेनीपुरी, रचना संचयन, साहित्य अकादमी प्रकाशन, नई दिल्‍ली, 2000 ई., पृ. 177
  17. महादेवी वर्मा, मेरा परिवार, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2014 ई., पृ. 33
  18. रामवृक्ष बेनीपुरी, मील के पत्थर, सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन, नई दिल्‍ली, 1957, पृ. 47

फणीश्वर नाथ रेणु प्रणीत रिपोर्ताजों में अभिव्यक्त आम -जन की पीड़ा: डॉ. अनीता यादव 

फणीश्वर नाथ रेणु प्रणीत रिपोर्ताजों में अभिव्यक्त आम -जन की पीड़ा

डॉ. अनीता यादव 

एसोसिएट प्रोफेसर

गार्गी कॉलेज

दिल्ली यूनिवर्सिटी

सारांश

हिंदी साहित्य में रिपोर्ताज विधा सर्वाधिक नई विधा है।  इस विधा को विकसित करने में फणीश्वर नाथ रेणु की अप्रतिम भूमिका है।  रेणु जी ने समकालीन सामाजिक एवं राजनीतिक परिवेश को सदैव गंभीरता से लिया।  मानवीय संवेदना से लिप्त  उनके द्वारा प्रणीत रिपोर्ताज अमूर्त भावों को मूर्त करने में पूर्ण सक्षम है।  सामाजिक जीवन में सक्रियता एवं जनहित हेतु लेखन रेणु जी का न केवल उत्तरदायित्व बल्कि लक्ष्य भी रहा है। उन्होंने रिपोर्ताज विधा में न केवल बिहार की आम जनता के लिए आवाज  उठाई अपितु नेपाल की राणाशाही के विरुद्ध भी कलम एवं आवाज बुलंद की।  यही बुलंद आवाज लेखनी के रूप में आलोच्य  रिपोर्ताजों में दर्शनीय है इसी की पड़ताल प्रस्तुत शोध आलेख का लक्ष्य है। 

 बीज शब्द– विभीषिका ,त्रासदी, मृग- मरीचिका, सामूहिक रुदन , राणाशाही, अर्थहीनता , अमूर्त भाव।   

शोध आलेख

जिस समय साहित्य के क्षेत्र में कवि, कथाकार, कहानीकार के रूप में प्रतिभाओं का उदय प्रगति पर था उस समय फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ बहुमुखी प्रतिभा संपन्न रूप में न केवल कथाकार बल्कि कथेतर साहित्य के प्रणेता रूप में साहित्य के सूर्य बनकर उदित हो चुके थे। अंचल विशेष को लेकर रची गई उनकी कहानियां एवं उपन्यास विधा ही चर्चित नहीं रही बल्कि कथा से इतर  रिपोर्ताज विधा के सरताज रूप में भी ख्याति मिली। पत्रकारिता की  रिपोर्ट से विकसित हुई इस  नई विधा को स्थापित करने का काम यदि रांगेय राघव द्वारा मान लिया जाए तो इसके विकास का श्रेय फणीश्वर नाथ रेणु को देने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं है। उनकेद्वारा प्रणीत इन रचनाओं में अभिव्यक्त आम जन-जीवन न केवल भारत के बिहार राज्य  बल्कि पड़ोसी देश नेपाल की सरजमी तक पहुंचता हैं। नेपाल में मजदूरों की नरक सरीखी  जिंदगी को ‘सरहद के उस पार’ नामक रिपोर्ताज में वर्णित किया है। रेणुजी  मानते हैं कि अकाल की विभीषिका  से उत्पन्न आम जीवन की त्रासद स्थति के पीछे भले ही नेपाल की सत्ता एवं सत्ता की गोद में बैठकर स्वार्थ सिद्धि में लिप्त पूंजीपति है लेकिन चुप्पी साधे हुए भारतीय नेताओं को भी वे उतना ही जिम्मेदार मानते हैं।  रेणु जी नेपाल के विराटनगर शहर के दौरे पर हैं । वहां की आम जनता की स्थिति से लेकर मजदूरों की दुर्दशा  को खुली आंखों से देखते हैं।  विराटनगर 1942 की क्रांति के दौरान भारत के समाजवादियों का एक महत्वपूर्ण ठिकाना था। परिणाम स्वरूप नेपाली सरकार की दृष्टि में यह नगर हमेशा चुभता रहा। उस पर कड़ी निगरानी रखी जाती थी। चूंकि यह शहर चमडिया, सिंघानिया जैसे पूंजीपतियों का केंद्र था और मिलें  विराटनगर की छवि को ‘मिलो का नगर’ रूप में स्थापित कर चुकी थी। पूँजीपतियों को यहाँ न केवल नेपाली राणाशाही की मिलीभगत के परिणाम स्वरूप इनकम टैक्स से छूट मिल  रही थी बल्कि इनके षड्यंत्र भी चलते रहते थे जिसके कारण लेखक इस क्षेत्र को षड्यंत्र-क्षेत्र कहने से नहीं चूकता। कानून तोड़ने वाले ही कानून निर्माता भी थे। ऐसे में आमजन से लेकर निरीह जनता एवं मिलों में काम करने वाले हजारों मजदूर अपने परिवार सहित इनके दमन चक्र में पीसने  को मजबूर थे। मजदूरों के लिए बनाए गए रिहाइश को लेखक ‘सूअर के खुहारों का समूह’ कहकर संबोधित करता है।  इससे  पता चलता है कि  यहां  मनुष्य और सूअर में कोई भेद नहीं। खुद को इनका रहनुमा मानने  वालों द्वारा इस भेद को मिटाने के कोई प्रयास भी नहीं दिखते।  इन सब के पीछे वह पूंजीपति ही हैं  जिन के लिए मजदूर अपना खून बहा कर उनकी तिजोरिया भर रहे थे। मजदूर हड़ताल या अपनी मांगों के लिए संघर्ष तो छोड़िए उफ तक नहीं करते थे।  इस विषय में रेणुजी  लिखते हैं-’ इन मिलों में पंद्रह बीस हजार मजदूरों की पिसाई होती है मगर कभी आह भी नहीं करने दिया जाता है।  मांगो एवं हड़तालों की चर्चा तो स्वप्न में भी नहीं की जाती।”1 

जहां मजदूर अपने परिवारों संग रहते हैं उस स्थान की ओर संकेत करते हुए लेखक  लिखता है- “देखिए दाहिनी ओर वह मजदूर कॉलोनी है या सूअर के खुहारों का समूह।  उनके बच्चे एवं औरतों की दशा देखिए कितनी दर्दनाक सूरत हैं।”2 

मजदूरों के लिए बनी इस कॉलोनी में न स्कूल है, ना अस्पताल लेकिन दिल बहलाने हेतु जगह-जगह शराब खाने एवं  वेश्यालय  खुले हैं।  न केवल शराब के फ्लेवर उपलब्ध है बल्कि वेश्यालय में वेश्याएँ भी अलग-अलग स्थानों से लाकर रखी गई हैं- ‘औसतन दस क्वार्टरों पर एक वेश्यालय।  महुआ, धान, जौ , सॉफ, नारंगी, नासपत्ती, केले की शराब। और वेश्याएं? देसी, पहाड़ी, बंगाली ,असमी ,सिंगापुरी ,बर्मीज, सस्ती- महंगी सब तरह की।”3 

ऐसी  व्यवस्था से मजदूरों  को ऐसे कुएँ में डूबोए रखने का इंतजाम है ताकि वह कभी अपनी वास्तविक स्थितियों का आकलन न कर पाए और पूंजीपतियों का स्वार्थ चक्र निरंतर गतिमान रहे। पूंजीपतियों द्वारा सत्ता के साथ मिलकर त्त्योहार और नेपाली महाराजा के जन्मदिन पर जुए के लिए छुट्टियों की घोषणा किया जाना विराटनगर के मजदूरों की हालत को और दयनीय बनाता है। नेपाल के मजदूरों की बदतर स्थितियों के लिए लेखक न केवल नेपाली सत्ता, वहां बैठे पूंजीपतियों को ही जिम्मेदार मानता है बल्कि भारतीय नेताओं की चुप्पी पर भी सवाल उठाता है-”देश के नेताओं की निगाह पर तो जैसे पट्टियां बंधी हैं। मुंह पर ताले पड़े हैं।  उन्हें दुनिया भर के लिए दर्द है पर नेपाल की शोषित जनता के लिए उनके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकलता ‘’4 

‘भूमि का दर्शन की भूमिका’ नामक रिपोर्ताज में भी  रेणु अपने कवि मित्र यायावर [अज्ञेय] के साथ यात्रा पर हैं। इस रिपोर्ताज में लेखक ने बिहार के अकाल के कई रंग और रूप दिखाये हैं।  जगह-जगह मरे हुए पशुओं के शरीरों पर लड़ते हुए गिद्धौ, काग के झुंड देखकर मन उद्विग्नता के सागर में डूब उतर रहा है। यायावर द्वारा मुसहर जाति के बालक की ओर अमरूद बढ़ाने से बालक के मन में उपजे एक अलौकिक उल्लास को देखकर लेखक अति संवेदनशील हो उठता है और ऐसे में लेखक को गाँव का वह नक्षत्र याद हो उठता है जिसे लोग नछत्तर मालाबार कहते थे। वही नक्षत्र जो भूखी आम जनता के मसीहा और व्यापारियों के लिए लुटेरा एवं डकैत रहा। और ‘‘जिसका नाम सुनते ही गरीब गांव में खुशी की लहर दौड़ जाती थी। अमीरों की हवेलियों में सन्नाटा छा जाता और अधिकारियों का आराम हराम…”.5

इसी नछत्तर को लेखक गुमराह कहता है। वास्तव में नक्षत्र से नच्छत्तर  में रूपांतरण नक्षत्र की संवेदनशीलता का प्रमाण है।  वह उन भूखे गांव वालों की आंखों में उस दर्द की लहर को महसूस कर सकता है इसलिए एक बार लेखक को भी वह एक पत्र में लिखता है कि एक बार यदि लेखक गांव आकर इन भूखी आत्माओं को देखे तो उनके लिए लूटपाट करके जेल जाने या फांसी पर भी चढ़ जाने का दुख नहीं।  दिन भर के भूखे बालक का पेट भरने पर जो आत्मिक खुशी होती है उसके लिए नछत्तर फांसी पर भी चढ़ने को तैयार है।  यहां पाठक भी महसूसता है कि नक्षत्र द्वारा की गई लूटपाट लेखक [रेणुजी] को एक तरह से सही प्रतीत होती है लेकिन अपनी भावता पर लेखक जल्द ही वैचारिक चादर डाल देते हैं।

 डाल्टनगंज में अकाल पीड़ित होने के बावजूद मुसहर जाति के लोगों की जीवनशैली और ड्राइवर गणेश द्वारा गांजा मांगना जीवन के प्रति ललक को दर्शाता है। उनकी  जिजीविषा देख एक स्थान पर लेखक खुद से सवाल कर उठता है-’’ कौन कहेगा कि बिहार में सूखा और अकाल है..”. 6 

लेकिन औरंगाबाद आते आते फिर वही झुलसी हुई धरती, कुत्सित, कुरूप भूखंड।  यहां लेखक को बिहार अकाल का बदरंग चेहरा दिखता हैं जिनमें एक रूप उन मुफ़्त लंगरो का भी है जो डीसी द्वारा उद्घाटन के आयोजन मात्र ही साबित होते हैं।  उन भूखी आत्माओं के अंतर्मन से किया जा रहा खिलवाड़ मात्र।  लंगर के रूप में प्रीतिभोज और’ प्यारे भाई बहनों’ का संबोधन लेखक को व्यर्थ जान पड़ता है।  सब सत्ता द्वारा किया गया दिखावा।  प्रीतिभोज के रूप में पत्तल पर एक मुट्ठी चावल और सोयाबीन की घूघनी।  और किसी को यह भी मयस्सर नहीं। न ही वे मांग रहे हैं क्योंकि लाशों में तब्दील हो चुके हैं। सामूहिक रुदन के इस रूप को कोई समझने को तैयार नहीं। इन्हे ही लेखक मुर्दों की टोली कहता है-’ मैंने जीवन में ऐसे लोगों की भीड़ कम ही देखी है चलते फिरते मुर्दों की टोली। मुझे लगा मुंह में ग्रास डालकर  चबाए   और कोई स्वाद पाए  बिना ही लोग निगलते जा रहे हैं’’7  मुर्दों की इस टोली के विपरीत भरे पेट लंगर  आयोजकों का अपना ही खेला चल रहा है।  कैसे अखबार या पत्रिका में सही फोटो आए, कैसे फ़ोटो में लंगर लगाए साइन बोर्ड की तस्वीर सही तरीके से दिखाई दे? ऐसे में मरते हुए लोगों की परवाह आखिर किसे थी?

 बात चाहे अकाल की हो अथवा  बाढ़ की। आम जन -जीवन दुश्वारियां से भर उठता है।  सहायता के नाम पर सत्ता केवल दिखावटी सहानुभूति के अतिरिक्त कुछ नहीं करती। मृग-मरीचिका में भटकते ये निरीह प्राणी कितने विवश है यह ‘पुरानी कहानी नया पाठ’ रिपोर्ताज में द्रष्टव्य है। कोसी नदी की बाढ़ के दौरान आम जीवन कितना त्रासदीपूर्ण हो सकता हैं लेखक ने यही दिखाने का प्रयास इस रचना में किया हैं। अचानक आई बाढ़ और उससे उत्पन्न विपत्ति को लेखक साक्षात देखता हैं फिर उसे अपनी संवेदना के देग में पकाकर न केवल पाठक को संवेदित करता है बल्कि  इस त्रासदी के पीछे कैसे जनसेवक अपना स्वार्थ साधते हुए राजनीतिक रोटियां सेकते हैं -बखूबी दिखाया है। मीडिया भी कम स्वार्थी नहीं है। खबरों को बेचने- खरीदने की होड़ में वह किस कदर रसातल की ओर अग्रसर है -यह सर्वविदित है।  बाढ़ पीड़ितों से  मुट्ठी भर अनाज के बदले  कैसे अंगूठे की टीप ली  जाती हैं… ,कैसे दाने- दाने का हिसाब रखा जाता हैं।  इसके विपरीत स्वार्थी तत्व अनाज से भरी नाव को बाढ़ के पानी में विलीन दिखाकर कैसे खुद भरी बोरियों को निगल जाते हैं – यही स्वार्थ की पराकाष्ठा है।  राजनीति से लेकर मीडिया और मीडिया से लेकर राहत कैंप कैसे एक पीड़ित व्यक्ति को बार-बार छलते हैं इसका  ब्यौरेदार  विवरण है यह रिपोर्ताज।

 नदियों को मां के रूप में मारने वाला यह आम व्यक्ति न केवल सत्ता,राजनीति,बल्कि  प्रकृति द्वारा भी छला जाता है।  -’’ धरती पर मरे हुए पशुओं की लाश- कंकाल।  हरी-भरी फसलों के सड़ते हुए पौधे, दुर्गंध दुर्गंध कीड़े धरती की सड़ी हुई लाशें’’8  छोटे शहर ही नहीं बल्कि पटना जैसे बड़े शहर भी बाढ़ की विभीषिका को झेलते हैं।  ‘कुत्ते की आवाज’ नामांक रिपोर्ताज में पटना के पश्चिमी इलाके में छाती भर पानी चढ़ने  के कारण उत्पन्न स्थिति का वर्णन लेखक ने बड़े ही सजीव रूप में किया है। आम जीवन कैसे प्रभावित होता है बावजूद उसकी जीवन के प्रति ललक विद्यमान हैं – यही लेखक ने इस रचना में दिखाने का प्रयास किया है।  लेखक खुद मोमबत्ती, दीयासलाई से लेकर पान और सिगरेट के जुगाड़ में राजभवन और मुख्यमंत्री निवास तक पहुंच जाते हैं।  वे देखते हैं कि कैसे लोग निचली मंजिलों को खाली कर ऊपर की मंजिलों पर जा रहे हैं। ऐसे में जब जीवन अर्थहीनता का पर्याय महसूस हो सकता है बावजूद ताश की गड्डी का जुगाड़ करना वे नहीं भूलते।  यह आम व्यक्ति की जीवन के प्रति एक सकारात्मक दृष्टि है जो उन्हें कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी जीने का अवसर मुहैया कराती है। लोगों को बचाने आई नाव पर कुत्ते को न चढ़ने देने की हिदायत पर नौजवान खुद पानी में उतर पड़ता है।  यह दृश्य दिखाता है कि एक आम व्यक्ति अपनी जान से अधिक अपने जानवरों से प्यार करता है और किसी भी हालत में उन्हें मरने देना नहीं चाहता। बाढ़ में विलीन होता जीवन का दृश्य लेखक ने निम्न शब्दों में व्यक्त किया है-’ ‘बेबस कुत्तों का सामूहिक रुदन, बहते हुए सूअर के बच्चों की चिचियाहट, कोलाहल, कलरव, कोहराम यह एक एक शब्द जनजीवन के विलीन होने को दर्शा रहे थे’’9

       भारतीय जीवन में नदी नदी न होकर मां के रूप में पूजनीय मानी जाती है। रेणु जी का ‘जै  गंगा’ रिपोर्ताज माँ की संज्ञा पा चुकी गंगा नदी के उफान से जन जीवन की अस्त-व्यस्तता को दर्शाता है।  बाढ़ से प्रभावित जीवन उबर भी जाए लेकिन सत्ता में बैठे आमजन के ठेकेदार और जनप्रतिनिधियों द्वारा बाढ़ की आड़ में किया गया शोषण और सत्ता की दिखावटी मदद इनके जीवन को बद से बदतर बनाने में कोई कोर कसर नहीं रखती।  बूढ़ा फैजू हताश और परेशान है उसकी परेशानी का कारण वे नाव और स्टीमर है जो प्रशासन द्वारा मदद के लिए तैनात किए गए हैं लेकिन बाढ़ का पानी लोगों के घरों में घुसकर अट्टहास कर रहा है। बावजूद ‘ऊपरी आदेश’ के अभाव में ये स्टीमर  बेकार पड़े हैं। दर्जनों गांव पानी में डूब जाने के बावजूद साहब लोग मजे से रेडियो सुन रहे हैं।  जब तक ऊपरी आदेश ना मिले तब तक कुछ भी करने की मनाही है।  डी टीए एस साहब आराम से कंठहारपुर जंक्शन के बंगले में मजे से रेडियो प्रोग्राम सुन रहे हैं और जिला मजिस्ट्रेट को शायद खबर भी नहीं मिली कि दर्जनों गांव के सैकड़ों प्राणी किसी भी वक्त मौत के मुंह में समा सकते हैं। इन मरते डूबते आमजन के साथ रिलीफ फंड कमेटी से लेकर राजनीतिक पार्टियां तक उपहास करती प्रतीत होती हैं।  दावते उड़ रही है लेकिन आमजन दो वक्त तो छोड़िए एक वक्त की रोटी के लिए बिलख कर जान दे रहा है।

निष्कर्ष- स्पष्ट है कि बिहार एवं पड़ोसी देश नेपाल के गांव के सामाजिक जीवन समेत  जनचेतना को वाणी देने का काम रेणु जी ने अपने इन रिपोर्ताजों में बखूबी  किया है।एक तरफ बाढ़ अथवा अकाल से उत्पन्न पीड़ा से बिलबिलाते आम लोग हैं तो दूसरी ओर स्वार्थ की सीढ़ी लिए राजनेता और  सत्तासीन हैं जो आमजन की समस्याओं को कम करने  या मदद के नाम पर बढ़ा रहे हैं।  एक मानव ही दूसरे मानव के दुख का कारक है  -कितनी बड़ी विडंबना है।  सामान्य जन की पीड़ा और संघर्ष गाथा का बेहद संवेदनशील और मार्मिक चित्रण इन रचनाओं में  दृष्टिगत है।

संदर्भ सूची

  1. सरहद के उस पार – फणीश्वरनाथ रेणु-गद्द कौमुदी -संपादक -प्रोफेसर रमेश गौतम ,वाणी प्रकाशन,पृष्ठ-111
  2. वही,पृष्ठ-112
  3. वही,पृष्ठ-112
  4. वही,पृष्ठ-114
  5. भूमिदर्शन की भूमिका -फणीश्वर नाथ रेणु -गडद्य संकलन क ,संपादक- प्रोफेसर सुरेशचंद्र गुप्त , प्रकाशक दिग्दर्शन -पृष्ठ-83
  6. वही,पृष्ठ-86
  7. वही,पृष्ठ-88
  8. पुरानी कहानी नया पाठ -फनीश्वरनाथ रेणु – गद्द मंजूषा -संपादक -ओमप्रकाश शर्मा । प्रकाशक-सतीश बुक डिपो-पृष्ठ-94
  9. वही,पृष्ठ-96

गीतांजलि श्री को मिला वर्ष 2022 का अंतरराष्ट्रीय बुकर सम्मान

बुकर प्राइज़ 2022: गीतांजलि श्री

आज समस्त हिन्दी भाषियों के लिए गर्व का दिन है क्योंकि गीतांजलि श्री जी को उनके उपन्यास ‘रेत समाधि’ के अंग्रेजी अनुवाद ‘Tomb of Sand by ‘ Daisy Rockwell’ के लिए वर्ष 2022 का बुकर सम्मान दिया गया है।

यह कार्यक्रम यूट्यूब पर लाइव चल रहा था। कमेंट बॉक्स में घोषणा होने से पहले लोग गीतांजलि श्री का समर्थन कर रहे थे और जैसे ही 2 बजकर 45 मिनट पर गीतांजलि श्री जी के उपन्यास का नाम घोषित हुआ पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।

यह हम सभी के लिए गर्व का क्षण है।

इस अवसर पर समस्त हिन्दी जगत की ओर से गीतांजलि श्री जी को बहुत बहुत बधाई

(सभी तस्वीरे बुकर सम्मान के लाइव कार्यक्रम की स्क्रीनशॉट है)

प्रेम नहीं प्रताड़ना

a person sitting on wooden planks across the lake scenery
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प्रेम को प्रताड़ित करने वाले को कभी समझ नहीं आएगा प्रेम
उसे सुनाई नहीं देंगी सिसकियाँ..
दिखाई नहीं देंगें आंसुओं के निशान
देह – आत्मा जब दंशों से भर जाएगी
आत्मा कराह उठेगी! वो बदजुबानी के चाबूक चलाएगा
रोज स्वाह होगा सात जन्मों का बंधन
मरा हुआ मन, टीसता तन कितनी दूर चल पाएगा
काले मोती जब रूप धर ले सर्प का! बूंद बूंद विष उतरता जाए..! एक लावे में तब्दील हो जाता तथाकथित प्रेम!!
प्रेम जो है ही नहीं! न कभी था उसका प्रतिकार क्यू नहीं!
गाय ढोर, की तरह ब्याह दी जाती है सही शब्दों में घर से निकाल दी जाती है… फिर उस दहलीज से कोई ताल्लुक नहीं होता! पिता भी अभिशाप हो जाते हैं कभी!
पिता और पति एक ही नस्ल के जीव है जिन्हें जन्म से
प्रताड़ित करने का पाठ पढ़या जाता है!
मां देवी होती है सास बनते ही ह्रदय हीन हो जाती
बहु नहीं वो कामवाली हो जाती है
प्रेम समर्पण तिल तिल मरना.. पीहर की लाज रखना
यह घुट्टी बस औरत को पीलायी जाती है!
अरे छोड़ो यह ढकोसले! सारी दुनियादारी बस एक के लिए
यह झूठे बंधनों की कुरीति अब तोड़नी चाहिए!